হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (1835)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ عَطَاءٍ، وَطَاوُسٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم احْتَجَمَ وَهُوَ مُحْرِمٌ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহরিম অবস্হায় রক্তমোক্ষণ করিয়েছেন। [১৮৩৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1835) صحیح مسلم (1202)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . هشام : هو ابن حسان الأزدي . وأخرجه البخاري (٥٧٠٠) ، والنسائي في " الكبرى " (٧٥٥٥) من طريقين عن هشام، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (٢١٠٨) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٥٠). وانظر ما قبله .









সুনান আবী দাউদ (1836)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَخْبَرَنَا هِشَامٌ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم احْتَجَمَ وَهُوَ مُحْرِمٌ فِي رَأْسِهِ مِنْ دَاءٍ كَانَ بِهِ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো রোগের কারণে মুহরিম অবস্হায় তাঁর মাথায় রক্তমোক্ষণ করিয়েছেন। [১৮৩৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5700) ، مشکوۃ المصابیح (4543)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات . لكن خالف معمراً في وصله سعيد بن أبي عَروبة كما قال المصنف، فأرسله عن قتادة . وابن أبي عروبة ثبتٌ في قتادة، وأما معمر فنقل ابنُ معين عنه أنه قال : جلست إلى قتادة وأنا صغير، فلم أحفظ عنه الأسانيد، ذكره ابن رجب في " شرح العلل " ٢ / ٥٠٩، وقال الدارقطني فيما نقله عنه ابن رجب أيضاً : معمر سيئ الحفظ لحديث قتادة . وقد شذ بقوله : على ظهر القدم، فقد روى ابن عباس عند البخاري (٥٧٠٠) وغيره : أن رسول الله ﷺ احتجم وهو محرم في رأسه . وروى ابن بحينة عن البخاري (١٨٣٦) ، ومسلم (١٢٠٣): أن النبي ﷺ احتجم وهو محرم في وسط رأسه . وقد ثبت عن أنس بن مالك من طريق حميد، عنه . لكن بذكر الحجامة فقط دون بيان موضعها عند أحمد (١٣٨١٦) ، وابن خزيمة (٢٦٥٨). وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٣٨١٨) و (٧٥٥٤) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (١٢٦٨٢) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٥٢). وكنا قد صححنا الحديث فيهما فيُستدرك من هنا .









সুনান আবী দাউদ (1837)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم احْتَجَمَ وَهُوَ مُحْرِمٌ عَلَى ظَهْرِ الْقَدَمِ مِنْ وَجَعٍ كَانَ بِهِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ سَمِعْتُ أَحْمَدَ قَالَ ابْنُ أَبِي عَرُوبَةَ أَرْسَلَهُ يَعْنِي عَنْ قَتَادَةَ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যাথার কারণে ইহরাম অবস্হায় তাঁর পায়ের উপরিভাগে রক্তমোক্ষণ করিয়েছেন। ইবনু আবূ আরুবাহ (রাহিমাহুল্লাহ) ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে এটি মুরসালভাবে বর্ণনা করেছেন। [১৮৩৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (2852) ، قتادۃ مدلس وعنعن ، وللحدیث شاھد ضعیف یأتي(3863) ، (انوار الصحیفہ ص 72)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: قول أبى داود هذا أثبتناه من (ج) و (هـ) ، وهو في روايتي ابن داسه وابن الأعرابي .









সুনান আবী দাউদ (1838)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَيُّوبَ بْنِ مُوسَى، عَنْ نُبَيْهِ بْنِ وَهْبٍ، قَالَ اشْتَكَى عُمَرُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ مَعْمَرٍ عَيْنَيْهِ فَأَرْسَلَ إِلَى أَبَانَ بْنِ عُثْمَانَ - قَالَ سُفْيَانُ وَهُوَ أَمِيرُ الْمَوْسِمِ - مَا يَصْنَعُ بِهِمَا قَالَ اضْمِدْهُمَا بِالصَّبِرِ فَإِنِّي سَمِعْتُ عُثْمَانَ - رضى الله عنه - يُحَدِّثُ ذَلِكَ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.




নুবাইহ্ ইবনু ওয়াহাব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, উমার ইবনু ‘উবাইদুল্লাহ ইবনু মা‘মারের চোখের অসুখ হলো। তিনি আবান ইবনু ‘উসমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে জানতে চেয়ে পাঠালেন, এখন কি করণীয়? সুফিয়ান বলেন, তিনি (আবান) ছিলেন আমীরুল হাজ্জ। তিনি বললেন, ‘সাবার’ নামক তিতা গাছের রস চোখে লাগাও। কেননা আমি ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি। [১৮৩৮]




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1204)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . سفيان : هو ابن عيينة . وأخرجه مسلم (١٢٠٤) ، والترمذي (٩٧٣) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٦٧٧) من طرق عن سفيان، بهذا الإسناد . وأخرجه مسلم (١٢٠٤) من طريق عبد الوارث، عن أيوب بن موسى، به . وهو في " مسند أحمد " (٤٩٤) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٥٤). وانظر ما بعده . قال النووي : اتفق العلماء على جواز تضميد العين وغيرها بالصبر ونحوه مما ليس بطيب ولا فدية في ذلك، فإن احتاج إلى ما فيه طيب فعله وعليه الفدية، واتفق العلماء على أن للمحرم أن يكتحل بكحل لا طيب فيه إذا احتاج إليه ولا فدية عليه، وأما الاكتحال للزينة فمكروه عند الشافعي وآخرين، ومنعه جماعة، منهم أحمد وإسحاق وفي مذهب مالك قولان كالمذهبين وفي إيجاب الفدية عندهم بذلك خلاف، والله أعلم .









সুনান আবী দাউদ (1839)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ ابْنُ عُلَيَّةَ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ نُبَيْهِ بْنِ وَهْبٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ ‏.‏




নাফি’ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, নুবাইহ্ ইবনু ওয়াহাব (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত। [১৮৩৯]



আমি এটি সহীহ এবং যঈফে পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، أنظر الحدیث السابق (1838)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . أيوب : هو السختياني . وهو في " مسند أحمد " (٤٢٢). وانظر ما قبله .









সুনান আবী দাউদ (1840)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ حُنَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَبَّاسٍ، وَالْمِسْوَرَ بْنَ مَخْرَمَةَ، اخْتَلَفَا بِالأَبْوَاءِ فَقَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ يَغْسِلُ الْمُحْرِمُ رَأْسَهُ وَقَالَ الْمِسْوَرُ لاَ يَغْسِلُ الْمُحْرِمُ رَأْسَهُ فَأَرْسَلَهُ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبَّاسٍ إِلَى أَبِي أَيُّوبَ الأَنْصَارِيِّ فَوَجَدَهُ يَغْتَسِلُ بَيْنَ الْقَرْنَيْنِ وَهُوَ يُسْتَرُ بِثَوْبٍ قَالَ فَسَلَّمْتُ عَلَيْهِ فَقَالَ مَنْ هَذَا قُلْتُ أَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ حُنَيْنٍ أَرْسَلَنِي إِلَيْكَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبَّاسٍ أَسْأَلُكَ كَيْفَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَغْسِلُ رَأْسَهُ وَهُوَ مُحْرِمٌ قَالَ فَوَضَعَ أَبُو أَيُّوبَ يَدَهُ عَلَى الثَّوْبِ فَطَأْطَأَهُ حَتَّى بَدَا لِي رَأْسُهُ ثُمَّ قَالَ لإِنْسَانٍ يَصُبُّ عَلَيْهِ اصْبُبْ ‏.‏ قَالَ فَصَبَّ عَلَى رَأْسِهِ ثُمَّ حَرَّكَ أَبُو أَيُّوبَ رَأْسَهُ بِيَدَيْهِ فَأَقْبَلَ بِهِمَا وَأَدْبَرَ ثُمَّ قَالَ هَكَذَا رَأَيْتُهُ يَفْعَلُ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




ইবরাহীম ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইন (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস ও আল-মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে আল-আবওয়া নামক স্হানে মতবিরোধ দেখা দিলে ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, মুহরিম ব্যক্তি মাথা ধুতে পারবে। আর মিসওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, মুহরিম ব্যক্তি মাথা ধুতে পারবে না। সুতরাং এ বিষয়ে জানার জন্য ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইনকে আবূ আইয়ূব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রেরণ করেন। তিনি গিয়ে তাকে দুই খুঁটির মাঝখানে একখানা কাপড়ের আড়ালে গোসল করতে দেখলেন। তিনি বলেন, আমি তাকে সালাম দিলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন, তুমি কে? আমি বললাম, আমি ‘আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইন। ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে আপনার কাছে জানতে পাঠিয়েছেন যে, মুহরিম অবস্হায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মাথা কিভাবে ধুতেন? ইবনু হুনাইন বলেন, আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার হাত কাপড়ের উপর রেখে তা নিচু করলেন, এমনকি আমি তার মাথা দেখতে পেলাম। এরপর তিনি এক ব্যক্তিকে তার মাথায় পানি ঢালতে বললে সে পানি ঢালতে থাকলো। তখন তিনি মাথার চুলে দুই হাত দিয়ে একবার সামনে আনলেন, আবার পিছনে নিলেন। অতঃপর বললেন, আমি রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এরূপ করতে দেখেছি। [১৮৪০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1840) صحیح مسلم (1205)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . وهو عند مالك في " الموطأ " ١ / ٣٢٣، ومن طريقه أخرجه البخاري (١٨٤٠) ، ومسلم (١٢٠٥) ، وابن ماجه (٢٩٣٤) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٦٣١). وأخرجه مسلم (١٢٠٥) من طريقين عن زيد بن أسلم، به . وهو في " مسند أحمد " (٢٣٥٤٨) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٤٨). قال النووي : في هذا الحديث فوائد، منها جواز اغتسال المحرم وغسل رأسه وإمرار اليد على شعره بحيث لا ينتف شعراً، ومنه قبول خبر الواحد، وأن قوله كان مشهوراً عند الصحابة ﵃ ، ومنها الرجوع إلى النص عند الاختلاف وترك الاجتهاد والقياس عند وجود النص، ومنها السلام على المتطهر في وضوء وغسل بخلاف الجالس على الحدث، ومنها جهاز الاستعانة في الطهارة، ولكن الأولى تركها إلا لحاجة، واتفق العلماء على جواز غسل المحرم رأسه وجسده من الجنابة بل هو واجب عليه، وأما غسله تبرداً فمذهبنا ومذهب الجمهور جوازه بلا كراهة ويجوز عندنا غسل رأسه بالسدر والخطمي بحيث لا ينتف شعراً فلا فدية عليه، وقال أبو حنيفة ومالك : هو حرام موجب للفدية .









সুনান আবী দাউদ (1841)


حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ نُبَيْهِ بْنِ وَهْبٍ، أَخِي بَنِي عَبْدِ الدَّارِ أَنَّ عُمَرَ بْنَ عُبَيْدِ اللَّهِ، أَرْسَلَ إِلَى أَبَانَ بْنِ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ يَسْأَلُهُ وَأَبَانُ يَوْمَئِذٍ أَمِيرُ الْحَاجِّ وَهُمَا مُحْرِمَانِ إِنِّي أَرَدْتُ أَنْ أُنْكِحَ طَلْحَةَ بْنَ عُمَرَ ابْنَةَ شَيْبَةَ بْنِ جُبَيْرٍ فَأَرَدْتُ أَنْ تَحْضُرَ ذَلِكَ ‏.‏ فَأَنْكَرَ ذَلِكَ عَلَيْهِ أَبَانُ وَقَالَ إِنِّي سَمِعْتُ أَبِي عُثْمَانَ بْنَ عَفَّانَ يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ يَنْكِحُ الْمُحْرِمُ وَلاَ يُنْكَحُ ‏"‏ ‏.




নুবাইহ্ ইবনু ওয়াহাব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, উমার ইবনু উবাইদুল্লাহ এক ব্যক্তিকে আবান ইবনু ‘উসমানের নিকট প্রেরণ করলেন এটা জিজ্ঞেস করার জন্য যে, আমি (আমার পুত্র) ত্বালহা ইবনু ‘উমারকে শাইবাহ ইবনু জুবাইরের মেয়ের সাথে বিয়ে দেয়ার ইচ্ছা করেছি। তখন আবান ছিলেন আমীরুল হাজ্জ এবং তারা উভয়েই মুহরিম ছিলেন। আমরা আশা করি আপনি এ অনুষ্ঠানে উপস্হিত থাকবেন। আবান ‘উমারের এ প্রস্তাব প্রত্যাখান করে বললেন, আমি আমার পিতা ‘উসমান ইবনু ‘আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মুহরিম ব্যক্তি ইহরাম অবস্হায় বিয়ে করতে পারবে না এবং কাউকে বিয়ে করাতেও পারবে না। [১৮৪১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1409)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . القعنبي : هو عبد الله بن مسلمة، ونافع : هو مولى ابن عمر . وهو عند مالك في " الموطأ " ١ / ٣٤٨ - ٣٤٩، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٤٠٩) ، وابن ماجه (١٩٦٦) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٨١١) و (٣٨١٢) و (٥٣٩٠). وزادوا : " ولا يخطب " وستأتي هذه الزيادة بعده . وأخرجه مسلم (١٤٠٩) ، والترمذي (٨٥٦) من طريق أيوب السختياني، عن نافع، به . وأخرجه مسلم (١٤٠٩) من طريق سعيد بن أبي هلال، عن نبيه بن وهب، به . وهو في " مسند أحمد " (٤٠١) ، و " صحيح ابن حبان " (٤١٢٣). وانظر ما بعده . قال الخطابي : ذهب الى ظاهر هذا الحديث مالك والشافعي ورأيا النكاح إذا عقد في الإحرام مفسوخاً سواء عقده المرء لنفسه، أو كان ولياً وعقده لغيره . وقال أصحاب الرأي : نكاح المرء لنفسه وإنكاحه لغيره جائز، واحتجوا بخبر ابن عباس الآتي برقم (١٨٤٤) أن رسول الله ﷺ تَزوَّج ميمونة وهو محرم .









সুনান আবী দাউদ (1842)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، أَنَّ مُحَمَّدَ بْنَ جَعْفَرٍ، حَدَّثَهُمْ حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ مَطَرٍ، وَيَعْلَى بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ نُبَيْهِ بْنِ وَهْبٍ، عَنْ أَبَانَ بْنِ عُثْمَانَ، عَنْ عُثْمَانَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ذَكَرَ مِثْلَهُ زَادَ ‏ "‏ وَلاَ يَخْطُبُ ‏"‏ ‏.‏




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, অতঃপর বর্ণনাকারী উপরোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেন। তবে এ বর্ণনায় আরো রয়েছে : ‘বিবাহের প্রস্তাবও দিতে পারবে না’। [১৮৪২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (1841)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . مطر - هو ابن طهمان الوراق - وإن كان فيه كلام فقد توبع . سعيد : هو ابن أبي عروبة اليشكري العدوي . وأخرجه مسلم (١٤٠٩) ، والنسائي في " الكبرى " (٥٣٩١) من طرق عن سعيد، بهذا الإسناد . وأخرجه مسلم (١٤٠٩) من طريق مالك عن نافع، ومسلم (١٤٠٩) ، والنسائي (٣٨١٣) من طريق أيوب بن موسي، كلاهما عن نبيه بن وهب، به . وهو في " مسند أحمد " (٤٠١) و (٤٦٢) ، و " صحيح ابن حبان " (٤١٢٤).









সুনান আবী দাউদ (1843)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ حَبِيبِ بْنِ الشَّهِيدِ، عَنْ مَيْمُونِ بْنِ مِهْرَانَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ الأَصَمِّ ابْنِ أَخِي، مَيْمُونَةَ عَنْ مَيْمُونَةَ، قَالَتْ تَزَوَّجَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَنَحْنُ حَلاَلاَنِ بِسَرِفَ ‏.‏




মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ‘সারিফ’ নামক স্হানে বিয়ে করেছেন। তখন আমর উভয়ে হালাল অবস্হায় ছিলাম। [১৮৪৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1411)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح ، وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الصحيح، وقد اختلف في وصله وإرساله، ورجح البخاري - كما في " علل الترمذي الكبير " ١ / ٣٧٩ - ٣٨٠ - إرساله، وكذا الدارقطني في " العلل " ٥ / ورقة ١٨٢ فقال : المرسل أشبه . حماد : هو ابن سلمة البصري . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٥٣٨٣) من طريق الوليد بن زَوران، عن ميمون ابن مهران، بهذا الإسناد . موصولاً . وأخرجه مسلم (١٤١١) ، وابن ماجه (١٩٦٥) ، والترمذي (٨٦١) من طريق أبو فزَارة راشد بن كيسان، عن يزيد بن الأصم، به . موصولاً . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٣٢١٩) من طريق سفيان بن حبيب، عن حبيب ابن الشهيد، عن ميمون بن مهران، عن يزيد بن الأصم، به . مرسلاً . وأخرجه مسلم بإثر الحديث (١٤١٠) من طريق ابن نمير، عن الزهري، عن يزيد ابن الأصم، به . مرسلاً . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٥٣٨٢) من طريق جعفر بن بُرقان، عن ميمون ابن مهران، عن صفية، به . وهو في " مسند أحمد " (٢٦٨١٥) ، و " صحيح ابن حبان " (٤١٣٤) و (٤١٣٦).









সুনান আবী দাউদ (1844)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم تَزَوَّجَ مَيْمُونَةَ وَهُوَ مُحْرِمٌ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্হায় মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিয়ে করেছেন। [১৮৪৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4258)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . مسدَّدٌ : هو ابن مسرهد الأزدي، وأيوب : هو السختياني . وأخرجه البخاري (٤٢٥٨) ، والترمذي (٨٥٩) من طريق أيوب السختياني، بهذا الإسناد . وأخرجه الترمذي (٨٥٨) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٨٠٩) و (٥٣٨٩) من طرق عن عكرمة، به . وأخرجه البخاري (٥١١٤) ، ومسلم (١٤١٠) ، وابن ماجه (١٩٦٤) ، والترمذي (٨٦٠) ، والنسائي (٥٣٨٦) من طريق أبي الشعثاء جابر بن زيد، والبخاري (١٨٣٧) ، والنسائي (٣١٨٩) و (٣٨١٠) و (٥٣٨٥) و (٥٣٨٦) من طريق عطاء بن أبي رباح، والنسائي (٣٨٠٦) من طريق أبي الشعثاء . سُليم بن أسود، و (٣٨٠٨) من طريق مجاهد ابن جبر، أربعتهم عن عبد الله بن عباس، به . وهو في " مسند أحمد " (٢٥٦٥) ، و " صحيح ابن حبان " (٤١٢٩). قال الحافظ في " الفتح " ٩ / ١٦٥ : وتد عارض حديث ابن عباس حديثُ عثمان السالف برقم (١٨٤١) " لا يَنكِح المحرم ولا يُنكح " ويجمع بينه وبين حديث ابن عباس بحمل حديث ابن عباس على أنه من خصائص النبي ﷺ ، وقال ابن عبد البر : اختلفت الآثار في هذا الحكم، لكن الرواية أنه تزوجها وهو حلال جاءت من طرق شتى، وحديث ابن عباس صحيح الإسناد لكن الوهم إلى الواحد أقرب إلى الوهم من الجماعة، فأقل أحوال الخبرين أن يتعارضا، فتطلب الحجة من غيرهما وحديث عثمان صحيح في نكاح المحرم فهو المعتمد .









সুনান আবী দাউদ (1845)


حَدَّثَنَا ابْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ إِسْمَاعِيلَ بْنِ أُمَيَّةَ، عَنْ رَجُلٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، قَالَ وَهِمَ ابْنُ عَبَّاسٍ فِي تَزْوِيجِ مَيْمُونَةَ وَهُوَ مُحْرِمٌ ‏.‏




সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইহরাম অবস্হায় নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিয়ে হওয়ার বিষয়ে ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সন্দেহে পড়েছেন। [১৮৪৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ’’ رجل ‘‘ لم أعرفہ،والثوري عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 72)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: أثر ضعيف، لإبهام الراوي عن سعيد بن المسيب . ابن بشار : هو محمد العبدي، وسفيان : هو ابن سعيد الثوري . وأخرجه البيهقي في " سننه " ٧ / ٢١٢ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد . وانظر ما قبله .









সুনান আবী দাউদ (1846)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَالِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، سُئِلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَمَّا يَقْتُلُ الْمُحْرِمُ مِنَ الدَّوَابِّ فَقَالَ ‏ "‏ خَمْسٌ لاَ جُنَاحَ فِي قَتْلِهِنَّ عَلَى مَنْ قَتَلَهُنَّ فِي الْحِلِّ وَالْحَرَمِ الْعَقْرَبُ وَالْفَأْرَةُ وَالْحِدَأَةُ وَالْغُرَابُ وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ ‏"‏ ‏.‏




সালিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলো, মুহরিম ব্যক্তি কোন কোন প্রাণী হত্যা করতে পারবে। তিনি বললেনঃ পাঁচ প্রকার প্রাণী হত্যা করতে দোষ নেই, চাই ইহরাম অবস্হায় বা ইহরাম ব্যতিরেকে অথবা হেরেম এলাকায় বা হেরেমের বাইরে হোক। তা হল : বিছা, কাক, ইদুঁর, চিল ও পাগলা কুকুর। [১৮৪৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1199)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . الزهري : هو محمد بن مسلم ابن شهاب القرشي . وأخرجه مسلم (١١٩٩) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٨٠٤) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد . وأخرجه البخاري (١٨٢٦) ، ومسلم (١١٩٩) ، وابن ماجه (٣٠٨٨) ، والنسائي (٣٧٩٧) و (٣٧٩٩) و (٣٨٠١ - ٣٨٠٣) من طريق نافع مولى ابن عمر، والبخاري (١٨٢٦) و (٣٣١٥) ، ومسلم (١١٩٩) من طريق عبد الله بن دينار، ومسلم (١١٩٩) من طريق عبيد الله بن عبد الله، ثلاثتهم عن عبد الله بن عمر . وأخرجه البخاري (١٨٢٨) ، ومسلم (١٢٠٠) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، عن ابن شهاب الزهري، عن سالم، عن عبد الله بن عمر، عن حفصة . وأخرجه البخاري (١٨٢٧) من طريق زيد بن جبير، عن ابن عمر، عن إحدى نسوة النبي ﷺ ، به . وأخرجه مسلم (١٢٠٠) من طريق زيد بن جبير، عن رجل، عن إحدى نسوة رسول الله ﷺ ، به . وهو في " مسند أحمد " (٤٥٤٣) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٦٢). والحِدأة بكسر الحاء المهملة وفتح الدال بعدها همزة : أخسُّ الطيور، تخطف أطعمةَ الناسِ من أيديهم . قال الدميري في " حياة الحيوان " ٣٢٧ / ١ بعد أن أورد الحديث من جهة " الصحيحين " من حديث ابن عمر وعائشة وحفصة : نبه بذكر هذه الخمسة على جواز قتل كل مضرٍّ، فيجوز له أن يقتل الفهد والنمر والذئب والصفر والشاهين والباشق والزنبور والبرغوث والبق والبعوض والوزغ والذباب والنمل إذا آذاه، فهذه الأنواع يستحب قتلها للمحرم وغيره .









সুনান আবী দাউদ (1847)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ بَحْرٍ، حَدَّثَنَا حَاتِمُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ عَجْلاَنَ، عَنِ الْقَعْقَاعِ بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ خَمْسٌ قَتْلُهُنَّ حَلاَلٌ فِي الْحَرَمِ الْحَيَّةُ وَالْعَقْرَبُ وَالْحِدَأَةُ وَالْفَأْرَةُ وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ সাপ, বিছা, চিল, ইঁদুর ও পাগলা কুকুর- এ পাঁচ প্রকারের প্রাণী হারাম এলাকায় হত্যা করা জায়িয। [১৮৪৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، الحدیث السابق (1846) شاھد لہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح ، وهذا إسناد قوي . محمد بن عجلان صدوق لا بأس به . أبو صالح : هو ذكوان السمان . وأخرجه ابن خزيمة في " صحيحه " (٢٦٦٧) ، والبيهقي في " سننه " ٥ / ٢١٠، وابن عبد البر في " التمهيد " ١٥ / ١٧٠ من طريق علي بن بحر، بهذا الإسناد . وأخرجه ابن خزيمة (٢٦٦٦) ، والبيهقي ٥ / ٢١٠ من طريق يحيي بن أيوب، عن محمد بن عجلان، به . إلا أن أبا هريرة في رواية ابن خزيمة قال : " الحية والذئب والكلب العقور ". وله شاهد صحيح من حديث عبد الله بن عمر سلف قبله .









সুনান আবী দাউদ (1848)


دَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ أَبِي زِيَادٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ أَبِي نُعْمٍ الْبَجَلِيُّ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم سُئِلَ عَمَّا يَقْتُلُ الْمُحْرِمُ قَالَ ‏ "‏ الْحَيَّةُ وَالْعَقْرَبُ وَالْفُوَيْسِقَةُ وَيَرْمِي الْغُرَابَ وَلاَ يَقْتُلُهُ وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ وَالْحِدَأَةُ وَالسَّبُعُ الْعَادِي ‏"‏ ‏.‏




আবূ সাঈদ আল খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলো, মুহরিম ব্যক্তি কোন কোন প্রাণী হত্যা করতে পারবে। তিনি বললেনঃ সাপ, বিছা, ইঁদুর, খ্যাপা কুকুর, চিল এবং হিংস্র জন্তু। আর কাক তাড়িয়ে দিবে, হত্যা করবে না। [১৮৪৮]



দুর্বল, এবং তার কথা “কাক তাড়িয়ে দিবে, হত্যা করবে না” এ অংশটুকু মুনকার। ইরওয়া (১০৩৬), যঈফ সুনান ইবনু মাজাহ (৬৬০), তার বর্ণনায় “কাক তাড়িয়ে দিবে, হত্যা করবে না” কথাটুকু নেই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف وقوله يرمي الغربا ولا يقتله منكر




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (838) ابن ماجہ (3089) ، یزید: ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 72)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف ، لضعف يزيد بن أبي زياد - وهو القرش الهاشمي مولاهم الكوفي - وفيه لفظة منكرة وهي قوله : " ويرمي الغراب ولا يقتله " ولهذا قال الذهبي في " السير " ٦ / ١٣١ : هذا خبر منكر . قلنا : وقد سلف حديث ابن عمر برقم (١٨٤٦) بإسناد صحيح . وفيه : أن المحرم يقتل الغراب . وأخرجه الترمذي (٨٥٤) من طريق أحمد بن منيع، عن هشيم بن بشير، بهذا الإسناد . وشمل الغرابَ فيما يقتله المحرم أيضاً . وقال : هذا حديث حسن، والعمل على هذا عند أهل العلم، قالوا : المحرم يقتل السبع العادي والكلب (العقور) ، وهو قول سفيان الثوري والشافعي، قال الشافعي : كل سبع عدا على الناس أو على دوابهم، فللمحرم قتله . وأخرجه ابن ماجه (٣٠٨٩) من طريق محمد بن فضيل، عن يزيد بن أبي زياد، به . دون ذكر الغراب والحدأة . وهو في " مسند أحمد " (١٠٩٩٠) عن هشيم، كلفظ المصنف . ولقتل الحية شاهد من حديث ابن عمر عند مسلم (١٢٠٠) (٧٥) وآخر من حديث : ابن مسعود عند أحمد (٣٥٨٦). والفويسقة : هي الفأرة، قال الخطابي : وقيل : سميت فويسقة لخروجها من جحرها على الناس واغتيالها إياهم في أموالهم بالفساد، وأصل الفسق : الخروج، ومن هذا سمي الخارج عن الطاعة فاسقاً، ويقال : فسقت الرطبة عن قشرها إذا خرجت عنه .









সুনান আবী দাউদ (1849)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ كَثِيرٍ، عَنْ حُمَيْدٍ الطَّوِيلِ، عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ أَبِيهِ، وَكَانَ الْحَارِثُ، خَلِيفَةَ عُثْمَانَ عَلَى الطَّائِفِ فَصَنَعَ لِعُثْمَانَ طَعَامًا فِيهِ مِنَ الْحَجَلِ وَالْبَعَاقِيبِ وَلَحْمِ الْوَحْشِ قَالَ فَبَعَثَ إِلَى عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ فَجَاءَهُ الرَّسُولُ وَهُوَ يَخْبِطُ لأَبَاعِرَ لَهُ فَجَاءَهُ وَهُوَ يَنْفُضُ الْخَبَطَ عَنْ يَدِهِ فَقَالُوا لَهُ كُلْ ‏.‏ فَقَالَ أَطْعِمُوهُ قَوْمًا حَلاَلاً فَإِنَّا حُرُمٌ ‏.‏ فَقَالَ عَلِيٌّ رضى الله عنه أَنْشُدُ اللَّهَ مَنْ كَانَ هَا هُنَا مِنْ أَشْجَعَ أَتَعْلَمُونَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَهْدَى إِلَيْهِ رَجُلٌ حِمَارَ وَحْشٍ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَأَبَى أَنْ يَأْكُلَهُ قَالُوا نَعَمْ ‏.




ইসহাক্ব ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন তায়িফে ‘উসমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতিনিধি গভর্ণর। হারিস ‘উসমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জন্যে খাবার তৈরী করালেন, তন্মধ্যে হুযাল ও ইয়া‘কীব পাখির গোশত এবং বন্য গাধার গোশ্‌ত ছিলো। অতঃপর তিনি ‘আলী ইবনু আবূ ত্বালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনতে লোক পাঠান। লোকটি যখন তার (আলীর) কাছে এলো তখন তিনি (আলী) উটের জন্য গাছ থেকে পাতা জড়ো করছিলেন। তিনি হাত থেকে পাতা ঝাড়তে ঝাড়তে দাওয়াতে আসলেন। তারা তাকে বললেন, খাওয়া শুরু করুন। তিনি বললেন, এটা এমন ব্যক্তিদেরকে খেতে দিন যারা ইহরামমুক্ত। কেননা আমরা মুহরিম। অতঃপর ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত আশজা’ গোত্রীয় লোকদের শপথ দিয়ে বলেন, তোমরা কি জানো না, এক লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জংলী গাধার গোশত হাদিয়া দিয়েছিলেন, তখন তিনি মুহরিম ছিলেন এবং তিনি তা খেতে চাননি? তারা বললো, হ্যাঁ। [১৮৪৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، حمید الطویل مدلس (طبقات المدلسین 3/71) وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 72)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن . سليمان بن كثير - وهو العبدي - صدوق حسن الحديث . حميد الطويل : هو حميد بن أبي حميد . وأخرجه مختصراً ابن ماجه (١٣٠٩١) من طريق عبد الكريم، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس، عن على بن أبي طالب، قال : أُتِيَ النبيُّ ﷺ بلحم صيدٍ وهو مُحرِم، فلم يأكله . وهو في " مسند أحمد " (٧٨٣). وقوله : وهو يخبط لأباعر له . الخبط : ضرب الشجرة بالعصا ليتناثر ورقها لعلف الإبل، والخبط بفتحتين : الورق الساقط بمعنى المخبوط .









সুনান আবী দাউদ (1850)


دَّثَنَا أَبُو سَلَمَةَ، مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ قَيْسٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّهُ قَالَ يَا زَيْدُ بْنَ أَرْقَمَ هَلْ عَلِمْتَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أُهْدِيَ إِلَيْهِ عُضْوُ صَيْدٍ فَلَمْ يَقْبَلْهُ وَقَالَ ‏ "‏ إِنَّا حُرُمٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ نَعَمْ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, হে যায়িদ ইবনু আরক্বাম! তুমি কি জানো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি শিকারী প্রাণীর এক টুকরা গোশত হাদিয়া দেয়া হলে তিনি সেটা গ্রহণ না করে এই বলে ফেরত পাঠালেন যে, আমরা মুহরিম? তিনি বললেনঃ হ্যাঁ। [১৮৫০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (2823 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . حمّاد : هو ابن سلمة البصري، وقيس : هو ابن سعد الحبشي، وعطاء : هو ابن أبي رباح . وأخرجه النسائي في " الكبرى " (٣٧٨٩) من طريق عفان بن مسلم، عن حمّاد، بهذا الإسناد . وأخرج بنحوه مسلم (١١٩٥) والنسائي في " الكبرى " (٣٧٩٠) من طريق طاووس، عن ابن عباس، به . وهو في " مسند أحمد " (١٩٢٩٤) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٦٨).









সুনান আবী দাউদ (1851)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ، - يَعْنِي الإِسْكَنْدَرَانِيَّ الْقَارِيَّ - عَنْ عَمْرٍو، عَنِ الْمُطَّلِبِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ صَيْدُ الْبَرِّ لَكُمْ حَلاَلٌ مَا لَمْ تَصِيدُوهُ أَوْ يُصَدْ لَكُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ إِذَا تَنَازَعَ الْخَبَرَانِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم يُنْظَرُ بِمَا أَخَذَ بِهِ أَصْحَابُهُ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি : স্থলভাগের শিকার করা পশুর গোশত তোমাদের জন্য খাওয়া হালাল ততক্ষণ পর্যন্ত যতক্ষণ তোমরা (ইহরাম অবস্থায়) তা শিকার করে না থাকো কিংবা শুধু তোমাদের জন্যই কেউ শিকার না করে থাকে। ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে পরস্পর বিরোধী হাদীস বর্ণিত হলে সাহাবীরা যেটা গ্রহণ করেছেন সেটাই প্রাধান্য পাবে। [১৮৫১]



দুর্বল : যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (৩৫২৪), মিশকাত (২৭০০), যঈফ সুনান আত-তিরমিযী (১৪৭/৮৫৪)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (846) نسائی (2830) ، المطلب لم یسمع ھذا الحدیث من جابر رضي اللّٰہ عنہ کما قال أبو حاتم الرازي (المراسیل ص 210) ، (انوار الصحیفہ ص 72، 73)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره ، وهذا إسناد حسن إن صح سماع المطلب - وهو ابن عبد الله ابن حنطب المخزومي - من جابر بن عبد الله، وقد اختلف فيه على عمرو - وهو ابن أبي عمرو المدني - كما بيناه في " المسند ". وعمرو بن أبي عمرو صدوق حسن الحديث . وأخرجه الترمذي (٨٦٢) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٧٩٦) من طريق قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد . وهو في " مسند أحمد " (١٤٨٩٤) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٧١). وفي الباب عن أبي قتادة عند أحمدْ (٢٢٥٢٦) وإسناده صحيح . وآخر من حديث رجل من بهز عند أحمد (١٥٧٤٤). وعن طلحة بن عببد الله عنده أيضاً (١٣٨٣) وقد وقع خطأ في حديث " المسند " (١٤٨٩٤) في ذكر الشواهد فيستدرك من هنا . وإلى هذا الحديث ذهب طائفة من أهل العلم، فأجازوا للمحرم أكل ما صاده الحلال من الصيد مما يحل للحلال أكله منهم عطاء ومجاهد وسعيد بن جبير وهو قول عمر بن الخطاب وعثمان بن عفان والزبير بن العوام وأبي هريرة، وبه قال أبو حنيفة وأصحابه . وقالت طائفة أخرى : إن لحم الصيد محرم على المحرمين على كل حال ولا يجوز لمحرم كل صيد البتة منهم ابن عباس وعلي بن أبي طالب وابن عمر، وكره ذلك طاووس وجابر بن زيد، وروي عن الثوري والليث وإسحاق مثل ذلك . وقالت طائفة ثالثة : ما صاده الحلال للمحرم أو من أجله أو بأمره وإشارته فلا يجوز له أكله، وما لم يصد له ولا من أجله أو بأمره وإشارته، فلا بأس للمحرم بأكله وهو الصحيح عن عثمان، وبه قال مالك والشافعي وأصحابهما وأحمد وإسحاق وأبو ثور وروي عن عطاء، وحجتهم أن عليه تصح الأحاديث في هذا الباب، وأنها إذا حملت على ذلك لم تتضاد ولم تتدافع، وعلى هذا يجب أن تحمل السنن ولا يعارض بعضها ببعض ما وجد إلى استعمالها سبيل . انظر " التمهيد " ٢١ / ١٥٠ - ١٥٦ و " شرح معاني الآثار " ٢ / ١٦٨ - ١٧٦، و " فتح الباري " ٤ / ٣٣ - ٣٤ .









সুনান আবী দাউদ (1852)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي النَّضْرِ، مَوْلَى عُمَرَ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ التَّيْمِيِّ عَنْ نَافِعٍ، مَوْلَى أَبِي قَتَادَةَ الأَنْصَارِيِّ عَنْ أَبِي قَتَادَةَ، أَنَّهُ كَانَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى إِذَا كَانَ بِبَعْضِ طَرِيقِ مَكَّةَ تَخَلَّفَ مَعَ أَصْحَابٍ لَهُ مُحْرِمِينَ وَهُوَ غَيْرُ مُحْرِمٍ فَرَأَى حِمَارًا وَحْشِيًّا فَاسْتَوَى عَلَى فَرَسِهِ قَالَ فَسَأَلَ أَصْحَابَهُ أَنْ يُنَاوِلُوهُ سَوْطَهُ فَأَبَوْا فَسَأَلَهُمْ رُمْحَهُ فَأَبَوْا فَأَخَذَهُ ثُمَّ شَدَّ عَلَى الْحِمَارِ فَقَتَلَهُ فَأَكَلَ مِنْهُ بَعْضُ أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَبَى بَعْضُهُمْ فَلَمَّا أَدْرَكُوا رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم سَأَلُوهُ عَنْ ذَلِكَ فَقَالَ ‏ "‏ إِنَّمَا هِيَ طُعْمَةٌ أَطْعَمَكُمُوهَا اللَّهُ تَعَالَى ‏"‏ ‏.‏




আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ্‌র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফর সঙ্গী ছিলেন। মক্কার কোনো রাস্তা অতিক্রমের সময় তিনি তার কিছু মুহরিম সাথীসহ পেছনে রয়ে যান। তিনি ছিলেন ইহরাম মুক্ত। অতঃপর তিনি একটি বন্য গাধা দেখতে পেয়ে নিজের ঘোড়ার পিঠে চড়লেন। তাঁর চাবুকটি নীচে পড়ে গেলে তিনি তার সঙ্গীদের তা তুলে দেয়ার অনুরোধ জানালে তারা তুলে দিতে অস্বীকৃতি জানান। এরপর তার তীরটি তুলে দেয়ার অনুরোধ জানালে তাও দিতে অস্বীকার করেন। অবশেষে তিনি নিজেই তা তুলে নিলেন এবং গাধাটিকে আক্রমণ করে হত্যা করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কিছু সাহাবী তার গোশত খেলেন, আর কিছু সাহাবী খেতে অস্বীকার করলেন। অতঃপর যখন তারা রাসূলুল্লাহ্‌র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে মিলিত হলেন, তখন তাঁকে এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেনঃ এটা তো খাদ্য, যা মহান আল্লাহ তোমাদেরকে খাইয়েছেন। [১৮৫২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2914) صحیح مسلم (1196)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح . أبو النضر : هو سالم بن أبي أمية المدني، ونافع مولى أبي قتادة : هو نافع بن عباس . وهو عند مالك في " الموطأ " ١ / ٣٥٠، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٩١٤) و (٥٤٩٠) ، ومسلم (١١٩٦) ، والترمذي (٨٦٣) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٧٨٤). وأخرج بنحوه البخاري (٥٤٩٢) من طريق عمرو بن الحارث، عن أبي النضر، به . وزاد فيها : أن رسول الله ﷺ قال : " أبقي معكم شيء منه؟ " قلت : نعم . وأخرج بنحوه أيضاً البخاري (١٨٢٣) ، ومسلم (١١٩٦) من طريق صالح بن كيسان، عن نافع، به . وأخرج بنحوه البخارى (١٨٢١) و (١٨٢٢) و (١٨٢٤) و (٢٥٧٠) و (٢٨٥٤) و (٥٤٠٧) ، ومسلم (١١٩٦) ، وابن ماجه (٣٠٩٣) ، والنسائي في " الكبرى " (٣٧٩٣) و (٣٧٩٤) و (٣٧٩٥) من طريق عبد الله بن أبي قتادة، والبخاري (٢٥٧٠) و (٢٩١٤) و (٥٤٠٧) و (٥٤٩١) ، ومسلم (١١٩٦) (٥٨) ، والترمذي (٨٦٤) من طريق عطاء بن يسار، والبخاري (٥٤٩٢) من طريق أبي صالح نبهان الجمحي، ثلاثتهم عن أبي قتادة الحارث بن ربعي، به . وهو في " مسند أحمد " (٢٢٥٦٧) ، و " صحيح ابن حبان " (٣٩٧٥).









সুনান আবী দাউদ (1853)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ مَيْمُونِ بْنِ جَابَانَ، عَنْ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الْجَرَادُ مِنْ صَيْدِ الْبَحْرِ ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ পঙ্গপাল হলো সামুদ্রিক শিকার। [১৮৫৩]



দুর্বল : যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (২৬৪৭), মিশকাত (২৭০১), ইরওয়া (১০৩১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2701) ، میمون بن جابان وثقہ العجلي وابن حبان والذہبي فی الکاشف فحدیثہ لا ینزل عن درجۃ الحسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف ، ميمون بن جابان جهله ابن حزم، وقال البيهقي : غير معروف، وقال الأزدى : لا يحتج بحديثه، وذكره العجلي وابن حبان في " الثقات ": حمّاد : هو ابن زيد الأزدي، وأبو رافع : هو نفيع بن رافع الصائغ . ومن طريق أبي داود أخرجه البيهقي في " سننه " ٥ / ٢٠٧ . وانظر تالييه .









সুনান আবী দাউদ (1854)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، عَنْ حَبِيبٍ الْمُعَلِّمِ، عَنْ أَبِي الْمُهَزِّمِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ أَصَبْنَا صِرْمًا مِنْ جَرَادٍ فَكَانَ رَجُلٌ مِنَّا يَضْرِبُهُ بِسَوْطِهِ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَقِيلَ لَهُ إِنَّ هَذَا لاَ يَصْلُحُ فَذُكِرَ ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏ "‏ إِنَّمَا هُوَ مِنْ صَيْدِ الْبَحْرِ ‏"‏ ‏.‏ سَمِعْتُ أَبَا دَاوُدَ يَقُولُ أَبُو الْمُهَزِّمِ ضَعِيفٌ وَالْحَدِيثَانِ جَمِيعًا وَهَمٌ ‏.‏




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা ফড়িংয়ের একটি বিরাট দলের মধ্যে পৌঁছলে জনৈক মুহরিম ব্যক্তি তার চাবুক দিয়ে সেগুলো মারতে লাগলো। কেউ বললো, মুহরিমের জন্য এরূপ করা উচিত নয়। অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তা অবহিত করালে তিনি বলেনঃ এটা হচ্ছে সামুদ্রিক শিকার। [১৮৫৪]



খুবই দুর্বল : ইরওয়া (১০৩১)।



(বর্ণনাকারী বলেন), আমি ইমাম আবূ দাউদকে বলতে শুনেছি, আবুল মুহাযযিম হাদীস বর্ণনায় দুর্বল। তার বর্ণিত হাদীসদ্বয় সন্দেহযুক্ত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف جدا




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف جدًا ، ترمذی (850) ابن ماجہ (3222) ، أبو المھزم: متروک (تق: 8397) وقال الھیثمي: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد 10 / 287) ، (انوار الصحیفہ ص 73)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف جداً، أبو المُهَزِّم - وهو يزيد بن سفيان التميمي - متروك الحديث . مسدَّدٌ : هو ابن مسرهد الأسدي، وعبد الوارث : هو ابن سعيد العنبري . وأخرجه ابن ماجه (٣٢٢٢) ، والترمذي (٨٦٦) من طريق حمّاد بن سلمة، عن أبي المهزم، بهذا الإسناد . وقال الترمذي : حديث غريب . وهو في " مسند أحمد " (٨٠٦٠). وانظر ما قبله . قوله : صِرْماً، بكسر الصاد وسكون الراء : قطعة من الجماعة الكبيرة .