হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (2861)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ خَالِدٍ الْخَيَّاطُ، عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ صَالِحٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ جُبَيْرِ بْنِ نُفَيْرٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي ثَعْلَبَةَ الْخُشَنِيِّ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِذَا رَمَيْتَ الصَّيْدَ فَأَدْرَكْتَهُ بَعْدَ ثَلاَثِ لَيَالٍ وَسَهْمُكَ فِيهِ فَكُلْهُ مَا لَمْ يُنْتِنْ ‏"‏ ‏.‏




আবূ সা‘লাবাহ আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তুমি শিকারের প্রতি তীর নিক্ষেপের তিনদিন পর তা পেলে এবং তাতে তোমার তীর আটকে থাকলে তা খেতে পারবে, যদি তাতে দুর্গন্ধ না থাকে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1931)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد أعله ابن حزم في "المحلى" ٧/ ٤٦٣ بمعاوية بن صالح، وليس ذلك بعلة، لأن معاوية بن صالح -وهو ابن حُدير الحضرمي- وثقه الأئمة، ولم يتكلم فيه غير يحيى القطان، ثم إنه متابع. وأخرجه مسلم (١٩٣١)، والنسائي (٤٣٠٣) من طريق معاوية بن صالح، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٩٣١) من طريق أبي الزاهرية، عن جبير بن نفير، به. وأخرجه أيضاً (١٩٣١) من طريق مكحول، عن أبي ثعلبة. قال الحافظ رشيد الدين العطار في "غرر الفوائد" ص ٢٣٣: وفي سماع مكحول من أبي ثعلبة نظر، إلا أن مسلماً ﵀ أورد حديث أبي ثعلبة هذا من طرق ثابتة الاتصال، وهو قوله ﷺ: "إذا رميت بسهمك فغاب عنك فأدركته فكل ما لم ينتن" انفرد به مسلم دون البخاري، والله الموفق. وهو في "مسند أحمد" (١٧٧٤٤). وانظر كلام الخطابي على فقه الحديث عند الحديث رقم (٢٨٥٧). تنبيه: هذا الحديث جاء في (أ) و (ب) و (ج) عقب الحديث (٢٨٤٥) في باب اتخاذ الكلب للصيد وغيره، وجاء في (هـ) عقب الحديث (٢٨٥٧)، وقد أشار الحافظ في نسخته التي رمزنا لها بالرمز (أ) أن هذا الحديث ليس في رواية ابن داسة مع أن (هـ) عندنا برواية ابن داسة والحديث ثابت فيها غير أنه جاء متأخراً عما هو في رواية اللؤلؤي! وقد تركناه على الترتيب الذي جاء في نسخة العظيم آبادي والسهارنفوري.









সুনান আবী দাউদ (2862)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدُ بْنُ مُسَرْهَدٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنِي نَافِعٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، - يَعْنِي ابْنَ عُمَرَ - عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَا حَقُّ امْرِئٍ مُسْلِمٍ لَهُ شَىْءٌ يُوصِي فِيهِ يَبِيتُ لَيْلَتَيْنِ إِلاَّ وَوَصِيَّتُهُ مَكْتُوبَةٌ عِنْدَهُ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কোন মুসলিমের কাছে ওসিয়াত করার মত সম্পদ থাকলে, তার নিজের কাছে ওসিয়াতনামা না লিখে রেখে দুই রাতও অতিবাহিত করার অধিকার তার নেই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2738) صحیح مسلم (1627)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٢٧٣٨)، ومسلم (١٦٢٧)، وابن ماجه (٢٦٩٩) و (٢٧٠٢)، والترمذي (٩٩٦) و (٢٢٥١)، والنسائي (٣٦١٥) و (٣٦١٦) من طرق عن نافع، به. وأخرجه مسلم (١٦٢٧)، والنسائي (٣٦١٨) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، إلا أنه قال: "ثلاث ليالٍ" بدل: "ليلتين". وهو في "مسند أحمد" (٤٤٦٩) من طريق سالم، و (٤٥٧٨) من طريق نافع. وأخرجه النسائي (٣٦١٧) من طريق عبد الله بن عون، عن نافع، عن ابن عمر من قوله. قال الخطابي: قوله: "ما حق امرىء مسلم" معناه: ما حقه من جهة الحزم والاحتياط إلا أن تكون وصيته مكتوبة عنده، إذا كان له شيء يريد أن يوصي فيه، فإنه لا يدري متى توافيه منيته، فتحول بينه وبين ما يريد من ذلك. وفيه دليل على أن الوصية غير واجبة، وهو قول عامة الفقهاء، وقد ذهب بعض التابعين إلى إيجابها، وهو قول داود. وفيه أن الوصية إنما تستحب لمن له فضل مالٍ يريد أن يوصي فيه، دون ما ليس له فضل مال، وهذا في الوصية التي هو متبرع بها من نحو صدقة وبِرٍّ وصلة، دون الديون والمظالم التي يلزمه الخروج عنها، فإن من عليه دين أو قِبَله تبعة لأحد من الناس فالواجب عليه أن يُوصي فيه، وأن يتقدم إلى أوليائه فيه، لأن أداء الأمانة فرض واجب عليه.









সুনান আবী দাউদ (2863)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ مَسْرُوقٍ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ مَا تَرَكَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم دِينَارًا وَلاَ دِرْهَمًا وَلاَ بَعِيرًا وَلاَ شَاةً وَلاَ أَوْصَى بِشَىْءٍ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ইন্তেকালের সময় কোন দীনার, দিরহাম, উট এবং বকরী কিছু্ই রেখে যাননি এবং তিনি কোন ওসিয়াতও করেননি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1635)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مَسروق: هو ابن الأجدع، وأبو وائل: هو شقيق بن سلمة، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، ومُسدَّد: هو ابن مُسرهَد. وأخرجه مسلم (١٦٣٥)، وابن ماجه (٢٦٩٥)، والنسائي (٣٦٢١) و (٣٦٢٢) من طريق الأعمش، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٣٦٢٣) من طريق حسن بن عياش، عن الأعمش، عن إبراهيم النخعي، عن الأسود النخعي، عن عائشة. وقال النسائي في "الكبرى" بإثر الحديث (٦٤١٩): حديث ابن عياش لا نعلم أن أحداً تابعه على قوله: عن إبراهيم، عن الأسود. وهو في "مسند أحمد" (٢٤١٧٦)، و"صحيح ابن حبان" (٦٦٠٦). قال الخطابي: قولها: "ولا أوصي بشئ" تريد وصية المال خاصة. لأن الإنسان إنما يوصي في مال سبيلُه أن يكون موروثاً، وهو ﷺ لم يترك شيئاً يُورَث، فيوصيَ فيه، وقد أوصى بأمور: منها: ما روي أنه كان عامة وصيته عند الموت؛ "الصلاة، وما ملكت أيمانكم". وقال ابن عباس ﵁: أوصى رسول الله ﷺ عند موته: "أخرجوا اليهود من جزيرة العرب، وأجيزوا الوفد بنحو ما كنتُ أجيزهم".









সুনান আবী দাউদ (2864)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَابْنُ أَبِي خَلَفٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَامِرِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ مَرِضَ مَرَضًا - قَالَ ابْنُ أَبِي خَلَفٍ - بِمَكَّةَ - ثُمَّ اتَّفَقَا - أَشْفَى فِيهِ فَعَادَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ لِي مَالاً كَثِيرًا وَلَيْسَ يَرِثُنِي إِلاَّ ابْنَتِي أَفَأَتَصَدَّقُ بِالثُّلُثَيْنِ قَالَ ‏"‏ لاَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَبِالشَّطْرِ قَالَ ‏"‏ لاَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَبِالثُّلُثِ قَالَ ‏"‏ الثُّلُثُ وَالثُّلُثُ كَثِيرٌ إِنَّكَ أَنْ تَتْرُكَ وَرَثَتَكَ أَغْنِيَاءَ خَيْرٌ مِنْ أَنْ تَدَعَهُمْ عَالَةً يَتَكَفَّفُونَ النَّاسَ وَإِنَّكَ لَنْ تُنْفِقَ نَفَقَةً إِلاَّ أُجِرْتَ بِهَا حَتَّى اللُّقْمَةَ تَرْفَعُهَا إِلَى فِي امْرَأَتِكَ ‏"‏ ‏.‏ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَتَخَلَّفُ عَنْ هِجْرَتِي قَالَ ‏"‏ إِنَّكَ إِنْ تُخَلَّفْ بَعْدِي فَتَعْمَلْ عَمَلاً صَالِحًا تُرِيدُ بِهِ وَجْهَ اللَّهِ لاَ تَزْدَادُ بِهِ إِلاَّ رِفْعَةً وَدَرَجَةً لَعَلَّكَ أَنْ تُخَلَّفَ حَتَّى يَنْتَفِعَ بِكَ أَقْوَامٌ وَيُضَرَّ بِكَ آخَرُونَ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ اللَّهُمَّ أَمْضِ لأَصْحَابِي هِجْرَتَهُمْ وَلاَ تَرُدَّهُمْ عَلَى أَعْقَابِهِمْ لَكِنِ الْبَائِسُ سَعْدُ ابْنُ خَوْلَةَ يَرْثِي لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ مَاتَ بِمَكَّةَ ‏"‏ ‏.




আমির ইবনু সা‘দ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার পিতা (সা‘দ) একবার কঠিন রোগে আক্রান্ত হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে আসলেন। তিনি বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমার প্রচুর সম্পদ আছে। একটি কন্যা সন্তান ছাড়া আমার কোন ওয়ারিস নাই। কাজেই দুই-তৃতীয়াংশ সম্পদ সদাক্বাহ করবো কি? তিনি বললেনঃনা। তিনি আবার জিজ্ঞেস করেন, অর্ধেক সম্পদ? তিনি বললেনঃ না। তিনি আবার জিজ্ঞেস করেন, এক-তৃতীয়াংশ? তিনি বললেন, হাঁ, তিন ভাগের এক ভাগ ওসিয়াত করতে পারো। তবে এটাও বেশি হয়ে যাচ্ছে। তোমার ওয়ারিসরা অন্যের নিকট ভিক্ষা চাইবে-তাদেরকে এমন দুঃস্থ অবস্থায় রেখে যাওয়ার চাইতে সচ্ছল অবস্থায় রেখে যাওয়া অনেক উত্তম। তুমি তাদের জন্য যা খরচ করবে, তোমাকে তার প্রতিদান দেয়া হবে। এমনকি তুমি তোমার স্ত্রীর মুখে যে খাবারের লোকমা তুলে দাও তারও প্রতিদান পাবে। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি আমার হিজরাতের নেকী থেকে পরিত্যক্ত হবো? তিনি বললেনঃ আমার হিজরাতের পর তুমি যদি (মাক্কাহ্তে) থেকে যাও এবং আমার অনুপস্থিতিতেও আল্লাহর সন্তুষ্টি অর্জনের জন্য নেক আমল অব্যাহত রাখো তাহলে তোমার মর্যাদা বৃ্দ্ধি পাবে। আশা করি তুমি বেঁচে থাকবে এবং একদল তোমার দ্বারা উপকৃত হবে, আর অন্যদল তোমার দ্বারা ক্ষতিগ্রস্থ হবে। অতঃপর তিনি এ দু‘আ করলেনঃ ‘ হে আল্লাহ! আমার সাহাবীদের হিজরাত পরিপূর্ণ করুন; তাদেরকে হিজরাতের পূর্বাবস্থায় ফিরিয়ে দিবেন না।” কিন্তু নিঃস্ব সাঈদ ইবনু খাওলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাক্কাহ্য় মারা যান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে স্মরণ করে অনুশোচনা করতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6373) صحیح مسلم (1628)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عامر بن سعد: هو ابن أبي وقاص، وسفيان: هو ابن عُيينة. وأخرجه مطولاً ومختصراً البخاري (٥٦) و (١٢٩٥) و (٣٩٣٦) و (٤٤٠٩) و (٥٦٦٨) و (٦٣٧٣) و (٦٧٣٣) ، ومسلم (١٦٢٨)، وابن ماجه (٢٧٠٨)، والترمذي (٢٢٤٩)، والنسائي (٣٦٢٦) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه كذلك مطولاً ومختصراً البخاري (٢٧٤٢) و (٢٧٤٤) و (٥٣٥٤)، ومسلم (١٦٢٨)، والنسائي (٣٦٢٧) و (٣٦٣٠) من طرق عن عامر بن سعد، به. وأخرجه أيضاً البخاري (٥٦٥٩)، ومسلم (١٦٢٨)، والترمذي (٩٩٧)، والنسائي (٣٦٢٩) و (٣٦٣١) و (٣٦٣٢) و (٣٦٣٥) من طرق عن سعد بن أبي وقاص. وهو في "مسند أحمد" (١٤٤٠)، و"صحيح ابن حبان" (٤٢٤٩). قال الخطابي: قوله: "وليس يرثني إلا ابنتي" يريد: أنه ليس يرثني ذو سهْم إلا ابنة، دون من يرثه بالتعصيب. لأن سعداً رجل من قريش من زهرة، وفي عصبته كثرة. وفي ذلك دليل على أن لمن مات وقد خلّف من الورثة ما يستوعب جميع ماله أن يوصي بالثلث. وفي قوله: "الثلث كثير" دليل على أنه لا يجوز مجاوزته، ولا أن يوصَى بأكثر من الثلث، سواء كان له ورثة أو لم يكن. وقد زعم قوم أنه إذا لم يكن له ورثة وضع جميع ماله حيث شاء، وإليه ذهب إسحاق بن راهويه، وروى ذلك عن ابن مسعود رضى الله تعالى عنه. وقد اختلف أهل العلم في جواز الوصية بالثلث: فذهب بعضهم إلى أن قوله: و"الثلث كثير" منعاً من الوصية به، وأن الواجب أن يقصر عنه، وأن لا يبلغ بوصيته تمام الثلث. وروي عن ابن عباس أنه قال: "الثلث جنف، والربع جنف". وعن الحسن البصري أنه قال: "يوصي بالثلث، أو الخمس، أو الربع". وقال إسحاق بن راهويه: السنة في الربع، لما قال النبي ﷺ: "الثلث كثير" إلا أن يكون رجلاً يعرف في ماله شبهات، فعليه استغراق الثلث. وقال الشافعي: إذا ترك ورثته أغنياء لم يكره أن يستوعب الثلث، فإذا لم يدعهم اخترتُ له أن لا يستوعبه. وقوله: "عالة يتكففون الناس" يريد فقراء يسألون الصدقة، يقال: رجل عائل، أي: فقير، وقوم عالة، والفعل منه: عال يعيل، إذا افتقر. ومعنى "يتكففون": يسألون الصدقة بأكفهم. وقوله: "أتخلف عن هجرتي " معناه خوف الموت بمكة، وهي دار تركوها لله ﷿، وهاجروا إلى المدينة، فلم يحبوا أن تكون مناياهم فيها. وقال المنذري: "لعلك أن تَخَلّف": "أن" ها هنا بالفتح لا غير. وقوله ﷺ: "إن تخلّف بعدى فتعمل عملاً صالحاً" رواه بعضهم بالفتح، وبعضهم بالكسر، ورواه بعضهم "لن" باللامِ. قال اليحصُبي وغيره: وكلاهما صحيح المعنى على ما تقدم. يريد قوله: "إنك إن تَذر". وقوله: "حتى ينتفع بك أقوام" هذا علم من أعلام نبوته ﷺ. وذلك أن سعداً أُمر على العراق، فأتي بقوم ارتدوا عن الإسلام، فاستتابهم، فأبى بعضهم، فقتلهم، وتاب بعضهم، فانتفعوا به، وعاش سعد بعد حجة الوداع نيفاً وأربعين سنة. ومعنى "أمض لأصحابي هجرتهم" أي: أتممها لهم ولا تبطلها، ولا تردهم على أعقابهم، بشرط هجرتهم ورجوعهم عن مستقيم حالهم. و"البائس" الذي اشتدت حاجته. عدَّه ﷺ من المساكين والفقراء لما فاته من الفضل لو مات في غير مكة.









সুনান আবী দাউদ (2865)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ زِيَادٍ، حَدَّثَنَا عُمَارَةُ بْنُ الْقَعْقَاعِ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ بْنِ عَمْرِو بْنِ جَرِيرٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَجُلٌ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم يَا رَسُولَ اللَّهِ أَىُّ الصَّدَقَةِ أَفْضَلُ قَالَ ‏ "‏ أَنْ تَصَدَّقَ وَأَنْتَ صَحِيحٌ حَرِيصٌ تَأْمُلُ الْبَقَاءَ وَتَخْشَى الْفَقْرَ وَلاَ تُمْهِلْ حَتَّى إِذَا بَلَغَتِ الْحُلْقُومَ قُلْتَ لِفُلاَنٍ كَذَا وَلِفُلاَنٍ كَذَا وَقَدْ كَانَ لِفُلاَنٍ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! কোন ধরনের সদাক্বাহ উত্তম? তিনি বলেনঃ সুস্থ ও সচ্ছল অবস্থায় সদাক্বাহ করা। যখন তুমি আরো বেঁচে থাকার আশা রাখো এবং গরীব হওয়ারও আশঙ্কা করো। তুমি এতটা বিলম্ব করবে না যে, প্রাণবায়ু উড়ে যাওয়ার পূর্ব মুহূর্তে তুমি বলবে, অমুকের জন্য এতটুকু অমুকের জন্য এতটুকু (সদাক্বাহ করলাম)। কেননা তখন তো সেটা অমুকের জন্য হয়েই গেছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1419) صحیح مسلم (1032)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مُسدَّد: هو ابن مُسرهَد. وأخرجه البخاري (١٤١٩)، ومسلم (١٠٣٢)، وابن ماجه (٢٧٠٦)، والنسائى (٢٥٤٢) و (٣٦١١) من طريق عمارة بن القعقاع، به. وهو في "مسند أحمد" (٧١٥٩)، و"صحيح ابن حبان" (٣٣١٢). قال الخطابي: فيه من الفقَه أن للصحيح أن يضع ماله حيث شاءَ مِن المباح، وله أن يشح به على من لا يلزمه فرضه. وفيه المنع من الإضرار في الوصية عند الموت. وفي قوله: "وقد كان لفلان" دليل على أنه في الوصية كان للورثة أن يبطلوها، لأنه حينئذٍ مالهم، ألا تراه يقول: "وقد كان لفلان" يريد به الوارث، والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (2866)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، أَخْبَرَنِي ابْنُ أَبِي ذِئْبٍ، عَنْ شُرَحْبِيلَ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لأَنْ يَتَصَدَّقَ الْمَرْءُ فِي حَيَاتِهِ بِدِرْهَمٍ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَتَصَدَّقَ بِمِائَةٍ عِنْدَ مَوْتِهِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কোন ব্যক্তির নিজ জীবদ্দশায় এক দিরহাম সদাক্বাহ করা তার মৃত্যুর সময়ে একশো দিরহাম সদাক্বাহ করার চেয়েও উত্তম।



দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (৪৬৪৩), মিশকাত (১৭৮০)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، شرحبیل بن سعد اختلط وضعفہ الجمہور وھو ضعیف،و قال الھیثمي: و ضعفہ جمھور الأئمۃ (مجمع الزوائد 115/4) و قال: وھو ضعیف عند الجمھور (مجمع الزوائد 159/2) ، وانظر الحدیث الآتي: 4813 ، (انوار الصحیفہ ص 103)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف شُرَحْبيل، وهو ابن سَعد. ابن أبي فُديك: هو محمد ابن إسماعيل بن مسلم، وابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة. وأخرجه ابن عبد البر في "التمهد" ١٤/ ٣٠٤ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن حبان (٣٣٣٤) من طريق ابن أبي فديك، به.









সুনান আবী দাউদ (2867)


حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ الصَّمَدِ، حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْحُدَّانِيُّ، حَدَّثَنَا الأَشْعَثُ بْنُ جَابِرٍ، حَدَّثَنِي شَهْرُ بْنُ حَوْشَبٍ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ، حَدَّثَهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏"‏ إِنَّ الرَّجُلَ لَيَعْمَلُ وَالْمَرْأَةَ بِطَاعَةِ اللَّهِ سِتِّينَ سَنَةً ثُمَّ يَحْضُرُهُمَا الْمَوْتُ فَيُضَارَّانِ فِي الْوَصِيَّةِ فَتَجِبُ لَهُمَا النَّارُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ وَقَرَأَ عَلَىَّ أَبُو هُرَيْرَةَ مِنْ هَا هُنَا ‏{‏ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصَى بِهَا أَوْ دَيْنٍ غَيْرَ مُضَارٍّ ‏}‏ حَتَّى بَلَغَ ‏{‏ ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ ‏}‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا - يَعْنِي الأَشْعَثَ بْنَ جَابِرٍ - جَدُّ نَصْرِ بْنِ عَلِيٍّ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যদি কোন পুরুষ বা নারী ষাট বছর ধরে আল্লাহর ইবাদাতে কাটায়, অতঃপর তাদের মৃত্যু এসে যায়। তখন তারা ওসিয়াতের মাধ্যমে উত্তরাধিকারের ক্ষতিসাধন করে। এ অপরাধের কারণে তাদের জন্য জাহান্নাম অবধারিত হয়। শাহর ইবনু হাওশাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অতঃপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার সামনে এ আয়াত পাঠ করেনঃ “মৃত ব্যক্তির কৃত ওসিয়াত ও ঋণ আদায়ের পর… এটাই হলো বিরাট সফলতা” (সূরাহ আন-নিসাঃ ১২, ১৩)। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, বর্ণনাকারী আশ‘আস ইবনু জাবির (রাহিমাহুল্লাহ) হলেন নাসর ইবনু ‘আলীর দাদা।



দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (১৪৫৭). যঈফ সুনান আত-তিরমিযী (৩৭৬/২২১৫), মিশকাত (৩০৭৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3075) ، أخرجہ الترمذي (2117 وسندہ حسن) شھر بن حوشب حسن الحدیث




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف شهر بن حوشب، وقد انفرد به. ونصر بن علي إنما نسب هنا حُدّانياً نسبة لجده لأمة أشعث بن عبد الله بن جابر الذي جاء في هذا الحديث، فهو حداني، وأما نصر بن علي فهو ابن صهبان الجهضمي، فنسبته من جهة أبيه جهضميٌّ. وأخرجه ابن ماجه (٢٧٠٤)، والترمذي (٢٢٥٠) من طريق نصر بن علي، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب. وهو في "مسند أحمد" (٧٧٤٢). وفي الباب قوله ﷺ: " إن الرجل ليعمل بعمل أهل الجنة حتى ما يكون بينه وبينها إلا ذراع، فيسبق عليه الكتاب، فيعمل بعمل أهل النار فيدخل النار" أخرجه البخاري (٣٣٣٢)، ومسلم (٢٦٤٣) من حديث عبد الله بن مسعود. والحيف في الوصية من عمل أهل النار.









সুনান আবী দাউদ (2868)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا أَبُو عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْمُقْرِئُ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ أَبِي أَيُّوبَ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي جَعْفَرٍ، عَنْ سَالِمِ بْنِ أَبِي سَالِمٍ الْجَيْشَانِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ، قَالَ قَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ يَا أَبَا ذَرٍّ إِنِّي أَرَاكَ ضَعِيفًا وَإِنِّي أُحِبُّ لَكَ مَا أُحِبُّ لِنَفْسِي فَلاَ تَأَمَّرَنَّ عَلَى اثْنَيْنِ وَلاَ تَوَلَّيَنَّ مَالَ يَتِيمٍ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ تَفَرَّدَ بِهِ أَهْلُ مِصْرَ ‏.‏




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে আবূ যার! আমি তোমাকে (প্রশাসনিক কাজে) দুর্বল দেখছি। আমি আমার নিজের জন্য যা পছন্দ করি তোমার জন্যও তা পছন্দ করি। তুমি দুই ব্যক্তির মধ্যে বিচারক হবে না এবং ইয়াতীমের সম্পদের অভিভাবক হবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1826)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو عبد الرحمن المقرئ: هو عبد الله بن يزيد. وأخرجه مسلم (١٨٢٦)، والنسائي (٣٦٦٧) من طريق أبي عبد الرحمن عبد الله ابن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢١٥٦٣)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٦٤). وأخرج مسلم (١٨٢٥) من طريق ابن حُجيرة الأكبر، عن أبي ذر قال: قلتُ: يا رسول الله، ألا تستعملني؟ قال: فضرب بيده على منكبى، ثم قال: "يا أبا ذر، إنك ضعيف، وإنها يوم القيامة خزي وندامة، إلا من أخذها بحقها، وأدى الذى عليه فيها". وهو في "مسند أحمد" (٢١٥١٣).









সুনান আবী দাউদ (2869)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدٍ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنِي عَلِيُّ بْنُ حُسَيْنِ بْنِ وَاقِدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ يَزِيدَ النَّحْوِيِّ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، ‏{‏ إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالأَقْرَبِينَ ‏}‏ فَكَانَتِ الْوَصِيَّةُ كَذَلِكَ حَتَّى نَسَخَتْهَا آيَةُ الْمِيرَاثِ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, (আল্লাহর বাণী): “তোমাদের কারো মৃত্যু উপস্থিত হলে তার পরিত্যক্ত সম্পদ পিতা-মাতা ও নিকটাত্নীয়ের জন্য প্রচলিত নিয়ম অনুযায়ী ওসিয়াত করা তোমাদের উপর ফার্য” (সূরাহ আল-বাক্বারাহঃ ১৮০)। ওসিয়াতের নিয়ম এভাবেই ছিল। পরে উত্তরাধিকার সম্পর্কিত বিধান অবতীর্ণ হলে এ আয়াত মানসূখ হয়ে যায়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل على بن حسين بن واقد، فهو صدوق حسن الحديث، لكنه متابع. عكرمة: هو مولى ابن عباس، ويزيد النحوي: هو ابن أبي سعيد، وأحمد بن محمد المروزي: هو ابن ثابت. وأخرجه البيهقى ٦/ ٢٦٥، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٤/ ٢٩٧، وابن الجوزي في "نواسخ القرآن" ص ٥٩ - ٦٠ من طريق أبي داود السجستاني، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه البخاري (٢٧٤٧) من طريق عطاء بن أبي رباح، والطبري ٢/ ١١٨، والحاكم ٢/ ٢٧٣ و ٢٨١، والبيهقي ٦/ ٢٦٥ و ٧/ ٤٢٧، وابن الجوزي في "نواسخ القرآن" ص ٦٠ من طريق محمد بن سيرين، والطبري ٢/ ١١٨ - ١١٩، وابن الجوزي ص ٥٩ من طريق عطية العوفي، ثلاثتهم عن ابن عباس. وأخرجه الدارمي (٣٢٦٣) عن أحمد بن إسماعيل، والطبري ٢/ ١١٩ عن محمد ابن حميد الرازي، كلاهما عن أبي تميلة يحيى بن واضح، عن الحسين بن واقد، عن يزيد النحوي، عن عكرمة والحسن البصري - فلم يذكرا ابن عباس. وأحمد بن إسماعيل ضعيف، وابن حميد متروك.









সুনান আবী দাউদ (2870)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ بْنُ نَجْدَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ عَيَّاشٍ، عَنْ شُرَحْبِيلَ بْنِ مُسْلِمٍ، سَمِعْتُ أَبَا أُمَامَةَ، سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ إِنَّ اللَّهَ قَدْ أَعْطَى كُلَّ ذِي حَقٍّ حَقَّهُ فَلاَ وَصِيَّةَ لِوَارِثٍ ‏"‏ ‏.‏




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ নিশ্চয়ই আল্লাহ প্রত্যেক হকদারের অংশ নির্দিষ্ট করেছেন। সুতরাং কোন ওয়ারিসের জন্য ওসিয়াত করা যাবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3073) ، أخرجہ الترمذي (2120 وسندہ حسن، إسماعیل بن عیاش صرح بالسماع عندہ) ورواہ ابن ماجہ (2713 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل ابن عياش -وهو إسماعيل- فهو حسن الحديث فيما رواه عن أهل بلده، وهذا منها، وهو متابع. وأخرجه ابن ماجه (٢٧١٣)، والترمذي (٢٢٥٣) من طريق إسماعيل بن عياش، به، وقال الترمذي: هذا حديث حسن. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٢٩٤). وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى" (٩٤٩) من طريق سليم بن عامر الكلاعي وغيره، عن أبي أمامة. وإسناده صحيح. وسيتكرر الحديث عند المصنف برقم (٣٥٦٥) ضمن حديث مطول. قال الخطابي: قوله: "أعطى كل ذي حق حقه" إشارة إلى آية المواريث. وكانت الوصية قبل نزول الآية واجبة للأقربين. وهو قوله تعالى: ﴿كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ﴾ [البقرة: ١٨٠] ثم نسخت بآية الميراث. (أي: خصصت). وإنما تبطل الوصية للوارث في قول أكثر أهل العلم من أجل حقوق سائر الورثة، فإذا أجازوها جازت، كما إذا أجازوا الزيادة على الثلث للأجنبي جاز. وذهب بعضهم إلى أن الوصية للوارث لا تجوز بحالٍ، وإن أجازها سائر الورثة. لأن المنع منها إنما هو لحق الشرع، فلو جوزناها لكنا قد استعملنا الحكم المنسوخ. وذلك غير جائز، كما أن الوصية للقاتل غير جائزة، وإن أجازها الورثة.









সুনান আবী দাউদ (2871)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لَمَّا أَنْزَلَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ ‏{‏ وَلاَ تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلاَّ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ‏}‏ وَ ‏{‏ إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا ‏}‏ الآيَةَ انْطَلَقَ مَنْ كَانَ عِنْدَهُ يَتِيمٌ فَعَزَلَ طَعَامَهُ مِنْ طَعَامِهِ وَشَرَابَهُ مِنْ شَرَابِهِ فَجَعَلَ يَفْضُلُ مِنْ طَعَامِهِ فَيُحْبَسُ لَهُ حَتَّى يَأْكُلَهُ أَوْ يَفْسُدَ فَاشْتَدَّ ذَلِكَ عَلَيْهِمْ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَنْزَلَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ ‏{‏ وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَى قُلْ إِصْلاَحٌ لَهُمْ خَيْرٌ وَإِنْ تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ ‏}‏ فَخَلَطُوا طَعَامَهُمْ بِطَعَامِهِ وَشَرَابَهُمْ بِشَرَابِهِ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মহান আল্লাহ যখন এ আয়াত অবতীর্ণ করেনঃ “ইয়াতীমের সম্পদের নিকটবর্তী হয়ো না। কিন্তু উত্তম পন্থায়, যতদিন না সে তার যৌবনে পদার্পণ করে” (সূরাহ ইসরাঃ ৩৪) এবং “যারা ইয়াতীমের সম্পদ অন্যায়ভাবে খায়, তারা মূলত আগুন দিয়েই নিজেদের পেট বোঝাই করে এবং তারা অবশ্যই জাহান্নামের উত্তপ্ত আগুনে নিক্ষিপ্ত হবে” (সূরাহ আন-নিসাঃ ১০)। তখন যাদের কাছে ইয়াতীম ছিল তারা নিজেদের খাদ্য হতে ইয়াতীমের খাদ্য এবং নিজেদের পানীয় হতে ইয়াতীমের পানীয় আলাদা করে ফেললো। ফলে ইয়াতীমের উদ্বৃত্ত খাদ্য রেখে দেয়া হতো, সে হয় পরে তা খেতো নতুবা তা নষ্ট হতো। অভিভাবকদের কাছে বিষয়টি কঠিন মনে হলো। তারা বিষয়টি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে উপস্থাপন করলো। অতঃপর মহান আল্লাহ তা’আলা আয়াত অবর্তীর্ণ করেনঃ “তোমাকে তারা জিজ্ঞেস করছে ইয়াতীমদের সম্পর্কে। বলো, তাদের সাথে উত্তম পন্থা অবলম্বন করাই শ্রেয়। যদিও তোমাদের ও তাদের খরচপত্র ও থাকা খাওয়া একত্র রাখা দোষণীয় নয়। কেননা তারা তোমাদেরই ভাই” (সূরাহ আল-বাক্বারাহঃ ২২০)। অতঃপর তারা নিজেরদের পানাহার তাদের পানাহারের সাথে একত্র করলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (3699) ، عطاء بن السائب اختلط ، (انوار الصحیفہ ص 103)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. عطاء -وهو ابن السائب- اختلط بأخرة، وجرير -وهو ابن عبد الحميد- ممن سَمع من عطاء بعد اختلاطه، وقد تابعه جماعة لم يُميّز سماعُ أحد منهم من عطاء، أكان قبل اختلاطه أو بعده. وأخرجه ابن جرير الطبري في "تفسيره" ٢/ ٣٦٩ - ٣٧٠، والحاكم ٢/ ١٠٣ و ٣٠٣ و ٣١٨، والبيهقي ٦/ ٢٨٤، والواحدي في "أسباب النزول" ص ٥٩، والضياء المقدسي في "المختارة" ١٠/ (٢٧٣) من طريق جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٣٦٦٩)، وابن جرير ٢/ ٣٧١ من طريق أبي كدينة يحيى بن المهلب، والنسائي (٣٦٧٠)، وابن جرير ٢/ ٣٧٠ - ٣٧١ من طريق عمران بن عيينة، وأحمد (٣٠٠٠)، وابن جرير ٢/ ٣٦٩، والحاكم ٢/ ٢٧٨ - ٢٧٩، والضياء المقدسي في "المختارة" ١٠/ (٢٧٢) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، ثلاثتهم عن عطاء ابن السائب، به. وأخرجه ابن جرير ٢/ ٣٧٠ من طريق عمرو بن أبي قيس الرازي، عن عطاء بن السائب، والواحدي في "أسباب النزول" ص ٥٩ من طريق سالم الأفطس، كلاهما (عطاء ابن السائب وسالم الأفطس) عن سعيد بن جبير مقطوعاً من قوله - فلم يذكرا ابنَ عباس. وأخرجه بنحوه أبو عبيد في "الناسخ والمنسوخ" (٤٣٧)، وابن جرير ٢/ ٣٧١، والطبراني في "الكبير" (١٣٠٢٠) من طريق علي بن أبي طلحة، وابن جرير ٢/ ٣٧٢ من طريق عطية العوفي، كلاهما عن ابن عباس. وإسناداهما ضعيفان. قال أبو جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص ١٩١: وهذا مما لا يجوز فيه ناسخ ولا منسوخ، لأنه خبر ووعيد، ونهي عن الظلم والتعدي، فمحالٌ نسخُهُ، فإن صح ذلك عن ابن عباس فتأويله من اللغة أن هذه الآية على نسخة تلك الآية، فهذا جواب، وأصح منه ما عليه أهلُ التأويل، قال سعيد بن جبير: لما نزلت ﴿إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا﴾ [النساء: ١٠] اشتدت على الناس، وامتنعوا من مخالطة اليتامى حتى نزلت ﴿وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَى قُلْ إِصْلَاحٌ لَهُمْ خَيْرٌ﴾ [البقرة: ٢٢٠] فالمعنى على هذا القول: أنه لما وقع بقلوبهم أنه لا ينبغي أن تخالطوا اليتامي في شيء لئلا يُحرجوا بذلك، فنسخ الله ﷿ ما وقع بقلوبهم منه، أي: أزاله أن أباح لهم مخالطة اليتامي. وقال مكي بن أبي طالب في "الإيضاح لناسخ القرآن ومنسوخه" عند قوله تعالى: ﴿وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّى يَبْلُغَ أَشُدَّهُ﴾ [الإسراء: ٣٤]: والذي يوجبه النظرُ وعليه جماعةٌ من العلماء أنه غيرُ منسوخ، لأنه قال تعالى: ﴿إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ﴾ ففي هذا جواز مخالطتهم بالتي هي أحسن، وهو قوله ﴿وَاللَّهُ يَعْلَمُ الْمُفْسِدَ مِنَ الْمُصْلِحِ﴾ [البقرة: ٢٢٠] فكلا الآيتين يجوز مخالطة اليتيم فلا يجوز أن تنسخ إحداهما الأخرى، لأنهما بمعنى واحد. وجاء في "زاد المسير" ٢/ ٢٤ بتحقيقنا: وقد توهم قوم لا علم لهم بالتفسير وفقهه أن هذه الآية منسوخة، لأنهم لما سمعوا أنها لما نزلت تحرج القوم عن مخالطة اليتامى، فنزل قوله: ﴿وَإِنْ تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ﴾ وهذا غلط، وإنما ارتفع عنهم الحرج بشرط الإصلاح، لا على إباحة الظلم.









সুনান আবী দাউদ (2872)


حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ مَسْعَدَةَ، أَنَّ خَالِدَ بْنَ الْحَارِثِ، حَدَّثَهُمْ حَدَّثَنَا حُسَيْنٌ، - يَعْنِي الْمُعَلِّمَ - عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَجُلاً، أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ إِنِّي فَقِيرٌ لَيْسَ لِي شَىْءٌ وَلِي يَتِيمٌ ‏.‏ قَالَ فَقَالَ ‏ "‏ كُلْ مِنْ مَالِ يَتِيمِكَ غَيْرَ مُسْرِفٍ وَلاَ مُبَادِرٍ وَلاَ مُتَأَثِّلٍ ‏"‏ ‏.‏




‘আমর ইবনু শু’আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বললো, আমি গরীব মানুষ। আমার কোন সম্পদ নাই। তবে আমার অধীনে একজন ইয়াতীম আছে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি ইয়াতীমের সম্পদ থেকে খেতে পারো কিন্তু কোন অপচয় করবে না, অতিরিক্ত গ্রহণ করবে না এবং তোমার নিজের জন্য কিছু সঞ্চয়ও করবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3355) ، أخرجہ النسائي (3698 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. حسين المعلم وهو ابن ذكوان. وأخرجه ابن ماجه (٢٧١٨)، والنسائي (٣٦٦٨) من طريق حسين المعلم، بهذا الإسناد. وهوفي "مسند أحمد" (٦٧٤٧). ويشهد له حديث عائشة عند البخاري (٤٥٧٥)، ومسلم (٣٠١٩) قالت في قوله تعالى: ﴿وَمَنْ كَانَ غَنِيًّا فَلْيَسْتَعْفِفْ وَمَنْ كَانَ فَقِيرًا فَلْيَأْكُلْ بِالْمَعْرُوفِ﴾ [النساء: ٦] نزلت في مال اليتيم إذا كان فقيراً أنه يأكل منه مكان قيامه عليه بمعروف. وهذا له حكم الرفع لأنه لا يقال من قِبَل الرأي. قال الخطابي: قوله: "غير متأثل" أي: غير متخذ منه أصل مالٍ، وأثلة الشيء أصله. ووجه إباحته الأكل من مال اليتيم أن يكون ذلك على معنى ما يستحقه من العمل فيه والاستصلاح له، وأن يأخذ منه بالمعروف على قدر مثل عمله. وقد اختلف الناس في الأكل من مال اليتيم: فروي عن ابن عباس ﵄ أنه قال: "يأكل منه الوصي إذا كان يقوم عليه" وإليه ذهب أحمد بن حنبل. وقال الحسن والنخعي: يأكل ولا يقضي. وقال عبيدة السلمانى وسعيد بن جبير ومجاهد: يأكل ويؤديه إليه إذا كبر، وهو قولُ الأوزاعي.









সুনান আবী দাউদ (2873)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مُحَمَّدٍ الْمَدِينِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ خَالِدِ بْنِ سَعِيدِ بْنِ أَبِي مَرْيَمَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ يَزِيدَ بْنِ رُقَيْشٍ، أَنَّهُ سَمِعَ شُيُوخًا، مِنْ بَنِي عَمْرِو بْنِ عَوْفٍ وَمِنْ خَالِهِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي أَحْمَدَ قَالَ قَالَ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ حَفِظْتُ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ يُتْمَ بَعْدَ احْتِلاَمٍ وَلاَ صُمَاتَ يَوْمٍ إِلَى اللَّيْلِ ‏"‏ ‏.‏




আলী ইবনু আবূ ত্বালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছ থেকে শুনে মুখস্ত করে নিয়েছিঃ “যৌবনপ্রাপ্ত হলে কেউ ইয়াতীম থাকে না এবং সকাল থেকে রাত পর্যন্ত নীরব থাকা জায়িয নয়।”




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ، إسنادہ ضعيف ، خالد بن سعید لم یوثقہ غیر ابن حبان وباقی السند حسن ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ ، وروی الطبراني فی الکبیر (3502) عن حنظلۃ بن حذیم قال قال رسول اللّٰہ ﷺ: ((لا یتم بعد احتلام ولا یتم علی جاریۃ إذا ھي حاضت)) وسندہ حسن ، (انوار الصحیفہ ص 103، 104)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: قوله: "لا يتم بعد احتلام" حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف خالد بن سعد بن أبي مريم ويحيى بن محمد المديني -وهو ابن عبد الله بن مهران-، وقد ضعف هذا الإسناد العقيلي في "الضعفاء" ٤/ ٤٢٨، وعبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى"، وابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والإيهام" ٣/ ٥٣٦ - ٥٣٧، والمنذري في "مختصر السنن"، لكن حسنه النووي في "رياض الصالحين". وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" ٤/ ٤٢٨، والطبراني في "الأوسط" (٢٩٠)، وفي "الصغير" (٢٦٦)، والبيهقي ٦/ ٥٧، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة عبد الله ابن أبي أحمد، من طريق عبد الله بن خالد بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٦٥٦٤)، وفي "الصغير" (٩٥٢)، ومن طريقه الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" ٥/ ٢٩٩، والضياء المقدسي في "المختارة" (٦٨٣) من طريق علقمة بن قيس النخعي، عن علي بن أبي طالب. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن علقمة إلا إبراهيم، ولا رواه عن إبراهيم إلا أبان بن تغلب، ولا رواه عن أبان إلا موسى بن عقبة، ولا عن موسى إلا محمد بن جعفر [بن أبي كثير]، تفرد به محمد بن عُبيد التبان، عن أبيه، ولا كتبناه إلا عن هذا الشيخ - قلنا: يعني به محمد بن سليمان بن هارون الصوفي المصري. وأخرجه عبد الرزاق (١١٤٥٠)، وسعيد بن منصور (١٠٣٠)، والطبراني في "الأوسط" (٧٣٣١)، وابن عدي في ترجمة أيوب بن سويد وترجمة جويبر بن سعيد، والدارقطني في "العلل" ٤/ ١٤٢ - ١٤٣ من طريق جويبر بن سعيد، عن الضحاك بن مزاحم، عن النزال بن سبرة، عن علي. وجويبر بن سعيد ضعيف جدا. وجاء عند عبد الرزاق بإثر روايته: فقال الثوري: يا أبا عروة [يعني معمر بن راشد]:إنما هو عن علي موقوف، فأبى عليه معمر إلا عن النبي ﷺ ولهذا صحح العقَيلي في "الضعفاء" ٤/ ٤٢٨، والدارقطني في "العلل" ٤/ ١٤٢ وغيرهما أنه موقوف على عليٍّ. وفي الباب عن الذيال بن عُبيد، عن جده حنظلة عند الطبراني في "الكبير" (٣٥٠٢)، وابن قانع في "معجم الصحابة" ١/ ٢٠٤ بلفظ: " لا يتم بعد احتلام، ولا يُتم على جارية إذا حاضت". قال الحافظ في "التلخيص الحبير" ٣/ ١٠١: إسناده لا بأس به. وعن جابر بن عبد الله عند الطيالسي (١٧٦٧)، وعبد الرزاق (١٣٨٩٩)، وابن حبان في "المجروحين" ١/ ٣١٨، وابن عدي في ترجمة حرام بن عثمان وترجمة أبي سعد سعيد بن المرزبان البقال، والبيهقي ٧/ ٣١٩، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" ٢/ ٦٤١ من طرق عن جابر بن عبد الله، ولا يخلو طريق منها من مقالٍ. قال الخطابي: ظاهر هذا القول يوجب انقطاع أحكام اليتم عنه بالاحتلام وحدوث أحكام البالغين له. فيكون للمحتلم أن يبيع ويشتري، ويتصرف في ماله، ويعقد النكاح لنفسه، وإن كانتَ امرأة فلا تزوج إلا بإذنها. ولكن المحتلم إذا لم يكن رشيدا، لم يُفَكَّ الحجر عنه. وقد يحظر الشىء بسببين، فلا يرتفع بارتفاع أحدهما مع بقاء السبب الآخر. وقد أمر الله تعالى بالحجر على السفيه فقال: ﴿وَلَا تُؤْتُوا السُّفَهَاءَ أَمْوَالَكُمُ الَّتِي جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ قِيَامًا﴾ [النساء: ٥]، وقال: ﴿فَإِنْ كَانَ الَّذِي عَلَيْهِ الْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا﴾ [البقرة: ٢٨٢] فأثبت الولاية على السفيه، كما أثبتها على الضعيف، فكان معنى الضعيف راجعاً إلى الصغير، ومعنى السفيه راجعا إلى الكبير البالغ، لأن السفه اسم ذمٍّ، ولا يُذم الإنسان على مالم يكتسب، والقلم مرفوع عن غير البالغ، فالحرج والذم مرفوعان عنه. وقال سبحانه: ﴿وَابْتَلُوا الْيَتَامَى حَتَّى إِذَا بَلَغُوا النِّكَاحَ فَإِنْ آنَسْتُمْ مِنْهُمْ رُشْدًا فَادْفَعُوا إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ﴾ [النساء: ٦] فشرط في دفع المال إليهم شيئين: الاحتلام والرشد. والحكم إذا كان وجوبه معلقاً بشيئين لم يجب إلا بوُرُودهما معاً. وقوله: "لا صمات يوم إلى الليل"وكان أهل الجاهلية من نسكهم الصمات، وكان الواحد منهم يعتكف اليوم والليلة فيصمت، ولا ينطق، فنهوا عن ذلك وأمروا بالذكر والنطق بالخير.









সুনান আবী দাউদ (2874)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ الْهَمْدَانِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ بِلاَلٍ، عَنْ ثَوْرِ بْنِ زَيْدٍ، عَنْ أَبِي الْغَيْثِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏"‏ اجْتَنِبُوا السَّبْعَ الْمُوبِقَاتِ ‏"‏ ‏.‏ قِيلَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَمَا هُنَّ قَالَ ‏"‏ الشِّرْكُ بِاللَّهِ وَالسِّحْرُ وَقَتْلُ النَّفْسِ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلاَّ بِالْحَقِّ وَأَكْلُ الرِّبَا وَأَكْلُ مَالِ الْيَتِيمِ وَالتَّوَلِّي يَوْمَ الزَّحْفِ وَقَذْفُ الْمُحْصَنَاتِ الْغَافِلاَتِ الْمُؤْمِنَاتِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ أَبُو الْغَيْثِ سَالِمٌ مَوْلَى ابْنِ مُطِيعٍ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা সাতটি ধ্বংসকারী বিষয় থেকে দূরে থাকো। জিজ্ঞেস করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কি কি? তিনি বলেনঃ আল্লাহর সাথে কাউকে শরীক করা, যাদু করা, যে প্রাণকে হত্যা করা আল্লাহ হারাম করেছেন, তা ন্যায়সংগত কারণ ছাড়া হত্যা করা, সুদ খাওয়া, ইয়াতীমের সম্পদ অন্যায়ভাবে আত্নসাৎ করা, যুদ্ধক্ষেত্র থেকে পালানো এবং নির্দোষ মুমিন স্ত্রীদের নামে ব্যভিচারের অপবাদ দেয়া।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2766) صحیح مسلم (89)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٢٧٦٦)، ومسلم (٨٩)، والنسائي (٣٦٧١) من طريق سليمان بن بلال، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٥٥٦١). قال النووي في "شرح صحيح مسلم": قال العلماء ﵏: ولا انحصار للكبائر في عدد مذكور، وقد جاء عن ابن عباس ﵄ أنه سئل عن الكبائر: أسبعٌ هي، فقال: هي إلى السبعين، ويُروى إلى سَبع مئة أقرب، وأما قوله ﷺ: "الكبائر سبع"، فالمراد به: من الكبائر سبع، فإن هذه الصيغة وإن كانت للعموم، فهي مخصوصة بلا شكٌّ، وإنما وقع الاقتصار على هذه السبع، وفي الرواية الأخرى: ثلاث، وفى الأخرى: أربع، لكونها من أفحش الكبائر مع كثرة وقوعها، لا سيما فيما كانت عليه الجاهلية، ولم يذكر في بعضها ما ذكر في الأخرى، وهذا مُصرِّح بما ذكرته من أن المراد البعض. والموبقات: الأفعال المهلكات التي توقع فاعلها في الهلكة، والتولي يوم الزحف، أي: الجهاد ولقاء العدو إلا متحرفاً لقتال. أو متحيزاً إلى فئة. واختلفوا في حد الكبيرة، فقيل: الكبيرة: هي الموجبة للحد، وقيل: ما يلحق الوعيدُ بصاحبه بنص كتاب أو سنة، وقيل: الكبيرة: كل ذنب قرن به وعيد أو لعن، وقيل: كل ذنب أدخل صاحبه النار. وقال القرطبي في "المفهم": كل ذنب أطلق عليه بنص كتاب أو سنة أو إجماع: أنه كبيرة أو عظيم، أو أخبر فيه بشدة العقاب، أو علق عليه الحد، أو شدد النكير عليه، فهو كبيرة.









সুনান আবী দাউদ (2875)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ يَعْقُوبَ الْجُوزَجَانِيُّ، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ هَانِئٍ، حَدَّثَنَا حَرْبُ بْنُ شَدَّادٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ عَبْدِ الْحَمِيدِ بْنِ سِنَانٍ، عَنْ عُبَيْدِ بْنِ عُمَيْرٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّهُ حَدَّثَهُ - وَكَانَتْ، لَهُ صُحْبَةٌ - أَنَّ رَجُلاً، سَأَلَهُ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الْكَبَائِرُ فَقَالَ ‏"‏ هُنَّ تِسْعٌ ‏"‏ ‏.‏ فَذَكَرَ مَعْنَاهُ زَادَ ‏"‏ وَعُقُوقُ الْوَالِدَيْنِ الْمُسْلِمَيْنِ وَاسْتِحْلاَلُ الْبَيْتِ الْحَرَامِ قِبْلَتِكُمْ أَحْيَاءً وَأَمْوَاتًا ‏"‏ ‏.‏




উমাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, যিনি সাহাবী ছিলেন। তিনি বলেন, এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করলো, হে আল্লাহর রাসূল! কোনগুলি কবীরাহ গুনাহ? তিনি বললেনঃ এর সংখ্যা নয়টি। অতঃপর উপরোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত। এতে আরো রয়েছেঃ মুসলিম পিতা-মাতাকে কষ্ট দেয়া এবং তোমদের জীবন-মরণের ক্বিবলাহ কা’বা ঘরের চত্বরে নিষিদ্ধ কাজকে হালাল গণ্য করা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، یحیی بن أبي کثیرعنعن ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ عند البیہقي (3/ 409) وغیرہ ، وتوجیہ المیت إلی القبلۃ مستحب بالإجماع و للحدیث طریق آخر عند النسائي (4017) بلفظ آخر ، وھو صحیح بالشواہد ، (انوار الصحیفہ ص 104)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الحميد بن سنان، وقال البخاري: في حديثه نظر. عُبيد بن عُمير: هو ابن قتادة الليثى. وأخرجه النسائي (٤٠١٢)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٨٩٨) والعقيلي في "الضعفاء" ٣/ ٤٥، والطبراني في "الكبير" ١٧/ (١٠١)، والحاكم ١/ ٥٩ و ٤/ ٢٥٩، والبيهقي ٣/ ٤٠٨ و ١٠/ ١٨٦، وابن عبد البر في "الاستيعاب" في ترجمة عمير بن قتادة، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة عبد الحميد بن سنان، من طريق حرب بن شداد، عن يحيي بن أبي كثير، عن عبد الحميد بن سنان، به، ورواية النسائى مختصرة بلفظ: "هن سبع: أعظمهن إشراك بالله، وقتل النفس بغير حق وفرار يوم الزحف". وأخرجه الطبري في "تفسيره" ٥/ ٣٩، والطبراني ١٧/ (١٠٢) من طريق أيوب بن عتبة اليمامي، عن يحيى بن أبي كثير، عبيد بن عمير، عن أبيه، فأسقط من إسناده عبد الحميد بن سنان. وأيوب بن عتبة ضعيف، لكن قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "الجرح والتعديل" ٢/ ٢٥٣: كتبه في الأصل فهي صحيحة عن يحيى بن أبي كثير قال: قال لي سليمان بن شعبة هذا الكلام وكان عالماً بأهل اليمامة، وقال: أروى الناس عن يحيى بن أبي كثير وأصح الناس كتاباً عنه. وفي الباب عن ابن عُمر عند أبي القاسم البغوي في "الجعديات" (٣٤٢٦)، والبيهقي ٣/ ٤٠٩، وابن عبد البر في "التمهيد" ٥/ ٦٩ من طريق أيوب بن عتبة اليمامي، عن طيسلة بن علي (ولقب عليٍّ مياس) عن ابن عمر، عن النبي ﷺ. لكن خالف أيوبَ بن عتبة -وهو ضعيف في غير يحيى بن أبي كثير- زيادُ بن مخراق -وهو ثقة- فرواه عن طيسلة بن علي، عن ابن عمر موقوفاً عليه، أخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (٨)، والطبري في "تفسيره" ٥/ ٣٩. ورواه سلْم بن سلّام الواسطي عن أيوب بن عتبة، عن طيسلة، كرواية زياد بن مخراق. أخرجه الطبري ٥/ ٣٩. قلنا: وسواء كان موقوفاً على ابن عُمر أو مرفوعاً فإن مثله لا يُقال من قبل الرأي، والله تعالى أعلم.









সুনান আবী দাউদ (2876)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ خَبَّابٍ، قَالَ مُصْعَبُ بْنُ عُمَيْرٍ قُتِلَ يَوْمَ أُحُدٍ وَلَمْ تَكُنْ لَهُ إِلاَّ نَمِرَةٌ كُنَّا إِذَا غَطَّيْنَا بِهَا رَأْسَهُ خَرَجَتْ رِجْلاَهُ وَإِذَا غَطَّيْنَا رِجْلَيْهِ خَرَجَ رَأْسُهُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ غَطُّوا بِهَا رَأْسَهُ وَاجْعَلُوا عَلَى رِجْلَيْهِ مِنَ الإِذْخِرِ ‏"‏ ‏.‏




খাব্বার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মুস’আব ইবনু ‘উমাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উহুদ যুদ্ধে শহীদ হন। তার একটি কম্বল ছাড়া কিছুই ছিলো না। আমরা সেটা দিয়ে তার মাথা পর্যন্ত ঢাকলে তার দু’ পা বেরিয়ে পড়তো এবং তার দু’ পা ঢাকলে মাথা উন্মুক্ত হয়ে যেতো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কম্বল দ্বারা তার মাথা ঢেকে দাও এবং ইযখির (সুগন্ধি ঘাস) দ্বারা পা দুটি ঢেকে দাও।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1276) صحیح مسلم (940)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو وائل: هو شقيق بن سلمة، والأعمش هو سليمان بن مهران، وسفيان: هو ابن سعيد الثوري. وأخرجه البخاري (١٢٧٦)، ومسلم (٩٤٠)، والترمذي (٤١٨٩) و (٤١٩٠)، والنسائي (١٩٠٣) من طريق سليمان الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٠٥٨)، و"صحيح ابن حبان" (٧٠١٩). وسيتكرر عند المصنف برقم (٣١٥٥). قال الخطابي: فيه دلالة على أن الكفن من رأس المال، وأنه إذا استغرق الكفن جميع المال كان الميت أولى به من الورثة. وقال ابن الأثير: كل شَمْلةٍ مخططهٍ من مآزِر الأعراب فهي نَمِرة، وجمعها نِمارٌ، كانها أُخذتْ من لون النَّمِر؛ لما فيها من السواد والبياض. وقال: الإذخر، بكسر الهمزة: حَشيشةٌ طيبةُ الرائحةِ تُسقَّفُ بها البيوت فوق الخشب. ومصعب بن عمير: هو ابن هشام بن عبد مناف بن عبد الدار بن قصي يجتمع مع النبي ﷺ في قصي، وكان يكنى أبا عبد الله، من السابقين إلى الإسلام إلى هجرة المدينة، قال البراء: أول من قدم علينا من أصحاب النبي ﷺ مصعب بن عمير وابن أم مكتوم، فجعلا يقرئاننا القرآن. أخرجه البخاري (٤٩٤١) وذكر ابن إسحاق: أن النبي ﷺ أرسله مع أهل العقبة الأولى يقرئهم ويعلمهم، وكان مصعب وهو بمكة في ثروة ونعمة، فلما هاجر صار في قلة وكان يفقه أهل المدينة، ويقرئهم القرآن، وأسلم على يديه أُسيد بن حضير، وسعد بن معاذ، وشهد بدراً مع رسول الله ﷺ وشهد أحداً ومعه لواء رسول الله ﷺ، وقتل بأحد شهيداً.









সুনান আবী দাউদ (2877)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَطَاءٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، بُرَيْدَةَ أَنَّ امْرَأَةً، أَتَتْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ كُنْتُ تَصَدَّقْتُ عَلَى أُمِّي بِوَلِيدَةٍ وَإِنَّهَا مَاتَتْ وَتَرَكَتْ تِلْكَ الْوَلِيدَةَ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ قَدْ وَجَبَ أَجْرُكِ وَرَجَعَتْ إِلَيْكِ فِي الْمِيرَاثِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ وَإِنَّهَا مَاتَتْ وَعَلَيْهَا صَوْمُ شَهْرٍ أَفَيُجْزِئُ - أَوْ يَقْضِي - عَنْهَا أَنْ أَصُومَ عَنْهَا قَالَ ‏"‏ نَعَمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ وَإِنَّهَا لَمْ تَحُجَّ أَفَيُجْزِئُ - أَوْ يَقْضِي - عَنْهَا أَنْ أَحُجَّ عَنْهَا قَالَ ‏"‏ نَعَمْ ‏"‏ ‏.‏




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট এক মহিলা এসে বললো, আমি আমার মাকে একটি দাসী দান করি। দাসীকে রেখে মা মারা যান। তিনি বললেনঃ তুমি তোমার দানের সওয়াব পেয়েছো এবং উত্তরাধিকার সূত্রে দাসীও তোমার কাছে ফিরে এসেছে। মহিলাটি বললো, তিনি এক মাসের সওম অবশিষ্ট রেখে মারা গেছেন। আমি তার পক্ষ হতে সওম পালন করলে তা কি তার জন্য যথেষ্ট হবে? তিনি বললেনঃ হাঁ। সে বললো, আমার মা হাজ্জ করেননি। আমি তার পক্ষ হতে হাজ্জ করলে কি তার জন্য যথেষ্ট হবে? তিনি বললেনঃ হাঁ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1149)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. زهير: هو ابن معاوية، وأحمد بن يونس: هو أحمد بن عبد الله بن يونس، نسب هنا لجده، وهو معروفٌ بذلك. وأخرجه مسلم (١١٤٩)، وابن ماجه (١٧٥٩) و (٢٣٩٤)، والترمذي (٦٧٣) و (٩٤٨)، والنسائي في "الكبرى" (٦٢٨١ - ٦٢٨٣) من طريق عبد الله بن عطاء، به. واقتصر ابن ماجه في الموضع الأول على ذكر قضاء الصوم، واقتصر في الموضع الثاني هو والنسائي على ذكر الوليدة، وقد سلفت قصة الوليدة وحدها عند المصنف برقم (١٦٥٦)، واقتصر الترمذي في الموضع الثانى على ذكر قضاء الحج. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٩٥٦). وسيأتي الحديث مختصراً كذلك برقم (٣٣٠٩). وأخرجه مسلم (١١٤٩)، والنسائى في "الكبرى" (٦٢٨٠) من طريق عبد الملك ابن أبي سليمان، عن عبد الله بن عطاء، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه. وقال النسائي: هذا خطأ، والصواب عبد الله بن بريدة. قلنا: وسواء كان هذا أو ذاك فكلاهما ثقة، إلا أن الأكثرين رووه عن عبد الله بن عطاء، فقالوا: عبد الله بن بريدة. قال الخطابي: "الوليدة" الجارية المملوكة، ومعى الصدقة هنا: العطية. وإنما جرى عليها اسم الصدقة لأنها برٌّ وصلة فيها أجر، فحلَّت محل الصدقة. وفيه دليل على أن من تصدق على فقير بشئ فاشتراه منه بعد أن أقبضه إياه فإن البيع جائز، وإن كان يستحب ألا يُرجعه إلى ملكه بعد أن أخرجه بمعنى الصدقة. وقولها: "أصوم عنها؟ " يحتمل أن تكون أرادت الكفارة عنها، فيحل محل الصوم، ويحتمل أن تكون أرادت الصيام المعروف. وقد ذهب إلى جواز الصوم عن الميت بعض أهل العلم. وذهب أكثر العلماء إلى أن عمل البدن لا تَقعُ فيه النيابة، كما لا تقع في الصلوات. وقال النووي في "شرح مسلم" ٨/ ٢٠ - ٢١: اختلف العلماء فيمن مات وعليه صوم واجب من رمضان أو قضاء أو نذر أو غيره: هل يقضى عنه، وللشافعي في المسألة قولان مشهوران: أشهرهما: لا يُصام عنه، ولا يصح عن ميت صوم أصلاً. والثاني: يستحب لوليه أن يصوم عنه ويصح صومه عنه ويبرأ الميت ولا يحتاج إلى إطعام عنه، وهذا القول هو الصحيح المختار الذي نعتقده، وهو الذي صححه محققو أصحابنا الجامعون بين الفقه والحديث لهذه الأحاديث الصحيحة الصريحة … وممن قال به من السلف: الحسن البصري والزهري وقتادة وأبو ثور، وبه قال الليث وأحمد وإسحاق وأبو عبيد في صوم النذر دون رمضان وغيره. وذهب الجمهور إلى أنه لا يُصام عن ميت لا نذر ولا غيره، حكاه ابن المنذر عن ابن عمر وابن عباس وعائشة ورواية عن الحسن والزهري وبه قال مالك وأبو حنيفة.









সুনান আবী দাউদ (2878)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ الْمُفَضَّلِ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنِ ابْنِ عَوْنٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ أَصَابَ عُمَرُ أَرْضًا بِخَيْبَرَ فَأَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ أَصَبْتُ أَرْضًا لَمْ أُصِبْ مَالاً قَطُّ أَنْفَسَ عِنْدِي مِنْهُ فَكَيْفَ تَأْمُرُنِي بِهِ قَالَ ‏ "‏ إِنْ شِئْتَ حَبَّسْتَ أَصْلَهَا وَتَصَدَّقْتَ بِهَا ‏"‏ ‏.‏ فَتَصَدَّقَ بِهَا عُمَرُ أَنَّهُ لاَ يُبَاعُ أَصْلُهَا وَلاَ يُوهَبُ وَلاَ يُورَثُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْقُرْبَى وَالرِّقَابِ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ - وَزَادَ عَنْ بِشْرٍ - وَالضَّيْفِ - ثُمَّ اتَّفَقُوا - لاَ جُنَاحَ عَلَى مَنْ وَلِيَهَا أَنْ يَأْكُلَ مِنْهَا بِالْمَعْرُوفِ وَيُطْعِمَ صَدِيقًا غَيْرَ مُتَمَوِّلٍ فِيهِ ‏.‏ زَادَ عَنْ بِشْرٍ قَالَ وَقَالَ مُحَمَّدٌ غَيْرَ مُتَأَثِّلٍ مَالاً ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খায়বারে একখন্ড জমি পান। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বললেন, আমি খায়বারে একখন্ড জমি পেয়েছি যা অপেক্ষা উত্তম সম্পদ ইতিপূর্বে আমি পাইনি। আপনি আমাকে এর কি নির্দেশ দেন? তিনি বললেনঃ তুমি চাইলে আসল জমি রেখে দিয়ে এর থেকে প্রাপ্ত লভ্যাংশ (ফসল) সদাক্বাহ করে দাও। তখন থেকে ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিদ্ধান্ত নেন যে, আসল জমি বিক্রয় করা যাবে না, হেবা করা যাবে না এবং তাতে কোনরূপ উত্তরাধিকার স্বত্ব প্রতিষ্ঠিত হবে না। তিনি তা দান করে দিলেন ফকীর, আত্নীয়স্বজন, দাস মুক্তকরণে, আল্লাহর পথে এবং মুসাফিরদের জন্য। বর্ণনাকারী মুসাদ্দাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বিশর সূত্রে মেহমানের কথাও উল্লেখ করেন। পরে তারা একমত হয়ে বর্ণনা করেনঃ যিনি এ সম্পত্তির মোতাওয়াল্লী হবেন তিনি ন্যায়সঙ্গতভাবে তা থেকে ভোগ করতে পারবেন এবং বন্ধুদেরও আপ্যায়ন করতে পারবেন। কিন্তু নিজের জন্য সঞ্চয় করতে পারবেন না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2772) صحیح مسلم (1633)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن عون: هو عبد الله، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، ومُسَدّد: هو ابن مُسَرهَدٍ. وأخرجه مطولاً ومختصراً البخاري (٢٧٣٧) و (٢٧٧٢) و (٢٧٧٣)، ومسلم (١٦٣٢)، وابن ماجه (٢٣٩٦)، والترمذي (١٤٢٩)، والنسائي (٣٥٩٧ - ٣٦٠١) من طريق عبد الله بن عون، والبخاري (٢٧٧٧) من طريق أيوب السختياني والنسائي (٣٦٠٣ - ٣٦٠٥) من طريق عُبيد الله بن عمر، ثلاثتهم عن نافع، به وبعضهم يقول عن ابن عمر عن عمر، يعني يجعله من مسند عمر، وهذا اختلاف لا يضر، غاية ما فيه أن يكون عن ابن عمر مرسل صحابي، وهذا لا يضر. وأخرجه البخاري (٢٧٦٤) من طريق صخر بن جويرية عن نافع، به. وقال فيه: "تصدق بأصله، لا يُباعُ ولا يُوهَب ولا يُورث، ولكن يُنفَقُ ثمرُه" فجعل قوله: "لا يباع … " إلخ صَريحاً في الرفع. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٩٧) من طريق عُبيد الله، عن نافع، به، وفيه: أن عمر قال: يا رسول الله، إن المئة سهم التي بخيبر لم أصب مالاً قط هو أحب إلي منها … فلم يذكر الأرض، وذكر بدلها: مئة سهم. وجاء فيه أيضاً أن محمد بن يحيى بن أبي عمر شيخ ابن ماجه قال بإثر الحديث: فوجدتُ هذا الحديث في موضع آخر في كتابي: عن سفيان، عن عَبد الله، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال عمر. قلنا: يعني بذكر عَبد الله العمري أخي عُبيد الله، وعبد الله ضعيف. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٠٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٠١). وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (2879)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي اللَّيْثُ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ صَدَقَةِ، عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضى الله عنه قَالَ نَسَخَهَا لِي عَبْدُ الْحَمِيدِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ هَذَا مَا كَتَبَ عَبْدُ اللَّهِ عُمَرُ فِي ثَمْغٍ فَقَصَّ مِنْ خَبَرِهِ نَحْوَ حَدِيثِ نَافِعٍ قَالَ غَيْرَ مُتَأَثِّلٍ مَالاً فَمَا عَفَا عَنْهُ مِنْ ثَمَرِهِ فَهُوَ لِلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ - قَالَ وَسَاقَ الْقِصَّةَ - قَالَ وَإِنْ شَاءَ وَلِيُّ ثَمْغٍ اشْتَرَى مِنْ ثَمَرِهِ رَقِيقًا لِعَمَلِهِ وَكَتَبَ مُعَيْقِيبٌ وَشَهِدَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الأَرْقَمِ بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ هَذَا مَا أَوْصَى بِهِ عَبْدُ اللَّهِ عُمَرُ أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ إِنْ حَدَثَ بِهِ حَدَثٌ أَنَّ ثَمْغًا وَصِرْمَةَ بْنَ الأَكْوَعِ وَالْعَبْدَ الَّذِي فِيهِ وَالْمِائَةَ سَهْمٍ الَّتِي بِخَيْبَرَ وَرَقِيقَهُ الَّذِي فِيهِ وَالْمِائَةَ الَّتِي أَطْعَمَهُ مُحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم بِالْوَادِي تَلِيهِ حَفْصَةُ مَا عَاشَتْ ثُمَّ يَلِيهِ ذُو الرَّأْىِ مِنْ أَهْلِهَا أَنْ لاَ يُبَاعَ وَلاَ يُشْتَرَى يُنْفِقُهُ حَيْثُ رَأَى مِنَ السَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ وَذِي الْقُرْبَى وَلاَ حَرَجَ عَلَى مَنْ وَلِيَهُ إِنْ أَكَلَ أَوْ آكَلَ أَوِ اشْتَرَى رَقِيقًا مِنْهُ ‏.‏




ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি ‘উমার ইবনুল খাত্তাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ওয়াক্‌ফ দলীল সম্পর্কে বলেন, ‘আবদুল হামীদ ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে ওয়াক্‌ফ দলীলটির অনুলিপি দিয়েছেন। (তা হলো) বিস্‌মিল্লাহির রহমানির রহীম। আল্লাহর বান্দা ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার ‘সামাগ’ নামক ফলের বাগান ওয়াক্‌ফ করেছেন- এটা তারই দলীল। অতঃপর ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ পুরো হাদীস নাফি’ বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেন। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এই ওয়াক্‌ফকৃত সম্পত্তির আয় সঞ্চয় করা যাবে না। দলীলে উল্লেখিত খাতসমূহে এ সম্পত্তির আয় খরচ করার পর কিছু উদ্বৃত্ত থাকলে তা ভিক্ষুক এবং বঞ্চিতদের জন্য ব্যয় করবে। অতঃপর ইয়াহইয়া সম্পূর্ণ ঘটনা বর্ণনা করেন। দলীলে এও উল্লেখ ছিল, ‘সামাগ’ এর মোতাওয়াল্লী প্রয়োজনে বাগানের আয় থেকে দাস ক্রয় করতে পারবে (বাগান দেখাশুনার জন্য)। ওয়াক্‌ফের এই দলীল মু’আইকিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাক্বল করেন এবং এর সাক্ষী হন ‘আবদুল্লাহ ইবনু আকরাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। দলীলের অনুলিপি এরূপঃ “বিস্‌মিল্লাহির রহমানির রহীম। আল্লাহর বান্দা এবং মুমিনগণের নেতা ‘উমার এ ওসিয়াত করছেন। তার মৃত্যুর পর সামাগের সম্পত্তি, সিরমা ইবনুল আকওয়া’ (বাগান) এবং এখানে কর্মরত গোলাম, খায়বারের একশো ভাগ জমি এবং সেখানে কর্মরত গোলাম এবং খায়বারের নিকটস্থ উপত্যকায় মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যে একশো ভাগ জমি প্রদান করেছেন- এগুলোর আজীবন মোতাওয়াল্লী হবেন হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তার মৃত্যুর পর এর মোতাওয়াল্লী হবে তার পরিবারের বিচক্ষণ ব্যক্তি। মোতাওয়াল্লী এসব শর্তগুলো মানবেঃ “এ সম্পত্তি বিক্রি করা যাবে না। ক্রয় করে এর সাথে আর সম্পত্তি যোগ করা যাবে না। মোতাওয়াল্লী তার বুঝ অনুযায়ী এর আয় ভিক্ষুক, বঞ্চিত এবং গরীব নিকট আত্নীয়দের জন্য ব্যয় করবেন। তিনি এ থেকে প্রয়োজন পরিমাণ পরিমাণ নিতে পারবেন এবং গোলাম ক্রয় করতে পারবেন”।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح وجادة




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شواھد منھا الحدیث السابق (2878)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح عن يحيى بن سعيد -وهو الأنصاري- كما قال ابن الملقن في "البدر المنير" ٧/ ١٠٨، وتبعه الحافظُ في "التلخيص الحبير" ٣/ ٦٩ الليث: هو ابن سعد، وابن وهب: هو عبد الله، سليمان بن داود المَهري: هو ابن حماد. وأخرجه البيهقي ٦/ ١٠٦ من طريق محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. قوله: "ثمغ" قال ياقوت: بالفتح ثم السكون والغين معجمة، موضع مال لعمر ابن الخطاب ﵁ حَبَسَه، أي: وقفه، جاء ذكره في الحديث الصحيح، وقيده بعض المغاربة بالتحريك، والثمغ بالتسكين مصدر ثمغتُ رأسه: شدخته، وثمغت الثوب، أي: أشبعت صبغه. ومُعَيقيب، بقاف وآخره موحدة، مُضغّر، هو ابن أبي فاطمة الدَّوسي، حليف بني عبد شمس، من السابقين الأولين، هاجر الهجرتين، وشهد المشاهد، وولي بيت المال لعمر، ومات في خلافة عثمان أو علي. وعبد الله بن الأرقم: هو ابن عبد يغوث بن وهب بن عبد مناف بن زهرة القرشي، صحابي معروف، ولاه عمرُ بيت المال، ومات في خلافة عثمان. والصِّرمة: قال في "النهاية": الصرمة هنا: القطعة الخفيفة من النخل، وقيل: من الإبل.









সুনান আবী দাউদ (2880)


حَدَّثَنَا الرَّبِيعُ بْنُ سُلَيْمَانَ الْمُؤَذِّنُ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ، - يَعْنِي ابْنَ بِلاَلٍ - عَنِ الْعَلاَءِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أُرَاهُ عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِذَا مَاتَ الإِنْسَانُ انْقَطَعَ عَنْهُ عَمَلُهُ إِلاَّ مِنْ ثَلاَثَةِ أَشْيَاءَ مِنْ صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ أَوْ عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ মানুষ যখন মৃত্যু বরণ করে তখন তার আমলের সুযোগও বন্ধ হয়ে যায়। কিন্তু তিনটি আমলের সওয়াব বন্ধ হয় না। এক. সদাক্বাহ জারিয়া। দুই. এমন জ্ঞান যা দ্বারা মানুষ উপকৃত হয় এবং নেক সন্তান, যে তার জন্য দু’আ করে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1631)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. العلاء بن عبد الرحمن: هو ابن يعقوب مولى الحُرَقة، وابن وهب: هو عبد الله، والربيع بن سليمان المؤذن: هو المُرادي الفقيه صاحب الشافعي. وأخرجه مسلم (١٦٣١)، والترمذي (١٤٣٠)، والنسائي (٣٦٥١) من طريق العلاء بن عبد الرحمن، به. وهو في "مسند أحمد" (٨٨٤٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠١٦). قال: الخطابي: فيه دليل على أن الصوم والصلاة وما دخل في معناهما من عمل الأبدان، لا تجري فيها النيابة. وقد يستدل به من يذهب إلى أن من حج عن ميت، فإن الحج في الحقيقة يكون للحاج دون المحجوج عنه. وإنما يلحقه الدعاء. ويكون له الأجر في المال الذي أعطى إن كان حج عنه بمالٍ. وقال النووي في "شرح مسلم": وفيه أن الدعاء يصل ثوابه إلى الميت وكذلك الصدقة وهما مجمع عليهما، وكذلك قضاء الدين، وأما الحج فيجزىء عن الميت عند الشافعي وموافقيه، وهذا داخل في قضاء الدين إن كان حجاً واجباً، وإن كان تطوعاً وصَّى به فهو من باب الوصايا. وقوله: الا من ثلاث، أي: ينقطع ثواب عمله من كل شيء ولا ينقطع من هذه الثلاث. قاله المناوي. وقال ابن حجر المكي: المراد من الصالح المؤمن، وفائدة تقييده بالولد مع أن دعاء غيره ينفعه تحريض الولد على الدعاء. وقال الإمام النووي في "شرح مسلم" ١/ ٨٢ في باب بيان أن الإسناد من الدين: إن الصدقة تصل الى الميت وينتفع بها بلا خلاف بين المسلمين، وهذا هو الصواب، وأما ما حكاه الماوردي من أن الميت لا يلحقه بعد موته ثواب، فهو مذهب باطل وخطأ بين، مخالف لنصوص الكتاب والسنة وإجماع الأئمة فلا التفات إليه ولا تعريج عليه … وذهب جماعات من العلماء إلى أنه يصل إلى الميت ثواب جميع العبادات من الصلاة والصوم والقراءة وغير ذلك.