হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (221)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّهُ قَالَ ذَكَرَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ تُصِيبُهُ الْجَنَابَةُ مِنَ اللَّيْلِ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ تَوَضَّأْ وَاغْسِلْ ذَكَرَكَ ثُمَّ نَمْ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে আরয করলেন যে, তিনি রাতে (প্রায়ই) অপবিত্র হন (এরূপ অবস্থায় করণীয় কি?) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ উযু কর এবং লজ্জাস্থান ধুয়ে নাও, তারপর ঘুমাও।

সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (290) صحیح مسلم (306)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ١/ ٤٧، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٩٠)، ومسلم (٣٠٦) (٢٥)، والنسائي في "الكبرى" (٢٥٢). وأخرجه البخاري (٢٨٧) و (٢٨٩)، ومسلم (٣٠٦) (٢٣) و (٢٤)، والترمذي (١٢٠) ، والنسائي (٩٠٠٩)، وابن ماجه (٥٨٥) من طرق عن نافع، عن ابن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٦٢) و (٥٣١٤)، و"صحيح ابن حبان" (١٢١٣).









সুনান আবী দাউদ (222)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَنَامَ وَهُوَ جُنُبٌ تَوَضَّأَ وُضُوءَهُ لِلصَّلاَةِ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপবিত্র অবস্থায় ঘুমানোর ইচ্ছা করলে সালাতের উযুর ন্যায় উযু করে নিতেন।

সহীহঃ মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (305)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة، والزهري: هو محمَّد بن مسلم، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وأخرجه مسلم (٣٠٥) (٢١)، والنسائي في "الكبرى" (٨٩٩٥)، وابن ماجه (٥٨٤) من طريق الليث، عن الزهري، بهذا الإسناد. وأخرجه البخارى (٢٨٦) من طريق يحيي بن أبي كثير، عن أبي سلمة، به. وأخرجه البخاري (٢٨٨) من طريق عروة بن الزُّبير، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠٨٣)، و "صحيح ابن حبان" (١٢١٧). وانظر الحديثين الآتيين بعده.









সুনান আবী দাউদ (223)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ الْبَزَّازُ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ زَادَ ‏ "‏ وَإِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْكُلَ وَهُوَ جُنُبٌ غَسَلَ يَدَيْهِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ ابْنُ وَهْبٍ عَنْ يُونُسَ فَجَعَلَ قِصَّةَ الأَكْلِ قَوْلَ عَائِشَةَ مَقْصُورًا وَرَوَاهُ صَالِحُ بْنُ أَبِي الأَخْضَرِ عَنِ الزُّهْرِيِّ كَمَا قَالَ ابْنُ الْمُبَارَكِ إِلاَّ أَنَّهُ قَالَ عَنْ عُرْوَةَ أَوْ أَبِي سَلَمَةَ وَرَوَاهُ الأَوْزَاعِيُّ عَنْ يُونُسَ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم كَمَا قَالَ ابْنُ الْمُبَارَكِ ‏.‏




ইউনুস হতে যুহরী হতে বর্ণিত, ইউনুস হতে যুহরী সূত্রে একই সানাদে সমার্থবোধক হাদীস বর্ণিত আছে। তাতে একথাও রয়েছেঃ অপবিত্র অবস্থায় তিনি খাওয়ার ইচ্ছা করলে তাঁর উভয় হাত ধুয়ে নিতেন।



সহীহ।



ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইউনুস থেকে ইবনু ওয়াহব ও হাদীসটিই বর্ণনা করেছেন। তাবে তিনি খাওয়ার কথাটা ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য বলে উল্লেখ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، زہری صرح بالسماع عند البغوی فی شرح السنۃ (2/ 34)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن المبارك: هو عبد الله. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٥٠) و (٢٥١)، وابن ماجه (٥٩١) من طريق عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. واقتصر ابن ماجه في روايته على الزيادة المذكورة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٨٧٢)، و"صحيح ابن حبان" (١٢١٨). وانظر ما قبله وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (224)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنِ الأَسْوَدِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْكُلَ أَوْ يَنَامَ تَوَضَّأَ ‏.‏ تَعْنِي وَهُوَ جُنُبٌ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপবিত্র অবস্থায় খানা খাওয়ার অথবা ঘুমাবার ইচ্ছা করলে উযু করে নিতেন।

সহীহঃ মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (305) ، مشکوۃ المصابیح (4442)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكن متنه مخالف لما سلف قبله من طريق أبي سلمة عن عائشة: أن النبي ﷺ كان إذا أراد أن ينام -وهو جنب- توضّأ، وإذا أراد أن يأكل غسل يديه. ولذا قال يحيي بن سعيد القطان - كما في رواية أحمد (٢٥٥٨٤) عنه: ترك شعبة حديث الحكم في الجنب: إذا أراد أن يأكل توضأ. الحكم: هو ابن عتيبة، وإبراهيم والأسود: هما النخعيان. وأخرجه مسلم (٣٠٥) (٢٢)، والنسائي في "الكبرى" (٢٤٩) و (٨٩٩٨)، وابن ماجه (٥٩١) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٥٨٤).









সুনান আবী দাউদ (225)


حَدَّثَنَا مُوسَى، - يَعْنِي ابْنَ إِسْمَاعِيلَ - حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، - يَعْنِي ابْنَ سَلَمَةَ - أَخْبَرَنَا عَطَاءٌ الْخُرَاسَانِيُّ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، عَنْ عَمَّارِ بْنِ يَاسِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم رَخَّصَ لِلْجُنُبِ إِذَا أَكَلَ أَوْ شَرِبَ أَوْ نَامَ أَنْ يَتَوَضَّأَ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ بَيْنَ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ وَعَمَّارِ بْنِ يَاسِرٍ فِي هَذَا الْحَدِيثِ رَجُلٌ وَقَالَ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ وَابْنُ عُمَرَ وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرٍو الْجُنُبُ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْكُلَ تَوَضَّأَ ‏.‏




আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপবিত্র ব্যক্তিকে উযু করে পানাহার করার অথবা ঘুমাবার অনুমতি প্রদান করেছেন। ‘আলী ইবনু আবূ ত্বালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার এবং ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, অপবিত্র ব্যক্তি খাওয়ার ইচ্ছা করলে উযু করে নিবে।



দুর্বল।



ইমাম আবূ দাউদ বলেনঃ এ হাদীসে ইয়াহইয়া ইবনু ইয়া’মার ও ‘আম্মার ইবনু ইয়াসারের মাঝে এক ব্যক্তি রয়েছে। আর ‘আলী ইবনু আবূ ত্বালিব, ইবনু ‘উমার, ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর বলেনঃ জুনুবী খাওয়ার ইচ্ছা করলে উযু করে নিবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (613) ویأتي (4176،4601) ، یحیی بن یعمر رواہ عن رجل عن عمار بن یاسر والرجل مجہول ، والحدیث السابق (الأصل: 224) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 21)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه، يحيى بن يعمر لم يلق عمار بن ياسر فيما ذكر الدارقطني، وقد نبه عليه المصنف بعده، وباقي رجاله ثقات. عطاء الخراساني: هو ابن أبي مسلم. وأخرجه الترمذي (٦١٧) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٨٨٦). وسيأتي ضمن حديث مطول برقم (٤١٧٦). وفي الباب عن جابر عند ابن ماجه (٥٩٢)، وإسناده ضعيف.









সুনান আবী দাউদ (226)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا الْمُعْتَمِرُ، ح حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالاَ حَدَّثَنَا بُرْدُ بْنُ سِنَانٍ، عَنْ عُبَادَةَ بْنِ نُسَىٍّ، عَنْ غُضَيْفِ بْنِ الْحَارِثِ، قَالَ قُلْتُ لِعَائِشَةَ أَرَأَيْتِ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَغْتَسِلُ مِنَ الْجَنَابَةِ فِي أَوَّلِ اللَّيْلِ أَوْ فِي آخِرِهِ قَالَتْ رُبَّمَا اغْتَسَلَ فِي أَوَّلِ اللَّيْلِ وَرُبَّمَا اغْتَسَلَ فِي آخِرِهِ ‏.‏ قُلْتُ اللَّهُ أَكْبَرُ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي جَعَلَ فِي الأَمْرِ سَعَةً ‏.‏ قُلْتُ أَرَأَيْتِ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُوتِرُ أَوَّلَ اللَّيْلِ أَمْ فِي آخِرِهِ قَالَتْ رُبَّمَا أَوْتَرَ فِي أَوَّلِ اللَّيْلِ وَرُبَّمَا أَوْتَرَ فِي آخِرِهِ ‏.‏ قُلْتُ اللَّهُ أَكْبَرُ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي جَعَلَ فِي الأَمْرِ سَعَةً ‏.‏ قُلْتُ أَرَأَيْتِ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَجْهَرُ بِالْقُرْآنِ أَمْ يَخْفِتُ بِهِ قَالَتْ رُبَّمَا جَهَرَ بِهِ وَرُبَّمَا خَفَتَ ‏.‏ قُلْتُ اللَّهُ أَكْبَرُ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي جَعَلَ فِي الأَمْرِ سَعَةً ‏.‏




গুদায়িফ ইবনুল হারিস হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে জানাবাতের গোসল কখন করতে দেখেছেন, রাতের প্রথমভাগে না শেষভাগে? ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তিনি কখনো রাতের প্রথম ভাগে গোসল করতেন আবার কখনো রাতের শেষ ভাগে। আমি বললাম, আল্লাহু আকবার! সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্যই যিনি এ ব্যাপারে প্রশস্ততা ও সহজতা দান করেছেন। আমি বললাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিতর (সালাত) রাতের প্রথম দিকে আদায় করতেন, না শেষদিকে? তিনি বললেন, কখনো রাতের প্রথমদিকে বিতর আদায় করতেন আবার কখনো শেষ রাতে। আমি বললাম, আল্লাহু আকবার! সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্যই যিনি এ ব্যাপারে প্রশস্ততা ও সহজতা দান করেছেন। আমি বললাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরআন তিলাওয়াত উচ্চৈঃস্বরে করতেন না নিম্নস্বরে? তিনি বললেন, তিনি কখনো উচ্চৈঃস্বরে এবং কখনো নিম্নস্বরে তিলাওয়াত করতেন। আমি বললাম, আল্লাহু আকবার! সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্যই, যিনি এ ব্যাপারে প্রশস্ততা ও সহজতা দান করেছেন।



সহীহঃ মুসলিমে এর প্রথমাংশ রয়েছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (1263)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. معتمر: هو ابن سليمان، وإسماعيل بن إبراهيم: هو ابن عُلية. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٢١)، وابن ماجه (١٣٥٤) من طرق عن برد بن سنان، بهذا الإسناد. ورواية النسائي مختصرة بالسؤال عن الغسل، ورواية ابن ماجه مختصرة بالسؤال عن قراءة القرآن. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٠٢)، و"صحيح ابن حبان" (٢٤٤٧) و (٢٥٨٢). وانظر ما سيأتى برقم (١٤٣٧).









সুনান আবী দাউদ (227)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ النَّمَرِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ مُدْرِكٍ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ بْنِ عَمْرِو بْنِ جَرِيرٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُجَىٍّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، - رضى الله عنه - عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَدْخُلُ الْمَلاَئِكَةُ بَيْتًا فِيهِ صُورَةٌ وَلاَ كَلْبٌ وَلاَ جُنُبٌ ‏"‏ ‏.




আলী ইবনু আবূ ত্বালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ঘরে মূর্তি, কুকুর অথবা অপবিত্র ব্যক্তি রয়েছে সেখানে মালায়িকাহ (ফেরেশতা) প্রবেশ করে না।



দূর্বল : যঈফ আল-জামি’উস সাগীর ৬২০৩।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (463) ، عبد اللہ بن نجیح وثقہ الجمہور وکذا أبوہ: حسن الحدیث




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره دون قوله: "ولا جنب"، وهذا إسناد ضعيف، نجي -وهو الحضرمي الكوفي- لم يرو عنه غير ابنه عبد الله، وذكره ابن حبان في "الثقات" وقال: لا يعجبني الاحتجاج بخبره إذا انفرد، وابنه عبد الله بن نجي مختلف فيه، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٥٣) و (٤٧٧٤)، وابن ماجه (٣٦٥٠) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وليس عند ابن ماجه قوله: "ولا جنب". وهو في "مسند أحمد" (٦٣٢)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٠٥). وسيأتي مكرراً برقم (٤١٥٢). وله دون قوله: "ولا جنب" شاهد من حديث أبي طلحة عند البخاري (٣٢٢٥)، ومسلم (٢١٠٦). وآخر من حديث عائشة عند مسلم (٢١٠٤). وثالث من حديث ميمونة عند مسلم (٢١٠٥)، وسيأتى برقم (٤١٥٧).









সুনান আবী দাউদ (228)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الأَسْوَدِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنَامُ وَهُوَ جُنُبٌ مِنْ غَيْرِ أَنْ يَمَسَّ مَاءً ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ الْوَاسِطِيُّ قَالَ سَمِعْتُ يَزِيدَ بْنَ هَارُونَ يَقُولُ هَذَا الْحَدِيثُ وَهَمٌ ‏.‏ يَعْنِي حَدِيثَ أَبِي إِسْحَاقَ ‏.




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনরূপ পানি স্পর্শ না করেই অপবিত্র অবস্থায় ঘুমাতেন।



সহীহ।



ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইয়াযীদ ইবনু হারুন বলতেন, এ হাদীসটি (অর্থাৎ আবূ ইসহাক্বের হাদীস) অনুমান নির্ভর।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (118)،ابن ماجہ (581583) ، أبو إسحاق مدلس صرح بالسماع عند البیہقي (1/ 201،202) ولکن السند إلیہ ضعیف (!) ، (انوار الصحیفہ ص 21)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون قولها: "من غير أن يمس ماء" فشاذ، قال أحمد: ليس بصحيح، وقال يزيد بن هارون: هو وهم، وقال الترمذي: يرون أن هذا غلط من أبي إسحاق، وعلَّله مسلم في "التمييز"، وقد بسطنا الكلام عليه في "مسند أحمد" (٢٤٧٠٦). سفيان: هو الثورى، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، والأسود: هو ابن يزيد النخعي. وأخرجه الترمذي (٢١٨) و (٢١٩)، وابن ماجه (٥٨١) و (٥٨٢) و (٥٨٣) من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، بهذا الإسناد. ويُعارضه ما رواه إبراهيم النخعي عن الأسود فيما سلف عند المصنف برقم (٢٢٤)، وما رواه أبو سلمة فيما سلف برقم (٢٢٢)، كلاهما عن عائشة: أن رسول الله ﷺ كان إذا أراد أن ينام وهو جنب توضّأ كما يتوضَّأ للصلاة. وقد جمع الإمام الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ١/ ١٢٥ بينهما بأنه لم يكن يمس ماء للغسل، وقال ابن قتيبة: إنه كان يفعل الأمرين لبيان الجواز. وانظر "التلخيص الحبير" ١/ ١٤٠ - ١٤١، والتعليق على "مسند أحمد" (٢٤٧٠٦).









সুনান আবী দাউদ (229)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مُرَّةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سَلِمَةَ، قَالَ دَخَلْتُ عَلَى عَلِيٍّ - رضى الله عنه - أَنَا وَرَجُلاَنِ رَجُلٌ مِنَّا وَرَجُلٌ مِنْ بَنِي أَسَدٍ - أَحْسِبُ فَبَعَثَهُمَا عَلِيٌّ - رضى الله عنه - وَجْهًا وَقَالَ إِنَّكُمَا عِلْجَانِ فَعَالِجَا عَنْ دِينِكُمَا ‏.‏ ثُمَّ قَامَ فَدَخَلَ الْمَخْرَجَ ثُمَّ خَرَجَ فَدَعَا بِمَاءٍ فَأَخَذَ مِنْهُ حَفْنَةً فَتَمَسَّحَ بِهَا ثُمَّ جَعَلَ يَقْرَأُ الْقُرْآنَ فَأَنْكَرُوا ذَلِكَ فَقَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَخْرُجُ مِنَ الْخَلاَءِ فَيُقْرِئُنَا الْقُرْآنَ وَيَأْكُلُ مَعَنَا اللَّحْمَ وَلَمْ يَكُنْ يَحْجُبُهُ - أَوْ قَالَ يَحْجُزُهُ - عَنِ الْقُرْآنِ شَىْءٌ لَيْسَ الْجَنَابَةَ ‏.




আবদুল্লাহ ইবনু সালামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং আমার সাথে আরো দু’জন লোক ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর নিকট গেলাম। তাদের একজন আমাদের গোত্রের আর অন্যজন সম্ভবত বানু আসাদ গোত্রের। ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের দু’জনকে কোন কাজে পাঠালেন এবং প্রেরণের সময় বললেন, তোমরা দু’জনেই শক্তিশালী। কাজেই তোমরা তোমাদের শক্তি দ্বীনের ক্ষেত্রে ব্যয় করবে। অতঃপর তিনি পায়খানায় গেলেন এবং সেখান থেকে বের হয়ে পানি চাইলেন। তিনি এক অঞ্জলি পানি হাতে নিয়ে (মুখ) মুছে কুরআন তিলাওয়াত করতে লাগলেন। লোকেরা বিষয়টি আপত্তিকর মনে করলে তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পায়খানা থেকে বেরিয়ে এসে আমাদের কুরআন পড়াতেন এবং আমাদের সঙ্গে গোশতও খেতেন। একমাত্র জানাবাত (গোসল ফরয হওয়ার অপবিত্রতা) ব্যতিত কোন কিছুই তাঁকে কুরআন থেকে বিরত রাখতে পারতো না। [২২৮]



দূর্বল : মিশকাত ৪৬০।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (460) ، عبد اللہ بن سلمۃ حسن الحدیث وعمرو بن مرۃ سمع منہ قبل اختلاطہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن، عبد الله بن سَلِمة -وهو المرادي الكوفي- وثقه يعقوب بن شيبة والعجلي وابن حبان، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، وصحح له حديثه هذا ابن خزيمة وابن حبان والحاكم، وقال الحافظ في "الفتح" ١/ ٤٠٨: هو من قبيل الحسن يصلح للحجة. وأخرجه دون قصة علي النسائي في "الكبرى" (٢٥٧)، وابن ماجه (٥٩٤) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٢٧) و (٦٣٩)، و "صحيح ابن حبان" (٧٩٩). وأخرجه الترمذي (١٤٦) من طريق الأعمش وابن أبي ليلى، والنسائي (٢٦٦) من طريق الأعمش وحده، كلاهما عن عمرو بن مرة، به بلفظ: كان رسول الله ﷺ يقرئنا القرآن على كل حال ما لم يكن جنباً وقال: حديث حسن صحيح. قال الترمذي: وبه قال غير واحد من أهل العلم من أصحاب النبي ﷺ والتابعين، قالوا: يقرأ الرجل القرآن على غير وضوء، ولا يقرأ في المصحف إلا وهو طاهر، وبه يقول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق (وأصحاب الرأي). وقوله: إنكما علجان تثنية علج، قال الخطابي: يريد الشدة والقوة على العمل، يقال: رجل علج: إذا كان قوي الخلقة، وقال ابن الأثير: أي: مارسا العمل الذي ندبتكما إليه، واعملا به. قوله: ليس الجنابةَ بالنصب قال الخطابي: معناه غير الجنابة. وليس هنا حرف استثناء بمنزلة "إلا".









সুনান আবী দাউদ (230)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ مِسْعَرٍ، عَنْ وَاصِلٍ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ حُذَيْفَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَقِيَهُ فَأَهْوَى إِلَيْهِ فَقَالَ إِنِّي جُنُبٌ ‏.‏ فَقَالَ ‏ "‏ إِنَّ الْمُسْلِمَ لاَ يَنْجُسُ ‏"‏ ‏.




হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে তার সাক্ষাত ঘটলে তিনি হুযাইফাহর দিকে (মুসাফাহ করতে) এগিয়ে আসলেন। তখন হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তো অপবিত্র অবস্থায় আছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ মুসলমান (কখনো) অপবিত্র হয় না বা অপবিত্র নয়।

সহীহ : মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (372)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيي: هو ابن سعيد القطان، ومسعر: هو ابن كدام، وواصل: هو ابن حيّان الأحدب، وأبو وائل: هو شقيق بن سلمة. وأخرجه مسلم (٣٧٢)، والنسائي في "الكبرى" (٢٦٠)، وابن ماجه (٥٣٥) من طريق مسعر، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٢٦١) من طريق أبي بردة، عن حذيفة. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٢٦٤)، و "صحيح ابن حبان" (١٢٥٨). وقوله: "فأهوى إليه"، أي: ميَّل يده إليه. وقوله: "إن المسلم ليس بنجس"، معناه أن الأمر بالغسل من الجنابة تعبدي وليس بنجس حتَّى لا يجوز مسه. وكذلك الكافر عند جمهور المسلمين سلفاً وخلفاً، وأما قوله تعالى: ﴿إنما المشركون نجس﴾ ﴿التوبه: ٢٨﴾ فالمراد منه نجاسة الاعتقاد والاستقذار، وليس المراد أعيانهم.









সুনান আবী দাউদ (231)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، وَبِشْرٌ، عَنْ حُمَيْدٍ، عَنْ بَكْرٍ، عَنْ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ لَقِيَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي طَرِيقٍ مِنْ طُرُقِ الْمَدِينَةِ وَأَنَا جُنُبٌ فَاخْتَنَسْتُ فَذَهَبْتُ فَاغْتَسَلْتُ ثُمَّ جِئْتُ فَقَالَ ‏"‏ أَيْنَ كُنْتَ يَا أَبَا هُرَيْرَةَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ قُلْتُ إِنِّي كُنْتُ جُنُبًا فَكَرِهْتُ أَنْ أُجَالِسَكَ عَلَى غَيْرِ طَهَارَةٍ ‏.‏ فَقَالَ ‏"‏ سُبْحَانَ اللَّهِ إِنَّ الْمُسْلِمَ لاَ يَنْجُسُ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ فِي حَدِيثِ بِشْرٍ حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ حَدَّثَنِي بَكْرٌ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মদীনার এক রাস্তায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে আমার সাক্ষাত হয়। আমি তখন অপবিত্র অবস্থায় ছিলাম। তাই আমি পিছনে হটে গিয়ে গোসল করে আসলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন হে আবূ হুরায়রা! তুমি এতক্ষণ কোথায় ছিলে? আমি বললাম, আমি অপবিত্র অবস্থায় ছিলাম বিধায় অপবিত্র অবস্থায় আপনার সাথে বসা অপছন্দ করলাম। তিনি বললেনঃ সুবহানাল্লাহ! মুসলমান (কখনো) অপবিত্র হয় না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (283) صحیح مسلم (371)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيي: هو ابن سعيد القطان، وبشر: هو ابن المفضل، وحميد: هو ابن أبي حميد الطويل، وبكر: هو ابن عبد الله، وأبو رافع: هو نفيع الصائغ. وأخرجه البخاري (٢٨٣)، ومسلم (٣٧١)، والترمذي (١٢٢)، والنسائى فى "الكبرى" (٢٥٩)، وابن ماجه (٥٣٤) من طريق حميد الطويل، بهذا الإسناد. وسقط من النسخ المطبوعة من "صحيح مسلم": بكر بن عبد الله، قال الحافظ في "النكت الظراف" (١٤٦٤٨): سقط بكر بن عبد الله من أكثر النسخ، وثبت في بعضها من رواية بعض المغاربة. وهو في "مسند أحمد" (٧٢١١)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٥٩). وقوله: فاختنستُ بالخاء المعجمة والسين المهملة من الخنوس والتأخر والاختفاء، يقال: خنس وانخنس واختنس. ويروى: فانخنست، ورواه بعضهم فانتجشت بالجيم المعجمة من النَّجْش: الإسراع: قاله فى "النهاية".









সুনান আবী দাউদ (232)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ زِيَادٍ، حَدَّثَنَا الأَفْلَتُ بْنُ خَلِيفَةَ، قَالَ حَدَّثَتْنِي جَسْرَةُ بِنْتُ دِجَاجَةَ، قَالَتْ سَمِعْتُ عَائِشَةَ، رضى الله عنها تَقُولُ جَاءَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَوُجُوهُ بُيُوتِ أَصْحَابِهِ شَارِعَةٌ فِي الْمَسْجِدِ فَقَالَ ‏"‏ وَجِّهُوا هَذِهِ الْبُيُوتَ عَنِ الْمَسْجِدِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ دَخَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَلَمْ يَصْنَعِ الْقَوْمُ شَيْئًا رَجَاءَ أَنْ تَنْزِلَ فِيهِمْ رُخْصَةٌ فَخَرَجَ إِلَيْهِمْ بَعْدُ فَقَالَ ‏"‏ وَجِّهُوا هَذِهِ الْبُيُوتَ عَنِ الْمَسْجِدِ فَإِنِّي لاَ أُحِلُّ الْمَسْجِدَ لِحَائِضٍ وَلاَ جُنُبٍ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهُوَ فُلَيْتٌ الْعَامِرِيُّ ‏.‏




জাসরাহ বিনতু দিজাজাহ হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -কে বলতে শুনেছি, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে দেখলেন, সহাবাদের ঘরের দরজা মাসজিদের দিকে ফেরানো। (কেননা তারা মাসজিদের ভিতর দিয়েই যাতায়াত করতেন) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ এসব ঘরের দরজা মাসজিদ হতে অন্যদিকে ফিরিয়ে নাও। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পুনরায় এসে দেখলেন, লোকেরা কিছুই করেননি এ প্রত্যাশায় যে, আল্লাহর পক্ষ থেকে তাদের ব্যাপারে কোন অনুমতি নাযিল হয় কিনা। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হয়ে তাদের আবারো বললেনঃ এসব ঘরের দরজা মাসজিদ হতে অন্যদিকে ফিরিয়ে নাও। কারণ ঋতুবতী মহিলা ও অপবিত্র ব্যক্তির জন্য মাসজিদে যাতায়াত আমি হালাল মনে করি না।



দূর্বলঃ যঈফ আর-জামি’উস সাগীর ৬১১৭, ইরওয়া ১৯৩




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (462)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن، أفلت -ويقال: فُليت- بن خليفة صدوق، وجسرة بنت دجاجة ذكرها أبو نعيم في "معرفة الصحابة"، ورجح الحافظ في "الإصابة" أن لها إدراكاً، وقد روى عنها جمع، وقال العجلي: ثقة تابعية، وذكرها ابن حبان في "الثقات"، وصحح لها ابن خزيمة وابن حبان والحاكم، وقال البخاري: عندها عجائب، وقال الذهبي معقباً عليه: قوله هذا ليس بصريح في الجرح. وأخرجه البيهقي ٢/ ٤٤٢ من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن خزيمة (١٣٢٧) من طريق عبد الواحد بن زياد، وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" ٢/ ٦٧، والبيهقي ٢/ ٤٤٢ - ٤٤٣ من طريق موسى بن إسماعيل التبوذكي، كلاهما عن أفلت، به. زاد موسى في آخره: "إلا لمحمد وآل محمَّد". قلنا: يعني أزواجه ﷺ، فقد كانت أبواب بيوت النبي ﷺ في المسجد ولم تكن لهم طريق إلا من المسجد. وأخرجه ابن ماجه (٦٤٥) من طريق أبي الخطاب الهجري، عن محدوج الهذلي، عن جسرة، عن أم سلمة، وأبو الخطاب ومحدوج مجهولان وصحح أبو زرعة كما في "علل الحديث" لابن أبي حاتم ١/ ٩٩ أنه من حديث عائشة. قال ابن رسلان: استدل به على تحريم اللبث في المسجد والعبور فيه سواء كان لحاجة أو لغيرها قائماً أو جالساً أو متردداً على أي حال متوضئاً كان أو غيره لإطلاق هذا الحديث، وحكاه ابن المنذر ١٠٧/ ٣ عن سفيان الثوري وأبي حنيفة وأصحابه وإسحاق بن راهويه ولا يجوز العبورُ إلا أن لا يجد بداً منه فيتوضأ ثمَّ يمر وإن لم يجد الماء يتيمم، ومذهب أحمد: يباح العبور في المسجد للحاجة من أخذ شيء أو تركه، أو كون الطريق فيه، وأما غير ذلك فلا يجوز بحال. انظر "المغني" ١/ ٢٠٠ - ٢٠١.









সুনান আবী দাউদ (233)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ زِيَادٍ الأَعْلَمِ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ أَبِي بَكْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم دَخَلَ فِي صَلاَةِ الْفَجْرِ فَأَوْمَأَ بِيَدِهِ أَنْ مَكَانَكُمْ ثُمَّ جَاءَ وَرَأْسُهُ يَقْطُرُ فَصَلَّى بِهِمْ ‏.‏




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাজরের সলাত শুরু করে (হঠাৎ তা ছেড়ে দিলেন) আর লোকদেরকে হাতে ইশারা করলেন যে, তোমরা সবাই নিজ নিজ জায়গায় অবস্থান কর। কিছুক্ষণ পর (ফারয গোসল করে) তিনি ফিরে এলেন। তখন তাঁর মাথা থেকে পানি ঝরে পড়ছিল। অতঃপর তিনি সলাত আদায় করালেন।



সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شاھد حسن عند أحمد (2/448 ح 9786) وسندہ حسن، وانظر صحیح البخاري (275) وصحیح مسلم (605)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكن الحسن -وهو ابن أبي الحسن يسار البصري- مدلس، رواه بالعنعنة. حماد: هو ابن سلمة، وزياد الأعلم: هو ابن حسان الباهلي. وأخرجه الشافعي فى "الأم" ١/ ٦٧، وأحمد (٢٠٤٢٠) و (٢٠٤٢٦) و (٢٠٤٥٩)، وابن خزيمة (١٦٢٩)، والطحاوي في "شرح المشكل" (٦٢٣)، وابن حبان (٢٢٣٥)، والبيهقي ٣٩٧/ ٢ و ٣/ ٩٤، وابن عبد البر في "التمهيد" ١/ ١٧٥ و ١٧٧ من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وسيأتي بعده. وقد وقع في حديث أبي بكرة هذا أن الانصراف كان بعد التكبير، وكذا جاء فى حديث علي عند أحمد (٦٦٨)، وحديث أنس عند الطحاوي فى "شرح المشكل" (٦٢٤)، والدارقطني (١٣٦٢)، والبيهقي ٢/ ٣٩٩، وإسناد حديث علي ضعيف، وحديث أنس روي مرسلاً عند الدارقطني (١٣٦٣). وكذا سيأتي عند المصنف بإثر الحديث (٢٣٤) من مرسل سليمان بن يسار ومرسل الربيع بن محمَّد. وجاء في حديث أبي هريرة الآتي برقم (٢٣٦) أن انصرافه ﷺ كان قبل التكبير، وهو في "الصحيحين". وجمع الإمام الطحاوي بينهما، فحمل حديث أبي بكرة وشواهده على قرب الدخول في الصلاة لا على الدخول حقيقة، كما سُمِّى إسماعيل ذبيحاً ولم يذبح، وجعلهما ابن حبان والنووي حادثتين، ورجح الحافظ ابن حجر حديث أبي هريرة، وهو الصواب. وانظر "التمهيد" ١/ ١٧٣ - ١٩٠، و"الاستذكار" ٣/ ١٠١ - ١١٠. وقال ابن قدامة فى "المغني" ٢/ ٥٠٤: إن الإمام إذا صلى بالجماعة محدثاً أو جنباً غير عالم بحدثه، فلم يعلم هو ولا المأمومون حتَّى فرغوا من الصلاة، فصلاتهم صحيحة وصلاة الإمام باطلة روي ذلك عن عمر وعثمان وعلى وابن عمر ﵃، وبه قال الحسن وسعيد بن جبير ومالك والأوزاعي والشافعي وسليمان بن حرب وأبو ثور. وعن علي أنه يُعيد ويعيدون، وبه قال ابن سيرين والشعبي وأبو حنيفة وأصحابه، لأنه صلى بهم محدثاً، أشبه ما لو علم.









সুনান আবী দাউদ (234)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَخْبَرَنَا حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ قَالَ فِي أَوَّلِهِ فَكَبَّرَ ‏.‏ وَقَالَ فِي آخِرِهِ فَلَمَّا قَضَى الصَّلاَةَ قَالَ ‏"‏ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ وَإِنِّي كُنْتُ جُنُبًا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ الزُّهْرِيُّ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ فَلَمَّا قَامَ فِي مُصَلاَّهُ وَانْتَظَرْنَا أَنْ يُكَبِّرَ انْصَرَفَ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ كَمَا أَنْتُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ أَيُّوبُ وَابْنُ عَوْنٍ وَهِشَامٌ عَنْ مُحَمَّدٍ مُرْسَلاً عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ فَكَبَّرَ ثُمَّ أَوْمَأَ بِيَدِهِ إِلَى الْقَوْمِ أَنِ اجْلِسُوا فَذَهَبَ فَاغْتَسَلَ ‏.‏ وَكَذَلِكَ رَوَاهُ مَالِكٌ عَنْ إِسْمَاعِيلَ بْنِ أَبِي حَكِيمٍ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَبَّرَ فِي صَلاَةٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ حَدَّثَنَاهُ مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ حَدَّثَنَا أَبَانُ عَنْ يَحْيَى عَنِ الرَّبِيعِ بْنِ مُحَمَّدٍ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ كَبَّرَ ‏.‏




হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হতে বর্ণিত, হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হতে উক্ত হাদীস একই সানাদ এবং একই অর্থে বর্ণিত হয়েছে। তবে তার বর্ণিত হাদীসের প্রথমাংশে রয়েছেঃ ‘তিনি তাকবীরে তাহরীমা বললেন।’ আর শেষাংশে রয়েছেঃ ‘তিনি সলাত আদায় শেষে বললেন, ‘আমি ও মানুষ এবং আমি অপবিত্র ছিলাম।’ আবূ হুরায়রার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণনায় রয়েছেঃ ‘যখন তিনি সলাতের স্থানে দাঁড়ালেন এবং আমরা তাঁর তাকবীর ধ্বনি শুনার অপেক্ষা করছিলাম, তখন তিনি ওখান থেকে চলে গেলেন এবং যাওয়ার সময় বলে গেলেন, তোমরা নিজ নিজ জায়গায় অবস্থান কর।’ মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সূত্রে মুরসালভাবে বর্ণনা করেন যে, ‘তিনি তাকবীরে তাহরীমা দিলেন, অতঃপর লোকদেরকে বসার জন্য ইশারা করে চলে গিয়ে গোসল করলেন। এরূপই বর্ণনা করেছেন মালিক, ইসমাঈল ইবনু আবূ হাকিম হতে, তিনি ‘আত্বা ইবনু ইয়াসীর হতে। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন এক সলাতের তাকবীর দিলেন। রাবী’ ইবনু মুহাম্মাদ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে বর্ণনা করেন, ‘তিনি তাকবীর বললেন।’




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وانظر الحدیث السابق (233)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، وفيه عنعنة الحسن البصري. وقد سلف تخريجه والكلام عليه فيما قبله.









সুনান আবী দাউদ (235)


حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا الزُّبَيْدِيُّ، ح وَحَدَّثَنَا عَيَّاشُ بْنُ الأَزْرَقِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ يُونُسَ، ح وَحَدَّثَنَا مَخْلَدُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ خَالِدٍ، - إِمَامُ مَسْجِدِ صَنْعَاءَ - حَدَّثَنَا رَبَاحٌ، عَنْ مَعْمَرٍ، ح وَحَدَّثَنَا مُؤَمَّلُ بْنُ الْفَضْلِ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، كُلُّهُمْ عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ أُقِيمَتِ الصَّلاَةُ وَصَفَّ النَّاسُ صُفُوفَهُمْ فَخَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى إِذَا قَامَ فِي مَقَامِهِ ذَكَرَ أَنَّهُ لَمْ يَغْتَسِلْ فَقَالَ لِلنَّاسِ ‏ "‏ مَكَانَكُمْ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ رَجَعَ إِلَى بَيْتِهِ فَخَرَجَ عَلَيْنَا يَنْطُفُ رَأْسُهُ وَقَدِ اغْتَسَلَ وَنَحْنُ صُفُوفٌ ‏.‏ وَهَذَا لَفْظُ ابْنِ حَرْبٍ وَقَالَ عَيَّاشٌ فِي حَدِيثِهِ فَلَمْ نَزَلْ قِيَامًا نَنْتَظِرُهُ حَتَّى خَرَجَ عَلَيْنَا وَقَدِ اغْتَسَلَ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা সলাতের জন্য ইক্বামাত দেয়া হলে লোকজন কাতারবন্দী হয়ে দাঁড়ালো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে তাঁর নির্দিষ্ট স্থানে দাঁড়ালেন। এমন সময় তাঁর স্মরণ হলো, তিনি গোসল করেননি। তিনি লোকদের বললেন, ‘তোমরা যথাস্থানে অবস্থান কর’। এ বলে তিনি ঘরে গিয়ে গোসল করে আমাদের নিকট ফিরে আসলেন, তখন তাঁর মাথা থেকে পানি ঝরে পড়ছিল। আমরা তখনও কাতারবন্দী হয়ে দাঁড়িয়ে ছিলাম। এটা ইবনু হারবের বর্ণনা। ‘আইয়াশের বর্ণনায় আছেঃ তিনি গোসল করে আমাদের নিকট ফিরে আসা পযর্ন্ত আমরা ঐভাবেই দাঁড়িয়ে থেকে তাঁর জন্য অপেক্ষা করছিলাম।



সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (639، 640) صحیح مسلم (605)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمَّد بن حرب: هو الخولاني، والزبيدي: هو محمَّد بن الوليد، وابن وهب: هو عبد الله، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي، ورباح: هو ابن زيد الصنعاني، ومعمر: هو ابن راشد، والوليد: هو ابن مسلم، والأوزاعي: هو عبد الرحمن ابن عمرو، والزهري: هو محمَّد بن مسلم، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن. وأخرجه البخاري (٢٧٥)، ومسلم (٦٠٥) (١٥٧)، والنسائي في "الكبرى" (٨٨٥) من طريق يونس بن يزيد، والبخاري (٦٤٠)، ومسلم (٦٠٥) (١٥٨) و (١٥٩)، والنسائي (٨٦٩) من طريق الأوزاعي، والبخاري (٦٣٩) من طريق صالح بن كيسان، والنسائي (٨٦٩) من طريق محمَّد بن الوليد الزبيدي، أربعتهم عن الزُّهريّ، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٢٣٨) و (٧٥١٥) و (٧٨٠٤). وفي هذا الحديث جواز النسيان على الأنبياء في أمر العبادة لأجل التشريع. وفيه أنه لا حياء في أمور الدين، وسبيل من غلب أن يأتي بعذر موهم كأن يمسك بأنفه ليوهم أنه رعف، وفيه انتظار المأمومين مجيء الإمام قياماً عند الضرورة، وهو غير القيام المنهي عنه في حديث أبي قتادة، وفيه أنه لا يجب على من احتلم في المسجد فأراد الخروج منه أن يتيمم، وجواز تأخير الجنب الغسل عن وقت الحدث، وجواز الكلام بين الإقامة والصلاة.









সুনান আবী দাউদ (236)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ خَالِدٍ الْخَيَّاطُ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ الْعُمَرِيُّ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنِ الْقَاسِمِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ سُئِلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الرَّجُلِ يَجِدُ الْبَلَلَ وَلاَ يَذْكُرُ احْتِلاَمًا قَالَ ‏"‏ يَغْتَسِلُ ‏"‏ ‏.‏ وَعَنِ الرَّجُلِ يَرَى أَنَّهُ قَدِ احْتَلَمَ وَلاَ يَجِدُ الْبَلَلَ قَالَ ‏"‏ لاَ غُسْلَ عَلَيْهِ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَتْ أُمُّ سُلَيْمٍ الْمَرْأَةُ تَرَى ذَلِكَ أَعَلَيْهَا غُسْلٌ قَالَ ‏"‏ نَعَمْ إِنَّمَا النِّسَاءُ شَقَائِقُ الرِّجَالِ ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে এমন ব্যক্তি সর্ম্পকে জিজ্ঞাসা করা হল, যে ঘুম থেকে জেগে (বীর্যপাতের দরুণ কাপড়) ভিজা দেখতে পায় অথচ স্বপ্নদোষের কথা তার স্মরণ হচ্ছে না। তিনি বললেন, তাকে গোসল করতে হবে। এটাও জিজ্ঞাসা করা হল যে, এক ব্যক্তির তার স্বপ্নদোষ হয়েছে বলে মনে পড়ছে, অথচ কাপড়ে কোন ভিজা দেখতে পেল না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তাকে গোসল করতে হবে না। উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! নারীরাও (পুরুষের) অনুরূপ কিছু দেখতে পেলে তাদেরও কি গোসল করতে হবে? তিনি বললেনঃ হ্যাঁ, নারীরা তো পুরুষের মতই।



হাসান : তবে উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এ কথাটি বাদে : নারীরাও (পুরুষের) অনুরূপ কিছু দেখতে




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن إلا قول أم سليم المرأة ترى الخ




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (113)،ابن ماجہ (612)،ویأتي (3721) ، وقال الترمذي: ’’وعبد اللّٰہ ضعفہ یحیی بن سعید من قبل حفظہ‘‘ ، ولبعض الحدیث شواھد عند مسلم (314) وغیرہ،انظر الحدیث الآتي (الأصل: 237) ، (انوار الصحیفہ ص 21)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله العمري، وباقي رجاله ثقات. عبيد الله: هو ابن عمر العمري أخو عبد الله، والقاسم: هو ابن محمَّد بن أبي بكر. وأخرجه الترمذي (١١٣)، وابن ماجه (٦١٢) من طريق حماد بن خالد الخياط، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" ((٢٦١٩٥). وأخرج سؤال أم سليم وجوابه ﷺ أحمد (٢٧١١٨) من طريق إسحاق بن بد الله ابن أبي طلحة، عن جدته أم سليم. وهذا إسناد منقطع، فإسحاق لم يسمع من جدته. وأخرجه مسلم (٣١٠) من طريق إسحاق، حدثنى أنس بن مالك، قال: جاءت أم سليم إلى رسول الله ﷺ وعائشة عنده … فذكره دون قوله: "النساء شقائق الرجال". وللحديث بتمامه شاهد من حديث خولة بنت حكيم عند أحمد (٢٧٣١٢)، وابن ماجه (٦٠٢) ولفظه: أنها سألت النبي ﷺ عن المرأة ترى في منامها ما يرى الرجل، فقال: "ليس عليها غسل حتَّى يَنزل الماءُ، كما أن الرجل ليس عليه غسل حتَّى يُنزل" وفي إسناده علي بن زيد بن جدعان، وهو ضعيف. وانظر ما بعده. وقوله: النساء شقائق الرجال. قال في "النهايه": أي نظائرهم وأمثالهم في الأخلاق والطباع، كأنهنَّ شُقِقْنَ منهم. يعنى فيجب الغسل على المرأة برؤية البلل من النوم كالرجل. قال الخطابي: وفيه من الفقه إثبات القياس، وإلحاق حكم النظير بنظيره، فإن الخطاب إذا ورد بلفظ المذكر، كان خطاباً للنساء إلا مواضع الخصوص التي قامت أدلة التخصيص فيها.









সুনান আবী দাউদ (237)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَنْبَسَةُ، حَدَّثَنَا يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، قَالَ قَالَ عُرْوَةُ عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ أُمَّ سُلَيْمٍ الأَنْصَارِيَّةَ، - وَهِيَ أُمُّ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ - قَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ لاَ يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ أَرَأَيْتَ الْمَرْأَةَ إِذَا رَأَتْ فِي النَّوْمِ مَا يَرَى الرَّجُلُ أَتَغْتَسِلُ أَمْ لاَ قَالَتْ عَائِشَةُ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ نَعَمْ فَلْتَغْتَسِلْ إِذَا وَجَدَتِ الْمَاءَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ عَائِشَةُ فَأَقْبَلْتُ عَلَيْهَا فَقُلْتُ أُفٍّ لَكِ وَهَلْ تَرَى ذَلِكَ الْمَرْأَةُ فَأَقْبَلَ عَلَىَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏"‏ تَرِبَتْ يَمِينُكِ يَا عَائِشَةُ وَمِنْ أَيْنَ يَكُونُ الشَّبَهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رَوَى عُقَيْلٌ وَالزُّبَيْدِيُّ وَيُونُسُ وَابْنُ أَخِي الزُّهْرِيِّ عَنِ الزُّهْرِيِّ وَإِبْرَاهِيمُ بْنُ أَبِي الْوَزِيرِ عَنْ مَالِكٍ عَنِ الزُّهْرِيِّ وَوَافَقَ الزُّهْرِيَّ مُسَافِعٌ الْحَجَبِيُّ قَالَ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَائِشَةَ ‏.‏ وَأَمَّا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ فَقَالَ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ زَيْنَبَ بِنْتِ أَبِي سَلَمَةَ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ أَنَّ أُمَّ سُلَيْمٍ جَاءَتْ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আনাস ইবনু মালিকের মা উম্মু সুলাইম আল-আনসারিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট এসে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ সত্যের ক্ষেত্রে লজ্জা করেন না! পুরুষের ন্যায় নারীরাও যদি ঘুমে ঐরূপ কিছু দেখে, তাহলে তাকে গোসল করতে হবে কিনা? ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, হ্যাঁ, পানি দেখতে পেলে তাকেও গোসল করতে হবে। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি উম্মু সুলাইমকে বললাম, তোমার জন্য দুঃখ হচ্ছে! পুরুষের ন্যায় নারীদের আবার স্বপ্নদোষ হয় নাকি? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দিকে এসে বললেন, হে ‘আয়িশাহ! তোমার ডান হাত ধুলিমলিন হোক। যদি এরূপই না হবে, তাহলে সন্তান মায়ের আকৃতির হয় কি করে?

সহীহঃ মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (314)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عنبسة -وهو ابن خالد بن يزيد الأيلي- وقد توبع. يونس: هو ابن يزيد الأيلي عم عنبسة، وابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم الزُّهريّ، وعروة: هو ابن الزُّبير. وأخرجه مسلم (٣١٤) (٣٢) من طريق عقيل بن خالد، والنسائي في "الكبرى" (٢٠١) من طريق محمَّد بن الوليد الزبيدي، كلاهما عن الزُّهريّ، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٣١٤) (٣٣) من طريق مسافع بن عبد الله، عن عروة، به. ولم يُسَمَّ السائلة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٦١٠)، و" صحيح ابن حبان" (١١٦٦). وقد روي سؤال أم سليم من حديثها عند أحمد (٢٧١١٤) و (٢٧١١٨)، ومن حديث أنس بن مالك عند مسلم (٣١٠)، والنسائي في "الكبرى" (٢٠٠)، وابن ماجه (٦٠١). وهو في "المسند" (١٢٢٢٢)، و"صحيح ابن حبان" (١١٦٤). وقول الرسول لعائشة: تربت يمينك. الذي عليه المحققون أن معناها: افتقرت، ولكن العرب اعتادت استعمالها غير قاصدة معناها الأصلي، فيقولون: تربت يداك، وقاتله الله ما أشجعه، ولا أم له، ولا أب لك، وثكلته أمه وما أشبه هذا من ألفاظهم يقولونها عند إنكار الشيء أو الزجر عنه، أو الذم عليه أو استعظامه، أو الحث عليه أو الإعجاب به. أفاده النووي.









সুনান আবী দাউদ (238)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَغْتَسِلُ مِنْ إِنَاءٍ - هُوَ الْفَرَقُ - مِنَ الْجَنَابَةِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ مَعْمَرٌ عَنِ الزُّهْرِيِّ فِي هَذَا الْحَدِيثِ قَالَتْ كُنْتُ أَغْتَسِلُ أَنَا وَرَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ إِنَاءٍ وَاحِدٍ فِيهِ قَدْرُ الْفَرَقِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَى ابْنُ عُيَيْنَةَ نَحْوَ حَدِيثِ مَالِكٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ سَمِعْتُ أَحْمَدَ بْنَ حَنْبَلٍ يَقُولُ الْفَرَقُ سِتَّةَ عَشَرَ رِطْلاً ‏.‏ وَسَمِعْتُهُ يَقُولُ صَاعُ ابْنِ أَبِي ذِئْبٍ خَمْسَةُ أَرْطَالٍ وَثُلُثٌ ‏.‏ قَالَ فَمَنْ قَالَ ثَمَانِيَةُ أَرْطَالٍ قَالَ لَيْسَ ذَلِكَ بِمَحْفُوظٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَسَمِعْتُ أَحْمَدَ يَقُولُ مَنْ أَعْطَى فِي صَدَقَةِ الْفِطْرِ بِرَطْلِنَا هَذَا خَمْسَةَ أَرْطَالٍ وَثُلُثًا فَقَدْ أَوْفَى ‏.‏ قِيلَ الصَّيْحَانِيُّ ثَقِيلٌ قَالَ الصَّيْحَانِيُّ أَطْيَبُ ‏.‏ قَالَ لاَ أَدْرِي ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ফারাক পরিমাণ পানি সংকুলান হয় এমন একটি পাত্র থেকে পানি নিয়ে জানাবাতের গোসল করতেন।



সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।



ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, যুহরী থেকে মা’মার এ হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি ও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’জনে একই পাত্র হতে পানি নিয়ে গোসল করতাম। ঐ পাত্রে এক ফারাক পানি ধরত। ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি আহমাদ ইবনু হাম্বাল (রাহিমাহুল্লাহ)-কে বলতে শুনেছি, ‘এক ফারাক হলো, ষোল রত্বল।’ আমি তাকে এটাও বলতে শুনেছি, ইবনু আবূ যি’ব এর মতেঃ এক সা’ হচ্ছে পাঁচ রত্বল এবং এক রত্বলের এক তৃতীয়াংশ।’ আর যিনি আট রত্বল বলেছেন তা সুরক্ষিত (মাহফূয) নয়। ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইমাম আহমাদ কে বলতে শুনেছি, যে ব্যক্তি আমাদের রত্বলের পাঁচ রত্বল এবং এক তৃতীয়াংশ দ্বারা সদাক্বাতুল ফিতর আদায় করল, সে পূর্ণ ফিতরা দিল। লোকজন বলল, সায়হানী (মাদীনাহর এক প্রকার খেজুর) তো (ওজনে) ভারী হয়। তিনি বললেন, সায়হানী কি উৎকৃষ্ট? তিনি বললেন, আমার তা জানা নেই।



সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (250) صحیح مسلم (319)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم الزُّهريّ. وهو في "موطأ مالك" ١/ ٤٤ - ٤٥، ومن طريقه أخرجه مسلم (٣١٩) (٤٠). وأخرجه البخاري (٢٥٠) من طريق ابن أبي ذئب، ومسلم (٣١٩) (٤١)، والنسائي في "الكبرى" (٢٢٦)، وابن ماجه (٣٧٦) من طريق الليث بن سعد، ومسلم (٣١٩) (٤١)، وابن ماجه (٣٧٦) من طريق سفيان بن عيينة، والنسائي (٢٣٠) من طريق معمر وابن جريج، أربعتهم عن الزُّهريّ، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠٨٩)، و"صحيح ابن حبان" (١١٠٨). وانظر ما سلف برقم (٧٧). الفَرَق: إناء من نحاس يسع (١٦) رطلاً، أي: ما يعادل (١٠) كيلو غرام. قال صاحب "عون المعبود" ٢٧٨/ ١: واعلم أنه ليس الغسل بالصاع أو الفرق للتحديد والتقدير، بل كان رسول الله ﷺ ربما اقتصر على الصاع وربما زاد عليه، والقدر المجزئ من الغسل ما يحصل به تعميم البدن على الوجه المعتبر سواء كان صاعاً أو أقل أو أكثر ما لم يبلغ فى النقصان إلى مقدار لا يسمى مستعمله مغتسلاً، أو إلى مقدار في الزيادة يدخل فاعله في حد الإسراف.









সুনান আবী দাউদ (239)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، أَخْبَرَنِي سُلَيْمَانُ بْنُ صُرَدٍ، عَنْ جُبَيْرِ بْنِ مُطْعِمٍ، أَنَّهُمْ ذَكَرُوا عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْغُسْلَ مِنَ الْجَنَابَةِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ أَمَّا أَنَا فَأُفِيضُ عَلَى رَأْسِي ثَلاَثًا ‏"‏ ‏.‏ وَأَشَارَ بِيَدَيْهِ كِلْتَيْهِمَا ‏.




জুবাইর ইবনু মুত্ব’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট জানাবাতের গোসল সর্ম্পকে উল্লেখ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি আমার মাথার উপর তিনবার পানি ঢেলে থাকি। এ বলে তিনি তাঁর দু’হাতের দ্বারা ইশারা করে দেখিয়ে দিলেন।

সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (254) صحیح مسلم (327)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. زهير: هو ابن حرب أبو خثيمة، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي. وأخرجه البخاري (٢٥٤)، ومسلم (٣٢٧)، والنسائي فى "المجتبى" (٢٥٠) و (٤٢٥)، وابن ماجه (٥٧٥) من طرق عن أبي إسحاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٧٤٩).









সুনান আবী দাউদ (240)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، عَنْ حَنْظَلَةَ، عَنِ الْقَاسِمِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا اغْتَسَلَ مِنَ الْجَنَابَةِ دَعَا بِشَىْءٍ نَحْوِ الْحِلاَبِ فَأَخَذَ بِكَفِّهِ فَبَدَأَ بِشِقِّ رَأْسِهِ الأَيْمَنِ ثُمَّ الأَيْسَرِ ثُمَّ أَخَذَ بِكَفَّيْهِ فَقَالَ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানাবাতের গোসল করার সময় ‘হিলাব’ তথা উটের দুধ দোহনের পাত্রের ন্যায় একটি পাত্র আনাতেন। অতঃপর উভয় হাতে পানি নিয়ে প্রথমে মাথার ডান দিকে ঢালতেন, তারপর বামদিকে। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর উভয় হাতে পানি নিয়ে মাথার তালুতে ঢালতেন।

সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (258) صحیح مسلم (318)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وحنظلة: هو ابن أبي سفيان الجمحي، والقاسم: هو ابن محمَّد بن أبي بكر. وأخرجه البخاري (٢٥٨)، ومسلم (٣١٨)، والنسائى في "المجتبى" (٤٢٤) عن محمَّد بن المثنى، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (١١٩٧). وقوله: فقال بهما على رأسه، أي: أشار بهما على رأسه، أي: أفاض الماء بكفيه على جميع رأسه.