হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8595)


8595 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سنان القزاز، حدثنا إسحاق بن إدريس، حدثنا أبان بن يزيد، حدثنا يحيى بن أبي كثير، حدثنا أبو قلابة عبد الله بن زيد الجرمي، حدثني أبو أسماء الرَّحَبي، أن ثوبان حدثه، أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ رَبِّي زَوَى لي الأرضَ حتى رأيتُ مشارقها ومغاربها، وأعطاني الكنزين: الأحمر والأبيضَ، وإن أمتي سيبلغ ملكها ما زُوِيَ لي منها.وإني سألت ربي لأمتي أن لا يُهلِكَها بسَنَةٍ عامة [1] فأعطانيها، وسألته أن لا يُسلّط عليهم عدوًّا من غيرهم فأعطانيها، وسألته أن لا يُذِيقَ بعضهم بأسَ بعض فَمَنَعَنِيها، وقال لي ربي: يا محمد، إني إذا قضيتُ قضاءً لم يُرَدَّ، إني أعطيتُك لأمَّتِك أن لا أُهلِكَها بسَنَةٍ عامة، ولا أُظْهِرَ عليهم عدُوًّا من غيرهم فيستبيحهم بعامَّةٍ ولو اجْتَمَعَ مَن بأقطارها، حتى يكون بعضهم هو يُهلك بعضًا، وبعضُهم هو يسبي بعضًا. وإني لا أخافُ على أمتي إلَّا الأئمة المضلين.ولن تقوم الساعة حتى تَلحَقَ قبائل من أمتي بالمشركين، وحتى تَعبُدَ قبائل من أمتي الأوثان.وإذا وُضِعَ السيفُ في أمتي لم يُرفع عنها إلى يوم القيامة".وأنه قال: "كل ما يوجد في مئة سنة [2].وسيخرج في أمتي كذَّابون ثلاثون كلُّهم يَزْعُمُ أَنه نبيٌّ، وأنا خاتَمُ الأنبياء لا نبي بعدي.ولن يزال في أمتي طائفة يقاتلون على الحقِّ ظاهرين، لا يضرهم من خَذَلَهم، حتى يأتي أمر الله".قال: وزعم أنه [قال]: "لا يَنزِعُ رجلٌ من أهل الجنة من ثمرِها شيئًا إِلَّا أَخلَفَ اللهُ مكانها مثلها".وأنه قال: "ليس دينارٌ يُنفِقُه رجلٌ بأعظم أجرًا من دينارٍ يُنفِقُه على عياله، ثم دينارٍ يُنفِقُه على فرسه في سبيل الله، ثم دينارٍ يُنفِقُه على أصحابه في سبيل الله".قال: وزعم: أنَّ نبي الله صلى الله عليه وسلم عظَمَ شأن المسألة.و "أنه إذا كان يوم القيامة جاء أهل الجاهلية يحملون أوثانهم على ظهورهم، فيسألهم ربهم: ما كنتم تعبدون؟ فيقولون: ربَّنا لم تُرسل إلينا رسولًا، ولم يأتِنا آمِرٌ، ولو أرسلت إلينا رسولًا لكنا أطوع عبادك لك، فيقول لهم ربهم: أرأيتم إن أمرتكم بأمر، أتطيعوني؟ قال: فيقولون: نعم، قال: فيأخذُ مَواثِيقَهم على ذلك، فيأمرهم أن يعمدوا لجهنَّم فيدخلوها، قال: فينطلقون، حتى إذا جاؤوها رأَوْا لها تغيُّظًا وزفيرًا فهابُوا، فرجعوا إلى ربهم فقالوا: ربَّنا فَرِقْنا منها، فيقول: ألم تُعطوني مواثيقكم لتطيعوني؟ اعمدوا لها، فينطلقون، حتى إذا رأوها فَرِقُوا فرجعوا، فقالوا: ربَّنا لا نستطيع أن ندخلها، قال: فيقول: ادخُلوها داخِرينَ"، قال: فقال نبي الله صلى الله عليه وسلم: "لو دخلوها أول مرة، كانت عليهم بردًا وسلامًا" [3]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السياقة، إنما أخرج مسلم [4] حديث معاذ بن هشام عن قتادة عن أبي قلابة عن أبي أسماء الرَّحَبي عن ثوبان مختصرًا.[وأما حديث عِمران بن حُصَين]:




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় আমার রব আমার জন্য পৃথিবীকে সঙ্কুচিত করে দিয়েছেন। ফলে আমি এর পূর্ব প্রান্তসমূহ এবং পশ্চিম প্রান্তসমূহ দেখতে পেয়েছি। আর তিনি আমাকে দুটি ধন-ভান্ডার—লাল (স্বর্ণ) এবং সাদা (রৌপ্য)—দান করেছেন। আর আমার উম্মতের রাজত্ব ততদূর পর্যন্ত পৌঁছাবে, যতদূর আমার জন্য সঙ্কুচিত করা হয়েছে।

আর আমি আমার রবের কাছে আমার উম্মতের জন্য প্রার্থনা করেছি যে, তিনি যেন তাদেরকে ব্যাপক দুর্ভিক্ষ দ্বারা ধ্বংস না করেন—তিনি আমাকে এটি দান করেছেন। আর আমি তাঁর কাছে প্রার্থনা করেছি যে, তিনি যেন তাদের উপর তাদের ছাড়া অন্য কোনো শত্রুকে কর্তৃত্ব না দেন—তিনি আমাকে এটিও দান করেছেন। আর আমি তাঁর কাছে প্রার্থনা করেছি যে, তিনি যেন তাদের কারো দ্বারা কারো উপর নির্যাতন না দেন—তিনি আমাকে তা দিতে অস্বীকার করেছেন।

আর আমার রব আমাকে বলেছেন, 'হে মুহাম্মাদ! আমি যখন কোনো ফয়সালা করি, তা রদ করা হয় না। আমি তোমাকে তোমার উম্মতের জন্য এই নিশ্চয়তা দিয়েছি যে, আমি তাদেরকে ব্যাপক দুর্ভিক্ষ দ্বারা ধ্বংস করব না, এবং তাদের ছাড়া অন্য কোনো শত্রুকে তাদের উপর কর্তৃত্ব দেব না, যারা তাদেরকে সম্পূর্ণরূপে গ্রাস করে ফেলবে—যদি পৃথিবীর সব প্রান্তের লোকও একত্রিত হয়। কিন্তু যতক্ষণ না তারা নিজেরাই একে অপরের সাথে ধ্বংসাত্মক সংঘাতে লিপ্ত হবে এবং একে অপরকে বন্দী করবে।'

আর আমি আমার উম্মতের ব্যাপারে শুধু পথভ্রষ্ট নেতাদেরকেই ভয় করি। কিয়ামত ততক্ষণ পর্যন্ত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না আমার উম্মতের কিছু গোত্র মুশরিকদের সাথে মিলে যাবে এবং আমার উম্মতের কিছু গোত্র মূর্তিপূজা শুরু করবে। আর যখন আমার উম্মতের মধ্যে একবার তরবারি রাখা হবে (অর্থাৎ যুদ্ধ শুরু হবে), তা কিয়ামত পর্যন্ত আর উঠিয়ে নেওয়া হবে না।"

আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে ত্রিশজন মিথ্যাবাদী আবির্ভূত হবে, যাদের প্রত্যেকেই দাবি করবে যে সে নবী। অথচ আমি শেষ নবী, আমার পরে কোনো নবী নেই। আর আমার উম্মতের মধ্যে একটি দল সর্বদা সত্যের উপর প্রতিষ্ঠিত থেকে লড়াই করতে থাকবে। যারা তাদের সাহায্য করা থেকে বিরত থাকবে, তারা তাদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না, যতক্ষণ না আল্লাহর নির্দেশ এসে পৌঁছায়।"

রাবী ধারণা করেছেন যে, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জান্নাতিদের মধ্যে কেউ যখন জান্নাতের কোনো ফল ছিঁড়ে নেবে, আল্লাহ তার জায়গায় অবশ্যই সেটির মতো অন্য একটি ফল উৎপন্ন করবেন।"

আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ব্যক্তি যে দীনার (স্বর্ণমুদ্রা) খরচ করে, তার মধ্যে সে দীনারের প্রতিদান সবচেয়ে বেশি, যা সে তার পরিবার-পরিজনের জন্য খরচ করে। এরপর তার থেকে বেশি প্রতিদান সেই দীনারের, যা সে আল্লাহর পথে তার ঘোড়ার জন্য খরচ করে। এরপর তার থেকে বেশি প্রতিদান সেই দীনারের, যা সে আল্লাহর পথে তার বন্ধুদের জন্য খরচ করে।"

রাবী মনে করেন যে, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রশ্নের বিষয়টিকে গুরুত্ব দিয়েছেন। আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কিয়ামত সংঘটিত হবে, তখন জাহিলিয়াতের লোকেরা তাদের মূর্তিসমূহ পিঠে বহন করে নিয়ে আসবে। তাদের রব তাদের জিজ্ঞাসা করবেন: 'তোমরা কিসের ইবাদত করতে?' তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! আপনি আমাদের কাছে কোনো রাসূল পাঠাননি, আমাদের কাছে কোনো আদেশদাতা আসেননি। যদি আপনি আমাদের কাছে রাসূল পাঠাতেন, তবে আমরা আপনার সবচেয়ে বেশি অনুগত বান্দাদের অন্তর্ভুক্ত হতাম।' তখন তাদের রব তাদের বলবেন: 'আচ্ছা, আমি যদি তোমাদের কোনো আদেশ দেই, তোমরা কি তা মান্য করবে?' তারা বলবে: 'হ্যাঁ।' তিনি তখন এর উপর তাদের কাছ থেকে প্রতিশ্রুতি গ্রহণ করবেন। অতঃপর তিনি তাদের জাহান্নামের দিকে যাওয়ার ও তাতে প্রবেশ করার নির্দেশ দেবেন। তারা যেতে থাকবে। যখন তারা তার কাছে পৌঁছাবে এবং তার ভয়ানক ক্রোধ ও গর্জন দেখতে পাবে, তখন তারা ভীত হয়ে যাবে। তারা তাদের রবের কাছে ফিরে এসে বলবে: 'হে আমাদের রব! আমরা তো তা দেখে ভয় পেয়ে গেছি।' তখন তিনি বলবেন: 'তোমরা কি আমার আনুগত্য করার প্রতিশ্রুতি দাওনি?' তিনি বলবেন: 'তোমরা এর দিকে যাও।' তারা যেতে থাকবে। যখন তারা আবার তা দেখবে, তখন ভয় পেয়ে ফিরে আসবে। তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! আমরা তাতে প্রবেশ করতে পারছি না।' আল্লাহ বলবেন: 'তোমরা অপমানিত অবস্থায় তাতে প্রবেশ করো।' আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: 'যদি তারা প্রথমবারই তাতে প্রবেশ করত, তবে সেটি তাদের জন্য শান্তিদায়ক ও শীতল হত'।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] لفظ "عامة" من (ب)، وليس في (ك) و (م).



[2] أي: كل ما يوجد من هذه الأمور الموعود بها هذه الأمة سيكون في مدة مئة سنة، يوضحها رواية أيوب عن أبي قلابة عند البزار (3293 - كشف الأستار) فهي بلفظ: "وكل ما توعدون في مئة سنة".



8595 [3] - إسناده تالف من أجل إسحاق بن إدريس، فإنه متروك واتهمه ابن معين بالكذب. والراوي عنه محمد بن سنان القزاز ليس بذاك القوي إلا أنه ليس بعلته، فقد توبع، تابعه يحيى بن محمد بن السكن - وهو من الثقات - عن إسحاق بن إدريس عند البزار (4170) و (4188)، إلّا أنَّ البزار لم يسق متنه.والحديث أغلبه صحيح قد روي من غير هذا الوجه غير القطعتين: السادسة منه في المئة سنة، والثانية عشرة منه في قصة مجيء أهل الجاهلية يوم القيامة يحملون أوثانهم … إلخ، فلم ترويا إلا من حديث عباد بن منصور عن أيوب عن أبي قلابة عند البزار في "مسنده" (4170) و (4188) و (3293 - كشف الأستار)، وعباد هذا ضعيف إذا انفرد، وهو في هذا لم يتابعه معتبر، بل قد خالفه في القطعة الأخيرة منه - في قصة حمل أهل الجاهلية أوثانهم - عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي في ما رواه عنه الحسين المروزي في زياداته على "زهد ابن المبارك" (1323)، فرواه عن أيوب عن أبي قلابة من قوله، وعبد الوهاب الثقفي ثقة لا يقارن به مثل عبّاد.وغير القطعة التاسعة منه في قصة ثمر الجنة، فلم يروها إلّا عباد بن منصور أيضًا عن أيوب عن أبي قلابة عند البزار (4187) والطبراني في "الكبير" (1449) والثعلبي في "تفسيره" 8/ 344 وأبي نعيم في صفة "الجنة" (345).وأما بقية الحديث - غير القطعة الحادية عشرة منه في قصة المسألة - فقد أخرجه مقطعًا: أحمد 37/ (22395) و (22406)، و (22452)، ومسلم (994) و (1920) و (2889)، وأبو داود (4252)، وابن ماجه (2760)، والترمذي (1966) و (2176) و (2202) و (2219) و (2229)، والنسائي (9138)، وابن حبان (4242) و (4246) و (7238) من طريق حماد بن زيد، عن أيوب، ومسلم (2889)، وابن ماجه (10) و (3952)، وابن حبان (6714) من طريق قتادة، كلاهما (أيوب وقتادة) عن أبي قلابة، عن أبي أسماء الرحبي، عن ثوبان.وأما القطعة الحادية عشرة في قصة تعظيم شأن المسألة، فقد روى معناها معدان بن أبي طلحة عن ثوبان عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من سأل الناسَ مسألةً وهو عنها غني، كانت شينًا في وجهه يوم القيامة"، وإسناده صحيح، أخرجه أحمد 37/ (22420) وغيره. وانظر حديث أبي العالية عن ثوبان السالف عند المصنف برقم (1517). والقطعة الرابعة منه في قصة لحوق قبائل من هذه الأمة بالمشركين، تقدمت عند المصنف قريبًا برقم (8589) من طريق عباد عن أيوب عن أبي قلابة.



8595 [4] - في "صحيحه" برقم (2889) في كتاب الفتن وأشراط الساعة. وهو فيه بالقطعتين الأولى والثانية من حديث معاذ بن هشام عن أبيه عن قتادة، وهو الصواب، فإنَّ الذي يروي عن قتادة هو هشام الدستوائي لا ابنه معاذ، فإنه لم يدركه.