হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (2801)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا خَالِدٌ، عَنْ مُطَرِّفٍ، عَنْ عَامِرٍ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، قَالَ ضَحَّى خَالٌ لِي يُقَالُ لَهُ أَبُو بُرْدَةَ قَبْلَ الصَّلاَةِ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ شَاتُكَ شَاةُ لَحْمٍ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ عِنْدِي دَاجِنًا جَذَعَةً مِنَ الْمَعْزِ فَقَالَ ‏"‏ اذْبَحْهَا وَلاَ تَصْلُحُ لِغَيْرِكَ ‏"‏ ‏.‏




আল বারাআ ইবনু ‘আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ বুরদাহ নামক আমার এক খালু একদা ঈদের সালাতের আগেই কুরবানী করে ফেলেন। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ তোমার বকরী গোশত খাওয়ার বকরী হয়েছে (কুরবানীর বকরী হয়নি)। তিনি বললেনঃ হে আল্লাহর রাসূল! আমার কাছে ছয় মাস বয়সের একটি ছাগল আছে। তিনি বললেনঃ সেটা কুরবানী করো, তবে তোমার পর আর কারো জন্য এরূপ করা সঠিক হবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5556) صحیح مسلم (1961)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عامر: هو ابن شَراحيل الشَّعبي، ومُطرِّف: هو ابن طريف الحارثي، وخالد: هو ابن عبد الله الواسطي، ومُسدَّد: هو ابن مُسرهَد. وأخرجه البخاري (٥٥٥٦)، ومسلم (١٩٦١) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (2802)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ النَّمَرِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ عُبَيْدِ بْنِ فَيْرُوزَ، قَالَ سَأَلْتُ الْبَرَاءَ بْنَ عَازِبٍ مَا لاَ يَجُوزُ فِي الأَضَاحِي فَقَالَ قَامَ فِينَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَصَابِعِي أَقْصَرُ مِنْ أَصَابِعِهِ وَأَنَامِلِي أَقْصَرُ مِنْ أَنَامِلِهِ فَقَالَ ‏"‏ أَرْبَعٌ لاَ تَجُوزُ فِي الأَضَاحِي الْعَوْرَاءُ بَيِّنٌ عَوَرُهَا وَالْمَرِيضَةُ بَيِّنٌ مَرَضُهَا وَالْعَرْجَاءُ بَيِّنٌ ظَلْعُهَا وَالْكَسِيرُ الَّتِي لاَ تَنْقَى ‏"‏ ‏.‏ قَالَ قُلْتُ فَإِنِّي أَكْرَهُ أَنْ يَكُونَ فِي السِّنِّ نَقْصٌ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ مَا كَرِهْتَ فَدَعْهُ وَلاَ تُحَرِّمْهُ عَلَى أَحَدٍ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ لَيْسَ لَهَا مُخٌّ ‏.




‘উবাইদ ইবনু ফাইরূয (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আল-বারাআ ইবনু ‘আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করি, কোন ধরনের পশু কুরবানী করা জায়িয নয়? তিনি বললেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে দাঁড়ান। আমার আঙ্গুলগুলো তাঁর আঙ্গুলের চেয়ে তুচ্ছ এবং আমার আঙ্গুলের গিরাগুলোও তাঁর আঙ্গুলের গিরার চেয়ে তুচ্ছ। তিনি আঙ্গুল দ্বারা ইশারা করে বললেনঃ চার ধরনের দোষযুক্ত পশু কুরবানী করা জায়ি্য নয়। অন্ধ-যার অন্ধত্ব সুস্পষ্ট, রুগ্ন-যার রোগ সুস্পষ্ট, খোঁড়া-যার খোঁড়ামী সুস্পষ্ট, বৃদ্ধ ও দুর্বল-যার হাড়ের মজ্জা শুকিয়ে গেছে। ‘উবাইদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি বলি, বয়সের কোন দোষ থাকাও আমি অপছন্দ করি। আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তুমি যা অপছন্দ করো তা বর্জন করবে, তবে অন্যের জন্য তা নিষিদ্ধ করবে না। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এমন দুর্বল যে, তার হাড়ের মজ্জা নাই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (1465) ، أخرجہ النسائي (4374 وسندہ صحیح) وابن ماجہ (3144 وسندہ صحیح) وصححہ ابن خزیمۃ (2912 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سليمان بن عبد الرحمن: هو ابن عيسى المصري، وشعبة: هو ابن الحجاج، وحفص بن عمر النمري: هو ابن الحارث بن سخبرة الحوضي. قال أحمد بن حنبل: ما أحسن حديث سليمان عن البراء في الضحايا. وأخرجه ابن ماجه (٣١٤٤)، والترمذي (١٥٧١) و (١٥٧٢)، والنسائي (٤٣٦٩) و (٤٣٧٠) و (٤٣٧١) من طريق سليمان بن عبد الرحمن، به. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلا من حديث عُبَيد بن فيروز عن البراء، والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥١٠)، و"صحيح ابن حبان " (٥٩١٩). قال الخطابي: قوله: "لا تُنقى" أي: لا نقِي لها، وهو المخُّ. وفيه دليل على أن العيب الخفيف في الضحايا معفو عنه. ألا تراه يقول: "بيّنٌ عَورُها، وبين مرضُها، وبيّن ظَلعها" فالقليل منه غير بيِّن، فكان معفواً عنه.









সুনান আবী দাউদ (2803)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، قَالَ أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ بَحْرِ بْنِ بَرِّيٍّ، حَدَّثَنَا عِيسَى، - الْمَعْنَى - عَنْ ثَوْرٍ، حَدَّثَنِي أَبُو حُمَيْدٍ الرُّعَيْنِيُّ، أَخْبَرَنِي يَزِيدُ، ذُو مِصْرٍ قَالَ أَتَيْتُ عُتْبَةَ بْنَ عَبْدٍ السُّلَمِيَّ فَقُلْتُ يَا أَبَا الْوَلِيدِ إِنِّي خَرَجْتُ أَلْتَمِسُ الضَّحَايَا فَلَمْ أَجِدْ شَيْئًا يُعْجِبُنِي غَيْرَ ثَرْمَاءَ فَكَرِهْتُهَا فَمَا تَقُولُ قَالَ أَفَلاَ جِئْتَنِي بِهَا ‏.‏ قُلْتُ سُبْحَانَ اللَّهِ تَجُوزُ عَنْكَ وَلاَ تَجُوزُ عَنِّي قَالَ نَعَمْ إِنَّكَ تَشُكُّ وَلاَ أَشُكُّ إِنَّمَا نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْمُصْفَرَّةِ وَالْمُسْتَأْصَلَةِ وَالْبَخْقَاءِ وَالْمُشَيَّعَةِ وَالْكَسْرَاءِ فَالْمُصْفَرَّةُ الَّتِي تُسْتَأْصَلُ أُذُنُهَا حَتَّى يَبْدُوَ سِمَاخُهَا وَالْمُسْتَأْصَلَةُ الَّتِي اسْتُؤْصِلَ قَرْنُهَا مِنْ أَصْلِهِ وَالْبَخْقَاءُ الَّتِي تَبْخَقُ عَيْنُهَا وَالْمُشَيَّعَةُ الَّتِي لاَ تَتْبَعُ الْغَنَمَ عَجْفًا وَضَعْفًا وَالْكَسْرَاءُ الْكَسِيرَةُ ‏.‏




ইয়াযীদ মিসরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘উতবাহ ইবনু আব্‌দ আস-সুলামীর নিকট এসে বলি, হে ওয়ালীদের পিতা! আমি কুরবানীর পশুর খোঁজে বের হই, কিন্ত কোন পশুই পছন্দ হয়নি। একটি বকরী পছন্দ হয়েছিল, তার একটি দাঁত না থাকায়, সেটাও বাদ দিয়েছি। এখন এ বিষয়ে আপনি আমাকে পরামর্শ দিন। ‘উতবাহ বলেন, তুমি আমার কাছে সেটা নিয়ে আসোনি কেন? আমি বলি, সুবহানাল্লাহ! দাঁতপড়া পশু কুরবানী আপনার জন্য বৈধ, অথচ আমার জন্য বৈধ নয়! তিনি বললেন, হাঁ। তুমি সন্দিহান হয়েছো কিন্ত আমি সন্দিহান হইনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কানকাটা, শিংবিহীন, অন্ধ, দুর্বল এবং পা ভাঙ্গা পশু কুরবানী করতে নিষেধ করেছেন।

মুসফারা হচ্ছে ঐ পশু যার কানকাটার ছিদ্র স্পষ্ট দেখা যায়। মুস্তাসালা হলো ঐ পশু যার শিং গোড়া থেকে ভেঙ্গে গেছে। যাখকা হলো, যে পশুর দৃষ্টিশক্তি লোপ পেয়েছে। মুশায়্যি’আহ হলো, যে পশু দুর্বলতার কারণে মেষের সাথে সাথে চলতেও অক্ষম। কাসরা হলো ঐ পশু যার পা ভাঙ্গা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو حمید الرعیني مجہول (تق: 8064) ، (انوار الصحیفہ ص 101)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، أبو حميد الرعيني ويزيد ذو مِصر مجهولان. عيسى: هو ابن يونس السبيعي، وثور: هو ابن يزيد. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" ٨/ ٣٣٠، وأحمد (١٧٦٥٢)، والطبراني في "الكبير" ١٧/ (٣١٤)، والحاكم ٤/ ٢٢٥، والبيهقي ٩/ ٢٧٥، والمزي في ترجمة يزيد من "تهذيب الكمال" ٣٢/ ٢٩٢ - ٢٩٣ من طريق عيسى بن يونس، بهذا الإسناد. - وأخرجه الحاكم ١/ ٤٦٩ من طريق صدقة بن عبد الله، عن ثور، عن أبي حميد قال: كنا جلوساً إلى عتبة بن عبد، فأقبل يزيد ذو مصر … وإسناده ضعيف. ويشهد له حديث البراء السالف قبله. وحديث على بن أبي طالب الآتي بعده. قال الخطابي: إنما سميت الشاةُ التي استُؤصِلَت أُذنُها مُصَفَّرَة: لأن الأذن إذا زالت صَفِر مكانُها، أي: خلا، والمشيَّعة: هي التي لا تلحق الغنم لضعفها وهُزالها. فهي تشيعها من ورائها. وبَخق العين: فقؤها. و"الثرماء" قال في "اللسان": الثرَم، بالتحريك: انكسار السنِّ من أصلها، وقيل: هو انكسار سن من الأسنان المقدمة مثل الثنايا والرباعيات، وقيل: انكسار الثنية خاصة. وقال ابن الأثير في "النهاية": المشيعة: هي التى لا تزال تتبع الغنم عَجَفاً: أي: التى لا تلحقُها، فهي أبدا تشيِّعُها، أي: تمشي وراءها، هذا إن كسرت الياء، وإن فتحتها فلأنها تحتاج إلى من يشيِّعُها: أي: يسوقُها لتأخرها عن الغنم.









সুনান আবী দাউদ (2804)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، عَنْ شُرَيْحِ بْنِ النُّعْمَانِ، - وَكَانَ رَجُلَ صِدْقٍ - عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ أَمَرَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ نَسْتَشْرِفَ الْعَيْنَ وَالأُذُنَيْنِ وَلاَ نُضَحِّيَ بِعَوْرَاءَ وَلاَ مُقَابَلَةٍ وَلاَ مُدَابَرَةٍ وَلاَ خَرْقَاءَ وَلاَ شَرْقَاءَ ‏.‏ قَالَ زُهَيْرٌ فَقُلْتُ لأَبِي إِسْحَاقَ أَذَكَرَ عَضْبَاءَ قَالَ لاَ ‏.‏ قُلْتُ فَمَا الْمُقَابَلَةُ قَالَ يُقْطَعُ طَرَفُ الأُذُنِ ‏.‏ قُلْتُ فَمَا الْمُدَابَرَةُ قَالَ يُقْطَعُ مِنْ مُؤَخَّرِ الأُذُنِ ‏.‏ قُلْتُ فَمَا الشَّرْقَاءُ قَالَ تُشَقُّ الأُذُنُ ‏.‏ قُلْتُ فَمَا الْخَرْقَاءُ قَالَ تُخْرَقُ أُذُنُهَا لِلسِّمَةِ ‏.




‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ করেছেন আমরা যেন কুরবানীর প্রাণীর চোখ-কান ভালভাবে দেখে নেই। আমরা যেন এমন পশু কুরবানী না করি যা কানা যা অন্ধ, কানের অগ্র যা শেষভাগের অংশ কাটা; যার কানের পাশের দিক ফাঁড়া যা গোলাকার ছিদ্র রয়েছে।

যুহাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি আবূ ইসহাক্বকে বলি, তিনি কান কাটার কথা উল্লেখ করেছেন কিনা? তিনি বললেন, না। আমি তাকে জিজ্ঞেস বলি, মুকাবালাহ কি? তিনি বললেন, যার কানের একপাশে কাটা। আমি বলি, মুদাবারাহ কি? তিনি বল্লেন, যে পশুর কানের শেষের অংশ কাটা। আমি বলি, শারকা কি? তিনি বললেন, যার কান ছিদ্র করা হয়েছে। আমি বলি, খারকা কি? তিনি বললেন, যে পশুর কান সম্পূর্ণ কাটা।



দুর্বল : ভালভাবে দেখে নেয়ার আদেশ কথাটি বাদে। মিশকাত (১৪১৩), ইরওয়া (১১৪৯)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف إلا جملة الأمر بالاستشراف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1498) نسائی (4377 تا 4380) ابن ماجہ (3142) ، أبو إسحاق عنعن وصرح بالسماع من ابن أشوع عن شریح في روایۃ ضعیفۃ عند الحاکم (224/4) ، ولبعض الحدیث شاھد حسن عند الترمذي (1503) ، (انوار الصحیفہ ص 101)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإن أبا إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السبيعي - لم يسمع هذا الحديث من شريح بن النعمان، بينهما سعيد بن عمرو بن أشوع، كما جاء في رواية قيس بن الربيع عن أبي إسحاق عند أبي الشيخ في "الأضاحي" كما في "شرح الترمذي" للعراقي ٦/ ورقة ١٢، والحاكم ٤/ ٢٢٤ إذ قال قيس: قلت لأبي إسحاق: سمعته من شُريح؟ قال: حدثني ابن أشوع عنه. وقد أورد ذلك أيضاً الدارقطني في "العلل" ٣/ ٢٣٩، وذكر أن الجراح بن الضحاك قد رواه عن أبي إسحاق، عن سعيد ابن أشوع، عن شريح بن النعمان، عن علي مرفوعاً. قلنا: وسعيد بن عمرو بن أشوع ثقة، وقيس بن الربيع كان شعبة وسفيان يوثقانه، وتكلم فيه الأكثرون، ولكن الجراح ابن الضحاك صدوق حسن الحديث، فباجتماع روايتيهما يحسن الحديث، وذكر العراقى أن أبا الشيخ رواه في "الأضاحي" بسند جيد إلى زهير بن معاوية وأبي بكر بن عياش، وصرح فيه أبو إسحاق بسماعه لهذا الحديث من شريح بن النعمان، فالله تعالى أعلم. وقد رواه الثوري، عن ابن أشوع، عن شريح، عن علي موقوفاً. قال الدارقطني: ويشبه أن يكون القول قول الثوري. وأورده كذلك البخاري في "تاريخه الكبير" ٤/ ٢٣٠ من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن شريح بن النعمان، به مرفوعاً، وقال: لم يثبت رفعُه. ثم ساقه من طريق أبي نعيم ووكيع عن سفيان الثوري، عن سعيد بن أشوع، قال: سمعت شريح بن النعمان يقول: لا مقابلة ولا مدابرة ولا شرقاء. سليمة العين والأذن. وأخرجه ابن ماجه (٣١٤٢)، والترمذي (١٥٧٣) و (١٥٧٤)، والنسائي (٤٣٧٢ - ٤٣٧٥) من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، به. وهو في "مسند أحمد" (٦٠٩)، وصححه الترمذي، وانتقاه ابن الجارود (٩٠٦)، وصححه الحاكم ٤/ ٢٢٤ ووافقه الذهبي، وصححه كذلك الضياء في "المختارة" (٤٨٧) و (٤٨٨). وانظر ما بعده. قال ابن قدامة في "المغني" ١٣/ ٣٧٣: وهذا نهي تنزيه، ويحصل الإجزاء بها، لا نعلم فيه خلافاً. وقال الخطابي: "العضب" كسر القرن، وكبش أعضب، ونعجة عضباء. وقوله: نستشرف العين والأذن، معناه: الصحة والعِظَم، ويقال: أذن شراقية. قال أبو عبيد: قال الأصمعي: الشرقاء من الغنم المشقوقة الأذنين. والخرقاء: أن يكون في الأذن ثقب مستدير. والمقابلة: أن يقطع من مقدم أذنها شيء، ثم يترك معلقاً، كأنه زنمة. والمدابرة: أن يفعل ذلك بمؤخر الأذن من الشاة.









সুনান আবী দাউদ (2805)


حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ أَبِي عَبْدِ اللَّهِ الدَّسْتَوَائِيُّ، وَيُقَالُ، لَهُ هِشَامُ بْنُ سَنْبَرٍ عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ جُرَىِّ بْنِ كُلَيْبٍ، عَنْ عَلِيٍّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى أَنْ يُضَحَّى بِعَضْبَاءِ الأُذُنِ وَالْقَرْنِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ جُرَىٌّ سَدُوسِيٌّ بَصْرِيٌّ لَمْ يُحَدِّثْ عَنْهُ إِلاَّ قَتَادَةُ ‏.‏




‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কান কাটা এবং শিং ভাঙ্গা পশু দ্বারা কুরবানী করতে নিষেধ করেছেন। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, বর্ণনাকারী জুরাই সাদূস গোত্রীও এবং বাসরাহ নিবাসী। তার থেকে ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) ছাড়া কেউই হাদীস বর্ণনা করেননি।



দুর্বল : মিশকাত (১৪৬৪), যইফ সুনান ইবনু মাজাহ (৬৭৮/৩১৪৫), ইরওয়া (১১৪৯), যইফ সুনান আত-তিরমিযী (২৫৯/১৫৫৬)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (1464) ، أخرجہ النسائي (4382 وسندہ حسن) جري بن کلیب حسن الحدیث




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. جُريّ بن كُليب: هو السدوسى، صاحب قتادة، روى عنه قتادة وكان يثنى عليه خيراً، وقال الترمذي عن حديثه هذا: حسن صحيح، وصححه الحاكم ٤/ ٢٢٤ ووافقه الذهبي، وذكره العجلى وابن حبان في "الثقات"، وقال أبو حاتم: شيخ لا يحتج بحديثه. وأخرجه ابن ماجه (٣١٤٥)، والترمذي (١٥٨١) من طريق قتادة، به. وهو في "مسند أحمد" (٦٣٣) و (٧٩١). وأخرجه أحمد (٨٦٤) من طريق جابر الجعفي، عن عبد الله بن نُجيّ، عن علي. وإسناده ضعيف ومنقطع. ابن نجي لم يسمع من علي، وهو وجابر الجعفي ضعيفان. وانظر ما قبله وما بعده. وانظر تفسير العضباء عند الحديث السابق.









সুনান আবী দাউদ (2806)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، قَالَ قُلْتُ لِسَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ مَا الأَعْضَبُ قَالَ النِّصْفُ فَمَا فَوْقَهُ ‏.‏




ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যিব (র)-কে জিজ্ঞেস করি, আ’দাব কোন ধরনের পশু? তিনি বলেন, যে পশুর কান বা শিং অর্ধেক বা ততোধিক ভাঙ্গা বা কাটা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، رواہ النسائي (4382 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هشام: هو الدستوائي، ويحيى: هو ابنُ سعيد القطان، ومُسدَّد: هو ابن مُسرهَد. وأخرجه الترمذي (١٥٨١) ضمن حديث علي بن أبي طالب السالف قبله من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، به.









সুনান আবী দাউদ (2807)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كُنَّا نَتَمَتَّعُ فِي عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَذْبَحُ الْبَقَرَةَ عَنْ سَبْعَةٍ وَالْجَزُورَ عَنْ سَبْعَةٍ نَشْتَرِكُ فِيهَا ‏.




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুগে তামাত্তু হাজ্জ করতাম এবং সাতজন মিলে একটি গরু কুরবানী করতাম। অনুরূপভাবে একটি উটেও সাতজন শরীক হয়ে কুরবানী করেছি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1318)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح، وعبد الملك: هو ابن أبي سليمان، وهُشيم: هو ابن بشير. وأخرجه مسلم (١٣١٨) والنسائى في "الكبرى" (٤١٠٦) من طريق هشيم بن بَشير، والنسائي في "الكبرى" (٤١٠٦) و (٤٤٦٧) من طريق يحيى بن سعيد القطان، كلاهما عن عبد الملك بن أبي سليمان، به. وهو في "سند أحمد" (١٤٢٦٥) عن هشيم، و (١٤٤٢٢) عن يحيى بن سعيد القطان. وانظر تالييه.









সুনান আবী দাউদ (2808)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ قَيْسٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الْبَقَرَةُ عَنْ سَبْعَةٍ وَالْجَزُورُ عَنْ سَبْعَةٍ ‏"‏ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ (একটি) গরু সাতজনের পক্ষ হতে এবং (একটি) উট সাতজনের পক্ষ হতে (কুরবানী করা যাবে)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (1458)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح، وقيس: هو ابن سعد المكي، وحماد: هو ابن سلمة. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤١٠٧) من طريق عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، به. وانظر ما قبله، وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (2809)


حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ الْمَكِّيِّ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّهُ قَالَ نَحَرْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِالْحُدَيْبِيَةِ الْبَدَنَةَ عَنْ سَبْعَةٍ وَالْبَقَرَةَ عَنْ سَبْعَةٍ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে হুদায়বিয়াতে সাতজনের পক্ষ হতে একটি উট এবং সাতজনের পক্ষ হতে একটি গরু কুরবানী করেছি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1318)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الزبير المكي - وهو محمد بن مسلم بن تدرُس - قد صرح بسماعه عند مسلم وابن خزيمة (٢٩٠٠) وغيرهما، فانتفت شبهة تدليسه. مالك: هو ابن أنس الإمام، والقعنبي: هو عبد الله بن مَسلمة بن قَعنَب. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٤٨٦. وأخرجه مسلم (١٣١٨)، وابن ماجه (٣١٣٢)، والترمذي (٩٢٠) و (١٥٧٩)، والنسائي في "الكبرى" (٤١٠٨) من طرق عن أبي الزبيرِ المكي، عن جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤١١٦) و (١٤١٢٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٩١٩) و (٤٠٠٤). وانظر ما قبله، وما سلف برقم (٢٨٠٧).









সুনান আবী দাউদ (2810)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ، - يَعْنِي الإِسْكَنْدَرَانِيَّ - عَنْ عَمْرٍو، عَنِ الْمُطَّلِبِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ شَهِدْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الأَضْحَى بِالْمُصَلَّى فَلَمَّا قَضَى خُطْبَتَهُ نَزَلَ مِنْ مِنْبَرِهِ وَأُتِيَ بِكَبْشٍ فَذَبَحَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِيَدِهِ وَقَالَ ‏ "‏ بِسْمِ اللَّهِ وَاللَّهُ أَكْبَرُ هَذَا عَنِّي وَعَمَّنْ لَمْ يُضَحِّ مِنْ أُمَّتِي ‏"‏ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ঈদুল আযহার দিন আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে ঈদগাহে উপস্থিত ছিলাম। তিনি খুত্ববাহ শেষে মিম্বার থেকে নামলেন। একটি বকরী আনা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে যাবাহ করেন এবং বলেনঃ “আল্লাহর নামে শুরু করছি, আল্লাহ মহান। এই কুরবানী আমার ও আমার উম্মাতের যারা কুরবানী করতে অক্ষম তাদের পক্ষ হতে।”




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1521) ، المطلب بن عبداللّٰہ بن حنطب مدلس وصرح بالسماع عند الطحاوی(معانی الآثار 177/4178) في أصل الحدیث ولکنہ لم یصرح بالسماع في قولہ:’’نزل من منبرہ ‘‘ فھذا ضعیف ، ولأصل الحدیث شواھد عند الحاکم (229/4) وغیرہ دون قولہ:’’نزل من منبرہ‘‘ ، (انوار الصحیفہ ص 101)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن إن صح سماع المطلب - وهو ابن عبد الله ابن حنطب - من جابر، فقد نص غير واحد من أهل العلم أنه لم يسمع منه، لكن أبا حاتم قال مرة كما في "الجرح والتعديل": يشبه أن يكون أدرك جابراً، وقد جاء تصريحه بالسماع عند الطحاوي ٤/ ١٧٧ والحاكم ٤/ ٢٢٩، فالله تعالى أعلم. وقد روي من وجهين آخرين عن جابر كما سيأتي. يعقوب: هو ابن عبد الرحمن بن محمد القاريّ، وعمرو: هو ابن أبي عمرو مولى المطلب. وأخرجه الترمذي (١٥٩٩) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد، وقال: هذا حديث غريب من هذا الوجه، والمطلب بن عبد الله بن حنطب يقال: إنه لم يسمع من جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤٨٣٧). وأخرج عبد بن حميد (١١٤٦)، وأبو يعلى (١٧٩٢)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ١٧٧، والبيهقي ٩/ ٢٦٨ من طريق حماد بن سلمة، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن عبد الرحمن بن جابر، قال: حدثني أبي: أن رسول الله ﷺ أُتي بكبشين أملحين أقرنين، عظيمين، موجوءين، فأضجع أحدهما، وقال: "باسم الله، والله أكبر، عن محمد وأمته، من شهد لك بالتوحيد، وشهد لي بالبلاغ". وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد. وسلف برقم (٢٧٩٥) من طريق أبي عياش بن النعمان المعافري عن جابر بن عبد الله بنحو رواية عبد الرحمن بن جابر السالفة الذكر، وإسناده حسن. وفي الباب عن أبي سعيد الخدري عند أحمد (١١٠٥١)، والطحاوي ٤/ ١٧٨، والحاكم ٤/ ٢٢٨ وغيرهما. وعن عائشة عند مسلم (١٩٦٧)، وسلف عند المصنف برقم (٢٧٩٢). قال الخطابي: فيه دليل على أن الشاة الواحدة تجزئ عن الرجل وعن أهله وإن كثروا، وروي عن أبي هريرة وعن ابن عمر ﵃ أنهما كانا يفعلان ذلك، وأجازه مالك والأوزاعي والشافعي وأحمد وإسحاق، وكره ذلك أبو حنيفة والثوري رحمهما الله.









সুনান আবী দাউদ (2811)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، أَنَّ أَبَا أُسَامَةَ، حَدَّثَهُمْ عَنْ أُسَامَةَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَذْبَحُ أُضْحِيَتَهُ بِالْمُصَلَّى وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يَفْعَلُهُ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কুরবানীর পশু ঈদগাহে যাবাহ করতেন। ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ করতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح خ دون الموقوف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، أخرجہ ابن ماجہ (3161 وسندہ حسن) وأصلہ عند البخاري (982)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أسامة - وهو ابن زيد الليثي - فهو صدوق حسن الحديث، ولكنه متابع. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه ابن ماجه (٣١٦١) من طريق أسامة بن زيد، به. دون ذكر فعل ابن عمر. وأخرجه البخاري (٩٨٢) و (٥٥٥٢)، والنسائي (١٥٨٩) و (٤٣٦٦) من طريق كثير بن فرقد، و (٤٣٦٧) من طريق عبد الله بن سليمان، كلاهما عن نافع، به. دون ذكر ابن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٥٨٧٦). وأخرج الموقوف من فعل ابن عمر: البخاريُّ (١٧١٠) و (٥٥٥١) من طريق عُبيد الله ابن عمر و (١٧١١) من طريق موسى بن عقبة، كلاهما عن نافع، عن ابن عمر.









সুনান আবী দাউদ (2812)


حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ عَمْرَةَ بِنْتِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، قَالَتْ سَمِعْتُ عَائِشَةَ، تَقُولُ دَفَّ نَاسٌ مِنْ أَهْلِ الْبَادِيَةِ حَضْرَةَ الأَضْحَى فِي زَمَانِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ ادَّخِرُوا الثُّلُثَ وَتَصَدَّقُوا بِمَا بَقِيَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ فَلَمَّا كَانَ بَعْدَ ذَلِكَ قِيلَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَا رَسُولَ اللَّهِ لَقَدْ كَانَ النَّاسُ يَنْتَفِعُونَ مِنْ ضَحَايَاهُمْ وَيَجْمُلُونَ مِنْهَا الْوَدْكَ وَيَتَّخِذُونَ مِنْهَا الأَسْقِيَةَ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ وَمَا ذَاكَ ‏"‏ ‏.‏ أَوْ كَمَا قَالَ قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ نَهَيْتَ عَنْ إِمْسَاكِ لُحُومِ الضَّحَايَا بَعْدَ ثَلاَثٍ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنَّمَا نَهَيْتُكُمْ مِنْ أَجْلِ الدَّافَّةِ الَّتِي دَفَّتْ عَلَيْكُمْ فَكُلُوا وَتَصَدَّقُوا وَادَّخِرُوا ‏"‏ ‏.‏




‘আমরাহ বিনতু ‘আবদুর রহমান (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি : রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সময়ে জঙ্গলে বসবাসকারী কিছু লোক এসে ঈদুল আযহার জামা’আতে উপস্থিত হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা তিন দিনের খাওয়ার পরিমাণ গোশ্‌ত রেখে বাকী গোশ্‌ত সদাক্বাহ করে দাও। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, কিছুদিন পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলা হলো, হে আল্লাহর রাসূল! ইতিপূর্বে লোকেরা তো তাদের কুরবানী (গোশ্‌ত) দ্বারা (অনেকদিন) সুবিধা ভোগ করতো। তারা চর্বি জমা করে রাখতো এবং চামড়া দিয়ে পানির মশক বানাতো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ এরূপ বলার অর্থ কি? তারা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কুরবানীর গোশ্‌ত তিন দিনের অধিক জমা রাখতে নিষেধ করেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ সে সময় তোমাদের নিকট কিছু গরীব লোক এসেছিল বিধায় আমি তোমাদেরকে এরূপ নিষেধ করেছিলাম। কাজেই এখন তোমরা তা খাও, সদাক্বাহ করো এবং জমা করে রাখো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1971)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الله بن أبي بكر: هو ابن محمد بن عمرو بن حَزم، ومالك: هو ابن أنس، والقعنبي: هو عبد الله بن مسلمة بن قعنب. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٤٨٤، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٩٧١)، والنسائي (٤٤٣١). هو في "مسند أحمد" (٢٤٢٤٩)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٢٧). قال الخطابي: "دفَّ ناس" معناه: أقبلوا من البادية. والدف: سير سريع، يقارب فيه الخطو، يقال: دفَّ الرجلُ دفيفاً. وهم دافَّة، أي: جماعة يدفون. وإنما أراد قوماً أقحمتهم السَّنة، وأقدمتهم المجاعة. يقول: إنما حرّمت عليكم الادّخار فوق ثلاث لتواسوهم، وتتصدقوا عليهم، فأما وقد جاء الله بالسعة، فادخروا ما بدا لكم. وقوله: "يجملون الودك" معناه: يذيبونه. قال لبيد: واشتوى ليلة ريح واجتمل. ومن هذا قيل: فلان جميل الوجه، يريدون به الحسن والنضارة، كأنه دهين صقيل. قال في "النهاية": "الودك": دسم اللحم ودهنه الذي يستخرج منه.









সুনান আবী দাউদ (2813)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، حَدَّثَنَا خَالِدٌ الْحَذَّاءُ، عَنْ أَبِي الْمَلِيحِ، عَنْ نُبَيْشَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّا كُنَّا نَهَيْنَاكُمْ عَنْ لُحُومِهَا أَنْ تَأْكُلُوهَا فَوْقَ ثَلاَثٍ لِكَىْ تَسَعَكُمْ فَقَدْ جَاءَ اللَّهُ بِالسَّعَةِ فَكُلُوا وَادَّخِرُوا وَاتَّجِرُوا أَلاَ وَإِنَّ هَذِهِ الأَيَّامَ أَيَّامُ أَكْلٍ وَشُرْبٍ وَذِكْرِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ ‏"‏ ‏.‏




নুবাইশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আমরা তোমাদেরকে তিন দিনের অধিক কুরবানীর গোশ্‌ত খেতে নিষেধ করেছিলাম, যাতে গোশ্‌ত তোমাদের সকলের নিকট পৌঁছে যায়। আল্লাহ এখন তোমাদের দারিদ্র মোচন করেছেন। কাজেই এখন তোমরা তা খাও, জমা করে রাখো এবং সদাক্বাহ করে নেকী অর্জন করো। জেনে রেখো, এ দিনগুলো পানাহারের দিন এবং মহান আল্লাহকে স্মরণ করার দিন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2645) ، أصلہ عند مسلم (1141)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو المليح: هو ابن أسامة بن عُمير الهُذَلي، وخالد الحذاء: هو ابن مِهران، ومُسدد: هو ابن مُسَرهَد. وأخرجه ابن ماجه (٣١٦٠)، والنسائي (٤٢٣٠) من طريق خالد الحذاء، به. ورواية ابن ماجه مختصرة، وعند النسائي قال خالد الحذاء: عن أبي قلابة، عن أبي المليح، وأحسبني قد سمعته من أبي المليح. فيكون بذلك قد سمعه خالد على الوجهين كليهما. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٧٢٣). وأخرج القطعة الأخيرة من الحديث وهي أن هذه الأيام أيامُ أكل وشرب وذكر الله تعالى: مسلم (١١٤١) من طريق خالد الحذاء، عن أبي المليح، و (١١٤١) من طريق خالد، عن أبي قلابة، عن أبي المليح. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٧٢٢). قال الخطابي: وقوله: "واتجروا" أصله: ايتجروا على وزن افتعِلو، يريد الصدقة التي يبتغي أجرها وثوابها، ثم قيل: اتجروا، كلما قيل: اتخذت الشيء. وأصله: ايتخذته. وهو من الأخذ، فهو من الأجر. وليس من باب التجارة. لأن البيع في الضحايا فاسد. إنما تؤكل ويتصدق منها. وقوله: "هذه الأيام أيام أكل وشرب" فيه دليل على أن صوم أيام التشريق غير جائز. لأنه قد وسمَها بالأكل والشرب، كما وسم يوم العيد بالفطر، ثم لم يجز صيامه. فكذلك أيام التشريق، وسواء كان ذلك تطوعاً من الصائم أو نذراً، أو صامها الحاج عن التمتع.









সুনান আবী দাউদ (2814)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ خَالِدٍ الْخَيَّاطُ، قَالَ حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ صَالِحٍ، عَنْ أَبِي الزَّاهِرِيَّةِ، عَنْ جُبَيْرِ بْنِ نُفَيْرٍ، عَنْ ثَوْبَانَ، قَالَ ضَحَّى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ قَالَ ‏ "‏ يَا ثَوْبَانُ أَصْلِحْ لَنَا لَحْمَ هَذِهِ الشَّاةِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَمَا زِلْتُ أُطْعِمُهُ مِنْهَا حَتَّى قَدِمْنَا الْمَدِينَةَ ‏.‏




শাদ্দাদ ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট দুটি বৈশিষ্ট সম্পর্কে শুনেছি। এক. মহান আল্লাহ প্রতিটি জিনিসের প্রতি অনুগ্রহ প্রদর্শন বাধ্যতামূলক করেছেন। সুতরাং তোমরা হত্যা করার সময় সঠিক পন্থায় (দ্রুত) হত্যা করবে। দুই. তোমরা যখন যাবাহ করবে, দয়া সহকারে উত্তমরূপে যাবাহ করবে। তোমাদের প্রত্যেকে যেন তার ছুরি উত্তমরূপে ধার দেয় এবং যাবাহকৃত পশুকে আরাম দেয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1955)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الزاهرية: هو حُدير بن كُريب الحضرمي. وأخرجه مسلم (١٩٧٥)، والنسائى في "الكبرى" (٤١٤٢) من طريق معاوية بن صالح، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٩٧٥) من طريق عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٣٩١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٣٢). تنبيه: هذا الحديث جاء في (أ) و (ب) و (ج) بعد الحديث الآتي برقم (٢٨١٦). ونحن تركناه على الترتيب الذي في (هـ) إبقاء على الترقيم المتسلسل.









সুনান আবী দাউদ (2815)


حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ خَالِدٍ الْحَذَّاءِ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَبِي الأَشْعَثِ، عَنْ شَدَّادِ بْنِ أَوْسٍ، قَالَ خَصْلَتَانِ سَمِعْتُهُمَا مِنْ، رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنَّ اللَّهَ كَتَبَ الإِحْسَانَ عَلَى كُلِّ شَىْءٍ فَإِذَا قَتَلْتُمْ فَأَحْسِنُوا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ غَيْرُ مُسْلِمٍ يَقُولُ ‏"‏ فَأَحْسِنُوا الْقِتْلَةَ وَإِذَا ذَبَحْتُمْ فَأَحْسِنُوا الذَّبْحَ وَلْيُحِدَّ أَحَدُكُمْ شَفْرَتَهُ وَلْيُرِحْ ذَبِيحَتَهُ ‏"‏ ‏.‏




হিশাম ইবনু যায়িদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি আনাসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে আল-হাকাম ইবনু আইয়ুবের নিকট যাই। সেখানে গিয়ে দেখা গেলো, কতিপয় যুবক একটি মুরগীকে লক্ষ্যবস্তু নির্ধারণ করে তীর ছুঁড়ছে। তখন আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীব-জন্ত্তকে চাঁদমারীর লক্ষ্যবস্তু বানাতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5513) صحیح مسلم (1956)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الأشعث: هو شَراحيل بن آده الصنعاني، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرمي، وخالد الحذاء: هو ابن مِهران، وشعبة: هو ابن الحجاج. وأخر جه مسلم (١٩٥٥)، وابن ماجه (٣١٧٠)، والترمذي (١٤٦٧)، والنسائي (٤٤٠٥) و (٤٤١٢) و (٤٤١٣) و (٤٤١٤) من طريق أبي قلابة الجَرمي، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧١١٣)، و"صحيح ابن حبان" (٥٨٨٣). وأخرجه النسائي (٤٤١١) من طريق خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء الرحبي، عن أبي الأشعث، عن شداد بن أوس. فزاد في الإسناد أبا أسماء الرحبي. قال أبو عوانة وقد أخرج الحديث (٧٧٤٤): وهو خطأ.









সুনান আবী দাউদ (2816)


حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ هِشَامِ بْنِ زَيْدٍ، قَالَ دَخَلْتُ مَعَ أَنَسٍ عَلَى الْحَكَمِ بْنِ أَيُّوبَ فَرَأَى فِتْيَانًا أَوْ غِلْمَانًا قَدْ نَصَبُوا دَجَاجَةً يَرْمُونَهَا فَقَالَ أَنَسٌ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ تُصْبَرَ الْبَهَائِمُ ‏.‏




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফরে কুরবানী করেন এবং বলেনঃ হে সাওবান! আমাদের জন্য বকরীর গোশতগুলো তৈরি করো। সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, মদিনায় পৌঁছা পর্যন্ত তাকে এ গোশত খাওয়াতে থাকি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1975)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هشام بن زيد: هو ابن أنس بن مالك، وشعبة: هو ابن الحجاج، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه البخاري (٥٥١٣)، ومسلم (١٩٥٦)، وابن ماجه (٣١٨٦)، والنسائي (٤٤٣٩) من طريق شعبة بن الحجاج، به. وهو في "مسند أحمد" (١٢١٦١). وقوله: أن تُصبَر، بصيغة المجهول، أي: تحبس لتُرمى حتى تموت. وقال الخطابي: أصل الصبر: الحبس. ومنه قيل: قتل فلان صبراً، أي: قهراً، أو حبساً على الموت. وإنما نهي عن ذلك لما فيه من تعذيبها، وأمر بإزهاق نفسها بأوحى الذكاة وأخفّها.









সুনান আবী দাউদ (2817)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ ثَابِتٍ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنِي عَلِيُّ بْنُ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ يَزِيدَ النَّحْوِيِّ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ ‏{‏ فَكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ ‏}‏ ‏{‏ وَلاَ تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ ‏}‏ فَنُسِخَ وَاسْتَثْنَى مِنْ ذَلِكَ فَقَالَ ‏{‏ وَطَعَامُ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ حِلٌّ لَكُمْ وَطَعَامُكُمْ حِلٌّ لَهُمْ ‏}‏ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, (আল্লাহর বাণী) : “যে পশুর উপর আল্লাহর নাম উচ্চারণ করা হয় তোমরা তার গোশত খাও” (সূরাহ আল-আন’আম : ১১৮) “যে পশুর উপর আল্লাহর নাম উচ্চারণ করা হয়নি, তার গোশত খেয়ো না” (সূরাহ আল-আন’আম : ১২১)। এর হুকুম রহিত হয়ে গেছে। এটি আহলে কিতাবের যাবাহ করা পশুর ব্যাপারে প্রযোজ্য নয়। (আল্লাহর বাণী) : “আহলে কিতাবের খাদ্য তোমাদের জন্য হালাল এবং তোমাদের খাদ্য তাদের জন্য হালাল” (সূরাহ আল-মায়িদাহ : ৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل علي بن الحسين - وهو ابن واقد المروزي - فهو صدوق حسن الحديث. وأخرج الطبري في "تفسيره" ٨/ ٢١ عن محمد بن حميد الرازي، عن يحيى بن واضح، عن الحسين بن واقد، عن يزيد النحوي، عن عكرمة والحسن قولهما. ومحمد بن حميد متروك. وإلى القول بالنسخ ذهب أيضاً مكحول فيما أسنده عنه ابن أبي حاتم كما في "تفسير ابن كثير"عند آية الأنعام. وقد ذهب الطبري إلى القول بإحكام آيتى الأنعام، فقال: الصواب من القول في ذلك عندنا أن هذه الآية محكمة فيما أنزلت لم ينسخ منها شيء، وأن طعام أهل الكتاب حلال، وذبائحهم ذكية، وذلك مما حرم الله على المؤمنين أكله بقوله: ﴿وَلَا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ﴾ [الأنعام: ١٢١] بمعزل، لأن الله إنما حرم علينا بهذه الآية الميتة، وما أُهل به للطواغيت، وذبائح أهل الكتاب ذكية سموا عليها أو لم يسمُّوا، لأنهم أهل توحيد وأصحاب كتب لله يدينون بأحكامها، يذبحون الذبائح بأديانهم، كما ذبح المسلم بدينه، سمى الله على ذبيحته أو لم يُسمه، إلا أن يكون ترك من ذكر تسمية الله على ذبيحته على الدينونة بالتعطيل، أو بعبادة شيء سوى الله، فيحرم حينئذ أكل ذبيحته سمى الله عليها أو لم يُسمِّ. ونسبَ القولَ بإحكامها إلى عامة أهل العلم. وإلى القول بإحكامها أيضاً ذهب ابنُ الجوزي في "نواسخ القرآن" ص٣٣٠، ومكي بن أبي طالب في "الإيضاح" ص ٢٦٢ ..









সুনান আবী দাউদ (2818)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا سِمَاكٌ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، فِي قَوْلِهِ ‏{‏ وَإِنَّ الشَّيَاطِينَ لَيُوحُونَ إِلَى أَوْلِيَائِهِمْ ‏}‏ يَقُولُونَ مَا ذَبَحَ اللَّهُ فَلاَ تَأْكُلُوا وَمَا ذَبَحْتُمْ أَنْتُمْ فَكُلُوا فَأَنْزَلَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ ‏{‏ وَلاَ تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ ‏}‏ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মহান আল্লাহর বাণী, “শয়তানরা তাদের সঙ্গীদের মনে বিভিন্ন প্রশ্নের উদ্ভব করে”-এ আয়াত অবতীর্ণ হওয়ার কারণ সম্পর্কে বর্ণিত আছে, শয়তানের সহযোগীরা বলতো, আল্লাহর যাবাহ করা (মরা জন্ত্ত) তোমরা খাও না, অথচ তোমরা নিজেরা যা যাবাহ করছো তা খাও? অতঃপর আল্লাহ আয়াত অবতীর্ণ করেন, “যে পশুর উপর আল্লাহর নাম উচ্চারণ করা হয়নি, তার গোশত খেয়ো না” ... শেষ পর্যন্ত (সূরা আল-আন’আম : ১২১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (3173) ، سماک عن عکرمۃ سلسلۃ ضعیفۃ ، وللحدیث شاھد ضعیف فی المعجم الکبیر للطبراني (11614) ، (انوار الصحیفہ ص 101، 102)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. سماك - وهو ابن حرب، وإن كان في روايته عن عكرمة اضطراب - متابع. إسرائيل: هو ابن يُونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، ومحمد بن كثير: هو العبْدي وقد صحح إسناد حديث سماك الحاكم ٤/ ١١٣ و٢٣١، ووافقه الذهبي، وصححه كذلك ابن كثير في "تفسيره" ٣/ ٣٢١، وابن حجر في "الفتح" ٩/ ٦٢٤. وأخرجه ابن ماجه (٣١٧٣)، والطبري في "تفسيره" ٨/ ١٦ و ١٧ و ١٨، وابن أبي حاتم في "تفسيره" كما في "تفسير ابن كثير" ٣/ ٣٢١، والحاكم ٤/ ١١٣ و٢٣١، والبيهقى ٩/ ٢٤١ من طريق سماك بن حرب، به. وأخرجه بنحوه النسائي في "الكبرى" (٤٥١١) و (١١١٠٦)، والطبري ٨/ ١٧، والحاكم ٤/ ٢٣٣، وابن عبد البر في "التمهيد" ٢٢/ ٣٠١ من طريق عنترَة بن عبد الرحمن الكوفي، والطبري ٨/ ١٦، والطبراني (١١٦١٤) من طريق الحكم بن أبان، عن عكرمة، والطبري ٨/ ١٧ من طريق عطية العوفي، و ٨/ ١٧ من طريق علي بن أبي طلحة، كلهم عن ابن عباس. وسيأتي بعده عند المصنف من طريق سعيد بن جبير، عن ابن عباس.









সুনান আবী দাউদ (2819)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عِمْرَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ السَّائِبِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ جَاءَتِ الْيَهُودُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالُوا نَأْكُلُ مِمَّا قَتَلْنَا وَلاَ نَأْكُلُ مِمَّا قَتَلَ اللَّهُ فَأَنْزَلَ اللَّهُ ‏{‏ وَلاَ تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ ‏}‏ إِلَى آخِرِ الآيَةِ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট ইয়াহুদীরা এসে বললো, আমরা নিজেরা যা পশু হত্যা করি তা খেয়ে থাকি আর আল্লাহ যা হত্যা করেন তা খাই না। এ প্রেক্ষিতে মহান আল্লাহ অবতীর্ণ করেন, “যে পশুর উপর আল্লাহর নাম উচ্চারণ করা হয়নি, তার গোশত খেয়ো না” ... আয়াতের শেষ পর্যন্ত (সূরা আল-আন’আম : ১২১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لكن ذكر اليهود فيه منكر والمحفوظ أنهم المشركون




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عطاء بن السائب: صدوق اختلط (تق: 4592) ولم یثبت تحدیثہ بہ قبل اختلاطہ ورواہ الترمذي (3069) بلفظ: ’’ أتی ناس النبي ﷺ ‘‘ وسندہ ضعیف کسند أبي داود ، و’’ ناس ‘‘ھم المشرکون کما في روایۃ النسائي (7 /237 ح 4442) وسندہ حسن ، (انوار الصحیفہ ص 102)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل عمران بن عيينة - وهو أخو سفيان - فهو ضعيف يعتبر به في المتابعات، وقد توبع، إلا أنه أخطأ في ذكر اليهود في الرواية، لأن المحفوظ هو المشركون لا اليهود، كما نبه عليه ابن كثير في "تفسيره" عند تفسير هذه الآية المذكورة. وأخرجه البزار في "مسنده" كما في "تفسير ابن كثير" ٣/ ٣٢٠، والطبري ٨/ ١٨ - ١٩، والطبراني (١٢٢٩٥)، والبيهقي ٩/ ٢٤٠، وابن عبد البر في "التمهيد" ٢٢/ ٣٠٠ - ٣٠١، والضياء المقدسي في "المختارة" ١٠/ (٢٧١) من طريق عمران بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (٣٣٢٣) من طريق زياد بن عبد الله البكائي، والطبري ٨/ ١٨ من طريق جرير بن عبد الحميد، والضياء١٠/ (٢٧٠) من طريق أبي كدينة يحيى بن المهلب، ثلاثتهم عن عطاء بن السائب، به. وقال الترمذي: حديث حسن غريب، وقد روي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن ابن عباس أيضاً. وانظر ما قبله. قال الخطابي: في هذا دلالة على أن معنى ذكر اسم الله على الذبيحة في هذه الآية ليس باللسان، وإنما معناه: تحريم ما ليس بالمذكَّى من الحيوان، فإذا كان الذابح ممن يعتقد الاسم، وإن لم يذكره بلسانه، فقد سمى، وإلى هذا ذهب ابن عباس في تأويل الآية.









সুনান আবী দাউদ (2820)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ مَسْعَدَةَ، عَنْ عَوْفٍ، عَنْ أَبِي رَيْحَانَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ أَكْلِ مُعَاقَرَةِ الأَعْرَابِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ اسْمُ أَبِي رَيْحَانَةَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَطَرٍ وَغُنْدَرٌ أَوْقَفَهُ عَلَى ابْنِ عَبَّاسٍ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐসব যাবাহকৃত পশুর গোশত খেতে নিষেধ করেছেন যেগুলো আরবের লোকেরা নিজেদের অহঙ্কার প্রকাশার্থে যাবাহ করে। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অধস্তন বর্ণনাকারী গুনদার এটি ইবনু ‘আব্বাসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উক্তি হিসাবে বর্ণনা করেছেন। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবূ রাইহানার নাম ‘আবদুল্লাহ ইবনু মাত্বার।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو ریحانۃ صدوق تغیر بآخرۃ (تق: 3623) یعني أنہ اختلط ، (انوار الصحیفہ ص 102)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل أبي ريحانة عبد الله بن مطر، فهو صدوق حسن الحديث، ومع أنه تغير بأخرة، قال ابن عدي: لا أعرف له حديثاً منكراً فأذكره، فالظاهر أنه لم يحدث بعدما تغير بشيء. وأخرج أبو بكر بن أبى شيبة في "تفسيره" كما في "اقتضاء الصراط المستقيم" لشيخ الإسلام ابن تيمية ص ٢٦٠ عن وكيع، عن أصحابه، عن عوف الأعرابي، عن أبي ريحانة، قال: سئل ابن عباس عن معاقرة الأعراب فقال: إني أخاف أن تكون مما أهل لغير الله به. هكذا جعله موقوفاً. وفي الباب عن علي بن طالب موقوفاً عند أبى إسحاق إبراهيم بن عبد الرحمن دُحيم في "تفسيره" كما في "اقتضاء الصراط المستقيم" ص٢٦٠ قال: حدَّثنا أبي، حدَّثنا سعيد بن منصور، عن ربعي [بن عبد الله بن الجارود]، عن عبدالله بن الجارود، قال: سمعت الجارود هو ابن أبي سبْرة، قال: كان من بني رباح رجل يقال له: ابن وثيل شاعراً، نافر أبا الفرزدق غالباً الشاعر، بماء بظهر الكونة، على أن يعقر هذا مئة من إبله، وهذا مئة من إبله، إذا وردت الماء، فلما وردت الإبل الماء قاما إليها بأسيافهما، فجعلا ينسفان عراقيبها. فخرج الناس على الحمر والبغال، يريدون اللحم. وعليٌّ ﵁ بالكوفة، فخرج على بغلة رسول الله ﷺ البيضاء، وهو ينادي: يا أيها الناس لا تأكلوا من لحومها، فإنها أُهل بها لغير الله. قال الخطابي في تفسير معاقرة الأعراب: هو أن يتبارى الرجلان كل واحد يجاود صاحبه، فيعقر هذا عددا من إبله، فأيهما كان أكثر عقراً غلب صاحبه ونفره. كره أكل لحومها لئلا تكون مما أُهِلَّ به لغير الله.