হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (2541)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ خَالِدٍ أَبُو مَرْوَانَ، وَابْنُ الْمُصَفَّى، قَالاَ حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ، عَنِ ابْنِ ثَوْبَانَ، عَنْ أَبِيهِ، يَرُدُّ إِلَى مَكْحُولٍ إِلَى مَالِكِ بْنِ يُخَامِرَ أَنَّ مُعَاذَ بْنَ جَبَلٍ، حَدَّثَهُمْ أَنَّهُ، سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏:‏ ‏"‏ مَنْ قَاتَلَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فُوَاقَ نَاقَةٍ فَقَدْ وَجَبَتْ لَهُ الْجَنَّةُ، وَمَنْ سَأَلَ اللَّهَ الْقَتْلَ مِنْ نَفْسِهِ صَادِقًا ثُمَّ مَاتَ أَوْ قُتِلَ فَإِنَّ لَهُ أَجْرَ شَهِيدٍ ‏"‏ ‏.‏ زَادَ ابْنُ الْمُصَفَّى مِنْ هُنَا ‏:‏ ‏"‏ وَمَنْ جُرِحَ جُرْحًا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوْ نُكِبَ نَكْبَةً فَإِنَّهَا تَجِيءُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ كَأَغْزَرِ مَا كَانَتْ، لَوْنُهَا لَوْنُ الزَّعْفَرَانِ، وَرِيحُهَا رِيحُ الْمِسْكِ، وَمَنْ خَرَجَ بِهِ خُرَاجٌ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَإِنَّ عَلَيْهِ طَابَعَ الشُّهَدَاءِ ‏"‏ ‏.‏




মু’আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছেন, যে ব্যক্তি উষ্ট্রির দুধ দুইবার দোহনের মধ্যবর্তী সময়টুকু আল্লাহর পথে জিহাদ করে তার জন্য জান্নাত ওয়াজীব। যে ব্যক্তি দৃঢ় প্রত্যয় নিয়ে আল্লাহর কাছে শাহাদাতের প্রার্থনা করে, অতঃপর (নিজ ঘরেই) মারা যায় অথবা নিহত হয়, তার জন্য শহীদের সওয়াব রয়েছে। (মধ্যবর্তী বর্ননাকারী) ইবনুল মুসান্না এরপর আরো বর্ননা করেনঃ যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (যুদ্ধে) আহত হয় কিংবা কোন বিপদে পতিত হয়, ক্বিয়ামাতের দিন তার এ যখমের স্থান পুর্বের মত তাজা থাকবে এবং এর রং হবে জা’ফরানের রংয়ের মত আর এর ঘ্রান হবে কস্তরীর ঘ্রানের অনুরুপ। মহান আল্লাহর পথে যার শরীরে কোন ফোড়া উঠে, তাতে শহীদের সীলমোহর অংকিত হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3825) ، رواہ الترمذي (1657 وسندہ صحیح) والنسائي (3143 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف بقية بن الوليد، ثم هو يدلس تدليس التسوية، وأسقط من إسناده كثير بن مرة الحضرمي بين مكحول ومالك بن يخامر، وقد قال الذهبي في "أسير أعلام النبلاء" ٥/ ١٥٦ في ترجمة مكحول: روى مكحول عن طائفة من قدماء التابعين، ما أحسبه لقيهم، وذكر منهم مالك بن يخامر. وما حسِبَه الذهبي قد تحقق، فقد أخرج أحمد (٢٢١١٠)، وابن حبان (٣١٩١) و (٤٦١٨) هذا الحديث من طريق آخر عن ابن ثوبان -وهو عبد الرحمن بن ثابت- عن أبيه، عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن مالك بن يخامر، عن معاذ بن جبل، وإسناده حسن لأن ابن ثوبان صدوق حسن الحديث، وقد توبع. وأخرجه ابن ماجه (٢٧٩٢)، والترمذي (١٧٥١)، والنسائي (٣١٤١) من طريق سليمان بن موسى الأشدق، عن مالك بن يخامر، عن معاذ بن جبل، وهذا إسناد صحيح، وما ذكره ابن معين من كون رواية سليمان بن موسى عن مالك بن يخامر مرسلة، وموافقة المزي له، مدفوع بتصريح سليمان بسماعه من مالك بن يخامر في هذا الحديث عند ابن ماجه والنسائي. وقد اقتصر الترمذي في روايته على القطعة الأولى والثالثة من الحديث، واقتصر ابن ماجه على القطعة الأولى منه. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٠١٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣١٨٥) ورواية ابن حبان مختصرة. قوله: "فُواق" قال الخطابي: هو ما بين الحَلْبَتَين، وقيل: هو ما بين الشُخْبَين. والشُّخبان ما يخرج من اللبن. وقوله: "خُرَاج" قال العظيم آبادي: بضم الخاء المعجمة وتخفيف الراء (بزنة غراب) ما يخرج في البدن من القروح والدماميل.









সুনান আবী দাউদ (2542)


حَدَّثَنَا أَبُو تَوْبَةَ، عَنِ الْهَيْثَمِ بْنِ حُمَيْدٍ، ح وَحَدَّثَنَا خُشَيْشُ بْنُ أَصْرَمَ، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، جَمِيعًا عَنْ ثَوْرِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ نَصْرٍ الْكِنَانِيِّ، عَنْ رَجُلٍوَقَالَ أَبُو تَوْبَةَ ‏:‏ عَنْ ثَوْرِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ شَيْخٍ، مِنْ بَنِي سُلَيْمٍ عَنْ عُتْبَةَ بْنِ عَبْدٍ السُّلَمِيِّ، - وَهَذَا لَفْظُهُ - أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏:‏ ‏ "‏ لاَ تَقُصُّوا نَوَاصِيَ الْخَيْلِ وَلاَ مَعَارِفَهَا وَلاَ أَذْنَابَهَا، فَإِنَّ أَذْنَابَهَا مَذَابُّهَا، وَمَعَارِفَهَا دِفَاؤُهَا، وَنَوَاصِيهَا مَعْقُودٌ فِيهَا الْخَيْرُ ‏"‏ ‏.‏




‘উতবাহ ইবনু আবদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছেন, তোমরা ঘোড়ার কপালের, ঘাড়ের ও লেজের চুল কাটবে না। কেননা এর লেজ মাছি তাড়ানোর জন্য, ঘাড়ের চুল শীত নিবারনের জন্য এবং কপালের চুলে কল্যাণের প্রতীক।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، رجل أو رجال من بني سلیم لم أعرفھم،ونصر الکناني مجہول (تق: 7116) ، ولبعض الحدیث شواہد صحیحۃ ، (انوار الصحیفہ ص 93)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لاضطرابه، فقد اختُلف فيه على ثور بن يزيد كما سيأتي. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، ونصر الكناني: هو ابن عبد الرحمن. وأخرجه البيهقي ٦/ ٣٣١ من طريق أبي عاصم النبيل، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (١٧٦٤٠) عن عبد الله بن الحارث المخزومي، عن ثور بن يزيد، عن نصر، عن رجل من بني سليم، عن عتبة بن عبد، فأطلق اسم نصر ولم يبينه. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ١٧/ (٣١٩)، وفي "الشاميين" (٤٥٥) من طريق عبد الملك بن الصباح، عن ثور، عن نصر بن شفي، عن شيخ من بني سيم، عن عتبة. فسماه نصر بن شفي. وإنما هو النضر بن شفي، بالضاد المعجمة، قال ابن القطان: مجهول جداً. وأخرجه أبو عوانة (٧٢٩٢) من طريق عمرو بن الحصين، عن ابن علاثة، والطبراني في "مسند الشاميين" (٤٦٧) من طريق جبارة بن مغلس، عن مندل بن علي، كلاهما (ابن علاثة ومندل) عن ثور، عن نصر بن علقمة، عن عتبة. وعمرو بن الحصين متروك، وجبارة ومندل ضعيفان. وقد أخطؤوا في الرواية، فجعلوا الحديث لنصر بن علقمة الثقة. وأخرجه أبو عوانة (٧٢٩٠)، والبيهقي ٦/ ٣٣١ من طريق الهيثم بن حميد، و (٧٢٩١) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن ثور بن يزيد، عن شيخ -زاد الهيثم: من بني سليم- ، عن عتبة. وأخرجه أحمد (١٧٦٤٣) من طريق بقية بن الوليد، عن نصر بن علقمة، عن رجال من بني سليم، عن عتبة. فسماه بقية نصر بن علقمة، وهذا هو الحضرمي وهو ثقة، ويغلب على الظن أن بقية قد أخطأ في تعيينه، ثم إن بقية نفسه ضعيف. ولقوله: "ونواصيها معقود فيها الخير" شواهد صحيحة ذكرناها عند الحديث (٢٥٣٢). قوله: "معارفها" أي: شعر عُنقها جمع عَرف على غير قياس، وقيل: هي جمع مَعرفة، وهي المحل الذي ينبت عليه العرف، فأطلق على الأعراف مجازاً. وقوله: "أذنابها مذابُّها" أي: مراوحها تذب بها الهوام عن نفسها. وقوله: "معارفها دفاؤها" أي: كساؤها التي تَدَفّأ بها. قاله السهارنفوري.









সুনান আবী দাউদ (2543)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ سَعِيدٍ الطَّالْقَانِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُهَاجِرِ الأَنْصَارِيُّ، حَدَّثَنِي عَقِيلُ بْنُ شَبِيبٍ، عَنْ أَبِي وَهْبٍ الْجُشَمِيِّ، - وَكَانَتْ لَهُ صُحْبَةٌ - قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏:‏ ‏ "‏ عَلَيْكُمْ بِكُلِّ كُمَيْتٍ أَغَرَّ مُحَجَّلٍ، أَوْ أَشْقَرَ أَغَرَّ مُحَجَّلٍ، أَوْ أَدْهَمَ أَغَرَّ مُحَجَّلٍ ‏"‏ ‏.‏




আবূ ওয়াহব আল-জুশামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, তোমাদের অবশ্যই এমন ঘোড়া থাকা উচিৎ যা লাল কালো মিশ্রিত, সাদা কপাল ও সাদা পা বিশিষ্ট অথবা গাড় লাল বর্নের এবং সাদা কপাল ও সাদা পা বিশিষ্ট কিংবা সাদা-কালো মিশ্রিত, সাদা কপাল ও সাদা পা বিশিষ্ট।



দুর্বলঃ মিশকাত (৩৮৭৮)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (3595) ، عقیل بن شبیب مجہول (تق: 4660) ، ولبعض الحدیث شاہد حسن عند الترمذي (1696،1697) و ابن ماجہ (2789) ، (انوار الصحیفہ ص 93)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة عقيل بن شبيب، قال الذهبي في "الميزان": لا يعرف. وأخرجه النسائي (٣٥٦٥) من طريق هشام بن سعيد الطالقاني، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٩٠٣٢). الكُميتُ: هو الفرس في لونه حُمرة، والأغرّ: الذي في جبهته بياض. والمُحجَّل: الذي في قوائمه كلها أو ثلاث منها بياض، والأدهم: الأسود اللون.









সুনান আবী দাউদ (2544)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَوْفٍ الطَّائِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو الْمُغِيرَةِ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُهَاجِرٍ، حَدَّثَنَا عَقِيلُ بْنُ شَبِيبٍ، عَنْ أَبِي وَهْبٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏:‏ ‏ "‏ عَلَيْكُمْ بِكُلِّ أَشْقَرَ أَغَرَّ مُحَجَّلٍ، أَوْ كُمَيْتٍ أَغَرَّ ‏"‏ ‏.‏ فَذَكَرَ نَحْوَهُ ‏.‏ قَالَ مُحَمَّدٌ - يَعْنِي ابْنَ مُهَاجِرٍ - سَأَلْتُهُ ‏:‏ لِمَ فَضَّلَ الأَشْقَرَ قَالَ ‏:‏ لأَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعَثَ سَرِيَّةً فَكَانَ أَوَّلَ مَنْ جَاءَ بِالْفَتْحِ صَاحِبُ أَشْقَرَ ‏.‏




আবূ ওয়াহ্ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, তোমাদের অবশ্যই উজ্জ্বল লাল রং এবং সাদা কপাল ও সাদা পা বিশিষ্ট ঘোড়া কিংবা কালো মিশ্রিত লাল রঙয়ের এবং সাদা কপাল ও সাদা পা বিশিষ্ট ঘোড়া থাকা উচিৎ। অতঃপর উপরের হাদীসদের অনুরুপ। মুহাম্মাদ ইবনু মুহাজির বলেন, আমি আকীল ইবনু শাবীবকে জিজ্ঞেস করি, উজ্জ্বল লাল বর্ণকে অগ্রাধিকার দেয়ার কারন কি? তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি অভিযানকারী দল প্রেরন করেছিলেন। সর্বপ্রথম বিজয়ের সংবাদ দাতা ছিল উজ্জ্বল লাল বর্ণের ঘোড়ার সওয়ারী।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (2543) ، (انوار الصحیفہ ص 93، 94)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف كسابقه. أبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجاج الخولاني.









সুনান আবী দাউদ (2545)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا حُسَيْنُ بْنُ مُحَمَّدٍ، عَنْ شَيْبَانَ، عَنْ عِيسَى بْنِ عَلِيٍّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏:‏ ‏ "‏ يُمْنُ الْخَيْلِ فِي شُقْرِهَا ‏"‏ ‏.‏




ঈসা ইবনু ‘আলী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও দাদা ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, লাল বর্নের ঘোড়ায় কল্যান নিহীত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3879)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل عيسى بن علي بن عبد الله بن عباس. شيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي. وأخرجه الترمذي (١٧٩٠) من طريق شيبان بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٥٤).









সুনান আবী দাউদ (2546)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ مَرْوَانَ الرَّقِّيُّ، حَدَّثَنَا مَرْوَانُ بْنُ مُعَاوِيَةَ، عَنْ أَبِي حَيَّانَ التَّيْمِيِّ، حَدَّثَنَا أَبُو زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، ‏:‏ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُسَمِّي الأُنْثَى مِنَ الْخَيْلِ فَرَسًا ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদী ঘোড়াকে ফার্স নামে আখ্যায়িত করতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مروان بن معاویۃ الفزاري صرح بالسماع عند الحاکم (2/144) والبیھقي




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل موسى بن مروان الرقي. أبو حيان: هو يحيي بن سعيد بن حيّان، وأبو زُرعة: هو ابن عَمرو بن جرير بن عبد الله البَجَلي. وأخرجه ابن حبان (٤٦٨٠)، والحاكم ٢/ ١٤٤، والبيهقي ٦/ ٣٣٠ من طريق مروان ابن معاوية، بهذا الإسناد.









সুনান আবী দাউদ (2547)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ سَلْمٍ، - هُوَ ابْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ - عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ ‏:‏ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَكْرَهُ الشِّكَالَ مِنَ الْخَيْلِ ‏.‏ وَالشِّكَالُ ‏:‏ يَكُونُ الْفَرَسُ فِي رِجْلِهِ الْيُمْنَى بَيَاضٌ وَفِي يَدِهِ الْيُسْرَى بَيَاضٌ، أَوْ فِي يَدِهِ الْيُمْنَى وَفِي رِجْلِهِ الْيُسْرَى ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ ‏:‏ أَىْ مُخَالِفٌ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শ্বেতিযুক্ত ঘোড়া অপছন্দ করতেন। শেকাল হল কোন ঘোড়ার পিছনের দিকে ডান পায়ে এবং সামনের দিকে বাম পায়ে সাদা রং হওয়া, অথবা সামনের দিকের ডান পায়ে এবং পিছনের দিকের বাম পায়ে সাদা রং হওয়া।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1875)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن سعيد الثوري، ومحمد بن كثير: هو العَبدي. وأخرجه مسلم (١٨٧٥)، والترمذى (١٧٩٣)، وابن ماجه (٢٧٩٠)، والنسائي (٣٥٦٧) من طريق سفيان الثوري، ومسلم (١٨٧٥)، والنسائي (٣٥٦٦) من طريق شعبة بن الحجاج، كلاهما عن سلم بن عبد الرحمن، به لكن شعبة سمى سَلماً في روايته: عبد الله بن يزيد النخعي، وهو خطأ كما نص عليه الإمام أحمد بإثر الحديث (٩٨٩٤) من"مسنده". وهو في "مسند أحمد" (٧٤٠٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٦٧٧) من طريق سفيان، وهو في "مسند أحمد" (٩٨٩٤) من طريق شعبة. وقد اختُلِفَ في تفسيرِ الشِّكال على أقوال غير هذا القول الذي بإثر هذا الحديث، منها ما قاله أبو عُبيد وجمهورُ أهلِ اللّغة والغريب وهو أن يكون منه ثلاث قوائم مُحجَّلة وواحدة مطلقة تشبيهاً بالشكال الذي تشكل به الخيل، فإنه يكون في ثلاث قوائم غالباً، ولا تكون المطلقة من الأرجل أو المحجلة إلا الرجل، … وقال العلماء: إنما كرهه على صورة المشكول، وقيل: يحتمل أن يكون قد جرَّب ذلك الجنس فلم يكن فيه نجابة. قاله النووي في "شرح مسلم".









সুনান আবী দাউদ (2548)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا مِسْكِينٌ، - يَعْنِي ابْنَ بُكَيْرٍ - حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُهَاجِرٍ، عَنْ رَبِيعَةَ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ أَبِي كَبْشَةَ السَّلُولِيِّ، عَنْ سَهْلِ ابْنِ الْحَنْظَلِيَّةِ، قَالَ ‏:‏ مَرَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِبَعِيرٍ قَدْ لَحِقَ ظَهْرُهُ بِبَطْنِهِ، فَقَالَ ‏:‏ ‏ "‏ اتَّقُوا اللَّهَ فِي هَذِهِ الْبَهَائِمِ الْمُعْجَمَةِ فَارْكَبُوهَا وَكُلُوهَا صَالِحَةً ‏"‏ ‏.‏




সাহল ইবনুল হানযালিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন একটি উটের কাছ দিয়ে যাচ্ছিলেন যে, অনাহারে উটটির পেট পিঠের সাথে লেগে গিয়েছিল। তিনি বললেন, তোমরা এসব বাকশক্তিহীন পশুর ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় কর। সুস্থ সবল পশুর পিঠে আরোহন করবে এবং এদেরকে উত্তমরুপে আহার করাবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3370) ، انظر الحدیث السابق (1629) والآتي (2567)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل مسكين بن بُكير فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. وأخرجه ابن خزيمة (٢٥٤٥) من طريق عبد الله بن محمد النُّفيليُّ، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (١٧٦٢٥)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٠٧٤)، وابن حبان (٥٤٥) و (٣٣٩٤)، والطبراني في "الكبير" (٥٦٢٠)، وفي "مسند الشاميين" (٥٨٤) و (٥٨٥) من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن ربيعة بن يزيد، به. وإسناده صحيح.









সুনান আবী দাউদ (2549)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا مَهْدِيٌّ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي يَعْقُوبَ، عَنِ الْحَسَنِ بْنِ سَعْدٍ، مَوْلَى الْحَسَنِ بْنِ عَلِيٍّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ جَعْفَرٍ، قَالَ ‏:‏ أَرْدَفَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَلْفَهُ ذَاتَ يَوْمٍ فَأَسَرَّ إِلَىَّ حَدِيثًا لاَ أُحَدِّثُ بِهِ أَحَدًا مِنَ النَّاسِ، وَكَانَ أَحَبُّ مَا اسْتَتَرَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لِحَاجَتِهِ هَدَفًا أَوْ حَائِشَ نَخْلٍ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ فَدَخَلَ حَائِطًا لِرَجُلٍ مِنَ الأَنْصَارِ فَإِذَا جَمَلٌ فَلَمَّا رَأَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم حَنَّ وَذَرَفَتْ عَيْنَاهُ، فَأَتَاهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَمَسَحَ ذِفْرَاهُ فَسَكَتَ، فَقَالَ ‏:‏ ‏"‏ مَنْ رَبُّ هَذَا الْجَمَلِ، لِمَنْ هَذَا الْجَمَلُ ‏"‏ ‏.‏ فَجَاءَ فَتًى مِنَ الأَنْصَارِ فَقَالَ ‏:‏ لِي يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ فَقَالَ ‏:‏ ‏"‏ أَفَلاَ تَتَّقِي اللَّهَ فِي هَذِهِ الْبَهِيمَةِ الَّتِي مَلَّكَكَ اللَّهُ إِيَّاهَا، فَإِنَّهُ شَكَى إِلَىَّ أَنَّكَ تُجِيعُهُ وَتُدْئِبُهُ ‏"‏ ‏.‏




‘আব্দুল্লাহ ইবনু জা’ফার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তার খচ্চরের পিঠে তার পিছনে বসালেন। তিনি আমাকে গোপনে কিছু কথা বলে এ মর্মে সতর্ক করে দিলেন যে, আমি যেন কাঊকে তা না বলি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার প্রাকৃতিক প্রয়োজনের সময় গোপনীয়তা রক্ষার্থে উঁচু জায়গা অথবা ঘন খেজুরকুঞ্জ পছন্দ করতেন। তিনি এক আনসারীর খেজুর বাগানে প্রবেশ করলে হঠাৎ একটি উট তার দৃষ্টিগোচর হয়। উটটি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে দেখে কাঁদতে লাগলো এবং তার চোখ দিয়ে অশ্রু গড়িয়ে পড়লো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটটির কাছে গিয়ে এর মাথায় হাত বুলিয়ে আদর করলেন। এতে উটটি কান্না থামালো। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, এ উটের মালিক কে? তিনি আবারো ডাকলেনঃ উটটি কার? এক আনসারি যুবক এসে বললো হে আল্লাহর রাসূল! আমার। তিনি বললেন, আল্লাহ যে তোমাকে এই নিরীহ প্রানীটির মালিক বানালেন, এর অধিকারের ব্যাপারে তুমি কি আল্লাহকে ভয় করনা? উটটি আমার কাছে অভিযোগ করেছে, তুমি একে ক্ষুধার্ত রাখো এবং একে কষ্ট দাও।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح م بجملة الهدف والحائش فقط




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح، صحیح مسلم (342 مختصرًا) ، مشکوۃ المصابیح (344)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مهدي: هو ابن ميمون المِعولي، وابن أبي يعقوب: هو محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب الضبي. وأخرجه مختصراً مسلم (٣٤٢) و (٢٤٢٩)، وابن ماجه (٣٤٠) من طريق مهدي ابن ميمون، بهذا الإسناد. واقتصر مسلم في الموضع الأول وابن ماجه على قصة الاستتار، واقتصر مسلم في الموضع الثاني على قصة الإسرار. وهو بتمامه في "مسند أحمد" (١٧٤٥) و (١٧٥٤). وفي "صحيح ابن حبان" (١٤١١) و (١٤١٢) مختصراً بقصة الاستتار. قال الخطابي: "الهدف": كل ما كان له شخص مرتفع من بناء وغيره، و"الحائش": جماعة النخل الصغار، لا واحد له من لفظه، و "الذِّفْرى" من البعير: مؤخر رأسه، وهو الموضع الذي يعرق مِن قفاه. قال: وقوله: "تُدئبُه": يريد تُكِدُّه وتتعِبُه.









সুনান আবী দাউদ (2550)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ سُمَىٍّ، مَوْلَى أَبِي بَكْرٍ عَنْ أَبِي صَالِحٍ السَّمَّانِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏:‏ ‏"‏ بَيْنَمَا رَجُلٌ يَمْشِي بِطَرِيقٍ فَاشْتَدَّ عَلَيْهِ الْعَطَشُ، فَوَجَدَ بِئْرًا فَنَزَلَ فِيهَا فَشَرِبَ ثُمَّ خَرَجَ فَإِذَا كَلْبٌ يَلْهَثُ يَأْكُلُ الثَّرَى مِنَ الْعَطَشِ، فَقَالَ الرَّجُلُ ‏:‏ لَقَدْ بَلَغَ هَذَا الْكَلْبَ مِنَ الْعَطَشِ مِثْلُ الَّذِي كَانَ بَلَغَنِي، فَنَزَلَ الْبِئْرَ فَمَلأَ خُفَّيْهِ فَأَمْسَكَهُ بِفِيهِ حَتَّى رَقِيَ فَسَقَى الْكَلْبَ، فَشَكَرَ اللَّهُ لَهُ فَغَفَرَ لَهُ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالُوا ‏:‏ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَإِنَّ لَنَا فِي الْبَهَائِمِ لأَجْرًا فَقَالَ ‏:‏ ‏"‏ فِي كُلِّ ذَاتِ كَبِدٍ رَطْبَةٍ أَجْرٌ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, একদা এক লোক রাস্তায় চলতে চলতে পিপাসায় কাতর হয়ে পড়লো। সে একটি কুপ দেখতে পেয়ে তাতে নেমে পানি পান করলো। কুপ থেকে উঠে সে দেখলো, একটি কুকুর হাপাচ্ছে এবং পিপাসায় কাতর হয়ে কাদামাটি চাটছে। সে ভাবলো, আমার যেরুপ পিপাসা পেয়েছিল কুকুরটিরও অনুরুপ পিপাসা পেয়েছে। সে আবার কুপের মধ্যে নামলো এবং পায়ের মোজায় পানি ভরে তা মুখে কামড়ে ধরে উঠে এসে কুকুরটিকে পানি পান করালো। আল্লাহ তার এ কাজে খুশী হয়ে তার সব গুনাহ ক্ষমা করে দিলেন। সাহাবীগণ বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! এসব প্রানীর সেবা করলেও আমাদেরকে সওয়াব দেয়া হবে? তিনি বললেন, প্রতিটি জীবিত প্রানীর সেবার জন্য সওয়াব আছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2363) صحیح مسلم (2244)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "الموطأ" ٢/ ٩٢٩ - ٩٣٠، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٣٦٣)، ومسلم (٢٢٤٤). وهو في "مسند أحمد" (٨٨٧٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥٤٤). وأخرجه بنحوه البخاري (١٧٣) من طريق عبد الله بن دينار، عن أبي صالح، به. لكنه قال فيه: "فشكر الله له فأدخله الجنة"، ولم يذكر قوله: " في كل ذات كبد رطبة أجر". وأخرج البخاري (٣٣٢١)، ومسلم (٢٢٤٥)، واللفظ للبخاري من طريق محمد ابن سيرين، عن أبي هريرة، عن رسول الله ﷺ قال: "غُفر لامرأة مُومِسَة، مرت بكلبٍ على رأس رَكيٍّ يلهث، قال: كاد يقتله العطش، فنزعت خفَّها، فأوثقته بخمارها، فنزعت له من الماء، فغفر لها بذلك". وقرن البخاري بابن سيرين الحسن البصري. فجعلا القصة لامرأة مُومِسة. والركي: هو البئر.









সুনান আবী দাউদ (2551)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ حَمْزَةَ الضَّبِّيِّ، قَالَ سَمِعْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ، قَالَ كُنَّا إِذَا نَزَلْنَا مَنْزِلاً لاَ نُسَبِّحُ حَتَّى نَحُلَّ الرِّحَالَ ‏.‏




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা কোন স্থানে অবতরন করলে বাহনের পিঠ থেকে হাওদা নামিয়ে এর বিশ্রামের ব্যবস্থা না করা পর্যন্ত সলাত আদায় করতাম না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3917)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حمزة الضبي: هو ابن عمرو العائذي، وشعبة: هو ابن الحجاج العتكي. وأخرجه عبد الرزاق (٩٢٦٣) عن عبد الله بن كثير، عن شعبة، به. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (١٣٧٦) من طريق بقية بن الوليد، عن شعبة، عن قتادة، عن أنس. وبقية ضعيف الحديث، ومع ذلك جود إسناده الهيثمي في "مجمع الزوائد" ١٠/ ١٩٠!! قال الخطابي: يريد (قلنا: يعني أنساً) لا نصلي سبحة الضحى حتى تُحطُّ الرَّحالُ ويُجَمَّ المَطيُّ، وكان بعض العلماء يستحب أن لا يَطعَم الراكب إذا نزل المنزل حتى يَعلِفَ الدابة، وأنشدني بعضهم فيما يشبه هذا المعنى: حق المطية أن يُبدا بحاجتها … لا أُطعمُ الضيفَ حتى أَعلِف الفرسا









সুনান আবী দাউদ (2552)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرِو بْنِ حَزْمٍ، عَنْ عَبَّادِ بْنِ تَمِيمٍ، أَنَّ أَبَا بَشِيرٍ الأَنْصَارِيَّ، أَخْبَرَهُ أَنَّهُ، كَانَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي بَعْضِ أَسْفَارِهِ فَأَرْسَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم رَسُولاً - قَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي بَكْرٍ حَسِبْتُ أَنَّهُ قَالَ - وَالنَّاسُ فِي مَبِيتِهِمْ ‏ "‏ لاَ يُبْقَيَنَّ فِي رَقَبَةِ بَعِيرٍ قِلاَدَةٌ مِنْ وَتَرٍ وَلاَ قِلاَدَةٌ إِلاَّ قُطِعَتْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ مَالِكٌ أَرَى أَنَّ ذَلِكَ مِنْ أَجْلِ الْعَيْنِ ‏.




‘আব্বাদ ইবনু তামীম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আবূ বাশীর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জানান যে, তিনি কোন এক সফরে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে ছিলেন। আবূ বাশীর বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন ঘোষক পাঠালেন। (মধ্যবর্তী বর্ননাকারি) আব্দুল্লাহ ইবনু আবূ বাকর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমার ধারণা আব্বাদ বলেছেন যে, লোকজন তখন ঘুমের প্রস্তুতি নিচ্ছিল। (ঘোষক এ মর্মে ঘোষনা দিলেন যে,) উটের গলায় ধনুকের তারের পট্টি এবং সাধারন কোন পট্টি যেন অবশিষ্ট না থাকে, ওগুলো কেটে ফেলো। (বর্ননাকারী) মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমার ধারণা, বদ নজর থেকে বাঁচার জন্য এই পট্টি বাঁধা হত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3005) صحیح مسلم (2115)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٩٣٧، ومن طريقه أخرجه البخاري (٣٠٠٥)، ومسلم (٢١١٥)، والنسائي في "الكبرى" (٨٧٥٧). إلا أن النسائي قال في روايته: عن عباد ابن تميم، أن رجلاً من الأنصار أخبره. ولم يذكر البخاري قول مالك في آخره. وهو في "مسند أحمد" (٢١٨٨٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤٦٩٨). قال الحافظ في "الفتح" ٦/ ١٤٢: قال ابن الجوزي: وفي المراد بالأوتار ثلاثة أقوال: أحدها: أنهم كلانوا يقلدون الإبل أوتار القسي لئلا تصيبها العين بزعمهم، فأمروا بقطعها إعلاماً بأن الأوتار لا ترد من قدر الله شيئاً، وهذا قول مالك. وثانيها: النهي عن ذلك لئلا تختنق الدابة بها عند شدة الركض، ويحكى ذلك عن محمد بن الحسن تلميذ أبي حنيفة، وكلام أبي عُبيد يرجحه، فإنه قال: نهى عن ذلك، لأن الدواب تتأذى بذلك ويضيق عليها نفسُها ورعيها. وربما تعلقت بشجرة فاختنقت أو تعوقت عن السير. ثالها: أنهم كانوا يُعلقون فيها الأجراس، حكلاه الخطابي، قال النووي وغيره: الجمهور على أن النهي للكراهة، وأنها كراهة تنزيه، وقيل: للتحريم، وعن مالك: تختص الكراهة من القلائد بالوتر، ويجوز بغيرها إذا لم يقصد رفع العين. هذا كله في تعليق التمائم وغيرها مما ليس فيه قرآن ونحوه، وأما ما فيه ذكر الله، فلا نهي فيه، فإنه إنما يجعل للتبرك به والتعوذ بأسمائه وذكره، وكذلك لا نهي عما يعلق لأجل الزينة ما لم يبلغ الخيلاء أو السرف.









সুনান আবী দাউদ (2553)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ سَعِيدٍ الطَّالْقَانِيُّ، أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُهَاجِرِ، حَدَّثَنِي عَقِيلُ بْنُ شَبِيبٍ، عَنْ أَبِي وَهْبٍ الْجُشَمِيِّ، - وَكَانَتْ لَهُ صُحْبَةٌ - قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ ارْتَبِطُوا الْخَيْلَ وَامْسَحُوا بِنَوَاصِيهَا وَأَعْجَازِهَا ‏"‏ ‏.‏ أَوْ قَالَ ‏"‏ أَكْفَالِهَا ‏"‏ ‏.‏ ‏"‏ وَقَلِّدُوهَا وَلاَ تُقَلِّدُوهَا الأَوْتَارَ ‏"‏ ‏.‏




আবূ ওয়াহব আল-জুশামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, তোমরা (যুদ্ধের জন্য) ঘোড়া প্রস্তুত রাখবে এবং এর কপালের চুল ও নিতম্বে হাত বুলাবে। অথবা তিনি বলেছেন, এর নিতম্বে হাত বুলাবে এবং গলায় মালা পরাবে, কিন্তু ধনুকের তারের মালা পরাবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیثین السابقین (2543،2544) ، (انوار الصحیفہ ص 94)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة عقيل بن شبيب، قال عنه الذهبي في "الميزان": لا يُعرف. وأخرجه النسائي (٣٥٦٥) من طريق هشام بن سعيد الطالقاني، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٩٠٣٢). قال الخطابي: قوله: "لا تقلدوه الأوتار" يحتمل أن يكون أراد عين الوتر خاصة، دون غيره من السُّيور والخيوط وغيرها، وقيل: معناه: لا تطلبوا عليها الأوتار والذُّحول (جمع ذَحْل، وهو الثأر أو طلب مكافأة بجناية)، ولا تركضوها في درك الثأر، على ما كان من عاداتهم في الجاهلية.









সুনান আবী দাউদ (2554)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ سَالِمٍ، عَنْ أَبِي الْجَرَّاحِ، مَوْلَى أُمِّ حَبِيبَةَ عَنْ أُمِّ حَبِيبَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَصْحَبُ الْمَلاَئِكَةُ رُفْقَةً فِيهَا جَرَسٌ ‏"‏ ‏.‏




উম্মু হাবীবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে দলের পশুর গলায় ঘন্টা থাকে রহমাতের (ফেরেশতা) তাদের সঙ্গী হয় না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث الآتي (2555)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في الشواهد. أبو الجراح مولى أم حبيبة زوج النبي ﷺ روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال العجلي: تابعي ثقة، ووثقه الذهبي في "الكاشف" لكن قال في "الميزان": وثق، وهي عبارة يقولها لمن ذكر في كتاب "الثقات" لابن حبان ولم يؤثر توثيقه عن أحد غيره، فهذا أصح مما جاء في "الكاشف". وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٨٧٦٠) من طريق مالك، عن نافع، به ولفظه: "العير التي فيها الجرس لا تصحبها الملائكة". وهو في "مسند أحمد" (٢٦٧٧٠)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٠٥). قال النووي في شرحه حديث أبي هريرة: "لا تصحب الملائكة رفقة فيها كلب ولا جرس" من "صحيح مسلم": فيه كراهة استصحاب الكلب والجرس في الأسفار، وأن الملائكة لا تصحب رفقة فيها أحدهما، والمراد بالملائكة ملائكة الرحمة والاستغفار لا الحفظة قال: قيل: سبب منافرة الملائكة للجرس أنه شبيه بالنواقيس، أو لأنه من المعاليق المنهي عنها، وقيل: سببه كراهة صوتها، وتؤيده رواية: مزامير الشيطان، وهذا الذي ذكرناه من كراهة الجرس على الإطلاق هو مذهبنا ومذهب مالك وآخرين، وهي كراهة تنزيه، وقال جماعة من متقدمي علماء الشام يكره الجرسُ الكبير دون الصغير. وذهب ابن حبان في "صحيحه" بإثر الحديث (٥٨٤٥) وهو حديث: "إن البيت الذي فيه الصور لا تدخله الملائكة" إلى أنه البيت الذي يوحى فيه على النبي ﷺ قال: إذ محالٌ أن يكون رجلٌ في بيت وفيه صورة من غير أن يكون حافظاه معه، وهما من الملائكة، وكذلك معنى قوله: "لا تصحب الملائكة رفقة فيها كلب أو جرس" يريد به رفقة فيها رسول الله ﷺ، إذ محالٌ أن يخرج الحاجُّ والعمار من أقاصي المدن والأقطار يؤمُّون البيت العتيق على نَعَم وعِيس بأجراس وكلاب ثم لا تصحبها الملائكة وهم وفد الله. وعلق صاحب "بذل المجهود" على قوله: "لا تصحب الملائكة رفقة فيها جرس أو كلب" بقوله: وهذا إذا خليا من المنفعة، وأما ما احتيج إليه منهما، فرخص فيه.









সুনান আবী দাউদ (2555)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا سُهَيْلُ بْنُ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تَصْحَبُ الْمَلاَئِكَةُ رُفْقَةً فِيهَا كَلْبٌ أَوْ جَرَسٌ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, রহমাতের ফেরেশতা তাদের সংগী হয় না যাদের মধ্যে ঘন্টা কিংবা কুকুর থাকে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2113) ، مشکوۃ المصابیح (3924)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. زهير: هو ابن معاوية بن حُديج، وأحمد بن يونس: هو ابن عبد الله بن يونس، فنسب إلى جده هنا، وهو مشهور بنسبته إلى جده. وأخرجه مسلم (٢١١٣)، والترمذي (١٧٩٨) من طريق سهيل بن أبي صالح، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٨٧٥٩) من طريق زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة. لكن ليس فيه ذكر الكلب. وهو في "مسند أحمد" (٧٥٦٦)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٠٣).









সুনান আবী দাউদ (2556)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رَافِعٍ، حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي أُوَيْسٍ، حَدَّثَنِي سُلَيْمَانُ بْنُ بِلاَلٍ، عَنِ الْعَلاَءِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ فِي الْجَرَسِ ‏ "‏ مِزْمَارُ الشَّيْطَانِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, ঘন্টা (নুপুর) শয়তানের বাদ্যযন্ত্র।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو بكر بن أبي أويس اسمه: عبد الحميد بن عبد الله الأصبحي مشهور بكنيته كأبيه وهو أخو إسماعيل. والعلاء بن عبد الرحمن: هو ابن يعقوب مولى الحُرَقة. وأخرجه مسلم (٢١١٣)، والنسائي في "الكبرى" (٨٧٦١) من طريق العلاء بن عبد الرحمن، به. وهو في "مسند أحمد" (٨٧٨٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٠٤).









সুনান আবী দাউদ (2557)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ نُهِيَ عَنْ رُكُوبِ الْجَلاَّلَةِ




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, পায়খানাখোর পশুর পিঠে সওয়ার হতে নিষেধ করা হয়েছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وللحدیث شواھد کثیرۃ انظر الحدیثین الآتین (3785، 3787)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، وعبد الوارث: هو ابن سعيد العنَبري، ومُسَدَّد: هو ابن مُسَرهَد بن مُسَربَل. وأخرجه البيهقي ٥/ ٢٥٤ و ٩/ ٣٣٣ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (٣٧٨٧). قال الخطابي: الجلالة الإبل التي تأكل العَذرة، والجَلة: البعر، كره ﷺ ركوبها، كما نهى عن أكل لحومها، ويقال: إن الإبل إذا اجتلت أنتنَ روائحُها إذا عَرِقَت كما تُنتن لحومُها. وقال في "المجمع": وهذا إذا كان غالب علفها من النجاسة حتى ظهر على لحمها ولبنها وعرلَها فيحرم أكلُها وركوبُها إلا بعد أن تحبس أياماً.









সুনান আবী দাউদ (2558)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي سُرَيْجٍ الرَّازِيُّ، أَخْبَرَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْجَهْمِ، حَدَّثَنَا عَمْرٌو، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي قَيْسٍ - عَنْ أَيُّوبَ السَّخْتِيَانِيِّ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْجَلاَّلَةِ فِي الإِبِلِ أَنْ يُرْكَبَ عَلَيْهَا ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পায়খানাখোর উটে সওয়ার হতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الله بن الجهم وعمرو بن أبي قيس الرازيان. وقد توبعا في الطريق السالفة قبله. وأخرجه الحاكم ٢/ ٣٤ - ٣٥، والبيهقي ٩/ ٣٣٣ من طريق أحمد بن أبي سريج الرازي، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. وسيتكرر برقم (٣٧٨٧).









সুনান আবী দাউদ (2559)


حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، عَنْ أَبِي الأَحْوَصِ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مَيْمُونٍ، عَنْ مُعَاذٍ، قَالَ كُنْتُ رِدْفَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى حِمَارٍ يُقَالُ لَهُ عُفَيْرٌ ‏.




মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উফাইর নামীয় একটি গাধার পিঠে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পিছনে আরোহী ছিলাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح ق لكن ذكر الحمار شاذ




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2856)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الأحوص: هو سلَّام بن سُليم، وأبو إسحاق: هو عمرو ابن عبد الله السَّبيعي. وأخرجه البخاري (٢٨٥٦)، ومسلم (٣٠)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثانى" (١٨٤٣)، والطبراني في "الكبير" ٢٠/ (٢٥٦)، وابن منده في "الإيمان" (١٠٨)، وأبو نعيم في "مستخرجه" (١٣٨)، والبيهقي ١٠/ ٢٥ من طريق أبي الأحوص سلام بن سُليم، بهذا الإسناد. قال الخطابي: وفيه أن الإرداف مباح إذا كانت الدابّة تقوى على ذلك، ولا يضر بها الضرر البين، وتسمية الدوابّ شكل من أشكال العرب وعادة من عاداتها، وكذلك تسمية السلاح وأداة الحرب، وكان سيفه ﷺ يُسمى ذا الفقار، ورايتُه العُقاب، ودرعُه ذات الفضول، وبغلتُه دُلْدُل، وبعض أفراسه السكب وبعضها البحر. وعفير: هو تصغير ترخيم لأعفر، من العفرة، وهي الغبرة ولون التراب، كما قالوا في أسود: سويد، وتصغيره غير مرخم: أعيفر.









সুনান আবী দাউদ (2560)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ دَاوُدَ بْنِ سُفْيَانَ، حَدَّثَنِي يَحْيَى بْنُ حَسَّانَ، أَخْبَرَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ مُوسَى أَبُو دَاوُدَ، حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ سَعْدِ بْنِ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، حَدَّثَنِي خُبَيْبُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَبِيهِ، سُلَيْمَانَ بْنِ سَمُرَةَ عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، أَمَّا بَعْدُ فَإِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم سَمَّى خَيْلَنَا خَيْلَ اللَّهِ إِذَا فَزِعْنَا وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُنَا إِذَا فَزِعْنَا بِالْجَمَاعَةِ وَالصَّبْرِ وَالسَّكِينَةِ وَإِذَا قَاتَلْنَا ‏.‏




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান বর্ণনার পর বললেন, আমরা ভীত হয়ে পড়লে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ঘোড়াকে আল্লাহর ঘোড়া নামে ডাকতেন। আর আমরা ভীত হয়ে পড়লে বা যুদ্ধে লিপ্ত হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সংঘবদ্ধ থাকতে, ধৈর্য ধরতে এবং ধীরস্থির অবলম্বনের আদেশ দিতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، خبیب: مجہول،و جعفر: ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 94)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده مسلسل بالضعفاء والمجاهيل. محمد بن داود وسليمان بن موسى -وهو الزهري- وجعفر بن سعد ضعفاء، وخبيب بن سليمان وأبوه مجهولان. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٧١٠٢) من طريق يحيى بن حسان، بهذا الإسناد. وللسكينة في القتال شاهد من حديث قيس بن عُباد قال: كان أصحاب محمد ﷺ يستحبون خفضَ صوتٍ عند ثلاث: عند القتال، وعند القرآن، وعند الجنائز. أخرجه ابن المبارك في "الزهد" (٢٤٧)، وابن أبي شيبة ٣/ ٢٧٤. وإسناد هذا الأثر صحيح. وقوله: "يا خيل الله اركبي" قال ابن الأثير: هذا على حذف المضاف، أراد: يا فرسان خيل الله اركبي، وهذا من أحسن المجازات وألطفها.