সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا ابْنُ عَوْفٍ، حَدَّثَنَا أَبُو الْيَمَانِ، أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ أَبِي سُفْيَانَ بْنِ أَسِيدِ بْنِ جَارِيَةَ الثَّقَفِيُّ، - وَهُوَ حَلِيفٌ لِبَنِي زُهْرَةَ - وَكَانَ مِنْ أَصْحَابِ أَبِي هُرَيْرَةَ فَذَكَرَ الْحَدِيثَ .
আয-যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাকে ‘আমর ইবনু আবূ সুফিয়ান ইবনু উসাইদ ইবনু জারিয়া আস-সাক্বাফী এ হাদীস জানিয়েছেন। তিনি আবূ হুরায়রার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথী ছিলেন। উল্লেখিত সানাদে তিনি উপরের হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3045)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه. شعيب: هو ابن أبي حمزة، وأبو اليمان: هو الحكم ابن نافع البهراني، وابن عوف: هو محمد بن عوف الحمصي. وأخرجه مطولاً البخاري (٣٠٤٥)، والنسائي في "الكبرى" (٨٧٨٨) من طريق أبي اليمان الحكم بن نافع، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، سَمِعْتُ الْبَرَاءَ، يُحَدِّثُ قَالَ جَعَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى الرُّمَاةِ يَوْمَ أُحُدٍ - وَكَانُوا خَمْسِينَ رَجُلاً - عَبْدَ اللَّهِ بْنَ جُبَيْرٍ وَقَالَ " إِنْ رَأَيْتُمُونَا تَخَطَّفُنَا الطَّيْرُ فَلاَ تَبْرَحُوا مِنْ مَكَانِكُمْ هَذَا حَتَّى أُرْسِلَ إِلَيْكُمْ وَإِنْ رَأَيْتُمُونَا هَزَمْنَا الْقَوْمَ وَأَوْطَأْنَاهُمْ فَلاَ تَبْرَحُوا حَتَّى أُرْسِلَ إِلَيْكُمْ " . قَالَ فَهَزَمَهُمُ اللَّهُ . قَالَ فَأَنَا وَاللَّهِ رَأَيْتُ النِّسَاءَ يَشْتَدِدْنَ عَلَى الْجَبَلِ فَقَالَ أَصْحَابُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ جُبَيْرٍ الْغَنِيمَةَ أَىْ قَوْمِ الْغَنِيمَةَ ظَهَرَ أَصْحَابُكُمْ فَمَا تَنْتَظِرُونَ فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ جُبَيْرٍ أَنَسِيتُمْ مَا قَالَ لَكُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالُوا وَاللَّهِ لَنَأْتِيَنَّ النَّاسَ فَلَنُصِيبَنَّ مِنَ الْغَنِيمَةِ فَأَتَوْهُمْ فَصُرِفَتْ وُجُوهُهُمْ وَأَقْبَلُوا مُنْهَزِمِينَ .
আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুলাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের যুদ্ধের দিন ‘আবদুল্লাহ ইবনু জুবাইরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঞ্চাশজন তীরন্দাজের নেতা নিযুক্ত করলেন। তিনি তাদেরকে সতর্কতামূলক বললেনঃ যদি তোমরা দেখ পাখি আমাদের গোশত ছিঁড়ে খাচ্ছে, তবুও তোমাদের ডেকে না পাঠানো পর্যন্ত তোমরা এ স্থান ত্যাগ করবে না। আর যদি দেখো, আমরা শত্রুদের পরাজিত করেছি, তবুও ডেকে না পাঠানো পর্যন্ত তোমরা তোমাদের স্থান ত্যাগ করবে না। বর্ণনাকারী বলেন, আল্লাহ মুশরিকদের পর্যুদস্ত করলেন। আল্লাহর শপথ! আমি দেখলাম, শত্রুপক্ষের নারীরা (পালানোর জন্য) পাহাড়ে উঠছে। ‘আবদুল্লাহ ইবনু জুবাইরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথীরা বললো, হে লোকেরা! গণীমাতের মাল সংগ্রহ করো। তোমারদের সাথীরা যুদ্ধে বিজয়ী হয়েছে। এখনও কিসের জন্য অপেক্ষা করছো? একথা শুনে ‘আবদুল্লাহ ইবনু জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ কি তোমরা ভুলে গেছো? তারা বললো, আল্লাহর শপথ! আমরা নিশ্চয়ই যাবো এবং গনীমাত সংগ্রহ করবো। তারা চলে গেলো। ফলে তাদের মুখের উপর মারা হলো এবং তারা পরাজিত হলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3039)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وزهير: هو ابن معاوية الجُعفي. وأخرجه البخاري (٣٠٣٩)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥٨١) و (١١٠١٣) من طريق زهير بن معاوية، والبخاري (٤٠٤٣) من طريق إسرائيل، كلاهما عن أبي إسحاق، به. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥٩٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٣٨). قال الخطابي: قوله: "تخطَفُنا الطير" معناه الهزيمة. يقول: إن رأيتمونا وقد أسرعنا مُولِّين، فاثبتوا أنتم، ولا تبرحوا، والعرب تقول: فلان ساكن الطير: إذا كان ركيناً ثابت الجأش، وقد طار طير فلانٍ: إذا طاش وخفَّ، قال لقيط الإيادي: هو الجلاء الذي يَجتَذُّ أصلكُمُ … إن طار طيرُكم يوماً، وإن وقعا
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سِنَانٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ الزُّبَيْرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ سُلَيْمَانَ بْنِ الْغَسِيلِ، عَنْ حَمْزَةَ بْنِ أَبِي أُسَيْدٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ اصْطَفَفْنَا يَوْمَ بَدْرٍ " إِذَا أَكْثَبُوكُمْ - يَعْنِي إِذَا غَشُوكُمْ - فَارْمُوهُمْ بِالنَّبْلِ وَاسْتَبْقُوا نَبْلَكُمْ " .
হামযাহ ইবনু আবূ উসাইদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি (পিতা) বলেন, আমরা বদর প্রান্তরে সারিবদ্ধ হওয়ার সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ শত্রুসৈন্য তোমাদের নাগালে এসে গেলে তোমরা তীর ছুড়বে এবং কিছু তীর অবশিষ্ট রাখবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3984، 3985)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الرحمن بن سليمان الغسيل: هو عبد الرحمن بن سليمان ابن عبد الله بن حنظلة غسيل الملائكة، وأبو أحمد الزبيري: هو محمد بن عبد الله بن الزبير، مشكور بكنيته. وأخرجه البخاري (٢٩٠٠) و (٣٩٨٤) و (٣٩٨٥) من طريق عبد الرحمن بن سليمان بن الغسيل، به. لكن قرن في الموضع الثاني بحمزة الزبير بن المنذر بن أبي أسيد، وفي الموضع الثالث قرن بحمزة المنذر بن أبي أسيد. قال الحافظ في "الفتح" ٧/ ٣٠٦: قيل: هو عمه، وقيل: هو هو لكن نسب إلى جده، والأول أصوب. قلنا: لم يذكر البخاري في الموضع الأول قوله: "واستبقوا نبلكم". وهو في "مسند أحمد" (١٦٠٦٠). وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "أكثبوكم" معناه: غشوكم، وأصله من الكَثْب، وهو القُرب يقول: إذا دنوا منكم فارموهم، ولا ترمُوهم على بُعد، أي: فإنه يسقط في الأرض فتذهب السهام ولا تحصل نكاية.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، حَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ نَجِيحٍ، - وَلَيْسَ بِالْمَلْطِيِّ - عَنْ مَالِكِ بْنِ حَمْزَةَ بْنِ أَبِي أُسَيْدٍ السَّاعِدِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ بَدْرٍ " إِذَا أَكْثَبُوكُمْ فَارْمُوهُمْ بِالنَّبْلِ وَلاَ تَسُلُّوا السُّيُوفَ حَتَّى يَغْشَوْكُمْ " .
মালিক ইবনু হামযাহ ইবনু আবূ উসাইদ আস- সাইদী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা ও দাদা হতে বর্ণিত, তিনি (দাদা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন বললেনঃ শত্রুরা তীরের নাগালে এসে গেলে তোমাদের ধনুক থেকে তীর ছুড়বে এবং তোমাদের তরবারির কাছাকাছি না আসা পর্যন্ত তরবারি চালাবে না।
দুর্বলঃ মিশকাত (৩৯৫৪)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، إسحاق بن نجیح: کذاب (تحقیقی وعلمی مقالات 5/ 50) ، (انوار الصحیفہ ص 97)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة إسحاق بن نجيح. وهو في معنى ما قبله دون قوله: "ولا تسلوا السيوف حتى يغشوكم".
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ عُمَرَ، أَخْبَرَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ حَارِثَةَ بْنِ مُضَرِّبٍ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ تَقَدَّمَ - يَعْنِي عُتْبَةَ بْنَ رَبِيعَةَ - وَتَبِعَهُ ابْنُهُ وَأَخُوهُ فَنَادَى مَنْ يُبَارِزُ فَانْتَدَبَ لَهُ شَبَابٌ مِنَ الأَنْصَارِ فَقَالَ مَنْ أَنْتُمْ فَأَخْبَرُوهُ فَقَالَ لاَ حَاجَةَ لَنَا فِيكُمْ إِنَّمَا أَرَدْنَا بَنِي عَمِّنَا . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " قُمْ يَا حَمْزَةُ قُمْ يَا عَلِيُّ قُمْ يَا عُبَيْدَةُ بْنَ الْحَارِثِ " . فَأَقْبَلَ حَمْزَةُ إِلَى عُتْبَةَ وَأَقْبَلْتُ إِلَى شَيْبَةَ وَاخْتُلِفَ بَيْنَ عُبَيْدَةَ وَالْوَلِيدِ ضَرْبَتَانِ فَأَثْخَنَ كُلُّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا صَاحِبَهُ ثُمَّ مِلْنَا عَلَى الْوَلِيدِ فَقَتَلْنَاهُ وَاحْتَمَلْنَا عُبَيْدَةَ .
‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, বদরের দিন যুদ্ধের ময়দানে ‘উতবাহ ইবনু রবী’আহ অগ্রসর হলো এবং তার পিছনে তার ছেলে ও তার ভাই আসলো। ‘উতবাহ ডেকে বললো, আমার মোকাবিলা করার মত কে আছো? কতিপয় আনসার যুবক তার জবাব দিলে ‘উতবাহ বললো, তোমরা কে? তারা তাকে জবাব দিয়ে জানালো। সে বললো, তোমাদের সাথে যুদ্ধ করার ইচ্ছা আমাদের নেই। আমরা আমাদের চাচাতো ভাইদের চাই। একথা শুনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ উঠো হে আলী, হে হামযা, ওঠো হে ‘উবাইদাহ ইবনুল হারিস। হামযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘উতবাহ্র দিকে এবং আমি (‘আলী) শইবাহ্র দিকে অগ্রসর হয়ে উভয়কে হত্যা করলাম। ‘উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ওয়ালীদের মধ্যে যুদ্ধ চলতে থাকলো। দু’জনেই দু’জনকে আহত করলো। অতঃপর আমরা ওয়ালীদের দিকে অগ্রসর হয়ে তাকে হত্যা করলাম এবং আহত ‘উবাইদাহ্কে তুলে আনলাম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو إسحاق مدلس وعنعن ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ فی السیرۃ لا بن ھشام (277/2) والسنن الکبری للبیہقي (9 / 131) وغیرھما ، (انوار الصحیفہ ص 97)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وإسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق، وعثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٤/ ٣٦٢ - ٣٦٤، وأحمد (٩٤٨)، والبزار في "مسنده" (٧١٩)، والطبري في "تاريخه" ٢/ ٤٢٤ - ٤٢٦، والحاكم ٣/ ١٩٤، والبيهقي ٣/ ٢٧٦ و ٩/ ١٣١ من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. قال الخطابي: فيه من الفقه: إباحة المبارزة في جهاد الكفار، ولا أعلم اختلافاً في جوازها إذا أذن الإمام فيها، وإنما اختلفوا فيها إذا لم تكن عن إذنٍ من الإمام. فكره سفيان الثوري وأحمد وإسحاق أن يفعل ذلك إلا بإذن الإمام. وحكي ذلك أيضاً عن الأوزاعي. وقال مالك والشافعي: لا بأس بها، كانت بإذن الإمام أو بغير إذنه. وقد روي ذلك أيضاً عن الأوزاعي. قلت (القائل الخطابي): قد جمع هذا الحديث معنى جوازها بإذن الإمام، وبغير إذنه، وذلك أن مبارَزة حمزة وعلي ﵄ كانت بإذن النبي ﷺ، ولم يذكر فيه إذن من النبي ﷺ للأنصاريين اللذين خرجا إلى عتبة وشيبة قبل عليٍّ وحمزة، ولا إنكار من النبي ﷺ عليهما في ذلك. وفي الحديث من الفقه أيضاً: أن معونة المبارز جائزة إذا ضعُف أو عَجَزَ عن قِرنه. ألا ترى أن عُبيدة لما أُثخن أعانه عليٌّ وحمزة على قتل الوليد؟ واختلفوا في ذلك. فرخص فيه الشافعي وأحمد وإسحاق. وقال الأوزاعي: لا يعينونه عليه، لأن المبارزة إنما تكون هكذا.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَزِيَادُ بْنُ أَيُّوبَ، قَالاَ حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، أَخْبَرَنَا مُغِيرَةُ، عَنْ شِبَاكٍ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ هُنَىِّ بْنِ نُوَيْرَةَ، عَنْ عَلْقَمَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَعَفُّ النَّاسِ قِتْلَةً أَهْلُ الإِيمَانِ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ হত্যাকান্ডের ব্যাপারে নিস্কলুষ হত্যাকারী ঈমানদার বটে।
দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি’উস সাগীর (৯৬৩), যঈফ সুনান ইবনু মাজাহ (৫৮৪/২৬৮২)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2681،2682) ، مغیرۃ و إبراہیم النخعي عنعنا ، (انوار الصحیفہ ص 97)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل هني بن نويرة، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات"ووثقه العجلي، وقال أبو داود: كان من العُبّاد، وباقي رجاله ثقات. عبد الله: هو ابن مسعود، وعلقمة: هو ابن قيس النخعي، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وشباك: هو الضبي، ومغيرة: هو ابن مِقْسَم الضبي، وهشيم: هو ابن بشير الواسطي. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٨٢) من طريق هشيم بن بشير، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٣٧٢٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٩٤)، وانظر تمام الكلام عليه وتخريجه عندهما. وفي الباب عن شداد بن أوس عند مسلم (١٩٥٥) قال: ثنتان حفظتهما عن رسول الله ﷺ قال: "إن الله كتب الإحسان على كل شيء، فإذا قتلتم فأحسنوا القِتلة، وإذا ذبحتُم فأحسنوا الذَّبح، وليُحد أحدكم شفرته، فليُرِح ذبيحتَه". قال المناوي في "فيض القدير": قوله: "أعف الناس قتلة أهل الإيمان": هم أرحم الناس بخلق الله، وأشدهم تحرياً عن التمثيل والتشويه بالمقتول، وإطالة تعذيبه، إجلالاً لخالقهم، وامتثالاً لما صدر عن صدر النبوة من قوله: "إذا قتلتم فأحسنوا القتلة"، بخلاف أهل الكفر وبعض أهل الفسوق ممن لم تذق قلوبهم حلاوة الإيمان، واكتفَوا من مُسماه بلقلقة اللسان، وأُشرِبُوا القسوة، حتى أُبعدوا عن الرحمن، وأبعدُ القلوب من الله القلب القاسي، ومن لا يَرحم لا يُرحَم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ هِشَامٍ، حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنِ الْهَيَّاجِ بْنِ عِمْرَانَ، أَنَّ عِمْرَانَ، أَبَقَ لَهُ غُلاَمٌ فَجَعَلَ لِلَّهِ عَلَيْهِ لَئِنْ قَدَرَ عَلَيْهِ لَيَقْطَعَنَّ يَدَهُ فَأَرْسَلَنِي لأَسْأَلَ لَهُ فَأَتَيْتُ سَمُرَةَ بْنَ جُنْدَبٍ فَسَأَلْتُهُ فَقَالَ كَانَ نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَحُثُّنَا عَلَى الصَّدَقَةِ وَيَنْهَانَا عَنِ الْمُثْلَةِ فَأَتَيْتُ عِمْرَانَ بْنَ حُصَيْنٍ فَسَأَلْتُهُ فَقَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَحُثُّنَا عَلَى الصَّدَقَةِ وَيَنْهَانَا عَنِ الْمُثْلَةِ .
আল হাইয়্যজ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, ‘ইমরানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি গোলাম পালিয়ে গেলো। তিনি আল্লাহর নামে মানত করলেন যে, তিনি তাকে কাবু করতে পারলে তার হাত কেটে দিবেন। তিনি আমাকে বিষয়টি জিজ্ঞেস করতে সামুরাহ ইবনু জুনদুবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট পাঠান। আমি তাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে দান-খয়রাতের প্রতি উৎসাহিত করতেন এবং মানুষের অঙ্গ–প্রতঙ্গ কেটে বিকৃত করতে নিষেধ করতেন। অতঃপর আমি ‘ইমরান ইবনু হুসাইনের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট আসি এবং তাকেও একই বিষয়ে জিজ্ঞেস করি। তিনিও বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে দান খয়রাত করতে উৎসাহিত করতেন আর মানুষের নাক-কান বিকৃত করা নিষেধ করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قتادۃ مدلس وعنعن ، وحدیث أحمد (5/ 20) یغني عن ھذا الحدیث ، (انوار الصحیفہ ص 97)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن، والمرفوع منه صحيح. الهياج بن عمران، قال ابن سعد: كان ثقة قليل الحديث، وذكره ابن حبان في "الثقاقط، وجهله ابن المدينط لأنه لم يرو عنه غير الحسن -وهو البصري- وباقي رجاله ثقات. قتادة: هو ابن دعامة، وهشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّستُوائي. وأخرجه عبد الرزاق (١٥٨١٩)، ومن طريقه أحمد (١٩٨٤٧)، والطبراني في "الكبير" ١٨/ (٥٤١) عن معمر بن راشد، وابن أبي شيبة ٩/ ٤٢٣، وأحمد (١٩٨٤٦)، والطبراني في "الكبير" (٦٩٦٦) و ١٨/ (٥٤٣)، والبيهقي ٩/ ٦٩ و ١٠/ ٧١ من طريق همام بن يحيى العوذي، والدارمي (١٦٥٦) من طريق هشام الدستوائي، ثلاثتهم عن قتادة، به. وجاء عند الدارمي والطبراني ١٨/ (٥٤٣) عن عمران بن حصين وحده، وعند الطبراني (٦٩٦٦) عن سمرة بن جندب وحده. وأخرجه أحمد (١٩٨٤٤)، والطبراني ١٨/ (٥٤٢) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، أن هياج بن عمران أتى عمران بن حصين … فأرسله. وأخرج المرفوع منه الطيالسي (٨٣٦)، وأحمد (١٩٨٥٧)، والبزار في "مسنده" (٣٥٦٦) و (٣٥٦٧)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ١٨٢، وفي"شرح مشكل الآثار" (١٨٢٠)، وابن حبان (٤٤٧٣) و (٥٦١٦)، والطبراني ١٨/ (٣٢٥ - ٣٢٧) و (٣٤٣) و (٣٤٥) و (٣٤٩) و (٣٥٠) و (٣٥٢) و (٣٨٨) و (٤٠٢)، والحاكم ٤/ ٣٠٥، والبيهقي ١٠/ ٨٠ من طرق عن الحسن البصري، وأحمد (١٩٩٠٩) من طريق أبي قلابة الجرمي، كلاهما عن عمران بن حصين. وقرن أبو قلابة بعمران سمرة بن جندب، والحسن وأبو قلابة لم يسمعا عمران بن حصين. ولم يسمع أبو قلابة من سمرة كذلك. وأخرج المرفوع كذلك ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" ٣/ ١٠٢، وأخرجه أحمد (٢٠١٣٦)، والطحاوي في "شرح المعاني" ٣/ ١٨٢، وفي"شرح المشكل" (١٨٢١) من طريق هشيم بن بشير، كلاهما (ابن إسحاق وهشيم) عن حميد الطويل، وأخرجه أحمد (٢٠٢٢٥)، والطحاوي في "شرح المعاني" ٣/ ١٨٢، وفي "شرح المشكل" (١٨٢٢)، والطبراني (٦٩٤٤) من طريق يزيد بن إبراهيم التُّستَري، كلاهما (حميد ويزيد) عن الحسن عن سمرة بن جندب. وقد صرح الحسن في رواية هشيم بالسماع من سمرة، فإن كان هشيمٌ حفظ ذلك فالإسناد صحيح. وقد احتج الحافظ العلائي في "جامع التحصيل" برواية هشيم هذه في إثبات سماع الحسن من سمرة لغير حديث العقيقة. وفي باب الأمر بالصدقة والنهي عن المثلة عن جرير بن عبد الله عند الطيالسي (٦٦٥) وإسناده صحيح. وفي باب النهي عن المثلة وحدها عن عبد الله بن يزيد الخطمي عند البخاري (٢٤٧٤)، وهو في "المسند" (١٨٧٤٠). وعن بريدة بن الحُصيب عند مسلم (١٧٣١)، وقد سلف عند المصنف برقم (٢٦١٣). وعن المغيرة بن شعبة عند أحمد (١٨١٥٢). وعن عبد الله بن عمر عند أحمد (٤٦٢٢)، وإسناده صحيح. وانظر تمام شواهده هناك. قال الخطابي: المثلة تعذيب المقتول بقطع أعضائه، وتشويه خَلقه قبل أن يقتل، أو بعده. وذلك مثل أن يُجدَع أنفه أو أذنه، أو يفقأ عينه، أو ما أشبه ذلك من أعضائه. قال: قلت: وهذا إذا لم يكن الكافر فعل مثل ذلك بالمقتول المسلم. فإن مثل بالمقتول جاز أن يمثل به. ولذلك قطع رسول الله ﷺ أيدي العرنيين وأرجلهم، وسَمَر أعينهم، وكانوا فعلوا ذلك برعاء رسول الله ﷺ، وكذلك هذا في القصاص بين المسلمين إذا كان القاتل قطع أعضاء المقتول وعذبه قبل القتل، فإنه يعاقب بمثله، وقد قال الله تعالى: ﴿فَمَنِ اعْتَدَى عَلَيْكُمْ فَاعْتَدُوا عَلَيْهِ بِمِثْلِ مَا اعْتَدَى عَلَيْكُمْ﴾ [البقرة: ١٩٤].
حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ مَوْهَبٍ، وَقُتَيْبَةُ، - يَعْنِي ابْنَ سَعِيدٍ - قَالاَ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ امْرَأَةً، وُجِدَتْ، فِي بَعْضِ مَغَازِي رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَقْتُولَةً فَأَنْكَرَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَتْلَ النِّسَاءِ وَالصِّبْيَانِ .
‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কোন এক যুদ্ধে এক মহিলাকে নিহত অবস্থায় পাওয়া গেলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারী ও শিশুদের হত্যা করতে নিষেধ করলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3014) صحیح مسلم (1744)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الله: هو ابن عمر بن الخطاب، ونافع: هو مولاه، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه الجاري (٣٠١٤)، ومسلم (١٧٤٤)، وابن ماجه (٢٨٤١)، والترمذي (١٦٥٩)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥٦٤) من طريق نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٧٣٩)، و "صحيح ابن حبان" (١٣٥). قال البغوي في "شرح السنة" ١١/ ٤٧: والعمل على هذا عند أهل العلم أنه لا يقتل نساه أهل الحرب وصبيانهم إلا أن يقاتلوا فيدفعوا بالقتل.
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ الْمُرَقِّعِ بْنِ صَيْفِيِّ بْنِ رَبَاحٍ، حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ جَدِّهِ، رَبَاحِ بْنِ رَبِيعٍ قَالَ كُنَّا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةٍ فَرَأَى النَّاسَ مُجْتَمِعِينَ عَلَى شَىْءٍ فَبَعَثَ رَجُلاً فَقَالَ " انْظُرْ عَلاَمَ اجْتَمَعَ هَؤُلاَءِ " فَجَاءَ فَقَالَ عَلَى امْرَأَةٍ قَتِيلٍ . فَقَالَ " مَا كَانَتْ هَذِهِ لِتُقَاتِلَ " . قَالَ وَعَلَى الْمُقَدِّمَةِ خَالِدُ بْنُ الْوَلِيدِ فَبَعَثَ رَجُلاً فَقَالَ " قُلْ لِخَالِدٍ لاَ يَقْتُلَنَّ امْرَأَةً وَلاَ عَسِيفًا " .
রাবাহ ইবনু রবী’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা কোন এক যুদ্ধে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে ছিলাম। তিনি লোকদেরকে একটি স্থানে ভিড় জমাতে দেখে এক লোককে পাঠিয়ে বললেনঃ দেখে আসো, ঐ লোকেরা কি জন্য ভিড় জমিয়েছে। লোকটি এসে বললো, তারা একটি নিহত মহিলার লাশের কাছে একত্র হয়েছে। তিনি বললেনঃ এ মহিলা তো যুদ্ধ করেনি। একে কেন হত্যা করা হলো! বর্ণনাকারী বলেন, খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অগ্রবর্তী দলের নেতৃত্বে ছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে পাঠিয়ে বললেনঃ খালিদকে বলো, নারী এবং শ্রমিককে হত্যা করবে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3955)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه النسائي في "الكبري" (٨٥٧١) من طريق عمر بن مرقع، به. وأخرجه ابن ماجه (٢٨٤٢/ م)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥٧٢) من طريق المغيرة بن عبد الرحمن الحزامي، عن المرقع، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٩٩٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٨٩). وأخرجه ابن ماجه (٢٨٤٢)، والنسائي (٨٥٧٣) من طريق سفيان الثوري، عن أبي الزناد، عن المرقع، عن حنظلة بن الربيع الكاتب وهو أخو رياح بن الربيع ونفل ابن ماجه عن ابن أبي شيبة قوله: يخطئ الثوري فيه. وهو في "مسند أحمد" (١٧٦١٠)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٩١). قال الخطابي: فيه دليل على أن المرأة إذا قاتلت قتلت. ألا ترى أنه جعل العلة في تحريم قتلها: أنها لا تقاتل. فإذا قاتلت دل على جواز قتلها؟ و"العسيف" الأجير والتابع. واختلفوا في جواز قتله: فقال الثوري: لا يقتل العسيف وهو التابع. قلنا: هو كالأجير وزناً ومعنى. وقال الأوزاعي نحواً منه. وقال: لا يقتل الحرّاث إذا علم أنه ليس من المقاتلة. قال: وكذلك لا يقتل صاحب الصَّومعة، ولا شيخاً فانياً، ولا صغيراً.
حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، حَدَّثَنَا حَجَّاجٌ، حَدَّثَنَا قَتَادَةُ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " اقْتُلُوا شُيُوخَ الْمُشْرِكِينَ وَاسْتَبْقُوا شَرْخَهُمْ " .
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ (যোদ্ধাবাজ) মুশরিক বৃদ্ধদের হত্যা করবে এবং তাদের অল্প বয়স্কদের অবশিষ্ট রাখবে।
দুর্বল: যঈফ সুনান আত-তিরমিযী (২৭২/১৬৪৮) এ শব্দে: মিশকাত (৩৯৫২), যঈফ আল-জামি’উস সাগীর (১০৬৩)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1583) ، قتادۃ عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 97)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. الحسن -وهو البصري- لم يصرح بسماعه من سمرة. وهو مدلس، وقد رواه بالعنعنة. وهو في "سنن سعيد بن منصور" (٢٦٢٤). وأخرجه الترمذي (١٦٧٤) من طريق سعيد بن بشير، عن قتادة، به. وقال: هذا حديث حسن صحيح، ورواه الحجاج بن أرطاة عن قتادة نحوه. وهو في "مسند أحمد" (٢٠١٤٥). قال الخطابي: "الشرخ" هاهنا جمع شارخ، وهو الحديثُ السن، يقال: شَارِخُ وشرخ، كما قالوا: راكب ورَكْب، وصاحب وصحب، يريد بهم الصبيان ومن لم يبلغ مبلغ الرجال. و"الشيوخ" هاهنا المَسَانُّ، فإذا قيل: شرخ الشباب، كان معناه أول الشباب. قال حسان: إن شرخَ الشباب والشعَر الأسـ … ـود ما لم يُعاصَ كان جنونا
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ لَمْ يُقْتَلْ مِنْ نِسَائِهِمْ - تَعْنِي بَنِي قُرَيْظَةَ - إِلاَّ امْرَأَةً إِنَّهَا لَعِنْدِي تُحَدِّثُ تَضْحَكُ ظَهْرًا وَبَطْنًا وَرَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقْتُلُ رِجَالَهُمْ بِالسُّيُوفِ إِذْ هَتَفَ هَاتِفٌ بِاسْمِهَا أَيْنَ فُلاَنَةُ قَالَتْ أَنَا . قُلْتُ وَمَا شَأْنُكِ قَالَتْ حَدَثٌ أَحْدَثْتُهُ . قَالَتْ فَانْطَلَقَ بِهَا فَضُرِبَتْ عُنُقُهَا فَمَا أَنْسَى عَجَبًا مِنْهَا أَنَّهَا تَضْحَكُ ظَهْرًا وَبَطْنًا وَقَدْ عَلِمَتْ أَنَّهَا تُقْتَلُ .
‘আয়ীশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, বনী কুরাইযার কোন মহিলাকে হত্যা করা হয়নি। তবে এক মহিলাকে হত্যা করা হয়। সে আমার পাশে বসে কথা বলছিল এবং অট্টহাসিতে ফেটে পড়ছিলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাজারে তাদের পুরুষদেরকে হত্যা করছিলেন। এমন সময় এক ব্যক্তি তার নাম ধরে ডেকে বললো, অমুক মহিলাটি কোথায়? সে বললো, আমি। আমি (‘আয়ীশাহ) বললাম, তোমার কি হলো? (ডাকছো কেন?) সে বললো, আমি যা ঘটিয়েছি সেজন্য (সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে অশ্লীল ভাষায় গালি দিয়েছিলো)। ‘আয়ীশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তাকে নিয়ে গিয়ে হত্যা করা হলো। আমি ঘটনাটি আজও ভুলতে পারিনি। আমি তার এ আচরণে অবাক হয়েছিলাম যে, তাকে হত্যা করা হবে একথা জেনেও সে অট্টহাসিতে ফেটে পড়ছিলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ ابن ھشام فی السیرۃ (2/242 بتحقیقي)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق -وهو ابن يسار المطلبي، صاحب السيرة النبوية- وقد صرح بالسماع فانتفت شبهةُ تدليسه. محمد بن سلمة: هو الحراني، وعبد الله بن محمد النُّفيليُّ: هو ابن علي بن نفيل الحراني. وهو في "السيرة النبوية" لابن هشام ٣/ ٢٥٢ - ٢٥٣. وأخرجه أحمد (٢٦٣٦٤)، والطبري في "تفسيره" ٢١/ ١٥٣ - ١٥٤، وفي "تاريخه" ٢/ ١٠٢، والحاكم ٣/ ٣٥ - ٣٦، والبيهقي في "السنن" ٩/ ٨٢، وفي "معرفة السنن" (١٨٠١٨)، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٦/ ١٤١ - ١٤٢ من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. قال ابنُ هشام في تفسير قول المرأة: "حَدَثٌ أحدثْتُه": هي التي طرحت الرحا على خلاد بن سويد فقتلته. لكن قال الخطابي: يقال: إنها كانت شتمتِ النبيَّ ﷺ. قال: وفي ذلك دلالة على وجوب قتل من فعل ذلك، ويُحكى عن مالك أنه كان لا يرى لمن سبَّ النبيَّ ﷺ توبة، ويقبل توبة من ذكر الله سبحانه بسبّ أو شتم ويكف عنه.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ اللَّهِ - عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ الصَّعْبِ بْنِ جَثَّامَةَ، أَنَّهُ سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عَنِ الدَّارِ مِنَ الْمُشْرِكِينَ يُبَيَّتُونَ فَيُصَابُ مِنْ ذَرَارِيِّهِمْ وَنِسَائِهِمْ . فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " هُمْ مِنْهُمْ " . وَكَانَ عَمْرٌو - يَعْنِي ابْنَ دِينَارٍ - يَقُولُ هُمْ مِنْ آبَائِهِمْ . قَالَ الزُّهْرِيُّ ثُمَّ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَعْدَ ذَلِكَ عَنْ قَتْلِ النِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ .
আস-সা’ব ইবনু জাস্সামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলেন, মুশরিকদের বাসস্থানে রাতে আক্রমন করলে তাদের নারী ও শিশুরাও নিহত হতে পারে, (এমতাবস্থায় এর হুকুম কি)। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তারাও তাদের অন্তর্ভুক্ত। ‘আমর ইবনু দীনার (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন, তারা তাদের পিতাদের অন্তর্ভুক্ত। ইমাম যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারী ও শিশুদের হত্যা করা নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح خ دون النهي عن القتل
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3012) صحیح مسلم (1745)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه البخاري (٣٠١٢)، ومسلم (١٧٤٥)، وابن ماجه (٢٨٣٩)، والترمذي (١٦٦٠)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥٦٨ - ٨٥٧٠) من طرق عن ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٤٢٢)، و"صحيح ابن حبان" (١٣٧) و (٤٧٨٦). وقول الزهري الذي في آخر الحديث أسنده عن ابن كعب بن مالك، عن عمه أن النبي ﷺ لما بعث إلى ابن أبي الحُقيق نهى عن قتل النساء والولدان. أخرجه الشافعي في "مسنده " ٢/ ١١٨، والحميدي (٨٧٤)، وسعيد بن منصور (٢٦٢٧)، وابن أبي شيبة ١٢/ ٣٨١، وأحمد بن حنبل (٢٤٠٠٩/ ٦٦)، والطحاوي في "شرح معانى الآثار" ٣/ ٢٢١، والبيهقي ٩/ ٧٧ و ٧٨، وابن عبد البر في "التمهيد" ١١/ ٦٩. وقد اختُلف فيه عن الزهري، فقيل: عنه، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أبيه، وقيل: عنه، عن عبد الله بن كعب، عن أبيه، وقيل: عنه عن عبد الرحمن بن كعب، مرسلاً، وقيل: عنه عن عبد الله بن كعب مرسلاً، وقيل: غير ذلك. وبالجملة فهو صحيح لغيره. انظر: تفصيل طرقه في "التمهيد" لابن عبد البر ١١/ ٦٦ - ٧٣ نقلاً عن محمد بن يحيى الذهلي. وانظر كذلك "مسند أحمد" (٢٤٠٠٩/ ٦٦). قال الشافعي في "الرسالة" ص ٢٩٩: حديث الصعب بن جثامة في عمرة النبي ﷺ، فإن كان في عمرته الأولى فقد قيل: أمرُ ابن أبي الحقيق قبلها، وقيل: في سنتها، وإن كان في عمرته الآخرة، فهو بعد أمر ابن أبي الحُقيق غير شكٍّ، والله أعلم. ولم نعلمه ﷺ رخص في قتل النساء والولدان ثم نهى عنه. قال: ومعنى نهيه عندنا -والله أعلم- عن قتل النساء والولدان: أن يقصد قصدَهم بقتل، وهم يُعرفون متميزين ممن أمر بقتله منهم. قال: ومعنى قوله: "هم منهم" أنهم يجمعون خصلتين: أن ليس لهم حكمُ الإيمان الذي يُمنع به الدم، ولا حكم دار الإيمان الذي يُمنع به الإغارةُ على الدار. وإذ أباح رسول الله البيات والإغارة على الدار، فأغار على بني المصطلق غارَّين، فالعلم يحيط أن البيات والإغارة إذا حلّ بإحلال رسول الله لم يمتنع أحدٌ بيَّتَ أو أغار من أن يُصيب النساء والولدان، فيسقط المأثم فيهم والكفارة والعقل والقَوَدُ عمن أصابهم؛ إذ أُبيح له أن يُبيِّت ويُغير، وليست لهم حرمة الإسلام. ولا يكون له قتلهم عامداً لهم متميزين عارفاً بهم. فإنما نهى عن قتل الولدان لأنهم لم يبلغوا كفراً فيعملوا به، وعن قتل النساء لأنه لا معنى فيهن لقتالٍ، وأنهن والولدان يُتَخَوَّلون فيكونون قوةً لأهل دين الله.
حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا مُغِيرَةُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْحِزَامِيُّ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ حَمْزَةَ الأَسْلَمِيُّ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَّرَهُ عَلَى سَرِيَّةٍ قَالَ فَخَرَجْتُ فِيهَا وَقَالَ " إِنْ وَجَدْتُمْ فُلاَنًا فَاحْرِقُوهُ بِالنَّارِ " . فَوَلَّيْتُ فَنَادَانِي فَرَجَعْتُ إِلَيْهِ فَقَالَ " إِنْ وَجَدْتُمْ فُلاَنًا فَاقْتُلُوهُ وَلاَ تُحْرِقُوهُ فَإِنَّهُ لاَ يُعَذِّبُ بِالنَّارِ إِلاَّ رَبُّ النَّارِ " .
মুহাম্মাদ ইবনু হামযাহ আল-আসলামী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক অভিযানে তার পিতাকে সেনাপতি নিযুক্ত করেন। হামযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা অভিযানে বের হওয়ার সময় তিনি বলে দিলেন যে, অমুক ব্যক্তিকে পেলে আগুন দিয়ে পোড়াবে। আমি পিঠ ফিরে চলে যাওয়ার সময় তিনি আমাকে পুনরায় ডাকলেন। আমি তাঁর নিকট ফিরে এলে তিনি বললেনঃ তোমরা অমুক ব্যক্তিকে পেলে হত্যা করবে, আগুনে পোড়াবে না। কেননা কেবল আগুনের প্রভুই আগুন দিয়ে শাস্তি দেয়ার অধিকারী, অন্য কেউ নয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن حمزة الأسلمي والمغيرة بن عبد الرحمن الحزامي، فهما صدوقان حسنا الحديث، وقد روي بإسناد آخر صحيح عن حمزة بن عمرو الأسلمي. وهو عند سعيد بن منصور (٢٦٤٣). وأخرجه أحمد بن حنبل (١٦٠٣٤)، والبخاري في "تاريخه" ١/ ٥٩، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٣٧٦)، وأبو يعلى (١٥٣٦)، وابن قانع في "معجم الصحابة" ١/ ١٦٧، والطبراني في "الكبير" (٢٩٩٠)، وابن حزم في "المحلى" ١٠/ ٣٧٦ و ١١/ ٣٨٣، والبيهقي ٩/ ٧٢ من طريق المغيرة بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق (٩٤١٨)، وأحمد (١٦٠٣٦)، والبيهقي ٩/ ٧٢ من طريق ابن جريج، قال: أخبرنا زياد أن أبا الزناد أخبره، قال: أخبرني حنظلة بن علي الأسلمي، أن حمزة بن عمرو الأسلمى صاحب النبي ﷺ حدثه … الحديث وهذا إسناد صحيح. وزياد: هو ابن سعد الخراساني. قال الخطابي: هذا إنما يكره إذا كان الكافر أسيراً قد ظُفِر به، وحصل في الكف، وقد أباح رسولُ الله ﷺ أن تُضرمَ النار على الكفار في الحرب. وقال لأسامة: "اغزُ على أُبنى صباحاً، وحَرِّق". ورخص سفيان الثوري والشافعي في أن يرمي أهل الحصون بالنيران، إلا أنه يستحب أن لا يُرموا بالنار ما داموا يطاقون، إلا أن يخافوا من ناحيتهم الغلبة. فيجوز حينئذٍ أن يقذفوا بالنار.
حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدٍ، وَقُتَيْبَةُ، أَنَّ اللَّيْثَ بْنَ سَعْدٍ، حَدَّثَهُمْ عَنْ بُكَيْرٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ بَعَثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي بَعْثٍ فَقَالَ " إِنْ وَجَدْتُمْ فُلاَنًا وَفُلاَنًا " . فَذَكَرَ مَعْنَاهُ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এক অভিযানে প্রেরণের সময় বললেনঃ তোমরা যদি অমুক অমুক ব্যক্তিকে পাও ... অতঃপর বাকী অংশ উপরের হাদীসের অনুরুপ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (3016)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. بكير: هو ابن عبد الله بن الأشج. وأخرجه البخاري (٣٠١٦)، والترمذي (١٦٦١)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥٥٩) من طريق الليث بن سعد، والنسائي (٨٧٥٣) و (٨٧٨١) - وهو عند البخاري معلقاً (٢٩٥٤) - من طريق عمرو بن الحارث المصري، كلاهما عن بكير بن عبد الله ابن الأشج، به. وهو في "مسند أحمد" (٨٠٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥٦١١).
حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، مَحْبُوبُ بْنُ مُوسَى أَخْبَرَنَا أَبُو إِسْحَاقَ الْفَزَارِيُّ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ الشَّيْبَانِيِّ، عَنِ ابْنِ سَعْدٍ، - قَالَ غَيْرُ أَبِي صَالِحٍ عَنِ الْحَسَنِ بْنِ سَعْدٍ، - عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ كُنَّا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سَفَرٍ فَانْطَلَقَ لِحَاجَتِهِ فَرَأَيْنَا حُمَّرَةً مَعَهَا فَرْخَانِ فَأَخَذْنَا فَرْخَيْهَا فَجَاءَتِ الْحُمَّرَةُ فَجَعَلَتْ تَفْرُشُ فَجَاءَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " مَنْ فَجَعَ هَذِهِ بِوَلَدِهَا رُدُّوا وَلَدَهَا إِلَيْهَا " . وَرَأَى قَرْيَةَ نَمْلٍ قَدْ حَرَّقْنَاهَا فَقَالَ " مَنْ حَرَّقَ هَذِهِ " . قُلْنَا نَحْنُ . قَالَ " إِنَّهُ لاَ يَنْبَغِي أَنْ يُعَذِّبَ بِالنَّارِ إِلاَّ رَبُّ النَّارِ " .
‘আবদুর রহমান ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফর সঙ্গী ছিলাম। তিনি তাঁর প্রয়োজনে অন্যত্র গেলেন। আমরা দু’টি বাচ্চাসহ একটি পাখি দেখতে পেয়ে বাচ্চা দুটোকে ধরে নিলাম। মা পাখিটা সাথে সাথে আসলো এবং পাখা ঝাঁপটিয়ে বাচ্চার জন্য অস্থিরতা প্রকাশ করতে লাগলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে এসে বললেনঃ কে এর বাচ্চা নিয়ে এসে একে অস্থিরতায় ফেলেছে? বাচ্চাগুলো এদের মায়ের কাছে ফিরিয়ে দাও। তিনি আমাদের পুড়িয়ে দেয়া একটা পিঁপড়ার ঢিবি দেখতে পেয়ে বললেনঃকে এগুলো পুড়িয়েছে? আমরা বললাম, আমরা। তিনি বললেনঃআগুনের রব্ব ব্যতীত আগুন দিয়ে কিছুকে শাস্তি দেয়ার কারো অধিকার নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3542)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. فقد ذكر المنذري: أن البخاري وعبد الرحمن بن أبي حاتم الرازي قالا: إنه سمع من أبيه عبد الله بن مسعود، وصحح الترمذي حديث عبد الرحمن عن أبيه في "جامعه". قلنا: أبو إسحاق الشيباني: هو سليمان بن أبي سليمان، وأبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث. وهو في "السير" له. وأخرج الحديثين هناد في "الزهد" (١٣٣٧) عن أبي معاوية الضرير، عن أبي إسحاق الشيباني، عن الحسن بن سعد، به. وأخرج الحديث الأول وهو قصة الحمرة: الطيالسي (٣٣٦)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٣٨٢)، والبزار (٢٠١٠)، والطبرانى في "الكبير" (١٠٣٧٥) و (١٠٣٧٦)، و"الأوسط" (٤١٤٣)، والحاكم ٤/ ٢٣٩، والبيهقي في "الدلائل" ٦/ ٣٢ - ٣٣ من طرق عن الحسن بن سعد، به. وصححه الحاكم ووافقه الذهبي. وأخرج الحديث الثاني، وهو قصة حرق قرية النمل: عبد الرزاق (٩٤١٤)، وأحمد (٤٠١٨)، والنسائى في "الكبرى" (٨٥٦٠)، والطبراني في"الكبير" (١٠٣٧٤) من طريق أبي إسحاق الشيباني، بهذا الإسناد. وسيتكرر الحديثان برقم (٥٢٦٨). وأخرج الطيالسي (٣٤٥)، وأحمد (٣٧٦٣) من طريق المسعودي، عن الحسن ابن سعد، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه أنه قال: نزل النبي منزلاً، فانطلق لحاجته، فجاء وقد أوقد رجلٌ على قرية نمل، إما في الأرض وإما في شجرة، فقال رسول الله ﷺ: "أيكم فعل هذا؟ " فقال رجل من القوم: أنا يا رسول الله، قال: "أطفها أطفها". قال الخطابي: "الحُمَّرة" طائر. قوله: "تفرشُ" أو "تعرش" معناه: ترفرف. والتفريش مأخوذ من فرش الجناح وبسطه، والعريش: أن ترتفع فرقهما، ويظلل عليهما، ومنه أخذ العريش، يقال: عَرَشتُ عريشاً أعرُشُه وأعرِشُه. وفيه دلالة على أن تحريق بيوت الزنابير مكروه، وأما النمل فالعذر فيه أقل. وذلك أن ضرره قد يمكن أن يُزال من غير إحراق. وقد روي عن النبي ﷺ أنه قال: "إن نبياً من الأنبياء نزل على قرية نمل، فقرصته نملة، فأمر بالنمل فأحرقت، فأوحى إليه: ألا نملة واحدة؟ ".
حَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ الدِّمَشْقِيُّ أَبُو النَّضْرِ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ شُعَيْبٍ، أَخْبَرَنِي أَبُو زُرْعَةَ، يَحْيَى بْنُ أَبِي عَمْرٍو السَّيْبَانِيُّ عَنْ عَمْرِو بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّهُ حَدَّثَهُ عَنْ وَاثِلَةَ بْنِ الأَسْقَعِ، قَالَ نَادَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةِ تَبُوكَ فَخَرَجْتُ إِلَى أَهْلِي فَأَقْبَلْتُ وَقَدْ خَرَجَ أَوَّلُ صَحَابَةِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَطَفِقْتُ فِي الْمَدِينَةِ أُنَادِي أَلاَ مَنْ يَحْمِلُ رَجُلاً لَهُ سَهْمُهُ فَنَادَى شَيْخٌ مِنَ الأَنْصَارِ قَالَ لَنَا سَهْمُهُ عَلَى أَنْ نَحْمِلَهُ عَقَبَةً وَطَعَامُهُ مَعَنَا قُلْتُ نَعَمْ . قَالَ فَسِرْ عَلَى بَرَكَةِ اللَّهِ تَعَالَى . قَالَ فَخَرَجْتُ مَعَ خَيْرِ صَاحِبٍ حَتَّى أَفَاءَ اللَّهُ عَلَيْنَا فَأَصَابَنِي قَلاَئِصُ فَسُقْتُهُنَّ حَتَّى أَتَيْتُهُ فَخَرَجَ فَقَعَدَ عَلَى حَقِيبَةٍ مِنْ حَقَائِبِ إِبِلِهِ ثُمَّ قَالَ سُقْهُنَّ مُدْبِرَاتٍ . ثُمَّ قَالَ سُقْهُنَّ مُقْبِلاَتٍ . فَقَالَ مَا أَرَى قَلاَئِصَكَ إِلاَّ كِرَامًا - قَالَ - إِنَّمَا هِيَ غَنِيمَتُكَ الَّتِي شَرَطْتُ لَكَ . قَالَ خُذْ قَلاَئِصَكَ يَا ابْنَ أَخِي فَغَيْرَ سَهْمِكَ أَرَدْنَا .
ওয়াসিলাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকের যুদ্ধে অংশ গ্রহণের ঘোষণা দিলেন। ইতোমধ্যে আমি আমার পরিবারের সঙ্গে একত্রে ফিরে আসি। এরই মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবীদের প্রথম দলটি রওয়ানা হয়ে গেছে। আমি মাদীনাহ্র অলিগলিতে ডেকে ডেকে বললাম, এমন কেউ আছে কি একজনকে বাহন দিবে, তার জন্য তার গনিমাতের অংশ থাকবে। এক প্রবীণ আনসারী ডেকে বললেন, তার অংশ আমি নিতে চাই। সে আমাদের বাহনের পিছনে চড়বে এবং আমাদের সাথেই খাওয়া-দাওয়া করবে। আমি বললাম, হাঁ, ঠিক আছে। প্রবীণ লোকটি বলেন, তাহলে এসো এবং মহান আল্লাহ্র আশু বরকতের উপর ভরসা করে যাত্রা করো। বর্ণনাকারী বলেন, আমি আমার উত্তম সাথীর সঙ্গে রওয়ানা দিলাম। আল্লাহ আমাদেরকে গনিমাত দান করলেন। আমার ভাগে কিছু উট পড়লো। আমি এগুলো দ্রুত হাকিঁয়ে আমার সেই উত্তম বন্ধুর কাছে নিয়ে আসি। প্রবীণ ব্যক্তি বেরিয়ে এসে তার উটের পালানের উপর বসলেন, তারপর বললেন, এগুলোকে আমার দিকে পিঠ করে হাঁকাও। তিনি পুনরায় বললেন, এগুলো আমার দিকে মুখ উত্তম মনে হয়। তিনি বললেন, এগুলো আপনার সেই মাল যার চুক্তি আমি আপনার সাথে করেছি। তিনি বললেন, হে ভাতিজা! তুমি তোমার উটগুলোকে নিয়ে যাও। গনিমাতের অংশ নেয়ার ইচ্ছা আমার নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، عمرو بن عبد اللہ الحضرمي وثقہ یعقوب الفارسي والعجلي المعتدل وقال ابن حبان ’’متقنًا‘‘ وصححہ أبو عوانۃ والحاکم والذہبي
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. عمرو بن عبد الله -وهو السيباني الحضرمي الحمصي - روى عن عمر بن الخطاب وذي مخمر وعوف بن مالك الأشجعي وواثلة بن الأسقع وأبي هريرة وأبي أمامة وكلهم صحابة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال في "مشاهير علماء الأمصار": كان متقناً. ووثقه العجلي، وباقي رجاله ثقات. محمد بن شعيب: هو ابن شابور الدمشقي. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني " (٩٢١)، والطبراني في "الكبير" ٢٢/ (١٩٦)، والبيهقي ٩/ ٢٨ من طريق محمد بن شعيب بن شابور، بهذا الإسناد. قال الخطابي: اختلف الناس في هذا: فقال أحمد بن حنبل فيمن يعطي فرسه على النصف مما يغنمه في غزاته: أرجو أن لا يكون به بأس. وقال الأوزاعي: ما أُراه إلا جائزاً. وكان مالك بن أنس يكرهُه، وفي مذهب الشافعي: لا يجوز أن يعطيه فرساً على سهم من الغنيمة. فإن فعل فله أجر مثل ركوبه. قال: وقوله: "فغير سهمك أردْنا" يشبه أن يكون معناه: أني لم أُرِدْ سهمَك من المغنم. إنما أردتُ مشاركتك في الأجر والثواب، والله أعلم.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، - يَعْنِي ابْنَ سَلَمَةَ - أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ زِيَادٍ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " لَقَدْ عَجِبَ رَبُّنَا عَزَّ وَجَلَّ مِنْ قَوْمٍ يُقَادُونَ إِلَى الْجَنَّةِ فِي السَّلاَسِلِ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছি: আমাদের রব্ব মহান আল্লাহ ঐ লোকদের দেখে বিস্মিত হবেন, যাদেরকে শৃঙ্খলিত অবস্হায় জান্নাতে প্রবেশ করানো হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، رواہ البخاري (3010)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمد بن زياد هو الجمحي المدني. وأخرجه البخاري (٣٠١٠) من طريق شعبة بن الحجاج، عن محمد بن زياد، به. وهو في "مسند أحمد" (٨٠١٣)، و"صحيح ابن حبان" (١٣٤). قال ابن حبان: قوله ﷺ: "عجب ربنا" من ألفاظ التعارف التي لا يتهيأ علمُ المخاطَبِ بما يخاطب به في القصد إلا بهذه الألفاظ التي استعملها الناسُ فيما بينهم. والقصد في هذا الخبر السَّبيُ الذين يَسبيهم المسلمون من دار الشرك مُكَتَّفين في السلاسل يُقادون إلى دور الإسلام حتى يُسلموا فيدخلوا الجنة. ولهذا المعنى أراد ﷺ بقوله في خبر الأسود بن سريع: "أوليس خيارَكم أولادُ المشركين" وهذه اللفظة أطلقت أيضاً بحذف "من" عنها: يريد: أوليس من خياركم.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرِو بْنِ أَبِي الْحَجَّاجِ أَبُو مَعْمَرٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنْ يَعْقُوبَ بْنِ عُتْبَةَ، عَنْ مُسْلِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ جُنْدُبِ بْنِ مَكِيثٍ، قَالَ بَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَبْدَ اللَّهِ بْنَ غَالِبٍ اللَّيْثِيَّ فِي سَرِيَّةٍ وَكُنْتُ فِيهِمْ وَأَمَرَهُمْ أَنْ يَشُنُّوا الْغَارَةَ عَلَى بَنِي الْمُلَوِّحِ بِالْكَدِيدِ فَخَرَجْنَا حَتَّى إِذَا كُنَّا بِالْكَدِيدِ لَقِينَا الْحَارِثَ بْنَ الْبَرْصَاءِ اللَّيْثِيَّ فَأَخَذْنَاهُ فَقَالَ إِنَّمَا جِئْتُ أُرِيدُ الإِسْلاَمَ وَإِنَّمَا خَرَجْتُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْنَا إِنْ تَكُنْ مُسْلِمًا لَمْ يَضُرَّكَ رِبَاطُنَا يَوْمًا وَلَيْلَةً وَإِنْ تَكُنْ غَيْرَ ذَلِكَ نَسْتَوْثِقْ مِنْكَ فَشَدَدْنَاهُ وِثَاقًا .
জুনদুব ইবনু মাকীস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আবদুল্লাহ ইবনু গালিব আল-লাইসীকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি অভিযানে পাঠালেন। তাদের সাথে আমিও ছিলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে নির্দেশ দিলেন যে, কাদীদের বনূ মালু্হ গোত্রকে কয়েক দিক থেকে আক্রমন করবে। আমরা রওয়ানা হলাম এবং কাদীদ এলাকায় পৌছে সেখানে আল-আরিস ইবনুল বারসায়া আল–লাইসীর সাক্ষাৎ পেলাম। আমরা তাকে গ্রেফতার করলে সে বললো, আমি ইসলাম কবুলের জন্য রাসূললাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট যাওয়ার উদ্দেশ্য বেড়িয়েছি। আমরা বললাম, তুমি মুসলিম হলে তোমাকে একদিন ও এক রাত বেধেঁ রাখাতে তোমার কোনো ক্ষতি হবে না। আর যদি অন্য কিছু হও তাওলে আমরা তোমাকে শক্ত করে বাধঁবো। অতঃপর আমরা তাকে শক্ত করে বেধেঁ রাখলাম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مسلم بن عبد اللّٰہ بن خبیب الجھني:مجہول (تقریب التہذیب: 6634) ، (انوار الصحیفہ ص 97)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة مسلم بن عبد الله -وهو ابن خبيب الجهني، فقد تفرد بالرواية عنه يعقوب بن عتبة- وهو ابن المغيرة الثقفي-، وقال الحافظ في"التقريب": مجهول. عبد الوارث: هو ابن سعيد العنبري. وهو في "السيرة النبويه" لابن هشام ٤/ ٢٥٧ - ٢٥٨. وأخرجه مطولاً ومختصراً ابن سعد في "الطبقات الكبرى" ٢/ ١٢٤، وأحمد (١٥٨٤٤)، والبخاري في "تاريخه" ٢/ ٢٢١، والطبري في "تاريخه" ٢/ ١٤٤، والطحاوي في "شرح المعاني" ٣/ ٢٠٨، وابن قانع في "معجم الصحابة" ١/ ١٤٥ - ١٤٦، والطبراني في "الكبير" (١٧٢٦)، والحاكم ٢/ ١٢٤، والبيهقي ٩/ ٨٨ من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد، وصححه الحاكم ووافقه الذهبي. قال الخطابي: "فشنُّوا الغارة" معناه: بثُّوها من كل وجه، وأصل الشَّنِّ: الصبُّ، يقال: شننتُ الماء: إذا صببتَه صبّاً متفرقاً، والشِّنان: ما تفرق من الماء. وفيه دلالة على جواز الاستيثاق من الأسير الكافر بالرباط والقيد والغُلّ، وما يدخل في معناها، إن خيف انفلاته، ولم يؤمن شرّه، إن ترك مطلقاً. قلنا: والكَديد: قال البكري في "معجم ما استعجم": بفتح أوله وكسر ثانيه، بعده دال وياء مهملة أيضاً موضع بين مكة والمدينة.
حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ حَمَّادٍ الْمِصْرِيُّ، وَقُتَيْبَةُ، قَالَ قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ بَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَيْلاً قِبَلَ نَجْدٍ فَجَاءَتْ بِرَجُلٍ مِنْ بَنِي حَنِيفَةَ يُقَالُ لَهُ ثُمَامَةُ بْنُ أُثَالٍ سَيِّدُ أَهْلِ الْيَمَامَةِ فَرَبَطُوهُ بِسَارِيَةٍ مِنْ سَوَارِي الْمَسْجِدِ فَخَرَجَ إِلَيْهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " مَاذَا عِنْدَكَ يَا ثُمَامَةُ " . قَالَ عِنْدِي يَا مُحَمَّدُ خَيْرٌ إِنْ تَقْتُلْ تَقْتُلْ ذَا دَمٍ وَإِنْ تُنْعِمْ تُنْعِمْ عَلَى شَاكِرٍ وَإِنْ كُنْتَ تُرِيدُ الْمَالَ فَسَلْ تُعْطَ مِنْهُ مَا شِئْتَ . فَتَرَكَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى إِذَا كَانَ الْغَدُ ثُمَّ قَالَ لَهُ " مَا عِنْدَكَ يَا ثُمَامَةُ " . فَأَعَادَ مِثْلَ هَذَا الْكَلاَمِ فَتَرَكَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى كَانَ بَعْدَ الْغَدِ فَذَكَرَ مِثْلَ هَذَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَطْلِقُوا ثُمَامَةَ " . فَانْطَلَقَ إِلَى نَخْلٍ قَرِيبٍ مِنَ الْمَسْجِدِ فَاغْتَسَلَ فِيهِ ثُمَّ دَخَلَ الْمَسْجِدَ فَقَالَ أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ . وَسَاقَ الْحَدِيثَ . قَالَ عِيسَى أَخْبَرَنَا اللَّيْثُ وَقَالَ ذَا ذِمٍّ .
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজদ এলাকায় অশ্বারোহী কাফেলা পাঠালেন। তারা বনী হানিফা্হ গোত্রের সুমামাহ ইবনু ইসাল নামক এক ব্যাক্তিকে ধরে নিয়ে এলো। সে ইয়ামামাবাসীদের নেতা ছিলো। লোকটিকে মাসজিদে নাববীর একটি খুটিঁতে বেধেঁ রাখা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কাছে এসে বললেনঃহে সুমামাহ! তোমার নিকট কি আছে? সে বললো, হে মুহাম্মাদ! আমার কাছে কল্যান আছে। আপনি আমাকে হত্যা করলে এমন এক ব্যাক্তিকে হত্যা করলেন যার রক্তের প্রতিশোধ নেয়া হবে। আর আপনি যদি অনুগ্রহ করেন, তাহলে একজন সন্মানি লোককে অনুগ্রহ করলেন। আপনি সম্পদের আশা করলে যত ইচ্ছে চাইতে পারেন, দেয়া হবে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলে গেলেন। পরবর্তী সকাল বেলায় তিনি জিজ্ঞেস করলেন: এ সুমামাহ! তুমি তোমার সাথে কেমন আচরনের প্রত্যাশা করো? সে আগের মতই জবাব দিলো। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলে গেলেন। তৃতীয় দিনের সকাল বেলায় সে একই জবাব দিলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, সুমা্মাহকে ছেড়ে দাও। সে মাসজিদের নিকটস্হ খেজুর বাগানে ঢুকে (কুপের পানিতে) গোসল করে মাসজিদে এসে বললো, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি ,আল্লাহ ছারা কনো ইলা্হ নাই। আমি আরো সাক্ষ্য দিচ্ছি যে মুহাম্মাদ তার বান্দা ও রাসূল। বর্ণনাকারী ঈসা বলেন, লাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের জানিয়েছেন, সুমামা্হ বললো, আপনি আমাকে হত্যা করলে একজন অপরাধীকেই হত্যা করলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (469) صحیح مسلم (1764)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سعيد بن أبي سعيد: هو المقبري، واسم أبي سعيد كيسان، وقتيبة: هو ابن سعيد البَغْلاني، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه البخاري (٤٦٢) و (٤٣٧٢)، ومسلم (١٧٦٤)، والنسائي (٧١٢) من طريق سعيد المقبري، عن أبي هريرة. ورواية البخاري الاولى والنسائي مختصرة بقصة ربط ثمامة بسارية المسجد. وهو في "مسند أحمد" (٩٨٣٣)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٣٩). قال في "النهاية": "إن تقتل تقتل ذا دَم" أي: مَن هو مُطالِبٌ بدم أو صاحب دمٍ مطلوب، ويُروى: ذا ذمٍّ بالذال المعجمة، أي: ذا ذمامٍ وحُرمةٍ في قومه، وإذا عَقَد ذِمّة وُفِّي له.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرٍو الرَّازِيُّ، قَالَ حَدَّثَنَا سَلَمَةُ، - يَعْنِي ابْنَ الْفَضْلِ - عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، قَالَ حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ يَحْيَى بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سَعْدِ بْنِ زُرَارَةَ، قَالَ قُدِمَ بِالأُسَارَى حِينَ قُدِمَ بِهِمْ وَسَوْدَةُ بِنْتُ زَمْعَةَ عِنْدَ آلِ عَفْرَاءَ فِي مُنَاخِهِمْ عَلَى عَوْفٍ وَمُعَوِّذٍ ابْنَىْ عَفْرَاءَ قَالَ وَذَلِكَ قَبْلَ أَنْ يُضْرَبَ عَلَيْهِنَّ الْحِجَابُ قَالَ تَقُولُ سَوْدَةُ وَاللَّهِ إِنِّي لَعِنْدَهُمْ إِذْ أَتَيْتُ فَقِيلَ هَؤُلاَءِ الأُسَارَى قَدْ أُتِيَ بِهِمْ . فَرَجَعْتُ إِلَى بَيْتِي وَرَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِيهِ وَإِذَا أَبُو يَزِيدَ سُهَيْلُ بْنُ عَمْرٍو فِي نَاحِيَةِ الْحُجْرَةِ مَجْمُوعَةٌ يَدَاهُ إِلَى عُنُقِهِ بِحَبْلٍ . ثُمَّ ذَكَرَ الْحَدِيثَ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهُمَا قَتَلاَ أَبَا جَهْلِ بْنَ هِشَامٍ وَكَانَا انْتَدَبَا لَهُ وَلَمْ يَعْرِفَاهُ وَقُتِلاَ يَوْمَ بَدْرٍ .
ইয়াহইয়া ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আবদুর রহমান ইবনু সা’দ ইবনু যুরারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি (ইয়াহইয়া) বলেন, যখন বদরের যুদ্ধের সময় বন্দীদের আনা হয় তখন সাওদা্হ বিনতু যাম’আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আফরা পরিবারের নিকট ‘আফরার ছেলে ‘আওফ ও মুআব্বিজের পাশে উটশালায় ছিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এটি পর্দার বিধানের পুর্বের ঘটনা। বর্ণনাকারী বলেন, সাওদা্হ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর শপথ! আমি তাদের কাছে ছিলাম। আমি ফিরে আসলে বলা হলো, এরা সবাই বন্দী। এদেরকে আনা হয়েছে। আমি নিজের ঘরে এলাম। তখন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ঘরেই ছিলেন। আমাদের ঘরের এক কোনে আবূ ইয়াযীদ সুহাইল ইবনু ‘আমরকে দেখতে পেলাম। তার দুই হাত রশি দিয়ে ঘাড়ের সাথে বাধাঁ। অতঃপর বর্ণনাকারী অবশিষ্ট হাদীস বর্ণনা করেন। আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘আওফ ইবনু ‘আফরা্হ ও মুআব্বিজ ইবনু ‘আফরা্হ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর যুদ্ধে আবূ জাহল ইবনু হিশামকে হত্যা করেন। তারা তার বিরুদ্ধে লড়েছেন, আবূ জাহল কে তারা চিনতেন না। তারাও বদর যুদ্ধে নিহত হোন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، یحیی روی ھذا الحدیث عن سودۃ کما ھو الأظھر
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. سلمة بن الفضل -وهو الأبرش- من أثبت الناس في محمد ابن إسحاق، وقد صرح ابن إسحاق بالتحديث هنا، وقوله في السند: ابن سَعد بن زرارة، قال في "تهذيب الكمال": ويقال: ابن أسعد بن زرارة، وقال البخاري في "تاريخه الكبير" ٨/ ٢٨٣: من قال: سَعد بن زرارة فقد وهم. وأخرجه الطبري في "تاريخه" ٢/ ٣٩ من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، بهذا الإسناد. وأخرجه يونس بن بكير في "مغازيه" كما في "الإصابة" ٤/ ٢٨٦، ومن طريقه البيهقي ٩/ ٨٩، وابن الأثير في "أسد الغابة" ٣/ ٤٢٦ - ٤٢٧، والمزي في ترجمة سودة بنت زمعة من "تهذيب الكمال" عن محمد بن إسحاق، به. وقد جاء عندهم: ابن أسعد بن زرارة. على الصواب. وكذلك هو"سيرة ابن هشام" ٢/ ٢٩٩. وقول المصنف بإثر الحديث عن عوفٍ ومعوِّذ ابني عفراء بأنهما قتلا أبا جهل، قال صاحب "بذل المجهود" ١٢/ ٢٢٠: قلت: اللذان قتلا أبا جهل هما معاذ ومعوِّذ ابنا عفراء، وفي بعض الروايات ذُكر معاذ بن عمرو بن الجموح، ولم أر أحداً ذكر عوفاً فيمن قتل أبا جهل إلا أبا داود وابن سعد، فإنه قال في "طبقاته" ٤/ ٤٩٢ - ٤٩٣: وقُتِل عوف بن الحارث [الحارث هو والد معوِّذ ومعاذ وعوف، وأمهم عفراء] يوم بدر شهيداً، قتله أبو جهل ابن هشام بعد أن ضربه عوف وأخوه معوّذ ابنا الحارث، فأثبتاه. والذي في البخاري ومسلم أن الذي قتل أبا جهل هم ثلاثة: معاذ ومعوِّذ؟ ابني عفراء، ومعاذ بن عمرو بن الجموح، ولم أر لعوفٍ ذكراً وشركة في قتل أبي جهل. قلنا: وفي البخاري (٣١٤١)، ومسلم (١٧٥٢) من طريق ابن الماجشون … ، وفيهما: وكانا معاذَ بن عفراء ومعاذَ بن عمرو بن الجموح. وعوف ومعوّذ استشهدا يوم بدر، وأما معاذ فقال ابن الأثير في "أسد الغاية" ٥/ ١٩٨: شهد بدراً هو وأخوه عوف ومعوِّذ ابنا عفراء، وقُتِل عوف ومعوِّذ ببدرٍ، وسلم معاذ فشهد أحداً والخندق والمشاهد كلها مع رسول الله ﷺ … وقيل: إن معاذاً بقى إلى زمن عثمان، وقيل: إنه جرح ببدر وعاد إلى المدينة فتوفي بها. وقال خليفة: عاش معاذ إلى زمن علي.