সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ تَرَكَ مَالاً فَلِوَرَثَتِهِ وَمَنْ تَرَكَ كَلاًّ فَإِلَيْنَا " .
আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কেউ সম্পদ রেখে গেলে সেটা তার ওয়ারিসদের জন্য। আর কেউ অসহায় সন্তান রেখে গেলে তা আমার যিম্মায়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6763) صحیح مسلم (1619)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو حازم: هو سَلمان الأشجعي، وحفص بن عمر: هو ابن الحارث بن سَخبرة الأزدي الحوضي. وأخرجه البخاري (٢٣٩٨) و (٦٧٦٣)، ومسلم (١٦١٩) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢٢٩٨) و (٢٣٩٩) و (٤٧٨١) و (٥٣٧١) و (٦٧٣١) و (٦٧٤٥) ومسلم (١٦١٩)، وابنُ ماجه (٢٤١٥)، والترمذي (٢٢١٩)، والنسائي (١٩٦٣) من طرق عن أبى هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٨٦١) و (٩٨٧٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠٦٣) و (٤٨٥٤) و (٥٠٥٤). وقوله: كَلًّا. هو بفتح أوله، أصله: الثقل، والمراد به هنا: العيال.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقُولُ " أَنَا أَوْلَى بِكُلِّ مُؤْمِنٍ مِنْ نَفْسِهِ فَأَيُّمَا رَجُلٍ مَاتَ وَتَرَكَ دَيْنًا فَإِلَىَّ وَمَنْ تَرَكَ مَالاً فَلِوَرَثَتِهِ " .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেনঃ আমি প্রত্যেক মুমিনের পক্ষে তার নিজের চেয়েও অধিক নিকটবর্তী। কেউ ঋন রেখে মারা গেলে তা পরিশোধের দায়িত্ব আমার। আর কেউ সম্পদ রেখে গেলে তা তার ওয়ারিসদের জন্য।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شواھد منھا الحدیث السابق (2954)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وقد روى هذا الحديث غيرُ معمر -وهو ابن راشد- كعُقيل بن خالد ويونس بن يزيد الأيليّان، وابن أبي ذئب، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة عند البخاري (٥٣٧١) و (٦٧٣١)، ومسلم (١٦١٩)، والنسائي (١٩٦٣) وغيرهم. ومثل هذا الاختلاف لا يضر في صحة الحديث، لاحتمال أن يكون أبو سلمة سمعه من كليهما؛ إذ كان واسعَ الرواية، وعلى فرض وهم معمر أو عبد الرزاق في تسمية الصحابي، فإن الصحابة كلَّهم عدولٌ. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٥٢٥٧). وأخرجه النسائى (١٩٦٢) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٥٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠٦٤). وسيتكرر عند المصنف برقم (٣٣٤٣) بأطول مما هنا. وقد سلف بإسناد آخر صحيح برقم (٢٩٥٤).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، أَخْبَرَنِي نَافِعٌ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عُرِضَهُ يَوْمَ أُحُدٍ وَهُوَ ابْنُ أَرْبَعَ عَشْرَةَ فَلَمْ يُجِزْهُ وَعُرِضَهُ يَوْمَ الْخَنْدَقِ وَهُوَ ابْنُ خَمْسَ عَشْرَةَ سَنَةً فَأَجَازَهُ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তাকে উহুদ যুদ্ধের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সম্মুখে উপস্থিত করা হলো। তখন তার বয়স চৌদ্দ বছর। তিনি তাকে যুদ্ধে অংশ গ্রহণের অনুমতি দেননি। অতঃপর খন্দকের যুদ্ধের সময় পনের বছর বয়সে তাকে আবারো তাঁর সামনে পেশ করা হলে তিনি তাকে অনুমতি দিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4097)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هو ابن عمر العُمري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (٢٦٦٤) و (٤٠٩٧)، ومسلم (١٨٦٨)، وابن ماجه (٢٥٤٣)، والترمذي (١٤١١) و (١٨٠٧)، والنسائي (٣٤٣١) من طرق عن عبيد الله بن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٦١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٢٧) و (٤٧٢٨). وسيتكرر عند المصنف برقم (٤٤٠٦) و (٤٤٠٧).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي الْحَوَارِيِّ، حَدَّثَنَا سُلَيْمُ بْنُ مُطَيْرٍ، - شَيْخٌ مِنْ أَهْلِ وَادِي الْقُرَى - قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي مُطَيْرٌ أَنَّهُ خَرَجَ حَاجًّا حَتَّى إِذَا كَانَ بِالسُّوَيْدَاءِ إِذَا أَنَا بِرَجُلٍ قَدْ جَاءَ كَأَنَّهُ يَطْلُبُ دَوَاءً وَحُضُضًا فَقَالَ أَخْبَرَنِي مَنْ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ وَهُوَ يَعِظُ النَّاسَ وَيَأْمُرُهُمْ وَيَنْهَاهُمْ فَقَالَ " يَا أَيُّهَا النَّاسُ خُذُوا الْعَطَاءَ مَا كَانَ عَطَاءً فَإِذَا تَجَاحَفَتْ قُرَيْشٌ عَلَى الْمُلْكِ وَكَانَ عَنْ دِينِ أَحَدِكُمْ فَدَعُوهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ ابْنُ الْمُبَارَكِ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ يَسَارٍ عَنْ سُلَيْمِ بْنِ مُطَيْرٍ .
সুলাইম ইবনু মুতাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার কাছে আমার পিতা মুতাইর আলোচনা করেছেন যে, তিনি হাজ্জের উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলেন। তিনি আস-সুয়াইদাহ নামক জায়গাতে পৌছলে এক লোক ঔষধের খোঁজে তার কাছে এলো। সে বললো, আমাকে এমন এক ব্যক্তি অবহিত করেছেন, যিনি বিদায় হাজ্জে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে শুনেছেন। এ সময় তিনি লোকদের সমাবেশ নসীহত করছিলেন। তিনি তাদেরকে সৎ কাজের আদেশ এবং অসৎ কাজে নিষেধ করছিলেন। তিনি বলেছিলেনঃ হে জনগণ! উপঢৌকন যদি উপঢৌকনের পর্যায়ে থাকে তবেই তা গ্রহন করো। যখন কুরাইশরা রাষ্ট্রীয় ক্ষমতা দখল নিয়ে মতবিরোধে লিপ্ত হবে, তখন দান কর্জে পরিণত হবে, কাজেই তোমরা তা পরিত্যাগ করবে।
দুর্বলঃ তাখরীজ মুশকিলাতুল ফিক্বর (৫)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سلیم بن مطیر: لین الحدیث وأبوہ مجہول الحال(تق: 2529،6715) ، والرجل مجہول ، (انوار الصحیفہ ص 107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف سُلَيم بن مُطَير، وجهالة حال أبيه، وقال البخاري فيما نقله العقيلي في "الضعفاء" ٤/ ٢٥٠: لا يثبت حديثه. وقد اختُلف عنه، فمرة روي عنه، عن رجل، عمن سمع رسول الله ﷺ كما في هذه الرواية، ومرة روي عنه عن رجل سمع رسول الله ﷺ، يعني بإسقاط الرجل المبهم كما في الرواية التالية. وقال المزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة ذي الزوائد ٨/ ٥٢٩ عن الرواية المزيدة: وهو الصواب. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء"١٠/ ٢٧، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ٣٥٩ من طريق أحمد بن أبي الحواري، بهذا الإسناد. وأخرجه ابنُ أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٦٥٧)، والطبراني في "الكبير" (٤٢٣٩)، وابن عدي في "الكامل" في ترجمة مطير، والبيهقي ٦/ ٣٥٩، وابن الأثير في "أسد الغابه" في ترجمة ذي الزوائد الجهني، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة ذي الزوائد ٨/ ٥٢٨، من طريق هشام بن عمار، وابن أبي عاصم (٢٦٤٦) من طريق زياد بن نصر، والبخاري في "تاريخه الكبير"١/ ٢٣٥ من طريق أمة الرحمن بنت محمد بن مطير العذرية، ثلاثتهم عن سليم بن مطير، عن أبيه، عن ذي الزوائد -وقال زياد وأمة الرحمن: أبو الزوائد- فأسقطوا من إسناده الرجل المبهم. وقرنت أمةُ الرحمن بعمها أباها محمداً. وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" معلقاً ٣/ ٢٦٥، والحسن بن سفيان في "مسنده" كما في "تهذيب الكمال" في ترجمة ذي الزوائد ٨/ ٥٢٩، عن هشام بن عمار، عن سلِيم، عن أبيه، عن رجل، عن ذي الزوائد. قال المزي: وهو الصواب، قلنا: فوافق رواية أحمد بن أبي الحواري. وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "تجاحفت" يريد: تنازعت الملك حتى تقاتلت عليه، وأجحف بعضها ببعض.
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا سُلَيْمُ بْنُ مُطَيْرٍ، - مِنْ أَهْلِ وَادِي الْقُرَى - عَنْ أَبِيهِ، أَنَّهُ حَدَّثَهُ قَالَ سَمِعْتُ رَجُلاً، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ فَأَمَرَ النَّاسَ وَنَهَاهُمْ ثُمَّ قَالَ " اللَّهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ " . قَالُوا اللَّهُمَّ نَعَمْ . ثُمَّ قَالَ " إِذَا تَجَاحَفَتْ قُرَيْشٌ عَلَى الْمُلْكِ فِيمَا بَيْنَهَا وَعَادَ الْعَطَاءُ أَوْ كَانَ رُشًا فَدَعُوهُ " . فَقِيلَ مَنْ هَذَا قَالُوا هَذَا ذُو الزَّوَائِدِ صَاحِبُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم .
সুলাইম ইবনু মুতাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এক ব্যক্তিকে বলতে শুনেছি, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হাজ্জের ভাষণে বলতে শুনেছিঃ তিনি লোকদেরকে সৎ কাজের আদেশ এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করার পর বললেনঃ হে আল্লাহ! আমি কি পৌছে দিয়েছি? লোকেরা বলল, হে আল্লাহ! হ্যাঁ (তিনি পৌছে দিয়েছেন)। অতঃপর তিনি বললেনঃ কুরাইশরা যখন রাষ্ট্রীয় ক্ষমতা দখল নিয়ে অন্তর্দ্বন্দ্বে লিপ্ত হবে এবং উপঢৌকন ঘুষে পরিণত হবে তখন তোমরা এ জাতীয় উপঢৌকন গ্রহণ করবে না। বলা হলো, কে এ ব্যক্তি? লোকেরা বললো, ইনি রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবী যুল-যাইয়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
দুর্বলঃ তাখরীজ মুশকিলাতুল ফিক্বর(৫)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (2958) ، (انوار الصحیفہ ص 107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف كسابقه، وانظر تخريجه هناك. وقوله: "وعاد العطاء رشاً" هو أن يُصرف عن المستحقين، ويُعطَى من له الجاه والمنزلة.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ، - يَعْنِي ابْنَ سَعْدٍ - حَدَّثَنَا ابْنُ شِهَابٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ الأَنْصَارِيِّ، أَنَّ جَيْشًا، مِنَ الأَنْصَارِ كَانُوا بِأَرْضِ فَارِسَ مَعَ أَمِيرِهِمْ وَكَانَ عُمَرُ يُعْقِبُ الْجُيُوشَ فِي كُلِّ عَامٍ فَشُغِلَ عَنْهُمْ عُمَرُ فَلَمَّا مَرَّ الأَجَلُ قَفَلَ أَهْلُ ذَلِكَ الثَّغْرِ فَاشْتَدَّ عَلَيْهِمْ وَتَوَاعَدَهُمْ وَهُمْ أَصْحَابُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالُوا يَا عُمَرُ إِنَّكَ غَفَلْتَ عَنَّا وَتَرَكْتَ فِينَا الَّذِي أَمَرَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ إِعْقَابِ بَعْضِ الْغَزِيَّةِ بَعْضًا .
আবদুল্লাহ ইবনু কা’ব ইবনু মালিক আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা আনসারদের সমন্বয়ে গঠিত যোদ্ধাদল তাদের দলনেতার সাথে পারস্যে অবস্থান করছিলো। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি বছর সেনাবাহিনী স্থানান্তর করতেন। একবার তিনি কোন কাজে ব্যস্ত থাকার কারণে স্থানান্তরের পদক্ষেপ নিতে পারেননি। সময় অতিবাহিত হওয়ায় সীমান্তের সেনাদল ফিরে আসে। এতে ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের প্রতি কঠোর মনোভাব প্রদর্শন করে তাদেরকে ধমকালেন। অথচ তারা সবাই রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম সাহাবী ছিলেন। তারা বললেন, হে ‘উমার! আপনি আমাদের ব্যাপারে উদাসীন হয়ে পড়েছেন। আপনি আমাদের বিষয়ে রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম অনুসৃত নীতি পরিহার করেছেন। রাসূলুল্লাহর সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম নির্দেশ হলোঃ এক বাহিনীর পিছনে অপর বাহিনী প্রেরণ এবং পরবর্তী বাহিনীর তদস্থলে অবস্থান গ্রহণ।
সানাদ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، ابن شھاب الزھري صرح بالسماع عند ابن الجارود (1095)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح إن كان عبد الله بن كعب سمعه من أولئك الأنصار -وهو الذي يغلب على الظن- ولا يُنكَر إدراكه لعمر بن الخطاب، بل إنه على قول من قال: له رؤية، مُدرك لا محالة، والله تعالى أعلم. وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى (١٠٩٥)، والبيهقي ٩/ ٢٩ من طريق إبراهيم ابن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق (٩٦٥١) عن معمر، عن الزهري قال: بعث عمر جيشاً … فذكره مرسلاً. قال الخطابي: الإعقاب: أن يبعث الإمام في أثر المقيمين في الثغر جيشاً يقيمون مكانهم وينصرف أولئك، فإنه إذا طالت عليهم الغيبة والغزية تضرروا به، وأضر ذلك بأهليهم، وقد قال عمر ﵁ في بعض كلامه "لا تجمروا الجيوش فتفتنوهم" يريد: لا تطيلوا حبسهم في الثغور.
حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَائِذٍ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنِي فِيمَا، حَدَّثَهُ ابْنٌ لِعَدِيِّ بْنِ عَدِيٍّ الْكِنْدِيِّ، أَنَّ عُمَرَ بْنَ عَبْدِ الْعَزِيزِ، كَتَبَ إِنَّ مَنْ سَأَلَ عَنْ مَوَاضِعِ الْفَىْءِ، فَهُوَ مَا حَكَمَ فِيهِ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ رضى الله عنه فَرَآهُ الْمُؤْمِنُونَ عَدْلاً مُوَافِقًا لِقَوْلِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم " جَعَلَ اللَّهُ الْحَقَّ عَلَى لِسَانِ عُمَرَ وَقَلْبِهِ " . فَرَضَ الأَعْطِيَةَ وَعَقَدَ لأَهْلِ الأَدْيَانِ ذِمَّةً بِمَا فُرِضَ عَلَيْهِمْ مِنَ الْجِزْيَةِ لَمْ يَضْرِبْ فِيهَا بِخُمُسٍ وَلاَ مَغْنَمٍ .
আদী আল-কিন্দীর (রাহিমাহুল্লাহ) এক পুত্রের হতে বর্ণিত, উমার ইবনু ‘আবদুল ‘আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) কর্মচারীদের প্রতি লিখেন, কেউ ফাই-এর খাত সম্পর্কে জানতে চাইলে তাকে ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নির্দেশিত নীতি অনুসরণ করতে বলবে। কেননা মুমিনগণ তার অনুসৃত নীতিকে সঠিক এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর বাণীর সাথে সামঞ্জাস্যপূর্ন পেয়েছে। মহান আল্লাহ ‘উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুখ ও অন্তর দ্বারা সত্যের প্রকাশ ঘটিয়েছেন। তিনি উপঢৌকন প্রবর্তন ও নির্ধারণ করেছেন। জিয্য়া প্রদানের বিনিময়ে অন্যান্য ধর্মাবলম্বীদের নিরাপত্তার নিশ্চয়তা বিধান করেছেন। তিনি আরো বলেছেনঃ জিয্য়াতে এক-পঞ্চমাংশ নেই বা এটা গনীমাতের মত নয়।
সানাদ দুর্বল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن عدي بن عدي الکندي لم یسم ولا یعرف حالہ (تق: 8480) ، وحدیث ابن حبان (الموارد: 2184) یغني عنہ وسندہ صحیح ، (انوار الصحیفہ ص 107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف، قال المنذري في "مختصر السنن": في رواته مجهول، وعمر بن عبد العزيز لم يدرك عمر بن الخطاب، والمرفوع منه مرسل.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنْ مَكْحُولٍ، عَنْ غُضَيْفِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِنَّ اللَّهَ وَضَعَ الْحَقَّ عَلَى لِسَانِ عُمَرَ يَقُولُ بِهِ " .
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ নিশ্চয়ই মহান আল্লাহ ‘উমারের মুখে সত্যকে স্থাপন করেছেন। তিনি ন্যায়নিষ্ঠার সাথেই কথা বলতেন।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (১০৮)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (6043) ، أخرجہ ابن ماجہ (108) محمد بن إسحاق صرح بالسماع عند یعقوب الفارسي فی المعرفۃ والتاریخ (1/461) وللحدیث شواھد کثیرۃ جدًا
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، محمد بن إسحاق قد صرح بالتحديث عند يعقوب بن سفيان في "المعرفه" ١/ ٤١٦، وهو متابع. زهير: هو ابن معاوية الجعفي، وأحمد بن يونس: هو ابن عبد الله بن يونس. وهو معروف بنسبته لجده. وأخرجه ابن ماجه (١٠٨) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى السامي، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢١٤٥٧).
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، وَمُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ الْمَعْنَى، قَالاَ حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ عُمَرَ الزَّهْرَانِيُّ، حَدَّثَنِي مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسِ بْنِ الْحَدَثَانِ، قَالَ أَرْسَلَ إِلَىَّ عُمَرُ حِينَ تَعَالَى النَّهَارُ فَجِئْتُهُ فَوَجَدْتُهُ جَالِسًا عَلَى سَرِيرٍ مُفْضِيًا إِلَى رِمَالِهِ فَقَالَ حِينَ دَخَلْتُ عَلَيْهِ يَا مَالُ إِنَّهُ قَدْ دَفَّ أَهْلُ أَبْيَاتٍ مِنْ قَوْمِكَ وَإِنِّي قَدْ أَمَرْتُ فِيهِمْ بِشَىْءٍ فَاقْسِمْ فِيهِمْ . قُلْتُ لَوْ أَمَرْتَ غَيْرِي بِذَلِكَ . فَقَالَ خُذْهُ . فَجَاءَهُ يَرْفَأُ فَقَالَ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ هَلْ لَكَ فِي عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ وَعَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَوْفٍ وَالزُّبَيْرِ بْنِ الْعَوَّامِ وَسَعْدِ بْنِ أَبِي وَقَّاصٍ قَالَ نَعَمْ . فَأَذِنَ لَهُمْ فَدَخَلُوا ثُمَّ جَاءَهُ يَرْفَأُ فَقَالَ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ هَلْ لَكَ فِي الْعَبَّاسِ وَعَلِيٍّ قَالَ نَعَمْ . فَأَذِنَ لَهُمْ فَدَخَلُوا فَقَالَ الْعَبَّاسُ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ اقْضِ بَيْنِي وَبَيْنَ هَذَا - يَعْنِي عَلِيًّا - فَقَالَ بَعْضُهُمْ أَجَلْ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ اقْضِ بَيْنَهُمَا وَارْحَمْهُمَا . قَالَ مَالِكُ بْنُ أَوْسٍ خُيِّلَ إِلَىَّ أَنَّهُمَا قَدَّمَا أُولَئِكَ النَّفَرَ لِذَلِكَ . فَقَالَ عُمَرُ رَحِمَهُ اللَّهُ اتَّئِدَا . ثُمَّ أَقْبَلَ عَلَى أُولَئِكَ الرَّهْطِ فَقَالَ أَنْشُدُكُمْ بِاللَّهِ الَّذِي بِإِذْنِهِ تَقُومُ السَّمَاءُ وَالأَرْضُ هَلْ تَعْلَمُونَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ نُورَثُ مَا تَرَكْنَا صَدَقَةٌ " . قَالُوا نَعَمْ . ثُمَّ أَقْبَلَ عَلَى عَلِيٍّ وَالْعَبَّاسِ رضى الله عنهما فَقَالَ أَنْشُدُكُمَا بِاللَّهِ الَّذِي بِإِذْنِهِ تَقُومُ السَّمَاءُ وَالأَرْضُ هَلْ تَعْلَمَانِ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ نُورَثُ مَا تَرَكْنَا صَدَقَةٌ " . فَقَالاَ نَعَمْ . قَالَ فَإِنَّ اللَّهَ خَصَّ رَسُولَهُ صلى الله عليه وسلم بِخَاصَّةٍ لَمْ يَخُصَّ بِهَا أَحَدًا مِنَ النَّاسِ فَقَالَ اللَّهُ تَعَالَى { وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلاَ رِكَابٍ وَلَكِنَّ اللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلَى مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ } وَكَانَ اللَّهُ أَفَاءَ عَلَى رَسُولِهِ بَنِي النَّضِيرِ فَوَاللَّهِ مَا اسْتَأْثَرَ بِهَا عَلَيْكُمْ وَلاَ أَخَذَهَا دُونَكُمْ فَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْخُذُ مِنْهَا نَفَقَةَ سَنَةٍ أَوْ نَفَقَتَهُ وَنَفَقَةَ أَهْلِهِ سَنَةً وَيَجْعَلُ مَا بَقِيَ أُسْوَةَ الْمَالِ . ثُمَّ أَقْبَلَ عَلَى أُولَئِكَ الرَّهْطِ فَقَالَ أَنْشُدُكُمْ بِاللَّهِ الَّذِي بِإِذْنِهِ تَقُومُ السَّمَاءُ وَالأَرْضُ هَلْ تَعْلَمُونَ ذَلِكَ قَالُوا نَعَمْ . ثُمَّ أَقْبَلَ عَلَى الْعَبَّاسِ وَعَلِيٍّ رضى الله عنهما فَقَالَ أَنْشُدُكُمَا بِاللَّهِ الَّذِي بِإِذْنِهِ تَقُومُ السَّمَاءُ وَالأَرْضُ هَلْ تَعْلَمَانِ ذَلِكَ قَالاَ نَعَمْ . فَلَمَّا تُوُفِّيَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ أَبُو بَكْرٍ أَنَا وَلِيُّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجِئْتَ أَنْتَ وَهَذَا إِلَى أَبِي بَكْرٍ تَطْلُبُ أَنْتَ مِيرَاثَكَ مِنِ ابْنِ أَخِيكَ وَيَطْلُبُ هَذَا مِيرَاثَ امْرَأَتِهِ مِنْ أَبِيهَا فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ رَحِمَهُ اللَّهُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ نُورَثُ مَا تَرَكْنَا صَدَقَةٌ " . وَاللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّهُ لَصَادِقٌ بَارٌّ رَاشِدٌ تَابِعٌ لِلْحَقِّ فَوَلِيَهَا أَبُو بَكْرٍ فَلَمَّا تُوُفِّيَ أَبُو بَكْرٍ قُلْتُ أَنَا وَلِيُّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَوَلِيُّ أَبِي بَكْرٍ فَوَلِيتُهَا مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ أَلِيَهَا فَجِئْتَ أَنْتَ وَهَذَا وَأَنْتُمَا جَمِيعٌ وَأَمْرُكُمَا وَاحِدٌ فَسَأَلْتُمَانِيهَا فَقُلْتُ إِنْ شِئْتُمَا أَنْ أَدْفَعَهَا إِلَيْكُمَا عَلَى أَنَّ عَلَيْكُمَا عَهْدَ اللَّهِ أَنْ تَلِيَاهَا بِالَّذِي كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَلِيهَا فَأَخَذْتُمَاهَا مِنِّي عَلَى ذَلِكَ ثُمَّ جِئْتُمَانِي لأَقْضِيَ بَيْنَكُمَا بِغَيْرِ ذَلِكَ وَاللَّهِ لاَ أَقْضِي بَيْنَكُمَا بِغَيْرِ ذَلِكَ حَتَّى تَقُومَ السَّاعَةُ فَإِنْ عَجَزْتُمَا عَنْهَا فَرُدَّاهَا إِلَىَّ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ إِنَّمَا سَأَلاَهُ أَنْ يَكُونَ يُصَيِّرُهُ بَيْنَهُمَا نِصْفَيْنِ لاَ أَنَّهُمَا جَهِلاَ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ نُورَثُ مَا تَرَكْنَا صَدَقَةٌ " . فَإِنَّهُمَا كَانَا لاَ يَطْلُبَانِ إِلاَّ الصَّوَابَ . فَقَالَ عُمَرُ لاَ أُوقِعُ عَلَيْهِ اسْمَ الْقَسْمِ أَدَعُهُ عَلَى مَا هُوَ عَلَيْهِ .
মালিক ইবনু আওস ইবনুল হাদাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা দিনের কিছু অংশ অতিবাহিত হওয়ার পর ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে ডেকে পাঠালেন। আমি তার কাছে গিয়ে দেখি, তিনি খেজুরের ছোবরার তৈরি একটি তক্তপোষের উপর বসে আছেন। আমি তার কাছে উপস্থিত হলে তিনি বললেন, হে মালিক! তোমার সম্প্রদায়ের কিছু লোক আমার কাছে এসেছে। আমি কিছু জিনিস তাদেরকে দেয়ার নির্দেশ দিয়েছি। সেগুলো তুমি তাদের মধ্যে বন্টন করে দিবে। আমি বললাম, আপনি যদি আমি ছাড়া অন্য কাউকে বন্টনের দায়িত্ব দিতেন। তিনি বললেন, এটা নাও (বন্টন করো)। খাদেম ইয়ারফা এসে বললো, হে আমীরুল মুমিনীন! ‘উসমান ইবনু ‘আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), ‘আব্দুর রহমান ইবনু ‘আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যুবাইর ইবনুল ‘আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং সা’দ ইবনু আবূ ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আপনার সাক্ষাত প্রার্থী। তিনি বললেন, হ্যাঁ, তাদেরকে আসতে বলো। সুতরাং তারা এলেন। ইয়ারফা আবার এসে বললো, হে আমীরুল মুমিনীন! আল-‘আব্বাস ও ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভিতরে আসার অনুমতি প্রার্থী। তিনি বললেন, হ্যাঁ তাদেরকে আসতে দাও। তারাও প্রবেশ করলেন। আল-‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আমীরুল মুমিনীন! আমার ও ‘আলীর মাঝে ফায়সালা করুন এবং তাদের শান্তির বিধান করুন। মালিক ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার মনে হলো; তারা দু’জনে এজন্যই ‘উসমান(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তার সঙ্গীদের এখানে আগে পাঠিয়েছেন। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ধৈর্য ধরো, শান্ত হও। অতঃপর তিনি উপস্থিত লোকদের লক্ষ্য করে বললেন, আমি আপনাদের সেই মহান আল্লাহর শপথ দিচ্ছি, যাঁর নির্দেশে আসমান-যমীন সুপ্রতিষ্ঠিত। আপনাদের কি জানা আছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “আমরা (নাবীগণ) কোন উত্তরাধিকার রেখে যাই না, আমরা যা রেখে যাই তা সদাক্বাহ গণ্য”? তারা সকলে বললেন, হ্যাঁ। অতঃপর তিনি ‘আলী ও আল-‘আব্বাসকে বললেন, আপনাদের উভয়কে সেই মহান আল্লাহর শপথ করে জিজ্ঞেস করছি, যাঁর নির্দেশে আসমান-যমীন অস্তিত্বমান! আপনারা কি জানেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “আমাদের (নাবীদের) কোন উত্তরাধীকার নাই, আমারা যা রেখে যাই তা সদাক্বাহ গণ্য”? ‘উমার(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, মহান আল্লাহ রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিশেষ বৈশিষ্ট্য দিয়েছেন, যা অন্য কাউকে দেননি। মহান আল্লাহ বলেন, “আর যা কিছু আল্লাহ তাদের (ইহূদীদের) থেকে তাঁর রাসূলের নিকট ফিরিয়ে দিয়েছেন, তার জন্য তোমরা ঘোড়া ও উট পরিচালিত করোনি। বরং আল্লাহ তাঁর রাসূলদেরকে যার উপর ইচ্ছা কর্তৃত্ব দান করেন। আর আল্লাহ প্রতিটি বিষয়ের উপরই ক্ষমতাবান” (সূরাহ আল-হাশরঃ ৬)। মহান আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বনু নাযীর গোত্রের সম্পদ ফাই হিসেবে দান করেন। আল্লাহর শপথ! এ সম্পদের ব্যাপারে তিনি তোমাদের উপর কাউকে অগ্রাধিকার দেননি এবং তিনি তোমাদের বাদ দিয়ে অন্য কাউকেও দেননি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ সম্পদ থেকে তাঁর পরিবারের এক বছরের ভরণপোষণের পরিমাণ নিতেন এবং অবশিষ্ট সম্পদ মুসলিমদের কল্যাণে ব্যয় করতেন। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত লোকদেরকে আবার বললেন, আমি আপনাদেরকে সেই মহান আল্লাহর শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, যাঁর নির্দেশে আসমান-যমীন সুপ্রতিষ্ঠিত! আপনারা কি এসব জানেন? তারা বললেন, হ্যাঁ, অতঃপর তিনি আল-‘আব্বাস ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে বললেন, আমি আপনাদের উভয়কে আল্লাহর শপথ দিয়ে বলছি, যাঁর নির্দেশে আসমান-যমীন সুপ্রতিষ্ঠিত! আপনাদের কি এসব বিষয় জানা আছে? তারা উভয়ে বললেন, হ্যাঁ। অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এখন আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতিনিধি। আপনি এবং ইনি (‘আলী) আবূ বাক্রের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট আসলেন। আপনি আপনার ভ্রাতুষ্পুত্রের পরিত্যক্ত সম্পদে আপনার মীরাস দাবি করলেন এবং ইনি তার শশুরের সম্পদের স্ত্রীর মীরাস দাবি করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “আমাদের (নাবীদের) কোন ওয়ারিস নাই, আমরা যা রেখে যাই তা সদাক্বাহ হিসাবে গণ্য”। আল্লাহ জানেন, আবূ বাক্র ছিলেন সত্যবাদী, কল্যাণকামী, হেদায়াতপ্রাপ্ত ও সত্যের অনুসারী। তিনি উক্ত সম্পদের মুতাওয়াল্লী হন। পরবর্তীতে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেলে আমি বললাম, আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উত্তরসুরি এবং আবূ বাক্রের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতিনিধি। আল্লাহর ইচ্ছায় আমি এখন এ সম্পদের তত্ত্বাবধায়। আপনি এবং ইনি আমার নিকট এসেছেন। আপনাদেরকে উভয়ের উদ্দেশ্য ও কথা একই। আমি আপনাদের কাছে তা অর্পণ করতে পারি। শর্ত হলো, আপনারা আল্লাহর ওয়াদা মেনে চলবেন এবং এ সম্পদের ক্ষেত্রে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুসৃত নীতি অনুসরণ করবেন। উক্ত শর্তে সেগুলো আপনারা আমার কাছ থেকে নিয়েছিলেন। পরে আবার আমার নিকট এসেছেন। আপনারা চাচ্ছেন, এখন আমি পূর্বের ফায়সালার বিপরীত ফায়সালা প্রদান করি। আল্লাহর শপথ! ক্বিয়ামাত পর্যন্ত আমি এর বিপরীত করবো না। আপনারা এ দায়িত্ব পালনে অপারগ হলে এর দায়িত্ব আমার উপর ন্যস্ত করুন।
আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আল-‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ সম্পত্তির দায়িত্বভার তাদের উভয়ের মধ্যে বন্টন করতে ‘উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট আবেদন করেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর বাণী, “আমরা যা রাখে যাই তাতে উত্তরাধিকার হবে না। বরং তা সদাক্বাহ হিসাবে গণ্য”। এ হাদীস তাদের উভয়ের অজানা ছিল না। বরং তারাও সত্যের অনুসন্ধানী ছিলেন, এজন্যই ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি এ সম্পদ ভাগ করবো না, বরং একে এর পূর্বাবস্থায়ই রাখবো।
সহীহঃ মুখতাসার শামায়িল(৩৪১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (7305) صحیح مسلم (1757)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٣٠٩٤)، ومسلم (١٧٥٧)، والترمذي (١٧٠٢)، والنسائىِ في "الكبرى" (٦٢٧٦) من طريق مالك بن أنس، بهذا الإسناد. ورواية الترمذي مختصرة. وأخرجه البخاري (٤٠٣٣) من طريق شعيب بن أبي حمزة، و (٥٣٥٨) و (٦٧٢٨) و (٧٣٠٥) من طريق عُقيل بن خالد الأيلي، والنسائي في "الكبرى" (٦٢٧٣) من طريق يونس بن يزيد، و (٦٢٧٤) و (٦٢٧٥) - من طريق عمرو بن دينار، أربعتهم عن الزهري، به. واقتصر يونس وعمرو في روايتهما على قوله ﷺ: "لانورث، ما تركنا صدقة". وأخرجه بنحوه مختصراً النسائي في "الكبرى" (٤٤٣٤) من طريق عكرمة بن خالد، عن مالك بن أوس بن الحدثان، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٢) و (١٧٨١)، و"صحيح ابن حبان" (٦٦٠٨). وانظر ما بعده وما سيأتي بالأرقام (٢٩٦٤) و (٢٩٦٥) و (٢٩٦٦) و (٢٩٦٧). قال الخطابي معلقاً على قول أبي داود بإثر الحديث: ما أحسن ما قال أبو داود وما أشبهه بما تأوله، والذي يدل من نفس الحديث وسياق القصة على ما قال أبو داود: قول عمر لهما: فجئت أنت وهذا وأنتما جميعاً وأمركما واحد، فهذا يبين أنهما إنما اختصما إليه في رأي حدثَ لهما في أسباب الولاية والحفظ. فرام كل واحدٍ منهما التفرد به دون صاحبه، ولا يجوز عليهما أن يكونا طالباه بأن يجعله ميراثاً ويرده ملكاً، بعد أن كانا سلّماه في أيام أبي بكر وتخليا عن الدعوى فيه. وكيف يجوز ذلك؟ وعمر ﵁ يناشدهما الله هل تعلمان أن رسول الله ﷺ قال: "لا نورث، ما تركنا صدقة فيعترفان به والقوم الحضور يشهدون على رسول الله ﷺ بمثل ذلك. وكل هذه الأمور تؤكد ما قاله أبو داود وتصحح ما تأوله من أنهما إنما طلبا القسمة، ويشبه أن يكون عمر إنما منعهما القسمة احتياطاً للصدقة ومحافظة عليها. فإن القسمة إنما تجري في الأموال المملوكة، وكانت هذه الصدقات متنازعة وقت وفاة رسول الله ﷺ يُدّعَى فيها الملك والوراثة إلى أن قامت البينة من قول رسول الله ﷺ: أن تركته صدقة غير موروثة فلم يسمح لهما عمر بالقسمة، ولو سمح لهما بالقسمة لكان لا يؤمن أن يكون ذلك ذريعة لمن يريد أن يمتلكها بعد علي والعباس ممن ليس له بصيرتهما في العلم ولا تقيتهما في الدين، فرأى أن يتركها على الجملة التي هي عليها، ومنع أن تحول عليها السهام فيتوهم أن ذلك إنما كان لرأي حدث منه فيها أوجب إعادتها إلى الملك بعد اقتطاعها عنه إلى الصدقة، وقد يحتمل ذلك وجهاً، وهو أن الأمر المفوض إلى الاثنين الموكول إليهما وإلى أمانتهما وكفايتهما ليُمضياه بمشاركة منهما أقوى في الرأي وأدنى إلى الاحتياط من الاقتصار على أحدهما والاكتفاء به دون مقام الآخر، ولو أوصى رجل بوصية إلى عمرو وزيد، أو وكل رجل زيداً وعَمراً لم يكن لواحدٍ منهما أن يسبتدّ بأمر منهما دون صاحبه فنظر عمر لتلك الأموال واحتاط فيها بأن فوّضها إليهما معاً، فلما تنازعاها قال لهما: إما أن تلياها جميعاً، على الشرط الذي عقدته لكما في أصل التولية، وإما أن ترداها إلي، فأتولاها بنفسي وأجريها على سبُلها التي كان تجري أيام أبي بكر ﵁. قلت (القائل الخطابي): وروي أن علياً ﵁ غلب عليها العباس بعد ذلك فكان يليها أيام حياته، ويدل على صحة التأويل الذي ذهب إليه أبو داود: أن منازعة علي ﵁ عباساً ﵁ لم تكن من قبل أنه كان يراها ملكاً وميراثاً، إن الأخبار لم تختلف عن على ﵁ أنه لما أفضت إليه الخلافة وخلص له الأمر أجراها على الصدقة، ولم يغير شيئاً من سبلها. وقال: قوله: مُفضياً إلى رماله، يريد أنه كان قاعداً عليه من غير فراش، ورماله: ما يرمل وينسج به من شريط ونحوه. وقوله: دفّ أهل أبيات من قومك، معناه: أقبلوا ولهم دفيف، وهو مشي سريع في مقاربة خطو. يريد: أنهم وردوا المدينة لضرٍّ أصابهم في بلادهم. وفي قول عمر: إن الله خص رسوله ﷺ بخاصة لم يخص بها أحداً من الناس، وتلا على أثره الآية، دليل على أن أربعة أخماس الفىء كانت لرسول الله ﷺ خاصة في حياته. واختلفوا في مَن هي له بعده وأين تصرف؟ وفيمن توضع؟ قال الشافعي: فيها قولان: أحدهما: أن سبيلها سيل المصالح، فتصرف إلى الأهم فالأهم من مصالح المسلمين، ويبدأ بالمقاتلة أولاً، فيعطون قدر كفايتهم، ثم يبدأ بالأهم فالأهم من المصالح، لأن النبي ﷺ كان يأخذه، لفضيلته، وليس لأحد من الأئمة بعده تلك الفضيلة، فليس لهم أن يتملكوها، والقول الآخر: أن ذلك للمقاتلة كله يقسم فيهم، لأن النبي ﷺ إنما كان يأخذه لما له من الرعب والهيبة في طلب العدو، والمقاتلة: هم القائمون مقامه في إرهاب العدو وإخافتهم. وكان مالك يرى أن الفيء للمصالح، قال: وكذلك كان في زمان رسول الله ﷺ، وحُكي عنه أنه قال: كان رسول الله ﷺ لا يملك فيه مالاً، أو كان لا يصح منه الملك. قلت (القائل الخطابي): وهذا القول إن صح عنه فهو خطأ، وقال بعض أهل العلم: الفيء للأئمة بعده.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ ثَوْرٍ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسٍ، بِهَذِهِ الْقِصَّةِ قَالَ وَهُمَا - يَعْنِي عَلِيًّا وَالْعَبَّاسَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا - يَخْتَصِمَانِ فِيمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْ أَمْوَالِ بَنِي النَّضِيرِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ أَرَادَ أَنْ لاَ يُوقِعَ عَلَيْهِ اسْمَ قَسْمٍ .
মালিক ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি উক্ত ঘটনা সম্পর্কে বলেন, তারা উভয়ে অর্থাৎ ‘আলী ও ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খায়বারের ফাইলব্ধ সম্পদ নিয়ে বিবাদে লিপ্ত হলেন-যা বনু নাযীর গোত্রের কাছ থেকে আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দান করেছিলেন। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইচ্ছা ছিল এ সম্পদের উপর বন্টনের নামও নেয়া যাবে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (2963)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. معمر: هو ابن راشد، ومحمد بن عُبيد: هو ابن حِساب الغُبَري. وأخرجه البخاري (٥٣٥٧)، ومسلم (١٧٥٧)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣٠٧) و (٦٣٠٨) من طريق معمر بن راشد، بهذا الإسناد. ورواية البخاري مختصرة بقوله: أن النبي ﷺ كان يبيع نخل بني النضير، ويحبس لأهله قوت سنتِهم، ورواية النسائي مختصرة بقوله ﷺ: "لا نورث، ما تركنا صدقة". وهو في "مسند أحمد" (٣٣٣) و (٤٢٥). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَأَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ، - الْمَعْنَى - أَنَّ سُفْيَانَ بْنَ عُيَيْنَةَ، أَخْبَرَهُمْ عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسِ بْنِ الْحَدَثَانِ، عَنْ عُمَرَ، قَالَ كَانَتْ أَمْوَالُ بَنِي النَّضِيرِ مِمَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِمَّا لَمْ يُوجِفِ الْمُسْلِمُونَ عَلَيْهِ بِخَيْلٍ وَلاَ رِكَابٍ كَانَتْ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَالِصًا يُنْفِقُ عَلَى أَهْلِ بَيْتِهِ - قَالَ ابْنُ عَبْدَةَ يُنْفِقُ عَلَى أَهْلِهِ قُوتَ سَنَةٍ - فَمَا بَقِيَ جُعِلَ فِي الْكُرَاعِ وَعُدَّةً فِي سَبِيلِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ قَالَ ابْنُ عَبْدَةَ فِي الْكُرَاعِ وَالسِّلاَحِ .
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, বনু নাযীর গোত্রের সম্পদ আল্লাহ তাঁর রাসূলকে দান করেন। এগুলো অর্জন করতে মুসলিমদের ঘোড়া বা উট চালাতে হয়নি। এ সম্পদ রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য নির্দিষ্ট ছিল। এর থেকে তিনি তাঁর পরিবারের সারা বছরের ভরণপোষণের ব্যয়ভার বহন করতেন। আর অবশিষ্ট অংশ দিয়ে ঘোড়া ও আল্লাহর পথে যুদ্ধের সরঞ্জাম সংগ্রহ করতেন। ইবনু ‘আবদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তা ব্যয় করা হতো ঘোড়া ও অস্ত্র সংগ্রহের জন্য।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2904) صحیح مسلم (1757)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٢٩٠٤) و (٤٨٨٥)، ومسلم (١٧٥٧) والترمذي (١٨١٦)، والنسائى (٤١٤٠) من طريق عمرو بن دينار، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٧٥٧) من طريق معمر بن راشد، عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧١) (٣٣٧)، و"صحيح ابن حبان" (٦٣٥٧). وانظر ما سلف برقم (٢٩٦٣). قوله: يوجف، قال ابن الأثير في "النهاية": الإيجاف، سرعة السير، وقد أوجف دابتَه، يوجفُها إيجافاً، إذا حَثَّها. و"الكراع" اسم لجميع الخيل. قال الحافظ في "الفتح" ٦/ ٢٠٨: واختلف العلماء في مصرف الفيء، فقال مالك: الفيء والخمس سواء يجعلان في بيت المال، ويُعطي الإمام أقارب النبي ﷺ بحسب اجتهاده، وفرق الجمهور بين خمس الغنيمة وبين الفيء، فقال: الخمس موضوع فيما عينه الله فيه من الأصناف المسمين في آية الخمس من سورة الأنفال لا يتعدى به إلى غيرهم. وأما الفيء، فهو الذي يرجع النظر في مصرفه إلى رأي الإمام بحسب المصلحة، وانفرد الشافعي -كما قال ابن المنذر وغيره بأن الفيء يخمس وأن أربعة أخماسه للنبي ﷺ، وله خمس الخمس كما في الغنيمة، وأربعة أخماس الخمس لمستحق نظيرها من الغنيمة. وقال الجمهور: مصرف الفيء كله إلى رسول الله ﷺ، واحتجوا بقول عمر: فكانت هذه لرسول الله ﷺ خاصة، وتأول الشافعي قول عمر المذكور بأنه يريد الأخماس الأربعة.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، أَخْبَرَنَا أَيُّوبُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، قَالَ قَالَ عُمَرُ { وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلاَ رِكَابٍ } . قَالَ الزُّهْرِيُّ قَالَ عُمَرُ هَذِهِ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَاصَّةً قُرَى عُرَيْنَةَ فَدَكَ وَكَذَا وَكَذَا { مَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْ أَهْلِ الْقُرَى فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ } وَ لِلْفُقَرَاءِ الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ وَالَّذِينَ تَبَوَّءُوا الدَّارَ وَالإِيمَانَ مِنْ قَبْلِهِمْ . وَالَّذِينَ جَاءُوا مِنْ بَعْدِهِمْ فَاسْتَوْعَبَتْ هَذِهِ الآيَةُ النَّاسَ فَلَمْ يَبْقَ أَحَدٌ مِنَ الْمُسْلِمِينَ إِلاَّ لَهُ فِيهَا حَقٌّ . قَالَ أَيُّوبُ أَوْ قَالَ حَظٌّ إِلاَّ بَعْضَ مَنْ تَمْلِكُونَ مِنْ أَرِقَّائِكُمْ .
আয-যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, (মহান আল্লাহর বাণী), “আর যা কিছু আল্লাহ তাদের (ইহুদীদের) থেকে তাঁর রাসূলের নিকট ফিরিয়ে দিয়েছেন, তার জন্য তোমরা ঘোড়া ও উট পরিচালিত করোনি। বরং আল্লাহ তাঁর রাসূলদেরকে যার উপর ইচ্ছা কর্তৃত্ব দান করেন। আর আল্লাহ প্রতিটি বিষয়ের উপরই ক্ষমতাবান” (সূরাহ আল-হাশরঃ ৬)। আয-যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, উরাইনাহ, ফাদাক ইত্যাদি এলাকা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য নির্দিষ্ট ছিল। যেমন অন্য আয়াতে বলা হয়েছেঃ “যা কিছুই আল্লাহ এ জনপদের লোকদের থেকে তাঁর রাসূলের দিকে ফিরিয়ে দিয়েছেন তা আল্লাহ, রাসূল এবং আত্মীয়-স্বজন, ইয়াতীম, মিসকিন ও পথিকদের জন্য। ঐসব মুহাজিরের জন্যও, যারা নিজেদের ঘর-বাড়ি ও সম্পদ থেকে বিতারিত ও বহিষ্কৃত। এবং যারা এ মুহাজিরদের আসার আগে ঈমান এনে দারুল হিজরাতেই বসবাসকারী ছিল এবং যারা তাদের পরে হিজরাত করে তাদের কাছে এসেছে (তাদের জন্যও)...” (সূরাহ আল-হাশরঃ ৭-১০)। এ আয়াতগুলো সকল লোককে অন্তর্ভুক্ত করেছে। এমন কোন মুসলিম নেই যার যুদ্ধলব্ধ সম্পদে অধিকার নেই। আইয়ূব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অথবা বর্ণনাকারী ‘অধিকার’ এর স্থলে ‘অংশ’ শব্দ বলেছেন। হ্যাঁ, তোমাদের কতিপয় কৃতদাস এ থেকে বাদ পড়েছে।
সহীহঃ ইরওয়া (৫/৮৩-৮৪)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قال المنذري: ’’ ھٰذا منقطع،الزہري لم یسمع من عمر ‘‘ (عون المعبود 103/3) ، (انوار الصحیفہ ص 107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، إلا أنه منقطع، فإن الزهري لم يدرك عمر بن الخطاب، لكن قول عمر في آخره: لم يبق أحد من المسلمين إلا له فيها حق إلا بعض من تملكون من أرقائكم، صحيح، سمعه الزهري من مالك بن أوس بن الحدثان كما سيأتي. إسماعيل ابن إبراهيم: هو ابن عُلَية، ومُسدَّد: هو ابن مُسَرْهَد. وأخرجه النسائي (٤١٤٨) من طريق إسماعيل ابن علية، به. وأخرج قول عمر في آخر الحديث الشافعى في "مسنده " ٢/ ١٢٧، ومن طريقه البيهقي ٦/ ٣٤٧ من طريق عمرو بن دينار، عن الزهري، وعبد الرزاق في "تفسيره" ٢/ ٢٨٣ - ٢٨٤، وأبو عبيد القاسم في "الأموال" (٤١)، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (٨٤)، والطبري في "تفسيره" ٢٨/ ٣٧ من طريق عكرمة بن خالد، كلاهما (الزهري وعكرمة) عن مالك بن أوس بن الحدثان، عن عمر بن الخطاب. وهذا إسناد صحيح. وانظر ما سلف برقم (٢٩٦٣). قال الخطابي: قوله: "إلا بعض من تملكون من أرقائكم" يتأول على وجهين، أحدهما: ما ذهب إليه أبو عبيد، فإنه روى حديثاً عن ابن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن الحسن بن محمد بن علي، عن مخلد الغفاري: أن مملوكين أو ثلاثة لبني غفار شهدوا بدراً، فكان عمر يعطي كل رجل منهم في كل سنة ثلاثة آلاف درهم، قال أبو عبيد: فأحسب أنه إنما أراد هؤلاء المماليك البدريين بمشهدهم بدراً، ألا ترى أنه خص ولم يعم؟ وقال غيره: بل أراد به جميع المماليك، وإنما استثنى من جملة المسلمين بعضاً من كل، فكان ذلك منصرفاً إلى جنس المماليك، وقد يوضع البعض في موضع الكل كقول لبيد: أو يعتلق بعضَ النفوس حِمامُها يريد النفوسَ كلها.
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا حَاتِمُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، ح وَحَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُحَمَّدٍ، ح وَحَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا صَفْوَانُ بْنُ عِيسَى، - وَهَذَا لَفْظُ حَدِيثِهِ - كُلُّهُمْ عَنْ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسِ بْنِ الْحَدَثَانِ، قَالَ كَانَ فِيمَا احْتَجَّ بِهِ عُمَرُ رضى الله عنه أَنَّهُ قَالَ كَانَتْ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثَلاَثُ صَفَايَا بَنُو النَّضِيرِ وَخَيْبَرُ وَفَدَكُ فَأَمَّا بَنُو النَّضِيرِ فَكَانَتْ حُبْسًا لِنَوَائِبِهِ وَأَمَّا فَدَكُ فَكَانَتْ حُبْسًا لأَبْنَاءِ السَّبِيلِ وَأَمَّا خَيْبَرُ فَجَزَّأَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثَلاَثَةَ أَجْزَاءٍ جُزْءَيْنِ بَيْنَ الْمُسْلِمِينَ وَجُزْءًا نَفَقَةً لأَهْلِهِ فَمَا فَضَلَ عَنْ نَفَقَةِ أَهْلِهِ جَعَلَهُ بَيْنَ فُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ .
মালিক ইবনু আওস ইবনুল হাদাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের বক্তব্যের অনুকূলে যুক্তি পেশ করে বললেন, কেবলমাত্র রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য ফাই-এর সম্পদে তিনটি বিশষ অংশ ছিলঃ বনু নাযীর, খায়বার ও ফাদাক। বনু নাযীর এলাকা থেকে প্রাপ্ত আয় দৈনন্দিনের প্রয়োজন পূরণে ব্যয় করা হতো। ফাদাক থেকে অর্জিত আয় পথিকদের জন্য ব্যয় করা হতো। খায়বার এলাকার আয়কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন ভাগে ভাগ করেছেন। দুই অংশ মুসলিমদের সার্বিক কল্যাণে ব্যয় করা হতো এবং অপর অংশ দ্বারা তাঁর পরিবারের ব্যয়ভার বহন করা হতো। আর অবশিষ্ট অংশ গরীব মুহাজিরদের মাঝে বন্টন করা হতো।
সানাদ হাসানঃ অনুরূপ আসছে সামনে হা/০৯৭৭।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، الزہري صرح بالسماع في أصل الحدیث ولکنہ عنعن في ھٰذا اللفظ وھو مدلس مشھور ، (انوار الصحیفہ ص 107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد -وهو الليثي-. وأخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (٨٧)، والبلاذري في "فتوح البلدان" ص ٣٣ وص ٤٣، والبزار في "مسنده" (٢٥٦)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ٣٠٢، والبيهقي ٦/ ٢٩٦ و ٧/ ٥٩، وابن عبد البر في "التمهيد" ٦/ ٤٥٠، والضياء في "المختارة" (٢٧٣ - ٢٧٦) من طريق أسامة بن زيد الليثي، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو عوانة (٦٦٧٤) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن الزهري، به. وأخرجه البيهقي ٦/ ٢٩٦ من طرق أسامة بن زيد الليثي، عن محمد بن المنكدر، عن مالك بن أوس، به.
حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَوْهَبٍ الْهَمْدَانِيُّ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ عُقَيْلِ بْنِ خَالِدٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ، زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهَا أَخْبَرَتْهُ أَنَّ فَاطِمَةَ بِنْتَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَرْسَلَتْ إِلَى أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ رضى الله عنه تَسْأَلُهُ مِيرَاثَهَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِمَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَيْهِ بِالْمَدِينَةِ وَفَدَكَ وَمَا بَقِيَ مِنْ خُمُسِ خَيْبَرَ . فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ نُورَثُ مَا تَرَكْنَا صَدَقَةٌ إِنَّمَا يَأْكُلُ آلُ مُحَمَّدٍ مِنْ هَذَا الْمَالِ " . وَإِنِّي وَاللَّهِ لاَ أُغَيِّرُ شَيئًا مِنْ صَدَقَةِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ حَالِهَا الَّتِي كَانَتْ عَلَيْهِ فِي عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَلأَعْمَلَنَّ فِيهَا بِمَا عَمِلَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَبَى أَبُو بَكْرٍ رضى الله عنه أَنْ يَدْفَعَ إِلَى فَاطِمَةَ عَلَيْهَا السَّلاَمُ مِنْهَا شَيْئًا .
নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি ‘উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জানান যে, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মেয়ে ফাত্বিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বাক্র সিদ্দীকের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট লোক পাঠালেন। তিনি তার কাছে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরিত্যক্ত সম্পদে তার ওয়ারিসীস্বত্ব দাবি করলেন। উক্ত সম্পদ আল্লাহ তাঁর রাসূলকে মদিনায় ও ফাদাকে ফাই হিসাবে এবং খায়বারে গনীমাতের এক-পঞ্চমাংশ হিসাবে দান করেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “আমাদের কোন ওয়ারিস নাই, আমাদের পরিত্যক্ত জিনিস সদাক্বাহ গণ্য”। মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পরিবার এ সম্পদ থেকে কেবল ভরণপোষণের পরিমাণ গ্রহন করবে। আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবদ্দশায় তাঁর এ সদাক্বাহর যে বৈশিষ্ট ছিল আমি তার কিছুমাত্র পরিবর্তন করবো না। এ সম্পদের ব্যাপারে আমি ঐ নীতিই অনুসরণ করবো যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করেছেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উক্ত সম্পদের অংশ ফাত্বিমাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট হস্তান্তর করতে অসম্মতি জানান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4240، 4241) صحیح مسلم (1759)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه بأطول مما هنا البخاري (٤٢٤٠) و (٤٢٤١)، ومسلم (١٧٥٩) من طريق عقيل بن خالد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٤٠٣٥) و (٤٠٣٦) و (٦٧٢٥) و (٦٧٢٦)، ومسلم (١٧٥٩) من طريق معمر بن راشد، عن الزهري، به. إلا أنه قال: إن فاطمة والعباس أتيا يلتمسان ميراثهما … وهو في "مسند أحمد" (٩) و (٥٥)، و"صحيح ابن حبان" (٦٦٠٧). وانظر تالييه. وسيأتي من مسند عائشة برقم (٢٩٧٦)، وفيه: أزواج النبي ﷺ،بدل: فاطمة.
حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ الْحِمْصِيُّ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا شُعَيْبُ بْنُ أَبِي حَمْزَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، حَدَّثَنِي عُرْوَةُ بْنُ الزُّبَيْرِ، أَنَّ عَائِشَةَ، زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَخْبَرَتْهُ بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ وَفَاطِمَةُ عَلَيْهَا السَّلاَمُ حِينَئِذٍ تَطْلُبُ صَدَقَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الَّتِي بِالْمَدِينَةِ وَفَدَكَ وَمَا بَقِيَ مِنْ خُمُسِ خَيْبَرَ . قَالَتْ عَائِشَةُ رضى الله عنها فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ رضى الله عنه إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ نُورَثُ مَا تَرَكْنَا صَدَقَةٌ وَإِنَّمَا يَأْكُلُ آلُ مُحَمَّدٍ فِي هَذَا الْمَالِ " . يَعْنِي مَالَ اللَّهِ لَيْسَ لَهُمْ أَنْ يَزِيدُوا عَلَى الْمَأْكَلِ .
উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে এ হাদীসটি অবহিত করেন। তিনি বলেন, ফাত্বিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনাহয় পরিত্যক্ত সদাক্বাহ, ফাদাকের ফাই ও খায়বারের এক-পঞ্চমাংশ সম্পদের নিজের উত্তরাধিকার দাবি করেন। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “আমাদের কোন ওয়ারিস নাই, আমরা যা রেখে যাই তা সদাক্বাহ গণ্য”। আল্লাহর দেয়া এ সম্পদ থেকে মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)—এর পরিবার তাদের ভরণপোষণের পরিমাণ গ্রহণ করবে।
সহীহঃ সহীহাহ (০০৩৮)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح ق دون قوله يعني مال الله
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3711، 3712)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٣٧١١) و (٣٧١٢)، والنسائي في "المجتبى" (٤١٤١) من طريق شعيب بن أبي حمزة، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٤٨٢٣). وانظر ما قبله، وما بعده.
حَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ أَبِي يَعْقُوبَ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ بْنِ سَعْدٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ صَالِحٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي عُرْوَةُ، أَنَّ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَخْبَرَتْهُ بِهَذَا الْحَدِيثِ، قَالَ فِيهِ فَأَبَى أَبُو بَكْرٍ رضى الله عنه عَلَيْهَا ذَلِكَ وَقَالَ لَسْتُ تَارِكًا شَيْئًا كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَعْمَلُ بِهِ إِلاَّ عَمِلْتُ بِهِ إِنِّي أَخْشَى إِنْ تَرَكْتُ شَيْئًا مِنْ أَمْرِهِ أَنْ أَزِيغَ فَأَمَّا صَدَقَتُهُ بِالْمَدِينَةِ فَدَفَعَهَا عُمَرُ إِلَى عَلِيٍّ وَعَبَّاسٍ رضى الله عنهم فَغَلَبَهُ عَلِيٌّ عَلَيْهَا وَأَمَّا خَيْبَرُ وَفَدَكُ فَأَمْسَكَهُمَا عُمَرُ وَقَالَ هُمَا صَدَقَةُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَتَا لِحُقُوقِهِ الَّتِي تَعْرُوهُ وَنَوَائِبِهِ وَأَمْرُهُمَا إِلَى مَنْ وَلِيَ الأَمْرَ . قَالَ فَهُمَا عَلَى ذَلِكَ إِلَى الْيَوْمِ .
‘উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে এ হাদীস অবহিত করেন। ‘উরওয়াহ এ ঘটনা প্রসঙ্গে বলেন, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাত্বিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ সম্পদের অংশ দিতে অসম্মতি জানালেন। তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন নীতিই বর্জন করবো না। তিনি যেটা যেভাবে করেছেন আমি ঠিক সেভাবেই তা করবো। আমার আশঙ্কা হচ্ছে, আমি তাঁর হুকুমের সামান্য ব্যতিক্রম করলে আমি বাঁকা পথে চলে যাবো। বর্ণনাকারী বলেন, মাদীনাহতে অবস্থিত নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সদাক্বাহর সম্পত্তি ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আলী ও ‘আব্বাসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে অর্পণ করলেন। পরে ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একাই তা দখল করে নেন। খায়বার ও ফাদাকের সম্পত্তি ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের তত্ত্বাবধানে রাখেন। তিনি বললেন, এ দু’টি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সদাক্বাহর মাল। তাঁর প্রয়োজন পুরণের জন্য এটি খরচ হতো। তিনি এ সম্পদ রাষ্ট্রপ্রাধানের তত্ত্বাবধানে রাখার নির্দেশ দিয়েছেন। বর্ণনাকারী বলেন, ঐ সময় পর্যন্ত তা এভাবেই ছিল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3092) صحیح مسلم (1759)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. صالح: هو ابن كيسان. وأخرجه البخاري (٣٠٩٢) و (٣٠٩٣)، ومسلم (١٧٥٩) من طريق إبراهيم بن سعد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥). وانظر سابقيه. قال الخطابي: تعرُوه، أى: تغشاه وتنتابه، يقال: عَراني ضيفٌ، وعراني همٌ أي: نزل بي.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ ثَوْرٍ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، فِي قَوْلِهِ { فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلاَ رِكَابٍ } قَالَ صَالَحَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَهْلَ فَدَكَ وَقُرًى قَدْ سَمَّاهَا لاَ أَحْفَظُهَا وَهُوَ مُحَاصِرٌ قَوْمًا آخَرِينَ فَأَرْسَلُوا إِلَيْهِ بِالصُّلْحِ قَالَ { فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلاَ رِكَابٍ } يَقُولُ بِغَيْرِ قِتَالٍ قَالَ الزُّهْرِيُّ وَكَانَتْ بَنُو النَّضِيرِ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم خَالِصًا لَمْ يَفْتَحُوهَا عَنْوَةً افْتَتَحُوهَا عَلَى صُلْحٍ فَقَسَمَهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بَيْنَ الْمُهَاجِرِينَ لَمْ يُعْطِ الأَنْصَارَ مِنْهَا شَيْئًا إِلاَّ رَجُلَيْنِ كَانَتْ بِهِمَا حَاجَةٌ .
আয-যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর বাণীঃ “তা অর্জনের জন্য তোমরা ঘোড়া বা উট দৌঁড়াওনি......” এ সম্পর্কে বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাদাক এবং আরেকটি গ্রামের লোকদের সাথে সন্ধি করেন। (যুহরী) গ্রামের নাম উল্লেখ করলেও আমি (মা’মার) তা স্মরণ রাখিনি। তিনি এ সময় আরেকটি জনপদ অবরোধ করেন। তারা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সন্ধির প্রস্তাব করে। মহান আল্লাহ বললেনঃ “তা অর্জনের জন্য তোমরা ঘোড়া বা উট হ্যাঁকাওনি”। অর্থাৎ তা বিনা যুদ্ধে অর্জিত। যুহুরী বলেন, বনু নাযীর গোত্রের এলাকাও নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ইচ্ছাধীন ছিল। তারা এ এলাকাটি বল প্রয়োগে জয় করেননি, বরং জয় করেছেন সন্ধির মাধ্যমে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ সম্পদ মুজাহিরদের মাঝে বন্টন করেন এবং আনসারদের এ থেকে কিছুই দেননি। অব্যশ্য দু’জনকে দিয়েছেন। কারণ তাদের খুবই প্রয়োজন ছিল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، السند مرسل،الزہري مدلس ، وھو من صغار التابعین ، (انوار الصحیفہ ص 107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكنه مرسل. لكن قوله في آخر الحديث في تقسيم نخل بني النضير سيأتي عند المصنف (٣٠٠٤) بسند صحيح. معمر: هو ابن راشد، وابن ثور: هو محمد، ومحمد بن عُبيد: هو ابن حساب. وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" ٢/ ٢٨٣، وأخرجه الطبري في "تفسيره" ٢٨/ ٣٥ - ٣٦، والبيهقي ٦/ ٢٩٦ من طريق محمد بن ثور، كلاهما (عبد الرزاق وابن ثور) عن معمر، به.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْجَرَّاحِ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الْمُغِيرَةِ، قَالَ جَمَعَ عُمَرُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ بَنِي مَرْوَانَ حِينَ اسْتُخْلِفَ فَقَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَتْ لَهُ فَدَكُ فَكَانَ يُنْفِقُ مِنْهَا وَيَعُودُ مِنْهَا عَلَى صَغِيرِ بَنِي هَاشِمٍ وَيُزَوِّجُ مِنْهَا أَيِّمَهُمْ وَإِنَّ فَاطِمَةَ سَأَلَتْهُ أَنْ يَجْعَلَهَا لَهَا فَأَبَى فَكَانَتْ كَذَلِكَ فِي حَيَاةِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى مَضَى لِسَبِيلِهِ فَلَمَّا أَنْ وَلِيَ أَبُو بَكْرٍ رضى الله عنه عَمِلَ فِيهَا بِمَا عَمِلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي حَيَاتِهِ حَتَّى مَضَى لِسَبِيلِهِ فَلَمَّا أَنْ وَلِيَ عُمَرُ عَمِلَ فِيهَا بِمِثْلِ مَا عَمِلاَ حَتَّى مَضَى لِسَبِيلِهِ ثُمَّ أَقْطَعَهَا مَرْوَانُ ثُمَّ صَارَتْ لِعُمَرَ بْنِ عَبْدِ الْعَزِيزِ قَالَ - يَعْنِي عُمَرَ بْنَ عَبْدِ الْعَزِيزِ - فَرَأَيْتُ أَمْرًا مَنَعَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَاطِمَةَ عَلَيْهَا السَّلاَمُ لَيْسَ لِي بِحَقٍّ وَأَنَا أُشْهِدُكُمْ أَنِّي قَدْ رَدَدْتُهَا عَلَى مَا كَانَتْ يَعْنِي عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَلِيَ عُمَرُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ الْخِلاَفَةَ وَغَلَّتُهُ أَرْبَعُونَ أَلْفَ دِينَارٍ وَتُوُفِّيَ وَغَلَّتُهُ أَرْبَعُمِائَةِ دِينَارٍ وَلَوْ بَقِيَ لَكَانَ أَقَلَّ .
আল-মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন ‘উমার ইবনু ‘আব্দুল ‘আযীযকে (রাহিমাহুল্লাহ) খলীফাহ নিযুক্ত করা হলে তিনি মারওয়ানের পুত্রদেরকে ডেকে একত্রে করে বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাদাকের সম্পদের অধিকারী ছিলেন। এর থেকে তিনি তাঁর পরিবারের ভরণপোষণ করতেন, গরীবদের সাহায্য করতেন, হাশিম গোত্রের নাবালক শিশুদের দান করতেন এবং তাদের বিধবাদের বিবাহে খরচ করতেন। তাঁর কন্যা ফাত্বিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকট এ সম্পদ চাইলে তিনি তা দিতে অসম্মতি জানান। রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবদ্দশায় তাঁর মৃত্যু পর্যন্ত তা এভাবেই রয়ে যায়। পরে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলিফাহ হলে তিনি তার জীবদ্দশায় এ সম্পদের ব্যাপারে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নীতি অনুসরন করলেন। ‘উমারও (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফাহ হওয়ার পর মৃত্যুর পর্যন্ত উভয় পূর্বসূরীর নীতি অনুসরণ করলেন। অতঃপর মারওয়ান এ সম্পদ জায়গীর হিসাবে দখল করেন। এখন ‘উমার ইবনু ‘আবদুল আযীয(রাহিমাহুল্লাহ) এর মালিক। ‘উমার ইবনু ‘আবদুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন, আমি একটা বিষয় লক্ষ্য করছি, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে সম্পদ ফাত্বিমাহকে(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেননি তা আমার জন্য কীভাবে বৈধ হবে! এতে আমার কোন অধিকার নাই। আমি তোমাদের সাক্ষী রেখে বলছি, আমি অবশ্যই এ সম্পদ ঐ অবস্থায় নিব যেরূপ রাসূলুল্লাহর(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুগে ছিল।
আবূ দাঊদ(রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘উমার ইবনু ‘আবদুল ‘আযীয(রাহিমাহুল্লাহ) যখন খলীফাহ নিযুক্ত হন তখন ঐ সম্পদের মূল্য ছিল চল্লিশ হাজার দীনার এবং তাঁর মৃত্যুর সময় এর মূল্য দাঁড়ায় চার হাজার দীনার। তিনি জীবিত থাকলে এর মূল্য আরো কমতো।
দুর্বলঃ মিশকাত (৪০৬৩)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، السند منقطع ومغیرۃ بن مقسم مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 107، 108)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: أثر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الله بن الجراح، فهو صدوق حسن الحديث ولكنه متابع. المغيرة: هو ابن مِقسَم الضبي، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه البيهقي ٦/ ٣٠١ من طريق عبد الله بن الجراح، والبلاذري في "فتوح البلدان " ص ٤٥ عن عثمان بن أبي شيبة، وابن عبد البر في "التمهيد" ٨/ ١٦٩ - ١٧٠ من طريق محمد بن حميد الرازي، ثلاثتهم عن جرير بن عبد الحميد، به. قال الخطابي: إنما أُقطِعها مروان في أيام حياة عثمان بن عفان، وكان ذلك مما عابوه وتعلقوا به عليه، وكان تأويله في ذلك -والله أعلم- ما بلغه عن رسول الله ﷺ من قوله: "إذا أطعم الله نبياً طعمة فهي للذي يقوم من بعده".وكان رسول الله ﷺ يأكل منها وينفق على عياله قوت سنة، ويصرف الباقي مصرف الفيء، فاستغنى عثمان عنها بماله فجعلها لأقربائه ووصل بها أرحامهم، وقد روى أبو داود هذا الحديث. قلنا: هو الحديت الآتى.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْفُضَيْلِ، عَنِ الْوَلِيدِ بْنِ جُمَيْعٍ، عَنْ أَبِي الطُّفَيْلِ، قَالَ جَاءَتْ فَاطِمَةُ رضى الله عنها إِلَى أَبِي بَكْرٍ رضى الله عنه تَطْلُبُ مِيرَاثَهَا مِنَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ عَلَيْهِ السَّلاَمُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ إِذَا أَطْعَمَ نَبِيًّا طُعْمَةً فَهِيَ لِلَّذِي يَقُومُ مِنْ بَعْدِهِ " .
আবুত তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ফাত্বিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট এসে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সম্পদে তার মীরাস দাবি করেন। বর্ণনাকারী বলেন, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ আল্লাহ কোন নাবীকে জীবন ধারণের ব্যবস্থা করে দিলে তাঁর পরবর্তীতে তাঁর স্থলাভিষিক্ত ব্যক্তি এর হকদার।
হাসানঃ ইরওয়া(১২৪১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل الوليد بن جميع -وهو الوليد بن عبد الله بن جميع- فهو صدوق حسن الحديث. وأخرجه أحمد (١٤)، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة"١/ ١٩٨، والبزار (٥٤)، وأبو بكر المروزي في "مسند أبي بكر" (٧٨)، وأبو يعلى (٣٧) و (٦٧٥٢)، والبيهقي ٦/ ٣٠٣ من طريق محمد بن فضيل، به. وزادوا جميعاً في آخره قول فاطمة لأبي بكر: أنتَ ما سمعتَ من رسول الله ﷺ، وبعضهم قال: أنت ورسول الله ﷺ أعلم. وله شاهد عند البخاري في "تاريخه الكبير" ٤/ ٤٦، والسهمي في "تاريخ جرجان" ص ٤٩٣، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٧٣٥٥) من طريق سليمان بن عبد الرحمن، حدَّثنا الوليد بن مسلم، حدَّثنا عبد الله بن العلاء بن زَبْر، وغيره، أنهما سمعا بلال بن سعد يحدث عن أبيه سعد بن تميم السكوني وكان من الصحابة قال: قيل: يا رسول الله، ما للخليفة من بعدك؟ قال: "مثل الذي لي، ما عدل في الحكم وقسط في القسط ورحم ذا الرحم، فمن فعل غير ذلك فليس مني ولست منه" وهذا سند صحيح. قال الخطابي: فيه حجة لمن ذهب إلى أن أربعة أخماس الفيء بعد رسول الله ﷺ للأئمة بعده.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ تَقْتَسِمُ وَرَثَتِي دِينَارًا مَا تَرَكْتُ بَعْدَ نَفَقَةِ نِسَائِي وَمُؤْنَةِ عَامِلِي فَهُوَ صَدَقَةٌ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ " مُؤْنَةِ عَامِلِي " . يَعْنِي أَكَرَةَ الأَرْضِ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমার ওয়ারিসগণ আমার পরিত্যক্ত একটি দীনারও বন্টন করবে না। আমার স্ত্রীদের ভরণপোষণ এবং শ্রমিকদের বেতন দেয়ার পর যা থাকবে তা সদাক্বাহ গণ্য হবে। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘আমার কর্মচারী’ অর্থাৎ কৃষি শ্রমিক।
সহীহঃ মুখতাসার শামায়িল(৩৪০)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3096) صحیح مسلم (1760)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، ومالك: هو ابن أنس. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٩٩٣، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٧٧٦)، ومسلم (١٧٦٠)، ومسلم (١٧٦٠) من طريق سفيان بن عيينة، والترمذي في "الشمائل" (٣٨٥) من طريق سفيان الثوري، ثلاثتهم (مالك وابن عيينة والثوري) عن أبي الزناد، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٠٣)، و"صحيح ابن حبان" (٦٦١٠). قال ابن عيينة: أزواج النبيَّ ﷺ في حكم المعتدات إذ لا يجوز أن ينكحن، فلهذا أوجبت النفقة لهن فيما تركه رسول الله ﷺ، أو الخليفة بعده ﷺ. والأكرة: جمع أكار، كأنه جمع آكر: الحراث.