আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8606 - أخبرنا الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن [1] عطاء، أخبرنا سعيد بن إياس الجريري، عن أبي نضرة، عن جابر بن عبد الله قال: يوشك أهل العراق أن لا يجيء إليهم درهمٌ ولا قَفِيزٌ، قالوا: ممَّ ذاك يا أبا عبد الله؟ قال: من قِبَل العَجَم، يَمنَعون ذاك، ثم سكت هنيهةً، ثم قال: يوشك أهل الشام أن لا يجيء إليهم دينارٌ ولا مُدٌّ، قالوا: ممَّ ذاك؟ قال: من قِبَل الرُّوم، يَمنَعون ذلك، ثم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يكون في أمتي خليفةٌ يَحْثي المال حَثيًا لا يَعُدُّه عدًّا".ثم قال: والذي نفسي بيده، ليعودَنَّ الأمر كما بدأ، ليعودَنَّ كلُّ إيمان إلى المدينة كما بدأ بها، حتى يكون كل إيمان بالمدينة.ثم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم "لا يخرج رجل من المدينة رَغْبةً عنها، إلَّا أبدَلَها الله خيرًا منه، وليَسمَعنَّ ناسُ برُخصٍ من أسعارٍ ورِيفٍ فيَتَّبِعونه، والمدينة خير لهم لو كانوا يعلمون" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.إنما أخرج مسلم حديث داود بن أبي هند، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "يكون في آخرِ الزمان خَليفةٌ يُعطي المال لا يعده عدًّا" [3]، وهذا له علَّة [4]:
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (জাবির) বলেন: অচিরেই ইরাকবাসীদের কাছে কোনো দিরহাম (মুদ্রা) এবং কোনো ক্বাফীয (খাদ্যের পরিমাপ) পৌঁছাবে না। তারা (উপস্থিত লোকেরা) জিজ্ঞেস করল: হে আবু আব্দুল্লাহ, তা কেন হবে? তিনি বললেন: অনারবদের পক্ষ থেকে, তারা তা বন্ধ করে দেবে। অতঃপর তিনি কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন। অতঃপর তিনি বললেন: অচিরেই সিরিয়াবাসীর (আহলে শাম) কাছে কোনো দিনার (স্বর্ণমুদ্রা) এবং কোনো মুদ্দ (খাদ্যের পরিমাপ) পৌঁছাবে না। তারা জিজ্ঞেস করল: তা কেন হবে? তিনি বললেন: রোমকদের পক্ষ থেকে, তারা তা বন্ধ করে দেবে।
অতঃপর তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে এমন একজন খলীফা আসবেন যিনি সম্পদ অঞ্জলি ভরে বিলিয়ে দেবেন, গণনা করে দেবেন না।"
অতঃপর তিনি বললেন: যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! বিষয়টি অবশ্যই সেভাবে ফিরে আসবে যেভাবে শুরু হয়েছিল; সকল ঈমান অবশ্যই মদীনায় ফিরে আসবে যেভাবে তা সেখানে শুরু হয়েছিল, এমনকি সকল ঈমান মদীনাতেই সীমাবদ্ধ হয়ে যাবে।
অতঃপর তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদীনার প্রতি বিতৃষ্ণা বা অনিচ্ছা নিয়ে সেখান থেকে বের হয়ে যায়, আল্লাহ তার চেয়ে উত্তম কাউকে তার স্থলাভিষিক্ত করেন। আর অবশ্যই লোকেরা সস্তা দাম ও প্রচুর শস্য-শ্যামলতার কথা শুনে সেদিকে ধাবিত হবে, অথচ মদীনা তাদের জন্য উত্তম ছিল, যদি তারা জানত।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف لفظ "بن" في النسخ الخطية إلى: عن، وعبد الوهاب بن عطاء هذا الراوي عن الجريري: هو عبد الوهاب بن عطاء الخفاف. وأما قوله: ليعودن الأمر كما بدأ … إلخ، فمعناه مذكور أيضًا في حديث أبي هريرة السابق، وفي حديثه عند البخاري (1876) ومسلم (147) مرفوعًا بلفظ: "إِنَّ الإيمان ليَأْرِزُ (أي: ينضم ويجتمع) إلى المدينة كما تأرز الحية إلى جُحرها"، وفي حديث ابن عمر عند مسلم (146) مرفوعًا بلفظ: "إنَّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، وهو يأرِزُ بين المسجدين (أي: مكة والمدينة) كما تأرز الحية في جحرها".والقفيز: مكيال معروف لأهل العراق، بسعة 12 صاعًا، أو 33 لترًا.والرِّيف: الأرض التي بها زرع وخصب.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أبي طالب وشيخه عبد الوهاب بن عطاء، فهما صدوقان لا بأس بهما، وهما متابعان.فقد أخرجه بطوله أبو طاهر في "المخلصيات" (1235 - 1237)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 330 - 331 من طرق عن عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، عن سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن جابر بن عبد الله. وعبد الوهاب الثقفي ثقة، وهو ممَّن سمع من الجريري قبل اختلاطه.وأخرج القسم الأول من الحديث أحمد 22/ (14406)، ومسلم (2913) (67)، وابن حبان (6682) من طريق إسماعيل بن إبراهيم - وهو ابن عُليّة - عن سعيد الجريري، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.وقول جابر في هذا الحديث: يوشك أهل العراق … إلخ، قد جاء معناه مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم من حديث أبي هريرة عند مسلم (2896) وغيره بلفظ: "مَنَعَت العراق قفيزها ودرهمها، ومنعت الشام مديها ودينارها، ومنعت مصر إردبَّها ودينارها، ثم عُدتم من حيث بدأتُم - قالها ثلاثًا". وأما قوله: ليعودن الأمر كما بدأ … إلخ، فمعناه مذكور أيضًا في حديث أبي هريرة السابق، وفي حديثه عند البخاري (1876) ومسلم (147) مرفوعًا بلفظ: "إِنَّ الإيمان ليَأْرِزُ (أي: ينضم ويجتمع) إلى المدينة كما تأرز الحية إلى جُحرها"، وفي حديث ابن عمر عند مسلم (146) مرفوعًا بلفظ: "إنَّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، وهو يأرِزُ بين المسجدين (أي: مكة والمدينة) كما تأرز الحية في جحرها".والقفيز: مكيال معروف لأهل العراق، بسعة 12 صاعًا، أو 33 لترًا.والرِّيف: الأرض التي بها زرع وخصب.
8606 [3] - قرن داود بن أبي هند في رواية عبد الوارث بن سعيد عنه عند مسلم (2914) (69) بأبي سعيد جابرًا. وأخرجه أحمد 22/ (14567)، ومسلم (2914) (69) من طريق عبد الوارث بن سعيد، عن داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد وجابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
8606 [4] - يريد بالعلّة: ما وقع في رواية عبد الوهاب عنده من الشك في اسم صحابي الحديث، هل هو أبو سعيد الخدري أم جابر بن عبد الله؟ وهذه ليست بعلة قادحة، والأولى عدم تسميتها علة، فإنَّ الخلاف في اسم الصحابي لا يضر البتة، فكلّهم ثقات عدول بإذن الله، على أن عبد الوارث بن سعيد قد خالف عبد الوهاب فرواه عن داود بن أبي هند بالجمع بينهما لا بالشك كما سيأتي. وأخرجه أحمد 22/ (14567)، ومسلم (2914) (69) من طريق عبد الوارث بن سعيد، عن داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد وجابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم.