সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مَرْزُوقٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا شُعْبَةُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أُتِيَ بِلَحْمٍ قَالَ " مَا هَذَا " . قَالُوا شَىْءٌ تُصُدِّقَ بِهِ عَلَى بَرِيرَةَ فَقَالَ " هُوَ لَهَا صَدَقَةٌ وَلَنَا هَدِيَّةٌ " .
আনাস (রা:) হতে বর্ণিত, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খিদমাতে গোশত পেশ করা হলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন : এটা কি ধরনের গোশত? লোকেরা বললো, এটা বারীরাহকে সদাক্বাহ দেয়া হয়েছিলো। তিনি বললেনঃ এটা তার জন্য সদাক্বাহ, কিন্ত আমাদের জন্য উপঢৌকন।
সহীহ : বুখারী ও মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1495) صحیح مسلم (1074)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . قتادة : هو ابن دِعامة السدوسي . وأخرجه البخاري (١٤٩٥) و (٢٥٧٧) ، ومسلم (١٠٧٤) ، والنسائي في " الكبرى " (٦٥٥٩) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (١٢١٥٩). قال البيضاوي : إذا تصدق على المحتاج بشيء ملكه، وصار له كسائر ما يملكه، فله أن يهدي به غيره، كما له أن يهدي سائر أمواله بلا فرق .
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَطَاءٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، بُرَيْدَةَ أَنَّ امْرَأَةً، أَتَتْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ كُنْتُ تَصَدَّقْتُ عَلَى أُمِّي بِوَلِيدَةٍ وَإِنَّهَا مَاتَتْ وَتَرَكَتْ تِلْكَ الْوَلِيدَةَ . قَالَ " قَدْ وَجَبَ أَجْرُكِ وَرَجَعَتْ إِلَيْكِ فِي الْمِيرَاثِ " .
বুরাইদাহ (রা:) হতে বর্ণিত, এক মহিলা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট এসে বললো, আমি আমার মাকে একটি দাসী দান করেছিলাম। তিনি ঐ দাসীটি রেখে মারা গেছেন। তিনি বললেনঃ তুমি দানের সওয়াব পেয়েছো এবং সে উত্তরাধিকার সূত্রে তোমার কাছে ফিরে এসেছে।
সহীহ : মুসলিম। (আরবী) অতিরিক্ত যোগে। যেমন সামনে আসছে হাদীস (২৮৭৭ নং)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح م بزيادة قضيتين أخريين
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1149)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . زهير : هو ابن معاوية الجعفي . وأخرجه مسلم (١١٤٩) ، وابن ماجه (٢٣٩٤) ، والترمذي (٦٧٣) ، والنسائي في " الكبرى " (٦٢٨٠ - ٦٢٨٣) من طرق عن عبد الله بن عطاء، به . وقال الترمذي : حديث حسن صحيح . وهو في " مسند أحمد " (٢٢٩٥٦). وسيكرر برقم (٢٨٧٧) و (٣٣٠٩) وفيه زيادة . وقوله : " ورجعت إليكِ في الميراث " ، أي : ردها الله عليكِ بالميراث، وصارت الجارية ملكاً لكِ بالإرث، وعادت إليك بالوجه الحلال، والمعنى : أن ليس هذا من باب العود في الصدقة، لأنه ليس أمراً اختيارياً، وأكثر العلماء على أن الشخص إذا تصدق بصدقة على قريبه، ئم ورثها حلت له .
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ أَبِي النَّجُودِ، عَنْ شَقِيقٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كُنَّا نَعُدُّ الْمَاعُونَ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَارِيَةَ الدَّلْوِ وَالْقِدْرِ .
আবদুল্লাহ (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুগে ‘মাউন’ গন্য করতাম বালতি, হাঁড়ি-পাতিল ইত্যাদি ছোট-খাটো বস্তু ধারে আদান-প্রদান করাকে। [১৬৫৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن . عاصم بن أبي النجود صدوق حسن الحديث، وباقي رجاله ثقات . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (١١٦٣٧) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد . وروى ابن أبي حاتم عن عكرمة قال : رأس الماعون زكاة المال، وأدناه : المنخل والدلو والإبرة، قال ابن كثير : وهذا الذي قاله عكرمة حسن، فإنه يشمل الأقوال كلها، وترجع كلها إلى شيء واحد، وهو ترك المعاونة بمال أو بمنفعة .
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ سُهَيْلِ بْنِ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَا مِنْ صَاحِبِ كَنْزٍ لاَ يُؤَدِّي حَقَّهُ إِلاَّ جَعَلَهُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يُحْمَى عَلَيْهَا فِي نَارِ جَهَنَّمَ فَتُكْوَى بِهَا جَبْهَتُهُ وَجَنْبُهُ وَظَهْرُهُ حَتَّى يَقْضِيَ اللَّهُ تَعَالَى بَيْنَ عِبَادِهِ فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ مِمَّا تَعُدُّونَ ثُمَّ يُرَى سَبِيلُهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ وَإِمَّا إِلَى النَّارِ وَمَا مِنْ صَاحِبِ غَنَمٍ لاَ يُؤَدِّي حَقَّهَا إِلاَّ جَاءَتْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَوْفَرَ مَا كَانَتْ فَيُبْطَحُ لَهَا بِقَاعٍ قَرْقَرٍ فَتَنْطَحُهُ بِقُرُونِهَا وَتَطَؤُهُ بِأَظْلاَفِهَا لَيْسَ فِيهَا عَقْصَاءُ وَلاَ جَلْحَاءُ كُلَّمَا مَضَتْ أُخْرَاهَا رُدَّتْ عَلَيْهِ أُولاَهَا حَتَّى يَحْكُمَ اللَّهُ بَيْنَ عِبَادِهِ فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ مِمَّا تَعُدُّونَ ثُمَّ يُرَى سَبِيلُهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ وَإِمَّا إِلَى النَّارِ وَمَا مِنْ صَاحِبِ إِبِلٍ لاَ يُؤَدِّي حَقَّهَا إِلاَّ جَاءَتْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَوْفَرَ مَا كَانَتْ فَيُبْطَحُ لَهَا بِقَاعٍ قَرْقَرٍ فَتَطَؤُهُ بِأَخْفَافِهَا كُلَّمَا مَضَتْ عَلَيْهِ أُخْرَاهَا رُدَّتْ عَلَيْهِ أُولاَهَا حَتَّى يَحْكُمَ اللَّهُ تَعَالَى بَيْنَ عِبَادِهِ فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ مِمَّا تَعُدُّونَ ثُمَّ يُرَى سَبِيلُهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ وَإِمَّا إِلَى النَّارِ " .
আবূ হুরাইরাহ (রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ধনী ব্যক্তি তার হাক্ব (যাকাত) আদায় না করলে ক্বিয়ামাতের দিন সোনা ও রুপা জাহান্নামের আগুনে উত্তপ্ত করে তার ললাটে, তার পার্শ্বদেশে ও তার পৃষ্ঠদেশে সেঁক দেয়া হবে। এমন শাস্তি অব্যাহত থাকবে আল্লাহ তাঁর বান্দাদের মধ্যে ফায়সালা করার দিন পর্যন্ত, যে দিন হবে তোমাদের গণনা অনুসারে পঞ্চাশ হাজার বছরের সমান। এরপর সে নিজের গন্তব্যস্থান চাক্ষুস দেখবে, জান্নাত অথবা জাহান্নাম। আর যে মেষপালের মালিক তার যাকাত দেয় না ক্বিয়ামাতের দিন সেগুলো পূর্বের চেয়েও সংখ্যায় অধিক ও মোটা-তাজা অবস্থায় উপস্থিত হবে এবং তাকে শিং দিয়ে গুতা মারবে ও খুর দিয়ে দলিত করবে। ওসবের কোনোটিই বাঁকা শিং বিশিস্ট বা শিংবিহীন হবে না। যখন সর্বশেষ জানোয়ারটি তাকে দলিত করে চলে যাবে, তখন প্রথমটিকে আবার তার কাছে আনা হবে। এরূপ চলতে থাকবে আল্লাহ তাঁর বান্দাদের মধ্যে ফয়সালা করার দিন পর্যন্ত, যে দিনটি হবে তোমাদের হিসাব মতে পঞ্চাশ হাজার বছরের সমান। এরপর সে তার গন্তব্যস্থান প্রত্যক্ষ করবে, জান্নাত অথবা জাহান্নাম। আর যে উটের মালিক উটের যাকাত প্রদান করে না ক্বিয়ামাতের দিন ঐ উট পূর্বের চাইতেও সংখ্যায় অধিক ও মোটা-তাজা অবস্থায় মালিকের নিকট উপস্থিত হবে। তাকে এক বিশাল সমভূমিতে উপুড় করে শোয়ানো হবে এবং পশুগুলো তাকে খুর দিয়ে দলন করতে থাকবে। সর্বশেষ পশুটি তাকে অতিক্রম করার পর প্রথমটিকে পুনরায় তার কাছে ফিরে আনা হবে। এরূপ চলতে থাকবে আল্লাহ তাঁর বান্দাদের মাঝে ফয়সালা করার দিন পর্যন্ত, যেদিন হবে তোমাদের গণনা অনুযায়ী পঞ্চাশ হাজার বছরের সমান। অতঃপর সে তার গন্তব্যস্থল প্রত্যক্ষ করবে, হয়তো জান্নাত অথবা জাহান্নাম।
সহীহ : মুসলিম। বুখারী সংক্ষেপে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (987)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . حمّاد : هو ابن سلمة، وأبو صالح : هو ذكوان السمان وأخرجه مسلم بطوله (٩٨٧) من طرق عن سهيل بن أبي صالح، بهذا الإسناد . وأخرجه مختصراً بذكر الكنز النسائي في " الكبرى " (١١٥٥٧) من طريق معمر، عن سهيل، به . بلفظ : " ما من رجل لا يؤدي زكاة ماله إلا جعل له يوم القيامة شجاعاً من نار، فيكوى بها جبهته وجبينه وظهره في يوم كان مقداره خمسين ألف سنة، حتى يقضى بين الناس ". وأخرجه مسلم (٩٨٧) من طريق بكير بن عبد الله، عن أبي صالح، به . بنحو حديث سهيل عند المصنف . وأخرجه مختصراً بذكر الكنز البخاري (١٤٠٣) ، والنسائي في " الكبرى " (٢٢٧٣) من طريق عبد الله بن دينار، عن أبي صالح، به . إلا أنه قال في روايته : " من آتاه الله مالاً فلم يؤد زكاته، مُثل له يوم القيامة شجاعاً أقرع له زبيبتان، يطوِّقه يوم القيامة، ثم يأخذ بلهزمتيه - يعني بشِدقَيه - ثم يقول : أنا مالك أنا كنزك ". وأخرجه نحوه مختصراً البخاري (٦٩٥٨) من طريق همام بن منبه، وابن ماجه (١٧٨٦) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب، كلاهما عن أبي هريرة، به . ولفظهما في الكنز بنحو لفظ عبد الله بن دينار عن أبي صالح . وأخرجه البخاري (١٤٠٢) ، والنسائي في " الكبرى " (٢٢٤٠) من طريق عبد الرحمن ابن هرمز، عن أبي هريرة، به . ورواية البخاري ليس فيها ذكر الكنز . ولفظ رواية النسائي في الكنز كرواية عبد الله بن دينار، عن أبي صالح . وهو في " مسند أحمد " (٧٥٦٣) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٢٥٣) و (٣٢٥٤). وانظر ما سيأتي برقم (١٦٥٩) و (١٦٦٠). القاع : الأرض الواسعة . قر قر : أملس . والأظلاف : جمع ظلف وهو للبقر والغنم بمنزلة الحافر للفرس، والعقصاء : ملتوية القرن، والجلحاء : التي لا قرن لها .
حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نَحْوَهُ . قَالَ فِي قِصَّةِ الإِبِلِ بَعْدَ قَوْلِهِ " لاَ يُؤَدِّي حَقَّهَا " . قَالَ " وَمِنْ حَقِّهَا حَلْبُهَا يَوْمَ وِرْدِهَا " .
আবূ হুরাইরাহ (রা:) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেন। তাতে উটের ব্যাপারে উল্লেখ রয়েছে: যে ব্যক্তি তার হাক্ব আদায় করে না। এর হাক্ব হচ্ছে, পানি পান করার দিন তার দুধ দোহন করা।
সহীহ : মুসলিম। বুখারী সংক্ষেপে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2371) صحیح مسلم (987)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح ، وهذا إسناد حسن . هشام بن سعد حديثه حسن في المتابعات والشواهد، وقد توبع . وأخرجه مسلم بتمامه (٩٨٧) من طريق هشام بن سعد، و (٩٨٧) من طريق حفص بن ميسرة، كلاهما عن زيد بن أسلم، به . وأخرج البخاري (٢٣٧٨) من طريق عبد الرحمن بن أبي عمرة عن أبي هريرة، به . رفعه : " من حق الإبل أن تُحلَب على الماء ". وانظر ما قبله . قال الطيبي : ومعنى حلبها يوم وردها : أن يسقي ألبانها المارة، وهذا مثل نهيه ﵊ عن الجذاذ بالليل أراد أن يصرم بالنهار ليحضرها الفقراء . وقال ابن عبد الملك : وحصر يوم الورد لاجتماعهم غالباً على المياه، وهذا على سبيل الاستحباب . وقال ابن حزم في " المحلى " ٦ / ٥٠ : وفرض على كل ذي إبل وبقر وغنم أن يحلبها يوم وردها على الماء، ويتصدق من لبنها بما طابت به نفسه . قال شعيب : وأهل القرى في دمشق بارك الله فيهم الذين عندهم البقر يُوزِّع غالبهم الحليب يوم الجمعة على الفقراء حسبة لله، وقد كانوا يفعلون ذلك إذ كنت فيهم قبل ربع قرن، وأظنهم لا يزالون يقومون بذلك إلى يومنا هذا لما أعلم فيهم من الكرم وحب الخير، والبر بالفقراء والمساكين .
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَخْبَرَنَا شُعْبَةُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي عُمَرَ الْغُدَانِيِّ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَحْوَ هَذِهِ الْقِصَّةِ فَقَالَ لَهُ - يَعْنِي لأَبِي هُرَيْرَةَ - فَمَا حَقُّ الإِبِلِ قَالَ تُعْطِي الْكَرِيمَةَ وَتَمْنَحُ الْغَزِيرَةَ وَتُفْقِرُ الظَّهْرَ وَتُطْرِقُ الْفَحْلَ وَتَسْقِي اللَّبَنَ .
আবূ হুরাইরাহ (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে এরূপই বলতে শুনেছি। বর্ণনাকারী আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন, উটের হাক্ব কি? তিনি বললেন, উত্তমটি দান করা, অধিক দুগ্ধবতী দান করা, তার পৃষ্ঠে আরোহণ করতে দেয়া, পুরুষ উট দ্বারা প্রজনন করতে দেয়া এবং দুধ (অভাবীদের) পান করতে দেয়া। [১৬৬০]
হাসান, পরবর্তী হাদীসের কারণে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (2444 وسندہ حسن) وصححہ ابن خزیمۃ (2322 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح ، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي عمر - ويقال : عمرو - الغُداني . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٢٢٣٤) من طريق سعيد بن أبي عروبة عن قتادة، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (١٠٣٥١). وقول أبي هريرة آخر الحديث أخرجه ابن أبي شيبة ٧ / ٣٣ عن وكيع عن عكرمة ابن عمار، عن علقمة بن الزبرقان - وهو علقمة بن بجالة بن الزبرقان - قال : قلت لأبي هريرة : ما حق الإبل … وعلقمة هذا ذكره ابن حبان في " الثقات " ، وفي " مشاهير علماء الأمصار " وقال : كان ثبتاً . وانظر سابقيه . الغزيرة : الكثيرة اللبن، والمنيحة : الشاة اللبون، أو الناقة ذات الدَّرِ تُعار لدرها، فإذا حُلبت رُدت إلى صاحبها، وإفقار الظهر : إعارته للركوب، يقال : أفقرت الرجل بعيري : إذا أعرته ظهره يركبه، ويبلغ عليه حاجته، وإطراق الفحل : إعارته للضرب لا يمنعه إذا طلبه، ولا يأخذ عليه أجرة .
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ خَلَفٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، قَالَ قَالَ أَبُو الزُّبَيْرِ سَمِعْتُ عُبَيْدَ بْنَ عُمَيْرٍ، قَالَ قَالَ رَجُلٌ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا حَقُّ الإِبِلِ فَذَكَرَ نَحْوَهُ زَادَ " وَإِعَارَةُ دَلْوِهَا " .
উবাইদ ইবনু ‘উমাইর (রহ:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি বললো, হে আল্লাহর রাসূল! উটের হাক্ব কি? অতঃপর পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ। তবে এতে অতিরিক্ত রয়েছে : তার দুধ ধার দেয়া।
সহীহ : মুসলিম। জাবির হতে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (988)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده مرسل صحيح . أبو عاصم : هو الضحاك بن مخلد الشيباني، وابن جريج : هو عبد الملك بن عبد العزيز، وأبو الزبير : هو محمد بن مسلم بن تدرس . وأخرجه مسلم (٩٨٨) من طريق عبد الرزاق عن ابن جريج، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (١٤٤٤٢). وأخرجه مسلم (٩٨٨) ، والنسائي في " الكبرى " (٢٢٤٦) من طريق عبد الملك ابن أبي سليمان، عن أبي الزبير، عن جابر . فوصله . وأخرجه الطحاوي في " أحكام القرآن " (٦٤٠) ، وفي " شرح معاني الآثار " ٢ / ٢٧ من طريق أبي حذيفة موسى بن مسعود النهدي، عن سفيان الثوري، عن أبي الزبير، عن جابر فوصله أيضاً .
حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ يَحْيَى الْحَرَّانِيُّ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ يَحْيَى بْنِ حَبَّانَ، عَنْ عَمِّهِ، وَاسِعِ بْنِ حَبَّانَ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَمَرَ مِنْ كُلِّ جَادِّ عَشَرَةِ أَوْسُقٍ مِنَ التَّمْرِ بِقِنْوٍ يُعَلَّقُ فِي الْمَسْجِدِ لِلْمَسَاكِينِ .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রহ:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিয়েছেন ‘দশ ওয়াসাক্ব খেজুর কাটলে এক কাঁদি খেজুর মিসকীনদের জন্য মাসজিদে ঝুলিয়ে রাখবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، محمد بن إسحاق صرح بالسماع عند أحمد (3/359 ح 14866)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن . محمد بن إسحاق صرح بالسماع في رواية " المسند " ، فانتفت شبهة تدليسه . وقال ابن كثير في " تفسيره ": هذا إسناد جيد قوي . وأخرجه أحمد في " مسنده " (١٤٨٦٧) ، وأبو يعلى (٢٠٣٨) ، وابن حبان في " صحيحه " (٣٢٨٩) من طريقين عن محمد بن سلمة، بهذا الإسناد . وأخرجه أحمد في " مسنده " (١٤٨٦٦) ، وأبو يعلى (١٧٨١) ، وابن خزيمة (٢٤٦٩) ، والطحاوي في " شرح معاني الآثار " ٤ / ٣٠، والحاكم ١ / ٤١٧، والبيهقي ٥ / ٣١١ من طرق عن محمد بن إسحاق، به . وقوله : " جاد عشرة " قال الخطابي : قال إبراهيم الحربي : يريد قدراً من النخل يُجد منه عشرة أوسق، وتقديره تقدير مجدود فاعل بمعنى مفعول، والمراد بالقِنو العذق بما عليه من الرطب والبسر يعلق للمساكين يأكلونه، وهذا من صدقة المعروف دون الصدقة التي هي فرض واجب .
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ الْخُزَاعِيُّ، وَمُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو الأَشْهَبِ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ بَيْنَمَا نَحْنُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سَفَرٍ إِذْ جَاءَ رَجُلٌ عَلَى نَاقَةٍ لَهُ فَجَعَلَ يَصْرِفُهَا يَمِينًا وَشِمَالاً فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ كَانَ عِنْدَهُ فَضْلُ ظَهْرٍ فَلْيَعُدْ بِهِ عَلَى مَنْ لاَ ظَهْرَ لَهُ وَمَنْ كَانَ عِنْدَهُ فَضْلُ زَادٍ فَلْيَعُدْ بِهِ عَلَى مَنْ لاَ زَادَ لَهُ " . حَتَّى ظَنَنَّا أَنَّهُ لاَ حَقَّ لأَحَدٍ مِنَّا فِي الْفَضْلِ .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা এক সফরে আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তার উটে আরোহণ করে সেটিকে ডানে-বামে হাঁকাতে লাগলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ যার অতিরিক্ত সওয়ারী আছে সে যেন তা যার কোনো সওয়ারী নেই তাকে দান করে এবং যার অতিরিক্ত পাথেয় আছে, সে যেন তা এমন ব্যক্তিকে দান করে যার পাথেয় নেই। বর্ণনাকারী বলেন, আমাদের ধারণা হলো যে, আমাদের অতিরিক্ত সম্পদ রাখার কোন অধিকার নেই।
সহীহ : মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1728)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . أبو الأشهب : هو جعفر بن حيان العطاردي، وأبو نضرة : هو المنذر بن مالك العبدي . وأخرجه مسلم (١٧٢٨) عن شيبان بن فرُّوخ، عن أبي الأشهب، به . وهو في " مسند أحمد " (١١٢٩٣) ، و " صحيح ابن حبان " (٥٤١٩). وقوله : " فليعد به على من لا ظهر له ". قال السندي : أي : فليعط من لا ظهر له .
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَعْلَى الْمُحَارِبِيُّ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا غَيْلاَنُ، عَنْ جَعْفَرِ بْنِ إِيَاسٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لَمَّا نَزَلَتْ هَذِهِ الآيَةُ { وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ } قَالَ كَبُرَ ذَلِكَ عَلَى الْمُسْلِمِينَ فَقَالَ عُمَرُ - رضى الله عنه أَنَا أُفَرِّجُ عَنْكُمْ . فَانْطَلَقَ فَقَالَ يَا نَبِيَّ اللَّهِ إِنَّهُ كَبُرَ عَلَى أَصْحَابِكَ هَذِهِ الآيَةُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنَّ اللَّهَ لَمْ يَفْرِضِ الزَّكَاةَ إِلاَّ لِيُطَيِّبَ مَا بَقِيَ مِنْ أَمْوَالِكُمْ وَإِنَّمَا فَرَضَ الْمَوَارِيثَ لِتَكُونَ لِمَنْ بَعْدَكُمْ " . فَكَبَّرَ عُمَرُ ثُمَّ قَالَ لَهُ " أَلاَ أُخْبِرُكَ بِخَيْرِ مَا يَكْنِزُ الْمَرْءُ الْمَرْأَةُ الصَّالِحَةُ إِذَا نَظَرَ إِلَيْهَا سَرَّتْهُ وَإِذَا أَمَرَهَا أَطَاعَتْهُ وَإِذَا غَابَ عَنْهَا حَفِظَتْهُ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন এ আয়াত অবতীর্ণ হলো : “যারা সোনা-রুপা সঞ্চিত করে রাখে …..” (সূরাহ আত-তাওবাহ : ৩৪), মুসলমানদের উপর তা ভারী মনে হলো। তখন ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমিই তোমাদের পক্ষ হতে এর সুষ্ঠু সমাধান নিয়ে আসবো। অতঃপর তিনি গিয়ে বললেন, হে আল্লাহর নবী ! এ আয়াতটি আপনার সঙ্গীদের উপর কষ্টকর অনুভূত হচ্ছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ নিশ্চয় মহান আল্লাহ তোমাদের অতিরিক্ত মাল পবিত্র করার জন্যই যাকাত ফারয করেছেন। আর তিনি উত্তরাধিকারীর ব্যবস্থা ফারয করেছেন এজন্যই যেন তা তোমাদের পরবর্তীদের জন্য থাকে। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহু আকবার ধ্বনি উচ্চারণ করলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ আমি কি তোমাকে মানুষের সর্বোত্তম সম্পদ সম্পর্কে অবহিত করবো না? তা হলো, নেককার স্ত্রী। সে তার দিকে তাকালে সে তাকে আনন্দ দেয় এবং তাকে কোন নির্দেশ দিলে সে তা মেনে নেয় এবং সে যখন তার থেকে অনুপস্থিত থাকে, তখন সে তার সতীত্ব ও তার সম্পদের হিফাযাত করে। [১৬৬৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، غیلان:سمعہ من عثمان بن عمیر أبی الیقظان عن جعفر بن إیاس بہ (رواہ البیھقي 83/4) ، وأبو الیقظان ضعیف مختلط مدلس ، (انوار الصحیفہ ص 67)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف فقد زاد غير واحد من الرواة بين غيلان - وهو ابن جامع - وبين جعفر بن إياس - وهو اليشكري الواسطي - عثمان أبا اليقظان، وهو ضعيف . يعلى : هو ابن الحارث بن حرب المحاربي . وأخرجه الحاكم ١ / ٤٠٨ - ٤٠٩ من طريق علي بن المديني، عن يحيى بن يعلى، بهذا الإسناد . وأخرجه أبو يعلى (٢٤٩٩) ، وابن أبي حاتم في " تفسيره " - كما في تفسير ابن كثير ٤ / ٨٢ - ، والحاكم في " المستدرك " ٢ / ٣٣٣، والبيهقي ٤ / ٨٣، وابن عبد البر في " التمهيد " ١٦٨ / ١٩ من طرق عن يحيي بن يعلى المحاربي، عن أبيه، عن غيلان، عن عثمان أبي اليقظان، عن جعفر بن إياس، به . وقوله في آخر الحديث : " ألا أخبرك بخير " حسن لغيره . وفى الباب عن ثوبان مولى رسول الله ﷺ بنحوه عند أحمد (٢٢٣٩٢) من طريق عبد الرحمن، عن إسرائيل عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن ثوبان، وهذا سند رجاله ثقات رجال الصحيح إلا أن سالم بن أبي الجعد راويه عن ثوبان لم يسمع منه فيما قاله غير واحد من أهل العلم . وأخرجه الترمذي (٣٠٩٤) وحسنه، وقال : سألت محمد بن إسماعيل سمع سالم ابن أبي الجعد من ثوبان؟ قال : لا . وللشطر الثاني في الحديث، وهو قوله : " ألا أخبرك بخير ما يكنز المرء … " شاهد من حديث ثوبان عند أحمد (٢٢٣٩٢) ، وابن ماجه (١٨٥٦) ، والترمذي (٣٠٩٤) ، وحسَّنَه . وآخر من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد (٦٥٦٧) ، ومسلم (١٤٦٧) ، وابن ماجه (١٨٥٥) ، والنسائي في " الكبرى " (٥٣٢٥) بلفظ : " الدنيا متاع، وخير متاع الدنيا المرأة الصالحة ". وثالث من حديث أبي هريرة عند النسائي (٥٣٢٤) قال : قيل لرسول الله ﷺ : أيّ النساء خير؟ قال : " التي تسرُّه إذا نظر، وتطيعه إذا أمر " ولا تخالفه في نفسها وماله بما يكره ". وإسناده صحيح .
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنَا مُصْعَبُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ شُرَحْبِيلَ، حَدَّثَنِي يَعْلَى بْنُ أَبِي يَحْيَى، عَنْ فَاطِمَةَ بِنْتِ حُسَيْنٍ، عَنْ حُسَيْنِ بْنِ عَلِيٍّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لِلسَّائِلِ حَقٌّ وَإِنْ جَاءَ عَلَى فَرَسٍ " .
হুসাইন ইবনু ‘আলী (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ (তোমাদের সম্পদে) যাঞ্ঝাকারীর অধিকার রয়েছে, যদিও সে ঘোড়ায় চড়ে আসে। [১৬৬৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2988) ، صححہ ابن خزیمۃ (2468 وسندہ حسن) یعلیٰ بن أبي یحیی وثقہ ابن خزیمۃ وابن حبان وجھلہ أبو حاتم وغیرہ فھو حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن . وقد حَسَّن إسناد هذا الحديث الحافظ العلائي في " النقد الصحيح " ص ٤١ - ٤٢، وجوّده الحافظ العراقي في " التقييد والإيضاح " والبرهان الأبناسي في " الشذا الفياح " ، والحافظ السخاوي في " المقاصد الحسنة " ، ونقل المناوي في " فيض القدير " أن ابن حجر العسقلاني ردّ على ابن الجوزي في إيراده هذا الحديث في " الموضوعات ". يعلى بن أبي يحيى - ويقال : يحيى بن أبي يعلى - روى عنه مصعب بن محمد بن شرحبيل ومحمد بن عبد الله بن مسلم الزهري وإسماعيل بن عبد الملك الأسدي، وذكره ابن حبان في " الثقات ". ووصفه الدولابي بأنه مولى فاطمة بنت الحُسين . وأخرجه ابن أبي شيبة ٣ / ١١٣، وأحمد (١٧٣٠) ، وحميد بن زنجوية في " الأموال " (٢٠٨٨) ، والبخاري في " التاريخ الكبير " ٨ / ٤١٦ معلقاً، والبزار في " مسنده " (١٣٤٣) ، وأبو يعلى (٦٧٨٤) ، وابن خزيمة (٢٤٦٨) ، والطبراني في " الكبير " (٢٨٩٣) ، وأبو نعيم في " حلية الأولياء " ٨ / ٣٧٩ وفي " معرفة الصحابة " (١٨٠٣) ، والبيهقي ٧ / ٢٣، وابن عبد البر في " التمهيد " ٥ / ٢٩٦ من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد . لكن سقط بعضُ الإسناد من مطبوع ابن خزيمة . وانظر ما بعده . ويشهد له حديث الهرماس بن زياد عند ابن قانع في " معجم الصحابة " ٣ / ٢١١، والطبراني في " الكبير " ٢٢ / (٥٣٥) وفي إسناده عثمان بن فائد، وهو ضعيف . ومرسل زيد بن أسلم عند مالك في " الموطأ " ٢ / ٩٩٦، وعبد الرزاق (٢٠٠١٧) ورجاله ثقات . وانظر " المقاصد الحسنة " للحافظ السخاوي (٨٧٣). قال ابن الأثير في " النهاية ": معناه الأمر بحسن الظن بالسائل إذا تعرّض لك، وأن لا تجْبَهَه بالتكذيب والردّ مع إمكان الصدق، أي : لا تخيب السائل وإن رابك منظره وجاء راكباً على فرس، فإنه قد يكون له فرس ووراءه عائلة، أو دين يجوز معه أخذ الصدقة، أو يكون من الغزاة أو من الغارمين وله في الصدقة سهم .
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رَافِعٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، عَنْ شَيْخٍ، قَالَ رَأَيْتُ سُفْيَانَ عِنْدَهُ عَنْ فَاطِمَةَ بِنْتِ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهَا، عَنْ عَلِيٍّ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِثْلَهُ .
‘আলী (রা:) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। [১৬৬৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث السابق (1665)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن كسابقه، ويغلب على ظننا أن الرجل المبهم في هذا الإسناد مو يعلى بن أبي يحيى الذي مضى ذكره في الإسناد السابق كما استظهره الحافظ العلائي في " النقد الصحيح ". وقد اختلف في إسناد هذا الحديث فمرة جاء عن حسين بن علي، عن أبيه كما هو هنا، ومرة جاء عن حسين بن علي مرسلاً - كما في الإسناد السابق . قال العلائي : وإن يكن كذلك فهو مرسل صحابي لا يجيء فيه الخلاف الذي في المرسل . زهير : هو ابن معاوية الجعفي . وأخرجه القضاعي في " مسند الشهاب " (٢٨٥) ، البيهقي ٧ / ٢٣، من طريق زهير ابن معاوية، بهذا الإسناد . وانظر ما قبله .
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ بُجَيْدٍ، عَنْ جَدَّتِهِ أُمِّ بُجَيْدٍ، وَكَانَتْ، مِمَّنْ بَايَعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهَا قَالَتْ لَهُ يَا رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْكَ إِنَّ الْمِسْكِينَ لَيَقُومُ عَلَى بَابِي فَمَا أَجِدُ لَهُ شَيْئًا أُعْطِيهِ إِيَّاهُ . فَقَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنْ لَمْ تَجِدِي لَهُ شَيْئًا تُعْطِينَهُ إِيَّاهُ إِلاَّ ظِلْفًا مُحْرَقًا فَادْفَعِيهِ إِلَيْهِ فِي يَدِهِ " .
উম্মু বুজাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে বাই‘আত প্রহণকারিণীদের একজন। তিনি তাঁকে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনার প্রতি অনুগ্রহ করুন। মিসকীন আমার দরজায় এসে দাড়ায়, কিন্তু তাকে দেয়ার মতো কিছুই আমি পাই না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ তাকে দেয়ার মতো কিছু না পেলে অন্তত রান্না করা পশুর একখান পায়া হলেও তার হাতে তুলে দাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (1879، 1942) ، أخرجہ الترمذي (665 وسندہ صحیح) والنسائي (2575 وسندہ صحیح) وصححہ ابن خزیمۃ (2473 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن ، عبد الرحمن بن بجيد مختلف في صحبته، وذكر الحافظ في " التقريب " أن له رؤية، وقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في " الثقات ". وأخرجه الترمذي (٦٧١) ، والنسائي في " الكبرى " (٢٣٦٦) من طريق قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد، وقال الترمذي : حديث حسن صحيح . وأخرجه النسائي (٢٣٥٧) من طريق زيد بن أسلم عن عبد الرحمن بن بجيد، به . وهو في " مسند أحمد " (٢٧١٤ - ٢٧١٥١) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٣٧٣). الظلف، قال في " القاموس ": الظلف بالكسر للبقرة والشاة وشبهها بمنزلة القدم لنا .
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي شُعَيْبٍ الْحَرَّانِيُّ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَسْمَاءَ، قَالَتْ قَدِمَتْ عَلَىَّ أُمِّي رَاغِبَةً فِي عَهْدِ قُرَيْشٍ وَهِيَ رَاغِمَةٌ مُشْرِكَةٌ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ أُمِّي قَدِمَتْ عَلَىَّ وَهِيَ رَاغِمَةٌ مُشْرِكَةٌ أَفَأَصِلُهَا قَالَ " نَعَمْ فَصِلِي أُمَّكِ " .
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, (হুদাইবিয়ার সন্ধির সময়) আমার মা-যিনি ইসলাম বিদ্বেষী ও কুরাইশদের ধর্মাবলম্বী ছিলেন, তিনি সদ্ব্যবহার পাবার আশায় আমার নিকট আসলেন। তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার মা আমার কাছে এসেছেন, অথচ তিনি ইসলাম বিদ্বেষী মুশরিকা। আমি কি তার সাথে সদাচরণ করবো? তিনি বললেনঃ তুমি তোমার মায়ের সাথে অবশ্যই সদাচরণ করবে।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2620) صحیح مسلم (1003)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . وأخرجه البخاري (٢٦٢٠) و (٣١٨٣) و (٥٩٧٨) و (٥٩٧٩) ، ومسلم (١٠٠٣) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (٢٦٩١٣) ، و " صحيح ابن حبان " (٤٥٢). وقولها : راغبة في عهد قريش، قال الخطابي : أي : طالبة يري وصلتي، وقولها : راغمة . معناه : كارهة للإسلام، ساخطة علي، تريد أنها لم تَقدَم مهاجرة راغبة في الدين كما كان يقدم المسلمون من مكة للهجرة والإقامة بحضرة رسول الله ﷺ وإنما أمر بصلتها لأجل الرحم، فأما دفع الصدقة الواجبة إليها، فلا يجوز، وإنما هي حق للمسلمين لا يجوز صرفها إلى غيرهم، ولو كانت أمها مسلمة لم يكن أيضاً يجوز لها إعطاؤها الصدقة، فإن خَلتها مسدودة بوجوب النفقة لها على ولدها إلا أن تكون غارمة فتعطى من سهم الغارمين، فأما من سهم الفقراء والمساكين، فلا، وكذلك إذا كان الوالد غازياً جاز للولد أن يدفع إليه من سهم السبيل . وأخرج ابن سعد في " الطبقات " ٨ / ٢٥٢ والطبري ٢٨ / ٦٦ وأبو داود الطيالسي (١٦٣٩) والحاكم ٢ / ٤٨٥ من حديث عبد الله بن الزبير قال : قدمت قُتَيلَةُ بنت عبد العزى ابن سعد من بني مالك بن حِسل على ابنتها أسماء بنت أبي بكر في الهدنة، وكان أبو بكر طلقها في الجاهلية بهدايا وزبيب وسمن وقرظ، فأبت أن تقبل هديتها أو تدخلها بيتها، فأرسلت إلى عائشة : سلي رسول الله ﷺ ، فقال : لتدخلنها . قلنا : وهو في " المسند " (١٦١١١) وفي سنده عندهم مصعب بن ثابت وهو لين الحديث . قال الحافظ في " الفتح " ٣٣٣ / ٥ : ووقع عند الزبير بن بكار أن اسمها قيلة، ورأيته في نسخة مجردة منه بسكون التحتانية، وضبط ابن ماكولا ٧ / ١٣٠ بسكون المثناة قتلة، فعلى هذا فمن قال : " قتيلة " صغرها قال الزبير : أم أسماء وعبد الله ابني أبي بكر قيلة بنت عبد العزى، وساق نسبها إلى حسن بن عامر بن لؤي .
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا كَهْمَسٌ، عَنْ سَيَّارِ بْنِ مَنْظُورٍ، - رَجُلٍ مِنْ بَنِي فَزَارَةَ - عَنْ أَبِيهِ، عَنِ امْرَأَةٍ، يُقَالُ لَهَا بُهَيْسَةُ عَنْ أَبِيهَا، قَالَتِ اسْتَأْذَنَ أَبِي النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَدَخَلَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ قَمِيصِهِ فَجَعَلَ يُقَبِّلُ وَيَلْتَزِمُ ثُمَّ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الشَّىْءُ الَّذِي لاَ يَحِلُّ مَنْعُهُ قَالَ " الْمَاءُ " . قَالَ يَا نَبِيَّ اللَّهِ مَا الشَّىْءُ الَّذِي لاَ يَحِلُّ مَنْعُهُ قَالَ " الْمِلْحُ " . قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الشَّىْءُ الَّذِي لاَ يَحِلُّ مَنْعُهُ قَالَ " أَنْ تَفْعَلَ الْخَيْرَ خَيْرٌ لَكَ " .
বুহায়সাহ (রঃ) তার পিতা হতে বর্ণিত, আমার পিতা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর (শরীরে চুমু দেয়ার) অনুমতি চাইলেন। অতঃপর তিনি তাঁর জামার ভেতরে প্রবেশ করে চুমা দিতে লাগলেন এবং তাঁকে জড়িয়ে ধরে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! কোন বস্তু চাইলে নিষেধ করা হালাল নয়? তিনি বললেনঃ পানি। তিনি আবার জিজ্ঞেস করলেন, কোন বস্তু চাইলে নিষেধ করা হালাল নয়? তিনি বললেনঃ লবণ। তিনি পুনরায় জিজ্ঞেস করলেন, কোন বস্তু চাইলে নিষেধ করা হালাল নয়? তিনি বললেনঃ তোমার কোন ভালো কাজ করাটাই তোমার জন্য কল্যাণকর।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، والحدیث الآتی (3476) ، سیار بن منظور و أبوہ مستوران لم یوثقھما غیر ابن حبان وانظر التحریر (2717،6913) ، (انوار الصحیفہ ص 67)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف ، مسلسل بالمجاهيل . سيّار بن منظور لم يرو عنه غير كهمس ابن الحسن، ووثقه العجلي، وذكره ابن حبان في " الثقات ". وقال عبد الحق الإشبيلي فيما نقله عنه الحافظ في " تهذيبه ": مجهول . وأبوه منظور - ابن سيار الفزاري - لم يروِ عنه غيرُ ابنه سيار، ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وقال الذهبي في " الميزان " ٤ / ١٩٠ : لا يُعرف . وبهيسة الفزارية، قال الذهبي : تفرد عنها أبو سيار بن منظور الفزاري، وقال الحافظ في " التقريب ": لا تُعرف، ويقال : إن لها صحبة . وذكر في " الإصابة " أنه ليس في حديثها ما يدل على صحبتها، لأن سياق ابن منده : أن أباها استأذن، وسياق أبي داود والنسائي : عن أبيها أنه استاذن، قال : وهو المعتمد . قلنا : وقد وقع اضطراب في إسناد هذا الحديث أيضاً، فبعض الرواة يذكر والد سيار بن منظور، وبعضهم لا يذكره . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٩٥٩١) من طريق معاذ بن معاذ العنبرى عن كهمس، بهذا الإسناد . مختصراً بقوله : " استأذن أبي النبي ﷺ فدخل بينه وبين قميصه، فجعل يقبّل ويلتزمه ". وهو عند أحمد بتمامه برقم (١٥٩٤٥). وسيأتي مكرراً برقم (٣٤٧٦).
حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ بَكْرٍ السَّهْمِيُّ، حَدَّثَنَا مُبَارَكُ بْنُ فَضَالَةَ، عَنْ ثَابِتٍ الْبُنَانِيِّ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " هَلْ مِنْكُمْ أَحَدٌ أَطْعَمَ الْيَوْمَ مِسْكِينًا " . فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ رضى الله عنه - دَخَلْتُ الْمَسْجِدَ فَإِذَا أَنَا بِسَائِلٍ يَسْأَلُ فَوَجَدْتُ كِسْرَةَ خُبْزٍ فِي يَدِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ فَأَخَذْتُهَا مِنْهُ فَدَفَعْتُهَا إِلَيْهِ .
আবদুর রহমান ইবনু আবূ বক্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমাদের মধ্যে এমন কেউ আছে কি যে আজ মিসকীনকে আহার করিয়েছে? আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি মাসজিদে ঢুকেই এক ভিক্ষুকের সাক্ষাত পেলাম। আমি ‘আবদুর রহমানের হাতে এক টুকরা রুটি পেয়ে তার থেকে সেটা নিয়ে ভিক্ষুককে দান করলাম।
দূর্বলঃ তবে ভিক্ষুকের ঘটনা বাদে সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف وهو صحيح دون قصة السائل م
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مبارک بن فضالۃ عنعن وھو مدلس (طبقات المدلسین: 3/93) قال الھیثمي: ضعفہ الجمہور(مجمع الزوائد 202/8) و قال الھیثمي أیضًا: و الأکثر علی توثیقہ(مجمع الزوائد 54/1) ، قلت: و ھذا ھو الصواب بشرط تصریح سماعہ من شیخہ ، و لبعض الحدیث شاہد عند مسلم (ح1028 بعد 2387) ، (انوار الصحیفہ ص 67)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح ، وهذا إسناده حسن . مبارك بن فضالة صدوق، وهو وإن كان يدلس، لا يُظَنُّ تدليسُه هنا، فقد رأى أنس بن مالك، وروايته هنا عن تابعي عن تابعي عن صحابي، فيبعد تدليسُه، والله أعلم . بشر بن آدم : هو البصري، ثابت : هو ابن أسلم البناني . وأخرجه البزار (٢٢٦٧) عن بثر بن آدم، والحاكم في " المستدرك " ١ / ٤١٢، والبيهقي ٤ / ١٩٩ من طريق سهل بن مِهران، كلاهما عن عبد الله بن بكر، بهذا الإسناد . ورواية البزار مطولة بنحو رواية أبي هريرة الآتية . وفي الباب عن أبي هريرة عند مسلم (١٠٢٨) وغيره قال : قال رسول الله ﷺ : " من أصبح منكم اليوم صائماً؟ " ، قال أبو بكر ﵁ : أنا، قال : " فمن تبع منكم اليوم جنازة؟ " قال أبو بكر ﵁ : أنا، قال : " فمن أطعم منكم اليوم مسكيناً؟ " قال أبو بكر ﵁ : أنا، قال : " من عاد منكم اليوم مريضاً؟ " قال أبو بكر ﵁ : أنا، فقال رسول الله ﷺ : " ما اجتمعن في امرئ إلا دخل الجنة ".
حَدَّثَنَا أَبُو الْعَبَّاسِ الْقِلَّوْرِيُّ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ إِسْحَاقَ الْحَضْرَمِيُّ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ مُعَاذٍ التَّيْمِيِّ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُنْكَدِرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ يُسْأَلُ بِوَجْهِ اللَّهِ إِلاَّ الْجَنَّةُ " .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আল্লাহর নামের দোহাই দিয়ে জান্নাত ছাড়া অন্য কিছু চাওয়া উচিৎ নয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سلیمان بن معاذ: ضعفہ الجمہور من جھۃ حفظہ وأخرج لہ مسلم (ح 2640) متابعۃ فھو ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 67)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف ، لضعف سليمان - وهو ابن قرم بن معاذ التميمي الضبي -. أبو العباس : هو أحمد بن عمرو بن عبيدة القلوري العصفري، وابن المنكدر : هو محمد . وأخرجه ابن عدي في " الكامل " ٣ / ١١٠٧، والبيهقي في " سننه " ١٩٩ / ٤، والخطيب في " الموضح " ١ / ٣٥٣ من طريق أي العباس القِلَّوري، بهذا الإسناد . وأخرجه الفسوي في " المعرفة والتاريخ " ٣ / ٣٦٢، والبيهقي في " شعب الإيمان " (٣٢٥٩) ، والخطيب في " الموضح " ١ / ٣٥٢ - ٣٥٣ من طريقين عن يعقوب بن إسحاق، به .
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنِ اسْتَعَاذَ بِاللَّهِ فَأَعِيذُوهُ وَمَنْ سَأَلَ بِاللَّهِ فَأَعْطُوهُ وَمَنْ دَعَاكُمْ فَأَجِيبُوهُ وَمَنْ صَنَعَ إِلَيْكُمْ مَعْرُوفًا فَكَافِئُوهُ فَإِنْ لَمْ تَجِدُوا مَا تُكَافِئُونَهُ فَادْعُوا لَهُ حَتَّى تَرَوْا أَنَّكُمْ قَدْ كَافَأْتُمُوهُ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি আল্লাহর নামে নিরাপত্তা চায়, তাকে নিরাপত্তা দাও। যে ব্যক্তি আল্লাহর নামে ভিক্ষা চায়, তাকে দাও। যে ব্যক্তি তোমাদেরকে দাওয়াত করে তার ডাকে সাড়া দাও। যে ব্যক্তি তোমাদের সাথে সদ্ব্যবহার করে তোমরা তার উত্তম প্রতিদান দাও। প্রতিদান দেয়ার মতো কিছু না পেলে তার জন্য দু‘আ করতে থাকো, যতক্ষণ না তোমরা অনুধাবন করতে পারো যে, তোমরা তার প্রতিদান দিতে পেরেছো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (2568) والحدیث الآتی (5109) ، الأعمش مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 67)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . جرير : هو ابن عبد الحميد بن قرط الضبي، والأعمش : هو سليمان بن مِهران، ومُجاهد : هو ابن جبر المكى . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٢٣٥٩) من طريق أبي عوانة، عن الأعمش، بهذا الإسناد . وزاد : " ومن استجار بالله فأجيروه " ، ولم يذكر قوله : " إذا دعاكم فأجيبوه ". وهو في " مسند أحمد " (٥٣٦٥) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٣٧٥) و (٣٤٠٨). وسيأتي برقم (٥١٠٩).
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ عُمَرَ بْنِ قَتَادَةَ، عَنْ مَحْمُودِ بْنِ لَبِيدٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الأَنْصَارِيِّ، قَالَ كُنَّا عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذْ جَاءَ رَجُلٌ بِمِثْلِ بَيْضَةٍ مِنْ ذَهَبٍ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَصَبْتُ هَذِهِ مِنْ مَعْدِنٍ فَخُذْهَا فَهِيَ صَدَقَةٌ مَا أَمْلِكُ غَيْرَهَا . فَأَعْرَضَ عَنْهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ أَتَاهُ مِنْ قِبَلِ رُكْنِهِ الأَيْمَنِ فَقَالَ مِثْلَ ذَلِكَ فَأَعْرَضَ عَنْهُ ثُمَّ أَتَاهُ مِنْ قِبَلِ رُكْنِهِ الأَيْسَرِ فَأَعْرَضَ عَنْهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ أَتَاهُ مِنْ خَلْفِهِ فَأَخَذَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَحَذَفَهُ بِهَا فَلَوْ أَصَابَتْهُ لأَوْجَعَتْهُ أَوْ لَعَقَرَتْهُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " يَأْتِي أَحَدُكُمْ بِمَا يَمْلِكُ فَيَقُولُ هَذِهِ صَدَقَةٌ ثُمَّ يَقْعُدُ يَسْتَكِفُّ النَّاسَ خَيْرُ الصَّدَقَةِ مَا كَانَ عَنْ ظَهْرِ غِنًى " .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট অবস্থানকালে এক ব্যক্তি একটি ডিম পরিমাণ স্বর্ণ নিয়ে এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি এ স্বর্ণ খনি থেকে পেয়েছি, এটি দান হিসেবে গ্রহণ করুন। এছাড়া আমার আর কিছুই নেই। রাসূলুল্লাহ তার মুখ ফিরিয়ে নিলে লোকটি তাঁর ডান পাশ এসে আগের মতই বললো। এরপর সে তাঁর বাম পাশে এসেও তাই বললো। আর তিনিও তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। অবশেষে সে তাঁর পিছনে এসে অনুরূপ বললে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা নিয়ে এমন জোরে তার দিকে ছুড়ে মারলেন যে, তার শরীরে লাগলে সে অবশ্যই যখম বা আহত হতো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমাদের কেউ তার সমস্ত মাল আমার কাছে নিয়ে এসে বলে, এটা সদাক্বাহ। পরে সে (সম্বলহীন হয়ে) লোকের কাছে ভিক্ষা করে বেড়ায়। বস্তুত সর্বোত্তম সদাক্বাহ সেটাই যা অভাবমুক্ত থেকে দান করা হয়।
দুর্বলঃ তবে হাদীসের এ বাক্যটি সহীহঃ “সর্বোত্তম সদাক্বাহ সেটাই যা অভাবমুক্ত থেকে দান করা হয়।”
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف إنما يصح منه جملة خير الصدقة
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 67)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات . محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - مدلس وقد عنعن . لكن ذكر الحافظ في " هدي الساري " ص ٤٢ : أنه وقع عند أبي يعلى تصريح ابن إسحاق بسماعه من عاصم بن عمر بن قتادة، فإن يكن صحيحاً فالإسناد حسن، على أننا لم نجد تصريحه بالسماع في مطبوع " مسند أبى يعلى " ، فالله أعلم . وأخرجه الحاكم في " المستدرك " ١ / ٤١٣، والبيهقي في " سننه " ٤ / ١٥٤ من طريق موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد . وقال الحاكم : صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه ! وأخرجه عبد بن حميد (١١٢٠) و (١١٢١) ، والدارمي (١٦٥٩) ، وأبو يعلى (٢٠٨٤) و (٢٢٢٠) ، والطبري في " تفسيره " ٢ / ٣٦٦، وابن خزيمة (٢٤٤١) ، والطحاوي في " شرح مشكل الآثار " (٤٧٧١) ، والبيهقي في " سننه الكبرى " ٤ / ١٨١ و١٠ / ٣٢٢، وفي " الشُّعب " (٣١٤٤) من طرق عن محمد بن إسحاق، به . وانظر ما بعده . وقوله : يستكف الناس . قال الخطابي : معناه : يتعرض للصدقة، وهو أن يأخذها ببطن كفه، يقال : تكفف الرجل واستكف : إذا فعل ذلك، ومن هذا قوله ﷺ لسعد ﵁ : " إنك أن تدع ورثتك أغنياء خير لك من أن تدعهم عالة يتكففون الناس ". وقوله : خير الصدقة ما كان عن ظهر غنى، أي : عن غنى يعتمده ويستظهره به على النوائب التي تنوبه، كقوله في حديث آخر : " خير الصدقة ما أبقت غنيً ". وفي الحديث من الفقه أن الاختيار للمرء أن يستبقي بنفسه قوتاً، وأن لا ينخلع من ملكه أجمع مرة واحدة لما يخاف عليه من فتنة الفقر، وشدة نزاع النفس إلى ما خرج من يده فيندم فيذهب ماله، ويبطل أجره، ويصير كلاً على الناس . قال الخطابي : ولم ينكر على أبي بكر الصديق ﵁ خروجه من ماله أجمع لما علمه من صحة نيته وقوة يقينه، ولم يخف عليه الفتنة كما خافها على الرجل الذي رد عليه الذهب .
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ إِدْرِيسَ، عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ زَادَ " خُذْ عَنَّا مَالَكَ لاَ حَاجَةَ لَنَا بِهِ " .
ইবনু ইসহাক্ব (রঃ) হতে বর্ণিত, উল্লেখিত সানাদে অনুরূপ অর্থের হাদীস বর্ণিত। তাতে আরো রয়েছেঃ ‘তুমি তোমার মাল নিয়ে যাও, আমাদের এর কোনই প্রয়োজন নেই’।[১৬৭৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، وانظر الحدیث السابق (1673) ، (انوار الصحیفہ ص 67، 68)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات كسابقه . ابن ادريس : هو عبد الله الأودي . وأخرجه ابن حبان في " صحيحه " (٣٣٧٢) ، وابن خزيمة (٢٤٤١) من طريقين عن ابن إدريس، بهذا الإسناد . وانظر ما قبله .