সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِمَعْنَاهُ . زَادَ كَانَ يَصُومُهُ إِلاَّ قَلِيلاً بَلْ كَانَ يَصُومُهُ كُلَّهُ .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সূত্রে পূর্বোক্ত হাদীসের অর্থের অনুরূপ বর্ণিত। তাতে রয়েছেঃ তিনি (শা‘বান মাসে) সামান্য ক’দিন ছাড়া গোটা মাসই সওম পালন করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. محمد بن عمرو -وهو ابن علقمة الليثي- صدوق حسن الحديث. لكن ذكر أبي هريرة فيه غير محفوظ وإنما يروى عن أم سلمة وعائشة، وانظر ما قبله. حماد: هو ابن سلمة. وقال المنذري: وهذه الزيادة أخرجها مسلم في "صحيحه" وفي البخاري أيضاً.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُمَرَ بْنِ أَبِي الْحَكَمِ بْنِ ثَوْبَانَ، عَنْ مَوْلَى، قُدَامَةَ بْنِ مَظْعُونٍ عَنْ مَوْلَى، أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ أَنَّهُ انْطَلَقَ مَعَ أُسَامَةَ إِلَى وَادِي الْقُرَى فِي طَلَبِ مَالٍ لَهُ فَكَانَ يَصُومُ يَوْمَ الاِثْنَيْنِ وَيَوْمَ الْخَمِيسِ فَقَالَ لَهُ مَوْلاَهُ لِمَ تَصُومُ يَوْمَ الاِثْنَيْنِ وَيَوْمَ الْخَمِيسِ وَأَنْتَ شَيْخٌ كَبِيرٌ فَقَالَ إِنَّ نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَصُومُ يَوْمَ الاِثْنَيْنِ وَيَوْمَ الْخَمِيسِ وَسُئِلَ عَنْ ذَلِكَ فَقَالَ " إِنَّ أَعْمَالَ الْعِبَادِ تُعْرَضُ يَوْمَ الاِثْنَيْنِ وَيَوْمَ الْخَمِيسِ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَذَا قَالَ هِشَامٌ الدَّسْتَوَائِيُّ عَنْ يَحْيَى عَنْ عُمَرَ بْنِ أَبِي الْحَكَمِ .
উসামাহ ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর আযাদকৃত গোলাম হতে বর্ণিত, তিনি উাসমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সাথে তার কোন মালের সন্ধানে ওয়াদিয়ুল কুরায় যান। উসামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি সোমবার ও বৃহস্পতিবার সওম পালন করতেন। তার মুক্তদাস তাকে জিজ্ঞেস করলেন, আপনি সোমবার ও বৃহস্পতিবার কেন সওম রাখেন অথচ আপনি একজন বৃদ্ধ মানুষ। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সোমবার ও বৃহস্পতিবার সওম রাখতেন। তাঁকে এর কারন জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেনঃ সোমবার ও বৃহস্পতিবার আল্লাহর নিকট বান্দার আমলসমূহ পেশ করা হয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مولی قدامۃ ومولی أسامۃ مستوران ، وحدیث الترمذي (745) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: المرفوع منه صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة مولى قدامة، وجهالة مولى أسامة، عمر بن أبي الحكم بن ثوبان، كذا جاء اسمه في أصولنا الخطية، لكن جاء في هامش (أ) و (هـ) أن صوابه عمر بن الحكم. قلنا: كذا سماه أبان -وهو ابن يزيد العطار- فقد جاء اسمه كذلك في "مسند أحمد" (٢١٧٤٤): عمر بن أبي الحكم، لكن خالفه هشام الدستوائي فسماه: عمر بن الحكم. وذكر صاحب "بذل المجهود" ١١/ ٣٠٣ أن كلاهما صواب فأحدهما نسبه إلى أبيه والآخر إلى جده. لأنه عمر بن الحكم بن أبي الحكم ثوبان إلا أن ما جاء في الأصول الخطية هنا من زيادة: بن ثوبان فخطأ، لأن ثوبان هو نفسه أبو الحكم. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٧٩٤) و (٢٧٩٥) من طريق هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٢٦٧٩) من طريق أبي سعيد المقبري، عن أسامة بن زيد، به. وإسناده حسن. وهو في "مسند أحمد" (٢١٧٤٤) و (٢١٧٥٣) وانظر تمام تخريجه فيه. ويشهد للمرفوع منه حديث أبي هريرة الآتي عند المصنف برقم (٤٩١٦)، وهو في "الصحيح". وحديث عائشة عند أحمد (٢٤٥٠٨)، وابن ماجه (١٦٤٩) و (١٧٣٩)، والترمذي (٧٥٥)، والنسائي في "الكبرى" (٢٥٠٧) و (٢٥٠٨). وحديث أم سلمة أو حفصة عند النسائي (٢٦٨٦) و (٢٦٨٧) و (٢٦٨٨).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنِ الْحُرِّ بْنِ الصَّبَّاحِ، عَنْ هُنَيْدَةَ بْنِ خَالِدٍ، عَنِ امْرَأَتِهِ، عَنْ بَعْضِ، أَزْوَاجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ تِسْعَ ذِي الْحِجَّةِ وَيَوْمَ عَاشُورَاءَ وَثَلاَثَةَ أَيَّامٍ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ أَوَّلَ اثْنَيْنِ مِنَ الشَّهْرِ وَالْخَمِيسَ .
হুনাইদাহ ইবনু খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) তার স্ত্রী হতে এবং তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কোন এক স্ত্রী সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিলহাজ্জ মাসের নয় তারিখ পর্যন্ত, আশূরার দিন, প্রত্যেক মাসে তিনদিন, মাসের প্রথম সোমবার ও বৃহস্পতিবার সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وأخرجہ النسائي (2374 وسندہ صحیح) ھنیدۃ: صحابي، وامرأتہ: صحابیۃ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: ضعيف لاضطرابه فقد اختلف عن هنيدة في إسناده، فروي عنه كما ذكره المصنف هنا وروي عنه، عن حفصة زوج النبي ﷺ، وروي عنه، عن أمه عن أم سلمة زوج النبي ﷺ مختصراً، وانظر التفصيل في ما كتبناه على الحديث في "مسند أحمد" برقم (٢٢٣٣٤). مسدَّدٌ: هو ابن مسرهد الأسَدي، وأبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٦٩٣)، (٢٧٣٨) من طريق أبي عوانة، بهذا الإسناد. وانظر ما سيأتي برقم (٢٤٥٢).
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، وَمُجَاهِدٍ، وَمُسْلِمٍ الْبَطِينِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَا مِنْ أَيَّامٍ الْعَمَلُ الصَّالِحُ فِيهَا أَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنْ هَذِهِ الأَيَّامِ " . يَعْنِي أَيَّامَ الْعَشْرِ . قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ وَلاَ الْجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ قَالَ " وَلاَ الْجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ إِلاَّ رَجُلٌ خَرَجَ بِنَفْسِهِ وَمَالِهِ فَلَمْ يَرْجِعْ مِنْ ذَلِكَ بِشَىْءٍ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মহান আল্লাহর নিকট যে কোন দিনের সৎ আমলের চাইতে যিলহাজ্জ মাসের দশ প্রথম দিনের আমলের অধিক প্রিয়। লোকেরা জিজ্ঞেস করলো, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর পথে জিহাদও নয়? তিনি বললেনঃ না, আল্লাহর পথে জিহাদও নয়। তবে যে ব্যক্তি তার জান-মাল নিয়ে জিহাদে বের হয় এবং এর কোন একটি নিয়েও ফিরে না আসে তার কথা স্বতন্ত্র।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (969)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وكيع: هو ابن الجراح، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو صالح: هو ذكوان السمان، ومجاهد: هو ابن جَبر، ومُسلم البَطين: هو مُسلم بن عِمران. وأخرجه الخاري (٩٦٩)، وابن ماجه (١٧٢٧)، والترمذي (٧٦٧). من طريقين، عن الأعمش، عن مسلم البَطين وحده، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٤).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنِ الأَسْوَدِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ مَا رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم صَائِمًا الْعَشْرَ قَطُّ .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে কখনো (যিলহাজ্জ মাসে) দশ দিন সওম পালন করতে দেখিনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1176)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مسرهد الأسدي، وأبو عوانة: هو الوضاح ابن عبد الله اليشكري، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، والأسود: هو ابن يزيد النخعي. وأخرجه مسلم (١١٧٦)، والترمذي (٧٦٦)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٨٥ - ٢٨٨٧) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (١٧٢٩) من طريق منصور، عن إبراهيم، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤١٤٧)، و"صحيح ابن حبان" (١٤٤١) و (٣٦٠٨).
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَوْشَبُ بْنُ عَقِيلٍ، عَنْ مَهْدِيٍّ الْهَجَرِيِّ، حَدَّثَنَا عِكْرِمَةُ، قَالَ كُنَّا عِنْدَ أَبِي هُرَيْرَةَ فِي بَيْتِهِ فَحَدَّثَنَا أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَرَفَةَ بِعَرَفَةَ .
ইকরিমাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আমরা আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর কাছে তারঘরে অবস্থান করছিলাম। তখন তিনি আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাহর দিন আরাফাহর ময়দানে সওম রাখতে নিষেধ করেছেন। [২৪৪০]
দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (৬০৬৯), যঈফ সুনান ইবনু মাজাহ (৩৭৮/১৭৩২), সিলসিলাতুল আহাদীসিয যঈফাহ (৪০৪), মিশকাত(২০৬৩)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2062) ، أخرجہ ابن ماجہ (1732 وسندہ حسن) وصححہ ابن خزیمۃ (2101 وسندہ حسن) مھدي بن حرب العبدي وثقہ ابن خزیمۃ والحاکم وغیرہما وأخطأ من جھلہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة مهدي الهَجَري -وهو ابن حرب العبدي المُحَاربي-. وأخرجه ابن ماجه (١٧٣٢)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٤٣) و (٢٨٤٤) من طريق حوشب بن عقيل، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٨٠٣١). قال الخطابي: هذا نهي استحباب لا نهي إيجاب، وإنما نهي المحرم عن ذلك خوفاً عليه أن يضعف عن الدعاء والابتهال في ذلك المقام، فأما من وجد قوة، ولا يخاف معها ضعفاً فصوم ذلك اليوم أفضل له إن شاء الله، وقد قال النبي ﷺ: "صيامُ يومِ عرفَة يُكفر سنتين: سنة قبلها، وسنة بعدها. قال ابن القيم: وقد صح عن رسول الله ﷺ أنه أفطر بعرفة، وصح عنه أن صيامه يكفر سنتين، فالصواب أن الأفضل لأهل الآفاق صومه، ولأهل عرفة فطره، لاختياره ﷺ ذلك لنفسه وعمل خلفائه بعده بالفطر، وفيه قوة على الدعاء الذي هو أفضل دعاء العبد، وفيه أن يوم عرفة عيد لأهل عرفة، فلا يستحب لهم صيامه. وانظر الحديث الآتي بعد هذا.
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي النَّضْرِ، عَنْ عُمَيْرٍ، مَوْلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ عَنْ أُمِّ الْفَضْلِ بِنْتِ الْحَارِثِ، أَنَّ نَاسًا، تَمَارَوْا عِنْدَهَا يَوْمَ عَرَفَةَ فِي صَوْمِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ بَعْضُهُمْ هُوَ صَائِمٌ . وَقَالَ بَعْضُهُمْ لَيْسَ بِصَائِمٍ . فَأَرْسَلَتْ إِلَيْهِ بِقَدَحِ لَبَنٍ وَهُوَ وَاقِفٌ عَلَى بَعِيرِهِ بِعَرَفَةَ فَشَرِبَ .
আল-হারিস কন্যা উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আরাফাহর দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওম পালন করেছেন কিনা এ নিয়ে কতিপয় লোক তার নিকট বিতর্ক করেন। তাদের কেউ বললেন, তিনি সওম রেখেছেন, আবার কতিপয় বললেন, তিনি সওম রাখেননি। সুতরাং আমি তাঁর কাছে এক পেয়ালা দুধ পাঠালাম, তখন তিনি তাঁর উষ্ট্রীর পিঠের উপর আরাফাহতে অবস্থান করছিলেন। তিনি দুধটুকু পান করলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1988) صحیح مسلم (1123)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. القعنبيّ: هو عبد الله بن مسلمة، ومالك: هو ابن أنس، وأبو النضر: هو سالم بن أبي أمية. وهو عند مالك في "الموطأ"١/ ٣٧٥، ومن طريقه أخرجه البخاري (١٦٦١) و (١٩٨٨)، ومسلم (١١٢٣). وأخرجه البخاري (١٦٥٨) و (٥٦٠٤) و (٥٦١٨) و (٥٦٣٦)، ومسلم (١١٢٣) من طرق عيب أبي النضر، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٨٣٢) من طريق عبد الله بن عباس عن أم الفضل. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٨٦٩) و (٢٦٨٧٢)، و"صحيح ابن حبان " (٣٦٠٥) و (٣٦٠٦).
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ كَانَ يَوْمُ عَاشُورَاءَ يَوْمًا تَصُومُهُ قُرَيْشٌ فِي الْجَاهِلِيَّةِ وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُهُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ فَلَمَّا قَدِمَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْمَدِينَةَ صَامَهُ وَأَمَرَ بِصِيَامِهِ فَلَمَّا فُرِضَ رَمَضَانُ كَانَ هُوَ الْفَرِيضَةَ وَتُرِكَ عَاشُورَاءُ فَمَنْ شَاءَ صَامَهُ وَمَنْ شَاءَ تَرَكَهُ .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাহিলিয়াতের যুগে কুরাইশরা আশূরার সওম পালন করতো। জাহিলী যুগে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -ও এ দিন সওম রাখতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনায় এসে এ দিন সওম রেখেছেন এবং লোকদেরকেও সওম পালনের নির্দেশ দিয়েছেন। অত:পর রমযানের সওম ফরয হলে সেটিই ফরয হিসেবে বহাল হলো এবং আশূরার দিন সওম রাখার আবশ্যকতা পরিত্যক্ত হলো। ফলে যার ইচ্ছা সওম রাখতো এবং যার ইচ্ছা ত্যাগ করতো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2002) صحیح مسلم (1125)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو عند مالك في "الموطأ"١/ ٢٩٩، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٠٠٢). وأخرجه البخاري (٣٨٣١) و (٤٥٠٤)، ومسلم (١١٢٥)، والترمذي (٧٦٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٥١) و (١٠٩٤٨) من طرق عن هشام بن عروة، به. وأخرجه مختصراً البخاري (١٥٩٢) و (١٨٩٣) و (٢٠٠١) و (٤٥٠٢)، ومسلم (١١٢٥)، وابن ماجه (١٧٣٣)، والنسائي (٢٨٥٠) و (٢٨٥٢) و (١٠٩٤٩) من طرق عن عروة بن الزبير، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠١١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢١). قال القرطبي: عاشوراء: معدول عن عاشرة للمبالغة والتعظيم، وهو في الأصل: صفة لليلة العاشرة، لأنه مأخوذ من العشر الذي هو اسم العقد واليوم مضاف إليها، فإذا قيل: يوم عاشوراء، فكأنه قيل: يوم الليلة العاشرة إلا أنهم لما عدلوا به عن الصفة غلبت عليه الاسمية، فاستغنوا عن الموصوف، فحذفوا الليلة، فصار هذا اللفظ علماً على اليوم العاشر.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، قَالَ أَخْبَرَنِي نَافِعٌ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ كَانَ عَاشُورَاءُ يَوْمًا نَصُومُهُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ فَلَمَّا نَزَلَ رَمَضَانُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " هَذَا يَوْمٌ مِنْ أَيَّامِ اللَّهِ فَمَنْ شَاءَ صَامَهُ وَمَنْ شَاءَ تَرَكَهُ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আশূরা এমন দিন ছিলো যে, জাহিলী যুগে আমরা এ দিন সওম পালন করতাম। অতঃপর রমাযান মাসের সওম ফারয করা হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ এটি আল্লাহর দিনসমূহের একটি দিন। কাজেই যার ইচ্ছা সওম রাখুক, আর যার ইচ্ছা তা ত্যাগ করুক।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4501) صحیح مسلم (1126)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مسرهد الأسَدي، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، وعُبيد الله: هو ابن عمر العمري، ونافع: هو مولى ابن عمر. وأخرجه البخاري (٤٥٠١)، ومسلم (١١٢٦) من طريق يحيى القطان، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٢٦) من طريق عُبيد الله، به. وأخرجه بنحوه مختصراً البخاري (١٨٩٢)، ومسلم (١١٢٦)، وابن ماجه (١٧٣٧)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٥٣) من طرق عن نافع، والبخاري (٢٠٠٠)، ومسلم (١١٢٦) من طرق سالم بن عبد الله، كلاهما عن ابن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٥٢٠٣)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢٢).
حَدَّثَنَا زِيَادُ بْنُ أَيُّوبَ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، حَدَّثَنَا أَبُو بِشْرٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لَمَّا قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم الْمَدِينَةَ وَجَدَ الْيَهُودَ يَصُومُونَ عَاشُورَاءَ فَسُئِلُوا عَنْ ذَلِكَ فَقَالُوا هَذَا الْيَوْمُ الَّذِي أَظْهَرَ اللَّهُ فِيهِ مُوسَى عَلَى فِرْعَوْنَ وَنَحْنُ نَصُومُهُ تَعْظِيمًا لَهُ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " نَحْنُ أَوْلَى بِمُوسَى مِنْكُمْ " . وَأَمَرَ بِصِيَامِهِ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনাহয় এসে ইয়াহুদীদের আশূরার দিন সওম পালনরত পেলেন। তাদেরকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তারা বললো, এটি একটি মহান দিন, যেদিন মহান আল্লাহ মূসা (আঃ)-কে ফেরাউনের উপর বিজয়ী করেছেন। সুতরাং এ মহান দিনের সম্মানার্থে আমরা সওম পালন করি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমাদের চাইতে আমরা মূসা (আঃ) -এর বেশি হকদার। অতঃপর তিনি ঐদিন সওম পালনের নির্দেশ দেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3943) صحیح مسلم (1130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هُشيم: هو ابن بَشير السُّلمي، وأبو بشر: هو جعفر بن إياس اليشكري. وأخرجه البخاري (٣٩٤٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٤٧) و (١١١٧٣) من طريق زياد بن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٣٠) من طريق هُشيم، والبخاري (٤٦٨٠) و (٤٧٣٧)، ومسلم (١١٣٠) من طريق شعبة، كلاهما عن أبي بِشر، به. وأخرجه البخاري (٢٠٠٤) و (٣٣٩٧)، ومسلم (١١٣٠)، والنسائي (٢٨٤٨) و (٢٨٤٩) من طريق عبد الله بن سعيد بن جبير، وابن ماجه (١٧٣٤) من طريق أيوب، كلاهما عن سعيد بن جبير، به. وأخرج الترمذي (٧٦٥) من طريق الحسن البصري، عن ابن عباس، قال: أمرَ رسول الله ﷺ بصوم عاشوراء، يوم عاشِر. وقال: حديث حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٣١٦٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢٥). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ، أَنَّ إِسْمَاعِيلَ بْنَ أُمَيَّةَ الْقُرَشِيَّ، حَدَّثَهُ أَنَّهُ، سَمِعَ أَبَا غَطَفَانَ، يَقُولُ سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَبَّاسٍ، يَقُولُ حِينَ صَامَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ عَاشُورَاءَ وَأَمَرَنَا بِصِيَامِهِ قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّهُ يَوْمٌ تُعَظِّمُهُ الْيَهُودُ وَالنَّصَارَى . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " فَإِذَا كَانَ الْعَامُ الْمُقْبِلُ صُمْنَا يَوْمَ التَّاسِعِ " . فَلَمْ يَأْتِ الْعَامُ الْمُقْبِلُ حَتَّى تُوُفِّيَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم .
‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন নিজে আশূরার দিন সওম রাখলেন এবং আমাদেরকেও এ সওম পালনের নির্দেশ দেন, তখন লোকেরা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! ইয়াহুদী ও খৃষ্টানরা এ দিনটিকে সম্মান করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আগামী বছর এলে আমরা নবম দিনও সওম পালন করবো। কিন্ত আগামী বছর না আসতেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইনতিকাল করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1134)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله المصري، ويحيي بن أيوب: هو الغافقي المصري، وأبو غَطَفَان: هو ابن طَريف المُري. وأخرجه مسلم (١١٣٤) من طريق سعيد بن الحكم بن أبي مريم، عن يحيي بن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم أيضاً (١١٣٤) من طريق عبد الله بن عُمَير، عن ابن عباس مرفوعاً بلفظ: "لأصومن التاسع". وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، - يَعْنِي ابْنَ سَعِيدٍ - عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ غَلاَبٍ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، أَخْبَرَنِي حَاجِبُ بْنُ عُمَرَ، - جَمِيعًا الْمَعْنَى - عَنِ الْحَكَمِ بْنِ الأَعْرَجِ، قَالَ أَتَيْتُ ابْنَ عَبَّاسٍ وَهُوَ مُتَوَسِّدٌ رِدَاءَهُ فِي الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ فَسَأَلْتُهُ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَاشُورَاءَ فَقَالَ إِذَا رَأَيْتَ هِلاَلَ الْمُحَرَّمِ فَاعْدُدْ فَإِذَا كَانَ يَوْمُ التَّاسِعِ فَأَصْبِحْ صَائِمًا . فَقُلْتُ كَذَا كَانَ مُحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ فَقَالَ كَذَلِكَ كَانَ مُحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ .
আল-হাকাম ইবনু আ‘রাজ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট এলাম। এ সময় তিনি মাসজিদুল হারামে তার চাঁদরে হেলান দেয়া অবস্থায় ছিলেন। আমি তাকে আশূরার সওম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, যখন তুমি মুহাররমের নতুন চাঁদ দেখবে, তখন থেকে গণনা করতে থাকবে। এভাবে যখন নবম দিন আসবে তখন সওম অবস্থায় ভোর করবে। আমি জিজ্ঞেস করলাম, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এভাবে সওম রাখতেন? তিনি বলেন, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবেই সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1133)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مسرهد الأسَدي، ويحيى بن سعيد: هو القطان، ومعاوية بن غَلَاب: هو معاوية بن عمرو بن خالد بن غَلَاب، وإسماعيل: هو ابن إبراهيم الأسدي، والحكم بن الأعرج: هو الحكم بن عبد الله بن إسحاق البصري. وأخرجه مسلم (١١٣٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٧٢) من طريق يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٣٣)، والترمذي (٧٦٤) من طريق وكيع بن الجراح، عن حاجب بن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٣٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٣٣). وانظر ما قبله. قال ابن القيم في "تهذيب السنن ": والصحيح أن المراد صوم التاسع مع العاشر لا نقل اليوم لما روى أحمد في "مسنده" (٢١٥٤) من حديث ابن عباس يرفعه إلى النبيَّ ﷺ قال: "خالفوا اليهود صوموا يوماً قبله أو يوماً بعده". وقال عطاء عن ابن عباس: "صوموا التاسع والعاشر، وخالفوا اليهود" ذكره البيهقي، وهو يبين أن قول ابن عباس: إذا رأيت هلال المحرم فاعدد، فإذا كان يوم التاسع فأصبح صائماً، أنه ليس المراد به: أن عاشوراء هو التاسع، بل أمره أن يصوم اليوم التاسع قبل عاشوراء.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمِنْهَالِ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ مَسْلَمَةَ، عَنْ عَمِّهِ، أَنَّ أَسْلَمَ، أَتَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " صُمْتُمْ يَوْمَكُمْ هَذَا " . قَالُوا لاَ . قَالَ " فَأَتِمُّوا بَقِيَّةَ يَوْمِكُمْ وَاقْضُوهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ يَعْنِي يَوْمَ عَاشُورَاءَ .
‘আব্দুর রহমান ইবনু মাসলামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার চাচা হতে বর্ণিত, একদা আসলাম গোত্রের লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আগমন করলে তিনি বললেনঃ তোমরা কি তোমাদের এই দিনে সওম রেখেছো? তারা বললো, না। তিনি বললেনঃ দিনের বাকী অংশটুকু (পানাহার না করে) পূর্ণ করো এবং এদিনের সওম ক্বাযা করে নাও। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অর্থাৎ আশূরার দিন। [২৪৪৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبد الرحمٰن بن مسلمۃ مجہول ، انظر التحریر (3884) لم یوثقہ غیر ابن حبان ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره دون قوله: "فاقضوه" فإنها زيادة تفرد بها عبد الرحمن ابن مسلمة -ويقال: ابن سلمة- الخزاعي، وهو مجهول. سعيد: هو ابن أبي عروبة، وقتادة: هو ابن دعامة السدوسي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٨٦٤) و (٢٨٦٥) من طريق سعيد، بهذا الإسناد. دون قوله: "واقضوه". وأخرجه النسائى أيضاً (٢٨٦٣) من طريق شعبة، عن قتادة، به. دون قوله: "واقضوه". وهو في "مسند أحمد" (٢٣٤٧٥). وله شاهد من حديث هند بن أسماء عند أحمد في "مسنده" (١٥٩٦٢). وانظر تتمة شواهده والكلام عليه في "المسند".
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَمُسَدَّدٌ، - وَالإِخْبَارُ فِي حَدِيثِ أَحْمَدَ - قَالُوا حَدَّثَنَا سُفْيَانُ قَالَ سَمِعْتُ عَمْرًا قَالَ أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ أَوْسٍ سَمِعَهُ مِنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو قَالَ قَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَحَبُّ الصِّيَامِ إِلَى اللَّهِ تَعَالَى صِيَامُ دَاوُدَ وَأَحَبُّ الصَّلاَةِ إِلَى اللَّهِ صَلاَةُ دَاوُدَ كَانَ يَنَامُ نِصْفَهُ وَيَقُومُ ثُلُثَهُ وَيَنَامُ سُدُسَهُ وَكَانَ يُفْطِرُ يَوْمًا وَيَصُومُ يَوْمًا " .
‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেনঃ আল্লাহর নিকট সর্বোত্তম সওম হলো দাঊদ (আঃ) -এর সওম এবং আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় সলাত হলো দাঊদ (আঃ) -এর সলাত। তিনি রাতের অর্ধেক অংশ ঘুমাতেন এবং এক-তৃতীয়াংশ ক্বিয়াম করতেন। আবার এক ষষ্ঠমাংশ ঘুমাতেন। আর তিনি একদিন সওম ত্যাগ করতেন এবং একদিন সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1131) صحیح مسلم (1159)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمد بن عيسى: هو ابن نَجِيح البغدادي، ومُسدَّد: هو ابنُ مسرهد الأسَدي، وسفيان: هو ابن عيينة، وعمرو: هو ابن دينار المكي. وأخرجه البخاري (١١٣١) و (٣٤٢٠)، ومسلم (١١٥٩)، وابن ماجه (١٧١٢)، والنسائي في "الكبرى" (١٣٢٩) و (٢٦٦٥) من طرق عن سفيان بن عيينة، ومسلم (١١٥٩) من طريق ابن جريج، كلاهما عن عمرو بن دينار، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١١٥٣) و (١٩٧٤ - ١٩٨٠) و (٣٤١٨ - ٣٤٢٠) و (٥٠٥٢) و (٦١٣٤) و (٦٢٧٧)، ومسلم (١١٥٩)، والترمذي (٧٨٠)، والنسائي (٢٧٠٩ - ٢٧٢٤) من طرق عن عبد الله بن عمرو بن العاص. واقتصروا جميعاً في رواياتهم على ذكر صوم داود دون صلاته، وعندهم أن هذا الحديث ضمن قصة لعبد الله بن عمرو نفسه. وهو في "مسند أحمد" (٦٤٩١)، و"صحيح ابن حبان" (٢٥٩٠). وانظر ما سلف برقم (٢٤٢٥) و (٢٤٢٧).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ أَنَسٍ، أَخِي مُحَمَّدٍ عَنِ ابْنِ مِلْحَانَ الْقَيْسِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُنَا أَنْ نَصُومَ الْبِيضَ ثَلاَثَ عَشْرَةَ وَأَرْبَعَ عَشْرَةَ وَخَمْسَ عَشْرَةَ . قَالَ وَقَالَ " هُنَّ كَهَيْئَةِ الدَّهْرِ " .
ইবনু মিলহান আল-ক্বায়সী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আইয়ামে বীয অর্থৎ চাদেঁর ১৩, ১৪ ও ১৫ তারিখে সওম পালনে আমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ এগুলো সারা বছর সওম রাখার সমতুল্য।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (2432-2434) ابن ماجہ (1707) ، ابن ملحان: عبدالملک بن قتادۃ مستور،لم یوثقہ غیر ابن حبان ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة ابن مِلحَان القَيْسِيُّ -وهو عبد الملك بن قتادة-. محمد بن كثير: هو العَبْدي، وهمام: هو ابن يحيى العَوْذي، وأنس: هو ابن سيرين الأنصاري. وأخرجه ابن ماجه (١٧٠٧ م)، والنسائي في "الكبرى" (٢٧٥٢) من طريق همام، بهذا الإسناد. ورواية النسائي دون قوله: "هن كهيئة الدهر". وأخطأ شعبة في تسمية ابن مِلحَان القيسي كما أخرجه عند ابن ماجه (١٧٠٧) فقال: عن أنس، عن عبد الملك بن المِنهال، وعند النسائي في "الكبرى" (٢٧٥٠) قال: عن أنس، عن عبد الملك. ولم يُسمِّه، و (٢٧٥١) قال: عن أنس، عن ابن أبي المِنهَال، والصواب كما أسلفنا أنه: عبد الملك بن قتادة. والله أعلم. وهو في "مسند أحمد" (١٧٥١٤)، وفي "صحيح ابن حبان" (٣٦٥١). ويشهد له حديث قُرّة بن إياس عند أحمد في "مسنده" (١٥٥٨٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٥٢). وإسناده صحيح. وآخر عند أبي ذرّ عند أحمد (٢١٣٠١)، وابن ماجه (١٧٠٨)، والترمذي (٧٧٢). ورجاله ثقات لكن فيه انقطاع. وثالث عن جرير بن عبد الله عند النسائي في "الكبرى" (٢٧٤١). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب " ٢/ ١٢٤. وفي الحث على صيام ثلاثة أيام من كل شهر أيضاً شواهد انظرها في "المسند" (١٧٥١٣). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا أَبُو كَامِلٍ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، حَدَّثَنَا شَيْبَانُ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنْ زِرٍّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ - يَعْنِي مِنْ غُرَّةِ كُلِّ شَهْرٍ - ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ .
‘আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি মাসের প্রথম দিকে তিনদিন সওম পালন করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2058) ، أخرجہ الترمذي (742 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل عاصم -وهو ابن أبي النَّجُود- فإنه حسن الحديث. أبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي، وشيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي المؤدب، وزر: هو ابن حُبيش، وعبد الله: هو ابن مسعود. وهو عند أبي داود الطيالسي في "مسنده" (٣٦٠) ومن طريقه أخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٧٧١)، وأخرجه الترمذي (٧٥٢) من طريق طلق بن غنام، كلاهما عن شيبان، بهذا الإسناد. وزاد الترمذي والنسائى: وقَلَّما كان يفطر يوم الجمعة، وقال الترمذي: حديث حسن غريب. وأخرجه النسائي (٢٦٨٩) من طريق أبي حمزة، عن عاصم، به. وزاد: وقلما يفطر يوم الجمعة. وهذه الزيادة أخرجها الطيالسي منفصلة برقم (٣٥٩)، ومن طريقه ابن ماجه (١٧٢٥). وهو في "مسند أحمد" (٣٨٦٠)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٤١) و (٣٦٤٥).
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ بَهْدَلَةَ، عَنْ سَوَاءٍ الْخُزَاعِيِّ، عَنْ حَفْصَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ مِنَ الشَّهْرِ الاِثْنَيْنِ وَالْخَمِيسِ وَالاِثْنَيْنِ مِنَ الْجُمُعَةِ الأُخْرَى .
হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি মাসে তিন দিন সওম রাখতেনঃ (প্রথম সপ্তাহে) সোমবার ও বৃহস্পতিবার এবং দ্বিতীয় সপ্তাহে সোমবার।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (2368 وسندہ حسن) سواء الخزاعي وثقہ ابن حبان وابن خزیمۃ بتصحیح حدیثہ فھو حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة حال سَوَاء الخُزاعي، ثم إن الإسناد منقطع بين عاصم -وهو ابن أبي النجود- وسَوَاء الخزاعي، بينهما المسيب بن رافع، أو معبد بن خالد، وعاصم بن أبي النَّجود تكلموا في حفظه، وقد اضطرب، وانظر تمام ذلك كما بيناه في "مسند أحمد" برقم (٢٦٤٦٠). حماد: هو ابن سلمة البصري. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٦٨٧) من طريق النضر بن شُميل، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي أيضاً (٢٨٠٠) من طريق زائدة، عن عاصم، عن المسيّب، عن حفصة، به. مختصراً بلفظ: كان رسول الله ﷺ يصوم الاثنين والخميس. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٦٠) و (٢٦٤٦١).
حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ هُنَيْدَةَ الْخُزَاعِيِّ، عَنْ أُمِّهِ، قَالَتْ دَخَلْتُ عَلَى أُمِّ سَلَمَةَ فَسَأَلْتُهَا عَنِ الصِّيَامِ فَقَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُنِي أَنْ أَصُومَ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ أَوَّلُهَا الاِثْنَيْنِ وَالْخَمِيسِ .
হুনাইদাহ আল-খুযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার মা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর কাছে গিয়ে সওম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে প্রতি মাসে তিন দিন সওম পালনের নির্দেশ দিতেন। মাসের প্রথম সপ্তাহের সোমবার ও বৃহস্পতিবার এবং (দ্বিতীয় সপ্তাহের) বৃহস্পতিবার। [২৪৫২]
মুনকারঃ মিশকাত (২০৬০)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: منكر
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2060)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث ضعيف لاضطرابه كما سلف برقم (٢٤٣٧). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٧٤٠) من طريق محمد بن فضيل، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٨٠).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، عَنْ يَزِيدَ الرِّشْكِ، عَنْ مُعَاذَةَ، قَالَتْ قُلْتُ لِعَائِشَةَ أَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ قَالَتْ نَعَمْ . قُلْتُ مِنْ أَىِّ شَهْرٍ كَانَ يَصُومُ قَالَتْ مَا كَانَ يُبَالِي مِنْ أَىِّ أَيَّامِ الشَّهْرِ كَانَ يَصُومُ .
মু‘আযাহ (রাহঃ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -কে জিজ্ঞেস করি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি প্রত্যেক মাসে তিন দিন সওম পালন করতেন? তিনি বললেন, হ্যাঁ। আমি জিজ্ঞেস করি , মাসের কোন্ কোন্ দিনে সওম রাখতেন? তিনি বললেন, তিনি নির্দিধায় যে কোন তিন দিন সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1160)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مُسَرهَد الأسدي ، وعبد الوارث: هو ابن سعيد، ويزيد الرّشك -والرشك: القسَّام بلغة أهل البصرة-: هو يزيد بن أبي يزيد الضُّبَعي مولاهم، ومُعَاذَة: هي بنت عبد الله العدوية. وأخرجه مسلم (١١٦٠) من طريق عبد الوارث، وابن ماجه (١٧٠٩)، والترمذي (٧٧٣) من طريق شعبة، كلاهما عن يزيد الرِّشْك، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥١٢٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٥٤) و (٣٦٥٧).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي ابْنُ لَهِيعَةَ، وَيَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرِ بْنِ حَزْمٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ حَفْصَةَ، زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ لَمْ يُجْمِعِ الصِّيَامَ قَبْلَ الْفَجْرِ فَلاَ صِيَامَ لَهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ اللَّيْثُ وَإِسْحَاقُ بْنُ حَازِمٍ أَيْضًا جَمِيعًا عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ مِثْلَهُ وَوَقَفَهُ عَلَى حَفْصَةَ مَعْمَرٌ وَالزُّبَيْدِيُّ وَابْنُ عُيَيْنَةَ وَيُونُسُ الأَيْلِيُّ كُلُّهُمْ عَنِ الزُّهْرِيِّ .
নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি ফাজরের পূর্বে সওমের নিয়্যাত করেনি তার সওম হয়নি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (730) نسائی (2333) ابن ماجہ (1700) ، ابن شھاب الزھري مدلس وعنعن ، و الموقوف صحیح ، انظر سنن النسائي (2338،2345) ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح. ورواية ابن وهب عن ابن لهيعة -وهو عبد الله الحضرمي- قوية، ثم هو متابع، وباقي رجاله ثقات، إلا أنه قد اختلف في رفعه ووقفه، ورجَّح وقفه الأئمة أبو حاتم والبخاري والترمذي والنسائي وغيرهم، وعمل بظاهر الإسناد جماعة من الأئمة، فصحَّحوا الحديث، منهم ابن خزيمة وابن حبان والدارقطني والخطابي والحاكم وابن حزم والبيهقي وابن العربي، وروى له الدارقطني طريقا آخر (٢٢١٣) وقال: رجالها ثقات. أحمد بن صالح: هو المِصْريُّ، ويحيى بن أيوب: هو الغافقي، وابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري. وأخرجه الترمذي (٧٣٩) من طريق سعيد بن الحكم بن أبي مريم، والنسائي في "الكبرى" (٢٦٥٢) و (٢٦٥٣) من طريق الليث بن سعد، كلاهما عن يحيى بن أيوب وحده، بهذا الإسناد. ولم يذكر النسائي في الموضع الأول ابن شهاب الزهري. وأخرجه النسائي (٢٦٥٤) من طريق أشهب بن عبد العزيز، وابن ماجه (١٧٠٠) من طريق إسحاق بن حازم، كلاهما، عن عبد الله بن أبي بكر، به. وسقط من إسناد ابن ماجه اسم الزهري. وأخرجه النسائي (٢٦٥٥) من طريق ابن جريج، عن ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٦٥٦) من طريق عُبيد الله بن عمر، و (٢٦٥٧) من طريق يونس، و (٢٦٥٨) من طريق معمر، ثلاثتهم عن ابن شهاب، به. موقوفاً وأخرجه موقوفاً كذلك النسائي (٢٦٥٩) من طريق سفيان بن عيينة، ومعمر، عن الزهري، عن حمزة بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، عن حفصة. وأخرجه موقوفاً أيضاً النسائي (٢٦٦٠) و (٢٦٦١) من طريق سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن حمزة بن عبد الله، عن حفصة. وأخرجه النسائي أيضاً (٢٦٦٢) من طريق مالك، عن ابن شهاب، عن عائشة وحفصة، به. موقوفاً. وأخرجه مالك في "الموطأ" ١/ ٢٨٨، ومن طريقه النسائي (٢٦٦٣)، والبيهقي في "الكبرى" ٦/ ٢٢٧ - ٢٢٨ عن نافع، عن ابن عمر قوله. وتابع مالكاً عُبيد الله بن عمر العمري عند النسائي (٢٦٦٤)، وموسى بن عقبة عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ٥٥، كلاهما عن نافع، عن ابن عمر قوله. وقد بسطنا الكلام عليه في "مسند أحمد" (٢٦٤٥٧)، فانظره. قال الخطابي: معنى الإجماع أو إحكام النية والعزيمة، يقال: أجمعت الرأي وأزمعت بمعنى واحد، وفيه بيان "أن من تأخرت نيته للصوم عن أول وقته فإن صومه فاسد، وقال أصحاب الرأي: إذا نوى الفرض قبل زوال الشمس أجزأه، وقالوا في صوم النذر والكفارة والقضاء: إن عليه تقديم النية قبل الفجر، وقال صاحب "المغني" ٤/ ٣٣٧: وتعتبر النية لكل يوم، وهو مذهب أبي حنيفة والشافعي وأحمد وابن المنذر، وعن أحمد: أنه تجزئه نية واحدة لجميع الشهر إذا نوى صوم جميعه، وهو مذهب مالك وإسحاق.