হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (2741)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ بْنُ نَجْدَةَ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، ح وَحَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الأَنْطَاكِيُّ، قَالَ حَدَّثَنَا مُبَشِّرٌ، ح وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَوْفٍ الطَّائِيُّ، أَنَّ الْحَكَمَ بْنَ نَافِعٍ، حَدَّثَهُمْ - الْمَعْنَى، - كُلُّهُمْ عَنْ شُعَيْبِ بْنِ أَبِي حَمْزَةَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ بَعَثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي جَيْشٍ قِبَلَ نَجْدٍ وَانْبَعَثَتْ سَرِيَّةٌ مِنَ الْجَيْشِ فَكَانَ سُهْمَانُ الْجَيْشِ اثْنَىْ عَشَرَ بَعِيرًا اثْنَىْ عَشَرَ بَعِيرًا وَنَفَّلَ أَهْلَ السَّرِيَّةِ بَعِيرًا بَعِيرًا فَكَانَتْ سُهْمَانُهُمْ ثَلاَثَةَ عَشَرَ ثَلاَثَةَ عَشَرَ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এক মুজাহিদ বাহিনীর সাথে ‘নাজাদ’ এলাকায় প্রেরণ করেন এবং সেনাবাহিনীর একটি অংশকে অভিযানে পাঠান। সেনাবাহিনীর সকল সৈন্য ভাগে বারোটি করে গনীমাতের উট পেলো এবং অভিযানে প্রেরিত সৈন্যদেরকে তিনি একটি করে উট অতিরিক্ত দিলেন। ফলে তাদের প্রত্যেকের ভাগে তেরটি করে উট পড়ে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، إلا أن شعيب بن أبي حمزة قد خالف مالكاً والليث بن سعد وعبيد الله، إذ جعل السرية منبعثة من الجيش، وأن قسمة ما غنموا كان بين الجيش وبين السرية، وأن أهل السرية فضلوا على الجيش بعيراً بعيراً، وحديث الليث ومالك وعبيد الله بن عمر وأيوب عن نافع يدل على أن الاثني عشر بعيراً كان سهمان السرية وأنهم هم الذين نُفلوا مع ذلك بعيراً بعيراً. أفاده ابن عبد البر في "التمهيد" ١٤/ ٣٩ - ٤٠. وأخرجه ابن الجارود (١٠٧٤)، وأبو عوانة (٦٦٢٠)، والبيهقي ٦/ ٣١٢، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٤/ ٣٧ - ٣٨ و ٣٨ - ٣٩ من طريق شعيب بن أبي حمزة، به. وسيأتى الحديث عند أبي داود من طريق ابن إسحاق برقم (٢٧٤٣)، ومن طريق مالك والليث برقم (٢٧٤٤)، ومن طريق عُبيد الله بن عمر برقم (٢٧٤٥). وانظر تمام تخريجه عند الحديث (٢٧٤٤) و (٢٧٤٥). قال البغوي في "شرح السنة" ١١/ ١١٢: والنفل: اسم لزيادة يعطيها الإمام بعض الجيش على القدر المستحق، ومنه سميت النافلة لما زاد على الفرائض من الصلوات. وفي الحديث دليل على أنه يجوز للإمام أن يُنفِّل بعض الجيش لزيادة غناء وبلاء منهم في الحرب يخصهم من بين سائر الجيش، لما يصيبهم من المشقة ويجعلهم أسوة الجماعة في سهمان الغنيمة.









সুনান আবী দাউদ (2742)


حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ عُتْبَةَ الدِّمَشْقِيُّ، قَالَ قَالَ الْوَلِيدُ - يَعْنِي ابْنَ مُسْلِمٍ - حَدَّثْتُ ابْنَ الْمُبَارَكِ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قُلْتُ وَكَذَا حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فَرْوَةَ، عَنْ نَافِعٍ، قَالَ لاَ تَعْدِلْ مَنْ سَمَّيْتَ بِمَالِكٍ هَكَذَا أَوْ نَحْوَهُ يَعْنِي مَالِكَ بْنَ أَنَسٍ ‏.




ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনুল মুবারকের নিকট উপরোক্ত হাদীস বর্ণনা করি। আমি বলি, আমাদের কাছে ইবনু আবূ ফারওয়াহ নাফি’ হতে হাদীসটি এভাবে বর্ণনা করেছেন। ইবনুল মুবারক বললেন, তুমি যার যার নাম উল্লেখ করেছ তারা কোন দিক দিয়েই মালিক ইবনু আনাসের সমক্ষ নন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (2741)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف جداً. ابن أبي فروة -وهوإسحاق بن عبد الله- متروك الحديث. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (2743)


حَدَّثَنَا هَنَّادٌ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدَةُ، - يَعْنِي ابْنَ سُلَيْمَانَ الْكِلاَبِيَّ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ بَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم سَرِيَّةً إِلَى نَجْدٍ فَخَرَجْتُ مَعَهَا فَأَصَبْنَا نَعَمًا كَثِيرًا فَنَفَّلَنَا أَمِيرُنَا بَعِيرًا بَعِيرًا لِكُلِّ إِنْسَانٍ ثُمَّ قَدِمْنَا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَسَّمَ بَيْنَنَا غَنِيمَتَنَا فَأَصَابَ كُلُّ رَجُلٍ مِنَّا اثْنَىْ عَشَرَ بَعِيرًا بَعْدَ الْخُمُسِ وَمَا حَاسَبَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِالَّذِي أَعْطَانَا صَاحِبُنَا وَلاَ عَابَ عَلَيْهِ بَعْدَ مَا صَنَعَ فَكَانَ لِكُلِّ رَجُلٍ مِنَّا ثَلاَثَةَ عَشَرَ بَعِيرًا بِنَفْلِهِ ‏.‏




নাফি’ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজাদ এলাকায় একটি বাহিনী পাঠালে তাদের সাথে আমিও হই। সেখানে আমরা প্রচুর পরিমাণ গনীমাত লাভ করি। আমাদের সেনাপতি আমাদের প্রত্যেককে একটি উট পুরস্কার দিলেন। অতঃপর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে ফিরে এলে তিনি আমাদের মাঝে গনীমাতের মাল বন্টন করেন। এক-পঞ্চমাংশ বাদ দেয়ার পর আমাদের প্রত্যেকে বারোটি করে উট গনীমাতের পায়। আমাদের সেনাপতি যে উটগুলো পূর্বে আমাদেরকে দিয়েছিলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা হিসাবে আনেননি। তিনি এ কাজের জন্য সেনাপতির কোন দোষও ধরেননি। ফলে আমাদের প্রত্যেকের ভাগে তার দেয়া অতিরিক্ত একটি সহ মোট তেরোটি করে উট পড়লো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث الآتي (2744)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف، محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ثم إنه خالف في متنه من هو أوثق منه كمالك والليث بن سعد وعُبيد الله بن عمر وغيرهم، إذ جعل ابنُ إسحاق النفل من رأس الغنيمة ثم جعل القسمة بعدُ، وأولئك جعلوا النفل بعد القسمة، أفاده ابن عبد البر في "التمهيد" ١٤/ ٤٦ - ٤٧. وأخرجه البيهقي ٦/ ٣١٢، وابنُ عبد البر في "التمهيد" ١٤/ ٤٥ و ٤٦ من طريق محمد بن إسحاق، به. وسيأتى بعده من طريق مالك والليث بن سعد، وبرقم (٢٧٤٥) من طريق عُبيدالله بن عمر، كلهم عن نافع. وسلف برقم (٢٧٤١) من طريق شعيب بن أبي حمزة، عن نافع.









সুনান আবী দাউদ (2744)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، ح وَحَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، وَيَزِيدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ مَوْهَبٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، - الْمَعْنَى - عَنْ نَافِعٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَعَثَ سَرِيَّةً فِيهَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ قِبَلَ نَجْدٍ فَغَنِمُوا إِبِلاً كَثِيرَةً فَكَانَتْ سُهْمَانُهُمُ اثْنَىْ عَشَرَ بَعِيرًا وَنُفِّلُوا بَعِيرًا بَعِيرًا ‏.‏ زَادَ ابْنُ مَوْهَبٍ فَلَمْ يُغَيِّرْهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজাদ এলাকায় একটি অভিযান পাঠান, তাতে ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তারা তাতে প্রচুর পরিমাণে গনীমাতের মাল লাভ করেন। এতে তাদের প্রত্যেককে বারোটি করে উট দেয়া হলো।

বর্ণনাকারী ইবনু মাওহাবের বর্ণনায় রয়েছেঃ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উল্লেখিত বন্টন কোন পরিবর্তন করেননি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3134) صحیح مسلم (1749)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. لكن ذكر ابن عبد البر في "التمهيد" ١٤/ ٣٥ أن مالكاً شك في روايته فقال: كانت سهمانُهم اثني عشر بعيراً أو أحد عشر بعيراً، كذا رواه جماعة رواة "الموطأ" عنه قال: وهذا مما حُمل فيه حديث مالك على حديث الليث، لأن القعنبي رواه في "الموطأ" عن مالك على الشك. قلنا: لكن جاء في رواية محمد بن الحسن الشيباني "للموطأ" (٨٦٣) كرواية أبي داود دون شك، وكذلك رواه أحمد (٥٩١٩) عن إسحاق بن عيسى الطباع، عن مالك. فالله تعالى أعلم. وهو في "الموطأ" برواية يحيى بن يحيى ٢/ ٤٥٠، وفيه برواية أبي مصعب الزهري (٩٥٣) ومن طريق مالك أخرجه البخاري (٣١٣٤)، ومسلم (١٧٤٩). وهو في "مسند أحمد" (٥٢٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٣٣). وأخرجه مسلم (١٧٤٩) من طريق الليث بن سعد، به. وأخرجه البخاري (٤٣٣٨)، ومسلم (١٧٤٩) من طريق أيوب بن أبي تميمة السختيانى، ومسلم (١٧٤٩) من طريق عبد الله بن عون، و (١٧٤٩) من طريق موسى ابن عقبة، ومن طريق أسامة بن زيد الليثي، أربعتهم عن نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٥٧٩) من طريق أيوب.









সুনান আবী দাউদ (2745)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، قَالَ حَدَّثَنِي نَافِعٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ بَعَثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سَرِيَّةٍ فَبَلَغَتْ سُهْمَانُنَا اثْنَىْ عَشَرَ بَعِيرًا وَنَفَّلَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَعِيرًا بَعِيرًا ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ بُرْدُ بْنُ سِنَانٍ عَنْ نَافِعٍ مِثْلَ حَدِيثِ عُبَيْدِ اللَّهِ وَرَوَاهُ أَيُّوبُ عَنْ نَافِعٍ مِثْلَهُ إِلاَّ أَنَّهُ قَالَ وَنُفِّلْنَا بَعِيرًا بَعِيرًا ‏.‏ لَمْ يَذْكُرِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে একটি সামরিক অভিযানে পাঠালেন। আমরা প্রত্যেকেই ভাগে বারোটি করে উট পেলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের প্রত্যেককে অতিরিক্ত একটি করে উট দিলেন। আরেক বর্ণনায় অতিরিক্ত একটি করে উট দেয়ার কথা রয়েছে। তবে তাতে এ কথা নেই যে, তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1749)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبيد الله: هو ابن عمر العمري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، ومُسَدَّد: هو ابنُ مُسَرهَدٍ. وأخرجه مسلم (١٧٤٩) من طريق يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٥٥١٩). قال الخطابي: اختلفوا في هذه الزيادة التي هي النفل، من أين أعطاهم إياها؟ فكان ابن المسيب يقول: إنما ينفلُ الإمامُ من الخمس، يعني سهم النبي ﷺ. وهو خمس الخمس من الغنيمة. وإلى هذا ذهب الشافعي وأبو عبيد. وذلك أن النبي ﷺ كان يضعه حيث أراه الله ﷿ في مصالح أمر الدين ومعاونة المسلمين. قال الشافعي: فإذا كثر العدو، واشتدت شوكتهم، وقل من بإزائهم من المسلمين نفّل منه الإمام، اتباعاً للسنة، وإذا لم يكن ذلك لم ينفِّل. وقال أبو عُبيد: الخمس مُفوَّض إلى الإمام، ينفل منه إن شاء، ومن ذلك قول النبي ﷺ: "ما لي مما أفاء الله عليكم إلا الخمس، والخمس مردود عليكم". وقال غيرهم: إنما كان النبي ﷺ ينفلهم من الغنيمة التي يغنمونها، كما نفل القاتل السلب من جملة الغنيمة. قلت (القائل الخطابي): وعلى هذا دل أكثر ما روي من الأخبار في هذا الباب.









সুনান আবী দাউদ (2746)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ شُعَيْبِ بْنِ اللَّيْثِ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ جَدِّي، ح وَحَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ أَبِي يَعْقُوبَ، قَالَ حَدَّثَنِي حُجَيْنٌ، قَالَ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ عُقَيْلٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَالِمٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ كَانَ يُنَفِّلُ بَعْضَ مَنْ يَبْعَثُ مِنَ السَّرَايَا لأَنْفُسِهِمْ خَاصَّةً النَّفْلَ سِوَى قَسْمِ عَامَّةِ الْجَيْشِ وَالْخُمُسُ فِي ذَلِكَ وَاجِبٌ كُلُّهُ ‏.‏




‘আবদূল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পক্ষ হতে বিশেষ অভিযানে প্রেরিত সেনাদের গনীমাত থেকে অতিরিক্ত দিতেন। যা সাধারণভাবে সব বাহিনীকে দেয়া হতো না। অবশ্য সমস্ত গনীমাত থেকে এক-পঞ্চমাংশ নেয়া হতো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3135) صحیح مسلم (1750)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حُجَين: هو ابن المثنى اليمامي، والليث: هو ابن سعد، وعُقيل: هو ابن خالد الأيلي، وسالم: هو ابن عبد الله بن عمر بن الخطاب. وأخرجه البخاري (٣١٣٥)، ومسلم (١٧٥٠) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه مسلم (١٧٥٠) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٦٢٥٠).









সুনান আবী দাউদ (2747)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنَا حُيَىٌّ، عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْحُبُلِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَرَجَ يَوْمَ بَدْرٍ فِي ثَلاَثِمِائَةٍ وَخَمْسَةَ عَشَرَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ اللَّهُمَّ إِنَّهُمْ حُفَاةٌ فَاحْمِلْهُمُ اللَّهُمَّ إِنَّهُمْ عُرَاةٌ فَاكْسُهُمُ اللَّهُمَّ إِنَّهُمْ جِيَاعٌ فَأَشْبِعْهُمْ ‏"‏ ‏.‏ فَفَتَحَ اللَّهُ لَهُ يَوْمَ بَدْرٍ فَانْقَلَبُوا حِينَ انْقَلَبُوا وَمَا مِنْهُمْ رَجُلٌ إِلاَّ وَقَدْ رَجَعَ بِجَمَلٍ أَوْ جَمَلَيْنِ وَاكْتَسَوْا وَشَبِعُوا ‏.‏




‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনশো পনের জন নিয়ে বদরের প্রান্তরে রওয়ানা হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ “হে আল্লাহ! এরা পদাতিক বাহিনী, এদেরকে বাহন দান করুন। হে আল্লাহ! এরা বস্ত্রহীন, এদেরকে পরিধেয় বস্ত্র দান করুন। হে আল্লাহ! এরা অন্নহীন, এদেরকে খাদ্য দিয়ে পরিতৃপ্ত করুন।” অতঃপর আল্লাহ তাঁকে বদরে বিজয়ী করলেন। সাহাবীরা যখন সেখান থেকে ফিরে আসেন তখন তাদের প্রত্যেকেই একটি বা দুইটি উট নিয়ে, পোশাকে সজ্জিত হয়ে এবং পরিতৃপ্ত হয়ে ফিরলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (5929)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات غير حُيي -وهو ابن عبد الله المعافري- ضعفه غير واحد وقال ابن معين لا بأس به، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال: لا بأس به إذا روى عنه ثقة، والراوي عنه هنا عبد الله بن وهب وهو ثقة. وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" ٢/ ٢٠، والحاكم ٢/ ١٣٢ - ١٣٣ و١٤٥، والبيهقي ٦/ ٣٠٥ و٩/ ٥٧ من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد، وصححه الحاكم، وحسنه الحافظ في "الفتح" ٧/ ٢٩٢، وانظر عدة أصحاب بدر في "صحيح البخاري" (٣٩٥٦) و (٣٩٥٧) و (٣٩٥٨).









সুনান আবী দাউদ (2748)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ يَزِيدَ بْنِ جَابِرٍ الشَّامِيِّ، عَنْ مَكْحُولٍ، عَنْ زِيَادِ بْنِ جَارِيَةَ التَّمِيمِيِّ، عَنْ حَبِيبِ بْنِ مَسْلَمَةَ الْفِهْرِيِّ، أَنَّهُ قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُنَفِّلُ الثُّلُثَ بَعْدَ الْخُمُسِ ‏.‏




হাবীব ইবনু মাসলামাহ আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গনীমাতের এক-পঞ্চমাংশ বের করার পর অবশিষ্ট মালের এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত হিসেবে প্রদান করতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مکحول صرح بالسماع عند الحاکم (2/133) وھو برئ من التدلیس




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. زياد بن جارية -ويقال: زيد- الصواب أنه تابعي كما بيناه في "المسند" (١٧٤٦٢) وهو ثقة. وباقى رجاله ثقات. مكحول: هو الشامي، وسفيان: هو الثورى، ومحمد بن كثير: هو العبدي. وأخرجه ابن ماجه (٢٨٥١) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٤٦٢). وانظر ما بعده، وما سيأتى برقم (٢٧٥٠). قال الخطابي: وفي هذا الحديث أنه أعطاهم ذلك بعد أن خمس الغنيمة، فيشبه -والله أعلم- أن يكون الأمران معا جائزين، وفيه أنه قد بلغ بالنفل الثلث. قال: وقد اختلف العلماء في ذلك. فقال مكحول والأوزاعي: لا يجاوز بالنفل الثلث. وقال الشافعي: ليس في النفل حدٌّ لا يُجاوَزُ، وإنما هو اجتهاد الإمام.









সুনান আবী দাউদ (2749)


حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ الْجُشَمِيُّ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ صَالِحٍ، عَنِ الْعَلاَءِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ مَكْحُولٍ، عَنِ ابْنِ جَارِيَةَ، عَنْ حَبِيبِ بْنِ مَسْلَمَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُنَفِّلُ الرُّبُعَ بَعْدَ الْخُمُسِ وَالثُّلُثَ بَعْدَ الْخُمُسِ إِذَا قَفَلَ ‏.‏




হাবীব ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক-পঞ্চমাংশ বের করার পর অবশিষ্ট মালের এক-চতুর্থাংশ অতিরিক্ত হিসেবে দান করতেন এবং যুদ্ধ হতে ফেরার পর এক-পঞ্চমাংশ পৃথক রেখে তাদেরকে অবশিষ্ট মালের এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত দান করতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4008) ، انظر الحدیث السابق (2748)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن جارية: هو زياد -وقيل: زيد- وهو تابعي ثقة كما أسلفنا في الطريق السالف. وهو في "مسند أحمد" (١٧٤٦٥). وانظر ما بعده. قال الخطابي: قال ابن المنذر: قيل: إن النبي ﷺ إنما فرق بين البدأة والقفول، حتى فضل إحدى العطيتين على الأخرى، لقوة الظهر عند دخولهم، وضعفه عند خروجهم، لأنهم -وهم داخلون- أنشط وأشهى للسير، والإمعان في بلاد العدو وأجمّ، وهم عند القفول تضعف دوابهم. وهم أشهى للرجوع إلى أوطانهم وأهاليهم، لطول عهدهم بهم، وحبهم للرجوع إليهم. فنرى أنه زادهم في القفول لهذه العلل. قلت (القائل الخطابي):كلام ابن المنذر هذا ليس بالبين لأن فحواه يوهم أن معنى الرجعة هو القفول إلى أوطانهم، وليس هو معنى الحديث. و"البدأة" إنما هي ابتداء سفر الغزو، إذا نهضت سرية من جملة العسكر، فأوقعت بطائفة العدو، فما غنموا كان لهم منه الربع، ويشركهم سائر العسكر في ثلاثة أرباعه. فإن قفلوا من الغزاة ثم رجعوا فأوقعوا بالعدو ثانية كان لهم مما غنموا الثلث، لأن نهوضهم بعد القفل أشقُّ، والخطر فيه أعظم.









সুনান আবী দাউদ (2750)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَحْمَدَ بْنِ بَشِيرِ بْنِ ذَكْوَانَ، وَمَحْمُودُ بْنُ خَالِدٍ الدِّمَشْقِيَّانِ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا مَرْوَانُ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَمْزَةَ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا وَهْبٍ، يَقُولُ سَمِعْتُ مَكْحُولاً، يَقُولُ كُنْتُ عَبْدًا بِمِصْرَ لاِمْرَأَةٍ مِنْ بَنِي هُذَيْلٍ فَأَعْتَقَتْنِي فَمَا خَرَجْتُ مِنْ مِصْرَ وَبِهَا عِلْمٌ إِلاَّ حَوَيْتُ عَلَيْهِ فِيمَا أُرَى ثُمَّ أَتَيْتُ الْحِجَازَ فَمَا خَرَجْتُ مِنْهَا وَبِهَا عِلْمٌ إِلاَّ حَوَيْتُ عَلَيْهِ فِيمَا أُرَى ثُمَّ أَتَيْتُ الْعِرَاقَ فَمَا خَرَجْتُ مِنْهَا وَبِهَا عِلْمٌ إِلاَّ حَوَيْتُ عَلَيْهِ فِيمَا أُرَى ثُمَّ أَتَيْتُ الشَّامَ فَغَرْبَلْتُهَا كُلُّ ذَلِكَ أَسْأَلُ عَنِ النَّفْلِ فَلَمْ أَجِدْ أَحَدًا يُخْبِرُنِي فِيهِ بِشَىْءٍ حَتَّى أَتَيْتُ شَيْخًا يُقَالُ لَهُ زِيَادُ بْنُ جَارِيَةَ التَّمِيمِيُّ فَقُلْتُ لَهُ هَلْ سَمِعْتَ فِي النَّفْلِ شَيْئًا قَالَ نَعَمْ سَمِعْتُ حَبِيبَ بْنَ مَسْلَمَةَ الْفِهْرِيَّ يَقُولُ شَهِدْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَفَّلَ الرُّبُعَ فِي الْبَدْأَةِ وَالثُّلُثَ فِي الرَّجْعَةِ ‏.‏




মাকহুল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মিসরে হুযাইল গোত্রের এক মহিলার গোলাম ছিলাম। অতঃপর তিনি আমাকে আযাদ করেন। আমার জানা মতে মিসরে সামগ্রিক জ্ঞান অর্জন না করা পর্যন্ত আমি সেখান থেকে বের হইনি। অতঃপর আমি হিজাযে আগমন করে সেখান থেকে সেখানকার কেন্দ্রগুলো থেকে জ্ঞান অর্জন করি। অতঃপর ইরাকে আসি এবং সেখানকার কেন্দ্রগুলো থেকে জ্ঞানার্জন করে সেখান থেকে বের হই। অতঃপর আমি সিরিয়ায় পৌছে এর বিভিন্ন এলাকা ভ্রমণ করি এবং গনীমাত সম্পর্কে জিজ্ঞস করি। কিন্তু এ সম্পর্কে আমাকে অবহিত করার মত কাউকে পাইনি। অবশেষে আমি যিয়াদ ইবনু জারিয়াহ আত-তামীমী নামক এক বৃদ্ধের সাক্ষাৎ পেয়ে তাকে জিজ্ঞেস করি, আপনি গনীমাত সম্পর্কে কিছু শুনেছেন কি? তিনি বললেন, হাঁ। আমি হাবীব ইবনু মাসলামাহ আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছিঃ আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে ছিলাম।

তিনি প্রথমে গনীমাত থেকে (এক-পঞ্চমাংশ বের করার পর বাকী মালের) এক-চতুর্থাংশ অতিরিক্ত দিতেন এবং যুদ্ধশেষে ফেরার পথে এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত দিতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4007) ، ولہ شاھد عند الترمذي (1561)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو وهب -واسمه عبيد الله بن عُبيد الكلاعي- ثقة، فقد وثقه دُحيم، وقال ابن معين: ليس به بأس، وهذه تُساوي عنده ثقة كما نص هو على ذلك، فقد قال ابن أبي خيثمة في "تاريخه" (٦٩٠) و (٤٤٤٥): قلت ليحيي: إنك تقول: فلان ليس به بأس، وفلان ضعيف، قال: إذا قلتُ لك: ليس به بأس فهو ثقة، وإذا قلتُ لك: ضعيف، فليس هو بثقة لا يُكتب حديثُه. وانظر ما قبله، وما سلف برقم (٢٧٤٨).









সুনান আবী দাউদ (2751)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عَدِيٍّ، عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، - هُوَ مُحَمَّدٌ - بِبَعْضِ هَذَا ح وَحَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ، حَدَّثَنِي هُشَيْمٌ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، جَمِيعًا عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ الْمُسْلِمُونَ تَتَكَافَأُ دِمَاؤُهُمْ يَسْعَى بِذِمَّتِهِمْ أَدْنَاهُمْ وَيُجِيرُ عَلَيْهِمْ أَقْصَاهُمْ وَهُمْ يَدٌ عَلَى مَنْ سِوَاهُمْ يَرُدُّ مُشِدُّهُمْ عَلَى مُضْعِفِهِمْ وَمُتَسَرِّعُهُمْ عَلَى قَاعِدِهِمْ لاَ يُقْتَلُ مُؤْمِنٌ بِكَافِرٍ وَلاَ ذُو عَهْدٍ فِي عَهْدِهِ ‏"‏ ‏.‏ وَلَمْ يَذْكُرِ ابْنُ إِسْحَاقَ الْقَوَدَ وَالتَّكَافُؤَ ‏.‏




‘আমর ইবরু শু’আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও তার দাদা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ সকল মুসলিমের রক্ত সমান। একজন সাধারণ মুসলিমও যে কোন ব্যক্তিকে নিরাপত্তার প্রতিশ্রুতি দিলে তার প্রতিশ্রুতি পূর্ণ করা সকলের কর্তব্যে পরিণত হয়। অনুরুপভাবে দূরবর্তী স্থানের মুসলিমরাও তাদের পক্ষে এ ধরনের আশ্রয় দিতে পারে। প্রত্যেক মুসলিম তার প্রতিপক্ষ শত্রুর বিরুদ্ধে অন্য মুসলিমকে সাহায্য করবে। যার শক্তিশালী ও দ্রুত পতিসম্পন্ন সওয়ারী আছে, সে দুর্বল ও ধীর গতিসম্পন্ন সওয়ারীর অধিকারী ব্যক্তির সাথে থেকে চলবে। সেনাবাহিনীর কোন বিশেষ অংশ গনীমাতের মাল অর্জন করলে তা সকলের মধ্যে বন্টিত হবে। কোন কাফিরকে হত্যার অপরাধে কোন মুমিনকে হত্যা করা যাবে না। চুক্তিবদ্ধ কোন কাফিরকে চুক্তির মেয়াদের মধ্যে হত্যা করা যাবে না। বর্ণনাকারী ইসহাক্ব তার বর্ণনায় “আলমুসলিমূনা তাতাকাফা দিমাউহুম” এবং “ওয়ালা ইউক্বতালু মুমিনুন বি কাফিরিন” বাক্য দুটি উল্লেখ করেননি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، ابن إسحاق صرح بالسماع عند البیھقي (8/29) وتابعہ یحیی بن سعید وعبد الرحمن بن الحارث وغیرھما وانظر الحدیث الآتي (4531)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن. عمرو بن شعيب: هو ابن محمد بن عبد الله ابن عمرو بن العاص، والْمُراد بجده: عبد الله، يحيى بن سعيد: هو الأنصاري، وهُشيم: هو ابن بَشير، وابن أبي عدي: هو محمد بن إبراهيم. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٨٥) من طريق عبد الرحمن بن عياش، عن عمرو بن شعيب، به. دون قوله: "يردُّ مُشدُّهم على مُضعفهم … " إلى آخر الحديث. وقوله في الحديث "لا يقتل مؤمن بكافر" أخرجه ابن ماجه (٢٦٥٩) من طريق عبد الرحمن بن عياش، والترمذي (١٤٧١) من طريق أسامة بن زيد، كلاهما عن عمرو بن شعيب، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٠١٢) لكن ليس فيه قوله: "يردُّ مُشِدُّهم على مضعفهم، ومتسريهم على قاعدهم"، ولا قوله: "ولا ذو عهد في عهده". وقد أخرجه بتمامه ابن الجارود (١٠٧٣) من طريق عُبيد الله بن عمر، بهذا الإسناد. وأخرجه البيهقي ٨/ ٢٩ من طريق إبراهيم بن سعد و ٩/ ٥١ من طريق يونس بن بكير، كلاهما عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني عمرو بن شعيب، به. لكنه لم يذكر قوله: "يرد مشدهُّم على مضُعفهم". ويشهد له بتمامه حديث علي بن أبي طالب الآتي عند المصنف برقم (٤٥٣٠). وإسناده صحيح. وسيتكرر عند المصنف طريق عُبيد الله بن عمر بن ميسرة برقم (٤٥٣١). وقوله: "لا يقتل مؤمن بكافر" سيأتى ضمن الحديث (٤٥٠٦). قال الخطابي: قوله: " تتكافأ دماؤهم"معناه: أن أحرار المسلمين دماؤهم متكافئة في وجوب القصاص والقود لبعضهم من بعض، لا يفضّل منهم شريف على وضيع. فإذا كان المقتول وضيعاً وجب القصاص على قاتله. وإن كان شريفا لم يُسقِط القَوَدَ عنه شرفُه، وإن كان القتيل شريفا لم يُقتص له إلا من قاتله حَسْبُ. وكان أهل الجاهلية لا يرضَون في دم الرجل الشريف بالاستقادة من قاتله، ولا يرونه بواء به، حتى يقتصوا من عدة من قبيلة القاتل، فأبطل الإسلام حكم الجاهلية وجعل المسلمين على التكافؤ في دمائهم، وإن كان بينهم تفاضل وتفاوت في معنى آخر. وقوله: "يسعى بذمتهم أدناهم" يريد أن العبد ومن كان في معناه من الطبقة الدنيا كالنساء والضعفاء الذين لا جهاد عليهم إذا أجاروا كافراً أُمضي جوارهم ولم تُخْفَر ذمتُهم. وقوله: "ويجير عليهم أقصاهم" معناه: أن بعض المسلمين، وإن كان قاصي الدار، إذا عقد للكافر عقداً لم يكن لأحد منهم أن ينقضه، وإن كان أقرب داراً من المعقود له. قلت (القائل الخطابي): وهذا إذا كان العقد والذمة منه لبعض الكفار دون عامتهم. فإنه لا يجوز له عقد الأمان لجماعتهم، وإنما الأمر في بذل الأمان وعقد الذمة للكافة منهم إلى الإمام على سبيل الاجتهاد، وتحري المصلحة فيه، دون غيره. ولو جعل لأفناء الناس ولآحادهم أن يعقدوا لعامة الكفار كلما شاؤوا، صار ذلك ذريعةً إلى إبطال الجهاد، وذلك غير جائز. وقوله: "وهم يدٌ على مَن سِواهم" فإن معنى اليد المعاونة والمظاهرة: إذا استُنفِروا وجب عليهم النفير، وإذا استُنجِدوا أنجدوا، ولم يتخلفوا، ولم يتخاذلوا. و"المُشِدُّ" المقوي، و"المضعف" من كانت دوابه ضعافاً. قلنا: وقال ابن الأثير: المُشِدُّ: الذي دوابه شديدة قوية، والمضعف الذي دوابُّه ضعيفة، يريد أن القوي من الغزاة يُساهم الضعيف فيما يكسبه من الغنيمة. قال الخطابي: وجاء في بعض الحديث: "المضعف أمير الرُّفقة" يريد أن الناس يسيرون بسير الضعيف لا يتقدمونه، فيتخلف عنهم، ويبقى بمضْيَعة. و"المتسري" هو الذي يخرج في السرية، ومعناه: أن يخرج الجيش فيُنيخوا بقرب دار العدو، ثم ينفصل منهم سرية، فيغنموا، فإنهم يردون ما غنموه على الذين هم ردءٌ لهم، لا ينفردون به، فأما إذا كان خروج السرية من البلد، فإنهم لا يردون على المقيمين في أوطانهم شيئاً. وقوله: "لا يقتل مؤمن بكافر" فإنه قد دخل فيه كل كافر، له عهد وذمة، أو لا عهد له ولا ذمة. وقوله: "ولا ذو عهد في عهده"، فإن العهد للكفار على ضربين: أحدهما: عهد متأبِّد، كمن حُقن دمه للجزية. والآخر: من كان له عهد إلى مدة، فإذا انقضت تلك المُدة عاد مباح الدم، كما كان. وقد تأوله مَن ذهب من الفقهاء إلى أن المسلم يقتل بالذمي، على أن قوله: "ولا ذو عهد في عهده" معطوف على قوله:. لا يقتل مؤمن بكافر" ويقع في الكلام على مذهبه تقديم وتأخير، فيصير كأنه قال: لا يقتل مؤمن، ولا ذو عهد في عهده بكافر، وإلى هذا ذهب أصحاب الرأي. وقال الشافعي: لا يقتل مسلم بوجه من الوجوه بأحد من الكفار، على ظاهر الحديث وعمومه. قال: وقوله: "لا يقتل مسلم بكافر" كلام تام بنفسه، ثم قال على أثره: "ولا ذو عهد في عهده" أي: لا يقتل معاهَدٌ ما دام في عهده. قال: وإنما احتيج إلى أن يجري ذكر المعاهَد، ويؤكد تحريم دمه هاهنا. لأن قوله: "لا يقتل مؤمن بكافر" قد يوهم ضعفاً وتوهيناً لشأنه، ويوقع شبهة في دمه، فلا يؤمن أن يُستباح، إذا علم أن لا قود على قاتله. فوكّد تحريمه بإعادة البيان، لئلا يَعرِض الأشكال في ذلك.









সুনান আবী দাউদ (2752)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا هَاشِمُ بْنُ الْقَاسِمِ، حَدَّثَنَا عِكْرِمَةُ، حَدَّثَنِي إِيَاسُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ أَغَارَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عُيَيْنَةَ عَلَى إِبِلِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَتَلَ رَاعِيَهَا وَخَرَجَ يَطْرُدُهَا هُوَ وَأُنَاسٌ مَعَهُ فِي خَيْلٍ فَجَعَلْتُ وَجْهِي قِبَلَ الْمَدِينَةِ ثُمَّ نَادَيْتُ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ يَا صَبَاحَاهُ ‏.‏ ثُمَّ اتَّبَعْتُ الْقَوْمَ فَجَعَلْتُ أَرْمِي وَأَعْقِرُهُمْ فَإِذَا رَجَعَ إِلَىَّ فَارِسٌ جَلَسْتُ فِي أَصْلِ شَجَرَةٍ حَتَّى مَا خَلَقَ اللَّهُ شَيْئًا مِنْ ظَهْرِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم إِلاَّ جَعَلْتُهُ وَرَاءَ ظَهْرِي وَحَتَّى أَلْقَوْا أَكْثَرَ مِنْ ثَلاَثِينَ رُمْحًا وَثَلاَثِينَ بُرْدَةً يَسْتَخِفُّونَ مِنْهَا ثُمَّ أَتَاهُمْ عُيَيْنَةُ مَدَدًا فَقَالَ لِيَقُمْ إِلَيْهِ نَفَرٌ مِنْكُمْ ‏.‏ فَقَامَ إِلَىَّ أَرْبَعَةٌ مِنْهُمْ فَصَعِدُوا الْجَبَلَ فَلَمَّا أَسْمَعْتُهُمْ قُلْتُ أَتَعْرِفُونِي قَالُوا وَمَنْ أَنْتَ قُلْتُ أَنَا ابْنُ الأَكْوَعِ وَالَّذِي كَرَّمَ وَجْهَ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم لاَ يَطْلُبُنِي رَجُلٌ مِنْكُمْ فَيُدْرِكُنِي وَلاَ أَطْلُبُهُ فَيَفُوتُنِي ‏.‏ فَمَا بَرِحْتُ حَتَّى نَظَرْتُ إِلَى فَوَارِسِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَتَخَلَّلُونَ الشَّجَرَ أَوَّلُهُمُ الأَخْرَمُ الأَسَدِيُّ فَيَلْحَقُ بِعَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عُيَيْنَةَ وَيَعْطِفُ عَلَيْهِ عَبْدُ الرَّحْمَنِ فَاخْتَلَفَا طَعْنَتَيْنِ فَعَقَرَ الأَخْرَمُ عَبْدَ الرَّحْمَنِ وَطَعَنَهُ عَبْدُ الرَّحْمَنِ فَقَتَلَهُ فَتَحَوَّلَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ عَلَى فَرَسِ الأَخْرَمِ فَيَلْحَقُ أَبُو قَتَادَةَ بِعَبْدِ الرَّحْمَنِ فَاخْتَلَفَا طَعْنَتَيْنِ فَعَقَرَ بِأَبِي قَتَادَةَ وَقَتَلَهُ أَبُو قَتَادَةَ فَتَحَوَّلَ أَبُو قَتَادَةَ عَلَى فَرَسِ الأَخْرَمِ ثُمَّ جِئْتُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ عَلَى الْمَاءِ الَّذِي جَلَّيْتُهُمْ عَنْهُ ذُو قَرَدٍ فَإِذَا نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي خَمْسِمِائَةٍ فَأَعْطَانِي سَهْمَ الْفَارِسِ وَالرَّاجِلِ ‏.‏




ইয়াস ইবনু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি (সালামাহ) বলেন, ‘আবদুর রহমান ইবনু ‘উয়াইনাহ রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উট লুন্ঠন করলো এবং তাঁর রাখালকে মেরে ফেললো। অতঃপর সে ও তার অশ্বারোহী সাথীরা উটগুলোকে হাঁকিয়ে নিয়ে যেতে থাকলো। আমি (সালামাহ) মাদীনার দিকে মুখ ফিরিয়ে (সাহায্যের জন্য) তিনবার ডাক দিলাম, হুশিয়ার! (ডাকাত দল এসেছে)। অতঃপর আমি তাদের পিছু ধাওয়া করে তীর ছুঁড়ে তাদেরকে আহত করতে লাগলাম। তাদের কোন অশ্বারোহী আমার দিকে ফিরলে আমি গাছের আড়ালে লুকাতাম। এভাবে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উটগুলোকে (উদ্ধার করে) আমার পিছনে ফেললাম। তারা বোঝা হালকা করে দ্রুত পালানোর জন্য তিরিশের অধিক বর্শা এবং তিরিশের অধিক চাদর বাহনের পিঠ থেকে ফেলে দেয়। তাদের সাহায্য করতে ‘উয়াইনাহ এগিয়ে এসে বললো, তার (সালামাহর) মোকাবিলার জনঃ কয়েকজন অগ্রসর হও। অতঃপর আমার মোকাবিলার জন্য তাদের চার জন সামনে অগ্রসর হয়ে পাহাড়ে উঠলো। আমার অবস্থান যখন তাদের থেকে এতটুকু দূরে ছিলো যে, তারা আমার ডাক শুনতে পাবে, তখন আমি বললাম, তোমরা কি আমাকে চেনো! তারা বললো, তুমি কে? আমি বললাম, আমি আকওয়া‘র পুত্র। সেই সত্ত্বার শপথ, যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর চেহারাকে সম্মানিত করেছেন! তোমাদের কেউ আমাকে ধরতে চাইলে, সে কখনোই আমাকে ধরতে পরবেনা। পক্ষান্তরে আমি কাউকে ধরতে পারলে তার রক্ষা নাই। এমন সময় আমি দেখতে পেলাম যে, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অশ্বারোহী বাহিনী গাছপালার ভিতর দিয়ে এগিয়ে আসছে। আখরাম আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন তাদের সবার আগে। আখরাম আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আবদুর রহমান ইবনু ‘উযাইনাহর দিকে অগ্রসর হলেন, সেও তাকে দেখতে পেলো। উভয়ের মধ্যে আক্রমণ পাল্টা-আক্রমণ চললো। আখরাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার ঘোড়াকে আঘাত করে হত্যা করলেন। ‘আবদুর রহমান (বল্লমের আঘাতে) আখরামকে শহীদ করে আখরামের ঘোড়ায় আরোহণ করলো। এবার আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আবদুর রহমানের মোকাবিলায় এগিয়ে এলেন। দু’জনের মধ্যে ধস্তাধস্তি হলো। সে আবূ ক্বাতাদাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘোড়াকে হত্যা করলো। আর আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে হত্যা করলেন। অতঃপর তিনি আখরামের ঘোড়ার সওয়ার হলেন। এরপর আমি (সালামাহ) রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে আসি। এ সময় তিনি যু ক্বারাদ নামক কূপের নিকটে অবস্থান করছিলেন। এখান থেকেই আমি লুটেরাদের ধাওয়া করেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে পাঁচশো লোক ছিলো। তিনি আমাকে (বীরত্বের জন্য) একজন অশ্বারোহীর ভাগ দিলেন এবং পদাতিকের ভাগও দিলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح، صحیح مسلم (1807)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سلمة: هو ابن الأكوع الأسلمي، وعكرمة: هو ابن عمار اليمامي. وأخرجه بأطول مما هاهنا مسلم (١٨٠٧) من طريق عكرمة بن عمار، به. وهو في "مسند أحمد" (١٦٥٣٩)، و"صحيح ابن حبان" (٧١٧٣). وقوله: "أعطاني سهم الفارس والراجل" فإنه يشبه أن يكون إنما أعطاه من الغنيمة سهم الراجل حسبُ، لأن سلمة كان راجلاً في ذلك اليوم، وأعطاه الزيادة نفلاً، لما كان من حسنِ بلائه.









সুনান আবী দাউদ (2753)


حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، مَحْبُوبُ بْنُ مُوسَى أَخْبَرَنَا أَبُو إِسْحَاقَ الْفَزَارِيُّ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ كُلَيْبٍ، عَنْ أَبِي الْجُوَيْرِيَةِ الْجَرْمِيِّ، قَالَ أَصَبْتُ بِأَرْضِ الرُّومِ جَرَّةً حَمْرَاءَ فِيهَا دَنَانِيرُ فِي إِمْرَةِ مُعَاوِيَةَ وَعَلَيْنَا رَجُلٌ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِنْ بَنِي سُلَيْمٍ يُقَالُ لَهُ مَعْنُ بْنُ يَزِيدَ فَأَتَيْتُهُ بِهَا فَقَسَمَهَا بَيْنَ الْمُسْلِمِينَ وَأَعْطَانِي مِنْهَا مِثْلَ مَا أَعْطَى رَجُلاً مِنْهُمْ ثُمَّ قَالَ لَوْلاَ أَنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ لاَ نَفْلَ إِلاَّ بَعْدَ الْخُمُسِ ‏"‏ ‏.‏ لأَعْطَيْتُكَ ‏.‏ ثُمَّ أَخَذَ يَعْرِضُ عَلَىَّ مِنْ نَصِيبِهِ فَأَبَيْتُ ‏.‏




আবূল জুওয়াইরিয়াহ আল-জারমী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মু‘আবিয়াহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাসনামলে রোম এলাকায় স্বর্ণমুদ্রা ভর্তি লাল রঙের একটি কলস পাই। এ সময়ে আমাদের অধিনায়ক ছিলেন বনী সুলাইম গোত্রের মা‘ন ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নামক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর এক সাহাবী। আমি কলসটি নিয়ে তার কাছে আসলে তিনি সৈনিকদের মধ্যে দীনারগুলি ভাগ করে দিলেন। তিনি অন্যদের মত আমাকেও এক ভাগ দিলেন। তিনি বললেন, আমি যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একথা বলতে না শুনতামঃ “এক-পঞ্চমাংশ নির্ধারণ করার পরই অতিরিক্ত দেয়া যায়।”, তাহলে আমি তোমাকে অতিরিক্ত দিতাম। অতঃপর তিনি তার অংশ থেকে আমাকে কিছু দিতে চাইলে আমি নিতে অসম্মতি জানাই।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4009)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث قوي، وهذا إسناد قد اختلفتْ فيه نسخُ أبي داود عن أبي إسحاق الفزاري، كما نبه عليه المزي في "تحفة الأشراف" (١١٤٨٤) نقلاً عن الخطيب البغدادي حيث قال: في نسختين مرويتين عن أبي داود: هذا الحديث مروي عن أبي إسحاق الفزاري، عن ابن المبارك، عن أبي عوانة، عن عاصم بن كليب، وقال المزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة معن بن يزيد السلمى: رواه أبو داود عن أبي صالح محبوب بن موسى الفراء، عن إبي إسحاق الفزاري، عن أبي عوانة. وفي بعض النسخ: عن أبي إسحاق الفزاري، عن ابن المبارك، عن أبي عوانة، فوقع لنا عالياً بدرجتين أو ثلاث. قلنا: فتحصل من هذا الكلام ثلاث احتمالات، احتمال كما رواه المصنف بإسقاط ابن المبارك وأبي عوانة، واحتمال بإسقاط ابن المبارك وحده، واحتمال بذكر الاثنين كليهما. لكن الذي في "السير" لأبي إسحاق الفزاري نفسه برقم (٥٤٠) كإسناد المصنف بإسقاط ابن المبارك وأبى عوانة، فالله تعالى أعلم. وقد روي الحديث من غير طريق الفزاري كما في الطريق الآتي بعده. وأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخه " ٥/ ١٥٠ من طريق أبي حمزة، عن عاصم بن كليب، به. وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (2754)


حَدَّثَنَا هَنَّادٌ، عَنِ ابْنِ الْمُبَارَكِ، عَنْ أَبِي عَوَانَةَ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ كُلَيْبٍ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ ‏.‏




আসিম ইবনু কুলাইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, উল্লেখিত হাদীস ‘আসিম ইবনু কুলাইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে একই সানাদে একই অর্থে বর্ণিত হয়েছে। আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل عاصم بن كليب، فهو صدوق لا بأس به. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري، وابن المبارك: هو عبد الله، وهناد: هو ابن السَّري. وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ٢٤٢ من طريق سهل بن بكار، والطبراني في "الكبير" ١٩/ (١٠٧٣)، والبيهقي ٦/ ٣١٤ من طريق عفان بن مسلم، والطبراني في "الأوسط" (٣٧٤٨) من طريق أبي ربيعة فهد بن عوف، والبيهقي ٦/ ٣١٤ من طريق محمد بن عُبيد، أربعتهم، عن أبي عوانة الوضاح بن عبد الله اليشكري، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (2755)


حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ عُتْبَةَ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْعَلاَءِ، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا سَلاَّمٍ الأَسْوَدَ، قَالَ سَمِعْتُ عَمْرَو بْنَ عَبَسَةَ، قَالَ صَلَّى بِنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى بَعِيرٍ مِنَ الْمَغْنَمِ فَلَمَّا سَلَّمَ أَخَذَ وَبَرَةً مِنْ جَنْبِ الْبَعِيرِ ثُمَّ قَالَ ‏ "‏ وَلاَ يَحِلُّ لِي مِنْ غَنَائِمِكُمْ مِثْلُ هَذَا إِلاَّ الْخُمُسَ وَالْخُمُسُ مَرْدُودٌ فِيكُمْ ‏"‏ ‏.‏




‘আমর ইবনু ‘আবাসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সুতরাহ স্বরূপ) গনীমাতের একটি উটকে সামনে রেখে আমাদের নিয়ে সলাত আদায় করলেন। সালাম ফিরিয়ে তিনি উটের পার্শ্বদেশের একটি পশম নিয়ে বললেনঃ এক-পঞ্চমাংশ ছাড়া তোমাদের গনীমাত থেকে আমার জন্য এতটুকু বৈধ নয়। আর এই এক-পঞ্চমাংশ তোমাদের কল্যাণে ব্যয় করা হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4026)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الله بن العلاء: هو ابن زبر، والوليد: هو ابن مسلم الدمشقي، وقد صرح بالسماع في جميع طبقات الإسناد، فانتفت شبهة تدليسه، ثم هو متابع. وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (٨٠٥)، والبيهقي ٦/ ٣٣٩، وابن عبد البر في "التمهيد" ٢٥/ ٥٠ - ٥١ من طريق الوليد بن مسلم، والحاكم ٣/ ٦١٦ - ٦١٧ من طريق محمد بن شعيب بن شابور، كلاهما عن عبد الله بن العلاء، به.









সুনান আবী দাউদ (2756)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِنَّ الْغَادِرَ يُنْصَبُ لَهُ لِوَاءٌ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَيُقَالُ هَذِهِ غَدْرَةُ فُلاَنِ بْنِ فُلاَنٍ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ ক্বিয়ামাতের দিন বিশ্বাসঘাতকের জন্য একটি পতাকা স্থাপন করা হবে। বলা হবে, এটা অমুকের পু্ত্র অমুকের বিশ্বাসঘাতকতার নিদর্শন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6178) صحیح مسلم (طریق الآخر ح1735)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "الموطأ" برواية محمد بن الحسن الشيباني (٩٩٣). وأخرجه البخاري (٦١٧٨) و (٦٩٦٦)، ومسلم (١٧٣٥)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٨٣) من طرق عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر. وأخرجه البخاري (٣١٨٨) و (٦١٧٧) و (١٧٣٥)، ومسلم (١٧٣٥)، والترمذي (١٦٧٢)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٨٤) من طريق نافع مولى ابن عمر، ومسلم (١٧٣٥) من طريق حمزة وسالم ابني عبد الله بن عمر، ثلاثتهم عن ابن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٤٨)، و"صحيح ابن حبان" (٧٣٤٢) و (٧٣٤٣). قال القرطبي فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" ٦/ ٢٨٤: هذا خطاب منه للعرب بنحو ما كانت تفعل، لأنهم كانوا يرفعون للوفاء راية بيضاء، وللغدر راية سوداء، ليلوموا الغادر ويذموه، فاقتضى الحديث وقوع مثل ذلك للغادر ليشتهر بصفته في القيامة، فيذمه أهل الموقف. قال الحافظ: وفي الحديث غلظُ تحريم الغدر لا سيما من صاحب الولاية العامة، لأن غدره يتعدى ضرره إلى خلق كثير، ولأنه غير مضطر إلى الغدر لقدرته على الوفاء. وقال القاضى عياض: المشهور أن هذا الحديث ورد في ذم الإمام إذا غدر في عهوده لرعيته أو لمقاتلته أو للإمامة التي تقلدها، والتزم القيام بها، فمتى خانَ فيها أو ترك الرفق، فقد غدر بعهده. وقيل: المراد نهي الرعية عن الغدر بالإمام، فلا تخرج عليه، ولا تتعرض لمعصيته، لما يترتب على ذلك من الفتنة. قال: والصحيح الأول. قلت (القائل ابن حجر): ولا أدري ما المانع من حمل الخبر على أعم من ذلك.









সুনান আবী দাউদ (2757)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ الْبَزَّازُ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّمَا الإِمَامُ جُنَّةٌ يُقَاتَلُ بِهِ ‏"‏ ‏.




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ নেতা ঢালস্বরুপ, তার নির্দেশে যুদ্ধ করা হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، رواہ البخاري (2957) ومسلم (1841)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات، عبد الرحمن بن أبي الزناد ضعيف يعتبر به في المتابعات، وقد توبع. أبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز. وأخرجه البخاري (٢٩٥٧)، والنسائي (٤١٩٦) من طريق شعيب بن أبي حمزة، ومسلم (١٨٤١) من طريق ورقاء بن عمر اليشكري، كلاهما عن أبي الزناد، به. وهو في "مسند أحمد" (١٠٧٧٧). قال الخطابي: معناه أن الإمام (رئيس الدولة) هو الذي يَعقِد العهدَ والهُدنة بينَ المسلمين، وبين أهلِ الشرك، فإذا رأى ذلك صلاحاً وهادنهم، فقد وجب على المسلمن أن يُجيزوا أمانَه، وأن لا يعرِضوا لمن عقد لهم في نفسِ أو مال. ومعنى جُنّة: العصمة والوقاية، وليس لغير الإمام أن يجعل للأمة بأسرها من الكفار أماناً، وإنما معنى قوله ﷺ: "يسعى بذمتهم أدناهم" أن يكون ذلك في الأفراد والآحاد، أو في أهل حصن أو قلعة ونحوها. فأما أن يجوز ذلك في جيل وأمة منهم، فلا يجوز.









সুনান আবী দাউদ (2758)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرٌو، عَنْ بُكَيْرِ بْنِ الأَشَجِّ، عَنِ الْحَسَنِ بْنِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي رَافِعٍ، أَنَّ أَبَا رَافِعٍ، أَخْبَرَهُ قَالَ بَعَثَتْنِي قُرَيْشٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أُلْقِيَ فِي قَلْبِيَ الإِسْلاَمُ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي وَاللَّهِ لاَ أَرْجِعُ إِلَيْهِمْ أَبَدًا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنِّي لاَ أَخِيسُ بِالْعَهْدِ وَلاَ أَحْبِسُ الْبُرُدَ وَلَكِنِ ارْجِعْ فَإِنْ كَانَ فِي نَفْسِكَ الَّذِي فِي نَفْسِكَ الآنَ فَارْجِعْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَذَهَبْتُ ثُمَّ أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَسْلَمْتُ ‏.‏ قَالَ بُكَيْرٌ وَأَخْبَرَنِي أَنَّ أَبَا رَافِعٍ كَانَ قِبْطِيًّا ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا كَانَ فِي ذَلِكَ الزَّمَانِ فَأَمَّا الْيَوْمَ فَلاَ يَصْلُحُ ‏.‏




আবু রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কুরাইশ নেতারা আমাকে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে পাঠালেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখা মাত্র আমার অন্তরে ইসলাম গ্রহনের প্রেরণা জাগলো। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! আমি কখনোই তাদের কাছে ফিরে যাবো না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি ওয়াদা ভঙ্গ করবো না এবং দূতকেও আটকে রাখবো না। বরং তুমি ফিরে যাও, তোমার অন্তরে এখন যা আছে, পরেও যদি তা থাকে তাহলে তুমি ফিরে এসো। আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সুতরাং আমি চলে যাই এবং পরে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে ফিরে এসে ইসলাম গ্রহন করি। বুকাইর (রঃ) বলেন, আমাকে হাসান ইবনু আলী জানিয়েছেন, আবূ রাফি’ ছিলেন কিবতী গোলাম। আবূ দাঊদ (রঃ) বলেন, এ নিয়ম ঐ যুগের প্রেক্ষাপটে ছিল। এ যুগে কোন দূত ইসলাম গ্রহন করে আশ্রয় চাইলে তাকে আশ্রয় দিবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3981)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. بكير بن الأشج. هو ابن عبد الله بن الأشج، وعمرو: هو ابن الحارث. وأخرجه النسائى في "الكبرى" (٨٦٢١) من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٨٥٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٧٧). قال الخطابي: قوله: "لا أخيس بالعهد" معناه: لا أنقض العهد، ولا أفسده، من قولك: خاس الشيءُ في الوعاء: إذا فَسَدَ. وفيه من الفقه: أن العقد يُرعَى مع الكافر، كما يُرعى مع المسلم، وأن الكافر إذا عقد لك عقد أمان، ففد وجب عليك أن تؤمنه، وأن لا تغتاله في دم، ولا مالٍ، ولا ولامنفعة. وقوله: "لا أحبس البرد" فقد يشبه أن يكون المعنى في ذلك: أن الرسالة تقتضي جواباً، والجواب لا يصل إلى المرسل إلا على لسان الرسول بعد انصرافه. فصار كأنه عقد له العهد مدة مجيئه ورجوعه، والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (2759)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ النَّمَرِيُّ، قَالَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ أَبِي الْفَيْضِ، عَنْ سُلَيْمِ بْنِ عَامِرٍ، - رَجُلٍ مِنْ حِمْيَرَ - قَالَ كَانَ بَيْنَ مُعَاوِيَةَ وَبَيْنَ الرُّومِ عَهْدٌ وَكَانَ يَسِيرُ نَحْوَ بِلاَدِهِمْ حَتَّى إِذَا انْقَضَى الْعَهْدُ غَزَاهُمْ فَجَاءَ رَجُلٌ عَلَى فَرَسٍ أَوْ بِرْذَوْنٍ وَهُوَ يَقُولُ اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ وَفَاءٌ لاَ غَدْرٌ فَنَظَرُوا فَإِذَا عَمْرُو بْنُ عَبَسَةَ فَأَرْسَلَ إِلَيْهِ مُعَاوِيَةُ فَسَأَلَهُ فَقَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ مَنْ كَانَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ قَوْمٍ عَهْدٌ فَلاَ يَشُدُّ عُقْدَةً وَلاَ يَحُلُّهَا حَتَّى يَنْقَضِيَ أَمَدُهَا أَوْ يَنْبِذَ إِلَيْهِمْ عَلَى سَوَاءٍ ‏"‏ ‏.‏ فَرَجَعَ مُعَاوِيَةُ ‏.‏




হিময়ার গোত্রের সুলাইম ইবনু ‘আমির (রঃ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও রোমকদের মধ্যে (নির্দিষ্ট সময় পর্যন্ত যুদ্ধ বিরতির) চুক্তি হয়। মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের জনপদে সফর করছিলেন এবং চুক্তির মেয়াদ শেষ হতেই তিনি তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধের প্রস্তুতি নেন। তখন এক ব্যাক্তি আরবী বা তুর্কী ঘোড়ায় চড়ে উপস্থিত হয়ে বলেন, আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার; ওয়াদা রক্ষা করতে হবে, ভঙ্গ করা চলবে না। লোকেরা দেখলো, লোকটি ‘আমর ইবনু ‘আসবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। অতঃপর মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)তাকে ডেকে পাঠালেন। তিনি ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)- কে (কিসের ওয়াদা ভঙ্গ হচ্ছে তা) জিজ্ঞেস করায় তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ যদি কারো সাথে কোন কওমের চুক্তি থাকে, তাহলে চুক্তির মেয়াদ শেষ হওয়ার পূর্বে তা নবায়ন করে শক্তিশালী করা যাবে না, এবং ভঙ্গ করাও যাবে না। যখন চুক্তির মেয়াদ শেষ হবে তখন ঘোষনা দিয়ে চুক্তি ভঙ্গ করবে। অতঃপর মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (যুদ্ধ না করে) ফিরে আসেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3980) ، أخرجہ الترمذي (1580 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. سُلَيم بن عامر: هو الخبائري الكلاعي، وأبو الفيض: هو موسى بن أيوب -ويقال: ابن أبي أيوب- المَهري الحمصي، وشعبة: هو ابن الحجاج. وأخرجه الترمذي (١٦٧١)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٧٩) من طريق شعبة بن الحجاج، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٧٠١٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٧١). وفي الباب عن أبي هريرة (٣٦٩) و (٣١٧٧)، وهو في "مسند أحمد" (٧٩٧٧). قال الخطابي: "الأمد" الغاية، قال النابغة: سَبق الجوادِ إذا استولى على الأمدِ ومعنى قوله: "ينبذ إليهم على سواء" أي: يُعلمُهم أنه يُريد أن يغزوهم، وأن الصلح الذي كان بينه وبينهم قد ارتفع. فيكون الفريقان في ذلك على السواء. وفيه دليل على أن العهد الذي يقعْ بين المسلمين وبين العدو ليس بعقدٍ لازمٍ لا يجوز القتال قبل انقضاء مدته، ولكن لا يجوز أن يفعل ذلك إلا بعد الإعلام به والإنذار فيه.









সুনান আবী দাউদ (2760)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ عُيَيْنَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي بَكْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ قَتَلَ مُعَاهِدًا فِي غَيْرِ كُنْهِهِ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ ‏"‏ ‏.‏




আবু বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যাক্তি আকারণে কোন চুক্তিবদ্ধ ব্যাক্তিকে হত্যা করবে, তার জন্য আল্লাহ জান্নাত হারাম করে দিবেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4751 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الرحمن:. هو ابن جَوشَنٍ الغَطَفاني، ووكيع: هو ابنُ الجراح. وأخرجه النسائى في "المجتبى" (٤٧٤٧) من طريق عيينة بن عبد الرحمن، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣٧٧). وأخرجه النسائي في "المجتبى" (٤٧٤٨) من طريق الأشعث بن ثُرمُلة، وفي "الكبرى" (٨٦٩١) من طريق الحسن البصري، كلاهما عن أبي بكرة. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣٨٣) و (٢٠٤٦٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٨١) و (٧٣٨٢). والمعاهد: قال ابن الأثير في "النهاية": يجوز بكسر الهاء وفتحها على الفاعل والمفعول، وهو في الحديث بالفتح أشهر وأكثر، والمعاهد: من كان بينك وبينه عهد، وأكثر ما يطلق في الحديث على أهل الذمة، وقد يطلق على غيرهم من الكفار إذا صولحوا على ترك الحرب مدة، وقوله: "في غير كهنه" كنه الأمر: حقيقته، وقيل: وقته وقدره، وقيل: غايته يعني مَن قتله في غير وقته، أو غاية أمره الذي يجوز فيه قتله.