সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، قَالَ حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ مُعَاذٍ، ح وَحَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ حَدَّثَنَا رَوْحٌ، قَالَ حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، عَنْ أَبِي طَلْحَةَ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا غَلَبَ عَلَى قَوْمٍ أَقَامَ بِالْعَرْصَةِ ثَلاَثًا . قَالَ ابْنُ الْمُثَنَّى إِذَا غَلَبَ قَوْمًا أَحَبَّ أَنْ يُقِيمَ بِعَرْصَتِهِمْ ثَلاَثًا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَانَ يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ يَطْعَنُ فِي هَذَا الْحَدِيثِ لأَنَّهُ لَيْسَ مِنْ قَدِيمِ حَدِيثِ سَعِيدٍ لأَنَّهُ تَغَيَّرَ سَنَةَ خَمْسٍ وَأَرْبَعِينَ وَلَمْ يُخْرِجْ هَذَا الْحَدِيثَ إِلاَّ بِأَخَرَةٍ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ يُقَالُ إِنَّ وَكِيعًا حَمَلَ عَنْهُ فِي تَغَيُّرِهِ .
আবূ ত্বালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো জাতির বিরুদ্ধে বিজয়ী হতেন, তখন সেখানে তিন দিন অবস্হান করতেন। ইবনুল মুসান্নার বর্ণনায় রয়েছে, যখন তিনি কোনো জাতির বিরুদ্ধে বিজয়ী হতেন, তখন তাদের এলাকায় তিন দিন অবস্হান করা তিনি উত্তম মনে করতেন। আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ আল-কাত্তান (রাহিমাহুল্লাহ) এ হাদীসের দোষারোপ করতেন। কারন এই হাদীসটি সাঈদ ইবনু আরুবার প্রথম দিকের হাদীস নয়। ৪৫ হিজরীতে তার স্মরনশক্তি দুর্বল হয়ে যায়। এই হাদীসটি তার শেষ বয়সেই বর্ণিত। আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তার স্মরনশক্তির এ পরিবর্তনের যুগেই ওয়াকী (রাহিমাহুল্লাহ) তার কাছ থেকে হাদীসটি অর্জন করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3065)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو طلحة: اسمه زيد بن سهل بن الأسود الأنصاري، مشهور بكنيته من كبار الصحابة، وأنس: هو ابن مالك الصحابي. وقتادة: هو ابن دِعامة، وسعيد: هو ابن أبي عروبة، ورَوح: هو ابن عُبادة. وسماع روح من سعيد بن أبي عروبة قبل اختلاطه. وأخرجه البخاري (٣٠٦٥) من طريق روح بن عُبادة، والترمذي (١٦٣٢)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٠٣) من طريق معاذ بن معاذ، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٣٥٥)، و"صحح ابن حبان" (٤٧٧٦). والعرصة: الساحة الواسعة بين الدور ليس فيها بناء، قال ابن الجوزي: إنما كان يُقيم ليظهر تأثير الغلبة وتنفيذ الأحكام، وقلة الاحتفال، فكأنه يقول: من كان فيه قوة منكم فليرجع إلينا.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، قَالَ حَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ السَّلاَمِ بْنُ حَرْبٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ مَيْمُونِ بْنِ أَبِي شَبِيبٍ، عَنْ عَلِيٍّ، أَنَّهُ فَرَّقَ بَيْنَ جَارِيَةٍ وَوَلَدِهَا فَنَهَاهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَنْ ذَلِكَ وَرَدَّ الْبَيْعَ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَمَيْمُونٌ لَمْ يُدْرِكْ عَلِيًّا قُتِلَ بِالْجَمَاجِمِ وَالْجَمَاجِمُ سَنَةُ ثَلاَثٍ وَثَمَانِينَ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَالْحَرَّةُ سَنَةُ ثَلاَثٍ وَسِتِّينَ وَقُتِلَ ابْنُ الزُّبَيْرِ سَنَةَ ثَلاَثٍ وَسَبْعِينَ .
‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বাঁদী ও তার সন্তানদের পৃথক করেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে এভাবে (আলাদাভাবে) বিক্রয় করতে নিষেধ করে এ বিক্রয় বাতিল করেন। আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, বর্ণনাকারী মাইমূন (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাক্ষাৎ পাননি। মাইমূন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল-জামাজিমের যুদ্ধে ৮৩ হিজরীতে নিহত হোন। আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন হাররার ঘটনা ঘটে ৬৩ হিজরী সনে এবং ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ৭৬ হিজরীতে শহীদ হোন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سندہ منقطع کما بینہ أبو داود رحمہ اللّٰہ ، وحدیث الترمذي (1283،1566) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 98)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضيف لانقطاعه، ميمون بن أبي شبيب لم يدرك علياً كما قال المصنف بإثر الحديث، وليس هو بذاك، الحكم: هو ابن عتيبة، ويزيد بن عبد الرحمن: هو الدالاني أبو خالد، وقد اختُلف في إسناده كما بينه الدارقطني في "العلل" ٣/ ٢٧٢ - ٢٧٥. وأخرجه الدارقطني (٣٠٤٢)، والحاكم ٢/ ٥٥ و١٢٥، والبيهقي ٩/ ١٢٦ من طريق يزيد بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٤٩)، والترمذي (١٣٣٠) من طريق الحجاج بن أرطاة، عن الحكم بن عتيبة، عن ميمون بن أبي شبيب، عن علي قال: وهب لي رسول الله ﷺ غلامين أخوين، فبعتُ أحدهما، فقال: "ما فعل الغلامان؟ "قلتُ: بعتُ أحدهما، قال: "رُدَّه". والحجاج بن أرطاة مدلس وقد عنعن. وهو في "مسند أحمد" (٨٠٠) بهذا اللفظ الأخير. وأخرجه بنحو هذا اللفظ الأخير أحمد (٧٦٠) عن محمد بن جعفر، والبزار (٦٢٤)، والبيهقي ٩/ ١٢٧ من طريق الحسن بن محمد الزعفراني، عن عبد الوهَّاب بن عطاء الخفاف، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، عن الحكم بن عتيبة، عن عبد الرحمن ابن أبي ليلى، عن علي. وسعيد لم يسمع من الحكم فيما قاله غير واحدٍ من أهل العلم. ويدل على ذلك رواية أحمد بن حنبل لهذا الحديث (١٠٤٥) عن عبد الوهَّاب ابن عطاء الخفاف، عن سعيد بن أبي عروبة، عن رجل، عن الحكم، به فذكر بينهما واسطة. وكذلك رواه محمد بن سواء عند إسحاق بن راهويه كما في "نصب الراية" ٤/ ٢٦، والبيهقي ٩/ ١٢٧ عن سعيد بن أبي عروبة. وانظر تمام تخريجه، والكلام عليه في "المسند" (١٠٤٥)، و"علل الدارقطني" ٣/ ٢٧٢ - ٢٧٥. وفي الباب عن أبي أيوب الأنصاري عند أحمد (٢٣٤٩٩)، والترمذي (١٣٢٩) ولفظه: "من فرق بين والدة وولدها، فرّق الله بينه وبين الأحبة يوم القيامة" وهو حديث حسن. والجماجم: موضع يُسمى دير الجماجم قرب الكونة، وبه كانت وقعة ابن الأشعث مع الحجاج، والحرة: أرض بظاهر المدينة، بها حجارة سود كثيرة بها كانت الوقعة بين جيش يزيد بن معاوية وبين أهل المدينة، وهي فيما يقول ابن حزم أكبر مصائب الإسلام وخرومه، لأن أفاضل المسلمين وبقية الصحابة وخيار المسلمين من جلة التابعين قتلوا جهراً ظلماً في الحرب وصبراً …
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ حَدَّثَنَا هَاشِمُ بْنُ الْقَاسِمِ، قَالَ حَدَّثَنَا عِكْرِمَةُ، قَالَ حَدَّثَنِي إِيَاسُ بْنُ سَلَمَةَ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي قَالَ، خَرَجْنَا مَعَ أَبِي بَكْرٍ وَأَمَّرَهُ عَلَيْنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَغَزَوْنَا فَزَارَةَ فَشَنَنَّا الْغَارَةَ ثُمَّ نَظَرْتُ إِلَى عُنُقٍ مِنَ النَّاسِ فِيهِ الذُّرِّيَّةُ وَالنِّسَاءُ فَرَمَيْتُ بِسَهْمٍ فَوَقَعَ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْجَبَلِ فَقَامُوا فَجِئْتُ بِهِمْ إِلَى أَبِي بَكْرٍ فِيهِمُ امْرَأَةٌ مِنْ فَزَارَةَ وَعَلَيْهَا قِشْعٌ مِنْ أَدَمٍ مَعَهَا بِنْتٌ لَهَا مِنْ أَحْسَنِ الْعَرَبِ فَنَفَّلَنِي أَبُو بَكْرٍ ابْنَتَهَا فَقَدِمْتُ الْمَدِينَةَ فَلَقِيَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لِي " يَا سَلَمَةُ هَبْ لِيَ الْمَرْأَةَ " . فَقُلْتُ وَاللَّهِ لَقَدْ أَعْجَبَتْنِي وَمَا كَشَفْتُ لَهَا ثَوْبًا . فَسَكَتَ حَتَّى إِذَا كَانَ مِنَ الْغَدِ لَقِيَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي السُّوقِ فَقَالَ " يَا سَلَمَةُ هَبْ لِيَ الْمَرْأَةَ لِلَّهِ أَبُوكَ " . فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَاللَّهِ مَا كَشَفْتُ لَهَا ثَوْبًا وَهِيَ لَكَ . فَبَعَثَ بِهَا إِلَى أَهْلِ مَكَّةَ وَفِي أَيْدِيهِمْ أَسْرَى فَفَادَاهُمْ بِتِلْكَ الْمَرْأَةِ .
ইয়াস ইবনু সালামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি (সালামাহ) বলেন, আমরা আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সঙ্গে অভিযানে বের হওয়ার সময়, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে আমাদের সেনাপতি নিযুক্ত করেন। আমরা ফাযারাহ গোত্রের বিরুদ্ধে হামলা করে তাদেরকে তছনছ করে দেই। অতঃপর আমি কিছু লোক দেখতে পাই। যাদের সাথে শিশু ও নারী ছিলো। আমি একটি তীর ছুড়ঁলে সেটা তাদের এবং পাহাড়ের মাঝখানে যেয়ে পরে। এতে তারা দাঁড়িয়ে যায়। আমি তাদেরকে ধরে আবূ বাকর এর কাছে নিয়ে আসি। তাদের মধ্যে ফাযারাহ গোত্রের এক মহিলা ছিলো। সে শুকনা চামড়া পরা ছিলো। তার কন্যাও তার সাথে ছিলো। ঐ কন্যাটি আরবের অন্যতম সুন্দরী। তার কন্যাকে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে (গনীমাত হিসাবে) প্রদান করলেন। আমি মদীনা্হয় ফিরে গেলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে সাক্ষাৎ করে আমাকে বললেনঃ হে সালামাহ! কন্যাটি আমাকে উপহার হিসাবে দিয়ে দাও। আমি বললাম, আল্লাহর শপথ! তার সৌন্দর্য আমাকে হতবাক করেছে। আমি তার পোষাক খুলিনি। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিশ্চুপ থাকলেন। পরের দিন সকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাজারে আমার সাথে সাক্ষাৎ করলেন। তিনি আমাকে বললেনঃ হে সালামা্হ! তুমি আল্লাহর ওয়াস্তে কন্যাটি আমাকে দিয়ে দাও। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! আমি তার পোশাক খুলিনি। সে আপনার জন্যই। কন্যাটি তিনি মাক্কাহবাসীদের কাছে পাঠিয়ে দিলেন। মাক্কাহবাসীদের হাতে কিছু মুসলিম বন্দী ছিলো। তাদের মুক্তির জন্য তিনি মেয়েটিকে বিনিময় হিসাবে মাক্কাহয় ফেরত দিয়ে তাদেরকে মুক্ত করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1755) ، مشکوۃ المصابیح (3948)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سلمة: هو ابن الأكوع، وعكرمة: هو ابن عمار اليمامي. وأخرجه مسلم (١٧٥٥)، وابن ماجه (٢٨٤٦)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦١٢) من طريق عكرمة بن عمار، به. وهو في "مسند أحمد" (١٦٥٠٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٦٠). قوله: "قشع من أدم" هو الجلد اليابس، وقيل: هو الفرو الخَلَق. قاله ابن الأثير في "النهاية". قال الخطابي: "عنق من الناس" يريد جماعة منهم، ومن هذا قوله تعالى: ﴿فَظَلَّتْ أَعْنَاقُهُمْ لَهَا خَاضِعِينَ﴾ [الشعراء: ٤] أي: جماعاتهم، ولو كان المراد به الرقاب لقيل: "خاضعات"، والله أعلم. وفي قوله: "نفلني أبو بكر ابنتها" دليل على أن النفل قبل الخمس. قال: وفيه دليل على جواز التفريق بين الأم وولدها الكبير، خلاف ما ذهب إليه أحمد بن حنبل. وفي قوله: "ما كشفت لها ثوباً" وسكوت النبي ﷺ وتركه الإنكار عليه دليل على أنهم كانوا يستبيحون إذ ذاك وطء الوثنيات، وذلك قبل نزوله من الحديبية، ولولا إقامة هذه الجارية على كفرها لما رُدَّت إلى أهل مكة وهم كفار إذ ذاك.
حَدَّثَنَا صَالِحُ بْنُ سُهَيْلٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي زَائِدَةَ - عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ غُلاَمًا، لاِبْنِ عُمَرَ أَبَقَ إِلَى الْعَدُوِّ فَظَهَرَ عَلَيْهِ الْمُسْلِمُونَ فَرَدَّهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى ابْنِ عُمَرَ وَلَمْ يُقْسَمْ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَقَالَ غَيْرُهُ رَدَّهُ عَلَيْهِ خَالِدُ بْنُ الْوَلِيدِ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন ইবনু ‘উমারের একটি গোলাম পালিয়ে শত্রুবাহিনীতে চলে যায়। মুসলিম সেনাবাহিনী যুদ্ধে বিজয়ী হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ইবনু ‘উমারের নিকট ফেরত দেন। তাকে গনিমাত হিসাবে বন্টন করেননি। আবূ দাউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি ছাড়া অন্য বর্ণনাকারী বলেছেন, খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গোলামটি তাকে ফেরত দেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * شاذ ، أخطأ ابن أبي زائدۃ وھو ثقۃ و روی من طرق صحیحۃ أن العبد ردّ بعد زمن النبي ﷺ وھو الصواب،انظر الحدیث الآتي (الأصل: 2699) ، (انوار الصحیفہ ص 98)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هو ابن عمر بن حفص العُمري، ويحيى: هو ابن زكريا بن أبي زائدة. وأخرج البخاري (٣٠٦٨) من طريق يحيى بن سعيد القطان، و (٣٠٦٩) من طريق موسى بن عقبة، كلاهما عن عُبيد الله بن عمر، عن نافع: أن عبداً لابن عمر أبق فلحق بالروم فظهر عليه خالد بن الوليد فردَّه على عبد الله، وأن فرساً لابن عمر عار فلحق بالروم، فظهر عليه فردَّوه على عبد الله. لفظ رواية يحيى، واقتصر موسى على ذكر الفرس. وسيأتي بعده بنحوه، فانظره. قال الخطابي: في هذا دليل على أن المشركين لا يُحرزون على المسلم مالاً بوجه، وأن المسلمين إذا استنقذوا من أيديهم شيئاً كان للمسلم، وكان عليهم ردُّه عليه، ولا يغنمونه. واختلفوا في هذا، فقال الشافعي: صاحب الشيء أحق به قُسم أو لم يُقسم. وقال الأوزاعي والثوري: إن أدركه صاحبه قبل أن يُقسم فهو له، وإن لم يدركه حتى قُسم كان أحق به، وكذلك قال أبو حنيفة، إلا أنه فرق بين المال يغلب عليه العدو، وبين العبد يأبق، فيأسره العدو: فقال في المال مثل قول الأوزاعي، وقال في العبد مثل قول الشافعي.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، وَالْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا ابْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ ذَهَبَ فَرَسٌ لَهُ فَأَخَذَهَا الْعَدُوُّ فَظَهَرَ عَلَيْهِمُ الْمُسْلِمُونَ فَرُدَّ عَلَيْهِ فِي زَمَنِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم . وَأَبَقَ عَبْدٌ لَهُ فَلَحِقَ بِأَرْضِ الرُّومِ فَظَهَرَ عَلَيْهِمُ الْمُسْلِمُونَ فَرَدَّهُ عَلَيْهِ خَالِدُ بْنُ الْوَلِيدِ بَعْدَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم .
ইবনু ‘উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তার একটি ঘোড়া ছুটে গেলে তা দুশমনরা ধরে নিয়ে যায়। অতঃপর মুসলিমরা বিজয়ী হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে তা পুনরায় তাকে ফেরত দেয়া হয়। (অপর বর্ণনায় রয়েছে) ইবনু ‘উমরের একটি গোলাম পালিয়ে রুম এলাকায় চলে যায়। মুসলিমরা রুমীদের বিরুদ্ধে বিজয়ী হলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পর খালিক ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গোলামটি পুনরায় তাকে ফিরিয়ে দেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ ابن ماجہ (2847 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن نمير: هو عبد الله بن نمير. وأخرجه البخاري تعليقا (٣٠٦٧)، وابن ماجه (٢٨٤٧) من طريق عبد الله بن نمير، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٤٨٤٥).
حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ يَحْيَى الْحَرَّانِيُّ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدٌ، - يَعْنِي ابْنَ سَلَمَةَ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ أَبَانَ بْنِ صَالِحٍ، عَنْ مَنْصُورِ بْنِ الْمُعْتَمِرِ، عَنْ رِبْعِيِّ بْنِ حِرَاشٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، قَالَ خَرَجَ عِبْدَانٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم - يَعْنِي يَوْمَ الْحُدَيْبِيَةِ - قَبْلَ الصُّلْحِ فَكَتَبَ إِلَيْهِ مَوَالِيهِمْ فَقَالُوا يَا مُحَمَّدُ وَاللَّهِ مَا خَرَجُوا إِلَيْكَ رَغْبَةً فِي دِينِكَ وَإِنَّمَا خَرَجُوا هَرَبًا مِنَ الرِّقِّ فَقَالَ نَاسٌ صَدَقُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ رُدَّهُمْ إِلَيْهِمْ . فَغَضِبَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَقَالَ " مَا أُرَاكُمْ تَنْتَهُونَ يَا مَعْشَرَ قُرَيْشٍ حَتَّى يَبْعَثَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ مَنْ يَضْرِبُ رِقَابَكُمْ عَلَى هَذَا " . وَأَبَى أَنْ يَرُدَّهُمْ وَقَالَ " هُمْ عُتَقَاءُ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ " .
‘আলী ইবনু আবূ ত্বালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুদায়বিয়ার দিন সন্ধি করার পূর্বে মুশরিকদের কিছু গোলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে পালিয়ে এলে তাদের মনিবরা তাকে চিঠি লিখে বলল, হে মুহাম্মাদ, আল্লাহর শপথ! এরা তোমার ধর্মের প্রতি আকৃস্ট হয়ে তোমার নিকট আসেনি। তারা তাদের গোলামী থেকে পালিয়ে এসেছে। কতিপয় লোক বলল, হে আল্লাহর রাসূল! মনিবরা সত্যেই বলেছে, এদেরকে তাদের নিকট ফিরিয়ে দিন। এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুবই নারাজ হলেন এবং বললেনঃ হে কুরাইশরা! আমি দেখছি তোমরা অন্যায় হতে বিরত হবে না, যতক্ষণ পর্যন্ত আল্লাহ তোমাদের বিরুদ্ধে এমন লোক না পাঠান যারা তোমাদের গর্দান উড়িয়ে দেয়। তিনি তাদেরকে ফিরিয়ে দিতে অস্বীকার করে বলেন; এরা মহান আল্লাহর অনুগ্রহে স্বাধীন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (3715) ، محمد بن إسحاق عنعن ورواہ الترمذي (3715) من حدیث شریک القاضي بہ وھومدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 98)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن. وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى" (١٠٩٣)، والطبراني في "الأوسط" (٤٣٠٧)، والحاكم ٢/ ١٢٥، والبيهقى ٩/ ٢٢٩ من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وصححه الحاكم وسكت عنه الذهبي. وأخرجه بنحوه أحمد (١٣٣٦)، والترمذي (٤٠٤٨)، والنسائي في "الكبرى" (٨٣٦٢) من طريق شريك بن عبد الله النخعي، عن منصور، به. وشريك سيئ الحفظ. ومع ذلك قال الترمذي: حديث حسن صحيح غريب، وصحح الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" كلا الطريقين وانظر "نصب الراية" ٣/ ٢٨١ - ٢٨٣ و "المغني" لابن قدامة ١٣/ ١١٦.
حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ حَمْزَةَ الزُّبَيْرِيُّ، قَالَ حَدَّثَنَا أَنَسُ بْنُ عِيَاضٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ جَيْشًا، غَنِمُوا فِي زَمَانِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم طَعَامًا وَعَسَلاً فَلَمْ يُؤْخَذْ مِنْهُمُ الْخُمُسُ .
ইবনু ‘উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদল সৈনিক রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে গনীমাত হিসাবে কিছু খাদ্যশস্য ও মধু পায়। কিন্তু তার এক –পঞ্চমাংশ নেয়া হয়নি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4021) ، رواہ البخاري (3154)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي، إبراهيم بن حمزة صدوق لا بأس به، وهو تابع. وأخرجه ابن حبان (٤٨٢٥) من طريق شعيب بن إسحاق، والطبراني في "الكبرى" (١٣٣٧٢)، وفي "الأوسط" (٨٩٤) و (٥٣٠١)، والبيهقي ٩/ ٥٩ من طريق أنس بن عياض، كلاهما عن عُبيد الله بن عمر، به. وأخرج البخاري (٣١٥٤) من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر قال: كنا نصيب في مغازينا العسل والعنب، فنأكله ولا نرفعه. قال الخطابي: لا أعلم خلافاً بين الفقهاء في أن الطعام لا يخمس في جملة ما يخمس من الغنيمة، وأن لواجده أكلَه، ما دام الطعام في حدِّ القلة، وعلى قدر الحاجة، وما دام صاحبه مقيماً في دار الحرب، وهو مخصوص من عموم الآية ببيان النبي ﷺ، كما خصّ منها السَّلَب وسهم النبي ﷺ والصفي، ورخص أكثر العلماء في علف الدواب، ورأوه في معنى الطعام، للحاجة إليه.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، وَالْقَعْنَبِيُّ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ، عَنْ حُمَيْدٍ، - يَعْنِي ابْنَ هِلاَلٍ - عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُغَفَّلٍ، قَالَ دُلِّيَ جِرَابٌ مِنْ شَحْمٍ يَوْمَ خَيْبَرَ - قَالَ - فَأَتَيْتُهُ فَالْتَزَمْتُهُ - قَالَ - ثُمَّ قُلْتُ لاَ أُعْطِي مِنْ هَذَا أَحَدًا الْيَوْمَ شَيْئًا - قَالَ - فَالْتَفَتُّ فَإِذَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَتَبَسَّمُ إِلَىَّ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, খায়বার যুদ্ধের দিন চর্বিভর্তি একটি ব্যাগ পরে থাকতে দেখে আমি তা উঠিয়ে নিয়ে বললাম, এ চর্বি থেকে কাউকে একটুও দিবো না। বর্ণনাকারী বলেন, দৃষ্টি ফিরিয়ে দেখি, রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দিকে তাকিয়ে মুচকি হাসছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3153) صحیح مسلم (1772)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سليمان: هو ابن المغيرة القيسي، والقعنبي: هو عبد الله بن مسلمة. وأخرجه مسلم (١٧٧٢)، والنسائي (٤٤٣٥) من طريق سليمان بن المغيرة، والبخاري (٣١٥٣)، ومسلم (١٧٧٢) من طريق شعبة بن الحجاج، كلاهما عن حميد ابن هلال، عن ابن مغفل. وهو في "مسند أحمد" (١٦٧٩١) و (٢٠٥٥٥). قال القاضي عياض: أجمع العلماء على جواز أكل طعام الحربيين ما دام المسلمون في دار الحرب على قدر حاجتهم، ويجوز بإذن الإمام وبغير إذنه، ولم يشترط أحد من العلماء استئذانه إلا الزهري.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، قَالَ حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، - يَعْنِي ابْنَ حَازِمٍ - عَنْ يَعْلَى بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ أَبِي لُبَيْدٍ، قَالَ كُنَّا مَعَ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سَمُرَةَ بِكَابُلَ فَأَصَابَ النَّاسُ غَنِيمَةً فَانْتَهَبُوهَا فَقَامَ خَطِيبًا فَقَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنْهَى عَنِ النُّهْبَى . فَرَدُّوا مَا أَخَذُوا فَقَسَمَهُ بَيْنَهُمْ .
আবূ লাবীদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা এক অভিযানে কাবুল নামক জায়গায় ‘আবদুর রাহমান ইবনু মাসুরাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সঙ্গী হই। গনীমাত সংগ্রহণের সুযোগ এলে লোকেরা তা লুণ্ঠন করে নেয়। ‘আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে “গনীমাত বণ্টনের পূর্বে তা থেকে কিছু নিতে নিষেধ করতে শুনেছি”। সুতরাং লোকেরা যা নিয়েছিল তা ফেরত দিলো। পরে তিনি সেগুলোকে তাদের মধ্যে বণ্টন করে দিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ أحمد (5/62، 63)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: مرفوعه صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل أبي لبيد -واسمه لمازة ابن زبّار الأزدي- وباقي رجاله ثقات. وأخرجه أحمد (٢٠٦١٩)، والدارمي (١٩٩٥)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار"، وابن قانع في "معجم الصحابة" ٢/ ١٦٧ - ١٦٨ من طريق جرير بن حازم، بهذا الإسناد. وفي باب النهي عن النُّهبى عن أبي هريرة عند البخاري (٢٤٧٥)، ومسلم (٥٧). وعن عبد الله بن يزيد الأنصاري عند البخاري (٢٤٧٤). وانظر تمام شواهده في "المسند" عند حديث أبي هريرة (٨٣١٧). قال الخطابي: "النُّهبى" اسم مبني على فُعْلَى: من النهب، كالرُّغبَى من الرَّغبة. وإنما نهى عن النهب، لأن الناهب إنما يأخذه على قدر قوته، لا على قدر استحقاقه، فيؤدي ذلك إلى أن يأخذ بعضهم فوق حظه، وأن يبخس بعضهم حقه. وإنما لهم سهام معلومة: للفارس سهمان، وللراجل سهم، فإذا انتهبوا الغنيمة بطلت القسمة وعدمت التسوية. وكابل: هي عاصمة أفغانستان الواقعة شمال باكستان، افتتحها الأحنف بن قيس عام (٢٢ هـ) في خلافة عمر ﵁.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ الشَّيْبَانِيُّ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ أَبِي مُجَالِدٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي أَوْفَى، قَالَ قُلْتُ هَلْ كُنْتُمْ تُخَمِّسُونَ - يَعْنِي الطَّعَامَ - فِي عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ أَصَبْنَا طَعَامًا يَوْمَ خَيْبَرَ فَكَانَ الرَّجُلُ يَجِيءُ فَيَأْخُذُ مِنْهُ مِقْدَارَ مَا يَكْفِيهِ ثُمَّ يَنْصَرِفُ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে কি আপনারা খাদ্যদ্রব্য থেকেও এক-পঞ্চমাংশ বের করতেন? এক সাহাবী বললেন, খায়বারের যুদ্ধের দিন আমরা খাদ্যদ্রব্য পাই। লোকজন এসে তাদের প্রয়োজন মত খাদ্যদ্রব্য উঠিয়ে নিয়ে চলে যেতো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4020)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو إسحاق الشيباني: سليمان بن أبي سليمان، وأبو معاوية: هو محمد بن خَازم الضرير، ومحمد بن العلاء: هو أبو كُريب الهمْداني، مشهور بكنيته. وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (٢٧٤٠)، وأحمد (١٩١٢٤)، وابن الجارود (١٠٧٢)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٣٤٥٤)، والحاكم ٢/ ١٢٦ و ١٣٣ - ١٣٤، والبيهقي في"السنن الكبرى" ٩/ ٦٠، وفي "دلائل النبوة" ٤/ ٢٤١ من طريق أبي إسحاق الشيباني، به.
حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ عَاصِمٍ، - يَعْنِي ابْنَ كُلَيْبٍ - عَنْ أَبِيهِ، عَنْ رَجُلٍ، مِنَ الأَنْصَارِ قَالَ خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سَفَرٍ فَأَصَابَ النَّاسَ حَاجَةٌ شَدِيدَةٌ وَجَهْدٌ وَأَصَابُوا غَنَمًا فَانْتَهَبُوهَا فَإِنَّ قُدُورَنَا لَتَغْلِي إِذْ جَاءَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَمْشِي عَلَى قَوْسِهِ فَأَكْفَأَ قُدُورَنَا بِقَوْسِهِ ثُمَّ جَعَلَ يُرَمِّلُ اللَّحْمَ بِالتُّرَابِ ثُمَّ قَالَ " إِنَّ النُّهْبَةَ لَيْسَتْ بِأَحَلَّ مِنَ الْمَيْتَةِ " . أَوْ " إِنَّ الْمَيْتَةَ لَيْسَتْ بِأَحَلَّ مِنَ النُّهْبَةِ " . الشَّكُّ مِنْ هَنَّادٍ .
‘আসিম ইবনু কুলাইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি একজন আনসারীর নিকট হতে বর্ণনা করেন যে, আনসার লোকটি বললেন, একদা আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে এক সফরে বের হই। লোকেরা ভীষণ খাদ্যকস্টের শিকার হলো। ইতোমধ্যে কিছু সংখ্যক বকরী তাদের হস্তগত হয়। কিন্তু বণ্টনের পূর্বেই তারা সেগুলো লুণ্ঠন করে নেয়। আমাদের হাঁড়িগুলাতে গোশত টগবগ করে ফুটছিল। এমন সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার ধনুকে ভর দিয়ে এখানে উপস্থিত হলেন এবং ধুনুক দিয়ে গোশতের হাঁড়ি উল্টিয়ে ফেলে দিয়ে তা বালির সাথে মিশিয়ে দিলেন। তিনি বললেনঃ এই লুটের মাল মৃত জন্তুর চাইতে কিছু কম নয় অথবা বলেছেনঃ মৃত জন্তু এই লুটের মালের চেয়ে কিছু কম নয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عاصم بن كليب -وهو ابن شهاب- وأبيه، فهما صدوقان لا بأس بهما، لكن روي الحديث من وجه آخر عن رافع بن خديج وهو أنصاري، فلعله هو، والله أعلم. أبو الأحوص: هو سلاّم بن سُليم. وأخرجه سعيد بن منصور (٢٦٣٦)، والبيهقي ٩/ ٦١ من طريق عاصم بن كليب، به. وأخرج البخاري (٢٤٨٨)، ومسلم (١٩٦٨)، وابن ماجه (٣١٣٧)، والترمذي (١٦٩١)، والنسائي (٤٢٩٧) عن رافع بن خديج، نحوه. إلا أنه قال: فأمر النبيُّ بالقدور فأكفئت، ثم قسم، فعدل عشرة من الغنم ببعير. وانظر في شرح هذا الحديث "فتح الباري" ٩/ ٦٢٦ - ٦٢٧ رقم الحديث (٥٤٩٨).
حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ الْحَارِثِ، أَنَّ ابْنَ حَرْشَفٍ الأَزْدِيَّ، حَدَّثَهُ عَنِ الْقَاسِمِ، مَوْلَى عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ بَعْضِ، أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ كُنَّا نَأْكُلُ الْجَزْرَ فِي الْغَزْوِ وَلاَ نَقْسِمُهُ حَتَّى إِنْ كُنَّا لَنَرْجِعُ إِلَى رِحَالِنَا وَأَخْرِجَتُنَا مِنْهُ مُمْلاَةٌ .
‘আবদুর রহমানের (রাহিমাহুল্লাহ) আযাদকৃত গোলাম আল-ক্বাসিম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর জনৈক সাহাবী হতে বর্ণনা করেন, আমরা যুদ্ধের সময় (গনীমাতের) উট যবাহ করে খেতাম, বণ্টন করতাম না। এমনকি আমরা যখন দেশে ফিরে যেতাম তখন আমাদের থলি গোশতে ভরা থাকতো।
দুর্বল, মিশকাত (৪০২২)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن حرشف: مجہول (تق: 8463) ، (انوار الصحیفہ ص 98)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة ابن حرشف. القاسم مولى عبد الرحمن: هو نفسه القاسم بن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن صاحب أبي أمامة. وهو في "سنن سعيد بن منصور" (٢٧٣٩). وأخرجه سحنون في "المدونة الكبرى" ٣/ ٣٨ عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. إلا أنه قال: عن رجل من أهل الأردن، بدل: ابن حرشف. وأخرجه البيهقي ٩/ ٦١ من طريق هشيم بن بشير، عن عمرو بن الحارث، به.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُصَفَّى، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ يَحْيَى بْنِ حَمْزَةَ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو عَبْدِ الْعَزِيزِ، - شَيْخٌ مِنْ أَهْلِ الأُرْدُنِّ - عَنْ عُبَادَةَ بْنِ نُسَىٍّ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ غَنْمٍ، قَالَ رَابَطْنَا مَدِينَةَ قِنَّسْرِينَ مَعَ شُرَحْبِيلَ بْنِ السِّمْطِ فَلَمَّا فَتَحَهَا أَصَابَ فِيهَا غَنَمًا وَبَقَرًا فَقَسَمَ فِينَا طَائِفَةً مِنْهَا وَجَعَلَ بَقِيَّتَهَا فِي الْمَغْنَمِ فَلَقِيتُ مُعَاذَ بْنَ جَبَلٍ فَحَدَّثْتُهُ فَقَالَ مُعَاذٌ غَزَوْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَيْبَرَ فَأَصَبْنَا فِيهَا غَنَمًا فَقَسَمَ فِينَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم طَائِفَةً وَجَعَلَ بَقِيَّتَهَا فِي الْمَغْنَمِ .
‘আবদুর রহমান ইবনু গানাব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা শুরাহবীল ইবনুস সিমতের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নেতৃত্বে কিন্নাসরীন শহর অবরোধ করি। তা বিজিতি হলে সেখানে মেষ ও গরু গনীমাত হিসাবে লাভ হলো। তিনি এর একটি অংশ আমাদের মধ্যে বন্টন করে বাকী অংশ গনীমাতের খাতে রেখে দিলেন। পরে আমি মু’আয ইবনু জাবালের সাথে দেখা করে তার সঙ্গে এ বিষয়ে আলাপ করি। তিনি বললেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে খায়বারের যুদ্ধে যোগদান করেছিলাম। সেখানে আমরা কিছু মেষ পেলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার একটা অংশ আমাদের মাঝে বন্টন করেন এবং বাকী অংশ গনীমাতের খাতে রেখে দেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل محمد بن المصفى وأبي عبد العزيز -وهو يحى بن عبد العزيز- فهما صدوقان حسنا الحديث، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٠/ (١٧٠)، وفي "الأوسط" (٦٧٣٧)، والبيهقي ٩/ ٦٠ من طريق يحيى بن حمزة، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الكبير"٢٠/ (١٣١) من طريق رشدين بن سعد، عن عبد الرحمن بن زياد بن أنعُم، عن عبادة بن نسيّ، به. وقنسرين: مدينة بالشام، بينها وبين حلب اثنا عشر ميلاً، فتحها أبو عبيدة بن الجراح، ﵁ سنة (١٧ هـ).
حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، وَعُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، - الْمَعْنَى - قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَأَنَا لِحَدِيثِهِ، أَتْقَنُ - قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ أَبِي مَرْزُوقٍ، مَوْلَى تُجَيْبٍ عَنْ حَنَشٍ الصَّنْعَانِيِّ، عَنْ رُوَيْفِعِ بْنِ ثَابِتٍ الأَنْصَارِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَبِالْيَوْمِ الآخِرِ فَلاَ يَرْكَبْ دَابَّةً مِنْ فَىْءِ الْمُسْلِمِينَ حَتَّى إِذَا أَعْجَفَهَا رَدَّهَا فِيهِ وَمَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَبِالْيَوْمِ الآخِرِ فَلاَ يَلْبَسْ ثَوْبًا مِنْ فَىْءِ الْمُسْلِمِينَ حَتَّى إِذَا أَخْلَقَهُ رَدَّهُ فِيهِ " .
রুয়াইফি’ ইবনু সাবিত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি আল্লাহ ও আখিরাতের উপর ঈমান রাখে সে যেন মুসলিমদের ‘ফাই’লব্ধ পশুর পিঠে সওয়ার না হয়। সে সওয়ারী হিসাবে ব্যবহার করে তাকে দুর্বল করে গনীমাতে ফেরত দেয় (এরূপ করা উচিত নয়)। যে ব্যক্তি আল্লাহ ও আখিরাতের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন মুসলিমদের গনীমাতের পোশাক না পরে, এমনকি সে তা পুরাতন করে গনীমাতে ফেরত দেয় (এটা ঠিক নয়)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، تقدم طرفہ (2158، 2159) محمد بن إسحاق بن یسار صرح بالسماع عند أحمد وأبي داود وغیرھما
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح بشواهده، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرح بالسماع عند أحمد (١٦٩٩٧) فانتفت شبهة تدليسه. وباقي رجاله ثقات. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير. وقد سلف برقم (٢١٥٩). قال الخطابي: أما في حال الضرورة وقيام الحرب فلا أعلم بين أهل العلم اختلافاً في جواز استعمال سلاح العدو ودوابهم، فأما إذا انقضت الحرب، فإن الواجب ردُّها في المغنم. فأما الثياب والخرثى والأدوات فلا يجوز أن يستعمل شيئاً منها إلا أن يقول قائل الثياب: إنه إذا احتاج إلى شيء منها حاجة ضرورة كان له أن يستعمله مثل أن يشتد البرد فيستدفئ بثوب ويتقوى به على المقام في بلاد العدو مرصداً لقتالهم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، قَالَ أَخْبَرَنَا إِبْرَاهِيمُ، - يَعْنِي ابْنَ يُوسُفَ بْنِ إِسْحَاقَ بْنِ أَبِي إِسْحَاقَ السَّبِيعِيَّ - عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ السَّبِيعِيِّ، حَدَّثَنِي أَبُو عُبَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ مَرَرْتُ فَإِذَا أَبُو جَهْلٍ صَرِيعٌ قَدْ ضُرِبَتْ رِجْلُهُ فَقُلْتُ يَا عَدُوَّ اللَّهِ يَا أَبَا جَهْلٍ قَدْ أَخْزَى اللَّهُ الأَخِرَ . قَالَ وَلاَ أَهَابُهُ عِنْدَ ذَلِكَ . فَقَالَ أَبْعَدُ مِنْ رَجُلٍ قَتَلَهُ قَوْمُهُ فَضَرَبْتُهُ بِسَيْفٍ غَيْرِ طَائِلٍ فَلَمْ يُغْنِ شَيْئًا حَتَّى سَقَطَ سَيْفُهُ مِنْ يَدِهِ فَضَرَبْتُهُ بِهِ حَتَّى بَرَدَ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু মাস’ঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি (বদর) যুদ্ধের ময়দানে আবূ জাহলকে মাটিতে ধরাশায়ী দেখতে পেয়ে তার পায়ে আঘাত করে বললাম, হে আল্লাহর দুশমন! হে জাহল! অবশেষে আল্লাহ তোমাকে লাঞ্ছিত করলেন। তিনি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি এ সময় তাকে একটুও ভয় করিনি। সে বললো, আশ্চর্যের বিষয়, এক ব্যক্তিকে তার কওমের লোকেরাই হত্যা করলো। আমি তাকে তরবারি দিয়ে আঘাত হানলাম, কিন্তু কাজ হলো না। তবে তার হাত থেকে তার তরবারিটা পড়ে গেল। আমি তা তুলে নিয়ে তাকে পুনরায় আঘাত হানলে সে ঠান্ডা হয়ে যায় (মৃত্যু বরণ করে)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی فی الکبریٰ (8670) ، أبو إسحاق السبیعي عنعن وأبو عبیدۃ عن أبیہ: منقطع ، وحدیث البخاري (39613963) ومسلم (1800) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 98، 99)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه، فإن أبا عبيدة -وهو ابن عبد الله بن مسعود- لم يسمع من أبيه، وإبراهيم بن يوسف -وإن كان ضعيفاً- متابع، لكن وردت قصة مقتل أبي جهل في "سيرة ابن إسحاق" من وجه آخر كما سيأتي. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٤/ ٣٧٣، وأحمد (٣٨٢٤) و (٤٢٤٦)، وأبو يعلى (٥٢٣٢)، والشاشي (٩٣٢)، والطبراني في "الكبير" (٨٤٦٨ - ٨٤٧١)، والبيهقي في "السنن" ٩/ ٦٢، وفي "دلائل النبوة" ٣/ ٨٧ و٨٨ من طريق أبي عُبيدة، عن أبيه. وأخرج ابن إسحاق في "سيرته" كما في "سيرة ابن هشام" ٢/ ٢٨٨ قال: حدثني ثور بن زيد، عن عكرمة، عن ابن عباس وعبد الله بن أبي بكر أيضاً قد حدثني ذلك، قالا: … فذكر قصة مقتلهِ إلى أن قال: فمر عبد الله بن مسعود بأبي جهل، حين أمر رسول الله ﷺ أن يُلتمس في القتلى، قال ابن مسعود: فوجدته بآخر رمقٍ فعرفتُه، فوضعت رجلي عدى عنقه، قال: وقد كان ضَبَثَ بي مرة بمكة (يعني قبض عليه ولزمه) فآذاني ولكَزَني، ثم قلت له: هل أخزاك الله يا عدوّ الله؟ قال: وبماذا أخزاني! أعمَدُ من رجلِ قتلتموه! أخبرني لمن الدائرة اليوم؟ قلت: لله ولرسوله. وهذا إسناد حسن، لأن ابن إسحاق صرح بسماعه. وقد تحرف ثور بن زيد في "سيرة ابن هشام" إلى: ثور بن يزيد. وأخرجه من طريق ابن إسحاق الطبري في "تاريخه" ٢/ ٣٧. قال الخطابي: قوله: "أبعد من رجل" هكذا رواه أبو داود. وهو غلط، إنما هو: "أعمد من رجل" بالميم بعد العين، وهي كلمة للعرب، معناها: كأنه يقول: هل زاد على رجل قتله قومه، يهوِّن على نفسه ما حلّ به من الهلاك. حكاها أبو عبيد عن أبي عُبيدة معمر بن المثنى، وأنشد لابن ميادة: وأعمدُ مِن قوم كفاهم أخوهُم … صدامَ الأعادي حين فلَّتْ نيوبُها يقول: هل زادنا على أن كفينا إخواننا؟ وقوله: "برد" يريد مات، وأصل الكلمة من الثبوت. يريد سكون الموت، وعدم حركة الحياة، ومن ذلك قولهم: برد لي على فلان حقّ، أي: ثبت. وقوله: "غير طائل" أي غير ماض، وأصل الطائل: النفع والعائدة، يقال: أتيت فلاناً فلم أر عنده طائلاً. وفيه أنه قد استعمل سلاحه في قتله، وانتفع به قبل القسم.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، أَنَّ يَحْيَى بْنَ سَعِيدٍ، وَبِشْرَ بْنَ الْمُفَضَّلِ، حَدَّثَاهُمْ عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ يَحْيَى بْنِ حَبَّانَ، عَنْ أَبِي عَمْرَةَ، عَنْ زَيْدِ بْنِ خَالِدٍ الْجُهَنِيِّ، أَنَّ رَجُلاً، مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم تُوُفِّيَ يَوْمَ خَيْبَرَ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " صَلُّوا عَلَى صَاحِبِكُمْ " . فَتَغَيَّرَتْ وُجُوهُ النَّاسِ لِذَلِكَ فَقَالَ " إِنَّ صَاحِبَكُمْ غَلَّ فِي سَبِيلِ اللَّهِ " . فَفَتَّشْنَا مَتَاعَهُ فَوَجَدْنَا خَرَزًا مِنْ خَرَزِ يَهُودَ لاَ يُسَاوِي دِرْهَمَيْنِ .
যায়িদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবীদের একজন খায়বার যুদ্ধের দিন মারা যায়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দেয়া হলে তিনি বললেনঃ তোমরা তোমাদের সাথীর জানাযা পড়ে নাও। তাঁর এ কথা শুনে লোকদের চেহারা (ভয়ে) পরিবর্তন হলো। তিনি বললেনঃ তোমাদের সাথী আল্লাহর পথে (গনীমাতের মাল) চুরি করেছে। আমরা তাঁর জিনিসপত্র অনুসন্ধান করে ইয়াহুদীদের ব্যবহৃত একটি পুঁতির মালা পাই, যার মূল্য দুই দিরহামও নয়।
দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি’উস সাগীর (৩৪৮১), যঈফ সুনান ইবনু মাজাহ (৬২৫/২৮৪৮), ইরওয়া (৭২৬), মিশকাত (৪০১১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4011) ، أخرجہ النسائي (1961 وسندہ حسن) وابن ماجہ (2848 وسندہ حسن) أبو عمرۃ الأنصاري حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: اسناده محتمل للتحسين. أبو عمرة: هو مولى زيد بن خالد مجهول الحال، فلم يرو عنه غير محمد بن يحيى بن حبان، ولم يُؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وقال الحاكم: رجل معروف بالصدق، وأقره الذهبي. وقد سمى بعضهم أبا عمرة: ابن أبي عمرة -وهو عبد الرحمن الثقة- وهو خطأ، وانظر تفصيل ذلك في "المسند" (١٧٠٣١). وأخرجه ابن ماجه (٢٨٤٨)، والنسائي (١٩٥٩) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٠٣١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٥٣). قال الفقهاء: إذا مات الفاسق المصر على فسقه يجوز أن يمتنع من الصلاة عليه الأئمة الذين يقتدى بهم، بل يأمرون الناس أن يُصلوا عليه.
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ ثَوْرِ بْنِ زَيْدٍ الدِّيلِيِّ، عَنْ أَبِي الْغَيْثِ، مَوْلَى ابْنِ مُطِيعٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّهُ قَالَ خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَامَ خَيْبَرَ فَلَمْ يَغْنَمْ ذَهَبًا وَلاَ وَرِقًا إِلاَّ الثِّيَابَ وَالْمَتَاعَ وَالأَمْوَالَ - قَالَ - فَوَجَّهَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَحْوَ وَادِي الْقُرَى وَقَدْ أُهْدِيَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَبْدٌ أَسْوَدُ يُقَالُ لَهُ مِدْعَمٌ حَتَّى إِذَا كَانُوا بِوَادِي الْقُرَى فَبَيْنَا مِدْعَمٌ يَحُطُّ رَحْلَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذْ جَاءَهُ سَهْمٌ فَقَتَلَهُ فَقَالَ النَّاسُ هَنِيئًا لَهُ الْجَنَّةُ . فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " كَلاَّ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ إِنَّ الشَّمْلَةَ الَّتِي أَخَذَهَا يَوْمَ خَيْبَرَ مِنَ الْمَغَانِمِ لَمْ تُصِبْهَا الْمَقَاسِمُ لَتَشْتَعِلُ عَلَيْهِ نَارًا " . فَلَمَّا سَمِعُوا ذَلِكَ جَاءَ رَجُلٌ بِشِرَاكٍ أَوْ شِرَاكَيْنِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " شِرَاكٌ مِنْ نَارٍ " . أَوْ قَالَ " شِرَاكَانِ مِنْ نَارٍ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে আমরা খায়বারের যুদ্ধে বের হলাম। তাতে গনীমাত হিসেবে কাপড়-চোপড়, মালপত্র ইত্যাদি ছাড়া সোনা-রূপা পাইনি। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওয়াদিল-কুরার দিকে রওয়ানা হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে মিদ’আম নামের একটি কালো গোলাম উপহার দেয়া হয়েছিল। অবশেষে তারা ওয়াদিল কুরায় পৌঁছলে মিদ’আম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উটের পালান খুলছিল। হঠাৎ একটি তীর এসে তার উপর পতিত হলে সে মারা যায়। লোকেরা বললোঃ তার জন্য কল্যাণ হয়েছে, তার জন্য জান্নাত ওয়াজিব। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কখনও নয়। ঐ সত্ত্বার শপথ, যাঁর হাতে আমার প্রাণ। খায়বারের যুদ্ধের দিন বন্টনের পূর্বে সে গনীমাতের যে চাদর চুরি করেছিল তা আগুন হয়ে তাকে দগ্ধ করছে। অতঃপর তারা যখন এ কথা শুনলো, এক ব্যক্তি একটি বা দু’টি চামড়ার লম্বা টুকরা নিয়ে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে হাজির হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ চামড়ার টুকরাটি আগুনের, অথবা তিনি বললেনঃ চামড়ার এই টুকরা দু’টি আগুনের ফিতা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6707) صحیح مسلم (115)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الغيث مولى ابن مطيع: اسمه سالم، والقعنبي: هو عبد الله ابن مسلمة. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٤٥٩، ومن طريقه أخرجه البخاري (٤٢٣٤)، ومسلم (١١٥)، والنسائى (٣٨٢٧). وأخرجه مسلم (١١٥) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن ثور بن زيد، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٤٨٥١). وقوله في الحديث: عن أبي هريرة أنه قال: خرجنا مع رسول الله ﷺ عام خيبر. ولفظ البخاري: افتتحنا خيبر، فحكى الدارقطني عن موسى بن هارون قال: وهم ثور ابن زيد في هذا الحديث، لأن أبا هريرة لم يخرج مع النبي ﷺ إلى خيبر، وإنما قدم بعد خروجهم من المدينة إلى خيبر، وقدم عليهم خيبر بعد أن فتحت. انظر "تحفة الأشراف" ٩/ ٤٥٩، وفتح الباري ٧/ ٤٨٨.
حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، مَحْبُوبُ بْنُ مُوسَى قَالَ أَخْبَرَنَا أَبُو إِسْحَاقَ الْفَزَارِيُّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ شَوْذَبٍ، قَالَ حَدَّثَنِي عَامِرٌ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الْوَاحِدِ - عَنِ ابْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أَصَابَ غَنِيمَةً أَمَرَ بِلاَلاً فَنَادَى فِي النَّاسِ فَيَجِيئُونَ بِغَنَائِمِهِمْ فَيُخَمِّسُهُ وَيُقَسِّمُهُ فَجَاءَ رَجُلٌ بَعْدَ ذَلِكَ بِزِمَامٍ مِنْ شَعَرٍ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَذَا فِيمَا كُنَّا أَصَبْنَاهُ مِنَ الْغَنِيمَةِ . فَقَالَ " أَسَمِعْتَ بِلاَلاً يُنَادِي " . ثَلاَثًا . قَالَ نَعَمْ . قَالَ " فَمَا مَنَعَكَ أَنْ تَجِيءَ بِهِ " . فَاعْتَذَرَ إِلَيْهِ فَقَالَ " كُنْ أَنْتَ تَجِيءُ بِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَلَنْ أَقْبَلَهُ عَنْكَ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গনীমাতের মাল জমা করার জন্য বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ঘোষণা করার নির্দেশ দিতেন। তিনি ঘোষণা দিলে লোকেরা তাদের গনীমাত নিয়ে এসে জমা করতো। তিনি তা থেকে এক-পঞ্চমাংশ বাদ দিয়ে অবশিষ্ট মালবন্টন করে দিতেন। একদা এক ব্যক্তি গনীমাত বন্টনের পর পশমের একটি দড়ি নিয়ে উপস্থিত হয়ে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! এই দড়িটা আমাদের গনীমাতের অংশ। তিনি বললেনঃ বিলাল যে তিনবার ঘোষণা দিল তা কি তুমি শুনতে পেয়েছিলে? লোকটি বলল, হাঁ। তিনি বললেনঃ তাহলে কিসে তোমাকে এটা নিয়ে উপস্থিত হতে বাঁধা দিলো? সে কিছু ওজর পেশ করলে তিনি বললেনঃ তুমি এভাবেই থাকো, তুমি ক্বিয়ামাতের দিন এটাসহ উপস্থিত হবে। আমি তোমার থেকে এটা গ্রহণ করবো না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4012)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل عامر بن عبد الواحد -وهو الأحول-. ابن بريدة: هو عبد الله، وأبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث. وأخرجه أحمد (٦٩٩٦)، وابن حبان (٤٨٠٩)، والطبراني في "الأوسط" (٨٠٢٣)، وفي "مسند الشاميين" (١٢٨٠)، والحاكم ٢/ ١٢٧ و ١٣٩، والبيهقي في "السنن" ٦/ ٢٩٣ و ٣٢٤ و ٨/ ٣٢٢ و ٩/ ١٠٢ من طريق عبد الله بن شوذب، بهذا الإسناد. وقوله: "فلن أقبله عنك" قال الطيبي: هذا وارد على سبيل التغليظ، لا أن توبته غير مقبولة، ولا أن ردَّ المظالم على أهلها أو الاستحلال منهم غير ممكن. وقال المظهر: وإنما لم يقبل ذلك منه، لأن جميع الغانمين فيه شركة، وقد تفرقوا وتعذر إيصال نصيب كل واحد منهم منه إليه، فتركه في يده، ليكون إثمه عليه لأنه هو الغاصب. أفاده في "المرقاة".
حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، وَسَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُحَمَّدٍ، - قَالَ النُّفَيْلِيُّ الأَنْدَرَاوَرْدِيُّ - عَنْ صَالِحِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ زَائِدَةَ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَصَالِحٌ هَذَا أَبُو وَاقِدٍ - قَالَ دَخَلْتُ مَعَ مَسْلَمَةَ أَرْضَ الرُّومِ فَأُتِيَ بِرَجُلٍ قَدْ غَلَّ فَسَأَلَ سَالِمًا عَنْهُ فَقَالَ سَمِعْتُ أَبِي يُحَدِّثُ عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِذَا وَجَدْتُمُ الرَّجُلَ قَدْ غَلَّ فَأَحْرِقُوا مَتَاعَهُ وَاضْرِبُوهُ " . قَالَ فَوَجَدْنَا فِي مَتَاعِهِ مُصْحَفًا فَسَأَلَ سَالِمًا عَنْهُ فَقَالَ بِعْهُ وَتَصَدَّقْ بِثَمَنِهِ .
সালিহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু যায়িদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আবূ দাঊদ ও সালিহ বলেন, ইনি হলেন আবূ ওয়াক্বিদ। তিনি বলেন, আমি মাসলামাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে রূম এলাকায় প্রবেশ করি। গনীমাত আত্মসাৎকারী এক ব্যক্তিকে নিয়ে আসা হয়। এ ব্যক্তির বিরুদ্ধে সিদ্ধান্ত নেয়ার জন্য মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালিম (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞেস করলেন। সালিম বলেন, আমি আমার পিতা ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তার পিতা ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা কোন গনীমাত আত্নসাৎকারীকে পেলে তার মালপত্র পুড়িয়ে ফেলবে এবং তাকে প্রহার করবে। আবূ ওয়াক্বিদ বলেন, আমরা ধৃত ব্যক্তির জিনিসপত্রে একটি মাসহাফ (কুরআন) পাই। মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঐ ব্যক্তির বিষয়ে সালিমকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, মাসহাফ বিক্রি করে প্রাপ্ত অর্থ দান করুন।
দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি’উস সাগীর (৭১৭), যঈফ সুনান আত-তিরমিযী (২৪৫/১৫০২), মিশকাত (৩৬৩৩)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1461) ، صالح بن محمد بن زائدۃ: ضعیف (تق: 2885) و قال الھیثمي: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد 6/ 274) و قال أیضًا: ضعفہ أکثر الناس (مجمع الزوائد 7/ 210) ، والحدیث ضعفہ البیہقي (103/9) ، (انوار الصحیفہ ص 99)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف صالح بن محمد بن زائدة، فقد قال عنه البخاري فيما نقله الترمذي في "جامعه" بأثر الحديث (١٥٢٨): هو منكر الحديث، وقال عن حديثه: حديث غريب، وكذلك قال الترمذي عن حديثه هذا. النُّفيليُّ: هو عبد الله بن محمد بن علي بن نفيل. وهو في "سنن سعيد بن منصور" (٢٧٢٩). وأخرجه الترمذي (١٥٢٨) من طريق عبد العزيز بن محمد الدَّراوَرْدي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤٤). قال البخاري فيما نقله الترمذي بإثر الحديث: وقد روي في غير حديثٍ عن النبي ﷺ في الغالِّ، ولم يأمر فيه بحرق متاعه. وقال الخطابي: أما تأديبُه عقوبته في نفسه على سوء فعله، فلا أعلم بين أهل العلم فيه خلافا، وأما عقوبته في ماله: فقد اختلف العلماءُ في ذلك. فقال الحسن البصري: يحرق ماله إلا أن يكون حيواناً أو مصحفاً. وقال الأوزاعي: يُحرق متاعه، وكذلك قال أحمد وإسحاق، قالوا: ولا يُحرق ماغل، لأنه حق الغانمين يُرَدُّ عليهم، فإن استهلكه غرم قيمته. وقال الأوزاعي: يُحرق متاعه الذي غزا به وسرجه وإكافه، ولا يُحرق دابته ولا نفقته إن كانت معه، ولا سلاحه، ولا ثيابه التي عليه. وقال الشافعي: لا يُحرق رحله، ولا يُعاقَبُ الرجل في ماله، إنما يعاقب في بدنه، جعل اللهُ الحدودَ على الأبدان، لا على الأموال. وإلى هذا ذهب مالك. ولا أراه إلا قولَ أصحاب الرأي. ويشبه أن يكونَ الحديثُ عندهم معناه: الزجرُ والوعيدُ، لا الإيجابُ، والله أعلم. وقال الإمام محمد بن الحسن في "السير الكبير" ٤/ ١٢٠٦ - ١٢١١: وإذا وجد الغلول في رحل رجل، أُوجعَ ضرباً، ولم يبلغ به أربعين سوطاً، ولا يُحرق رحلُه بما صنع، ولا قطع عليه أيضاً، وهذا قول الجمهور من الفقهاء، فأما أهل الشام كانوا يقولون: يحرق رحلُ الغالِّ، ويروون فيه حديثاً عن الحسن ﵁، قال: يؤخذ الغلول من رحله ثم يُحرق رحلُه إلا أن يكون فيه مصحف، وأصحاب الحسن يروونه عنه موقوفاً، وقد ذكر الأوزاعي عن الحسن هذا الحديث مرفوعاً، ولكن الفقهاء لم يُصححوا هذا الحديث، لأنه شاذ يرويه مجهول لا يعرف، فإن الأوزاعي لم يذكر اسم الرجل الذي بينه وبين الحسن، ثم هو مخالف للأحاديث المشهورة أن رسول الله ﷺ ألحق الوعيد بكل من ظهر منه غلول، ولم يشتغل بإحراق رحل أحد …
حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، مَحْبُوبُ بْنُ مُوسَى الأَنْطَاكِيُّ قَالَ أَخْبَرَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، عَنْ صَالِحِ بْنِ مُحَمَّدٍ، قَالَ غَزَوْنَا مَعَ الْوَلِيدِ بْنِ هِشَامٍ وَمَعَنَا سَالِمُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ وَعُمَرُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ فَغَلَّ رَجُلٌ مَتَاعًا فَأَمَرَ الْوَلِيدُ بِمَتَاعِهِ فَأُحْرِقَ وَطِيفَ بِهِ وَلَمْ يُعْطِهِ سَهْمَهُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهَذَا أَصَحُّ الْحَدِيثَيْنِ رَوَاهُ غَيْرُ وَاحِدٍ أَنَّ الْوَلِيدَ بْنَ هِشَامٍ حَرَّقَ رَحْلَ زِيَادِ بْنِ سَعْدٍ - وَكَانَ قَدْ غَلَّ - وَضَرَبَهُ .
সালিহ ইবনু মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমরা ওয়ালীদ ইবনু হিশামের নেতৃত্বে যুদ্ধে যোগদান করি। আমাদের সাথে সালিম ইবনু ‘আবদুল্লাহ উবনু ‘উমার (রাহিমাহুল্লাহ) এবং ‘উমার ইবনু আবদুল ‘আযীয (রাহিমাহুল্লাহ)-ও ছিলেন। আমাদের মধ্যকার এক লোক গনীমাতের মাল চুরি করলে ওয়ালীদ তার জিনিসপত্র পুড়ে ফেলার নির্দেশ দিলে তা পুড়ে ফেলা হয়, তাকে পথে পথে ঘুরানো হয় এবং গনীমাত থেকে বঞ্চিত করা হয়। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, দুই হাদীসের মধ্যে শেষোক্ত হাদীসটি অধিক সহীহ। কেননা একাধিক বর্ণনাকারী বর্ণনা করেছেন যে, ওয়ালীদ ইবনু হিশাম যিয়াদ ইবনু সা’দের জিনিসপত্র পুড়িয়ে ফেলেন এবং তাকে প্রহার করেন। কারণ সে গনীমাতের মাল আত্নসাৎ করেছিল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (2713) ، (انوار الصحیفہ ص 99)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف صالح بن محمد -وهو ابن زائدة- السالف ذكره في الحديث السابق. أبو إسحاق: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث الفَزاري. وأخرجه البيهقي ٩/ ١٠٣ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد.