হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (2941)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي مَالِكٌ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، أَنَّ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَخْبَرَتْهُ عَنْ بَيْعَةِ، رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم النِّسَاءَ قَالَتْ مَا مَسَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَدَ امْرَأَةٍ قَطُّ إِلاَّ أَنْ يَأْخُذَ عَلَيْهَا فَإِذَا أَخَذَ عَلَيْهَا فَأَعْطَتْهُ قَالَ ‏ "‏ اذْهَبِي فَقَدْ بَايَعْتُكِ ‏"‏ ‏.‏




উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম কর্তৃক নারীদের বাই’আত গ্রহণের পদ্ধতি সম্পর্কে অবহিত করেছেন। তিনি বলেছেন, নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম কোন নারীকে নিজ হাতে স্পর্শ করতেন না, শুধু তাদের থেকে ওয়াদা নিতেন। তিনি কোন নারী থেকে ওয়াদা নিলে এবং সে তাঁর আনুগত্য স্বীকার করলে তিনি বলতেনঃ তোমার কাছ থেকে বায়’আত নিয়েছি, কাজেই এখন তুমি যেতে পারো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (7214) صحیح مسلم (1866)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام، وابن شهاب: هو الزهرى، ومالك: هو ابن أنس الإمام، وابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه البخاري (٢٧١٣) و (٤٨٩١) و (٧٢١٤)، ومسلم (١٨٦٦)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٦١) و (٩١٩٤) و (٩١٩٥) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٨٢٩)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٨١). قال النووي: فيه دليل على أن بيعة النساء الكلام من غير أخذ كف، وفيه أن بيعة الرجال بأخذ الكف مع الكلام، وفيه أن كلام الأجنبية يباح سماعه عند الحاجة، وأن صوتها ليس بعورة، وأنه لا يلمس الأجنبية من غير ضرورة كتطبيب وفصد وحجامة وقلع ضرس وكحل عين ونحوها مما لا توجد امرأة تفعله جاز للرجل الأجنبي فعله للضرورة.









সুনান আবী দাউদ (2942)


حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يَزِيدَ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ أَبِي أَيُّوبَ، حَدَّثَنِي أَبُو عَقِيلٍ، زُهْرَةُ بْنُ مَعْبَدٍ عَنْ جَدِّهِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ هِشَامٍ، قَالَ وَكَانَ قَدْ أَدْرَكَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَذَهَبَتْ بِهِ أُمُّهُ زَيْنَبُ بِنْتُ حُمَيْدٍ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ بَايِعْهُ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ هُوَ صَغِيرٌ ‏"‏ ‏.‏ فَمَسَحَ رَأْسَهُ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু হিশাম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর যুগ পান। তার মা যাইনাব বিনতু হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর নিকট গিয়ে বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! এর বাই’আত নিন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেনঃ সে তো ছোট, পরে তিনি তার মাথায় হাত বুলিয়ে দেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (7210)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٢٥٠١) و (٧٢١٠) من طريق سعيد بن أبي أيوب، به. وهو في "مسند أحمد" (١٨٠٤٦).









সুনান আবী দাউদ (2943)


حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ أَخْزَمَ أَبُو طَالِبٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، عَنْ عَبْدِ الْوَارِثِ بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ حُسَيْنٍ الْمُعَلِّمِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنِ اسْتَعْمَلْنَاهُ عَلَى عَمَلٍ فَرَزَقْنَاهُ رِزْقًا فَمَا أَخَذَ بَعْدَ ذَلِكَ فَهُوَ غُلُولٌ ‏"‏ ‏.‏




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেনঃ আমরা কাউকে সরকারী পদে নিযুক্ত করলে তার আহার ব্যবস্থাও আমার দায়িত্বে। পরে সে অতিরিক্ত কিছু নিলে তবে তা আত্মসাৎ হিসাবে গণ্য হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3748) ، صححہ ابن خزیمۃ (2369 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حسين المعلم: هو ابن ذكوان، وأبو عاصم: هو الضحاك ابن مخلد. وأخرجه أبو يعلى في "معجم شيوخه" (٢٤٤)، والطبري في "تهذيب الآثار" -قسم مسند علي بن أبي طالب- (٣٥٣)، وابن خزيمة (٢٣٦٩)، والحاكم ١/ ٤٠٦، والبيهقي ٦/ ٣٥٥ من طريق حسين بن ذكوان المعلم، به. وصححه الحاكم وسكت عنه الذهبي. والغلول: الخيانة في الغنيمة وفى مال الفيء.









সুনান আবী দাউদ (2944)


حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا لَيْثٌ، عَنْ بُكَيْرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الأَشَجِّ، عَنْ بُسْرِ بْنِ سَعِيدٍ، عَنِ ابْنِ السَّاعِدِيِّ، قَالَ اسْتَعْمَلَنِي عُمَرُ عَلَى الصَّدَقَةِ فَلَمَّا فَرَغْتُ أَمَرَ لِي بِعُمَالَةٍ فَقُلْتُ إِنَّمَا عَمِلْتُ لِلَّهِ ‏.‏ قَالَ خُذْ مَا أُعْطِيتَ فَإِنِّي قَدْ عَمِلْتُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَعَمَّلَنِي ‏.




ইবনুল সাঈদী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে যাকাত আদায়ের জন্য নিযুক্ত করলেন। আমি কাজ সমাপ্ত করলে তিনি আমাকে বেতন প্রদানের নির্দেশ দেন। আমি বললাম, আমি আল্লাহর জন্যই এ কাজ করেছি। তিনি বললেন, যা দেয়া হচ্ছে তা নাও। আমিও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর সময়ে সরকারী দায়িত্বে ছিলাম। তিনি আমাকে পারিশ্রমিক প্রদান করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1045) ، مشکوۃ المصابیح (3749)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن الساعدي: هو عبد الله بن السعدي، واسم أبيه وَقْدان -وقيل غير ذلك- القرشي العامري، وليث: هو ابن سعد. وأخرجه مسلم (١٠٤٥)، والنسائى (١٦٠٤) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٣٧١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٤٠٥). وأخرجه بنحوه البخاري (٧١٦٣)، ومسلم (١٠٤٥)، والنسائي (٢٦٠٥) و ٢٦٠٦) و (٢٦٠٧) من طريق حويطب بن عبد العزى، عن عبد الله بن السعدي، به. وهو في "مسند أحمد" (١٠٠). وأخرج البخاري (٧١٦٤)، والنسائى (٢٦٠٨) من طريق عبد الله بن عمر بن الخطاب قال: سمعتُ عمر يقول: كان النبي ﷺ يعطيني العطاء، فأقول: أعطه أفقر إليه مني، حتى أعطانى مرة مالاً، فقلتُ: أعطه أفقر إليه مني، فقال النبي ﷺ: "خذه فتموَّله وتصدق به. فما جاءك من هذا المال، وأنت غير مشرف ولا سائل فخذه، وما لا، فلا تُتبِعه نفسَك". وهو في "مسند أحمد" (١٣٦). قال الخطابي: قوله: "عملني" معناه: أعطاني العُمالة، والعمالة بضم العين: ما يأخذه العامل من الأجرة. وفيه بيان أخذ العامل الأجرة بقدر مثل عمله فيما يتولاه من الأمر، وقد سمى الله تعالى للعاملين سهماً في الصدقة، فقال: ﴿وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا﴾ [التوبة: ٦٠] فرأى العلماء أن يُعطوا على قدر غنائهم وسعيهم.









সুনান আবী দাউদ (2945)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ مَرْوَانَ الرَّقِّيُّ، حَدَّثَنَا الْمُعَافَى، حَدَّثَنَا الأَوْزَاعِيُّ، عَنِ الْحَارِثِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ جُبَيْرِ بْنِ نُفَيْرٍ، عَنِ الْمُسْتَوْرِدِ بْنِ شَدَّادٍ، قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏"‏ مَنْ كَانَ لَنَا عَامِلاً فَلْيَكْتَسِبْ زَوْجَةً فَإِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ خَادِمٌ فَلْيَكْتَسِبْ خَادِمًا فَإِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ مَسْكَنٌ فَلْيَكْتَسِبْ مَسْكَنًا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ قَالَ أَبُو بَكْرٍ أُخْبِرْتُ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏"‏ مَنِ اتَّخَذَ غَيْرَ ذَلِكَ فَهُوَ غَالٌّ أَوْ سَارِقٌ ‏"‏ ‏.‏




আল-মুসতাওরিদ ইবনু শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছিঃ যে আমাদের কর্মকর্তা নিযুক্ত হয়েছে সে যেন (সরকারী খরচে) একজন স্ত্রী সংগ্রহ করে। খাদেম না থাকলে সে যেন একটি খাদেম সংগ্রহ করে এবং বাসস্থান না থাকলে সে যেন একটি বাসস্থান সংগ্রহ করে। যে ব্যক্তি এর অতিরিক্ত কিছু গ্রহণ করবে সে প্রতারক বা চোর গণ্য হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3751) ، صححہ ابن خزیمۃ (2370 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل موسى بن مروان الرقي، وهو متابع. المعافى: هو ابن عمران الموصلي. وأخرجه ابن خزيمة (٢٣٧٠) عن يحيى بن مخلد المِقْسَمى، والحاكم ١/ ٤٠٦ من طريق محمد بن عبد الله بن عمار الموصلي، كلاهما عن المعافى بن عمران، بهذا الإسناد. قال الخطابي: هذا يتأول على وجهين: أحدهما: إنما أباح له اكتساب الخادم، والمسكن من عُمالته التي هي أجر مثله، وليس له أن يرتفق بشيء سواها، والوجه الآخر: أن للعامل السُّكنى والخدمة، فإن لم يكن له مسكن وخادم، استؤجر له من يخدمه، فيكفيه مهنة مثله، ويُكترى له مسكنٌ يسكنه مدة مقامه في عمله. وقال القاري في شرح "المشكاة" ٤/ ١٥٣: معنى "من كان لنا عاملاً فيكتسب مسكناً" أي: يحل له أن يأخذ مما في تصرفه من مال بيت المال قدر مهر زوجة ونفقتها وكسوتها، وكذلك مالا بد له من غير إسراف وتنعم، فإن أخذ أكثر مما يحتاج إليه ضرورة، فهو حرام عليه.









সুনান আবী দাউদ (2946)


حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، وَابْنُ أَبِي خَلَفٍ، - لَفْظُهُ - قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِي حُمَيْدٍ السَّاعِدِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اسْتَعْمَلَ رَجُلاً مِنَ الأَزْدِ يُقَالُ لَهُ ابْنُ اللُّتْبِيَّةِ - قَالَ ابْنُ السَّرْحِ ابْنُ الأُتْبِيَّةِ - عَلَى الصَّدَقَةِ فَجَاءَ فَقَالَ هَذَا لَكُمْ وَهَذَا أُهْدِيَ لِي ‏.‏ فَقَامَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَلَى الْمِنْبَرِ فَحَمِدَ اللَّهَ وَأَثْنَى عَلَيْهِ وَقَالَ ‏"‏ مَا بَالُ الْعَامِلِ نَبْعَثُهُ فَيَجِيءُ فَيَقُولُ هَذَا لَكُمْ وَهَذَا أُهْدِيَ لِي ‏.‏ أَلاَّ جَلَسَ فِي بَيْتِ أُمِّهِ أَوْ أَبِيهِ فَيَنْظُرَ أَيُهْدَى لَهُ أَمْ لاَ لاَ يَأْتِي أَحَدٌ مِنْكُمْ بِشَىْءٍ مِنْ ذَلِكَ إِلاَّ جَاءَ بِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنْ كَانَ بَعِيرًا فَلَهُ رُغَاءٌ أَوْ بَقَرَةً فَلَهَا خُوَارٌ أَوْ شَاةً تَيْعَرُ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ رَفَعَ يَدَيْهِ حَتَّى رَأَيْنَا عُفْرَةَ إِبْطَيْهِ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ اللَّهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ اللَّهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম আয্দ গোত্রের এক লোককে যাকাত আদায়কারী নিয়োগ করেন। তার নাম ইবনুল লুতবিয়্যাহ। তবে ইবনুস সারহ বলেছেন তার নাম ইবনুল উতবিয়্যাহ। সে কর্মস্থল হতে মাদীনাহ্‌তে প্রত্যাবর্তন করে রাসূলুল্লাহকে বললো, এগুলো আপনাদের, আর এগুলো আমাকে উপঢৌকন দেয়া হয়েছে। নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিম্বারে দাঁড়িয়ে আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করে বললেনঃ কর্মচারীর কি হলো! আমরা তাকে দায়িত্ব দিয়ে প্রেরণ করি। আর সে ফিরে এসে বলে, এটা আপনাদের আর এটা আমাকে হাদিয়া দেয়া হয়েছে। সে তার পিতা-মাতার ঘরে বসে থেকে দেখুক তাকে কেউ উপঢৌকন দেয় কিনা? তোমাদের মধ্যকার যে-ই এভাবে কোন কিছু গ্রহণ করবে সে তা নিয়ে ক্বিয়ামাতের দিন উপস্থিত হবে। যদি সেটা উট, গাভী কিংবা বকরী হয়, তা চিৎকার করবে। অতঃপর তিনি তাঁর দু’ হাত এতোটা উঁচু করেন যে, আমরা তার বগলের শুভ্রতা দেখলাম। তিনি বললেনঃ হে আল্লাহ! আমি কি পৌছে দিয়েছি, হে আল্লাহ! আমি কি পৌছে দিয়েছি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (7174) صحیح مسلم (1832)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوام، وسفيان: هو ابن عُيينة، وابن أبي خلف: هو محمد بن أحمد بن أبي خلف السُّلَمي، وابنُ السَّرح: هو أحمد ابن عمرو بن عبد الله بن عمرو بن السَّرح، أبو الطاهر، مشهور بكنيته. وأخرجه البخاري (٢٥٩٧) و (٦٦٣٦) و (٧١٧٤)، ومسلم (١٨٣٢) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه البخاري (١٥٠٠) و (٦٩٧٩) و (٧١٩٧)، ومسلم (١٨٣٢) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٥٩٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥١٥). الرغاء: صوت البعير، والخوار: صوت البقرة، وقوله: تيعر على وزن تسمع وتضرب، أي: تصيح وتصوت صوتاً شديداً. قال الخطابي: في هذا بيان أن هدايا العمال سُحْتٌ، وأنه ليس سبيلُها سبيلَ سائر الهدايا المباحةِ، وإنما يُهدَى إليه للمحاباة، وليخفف عن المُهدِي، ويُسوَّغ له بعض الواجب عليه. وهو خيانة منه، وبَخس للحق الواجب عليه استيفاؤه لأهله. وفي قوله: "ألا جلس في بيت أمه أو أبيه، فينظر أيُهدى إليه أم لا" دليل على أن كل أمر يُتذرع به إلى محظور فهو محظور، ويدخل في ذلك القرض يجر المنفعة، والدار المرهونة يسكنُها المرتهن بلا كراء، والدابة المرهونة يركبها ويرتفق بها من غير عوض. وفي معناه: من باع درهماً ورغيفاً بدرهمين، لأن معلوماً أنه إنما جعل الرغيف ذريعة إلى أن يربح فضل الدرهم الزائد، وكذلك كل تلجئة وكل دخيل في العقود يجري مجرى ما ذكرناه على معنى قوله: "هلا قعد في بيت أمه حتى ينظر أيُهدى إليه أم لا؟ " فينظر في الشيء وقرينه إذا أفرد أحدهما عن الآخر، وفرق بين قرانها: هل يكون حكمه عند الانفراد كحكمه عند الاقتران أم لا؟ والله أعلم. وقال ابن الأثير: "عُفْرة إبطيه" العُفْرة: بياض ليس بالناصع، ولكن كلون عَفَر الأرض، وهو وجهها. ومعنى قوله: "اللهم هل بلغت": المراد: - بلغت حكم الله إليكم امتثالاً لقوله تعالى له: ﴿بَلِّغْ﴾ وإشارة إلى ما يقع في القيامة من سؤال الأمم: هل بلغهم أنبِياؤهم ما أرسلوا به إليهم.









সুনান আবী দাউদ (2947)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ مُطَرِّفٍ، عَنْ أَبِي الْجَهْمِ، عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ الأَنْصَارِيِّ، قَالَ بَعَثَنِي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم سَاعِيًا ثُمَّ قَالَ ‏"‏ انْطَلِقْ أَبَا مَسْعُودٍ وَلاَ أُلْفِيَنَّكَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تَجِيءُ عَلَى ظَهْرِكَ بَعِيرٌ مِنْ إِبِلِ الصَّدَقَةِ لَهُ رُغَاءٌ قَدْ غَلَلْتَهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ إِذًا لاَ أَنْطَلِقُ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ إِذًا لاَ أُكْرِهُكَ ‏"‏ ‏.‏




আবূ মাস’ঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যাকাত আদায়ের জন্য নিয়োগ দিলেন। তিনি বললেনঃ আবু মাস’ঊদ যাও। তবে এমনটি যেন না হয় যে, ক্বিয়ামাতের দিন তুমি আত্নসাৎ করা যাকাতের উট পিঠে বহন করে উপস্হিত হবে আর তা চিৎকার করতে থাকবে। এমনটি হলে আমি তোমার কোন কাজে আসবো না। আবু মাস’ঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তবে আমি এ দায়িত্ব গ্রহন করবো না। তিনি বললেনঃ আমিও তোমাকে চাপ প্রয়োগ করবো না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، ولہ شاھد عند مسلم (1831)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الجهم -وهو سليمان بن الجهم الحارثي- وثقه يعقوب ابن سفيان والعجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ونقل ابن خلفون عن ابن عمير توثيقه، وأثنى عليه خيراً، مطرِّف -وهو ابن طريف-، جرير: هو ابن عبد الحميد. وقال المنذري في "مختصر السنن": حسنٌ. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ١٧/ (٦٨٨) و (٦٨٩) من طريق مطرف بن طريف، به.









সুনান আবী দাউদ (2948)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَمْزَةَ، حَدَّثَنِي ابْنُ أَبِي مَرْيَمَ، أَنَّ الْقَاسِمَ بْنَ مُخَيْمِرَةَ، أَخْبَرَهُ أَنَّ أَبَا مَرْيَمَ الأَزْدِيَّ أَخْبَرَهُ قَالَ دَخَلْتُ عَلَى مُعَاوِيَةَ فَقَالَ مَا أَنْعَمَنَا بِكَ أَبَا فُلاَنٍ ‏.‏ وَهِيَ كَلِمَةٌ تَقُولُهَا الْعَرَبُ فَقُلْتُ حَدِيثًا سَمِعْتُهُ أُخْبِرُكَ بِهِ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ مَنْ وَلاَّهُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ شَيْئًا مِنْ أَمْرِ الْمُسْلِمِينَ فَاحْتَجَبَ دُونَ حَاجَتِهِمْ وَخَلَّتِهِمْ وَفَقْرِهِمُ احْتَجَبَ اللَّهُ عَنْهُ دُونَ حَاجَتِهِ وَخَلَّتِهِ وَفَقْرِهِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَجَعَلَ رَجُلاً عَلَى حَوَائِجِ النَّاسِ ‏.‏




আবু মারইয়াম আল-আযদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট গেলে তিনি বলেন, হে অমুক, আমার নিকট তোমার আগমন সুস্বাগতম! এটা আরবদের বাকরীতি। আমি বললাম, আমি একটি হাদীস শুনেছি যা আপনাকে জানাবো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ মহান আল্লাহ কোন ব্যক্তিকে মুসলিমদের কোন দায়িত্বে নিয়োগ করলে যদি সে তাদের প্রয়োজন পূরণ ও অভাবের সময় দূরে আড়ালে থাকে তখন মহান আল্লাহও তার প্রয়োজন পূরণ ও অভাব-অনটন দূর করা হতে দূরে থাকবেন। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জনসাধারণের প্রয়োজন পূরণের জন্য এক ব্যক্তিকে নিয়োগ দিলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3728، 3729) ، أخرجہ الترمذي (1333 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو مريم الأزدي: اسمه عمرو بن مرة الجهني، كما جزم به البخاري في "التاريخ الكبير" ٦/ ٣٠٨، والترمذي بإثر (١٣٨٢)، والبغوي فيما نقله الحافظ في "الإصابة" في ترجمة أبي مريم الأزدي. وأخرجه الترمذي (١٣٨٢) من طريق يحيي بن حمزة، بهذا الإسناد. وانظر "مسند أحمد" (١٥٦٥١). وأخرجه بنحوه الترمذي (١٣٨١) من طريق أبي الحسن الجزري، عن عمرو بن مرة. وإسناده ضعيف لجهالة أبي حسن هذا، ولهذا قال الترمذي: غريب. وهو في "مسند أحمد" (١٨٠٣٣). قال الخطابي: قوله: ما أنعمنا بك، يريد ما جاءنا بك، أو ما أعملك إلينا، وأحسبه مأخوذاً من قوله: نَعَمْ ونِعمة عين، أي: قرة عين، وإنما يقال ذلك لمن يُعتَدُّ بزيارته ويُفرح بلقائه، كأنه يقول: ما الذي أطلعك علينا وحيانا بلقائك، ومن ذلك قوله: أنعم صباحاً، هذا أو ما أشبهه مِن الكلام، والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (2949)


حَدَّثَنَا سَلَمَةُ بْنُ شَبِيبٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ هَمَّامِ بْنِ مُنَبِّهٍ، قَالَ هَذَا مَا حَدَّثَنَا بِهِ أَبُو هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَا أُوتِيكُمْ مِنْ شَىْءٍ وَمَا أَمْنَعُكُمُوهُ إِنْ أَنَا إِلاَّ خَازِنٌ أَضَعُ حَيْثُ أُمِرْتُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আমি তোমাদেরকে আমার ইচ্ছামত কোন জিনিস দেই না এবং আমার ইচ্ছামত তোমাদেরকে তা থেকে বঞ্চিত করি না। আমি তো কেবল কোষাধ্যক্ষ বা বন্টনকারী। আমাকে যেখানে ব্যয়ের নির্দেশ দেয়া হয় সেখানেই ব্যয় করি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وھو في صحیفۃ ھمام بن منبہ (43)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. معمر: هو ابن راشد، وعبد الرزاق: هو ابن همام. وأخرجه أحمد (٨١٥٥). والبغوي في "شرح السنة" (٢٧١٩) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٣١١٧) من طريق عبد الرحمن بن أبي عمرة، عن أبي هريرة، أن رسول الله ﷺ قال: "ما أُعطيكم ولا أمنعكم، إنما أنا قاسم، أضع حيث أُمِرتُ".









সুনান আবী দাউদ (2950)


حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرِو بْنِ عَطَاءٍ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسِ بْنِ الْحَدَثَانِ، قَالَ ذَكَرَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ يَوْمًا الْفَىْءَ فَقَالَ مَا أَنَا بِأَحَقَّ، بِهَذَا الْفَىْءِ مِنْكُمْ وَمَا أَحَدٌ مِنَّا بِأَحَقَّ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلاَّ أَنَّا عَلَى مَنَازِلِنَا مِنْ كِتَابِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ وَقَسْمِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَالرَّجُلُ وَقِدَمُهُ وَالرَّجُلُ وَبَلاَؤُهُ وَالرَّجُلُ وَعِيَالُهُ وَالرَّجُلُ وَحَاجَتُهُ ‏.‏




মালিক ইবনু আওস ইবনুল হাদাসান (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাই সম্পর্কে আলোচনা করতে গিয়ে বলেন, ফাই প্রাপ্তির বিষয়ে আমি তোমাদের চাইতে অগ্রাধিকারী নই এবং এ বিষয়ে আমাদের কেউই কারোর চাইতে অগ্রাধিকারী নয়। বরং মহান আল্লাহর কিতাব ও তার রাসূলের পদ্ধতি মোতাবেক আমরা নিজ নিজ অবস্থানে রয়েছি। সুতরাং ব্যক্তি ও তার প্রাচীনত্ব, ব্যক্তি ও তার বীরত্ব, ব্যক্তি ও তার সন্তান এবং ব্যক্তি ও তার প্রয়োজন এসব বিবেচনা করে তা বন্টন হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن موقوف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 107)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن، وهذا إسناد فيه عنعنة محمد بن إسحاق -وهو مدلس- لكنه متابع. وأخرجه أحمد (٢٩٢)، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (٩٤٧)، والبيهقي ٦/ ٣٤٦ - ٣٤٧، والضياء المقدسي في "المختارة" (٢٧٧) من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (١٢٩٠) من طريق هشام" بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن مالك بن أوس، به، وهذا إسناد حسن في المتابعات، هشام بن سعد يعتبر به في المتابعات والشواهد. وأخرج الشافعي في "مسنده" ٢/ ١٢٧، ومن طريقه البيهقي ٦/ ٣٤٧ من طريق عمرو بن دينار عن الزهري، عن مالك بن أوس أن عمر بن الخطاب قال: ما أحدٌ إلا وله في هذا المال حق، أُعطيَه أو مُنِعَه، إلا ما ملكت أيمانكم.









সুনান আবী দাউদ (2951)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ زَيْدِ بْنِ أَبِي الزَّرْقَاءِ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ، دَخَلَ عَلَى مُعَاوِيَةَ فَقَالَ حَاجَتُكَ يَا أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ فَقَالَ عَطَاءُ الْمُحَرَّرِينَ فَإِنِّي رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَوَّلَ مَا جَاءَهُ شَىْءٌ بَدَأَ بِالْمُحَرَّرِينَ ‏.‏




যায়িদ ইবনু আসলাম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট উপস্থিত হলেন। মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আবূ ‘আবদুর রহমান! আপনার প্রয়োজন বলুন। তিনি বললেন, আযাদকৃত গোলামদের ভাগ প্রদানের ব্যবস্থা করুন। কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তাঁর কাছে ফাইলব্ধ সম্পদ এলে প্রথমে আযাদকৃত গোলামদের অংশ দিতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4058)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد قد اختلف فيه عن هشام بن سعد -وهو ضعيف يعتبر به- كما سيأتي. فقد رواه زيد بن أبي الزرقاء كما عند المصنف، عنه عن زيد بن أسلم، أن عبد الله بن عمر. وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى" (١١١٤)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٢٧٤) من طريق عبد الله بن نافع الصائغ، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، أن معاوية لما قدم حاجاً جاءه عبد الله بن عمر … فزاد في الإسناد أسلم مولى ابن عمر، وعبد الله بن نافع فيه كلام، وهو صدوق حسن الحديث. وأخرجه الطحاوي (٤٢٧٥) من طريق خالد بن مخلد القطواني، عن أسامة بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن ابن عمر أنه قال لمعاوية. وأسامة بن زيد ضعيف الحديث، وفى خالد القطواني كلام. وأخرجه الطحاوي (٤٢٧٦) من طريق أبي عتاب زيد بن أبي عتاب: أن معاوية عام حج، قال عبد الله بن عمر … وإسناده حسن. قال الخطابي: يريد بالمحررين المعتَقِين، وذلك أنهم قوم لا ديوان لهم. وإنما يدخلون تبعاً في جملة مواليهم. وكان الديوان موضوعاً على تقديم بنى هاشم، ثم الذين يلونهم في القرابة والسابقة. وكان هؤلاء مؤخرين في الذكر، فأذكر بهم عبد الله بن عمر، وتشفع في تقديم أُعطيتهم، لما علم من ضعفهم وحاجتهم. ووجدنا الفيء مقسوماً لكافة المسلمين، على ما دلت عليه الأخبار، إلا من استثني منهم من أعراب الصدقة. وقال الخطابي: وقال أحمد وإسحاق: الفيء للغني والفقير إلا العبيد. واحتج أحمد في ذلك بأن النبي ﷺ أعطى العباس من مال البحرين، والعباس ﵁ غني، والمشهور عن أبي بكر الصديق ﵁: أنه سوى بين الناس، ولم يفضل بالسابقة، وأعطى الأحرار والعبيد. وعن عمر رضى الله عنه: أنه فضّل بالسابقة والقدم، وأسقط العبيد. ثم رد على بن أبي طالب ﵁ الأمر إلى التسوية بعد. ومال الشافعي إلى التسوية، وشبهه بقسم المواريث.









সুনান আবী দাউদ (2952)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، أَخْبَرَنَا عِيسَى، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي ذِئْبٍ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ عَبَّاسٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نِيَارٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عَنْهَا أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أُتِيَ بِظَبْيَةٍ فِيهَا خَرَزٌ فَقَسَمَهَا لِلْحُرَّةِ وَالأَمَةِ ‏.‏ قَالَتْ عَائِشَةُ كَانَ أَبِي رضى الله عنه يَقْسِمُ لِلْحُرِّ وَالْعَبْدِ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট একটি আংটির থলে আনা হলে তিনি দাসত্বমুক্ত নারী ও বাঁদীদের মধ্যে তা বন্টন করেন। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার পিতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাসত্বমুক্ত পুরুষ লোক ও ক্রীতদাসদের মাঝে ফাই বণ্টন করে দিতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4059)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة بن الحارث، وعيسى: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السبيعي. وأخرجه الطيالسي (١٤٣٥)، وابن أبي شيبة ١٢/ ٤٠٩ - ٤١٠، وإسحاق بن راهوية (٧٥٨)، وأحمد (٢٥٢٢٩)، وأبو يعلى (٤٩٢٣)، والبيهقي ٦/ ٣٤٧ و ٣٤٨ من طريق ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. قال ابن الأثير: الظَّبْية. هي جراب صغير عليه شعر، وقيل: هي شبه الخريطة والكيس.









সুনান আবী দাউদ (2953)


حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ، ح وَحَدَّثَنَا ابْنُ الْمُصَفَّى، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو الْمُغِيرَةِ، جَمِيعًا عَنْ صَفْوَانَ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ جُبَيْرِ بْنِ نُفَيْرٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَوْفِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا أَتَاهُ الْفَىْءُ قَسَمَهُ فِي يَوْمِهِ فَأَعْطَى الآهِلَ حَظَّيْنِ وَأَعْطَى الْعَزَبَ حَظًّا ‏.‏ زَادَ ابْنُ الْمُصَفَّى فَدُعِينَا وَكُنْتُ أُدْعَى قَبْلَ عَمَّارٍ فَدُعِيتُ فَأَعْطَانِي حَظَّيْنِ وَكَانَ لِي أَهْلٌ ثُمَّ دُعِيَ بَعْدِي عَمَّارُ بْنُ يَاسِرٍ فَأَعْطَى لَهُ حَظًّا وَاحِدًا ‏.‏




আওফ ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে ফাইলব্ধ সম্পদ আসতো তিনি ঐদিনই তা বন্টন করতেন। তিনি বিবাহিতদের দু’ভাগ এবং অবিবাহিতদের এক ভাগ দিতেন। ইবনুল মুসাফফারের বর্ণনায় রয়েছে, আমাদেরকে ডাকা হলো, আর আমাকে ‘আম্মারের পূর্বে ডাকা হলো। আমাকে ডেকে তিনি দুই ভাগ দিলেন। কেননা আমার পরিবার ছিল। আমার পর ‘আম্মার ইবনু ইয়াসিরের ডাক ডাকা হলো। (অবিবাহিত বলে) তাকে এক ভাগ দেয়া হলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4057)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. صفوان بن عمرو: هو ابن هَرِم السَّكْسَكي، وأبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجَّاج الخولاني، وابن المصفى: هو محمد بن المصفى الحمصي. وهو في "سنن سعيد بن منصور" (٢٣٥٦). وأخرجه أبو عبيد في "الأموال" (٥٩٩)، وابن أبي شيبة ١٢/ ٣٤٨، وأحمد (٢٣٩٨٦)، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (٨٧٩)، والبزار (٢٧٤٨)، وابن الجارود (١١١٢)، وابن حبان (٤٨١٦)، والطبراني في "الكبير" ١٨/ (٨٠) و (٨١)، وفي "مسند الشاميين"، (٩٤٦) و (٩٤٧)، والحاكم ٢/ ١٤٠ - ١٤١، والبيهقي ٦/ ٣٤٦ من طريق صفوان بن عمرو، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني ١٨/ (٨٢) من طريق معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير، بنحوه.









সুনান আবী দাউদ (2954)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ جَعْفَرٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ أَنَا أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ مَنْ تَرَكَ مَالاً فَلأَهْلِهِ وَمَنْ تَرَكَ دَيْنًا أَوْ ضَيَاعًا فَإِلَىَّ وَعَلَىَّ ‏"‏ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেনঃ আমি মুমিনদের পক্ষে তাদের নিজেদের চেয়ে অধিক নিকটবর্তী। কেউ সম্পদ রেখে গেলে তা তার পরিজনের জন্য। কেউ ঋন অথবা পোষ্য রেখে গেলে তার দায়দায়িত্ব আমার উপর।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، رواہ مسلم (867)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. جعفر: هو الصادق، ابن محمد بن علي الباقر، وسفيان: هو الثوري. وأخرجه مسلم (٨٦٧)، وابن ماجه (٤٥) و (٢٤١٦)، والنسائي (١٥٧٨) من طريق جعفربن محمد، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٣٤)، و"صحيح ابن حبان" (١٠) و (٣٠٦٢). وسيأتى من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن جابر برقم (٢٩٥٦) و (٣٣٤٣). قال الخطابي: هذا فيمن ترك ديناً لا وفاء له في ماله، فإنه يمضى دَينهِ من الفيء، فأما من ترك وفاءً، فإن دَينه مقضي عنه، ثم بقية ماله بعد ذلك مقسومة بين ورثته. و"الضياع": اسم لكل ما هو بعرض أن يضيع، إن لم يُتَعهَّد، كالذرية الصغار والأطفال والزَّمْنى، الذين لا يقومون بكلِّ أنفسهم، وسائر من يدخل في معناهم. وكان الشافعي يقول: ينبغي للإمام أن يحصي جميع مَن في البلدان من المقاتلة، وهم مَن قد احتلم، أو استكمل خمس عشرة سنة من الرجال، ويحصي الذرية، وهم مَن دون المحتلِم ودون البالغ، والنساء صغيرتهن وكبيرتهن، ويعرف قدر نفقاتهم وما يحتاجون إليه في مؤناتهم بقدر معايش مثلهم في بلدانهم. ثم يعطي المقاتلة في كل عام عطاءهم. والعطاء الواجب من الفيء لا يكون إلا لبالغ يطيق مثلُه الجهاد، ثم تُعطَى الذريةُ والنساءُ ما يكفيهم لسَنَتِهم قي كسوتهم ونفقتهم. قال: ولم يختلف أحد لقيناه في أن ليس للمماليك في العطاء حقٌ، ولا للأعراب الذين هم أهل الصدقة. قال: وإن فضل من المال فَضْل -بعدما وصفتُ- وضعه الإمام في إصلاح الحصون، والازدياد في الكُراع، وكلِّ ما يَقوى به المسلمون. فإن استغنى المسلمون وكملت كل مصلحة لهم، فرَّق ما يبقى منه بينهم كلَّه على قدر ما يستحقون في ذلك المال. قال: ويُعطى من الفيء رزقُ الحكام، وولاةُ الأحداث والصلاة بأهل الفيء، وكلُّ مَن قام بأمر الفيء من والٍ وكاتب وجندي مما لا غنى لأهل الفيء عنه -رزق مثلِه.









সুনান আবী দাউদ (2955)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ تَرَكَ مَالاً فَلِوَرَثَتِهِ وَمَنْ تَرَكَ كَلاًّ فَإِلَيْنَا ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কেউ সম্পদ রেখে গেলে সেটা তার ওয়ারিসদের জন্য। আর কেউ অসহায় সন্তান রেখে গেলে তা আমার যিম্মায়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6763) صحیح مسلم (1619)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو حازم: هو سَلمان الأشجعي، وحفص بن عمر: هو ابن الحارث بن سَخبرة الأزدي الحوضي. وأخرجه البخاري (٢٣٩٨) و (٦٧٦٣)، ومسلم (١٦١٩) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢٢٩٨) و (٢٣٩٩) و (٤٧٨١) و (٥٣٧١) و (٦٧٣١) و (٦٧٤٥) ومسلم (١٦١٩)، وابنُ ماجه (٢٤١٥)، والترمذي (٢٢١٩)، والنسائي (١٩٦٣) من طرق عن أبى هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٨٦١) و (٩٨٧٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠٦٣) و (٤٨٥٤) و (٥٠٥٤). وقوله: كَلًّا. هو بفتح أوله، أصله: الثقل، والمراد به هنا: العيال.









সুনান আবী দাউদ (2956)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقُولُ ‏ "‏ أَنَا أَوْلَى بِكُلِّ مُؤْمِنٍ مِنْ نَفْسِهِ فَأَيُّمَا رَجُلٍ مَاتَ وَتَرَكَ دَيْنًا فَإِلَىَّ وَمَنْ تَرَكَ مَالاً فَلِوَرَثَتِهِ ‏"‏ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেনঃ আমি প্রত্যেক মুমিনের পক্ষে তার নিজের চেয়েও অধিক নিকটবর্তী। কেউ ঋন রেখে মারা গেলে তা পরিশোধের দায়িত্ব আমার। আর কেউ সম্পদ রেখে গেলে তা তার ওয়ারিসদের জন্য।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شواھد منھا الحدیث السابق (2954)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وقد روى هذا الحديث غيرُ معمر -وهو ابن راشد- كعُقيل بن خالد ويونس بن يزيد الأيليّان، وابن أبي ذئب، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة عند البخاري (٥٣٧١) و (٦٧٣١)، ومسلم (١٦١٩)، والنسائي (١٩٦٣) وغيرهم. ومثل هذا الاختلاف لا يضر في صحة الحديث، لاحتمال أن يكون أبو سلمة سمعه من كليهما؛ إذ كان واسعَ الرواية، وعلى فرض وهم معمر أو عبد الرزاق في تسمية الصحابي، فإن الصحابة كلَّهم عدولٌ. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٥٢٥٧). وأخرجه النسائى (١٩٦٢) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٥٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠٦٤). وسيتكرر عند المصنف برقم (٣٣٤٣) بأطول مما هنا. وقد سلف بإسناد آخر صحيح برقم (٢٩٥٤).









সুনান আবী দাউদ (2957)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، أَخْبَرَنِي نَافِعٌ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عُرِضَهُ يَوْمَ أُحُدٍ وَهُوَ ابْنُ أَرْبَعَ عَشْرَةَ فَلَمْ يُجِزْهُ وَعُرِضَهُ يَوْمَ الْخَنْدَقِ وَهُوَ ابْنُ خَمْسَ عَشْرَةَ سَنَةً فَأَجَازَهُ ‏.




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তাকে উহুদ যুদ্ধের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সম্মুখে উপস্থিত করা হলো। তখন তার বয়স চৌদ্দ বছর। তিনি তাকে যুদ্ধে অংশ গ্রহণের অনুমতি দেননি। অতঃপর খন্দকের যুদ্ধের সময় পনের বছর বয়সে তাকে আবারো তাঁর সামনে পেশ করা হলে তিনি তাকে অনুমতি দিলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4097)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هو ابن عمر العُمري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (٢٦٦٤) و (٤٠٩٧)، ومسلم (١٨٦٨)، وابن ماجه (٢٥٤٣)، والترمذي (١٤١١) و (١٨٠٧)، والنسائي (٣٤٣١) من طرق عن عبيد الله بن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٦١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٢٧) و (٤٧٢٨). وسيتكرر عند المصنف برقم (٤٤٠٦) و (٤٤٠٧).









সুনান আবী দাউদ (2958)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي الْحَوَارِيِّ، حَدَّثَنَا سُلَيْمُ بْنُ مُطَيْرٍ، - شَيْخٌ مِنْ أَهْلِ وَادِي الْقُرَى - قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي مُطَيْرٌ أَنَّهُ خَرَجَ حَاجًّا حَتَّى إِذَا كَانَ بِالسُّوَيْدَاءِ إِذَا أَنَا بِرَجُلٍ قَدْ جَاءَ كَأَنَّهُ يَطْلُبُ دَوَاءً وَحُضُضًا فَقَالَ أَخْبَرَنِي مَنْ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ وَهُوَ يَعِظُ النَّاسَ وَيَأْمُرُهُمْ وَيَنْهَاهُمْ فَقَالَ ‏ "‏ يَا أَيُّهَا النَّاسُ خُذُوا الْعَطَاءَ مَا كَانَ عَطَاءً فَإِذَا تَجَاحَفَتْ قُرَيْشٌ عَلَى الْمُلْكِ وَكَانَ عَنْ دِينِ أَحَدِكُمْ فَدَعُوهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ ابْنُ الْمُبَارَكِ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ يَسَارٍ عَنْ سُلَيْمِ بْنِ مُطَيْرٍ ‏.‏




সুলাইম ইবনু মুতাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার কাছে আমার পিতা মুতাইর আলোচনা করেছেন যে, তিনি হাজ্জের উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলেন। তিনি আস-সুয়াইদাহ নামক জায়গাতে পৌছলে এক লোক ঔষধের খোঁজে তার কাছে এলো। সে বললো, আমাকে এমন এক ব্যক্তি অবহিত করেছেন, যিনি বিদায় হাজ্জে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে শুনেছেন। এ সময় তিনি লোকদের সমাবেশ নসীহত করছিলেন। তিনি তাদেরকে সৎ কাজের আদেশ এবং অসৎ কাজে নিষেধ করছিলেন। তিনি বলেছিলেনঃ হে জনগণ! উপঢৌকন যদি উপঢৌকনের পর্যায়ে থাকে তবেই তা গ্রহন করো। যখন কুরাইশরা রাষ্ট্রীয় ক্ষমতা দখল নিয়ে মতবিরোধে লিপ্ত হবে, তখন দান কর্জে পরিণত হবে, কাজেই তোমরা তা পরিত্যাগ করবে।



দুর্বলঃ তাখরীজ মুশকিলাতুল ফিক্বর (৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سلیم بن مطیر: لین الحدیث وأبوہ مجہول الحال(تق: 2529،6715) ، والرجل مجہول ، (انوار الصحیفہ ص 107)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف سُلَيم بن مُطَير، وجهالة حال أبيه، وقال البخاري فيما نقله العقيلي في "الضعفاء" ٤/ ٢٥٠: لا يثبت حديثه. وقد اختُلف عنه، فمرة روي عنه، عن رجل، عمن سمع رسول الله ﷺ كما في هذه الرواية، ومرة روي عنه عن رجل سمع رسول الله ﷺ، يعني بإسقاط الرجل المبهم كما في الرواية التالية. وقال المزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة ذي الزوائد ٨/ ٥٢٩ عن الرواية المزيدة: وهو الصواب. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء"١٠/ ٢٧، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ٣٥٩ من طريق أحمد بن أبي الحواري، بهذا الإسناد. وأخرجه ابنُ أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٦٥٧)، والطبراني في "الكبير" (٤٢٣٩)، وابن عدي في "الكامل" في ترجمة مطير، والبيهقي ٦/ ٣٥٩، وابن الأثير في "أسد الغابه" في ترجمة ذي الزوائد الجهني، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة ذي الزوائد ٨/ ٥٢٨، من طريق هشام بن عمار، وابن أبي عاصم (٢٦٤٦) من طريق زياد بن نصر، والبخاري في "تاريخه الكبير"١/ ٢٣٥ من طريق أمة الرحمن بنت محمد بن مطير العذرية، ثلاثتهم عن سليم بن مطير، عن أبيه، عن ذي الزوائد -وقال زياد وأمة الرحمن: أبو الزوائد- فأسقطوا من إسناده الرجل المبهم. وقرنت أمةُ الرحمن بعمها أباها محمداً. وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" معلقاً ٣/ ٢٦٥، والحسن بن سفيان في "مسنده" كما في "تهذيب الكمال" في ترجمة ذي الزوائد ٨/ ٥٢٩، عن هشام بن عمار، عن سلِيم، عن أبيه، عن رجل، عن ذي الزوائد. قال المزي: وهو الصواب، قلنا: فوافق رواية أحمد بن أبي الحواري. وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "تجاحفت" يريد: تنازعت الملك حتى تقاتلت عليه، وأجحف بعضها ببعض.









সুনান আবী দাউদ (2959)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا سُلَيْمُ بْنُ مُطَيْرٍ، - مِنْ أَهْلِ وَادِي الْقُرَى - عَنْ أَبِيهِ، أَنَّهُ حَدَّثَهُ قَالَ سَمِعْتُ رَجُلاً، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ فَأَمَرَ النَّاسَ وَنَهَاهُمْ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ اللَّهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا اللَّهُمَّ نَعَمْ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ إِذَا تَجَاحَفَتْ قُرَيْشٌ عَلَى الْمُلْكِ فِيمَا بَيْنَهَا وَعَادَ الْعَطَاءُ أَوْ كَانَ رُشًا فَدَعُوهُ ‏"‏ ‏.‏ فَقِيلَ مَنْ هَذَا قَالُوا هَذَا ذُو الزَّوَائِدِ صَاحِبُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




সুলাইম ইবনু মুতাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এক ব্যক্তিকে বলতে শুনেছি, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হাজ্জের ভাষণে বলতে শুনেছিঃ তিনি লোকদেরকে সৎ কাজের আদেশ এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করার পর বললেনঃ হে আল্লাহ! আমি কি পৌছে দিয়েছি? লোকেরা বলল, হে আল্লাহ! হ্যাঁ (তিনি পৌছে দিয়েছেন)। অতঃপর তিনি বললেনঃ কুরাইশরা যখন রাষ্ট্রীয় ক্ষমতা দখল নিয়ে অন্তর্দ্বন্দ্বে লিপ্ত হবে এবং উপঢৌকন ঘুষে পরিণত হবে তখন তোমরা এ জাতীয় উপঢৌকন গ্রহণ করবে না। বলা হলো, কে এ ব্যক্তি? লোকেরা বললো, ইনি রাসূলুল্লাহ্‌র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবী যুল-যাইয়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।



দুর্বলঃ তাখরীজ মুশকিলাতুল ফিক্বর(৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (2958) ، (انوار الصحیفہ ص 107)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف كسابقه، وانظر تخريجه هناك. وقوله: "وعاد العطاء رشاً" هو أن يُصرف عن المستحقين، ويُعطَى من له الجاه والمنزلة.









সুনান আবী দাউদ (2960)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ، - يَعْنِي ابْنَ سَعْدٍ - حَدَّثَنَا ابْنُ شِهَابٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ الأَنْصَارِيِّ، أَنَّ جَيْشًا، مِنَ الأَنْصَارِ كَانُوا بِأَرْضِ فَارِسَ مَعَ أَمِيرِهِمْ وَكَانَ عُمَرُ يُعْقِبُ الْجُيُوشَ فِي كُلِّ عَامٍ فَشُغِلَ عَنْهُمْ عُمَرُ فَلَمَّا مَرَّ الأَجَلُ قَفَلَ أَهْلُ ذَلِكَ الثَّغْرِ فَاشْتَدَّ عَلَيْهِمْ وَتَوَاعَدَهُمْ وَهُمْ أَصْحَابُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالُوا يَا عُمَرُ إِنَّكَ غَفَلْتَ عَنَّا وَتَرَكْتَ فِينَا الَّذِي أَمَرَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ إِعْقَابِ بَعْضِ الْغَزِيَّةِ بَعْضًا ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু কা’ব ইবনু মালিক আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা আনসারদের সমন্বয়ে গঠিত যোদ্ধাদল তাদের দলনেতার সাথে পারস্যে অবস্থান করছিলো। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি বছর সেনাবাহিনী স্থানান্তর করতেন। একবার তিনি কোন কাজে ব্যস্ত থাকার কারণে স্থানান্তরের পদক্ষেপ নিতে পারেননি। সময় অতিবাহিত হওয়ায় সীমান্তের সেনাদল ফিরে আসে। এতে ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের প্রতি কঠোর মনোভাব প্রদর্শন করে তাদেরকে ধমকালেন। অথচ তারা সবাই রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম সাহাবী ছিলেন। তারা বললেন, হে ‘উমার! আপনি আমাদের ব্যাপারে উদাসীন হয়ে পড়েছেন। আপনি আমাদের বিষয়ে রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম অনুসৃত নীতি পরিহার করেছেন। রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম নির্দেশ হলোঃ এক বাহিনীর পিছনে অপর বাহিনী প্রেরণ এবং পরবর্তী বাহিনীর তদস্থলে অবস্থান গ্রহণ।



সানাদ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، ابن شھاب الزھري صرح بالسماع عند ابن الجارود (1095)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح إن كان عبد الله بن كعب سمعه من أولئك الأنصار -وهو الذي يغلب على الظن- ولا يُنكَر إدراكه لعمر بن الخطاب، بل إنه على قول من قال: له رؤية، مُدرك لا محالة، والله تعالى أعلم. وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى (١٠٩٥)، والبيهقي ٩/ ٢٩ من طريق إبراهيم ابن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق (٩٦٥١) عن معمر، عن الزهري قال: بعث عمر جيشاً … فذكره مرسلاً. قال الخطابي: الإعقاب: أن يبعث الإمام في أثر المقيمين في الثغر جيشاً يقيمون مكانهم وينصرف أولئك، فإنه إذا طالت عليهم الغيبة والغزية تضرروا به، وأضر ذلك بأهليهم، وقد قال عمر ﵁ في بعض كلامه "لا تجمروا الجيوش فتفتنوهم" يريد: لا تطيلوا حبسهم في الثغور.