হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (575)


575 - ` على كل نفس في كل يوم طلعت فيه الشمس صدقة منه على نفسه قلت: يا رسول الله
من أين أتصدق وليس لنا أموال؟ قال: لأن من أبواب الصدقة التكبير وسبحان
الله والحمد لله ولا إله إلا الله وأستغفر الله وتأمر بالمعروف وتنهى عن
المنكر وتعزل الشوكة عن طريق الناس والعظمة والحجر وتهدي الأعمى وتسمع
الأصم والأبكم حتى يفقه
وتدل المستدل على حاجة له قد علمت مكانها وتسعى بشدة
ساقيك إلى اللهفان المستغيث وترفع بشدة ذراعيك مع الضعيف كل ذلك من أبواب
الصدقة منك على نفسك ولك في جماعك زوجتك أجر قال أبو ذر: كيف يكون لي أجر في
شهوتي؟ فقال: أرأيت لو كان لك ولد فأدرك ورجوت خيره، فمات أكنت تحتسبه؟
قلت: نعم قال: فأنت خلقته؟ قال: بل الله خلقه قال: فأنت هديته؟ قال: بل
الله هداه قال: فأنت ترزقه؟ قال: بل الله كان يرزقه قال: كذلك فضعه في
حلاله وجنبه حرامه، فإن شاء الله أحياه وإن شاء أماته ولك أجر `.
أخرجه الإمام أحمد (5 / 168) : حدثنا عبد الملك بن عمرو حدثنا علي يعني ابن
مبارك عن يحيى عن زيد بن سلام عن أبي سلام قال أبو ذر: على كل نفس الخ.
كذا الأصل لم يرفعه والظاهر أنه سقط من الناسخ بدليل السياق. وهذا سند صحيح
رجاله كلهم ثقات رجال مسلم. ورواه ابن حبان والنسائي كما رمز له في المنتخب
(2 / 535) والله أعلم. وله طريق أخرى أخصر منه بلفظ: ` تبسمك في وجه أخيك
صدقة `. وقد مر وله حديث آخر قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم: أي
العمل أفضل؟ قال: ` إيمان بالله وجهاد في سبيله قلت: فأي الرقاب أفضل؟ قال
: أغلاها ثمنا وأنفسها عند أهلها قلت: فإن لم أفعل؟ قال: تعين صانعا أو
تصنع لأخرق قال: فإن لم أفعل؟ قال: تدع الناس من الشر فإنها صدقة تصدق بها
على نفسك `. أخرجه البخاري (3 / 117) وفي ` الأدب المفرد ` (34، 46)
ومسلم (1 / 62) وأحمد (5 / 150، 171) عن أبي مراوح عنه. وعند النسائي
ولبعضه (2 / 57) منه الجملة الأولى.
ولبعضه شاهد مختصر بلفظ: ` على كل
سلامى من بني آدم فهي في كل يوم صدقة ويجزي من ذلك كله ركعتا الضحى `.
أخرجه الطبراني في الصغير ص (133) : حدثنا عبد الله بن محمد ابن سختان
الشيرازي حدثنا علي بن محمد الزياداباذي حدثنا سالم بن نوح عن هشام بن حسان عن
قيس بن سعد عن طاووس عن ابن عباس رفعه. وقال: تفرد به علي بن محمد.
قلت: ذكره السمعاني بغير جرح أو تعديل. وشيخه عبد الله بن محمد لم أره
وبقية رجاله ثقات رجال البخاري. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (2 / 237) :
` رواه الطبراني في الصغير والأوسط وفيه من لم أجد من ترجمه `.
قلت: وله طريق أخرى عن طاووس بلفظ أتم وهو.
` في ابن آدم ستون وثلاثمائة سلامى أو عظم أو مفصل على كل واحد في كل يوم
صدقة كل كلمة طيبة صدقة وعون الرجل أخاه صدقة والشربة من الماء تسقيها صدقة
وإماطة الأذى عن الطريق صدقة `.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

“যেদিন সূর্য উদিত হয়, সেদিন প্রত্যেক ব্যক্তির উপর তার নিজের জন্য সাদকা (দান) আবশ্যক।”

আমি বললাম, “হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা কোথা থেকে সাদকা করব, যখন আমাদের কোনো সম্পদ নেই?”

তিনি বললেন, “কারণ সাদকার বিভিন্ন পথের মধ্যে রয়েছে: আল্লাহু আকবার (তাকবীর) বলা, সুবহানাল্লাহ বলা, আলহামদুলিল্লাহ বলা, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ বলা এবং আস্তাগফিরুল্লাহ বলা। তুমি সৎকাজের আদেশ দাও এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করো। মানুষের রাস্তা থেকে কাঁটা, হাড় এবং পাথর সরিয়ে দাও। অন্ধকে পথ দেখিয়ে দাও। বধির ও মূক ব্যক্তিকে এমনভাবে শোনোও (বা বোঝাও) যাতে তারা বুঝতে পারে। যে ব্যক্তি কোনো প্রয়োজন খুঁজছে, যার স্থান তোমার জানা আছে, তাকে তার সেই প্রয়োজনটি দেখিয়ে দাও। আর যে বিপদগ্রস্ত বা সাহায্যপ্রার্থী, তার কাছে দ্রুত তোমার দু’পা ব্যবহার করে ছুটে যাও। আর দুর্বল ব্যক্তির সাথে তোমার দু’হাত সবলে উত্তোলন করো (অর্থাৎ তাকে সাহায্য করো)। এই সব কিছুই তোমার পক্ষ থেকে তোমার নিজের জন্য সাদকার পথ।

আর তোমার স্ত্রীর সাথে সহবাসের মধ্যেও তোমার জন্য সাওয়াব রয়েছে।”

আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “কীভাবে আমার প্রবৃত্তির ভোগের মধ্যেও আমার জন্য সাওয়াব হতে পারে?”

তিনি বললেন, “তুমি কি মনে করো, তোমার যদি কোনো সন্তান হয় এবং সে বড় হওয়ার পর তুমি তার কল্যাণ আশা করো, কিন্তু সে যদি মারা যায়, তবে কি তুমি এর বিনিময়ে (আল্লাহর কাছে) সাওয়াব আশা করো না?”

আমি বললাম, “হ্যাঁ।”

তিনি বললেন, “তুমি কি তাকে সৃষ্টি করেছ?”

আমি বললাম, “বরং আল্লাহই তাকে সৃষ্টি করেছেন।”

তিনি বললেন, “তুমি কি তাকে পথ দেখিয়েছ?”

আমি বললাম, “বরং আল্লাহই তাকে পথ দেখিয়েছেন।”

তিনি বললেন, “তুমি কি তাকে রিযিক দাও?”

আমি বললাম, “বরং আল্লাহই তাকে রিযিক দিতেন।”

তিনি বললেন, “ঠিক তেমনই, তুমি এটিকে (এই প্রবৃত্তিকে) হালাল পথে ব্যবহার করো এবং হারাম থেকে দূরে থাকো। আল্লাহ চাইলে তাকে (সন্তানকে) বাঁচিয়ে রাখেন অথবা চাইলে মৃত্যু দেন। আর তোমার জন্য এর মধ্যেও সাওয়াব রয়েছে।”