সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، حَدَّثَنِي مُوسَى بْنُ يَعْقُوبَ، عَنِ ابْنِ عُثْمَانَقَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهُوَ يَحْيَى بْنُ الْحَسَنِ بْنِ عُثْمَانَ عَنِ الأَشْعَثِ بْنِ إِسْحَاقَ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ عَامِرِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ مَكَّةَ نُرِيدُ الْمَدِينَةَ فَلَمَّا كُنَّا قَرِيبًا مِنْ عَزْوَرَا نَزَلَ ثُمَّ رَفَعَ يَدَيْهِ فَدَعَا اللَّهَ سَاعَةً ثُمَّ خَرَّ سَاجِدًا فَمَكَثَ طَوِيلاً ثُمَّ قَامَ فَرَفَعَ يَدَيْهِ فَدَعَا اللَّهَ سَاعَةً ثُمَّ خَرَّ سَاجِدًا فَمَكَثَ طَوِيلاً ثُمَّ قَامَ فَرَفَعَ يَدَيْهِ سَاعَةً ثُمَّ خَرَّ سَاجِدًا ذَكَرَهُ أَحْمَدُ ثَلاَثًا قَالَ " إِنِّي سَأَلْتُ رَبِّي وَشَفَعْتُ لأُمَّتِي فَأَعْطَانِي ثُلُثَ أُمَّتِي فَخَرَرْتُ سَاجِدًا شُكْرًا لِرَبِّي ثُمَّ رَفَعْتُ رَأْسِي فَسَأَلْتُ رَبِّي لأُمَّتِي فَأَعْطَانِي ثُلُثَ أُمَّتِي فَخَرَرْتُ سَاجِدًا لِرَبِّي شُكْرًا ثُمَّ رَفَعْتُ رَأْسِي فَسَأَلْتُ رَبِّي لأُمَّتِي فَأَعْطَانِي الثُّلُثَ الآخَرَ فَخَرَرْتُ سَاجِدًا لِرَبِّي " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ أَشْعَثُ بْنُ إِسْحَاقَ أَسْقَطَهُ أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ حِينَ حَدَّثَنَا بِهِ فَحَدَّثَنِي بِهِ عَنْهُ مُوسَى بْنُ سَهْلٍ الرَّمْلِيُّ .
‘আমির ইবনু সা’দ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি (সা’দ) বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে মাক্কাহ থেকে মাদীনাহর দিকে রওয়ানা হলাম। অতঃপর আমরা ‘আযওয়ারা’ নামক স্থানের নিকটে পৌঁছালে তিনি বাহন থেকে নেমে আল্লাহর নিকট হাত তুলে কিছুক্ষণ দু’আ করে সাজদাহয় লুটিয়ে পড়েন। তিনি অনেকক্ষণ সাজদাহয় থাকলেন। অতঃপর সাজদাহ থেকে উঠে পুনরায় মহান আল্লাহর কাছে হাত তুলে কিছুক্ষণ দু’আ করে আবার সাজদাহ করলেন এবং অনেকক্ষণ সাজদাহয় থাকলেন। আবার উঠে দু’হাত তুলে দু’আ করলেন এবং সাজদাহয় করলেন। বর্ণনাকারী আহমাদ বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরুপ তিনবার করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি আমার রব্বের নিকট আবেদন করেছি এবং আমার উম্মাতের জন্য সুপারিশ করেছি। আমাকে এক-তৃতীয়াংশ উম্মাতের জন্য শাফা’আতের অনুমতি দেয়া হয়েছে। তাই কৃতজ্ঞতা সরূপ আমি সাজদাহতে লুটিয়ে পড়েছি। আবার মাথা তুলে আমার রব্বের নিকট উম্মাতের জন্য আবেদন করেছি। তিনি আমাকে আমার উম্মাতের আরো এক-তৃতীয়াংশের জন্য শাফ’আত করার অনুমতি দিলেন। আমি পুনরায় সাজদাহয় অবনত হয় প্রভুকে কৃতজ্ঞতা জানাই। আমি পুনরায় মাথা তুলে আমার মহান রব্বের নিকট উম্মাতের জন্য দু’আ করি। তিনি আমাকে আরো এক-তৃতীয়াংশ উম্মাতের জন্য শাফা’আত করার অনুমতি দেন। আমি আমার প্রভুকে সাজদাহ করে শুকরিয়া জানাই। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীস বর্ণনার সময় আহমাদ ইবনু সালিহ আমাদের কাছে আশ’আস ইবনু ইসহাক্বের নাম উল্লেখ না করেই মূসা ইবনু সাহল থেকে এ হাদীস বর্ণনা করেন।
দুর্বলঃ যঈফ আল-জামু’উস সাগীর (২০৮৯), ইরওয়া (৪৭৪)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، یحیي بن الحسن بن عثمان مجہول الحال (تق: 7531) ، (انوار الصحیفہ ص 100)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف موسى بن يعقوب، وجهالة يحيى بن الحسن بن عثمان. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل بن مسلم. وأخرجه محمد بن نصر المروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (٢٣٤)، والبيهقي ٢/ ٣٧٠ من طريق ابن أبي فُديك، بهذا الإسناد. وعزورا: بفتح العين وسكون الزاي وفتح الواو، وفتح الراء بالقصر، ويقال فيها: عَزْوَر: ثنية (هضبة) الجحفة عليها الطريق من المدينة إلى مكة، قال إبراهيم بن هرمة: تَذكَّر بعد النأي هنداً وشَفْغرا … فقصَّرَ يقضي حاجة ثم هَجَّرا ولم ينس أظعاناً عرضنَ عشيّةً … طوالعَ مِن هرشى قواصد عَزورا
حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، وَمُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ مُحَارِبِ بْنِ دِثَارٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَكْرَهُ أَنْ يَأْتِيَ الرَّجُلُ أَهْلَهُ طُرُوقًا .
জাবির ইবনু ‘আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন ব্যক্তির সফর থেকে গভীর রাতে নিজ পরিবারের কাছে প্রত্যাবর্তন করা অপছন্দ করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5243) صحیح مسلم (715 بعد ح1928)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٨٠١) و (٥٢٤٣)، ومسلم بإثر (١٩٢٨)، والنسائي في "الكبرى" (٩٠٩٦) من طريق محارب بن دثار، به. وأخرجه الترمذي (٢٩٠٩) من طريق نبيح العنزي، عن جابر بن عبد الله. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٩١)، و"صحيح ابن حبان" (٤١٨٢). وانظر ما بعده وما سيأتي برقم (٢٧٧٨). قال الخطابي: "طروقاً" أي: ليلا. يقال لكل ما أتاك ليلاً: طارق، ومنه قوله تعالى: ﴿وَالسَّمَاءِ وَالطَّارِقِ﴾ أي: النجم، لأنه يطرق بطلوعه ليلاً.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ مُغِيرَةَ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ جَابِرٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِنَّ أَحْسَنَ مَا دَخَلَ الرَّجُلُ عَلَى أَهْلِهِ إِذَا قَدِمَ مِنْ سَفَرٍ أَوَّلَ اللَّيْلِ " .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ মানুষের জন্য উত্তম হচ্ছে রাতের প্রথম অংশেই সফর থেকে ফিরে এসে পরিবারের সাথে মিলিত হওয়া।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5244) صحیح مسلم (715 بعد ح1928) ، مشکوۃ المصابیح (3921)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الشعبى: هو عامر بن شراحيل، ومغيرة: هو ابن مِقسَم، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه بنحوه البخاري (٥٢٤٤)، ومسلم بإثر (١٩٢٨)، والنسائي في "الكبرى" (٩٠٩٧) (٩٠٨٩) من طريق عاصم بن سليمان الأحول، عن الشعبي، به بلفظ: "إذا أطال أحدكم الغيبة، فلا يطرق أهله ليلاً" لفظ البخاري، ولفظ الآخرين حكاية نهي. وهو في "مسند أحمد" (١٥٢٦٥). وانظر ما قبله، وما بعده. قال الحافظ في "الفتح" ٩/ ٣٤٠: التقييد فيه بطول الغيبة يشير إلى أن علة النهي إنما توجد حينئذ، فالحكم يدور مع علته وجوداً وعدماً، فلما كان الذي يخرج لحاجته مثلاً نهاراً، ويرجع ليلاً لا يتأتى له ما يحذر من الذي يطيل الغيبة، كان طول الغيبة مظنة الأمن من الهجوم، فيقع للذي يهجم بعد طول الغيبة غالبا ما يكره: إما أن يجد أهله على غير أهبة من التنظيف والتزين المطلوب من المرأة، فيكون ذلك سبب النفرة بينهما، وقد أشار إلى ذلك بقوله في الحديث الآتي: "لكى تمتشط الشعثة وتستحد المغيبة"، ويؤخذ منه كراهة مباشرة المرأة في الحالة التي تكون فيها غير متنظفة، لئلا يطلع منها على ما يكون سببا لنفرته منها، وإما أن يجدها على حالة غير مرضية والشرع محرض على الستر.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، أَخْبَرَنَا سَيَّارٌ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي سَفَرٍ فَلَمَّا ذَهَبْنَا لِنَدْخُلَ قَالَ " أَمْهِلُوا حَتَّى نَدْخُلَ لَيْلاً لِكَىْ تَمْتَشِطَ الشَّعِثَةُ وَتَسْتَحِدَّ الْمُغِيبَةُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ الزُّهْرِيُّ الطُّرُوقُ بَعْدَ الْعِشَاءِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَبَعْدَ الْمَغْرِبِ لاَ بَأْسَ بِهِ .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে কোন এক সফর থেকে ফিরে যখন শহরে ঢূকছিলাম, তখন তিনি বললেনঃ থামো! আমরা রাত হলে প্রবেশ করবো। যেন স্ত্রীরা পরিচ্ছন্ন হয়ে চিরুনী করে এবং নিম্নাঙ্গের পশম কেটে পরিষ্কার করতে পারে। আবূ দাঊদ বলেন, যুহরী বলেছেন, ‘ইশার সলাতের পর আসলে এ নিষেধাজ্ঞা প্রযোজ্য। আবূ দাঊদ (রঃ) বলেন, মাগরিবের পর আসাতে কোন দোষ নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5247) صحیح مسلم (715 بعد ح1928)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سيار: هو أبو الحكم العَنَزي، وهُشيم: هو ابن بشير الواسطي. وأخرجه البخاري (٥٠٧٩) و (٥٢٤٥ - ٥٢٤٧)، ومسلم بإثر (١٩٢٨)، والنسائي في "الكبرى" (٩٠٩٩) و (٩١٠٠) من طريق سيار أبي الحكم، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٨٤)، و"صحيح ابن حبان" (٢٧١٤). وانظر سابقيه. قال الخطابي: "وتستحد" أي: تصلح من شأن نفسها، والاستحداد مشتق من الحديد، ومعناه الاحتلاق بالموسى، يقال: استحد الرجل إذا احتلق بالحديد، واستعان بمعناه: إذا حلق عانته.
حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنِ السَّائِبِ بْنِ يَزِيدَ، قَالَ لَمَّا قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم الْمَدِينَةَ مِنْ غَزْوَةِ تَبُوكَ تَلَقَّاهُ النَّاسُ فَلَقِيتُهُ مَعَ الصِّبْيَانِ عَلَى ثَنِيَّةِ الْوَدَاعِ .
আস-সায়িব ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকের যুদ্ধ হতে মাদীনাহয় ফিরে এলে জনগণ তাঁর সাথে সাক্ষাতের জন্য এগিয়ে আসে। আমি বালকদের সঙ্গে নিয়ে ‘আল-বিদা’ উপত্যকায় গিয়ে তাঁকে সংবর্ধনা জানাই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4427)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة، وابن السرح: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله بن عمرو بن السرح أبو الطاهر. وأخرجه البخاري (٣٠٨٣)، والترمذي (١٨١٥) من طريق سفيان بن عيينة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٧٢١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٩٢). قال المنذري في "اختصار السنن": فيه تمرين الصبيان على مكارم الأخلاق، واستجلاب الدعاء لهم. قال: وقال المُهلّب (قلنا: وهو أحد شراح البخاري): التلقي للمسافرين والقادمين من الجهاد والحج بالبشر والسرور أمرٌ معروف، ووجه من وجوه البر. وغزوة تبوك كانت في شهر رجب سنة تسع من الهجرة انظر خبرها في "زاد المعاد" ٣/ ٥٢٦ - ٥٣٧ الثنية: ما ارتفع من الأرض، وقيل: الطريق في الجبل. وثنية الوداع: هي من ناحية الشام لا يراها القادم من مكة إلى المدينة، ولا يمر بها إلا إذا توجه إلى الشام.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا ثَابِتٌ الْبُنَانِيُّ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ فَتًى، مِنْ أَسْلَمَ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي أُرِيدُ الْجِهَادَ وَلَيْسَ لِي مَالٌ أَتَجَهَّزُ بِهِ . قَالَ " اذْهَبْ إِلَى فُلاَنٍ الأَنْصَارِيِّ فَإِنَّهُ كَانَ قَدْ تَجَهَّزَ فَمَرِضَ فَقُلْ لَهُ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُقْرِئُكَ السَّلاَمَ وَقُلْ لَهُ ادْفَعْ إِلَىَّ مَا تَجَهَّزْتَ بِهِ " . فَأَتَاهُ فَقَالَ لَهُ ذَلِكَ فَقَالَ لاِمْرَأَتِهِ يَا فُلاَنَةُ ادْفَعِي لَهُ مَا جَهَّزْتِنِي بِهِ وَلاَ تَحْبِسِي مِنْهُ شَيْئًا فَوَاللَّهِ لاَ تَحْبِسِينَ مِنْهُ شَيْئًا فَيُبَارِكَ اللَّهُ فِيهِ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আসলাম গোত্রের এক যুবক বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি জিহাদের ইচ্ছা করেছি, কিন্তু এর প্রয়োজনীয় জিনিসপত্র আমার নেই। তিনি বললেনঃ অমুক আনসারীর নিকট যাও। সে জিহাদে অংশগ্রহণের রসদপত্র ব্যবস্থা করেছে কিন্তু এখন অসুস্থ। তুমি তাকে গিয়ে বলবে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে সালাম জানিয়েছেন। তুমি তাকে আরো বলবে, জিহাদের জন্য আপনি যে রসদপত্র সংগ্রহ করেছেন তা আমাকে দিন। যুবকটি তার নিকট গিয়ে বিষয়টি জানালো। আনসারী লোকটি তার স্ত্রীকে ডেকে বললেন, হে অমুক! আমার জন্য যে রসদপত্র তুমি সংগ্রহ করেছো তা এ যুবককে দিয়ে দাও, এর কোন কিছুই রেখে দিবে না। আল্লাহ শপথ! তুমি এর থেকে সামান্য বস্তুও রাখবে না, তবেই আল্লাহ এতে বরকত দিবেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1894)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ثابت البُناني: هو ابن أسلم، وحماد: هو ابن سلمة. وأخرجه مسلم (١٨٩٤) من طريق حماد بن سلمة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٣١٦٠)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٣٠).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُتَوَكِّلِ الْعَسْقَلاَنِيُّ، وَالْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنِي ابْنُ جُرَيْجٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي ابْنُ شِهَابٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ، عَنْ أَبِيهِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ كَعْبٍ، وَعَمِّهِ، عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ كَعْبٍ عَنْ أَبِيهِمَا، كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ لاَ يَقْدِمُ مِنْ سَفَرٍ إِلاَّ نَهَارًا . قَالَ الْحَسَنُ فِي الضُّحَى فَإِذَا قَدِمَ مِنْ سَفَرٍ أَتَى الْمَسْجِدَ فَرَكَعَ فِيهِ رَكْعَتَيْنِ ثُمَّ جَلَسَ فِيهِ .
কা‘ব ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনের বেলায় সফর থেকে ফিরতেন। হাসান বাসরী (রঃ) বলেন, পূর্বাহ্নে ফিরতেন। কা‘ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি সফর থেকে ফিরে প্রথমে মাসজিদে এসে দুই রাকা‘আত আদায় করার পর সেখানে বসতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح، صحیح بخاری (3088) صحیح مسلم (3769)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعبد الرزاق: هو ابن همام الصنعاني. وهو في "مصنف عبد الرزاق " (٤٨٦٤). وأخرجه البخاري (٣٠٨٨)، ومسلم (٧١٦)، والنسائي في "الكبرى" (٨٧٢٣) من طريق ابن جريج، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٥٧٧٥). وانظر ما سلف برقم (٢٧٧٣). تنبيه: هذا الحديث أثبتناه من هامش (هـ)، وأشار هناك إلى أنه من نسخة برواية أبي عيسى الرملي. وأورده المزي في "الأطراف" (١١١٣٢)، وقال: حديث العسقلانى والخلال في رواية أبي الحسن بن العبد وأبي بكر ابن داسه، ولم يذكره أبو القاسم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مَنْصُورٍ الطُّوسِيُّ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، حَدَّثَنِي نَافِعٌ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ أَقْبَلَ مِنْ حَجَّتِهِ دَخَلَ الْمَدِينَةَ فَأَنَاخَ عَلَى بَابِ مَسْجِدِهِ ثُمَّ دَخَلَهُ فَرَكَعَ فِيهِ رَكْعَتَيْنِ ثُمَّ انْصَرَفَ إِلَى بَيْتِهِ . قَالَ نَافِعٌ فَكَانَ ابْنُ عُمَرَ كَذَلِكَ يَصْنَعُ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজ্জ শেষে প্রত্যাবর্তন করে মাদীনাহয় প্রবেশ করলেন। উষ্ট্রীকে মাসজিদের দরজায় বসিয়ে তিনি তাঁর মাসজিদে ঢুকে দুই রাকা‘আত সলাত আদায় করলেন, অতঃপর নিজ বাড়িতে গেলেন। নাফি’ (রঃ) বলেন, ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–ও অনুরূপ করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل ابن إسحاق -وهو محمد- وقد صرح بالسماع فانتفت شبهة تدليسه. يعقوب: هو ابن إبراهيم بن سعد بن إبراهيم الزهري. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٦١٣٢) من طريق محمد بن إسحاق، به.
حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ التِّنِّيسِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، حَدَّثَنَا الزَّمْعِيُّ، عَنِ الزُّبَيْرِ بْنِ عُثْمَانَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سُرَاقَةَ، أَنَّ مُحَمَّدَ بْنَ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ ثَوْبَانَ، أَخْبَرَهُ أَنَّ أَبَا سَعِيدٍ الْخُدْرِيَّ أَخْبَرَهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِيَّاكُمْ وَالْقُسَامَةَ " . قَالَ فَقُلْنَا وَمَا الْقُسَامَةُ قَالَ " الشَّىْءُ يَكُونُ بَيْنَ النَّاسِ فَيَجِيءُ فَيَنْتَقِصُ مِنْهُ " .
আবূ সাইদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কোন কিছু বন্টনের পারিশ্রমিক গ্রহণ থেকে বিরত থাকো। বর্ণনাকারী বলেন, আমরা এর তাৎপর্য সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেনঃ একটি নির্দিষ্ট জিনিসে বিভিন্ন লোকের অধিকার থাকতে পারে। (অথচ বন্টনকারী বেশি পাওয়ার জন্য কারচুপি করে)। ফলে অন্যরা ভাগে কম পায়।
দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি’উস সাগীর (২২০৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، قال تنویر الحق الترمذی: زبیر بن عثمان: وقال ابن حبان: ’’من ثقات العلماء المدینۃ ومتقنیھم‘‘ (مشاہیر علماء الامصار؛ 1035) وذکرہ فی الثقات ایضًا
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث محتمل للتحسين بشاهده المرسل بعده، وهذا إسناد ضعيف لضعف الزمعي -واسمه موسى بن يعقوب- وجهالة الزبير بن عثمان بن عبد الله بن سراقة. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل بن مسلم. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٨٢٨١)، والبيهقي ٦/ ٣٥٦ من طريق ابن أبي فُديك، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده. قال الخطابي: "القسام" مضمومة القاف: اسم لما يأخذه القسام لنفسه في القسمة كالنّشارة لما يُنشر، والفُصالة لما يفصل، والعُجالة لما يُعجّل للضيف من الطعام. قال: وليس في هذا تحريم لأجرة القسام إذا أخذها بإذن المقسوم لهم، وإنما جاء هذا فيمن ولي أمر قوم فكان عريفاً عليهم، أو نقيباً. فإذا قسم بينهم سهامهم أمسك منها شيئاً لنفسه يستأثر به عليهم. وقد جاء بيان ذلك في الحديث الآخر.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ الْقَعْنَبِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ، - يَعْنِي ابْنَ مُحَمَّدٍ - عَنْ شَرِيكٍ، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي نَمِرٍ - عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نَحْوَهُ . قَالَ " الرَّجُلُ يَكُونُ عَلَى الْفِئَامِ مِنَ النَّاسِ فَيَأْخُذُ مِنْ حَظِّ هَذَا وَحَظِّ هَذَا " .
‘আত্বা ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেন। তিনি বলেনঃ এমনও লোক রয়েছে, যারা জনসাধারণের বন্টনকারী নিযুক্ত হয়ে এ ভাগ থেকে কিছু এবং ঐ ভাগ থেকে কিছু আত্মসাৎ করে থাকে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ھذا حدیث مرسل کما قال البغوي (شرح السنۃ 90/10 ح 2494) ، (انوار الصحیفہ ص 100)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث محتمل للتحسين، وهذا مرسل رجاله ثقات. القعنبى: هو عبد الله ابن مسلمة بن قعنب، وعبد العزيز بن محمد: هو الدَّرَاوردي. وأخرجه البيهقي ٦/ ٣٥٦ من طريق زهير بن محمد ومن طريق عبد العزيز بن محمد، كلاهما عن شريك بن أبى نمر، به. وانظر ما قبله. قال الخطابي: الفئام: الجماعات. قال الفرزدق: فئام ينهضون إلى فئام.
حَدَّثَنَا الرَّبِيعُ بْنُ نَافِعٍ، حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ، - يَعْنِي ابْنَ سَلاَّمٍ - عَنْ زَيْدٍ، - يَعْنِي ابْنَ سَلاَّمٍ - أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا سَلاَّمٍ، يَقُولُ حَدَّثَنِي عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ سَلْمَانَ، أَنَّ رَجُلاً، مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم حَدَّثَهُ قَالَ لَمَّا فَتَحْنَا خَيْبَرَ أَخْرَجُوا غَنَائِمَهُمْ مِنَ الْمَتَاعِ وَالسَّبْىِ فَجَعَلَ النَّاسُ يَتَبَايَعُونَ غَنَائِمَهُمْ فَجَاءَ رَجُلٌ حِينَ صَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ لَقَدْ رَبِحْتُ رِبْحًا مَا رَبِحَ الْيَوْمَ مِثْلَهُ أَحَدٌ مِنْ أَهْلِ هَذَا الْوَادِي قَالَ " وَيْحَكَ وَمَا رَبِحْتَ " . قَالَ مَا زِلْتُ أَبِيعُ وَأَبْتَاعُ حَتَّى رَبِحْتُ ثَلاَثَمِائَةِ أُوقِيَّةٍ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَنَا أُنَبِّئُكَ بِخَيْرِ رَجُلٍ رَبِحَ " . قَالَ مَا هُوَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ " رَكْعَتَيْنِ بَعْدَ الصَّلاَةِ " .
‘উবাইদুল্লাহ ইবনু সুলাইমান (রঃ) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কোন এক সাহাবী তাকে বলেছেন, আমরা খায়বার বিজয় করলে মুজাহিদরা গনীমাত থেকে নিজ নিজ ভাগের বন্দী ও মালপত্র গ্রহণ করলো। লোকজন তাদের গনীমাতের মাল পরস্পর ক্রয়-বিক্রয় করতে লাগলো। এক ব্যক্তি এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আজকে আমি এতই লাভ করেছি যে, এই প্রান্তরে কেউই অনুরূপ লাভ করতে পারেনি। তিনি বললেনঃ হায়! তুমি কি লাভ করেছো? সে বললো, আমি ক্রয়-বিক্রয় করে ‘তিনশো উকিয়াহ’ লাভ করেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি কি তোমাকে এমন ব্যক্তির কথা জানাবো, যে তোমার চাইতে উত্তম লাভ করেছে? সে বললো, হে আল্লাহর রাসূল রাসূল! কে সেই লোক? তিনি বললেনঃ যে ব্যক্তি ফারয সালাতের পর অতিরিক্ত দুই রাকা‘আত (নাফল) সলাত আদায় করেছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبید اللّٰہ بن سلمان مجہول (تق: 4298) ، و لم یوثقہ أحد فیما أعلم ، (انوار الصحیفہ ص 100)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة عُبيد الله بن سلمان. وأخرجه البيهقي ٦/ ٣٣٢ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. قلنا: وقد ثبت عنه ﷺ فيما أخرجه النسائي (٤٦٤٥) وغيره: أنه نهى عن بيع المغانم حتى تُقسم، وهذا يدل بمفهومه على جواز البيع والشراء للغنائم في الغزو بعد قسمتها، والله تعالى أعلم.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، أَخْبَرَنِي أَبِي، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ ذِي الْجَوْشَنِ، - رَجُلٍ مِنَ الضِّبَابِ - قَالَ أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعْدَ أَنْ فَرَغَ مِنْ أَهْلِ بَدْرٍ بِابْنِ فَرَسٍ لِي يُقَالُ لَهَا الْقَرْحَاءُ فَقُلْتُ يَا مُحَمَّدُ إِنِّي قَدْ جِئْتُكَ بِابْنِ الْقَرْحَاءِ لِتَتَّخِذَهُ قَالَ " لاَ حَاجَةَ لِي فِيهِ وَإِنْ شِئْتَ أَنْ أُقِيضَكَ بِهِ الْمُخْتَارَةَ مِنْ دُرُوعِ بَدْرٍ فَعَلْتُ " . قُلْتُ مَا كُنْتُ أُقِيضُهُ الْيَوْمَ بِغُرَّةٍ . قَالَ " فَلاَ حَاجَةَ لِي فِيهِ " .
দিবাব গোত্রের যুল-জাওসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধ থেকে অবসর হওয়ার পর আমি ইবনুল কারহা নামক একটি ঘোড়ার বাচ্চা নিয়ে তাঁর কাছে আসি। আমি বললাম, হে মুহাম্মদ! আমি আপনাকে দেয়ার জন্য কারহার বাচ্চাকে নিয়ে এসেছি। তিনি বললেনঃ এটি আমার দরকার নাই। তবে তুমি এর বিনিময়ে বদর যুদ্ধে প্রাপ্ত কোন একটি বর্ম নাও তাহলে তোমার ঘোড়ার বাচ্চাটি নিতে পারি। আমি বললাম, আজ আমি এর বিনিময়ে একটি ঘোড়াও নিতে রাজি নই। তিনি বললেনঃ তাহলে এটি আমার দরকার নাই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 100)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه. أبو إسحاق -وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي- لم يسمع من ذي الجوشن، وإنما سمعه من ابنه شمر عنه، نص على ذلك سفيان الثوري عن عبد الله بن أحمد في "زوائده على المسند" لأبيه (١٥٩٦٦/ ٢)، وابن أبي حاتم في "المراسيل" ص ١٤٦، وأبو القاسم البغوي فيما نقله عنه المنذري في "اختصار السنن"، وقال المنذري: الحديث لا يثبت، فإنه دائر بين الانقطاع، أو رواية من لا يُعتمد على روايته. قلنا: يعني بذلك جهالة شمر، والله أعلم. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٤/ ٣٧٥ - ٣٧٦، وابن سعد ٦/ ٤٧، وأحمد (١٥٩٦٥)، وابن أبي عاصم في" الآحاد والمثاني" (١٥٠٦)، والطبراني في "الكبير" (٧٢١٦)، والبيهقي ٩/ ١٠٨ من طريق عيسى بن يونس، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الله بن أحمد في زوائده على "المسند" لأبيه (١٥٩٦٦) من طريق سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن ذي الجوشن أبي شمر الضبابى نحو هذا الحديث قال سفيان: فكان ابن ذي جوشن جاراً لأبي إسحاق، لا أُراه إلا سمعه منه. قال الخطابي: "أقيضك به "معناه: أبدلك به، وأعوضك منه، والمقايضة في البيوع المعاوضة: أن يُعطي متاعاً ويأخذ آخر لا نقد فيه. وفيه أنه سمى الفَرَسَ غُرَّة، وكثر ما جاء ذكر الغرة في الحديث إنما يُراد به النَّسمة من أولاد آدم ﵇ عبد أو أمةٍ، وعلى ذلك تفسير قوله في الجنين وقضائه فيه بغرة عبدٍ أو أمةٍ. وكان أبو عمرو بن العلاء يقول لا تكون الغرة إلا عبداً أبيض أو جارية بيضاء … وقد روى حديث الجنين عيسى بن يونس، فجاء بزيادة تفرد بها لم يذكرها غيره من رواة الحديث، فقال: "عبد أو فرس أو بغل" فجعل الفرس والبغل غرة.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ دَاوُدَ بْنِ سُفْيَانَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَسَّانَ، أَخْبَرَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ مُوسَى أَبُو دَاوُدَ، حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ سَعْدِ بْنِ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، حَدَّثَنِي خُبَيْبُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَبِيهِ، سُلَيْمَانَ بْنِ سَمُرَةَ عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، أَمَّا بَعْدُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ جَامَعَ الْمُشْرِكَ وَسَكَنَ مَعَهُ فَإِنَّهُ مِثْلُهُ " .
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কেউ কোন মুশরিকের সাহচর্যে থাকলে এবং তাদের সাথে বসবাস করলে সে তাদেরই মত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، خبیب: مجہول،وجعفر: ضعیف کما ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 100، 101)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده مسلسلٌ بالضعفاء والمجاهيل. قال ابن القطان الفاسى في "بيان الوهم والإيهام" ٥/ ١٣٨ عند حديث بناء المساجد في الدور عن سمرة بهذا الإسناد: إسناد مجهول ألبتة، وما من هؤلاء من تعرف له حالٌ، وقد جَهِد المُحدِّثون فيهم جهدهم، وقال الذهبي في ترجمة جعفر بن سعد من "الميزان": هذا إسناد مظلم لا ينهض بحكمِ، وأورد هذا الحديث. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٧٠٢٣) و (٧٠٢٤) من طريق جعفر بن سعد، بهذا الإسناد. ويغني عنه ما صح عن جرير بن عبد الله، عن النبي ﷺ قال: "أنا بريء من كل مسلم يُقيم بين أظهر المشركين" قالوا: يا رسول الله، لم؟ قال: "لا تراءى ناراهما". وقد سلف عند المصنف برقم (٢٦٤٥)، وانظر الكلام على فقهه عند حديث جرير. قال ابن القيم في "زاد المعاد" ٣/ ١٢٢ - ١٢٣ بتحقيقنا: ومنع رسول الله ﷺ من إقامة المسلم بين المشركين إذا قدر على الهجرة من بينهم، وقال: "أنا بريء من كل مسلم يقيم بين أظهر المشركين، قيل: يا رسول الله ولم؟ قال: لا تراءى ناراهما" وقال: "من جامع المشرك وسكن معه، فهو مثله"، وقال: "لا تنقطع الهجرة حتى تنقطع التوبة، ولا تنقطع التوبة حتى تطلع الشمس من مغربها" سلف عند المصنف (٢٤٧٩) وقال: "ستكون هجرة بعد هجرة فخيار أهل الأرض ألزمهم مهاجر إبراهيم، ويبقى في الأرض شرار أهلها تلفظهم أرضوهم، تقذرهم نفس الله، وتحشرهم النار مع القردة والخنازير" سلف عن أبي داود (٢٤٨٢).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ، ح وَحَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ مَسْعَدَةَ، حَدَّثَنَا بِشْرٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَوْنٍ، عَنْ عَامِرٍ أَبِي رَمْلَةَ، قَالَ أَخْبَرَنَا مِخْنَفُ بْنُ سُلَيْمٍ، قَالَ وَنَحْنُ وُقُوفٌ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِعَرَفَاتٍ قَالَ " يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّ عَلَى كُلِّ أَهْلِ بَيْتٍ فِي كُلِّ عَامٍ أُضْحِيَةً وَعَتِيرَةً أَتَدْرُونَ مَا الْعَتِيرَةُ هَذِهِ الَّتِي يَقُولُ النَّاسُ الرَّجَبِيَّةُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ الْعَتِيرَةُ مَنْسُوخَةٌ هَذَا خَبَرٌ مَنْسُوخٌ .
মিখলাফ ইবনু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে আরাফাহয় অবস্থান করছিলাম। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি বললেনঃলোকসকল! নিশ্চয়ই প্রতিটি পরিবারের লোকদের উপর প্রতি বছর কুরবানী ও ‘আতীরাহ করা কর্তব্য। তিনি বললেন, তোমরা কি জানো, ‘আতীরাহ কি? ‘আতীরাহ হলো, যাকে লোকেরা ‘রাজাবিয়াহ’ বলতে থাকে।
আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘আতীরাহ রহিত এবং এর হাদীসও রহিত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1518) نسائی (4229) ابن ماجہ (3125) ، أبو رملۃ مجہول الحال،جھلہ ابن القطان وغیرہ ، والحدیث الآتي (الأصل: 2830) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 101)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي رملة واسمه عامر، وقد تابعه حبيب ابن مخنف، وقواه الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٤، وحسنه الترمذي. بشر: هو ابن المفضل، ويزيد: هو ابن هارون، ومُسدد: هو ابن مسرهد. وأخرجه ابن ماجه (٣١٢٥)، والترمذي (١٥٩٦) من طريق عبد الله بن عون، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٨٨٩). وأخرجه عبد الرزاق (٨٠٠١) و (٨١٥٩)، وعنه أحمد (٢٠٧٣٠) عن ابن جريج، عن عبد الكريم بن أبي المخارق، عن حبيب بن مخنف، عن أبيه قال: انتهيت إلى النبي. وعند أحمد: عن حبيب بن مخنف قال: انتهيت. فجعله من مسند حبيب وليس من مسند أبيه، فكأنه هو الصحابي، وقد كان عبد الرزاق يفعل هذا تارة، وهذا تارة، ولهذا اختلفت الروايات عنه كما نقل ابن الأثير في "أسد الغابة" ١/ ٤٤٨. عن أبي نعيم الأصبهانى في "معرفة الصحابة" أنه قال ذلك. وصوب أبو نعيم روايته عن أبيه، ومال إليه أبو زرعة العراقي في "ذيل الكاشف" ووافقه ابن حجر في "التعجيل" و"الإصابة" و"أطراف المسند". قال الخطابي: "العتيرة" تفسيرها في الحديث: أنها شاة تذبح في رجب. وهذا هو الذي يشبه معنى الحديث، ويليق بحكم التدين، فأما العتيرة التي كان يَعتِرُها أهل الجاهلية: فهي الذبيحة تذبح للصنم، فيصبُّ دمها على رأسه، والعتر: بمعنى الذبح. وقول أبي داود في آخر الحديث: العتيرة منسوخة. هذا خبر منسوخ فيه نظر، فصلنا القول فيه في تعليقنا على "شرح السنة" ٤/ ٣٥١ - ٣٥٣. وانتهينا إلى أن العتيرة مستحبة وليست بمنسوخة إذا كان الذبح لله سبحانه. والحديث يدل على وجوب الأضحية على الموسر، وهو قول أبي حنيفة والليث بن سعد وربيعة الرأي والأوزاعي وبعض المالكية. ومن الأدلة على وجوبها حديث أبي هريرة عند أحمد (٨٢٧٣)، وابن ماجه (٣١٢٣) أن رسول الله ﷺ قال: "من وجد سعة ولم يضح، فلا يقربن مصلانا" وهو حسن في الشواهد وصححه الحاكم ٢/ ٣٤٩ و ٤/ ٢٣١، ووجه الاستدلال: أنه لما نهى من كان ذا سعة عن قربان المصلى إذا لم يضح، دل على أنه قد ترك واجباً، فكأنه لا فائدة من التقرب مع ترك هذا الواجب. وحديث جندب بن عبد الله البجلي قال: شهدت النبي ﷺ يوم النحر قال: "من ذبح قبل أن يصلي فليُعد مكانها أخرى". أخرجه البخاري (٩٨٥)، ومسلم (١٩٦٢)، والأمر ظاهر في الوجوب، ولم يأت من قال بعدم الوجوب بما يصلح للصرف، اللهم إلا ما رواه أحمد في "المسند" (٢٠٥٠) وغيره: أن رسول الله ﷺ قال: "ثلاث هن علي فرائض، وهن لكم تطوع، الوتر والنحر وصلاة الضحى، وهو حديث ضعيف، في سنده أبو جناب الكلبي يحيى بن أبي حية، قال يحيى القطان: لا أستحل أن أروي عنه، وقال النسائي والدارقطني: ضعيف، وقال الفلاس متروك، وله طرق أخرى كلها ضعيفة لا تصح.
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يَزِيدَ، حَدَّثَنِي سَعِيدُ بْنُ أَبِي أَيُّوبَ، حَدَّثَنِي عَيَّاشُ بْنُ عَبَّاسٍ الْقِتْبَانِيُّ، عَنْ عِيسَى بْنِ هِلاَلٍ الصَّدَفِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " أُمِرْتُ بِيَوْمِ الأَضْحَى عِيدًا جَعَلَهُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ لِهَذِهِ الأُمَّةِ " . قَالَ الرَّجُلُ أَرَأَيْتَ إِنْ لَمْ أَجِدْ إِلاَّ أُضْحِيَةً أُنْثَى أَفَأُضَحِّي بِهَا قَالَ " لاَ وَلَكِنْ تَأْخُذُ مِنْ شَعْرِكَ وَأَظْفَارِكَ وَتَقُصُّ شَارِبَكَ وَتَحْلِقُ عَانَتَكَ فَتِلْكَ تَمَامُ أُضْحِيَتِكَ عِنْدَ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ " .
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমি কুরবানীর দিনকে ঈদ উদযাপন করতে নির্দেশপ্রাপ্ত হয়েছি। আল্লাহ এ দিনকে এ উম্মাতের জন্য ঈদ হিসাবে নির্দিষ্ট করেছেন। এক ব্যক্তি বললো, আপনার অভিমত ব্যক্ত করুন, আমি (আমার প্রতিপালিত) দুগ্ধবতী বা মালবাহী পশু ছাড়া অন্য পশু না পেলে কি তা দিয়েই কুরবানী করবো? তিনি বললেনঃ না, বরং তুমি তোমার চুল ও নখ কাটবে, গোঁফ ছোট করবে এবং নাভীর নীচের লোম কাটবে। এ কাজগুলোই আল্লাহর নিকট তোমার পূর্ণাঙ্গ কুরবানী।
দুর্বলঃ মিশকাত (১৪৭৯), আল-জামি’উস সাগীর (১২৬৫), যঈফ সুনান নাসায়ী (২৯৪/৪৩৬৫)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (1479) ، عیسی بن ھلال: صدوق، و ثقہ ابن حبان والحاکم وغیرھما و حدیثہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل عيسى بن هلال الصدفي، فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، وذكره يعقوب بن سفيان في "تاريخه" في ثقات التابعين من أهل مصر. وأخرجه النسائي (٤٣٦٥) من طريق سعيد بن أبي أيوب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٥٧٥)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩١٤). وإنما منعه، لأنه لم يكن عنده شيء سواها ينتفع بها.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ أَبِي الْحَسْنَاءِ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ حَنَشٍ، قَالَ رَأَيْتُ عَلِيًّا يُضَحِّي بِكَبْشَيْنِ فَقُلْتُ مَا هَذَا فَقَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَوْصَانِي أَنْ أُضَحِّيَ عَنْهُ فَأَنَا أُضَحِّي عَنْهُ .
তাবিঈ হানাশ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দু’টি দুম্বা কুরবানী করতে দেখে জিজ্ঞেস করলাম, ব্যাপার কি (দু’টি কেন)? তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ওয়াসিয়্যাত করেছেন, আমি যেন তার পক্ষ হতে কুরবানী করি। তাই তার পক্ষ হতেও কুরবানী করছি।
দুর্বলঃ মিশকাত (১৫৪২)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1495) ، شریک والحکم بن عتیبۃ مدلسان و عنعنا ، و أبو الحسناء ’’مجہول‘‘ (تقریب التہذیب: 8053) ، (انوار الصحیفہ ص 101)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة أبي الحسناء، وسوء حفظ شريك -وهو النَّخَعي-، وحنش -وهو ابن المعتمر الكوفي- تكلم فيه غير واحد. وأخرجه الترمذي (١٥٦٩) من طريق شريك النخعي، بهذا الإسناد. وقال: حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث شريك. وهو في "مسند أحمد" (٨٤٣). قال الترمذي: قد رخص بعض أهل العلم أن يضحي عن الميت، ولم ير بعضهم أن يُضحي عنه، وقال عبد الله بن المبارك: أحبّ إلي أن يتصدق عنه ولا يُضحى، وإن ضحى عنه، فلا يأكل منها شيئاً، ويتصدق بها كلها.
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرٍو، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مُسْلِمٍ اللَّيْثِيُّ، قَالَ سَمِعْتُ سَعِيدَ بْنَ الْمُسَيَّبِ، يَقُولُ سَمِعْتُ أُمَّ سَلَمَةَ، تَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ كَانَ لَهُ ذِبْحٌ يَذْبَحُهُ فَإِذَا أَهَلَّ هِلاَلُ ذِي الْحِجَّةِ فَلاَ يَأْخُذَنَّ مِنْ شَعْرِهِ وَلاَ مِنْ أَظْفَارِهِ شَيْئًا حَتَّى يُضَحِّيَ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ اخْتَلَفُوا عَلَى مَالِكٍ وَعَلَى مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو فِي عَمْرِو بْنِ مُسْلِمٍ قَالَ بَعْضُهُمْ عُمَرُ وَأَكْثَرُهُمْ قَالَ عَمْرٌو . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهُوَ عَمْرُو بْنُ مُسْلِمِ بْنِ أُكَيْمَةَ اللَّيْثِيُّ الْجُنْدَعِيُّ .
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যার কুরবানীর পশু রয়েছে, সে যেন যিলহাজ্জ মাসের নতুন চাঁদ উঠার পর থেকে কুরবানী করার পূর্ব পর্যন্ত তার চুল ও নখ না কাটে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1977)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو -وهو ابن علقمة اليثي- وهو متابع. وأخرجه مسلم (١٩٧٧) عن عُبيد الله بن معاذ، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٩٧٧)، والترمذي (١٦٠٢)، والنسائي (٤٣٦١) و (٤٣٦٢) من طريق عَمرو بن مسلم -وقيل: عُمر بن مسلم، وكلاهما وارد في اسمه-، به. وأخرجه مسلم (١٩٧٧)، والنسائي (٤٣٦٤) من طريق عبد الرحمن بن حميد بن عبد الرحمن، عن سعيد بن المسيب، به. قال الخطابي: "الذِّبح" بكسر الذال: الضحية التي يذبحها المضحي. واختلف العلماء في القول بظاهر هذا الخبر. فكان سعيد بن المسيب يقول به. ويمنع المضحيَ من أحد أظفاره وشعره أيام العشر من ذي الحجة. وكذلك قال ربيعة بن أبي عبد الرحمن، وإليه ذهب أحمد وإسحاق. وكان مالك والشافعي يريان ذلك على الندب والاستحباب. ورخص أصحاب الرأي في ذلك. قال: وأجمعوا أنه لا يحرم عليه اللباسُ والطيب، كما يحرمان على المحرم. فدل ذلك على سبيل الندب والاستحباب، دون الحتم والإيجاب.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي حَيْوَةُ، حَدَّثَنِي أَبُو صَخْرٍ، عَنِ ابْنِ قُسَيْطٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَرَ بِكَبْشٍ أَقْرَنَ يَطَأُ فِي سَوَادٍ وَيَنْظُرُ فِي سَوَادٍ وَيَبْرُكُ فِي سَوَادٍ فَأُتِيَ بِهِ فَضَحَّى بِهِ فَقَالَ " يَا عَائِشَةُ هَلُمِّي الْمُدْيَةَ " . ثُمَّ قَالَ " اشْحَذِيهَا بِحَجَرٍ " . فَفَعَلَتْ فَأَخَذَهَا وَأَخَذَ الْكَبْشَ فَأَضْجَعَهُ وَذَبَحَهُ وَقَالَ " بِسْمِ اللَّهِ اللَّهُمَّ تَقَبَّلْ مِنْ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَمِنْ أُمَّةِ مُحَمَّدٍ " . ثُمَّ ضَحَّى بِهِ صلى الله عليه وسلم .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন দুম্বা কুরবানী করতে নির্দেশ করেন, যার শিং নিখুঁত, হাঁটা কালো, দেখতে কালো এবং শোয়াও কালো (অর্থাৎ পা, চোখ, পেট সবই কালো রঙের)। তিনি বললেনঃ হে ‘আয়িশাহ! ছুরি দাও। এরপর বললেনঃ এটা পাথরে ঘষে ধারালো করো। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাই করলাম। তিনি ছুরি নিলেন, দুম্বাকে ধরে কাৎ করে শোয়ান এবং যাবাহ করার সময় বললেনঃ “বিসমিল্লাহ; হে আল্লাহ! আপনি এ কুরবানী মুহাম্মাদ, মুহাম্মাদের পরিবার ও তার উম্মাতের পক্ষ হতে কবুল করুন।" অতঃপর তিনি দুম্বাটি কুরবানী করলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1967)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناد حسن. أبو صخر - واسمه حميد بن زياد المدني - صدوق حسن الحديث. حيوة: هو ابن شُريح، وابن قُسيط: هو يزيد بن عبد الله بن قُسيط. وأخرجه مسلم (١٩٦٧) من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٤٩١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩١٥). قوله: "يطأ في سواد" قال الخطابي: يريد أن أظلافه ومواضع البروك منه، وما أحاط بملاحظ عينيه من وجهه: أسود، وسائر بدنه أبيض. وقوله: "اشحذيها" قال ابن الأثير: يقال: شحذت السيف والسكين، إذا حدَّدته بالمِسَنِّ وغيره مما يُخرج حدَّه. قال الخطابي: وفي قوله: "تقبل من محمد وآل محمد، ومن أمة محمد" دليل على أن الشاة الواحدة تجزئ عن الرجل وأهله، وإن كثروا. وروي عن أبي هريرة وابن عمر: أنهما كانا يفعلان ذلك. وأجازه مالك والأوزاعي والشافعي وأحمد. وكره ذلك الثوري وأبو حنيفة.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا وُهَيْبٌ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَحَرَ سَبْعَ بَدَنَاتٍ بِيَدِهِ قِيَامًا وَضَحَّى بِالْمَدِينَةِ بِكَبْشَيْنِ أَقْرَنَيْنِ أَمْلَحَيْنِ .
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে সাতটি উটকে দাঁড়িয়ে থাকাবস্থায় কুরবানী করেন এবং মদীনাহতে শিংযুক্ত দুটি ধূসর বর্ণের দুম্বা কুরবানী করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1712)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وُهَيب: هو ابن خالد. وأخرجه البخاري (١٥٥١) و (١٧١٢) و (١٧١٤) و (٥٥٥٤) من طريق أيوب السختاني، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٣٨٣١). وأخرجه بنحوه البخاري (٥٥٥٣) من طريق عبد العزيز بن صهيب، والنسائي (٤٣٨٨) من طريق محمد بن سيرين، و (٤٣٨٦) من طريق ثابت البناني، ثلاثتهم عن أنس. وهو في "مسند أحمد" (١١٩٨٤) و (١٢١٢٠) و (١٢٨٣٠). وانظر ما بعده. وقد ذهل الحافظ المنذري في "اختصار السنن" فقال: أخرج البخاري قصة الكبشين فقط بنحوه مع أنه أخرج الحديث بتمامه في المواضع الثلاثة المشار إليها. قال الخطابي: "الأملح" من الكباش: هو الذي في خلال صوفه الأبيض طاقات سود.
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم ضَحَّى بِكَبْشَيْنِ أَقْرَنَيْنِ أَمْلَحَيْنِ يَذْبَحُ وَيُكَبِّرُ وَيُسَمِّي وَيَضَعُ رِجْلَهُ عَلَى صَفْحَتِهِمَا .
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই শিংওয়ালা ধূসর বর্ণের দু’টি দুম্বা কুরবানী করেন। যাবাহ করার সময় তিনি বিসমিল্লাহ এবং আল্লাহু আকবার পাঠ করেন, এবং তিনি তার পা পশুর ঘাড়ের উপর রাখেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3799)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. قتادة: هو ابن دِعامة السدوسي، وهشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّستُوائي. وأخرجه البخاري (٥٥٥٨) و (٥٥٦٤) و (٥٥٦٥)، ومسلم (١٩٦٦)، وابنُ ماجه (٣١٢٠)، والترمذي (١٥٦٨)، والنسائي (٤٣٨٧) و (٤٤١٥ - ٤٤١٨) من طرق عن قتادة، به. وبعضهم لا يذكر التكبير، وبعضهم يزيد في التسمة. وهو في "مسند أحمد" (١١٩٦٠)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٠٠). وانظر ما قبله. قوله: "صفحتهما" أي: جانب العُنُق.