হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8682)


8682 - أخبرني الحسن بن حليم [1] المروزي، حدثنا أحمد بن إبراهيم السَّدَوَّري، حدثنا سعيد بن هُبيرة، حدثنا حمَّاد بن زيد، عن أيوب السَّختِياني وعلي بن زيد بن جُدْعان، عن أبي نَضْرة قال: أتينا عثمان بن أبي العاص يوم الجمعة لنعارضَ مُصحَفَنا بمُصحَفِه، فلما حَضَرَت الجمعةُ أَمرنا فاغتسلنا وتَطيَّبْنا ورُحْنا إلى المسجد، فجلسنا إلى رجل يحدِّث، ثم جاء عثمانُ بن أبي العاص فتحوَّلْنا إليه، فقال عثمان: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "يكونُ للمسلمين ثلاثةُ أمصارٍ: مصرٌ بمُلتقى البحرين، ومصرٌ بالجزيرة [2]، ومصرٌ بالشام، فيَفزَعُ الناسُ ثلاثَ فَزَعاتٍ، فيخرجُ الدَّجّالُ في أعراض [3] جيشٍ، فيَهزِمُ مَن قِبَل المشرق، فأوَّلُ [4] مصرٍ يَرِدُه المصرُ الذي بمُلتقى البحرين، فيصير أهلُها ثلاثَ فِرَقٍ: فِرقةٌ تقيمُ وتقول: نُشَامُّه [5] وننظر ما هو، وفرقةٌ تَلحَق بالأعراب، وفرقةٌ تلحق بالمِصر الذي يليهم [6]، ثم يأتي الشام، فينحازُ المسلمون إلى عَقَبَةِ أَفِيقَ، فيبعثون بسَرْح لهم فيصابُ سَرْحُهم، فيشتدُّ ذلك عليهم، وتصيبُهم مَجَاعَةٌ شديدةٌ وجَهْد، حتى إنَّ أحدهم ليُحرقُ [-4] وَتَرَ قوسه فيأكلُه، فبينما هم كذلك إذ ناداهم منادٍ من السَّحَر: يا أيها الناس، أتاكم الغَوْثُ، فيقول بعضُهم لبعض: إنَّ هذا لصوتُ رجل شَبْعانَ، فينزل عيسى ابن مريم عليه السلام عند صلاة الفجر، فيقول له إمام [-4] الناس: تقدَّم يا رُوحَ الله فصلِّ بنا [فيقول: إنكم معشر هذه الأُمَّة أمراءُ بعضُكم على بعضٍ، تَقدَّم أنت فصلِّ بنا] [-4] فيتقدَّمُ فيصلِّي بهم، فإذا انصرف أَخَذَ عيسى صلوات الله عليه حَرْبتَه نحوَ الدَّجّال، فإذا رآه ذابَ كما يَذُوبُ الرَّصَاصُ، فتقعُ حَرْبَتُه بين ثَنْدُوَتِه فيقتلُه، ثم ينهزمُ أصحابُه، فليس شيءٌ يومئذٍ يُجِنُّ منهم أَحدًا، حتى إنَّ الحَجَرَ [-4] يقول: يا مؤمنُ، هذا كافرٌ فاقتُله، والحَجَرَ يقول: هذا كافرٌ فاقتُله [-4] " [-4].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم بذكر أيوب السَّختياني، ولم يخرجاه.




উসমান ইবনে আবুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:

“মুসলিমদের জন্য তিনটি প্রধান শহর (কেন্দ্র) হবে: একটি শহর হবে দুই সাগরের মিলনস্থলে, একটি শহর জাযীরাতে (উপদ্বীপে), এবং একটি শহর শামে (সিরিয়ায়)। অতঃপর মানুষ তিনবার (মহাত্রাসে) ভীত হবে। এরপর দাজ্জাল একটি বিশাল সেনাবাহিনীর সাথে বের হবে এবং সে প্রাচ্যের (পূর্ব দিকের) লোকেদের পরাজিত করবে। সে প্রথম যে শহরে আগমন করবে, তা হলো দুই সাগরের মিলনস্থলের শহরটি। সেখানকার অধিবাসীরা তিন দলে বিভক্ত হবে: একদল অবস্থান করবে এবং বলবে, আমরা তার সাথে মুখোমুখি হব এবং দেখব সে কী করে। একদল যাযাবর (আরব বেদুইন)-দের সাথে যোগ দেবে। আর একদল তাদের পার্শ্ববর্তী শহরে চলে যাবে।

এরপর সে শামে (সিরিয়ায়) আসবে। তখন মুসলিমগণ আফীকের গিরিপথে আশ্রয় নেবে। তারা তাদের পশুর পালকে (চরাতে) পাঠাবে, কিন্তু পশুর পাল আক্রান্ত হবে (বা বিনষ্ট হবে)। এতে তাদের উপর চরম বিপদ নেমে আসবে এবং তাদের ওপর কঠিন দুর্ভিক্ষ ও কষ্ট আপতিত হবে। অবস্থা এমন হবে যে, তাদের কেউ কেউ তাদের ধনুকের রশি পুড়িয়ে ভক্ষণ করবে।

তারা যখন এই অবস্থায় থাকবে, তখন সাহরীর সময় একজন আহ্বানকারী তাদের ডেকে বলবে: হে মানব সকল, তোমাদের জন্য সাহায্য এসেছে। তখন তাদের কেউ কেউ একে অপরের সঙ্গে বলবে: এ তো কোনো পেটভরা (ক্ষুধামুক্ত) লোকের কণ্ঠস্বর! অতঃপর ঈসা ইবনে মারিয়াম (আঃ) ফজরের সালাতের সময় অবতরণ করবেন।

তখন মুসলিমদের ইমাম তাকে বলবেন: হে আল্লাহর রূহ! আপনি এগিয়ে আসুন এবং আমাদের সালাতে নেতৃত্ব দিন। তিনি বলবেন: তোমরা এই উম্মতের দল, তোমাদের কেউ কেউ অন্যের উপর নেতা। আপনিই এগিয়ে আসুন এবং আমাদের সালাতে নেতৃত্ব দিন। অতঃপর তিনিই (ইমাম) এগিয়ে যাবেন এবং তাদের নিয়ে সালাত আদায় করবেন।

যখন তিনি (ইমাম) সালাত থেকে ফারেগ হবেন, তখন ঈসা (আঃ) দাজ্জালের দিকে লক্ষ্য করে তাঁর বর্শা হাতে নেবেন। যখন দাজ্জাল তাঁকে দেখবে, তখন সে সিসার মতো গলে যেতে থাকবে। অতঃপর তাঁর বর্শা দাজ্জালের বুকের মাঝখানে আঘাত হানবে এবং তিনি তাকে হত্যা করবেন। এরপর দাজ্জালের সাথীরা পরাজিত হয়ে পালাতে থাকবে। সেদিন এমন কোনো কিছুই থাকবে না যা তাদের কাউকে আড়াল করতে পারে। এমনকি পাথরও বলবে: হে মুমিন! এ তো কাফির, তুমি তাকে হত্যা করো। পাথর বলবে: এ তো কাফির, তুমি তাকে হত্যা করো।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حكيم.



[2] في بعض المصادر: ومصر بالحيرة.



8682 [3] - في النسخ الخطية: عراض، وأثبتناه بالألف من مصادر التخريج، والأعراض: جمع عَرْض، وهو الجيش، وفي بعض المصادر: في أعراض الناس، يعني: في عامتهم.



8682 [4] - في النسخ الخطية: فإذا، والمثبت من "تلخيص الذهبي".



8682 [5] - أي: نختبره وننظر ما عنده.



8682 [6] - سقط من رواية المصنف ذكر المصر الثاني، وذكر عند غيره، ويصير أهله ثلاث فرق كأهل المصر الأول.



8682 [-4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: ليجر، والتصويب من "تلخيص الذهبي".



8682 [-4] - في (ز) و (ك) و (ب): أم، وفي "التلخيص": أمير، والمثبت من (م).



8682 [-4] - ما بين المعقوفين ليس في نسخنا الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي".



8682 [-4] - في مصادر التخريج في هذا الموضع: الشجرة، مكان الحجر.



8682 [-4] - قوله: "والحجر يقول … " من (ز) و (ك) وتكرر في (ك) مرة أخرى، وقد سقط من (م) و (ب).



8682 [-4] - إسناده ضعيف لضعف علي بن زيد بن جدعان، وأما ذكر أيوب السختياني في هذا الإسناد فهو من تخليط سعيد بن هبيرة، فإنه ليس بالقوي كما قال أبو حاتم الرازي، واتهمه ابن حبان بالوضع، ووهّاه الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه أحمد 29/ (17900) عن يزيد بن هارون، و (17901) عن عفان بن مسلم، كلاهما عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد وحده عن أبي نضرة - وهو المنذر بن مالك العبدي - به. وانظر ما بعده.