সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا ابْنُ إِدْرِيسَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُتْبَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَامَ الْفَتْحِ جَاءَهُ الْعَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ بِأَبِي سُفْيَانَ بْنِ حَرْبٍ فَأَسْلَمَ بِمَرِّ الظَّهْرَانِ فَقَالَ لَهُ الْعَبَّاسُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ أَبَا سُفْيَانَ رَجُلٌ يُحِبُّ هَذَا الْفَخْرَ فَلَوْ جَعَلْتَ لَهُ شَيْئًا . قَالَ " نَعَمْ مَنْ دَخَلَ دَارَ أَبِي سُفْيَانَ فَهُوَ آمِنٌ وَمَنْ أَغْلَقَ عَلَيْهِ بَابَهُ فَهُوَ آمِنٌ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মাক্কা বিজয়ের দিন ‘আব্বাস ইবনু ‘আবদুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ সুফিয়ান ইবনু হারবকে সাথে নিয়ে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট আসেন। মাররুয-যাহরান নামক জায়গাতে পৌঁছে আবূ সুফিয়ান ইসলাম কবুল করলেন। ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আবূ সুফিয়ান এমন ব্যক্তি, যে নেতৃত্বের গৌরব পছন্দ করে। যদি আপনি তাঁর জন্য কিছু করতেন! তিনি বললেন, হ্যাঁ, আজকে আবূ সুফিয়ানের বাড়িতে কেউ আশ্রয় নিলে সে নিরাপত্তা পাবে এবং যে ব্যক্তি নিজের ঘরের দরজা বন্ধ রাখবে সেও নিরাপদ থাকবে।
হাসান : মুসলিম – শেষের বাক্যটি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن م الجملة الأخيرة أبي هريرة
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، وللحدیث شاھد عند مسلم (1780)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق، فهو صدوق حسن الحديث، وقد صرح بالتحديث في رواية الطبراني في "الكبير"، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" في ترجمة أبي سفيان، فانتفت شبهة تدليسه ثم هو متابع. وقال الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ٣٢٢: حديث متصل الإسناد صحيح. ابن إدريس: هو عبد الله. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٤/ ٤٩٦، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٤٨٦)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ٣١٩ - ٣٢١، والطبراني في "الكبير" (٧٢٦٤)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" في ترجمة أبي سفيان، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٩/ ١١٨، وفي "معرفة السنن والأثار، (١٨٢٥١)، وفي "دلائل النبوة" ٥/ ٣١ و ٣١ - ٣٢ من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه البزار في "مسنده" (١٢٩٢)، والطبري في "تاريخه" ٢/ ١٥٧، والبيهقي في "الدلائل" ٥/ ٣٢ من طريق يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، قال: حدَّثنا الحُسين ابن عَبد الله بن عُبيد الله بن عباس، عن عكرمة، عن ابن عباس. والحسين بن عبد الله ضعيف. وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (٩٧٣٩) من طريق عثمان الجزري، عن مقسم، عن ابن عباس. وعثمان الجزري -وهو ابن عمرو- ضعيف. وأخرجه الطحاوي في "شرح معانى الآثار" ٣/ ٣١٤، والبيهقي في "الدلائل" ٥/ ٣٢ - ٣٤ من طريق أيوب، عن عكرمة مرسلاً والإسناد إليه صحيح. وباجتماع هذه الطرق مع الطريق الآتي بعده يصح الحديث إن شاء الله. وللمرفوع منه شاهد من حديث أبي هريرة عند مسلم (١٧٨٠)، والنسائي في "الكبرى" (١١٢٣٤)، وسيأتي عند المصنف برقم (٣٠٢٤). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرٍو الرَّازِيُّ، حَدَّثَنَا سَلَمَةُ، - يَعْنِي ابْنَ الْفَضْلِ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنِ الْعَبَّاسِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَعْبَدٍ، عَنْ بَعْضِ، أَهْلِهِ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لَمَّا نَزَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَرَّ الظَّهْرَانِ قَالَ الْعَبَّاسُ قُلْتُ وَاللَّهِ لَئِنْ دَخَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَكَّةَ عَنْوَةً قَبْلَ أَنْ يَأْتُوهُ فَيَسْتَأْمِنُوهُ إِنَّهُ لَهَلاَكُ قُرَيْشٍ فَجَلَسْتُ عَلَى بَغْلَةِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْتُ لَعَلِّي أَجِدُ ذَا حَاجَةٍ يَأْتِي أَهْلَ مَكَّةَ فَيُخْبِرُهُمْ بِمَكَانِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لِيَخْرُجُوا إِلَيْهِ فَيَسْتَأْمِنُوهُ فَإِنِّي لأَسِيرُ إِذْ سَمِعْتُ كَلاَمَ أَبِي سُفْيَانَ وَبُدَيْلِ بْنِ وَرْقَاءَ فَقُلْتُ يَا أَبَا حَنْظَلَةَ فَعَرَفَ صَوْتِي فَقَالَ أَبُو الْفَضْلِ قُلْتُ نَعَمْ . قَالَ مَا لَكَ فِدَاكَ أَبِي وَأُمِّي قُلْتُ هَذَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَالنَّاسُ . قَالَ فَمَا الْحِيلَةُ قَالَ فَرَكِبَ خَلْفِي وَرَجَعَ صَاحِبُهُ فَلَمَّا أَصْبَحَ غَدَوْتُ بِهِ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَسْلَمَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ أَبَا سُفْيَانَ رَجُلٌ يُحِبُّ هَذَا الْفَخْرَ فَاجْعَلْ لَهُ شَيْئًا . قَالَ " نَعَمْ مَنْ دَخَلَ دَارَ أَبِي سُفْيَانَ فَهُوَ آمِنٌ وَمَنْ أَغْلَقَ عَلَيْهِ دَارَهُ فَهُوَ آمِنٌ وَمَنْ دَخَلَ الْمَسْجِدَ فَهُوَ آمِنٌ " . قَالَ فَتَفَرَّقَ النَّاسُ إِلَى دُورِهِمْ وَإِلَى الْمَسْجِدِ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, (মাক্কাহ বিজয়ের সময়) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মাররুয-যাহরান নামক স্থানে অবস্থান করেছিলেন তখন ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনে মনে বললেন, আল্লাহর শপথ করে বলছি! তারা এসে আশ্রয় চাওয়ার আগেই যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জোরপূর্বক মক্কায় ঢুকেন তাহলে তা কুরাইশদের জন্য ধ্বংসের কারণ হবে। আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খচ্চরের পিঠে বসে মনে মনে বললাম, আমি যদি যাওয়ার মতো লোক পেতাম, আর ঐ লোক মক্কাবাসীদের নিকট গিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর অবস্থানস্থল সম্পর্কে অবহিত করতো এবং তাঁর কাছে এসে তারা নিরাপত্তা চাইতো। এ চিন্তা করতে করতে আমি সওয়ারী নিয়ে এগুচ্ছিলাম। হঠাৎ আমি আবূ সুফিয়ান ও বুদাইল ইবনু ওয়ারাকার কথোপকথন শুনতে পাই। আমি বললাম, হে আবূ হানযালাহ। সে আমার কণ্ঠস্বর চিনতে পেরে বললো, আবুল ফাদল নাকি? আমি বললাম, হ্যাঁ। সে বললো, আমার পিতামাতা তোমার জন্য কোরবান হোক। কি ব্যাপার? আমি বললাম, এই তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথের সৈন্যবাহিনী। সে বললো, বাঁচার জন্য কি কৌশল অবলম্বন করা যায়? ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ সুফিয়ান আমার পিছনে সওয়ার হলো এবং তার সাথী ফিরে গেলো। অতঃপর ভোর বেলায় উপস্থিত হলাম। সে ইসলাম কবুল করলো। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আবূ সুফিয়ান এমন লোক যে নেতৃত্বের গৌরব পছন্দ করে, তাঁর জন্য কিছু করুন। তিনি বললেন, হ্যাঁ। যে ব্যাক্তি আবূ সুফিয়ানের ঘরে আশ্রয় নিবে সে নিরাপদ; যে নিজের ঘরের দরজা বন্ধ করবে সেও নিরাপদ। বর্ণনাকারী বলেন, লোকজন নিজেদের ঘর ও মাসজিদুল হারামে আশ্রয় নিলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، بعض أھلہ مجہول ، والحدیث السابق (الأصل: 3021) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 110)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الراوي عن ابن عباس، ولكنه متابع كما بيناه في الطريق السابق قبله. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" ٩/ ١١٨، وفي "معرفة السنن والآثار" (١٨٢٥٢) من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. قال الخطابي: فيه من الفقه أن المشرك إذا خرج من دار الكفر وأسلم وبقيت زوجته في دار الكفر لم تُسلم، فإن الزوجية بينهما لا تنفسخ ما اجتمعا على الإسلام قبل انقضاء العدة، وذلك أن رسول الله ﷺ لم يكن ظهر على مكة بعدُ. وأسلم أبو سفيان بمر الظهران، وبقيت هند بمكة وهى دار كفر بعد، ثم اجتمعا في الإسلام قبل انقضاء العدة فكانا على نكاحهما. واحتج بقوله: "من دخل دار أبي سفيان فهو آمن" من زعم أن فتح مكة كان عنوة لا صلحاً، وأن للإمام إذا ظهر على قوم كفار أن يؤمن من شاء منهم، فيُمنَّ عليه، ويقتل من شاء منهم، وله أن يترك الأرض في أيدي أهلها، لا يقسمها بين الغانمين. وذلك: أن رسول الله ﷺ ترك أرض مكة ودورها في أيدي أهلها، ولم يقسمها. وممن قال إنه فتحها عنوة: الأوزاعي وأبو يوسف، وأبو عُبيد القاسم بن سلام، إلا أن أبا عبيد زعم أنه منَّ على أهلها، فردها عليهم، ولم يقسمها، ولم يجعلها فيئاً، وكان هذا خاصاً لرسول الله ﷺ في مكة، ليس لغيره من الأئمة أن يفعل ذلك في شيء من البلدان غيرها. وذلك: أنها مسجد لجماعة المسلمين، وهي مُناخ من سبق. وأجور بيوتها لا تطيب ولا تباع رباعها. وليس هذا لغيرها من البلدان. وقال الشافعي: فتحت مكة صلحاً. وقد سبق لهم أمان. فمنهم من أسلم قبل أن يُظْهَر لهم على شيء، ومنهم من لم يُسلم، وصار إلى قبول الأمان بإلقاء السلاح ودخول داره. فكيف يغنم مال مُسلم، أو مال من بُذِل له الأمان؟ ومَرّ الظهران: موضع بينه وبين البيت ستة عشر ميلاً، ويُعرف الآن باسم وادي فاطمة، أو الجُمُوم.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الْكَرِيمِ - حَدَّثَنِي إِبْرَاهِيمُ بْنُ عَقِيلِ بْنِ مَعْقِلٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ وَهْبِ بْنِ مُنَبِّهٍ، قَالَ سَأَلْتُ جَابِرًا هَلْ غَنِمُوا يَوْمَ الْفَتْحِ شَيْئًا قَالَ لاَ .
ওয়াহ্ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, তারা মাক্কাহ বিজয়ের দিন কোন গণিমত লাভ করেছিলেন কি? তিনি বললেন, না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ٢/ ١٤٣، والبيهقي ٩/ ١٢١ من طريق إسماعيل ابن عبد الكريم، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا سَلاَّمُ بْنُ مِسْكِينٍ، حَدَّثَنَا ثَابِتٌ الْبُنَانِيُّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ رَبَاحٍ الأَنْصَارِيِّ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمَّا دَخَلَ مَكَّةَ سَرَّحَ الزُّبَيْرَ بْنَ الْعَوَّامِ وَأَبَا عُبَيْدَةَ بْنَ الْجَرَّاحِ وَخَالِدَ بْنَ الْوَلِيدِ عَلَى الْخَيْلِ وَقَالَ " يَا أَبَا هُرَيْرَةَ اهْتِفْ بِالأَنْصَارِ " . قَالَ اسْلُكُوا هَذَا الطَّرِيقَ فَلاَ يُشْرِفَنَّ لَكُمْ أَحَدٌ إِلاَّ أَنَمْتُمُوهُ . فَنَادَى مُنَادٍ لاَ قُرَيْشَ بَعْدَ الْيَوْمِ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ دَخَلَ دَارًا فَهُوَ آمِنٌ وَمَنْ أَلْقَى السِّلاَحَ فَهُوَ آمِنٌ " . وَعَمَدَ صَنَادِيدُ قُرَيْشٍ فَدَخَلُوا الْكَعْبَةَ فَغَصَّ بِهِمْ وَطَافَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَصَلَّى خَلْفَ الْمَقَامِ ثُمَّ أَخَذَ بِجَنْبَتَىِ الْبَابِ فَخَرَجُوا فَبَايَعُوا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عَلَى الإِسْلاَمِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ سَمِعْتُ أَحْمَدَ بْنَ حَنْبَلٍ سَأَلَهُ رَجُلٌ قَالَ مَكَّةَ عَنْوَةً هِيَ قَالَ أَيْشٍ يَضُرُّكَ مَا كَانَتْ قَالَ فَصُلْحٌ قَالَ لاَ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মাক্কাহয় প্রবেশ করলেন, তিনি যুবাইর ইবনুল ‘আওয়াম, আবূ ‘উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ ও খালিদ ইবনুল ওয়ালীদকে ঘোড়ায় চড়ে (পরিস্থিতি লক্ষ্য রাখতে) প্রেরণ করেন। তিনি বললেনঃ হে আবূ হুরায়রা! আনসারদের আমার নিকট ডেকে বলুন, এই এই পথ ধরে অগ্রসর হতে। যেই তোমাদের সামনে পড়বে তাকে হত্যা করবে। একজকন ঘোষক ঘোষণা করলেন, আজকের পরে কুরাইশরা অবশিষ্ট থাকবে না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, যে ব্যক্তি ঘরে প্রবেশ করবে সে নিরাপদ। যে অস্ত্র সমর্পণ করবে সেও নিরাপদ। কুরাইশ নেতারা (নিরাপত্তার জন্য) কা’বা ঘরে ঢুকলো। এতে কা’বা ঘর ভরে গেলো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা’বা ঘর তাওয়াফ করলেন এবং মাকামে ইবরাহীমে সালাত আদায় করে দরজার চৌকাঠ ধরে দাঁড়ালেন। তারা বের হয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে ইসলামের উপর বাই‘আত গ্রহণ করলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، انظر الحدیث السابق (1872)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ثابت البُناني: هو ابنُ أسلم. وأخرجه بأطول مما هاهنا مسلم (١٧٨٠)، والنسائي في "الكبرى" (١١٢٣٤) من طريق ثابت بن أسلم البناني، به. وهو في "مسند أحمد" (١٠٩٤٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٦٠). وقوله في آخر الحديث: وطاف النبي ﷺ، وصلى خلف المقام، سلف عند المصنف برقم (١٨٧١) و (١٨٧٢). قوله: "سَرَّح" قال في "اللسان": سرَّحتُ فلاناً إلى موضع كذا: إذا أرسلتَه. وقوله: "لا يُشرفن لكم أحد إلا أنمتموه" قال النووي في "شرح مسلم": ما أشرف لهم أحد إلا أناموه، أي: ما ظهر لهم أحد إلا قتلوه. وقوله: "صناديد قريش": قال ابن الأثير: هم أشرافُهم وعظماؤهم ورؤساؤهم، الواحد صِنْديد، وكل عظيم غالب صِنديدٌ. وقوله: "بجنَبتَي الباب" قال صاحب "اللسان" الجانب: الناحية، وكذلك الجَنَبة.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الْكَرِيمِ - حَدَّثَنِي إِبْرَاهِيمُ، - يَعْنِي ابْنَ عَقِيلِ بْنِ مُنَبِّهٍ - عَنْ أَبِيهِ، عَنْ وَهْبٍ، قَالَ سَأَلْتُ جَابِرًا عَنْ شَأْنِ، ثَقِيفٍ إِذْ بَايَعَتْ قَالَ اشْتَرَطَتْ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنْ لاَ صَدَقَةَ عَلَيْهَا وَلاَ جِهَادَ وَأَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعْدَ ذَلِكَ يَقُولُ " سَيَتَصَدَّقُونَ وَيُجَاهِدُونَ إِذَا أَسْلَمُوا " .
ওয়াহ্ব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে জিজ্ঞেস করি, বনূ সাক্বীফ যখন বাই‘আত গ্রহণ করলো, তখন তারা কি কি শর্ত আরোপ করেছিলো? তিনি বললেন, তারা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর এ শর্তের উপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে বাই’আত নিলো যে, তারা যাকাত দিবে না এবং জিহাদে যোগদান করবে না। এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছেন: তারা যখন ইসলাম গ্রহণ করবে তখন যাকাত দিবে, জিহাদেও যোগদান করবে।
সহীহ : সহীহাহ (১৮৮৮)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، وللحدیث شاھد عند أحمد (3/343)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (١٥٢٥)، والبيهقي في "دلائل النبوة" ٥/ ٣٠٦ من طريق إسماعيل بن عبد الكريم، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (١٤٦٧٣)، وابن أبي عاصم في "الآحاد" (١٥٢٤) من طريق أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله. وفي إسناده ابنُ لهيعة، وعنعنة أبي الزبير محمد بن مسلم بن تدرُس المكي. فيغني عنه الإسناد السابق. وانظر فقه الحديث عند الحديث التالي.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ سُوَيْدٍ، - يَعْنِي ابْنَ مَنْجُوفٍ - حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، عَنْ حَمَّادِ بْنِ سَلَمَةَ، عَنْ حُمَيْدٍ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي الْعَاصِ، أَنَّ وَفْدَ، ثَقِيفٍ لَمَّا قَدِمُوا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْزَلَهُمُ الْمَسْجِدَ لِيَكُونَ أَرَقَّ لِقُلُوبِهِمْ فَاشْتَرَطُوا عَلَيْهِ أَنْ لاَ يُحْشَرُوا وَلاَ يُعْشَرُوا وَلاَ يُجَبُّوا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لَكُمْ أَنْ لاَ تُحْشَرُوا وَلاَ تُعْشَرُوا وَلاَ خَيْرَ فِي دِينٍ لَيْسَ فِيهِ رُكُوعٌ " .
উসমান ইবনু আবুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট বনূ সাক্বীফের প্রতিনিধি দল এলে তিনি তাদেরকে মাসজিদে অবস্থান করালেন, যেন তাদের মন নরম হয়। তারা তাঁর প্রতি শর্ত আরোপ করলো যে, তাদেরকে যুদ্ধে যেতে বাধ্য করা যাবে না, তাদের কাছ থেকে ‘উশর আদায় করা যাবে না এবং তাদেরকে সালাত আদায়ে বাধ্য করা যাবে না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃএ মুহূর্তে তোমাদের জন্য যুদ্ধে যোগদান ও ‘উশর দেয়া বাধ্যতামূলক নয়। তবে যে দ্বীনের মধ্যে রুকূ’ (সালাত) নেই তাতে কল্যাণ নাই।
দুর্বল : যইফাহ (৪৩১৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، حمید الطویل والحسن البصري عنعنا ، (انوار الصحیفہ ص 110)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، إلا أن في سماع الحسن -وهو البصري من عثمان بن أبي العاص- اختلافاً كما بيناه في "مسند أحمد" (١٦٢٨٠). حميد: هو ابن أبي حميد الطويل، وأبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي. وأخرجه الطيالسي (٩٣٩)، وابن أبي شيبة ٣/ ١٩٧، وأحمد (١٧٩١٣)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثانى" (١٥٢٠)، وابن الجارود (٣٧٣)، وابن خزيمة (١٣٢٨)، والطبراني في "الكبير" (٨٣٧٢)، والبيهقي ٢/ ٤٤٤ من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. ورواية بن خزيمة مختصرة بقصنة إنزالهم المسجد. قال الخطابي: قوله: "لا تحشَروا" معناه: الحشر في الجهاد والنفير له. وقوله: "وأن لا تعشروا" معناه: الصدقة، أي: لا يؤخذ عشرُ أموالهم. وقوله: "أن لا يُجَبُّوا" معناه: لا يصلُّوا، وأصل التجبية أن يكبَّ الإنسان على مُقَدَّمِه ويرفع مُؤخِّره. قلت [القائل الخطابي]: ويشبه أن يكون النبي ﷺ إنما سمح لهم بالجهاد والصدقة لأنهما لم يكونا واجبين في العاجل، لأن الصدقة إنما تجب بحلول الحول، والجهاد إنما يجب لحضور العدو، فأما الصلاة فهي راهنةٌ في كل يوم وليلة في أوقاتها الموقوتة ولم يجز أن يشترطوا تركها، وقد سئل جابر بن عبد الله عن اشتراط ثقيف أن لا صدقة عليها ولا جهاد، فقال: عَلِمَ أنهم سيتصدقون ويجاهدون إذا أسلموا. وفي هذا الحديث من العلم أن الكافر يجوز له دخول المسجد لحاجة له فيه أو للمسلم إليه.
حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، عَنْ أَبِي أُسَامَةَ، عَنْ مُجَالِدٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ عَامِرِ بْنِ شَهْرٍ، قَالَ خَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ لِي هَمْدَانُ هَلْ أَنْتَ آتٍ هَذَا الرَّجُلَ وَمُرْتَادٌ لَنَا فَإِنْ رَضِيتَ لَنَا شَيْئًا قَبِلْنَاهُ وَإِنْ كَرِهْتَ شَيْئًا كَرِهْنَاهُ قُلْتُ نَعَمْ . فَجِئْتُ حَتَّى قَدِمْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَرَضِيتُ أَمْرَهُ وَأَسْلَمَ قَوْمِي وَكَتَبَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم هَذَا الْكِتَابَ إِلَى عُمَيْرٍ ذِي مَرَّانَ قَالَ وَبَعَثَ مَالِكَ بْنَ مِرَارَةَ الرَّهَاوِيَّ إِلَى الْيَمَنِ جَمِيعًا فَأَسْلَمَ عَكٌّ ذُو خَيْوَانَ . قَالَ فَقِيلَ لِعَكٍّ انْطَلِقْ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَخُذْ مِنْهُ الأَمَانَ عَلَى قَرْيَتِكَ وَمَالِكَ فَقَدِمَ وَكَتَبَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ مِنْ مُحَمَّدٍ رَسُولِ اللَّهِ لِعَكٍّ ذِي خَيْوَانَ إِنْ كَانَ صَادِقًا فِي أَرْضِهِ وَمَالِهِ وَرَقِيقِهِ فَلَهُ الأَمَانُ وَذِمَّةُ اللَّهِ وَذِمَّةُ مُحَمَّدٍ رَسُولِ اللَّهِ " . وَكَتَبَ خَالِدُ بْنُ سَعِيدِ بْنِ الْعَاصِ .
আমির ইবনু শাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রওয়ানা হলেন। তখন হামদান গোত্রের লোকেরা আমাকে বললো, তুমি এ ব্যক্তির (রাসূলের) কাছে আমাদের প্রতিনিধি হয়ে যাবে কি? তুমি তাঁর সাথে যেসব বিষয়ে সমঝোতায় আসবে আমরা তাতে রাজি হবো। আর তুমি যা অপছন্দ করবে আমরাও তা অপছন্দ করবো। আমি বললাম, হ্যাঁ যাবো। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে উপস্থিত হয়ে তাঁর ফায়সালা মেনে নেই এবং আমার গোত্রের লোকেরা ইসলাম কবুল করলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘উমাইর যি-মাররানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট একটি পত্র লিখালেন। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি মালিক ইবনু মুরারাহ আর-রাহাবীকে সমগ্র ইয়ামানবাসীর কাছে (দ্বীনের দাওয়াতের উদ্দেশ্যে) পাঠালেন। অতঃপর আককু যু-খাইওয়ান ইসলাম কবুল করে। বর্ণনাকারী বলেন, আক্কু-কে বলা হলো, তুমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট গিয়ে তাঁর কাছ থেকে তোমার গ্রাম ও সম্পদের নিরাপত্তার ব্যবস্থা করো। সুতরাং সে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এলে তিনি তাঁর জন্য নিরাপত্তা লিখালেন। পত্রটি এরূপ: বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। মুহাম্মাদুর রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পক্ষ হতে ‘আককু যি-খাইওয়ানের প্রতি। যদি সে (মুসলিম হওয়ার ব্যাপারে) সত্যবাদী হলে তার গ্রাম, সম্পদ ও তার দাস-দাসীর যিম্মাদারীর দায়িত্ব আল্লাহ ও মুহাম্মাদুর রাসূলুল্লাহর। খালিদ ইবনু সাঈদ ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ চিঠির ফরমান লিখেছিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مجالد ضعیف ، ضعفہ الجمہور من جھۃ حفظہ ، (انوار الصحیفہ ص 110)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف من أجل مُجالد -وهو ابن سعيد-. الشعبي: هو عامر بن شَراحيل، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وقد ضعف إسنادَه الحافظ في "الإصابة" في ترجمة ذي خيوان الهمداني ٢/ ٤١٢. وأخرجه بأطول مما هاهنا ابن سعد في "الطبقات" ٦/ ٢٨، وأبو يعلى (٦٨٦٤)، وابن الأثير في "أُسدِ الغابة" ٣/ ١٢٦ من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَحْمَدَ الْقُرَشِيُّ، وَهَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ، حَدَّثَهُمْ حَدَّثَنَا فَرَجُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنِي عَمِّي، ثَابِتُ بْنُ سَعِيدٍ عَنْ أَبِيهِ، سَعِيدٍ - يَعْنِي ابْنَ أَبْيَضَ - عَنْ جَدِّهِ، أَبْيَضَ بْنِ حَمَّالٍ أَنَّهُ كَلَّمَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي الصَّدَقَةِ حِينَ وَفَدَ عَلَيْهِ فَقَالَ " يَا أَخَا سَبَإٍ لاَ بُدَّ مِنْ صَدَقَةٍ " . فَقَالَ إِنَّمَا زَرْعُنَا الْقُطْنُ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَقَدْ تَبَدَّدَتْ سَبَأٌ وَلَمْ يَبْقَ مِنْهُمْ إِلاَّ قَلِيلٌ بِمَأْرِبٍ . فَصَالَحَ نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى سَبْعِينَ حُلَّةِ بَزٍّ مِنْ قِيمَةِ وَفَاءِ بَزِّ الْمَعَافِرِ كُلَّ سَنَةٍ عَمَّنْ بَقِيَ مِنْ سَبَإٍ بِمَأْرِبَ فَلَمْ يَزَالُوا يُؤَدُّونَهَا حَتَّى قُبِضَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَإِنَّ الْعُمَّالَ انْتَقَضُوا عَلَيْهِمْ بَعْدَ قَبْضِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِيمَا صَالَحَ أَبْيَضُ بْنُ حَمَّالٍ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي الْحُلَلِ السَّبْعِينَ فَرَدَّ ذَلِكَ أَبُو بَكْرٍ عَلَى مَا وَضَعَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى مَاتَ أَبُو بَكْرٍ فَلَمَّا مَاتَ أَبُو بَكْرٍ رضى الله عنه انْتَقَضَ ذَلِكَ وَصَارَتْ عَلَى الصَّدَقَةِ .
আবইয়াদ ইবনু হাম্মাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি প্রতিনিধি দলের সাথে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট এসে তাঁর সঙ্গে যাকাত সম্পর্কে আলাপ করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে সাবার অধিবাসীগণ! যাকাত অবশ্যই দিতে হবে। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! তুলা আমাদের কৃষি উৎপাদন। আর ‘সাবার’ অধিবাসীরা তো উজাড় হয়ে গেছে। তাদের কেউ অবশিষ্ট নেই, শুধু মা’রিব শহরে মুষ্টিমেয় লোক রয়েছে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্তর জোড়া মু’আফিরী কাপড়ের মূল্যের বিনিময়ে তাদের সাথে সন্ধি করলেন। যা বাজ্জিল মা’আফিরের লোকেরা প্রতি বছর নিয়মিত আদায় করবে। সাবায় অবশিষ্ট এ লোকেরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃত্যু পর্যন্ত এ কর প্রদান করে আসছিল। রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকালের পর কর্মচারীরা তাঁর সাথে আবইয়াদ ইবনু হাম্মালের সত্তর জোড়া কাপড় প্রদানের চুক্তি ভঙ্গ করে। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটা জানতে পেরে পূর্বের চুক্তিই পুনর্বহাল রাখার হুকুম দেন। বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যুর পর শেষ পর্যন্ত সন্ধিচুক্তি বাতিল হয়ে যায় এবং তারা অপরাপর মুসলিমের মত সদাক্বাহ আদায় চালু রাখে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، قال تنویر الحق الترمذی: ثابت بن سعید بن أبیض وأبوہ: وثقھما ابن حبان وقال: ’’صدوق اللہجة‘‘ وصحح لھما ضیاء المقدسی فی المختارۃ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة سعيد بن أبيض بن حمال وابنه ثابت، فقد قال ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" ٥/ ٩٣: ثابت وأبوه مجهولان، وقال الذهبي في "الميزان" في ترجمة ثابت: لا يعرف، وقال في ترجمة سعيد بن أبيض: فيه جهالة، وقال ابن القيم في "حاشية سنن أبي داود": قال عبد الحق: لا يحتج بإسناد هذا الحديث فيما أعلم، لأن سعيداً لم يرو عنه فيما أرى إلا ثابت، وثابت مثله في الضعف يعني هذا الحديث من رواية ثابت بن سعيد بن أبيض بن حمال، عن أبيه، عن جده. عبد الله بن الزبير: هو ابن عيسى القرشي المكي. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٨٠٦) و (٨٠٧)، ومن طريقه أخرجه الضياء المقدسي في "المختارة" (١٢٨٨) من طريق فرج بن سعيد، بهذا الإسناد. قوله: "بَزّ": هو الثياب. و"مَعافر": قبيلة باليمن. قاله في "اللسان".
حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ سُلَيْمَانَ الأَحْوَلِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَوْصَى بِثَلاَثَةٍ فَقَالَ " أَخْرِجُوا الْمُشْرِكِينَ مِنْ جَزِيرَةِ الْعَرَبِ وَأَجِيزُوا الْوَفْدَ بِنَحْوٍ مِمَّا كُنْتُ أُجِيزُهُمْ " . قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ وَسَكَتَ عَنِ الثَّالِثَةِ أَوْ قَالَ فَأُنْسِيتُهَا . وَقَالَ الْحُمَيْدِيُّ عَنْ سُفْيَانَ قَالَ سُلَيْمَانُ لاَ أَدْرِي أَذَكَرَ سَعِيدٌ الثَّالِثَةَ فَنَسِيتُهَا أَوْ سَكَتَ عَنْهَا
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনটি বিষয়ে উপদেশ দিয়েছেন। তিনি বলেছেনঃ আরব উপদ্বীপ থেকে মুশরিকদের বিতাড়িত করবে। আমি যেভাবে রাষ্ট্রদূতদেরর সাথে সৌজন্যমূলক ব্যবহার করেছি তোমরাও অনুরূপ করবে। বর্ণনাকারী বলেন, ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তৃতীয় বিষয়টি সম্পর্কে নীরব থাকেন। অথবা তিনি বলেছেন, আমি তা ভুলে গেছি।
সহীহঃ সহীহাহ (১১৩৩)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3053) صحیح مسلم (1637)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سليمان الأحول: هو ابن أبي مسلم. وأخرجه البخاري (٣٠٥٣) و (٣١٦٨) و (٤٤٣١)، ومسلم (١٦٣٧)، والنسائي في "الكبرى" (٥٨٢٣) من طريق سليمان الأحول، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٣٥).
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، وَعَبْدُ الرَّزَّاقِ، قَالاَ أَخْبَرَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي أَبُو الزُّبَيْرِ، أَنَّهُ سَمِعَ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، يَقُولُ أَخْبَرَنِي عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ، أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " لأُخْرِجَنَّ الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى مِنْ جَزِيرَةِ الْعَرَبِ فَلاَ أَتْرُكُ فِيهَا إِلاَّ مُسْلِمًا " .
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেনঃ আমি অবশ্যই আরব উপদ্বীপ থেকে ইয়াহুদী-খৃস্টানদের বিতাড়িত করবো। এখানে মুসলিমদের ছাড়া আর কাউকে আমি থাকতে দিবো না।
সহীহঃ সহীহাহ (১৩৩৪)।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1767)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تُدرُس المكي، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعبد الرزاق: هو ابن همام الصنعاني، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، والحسن بن علي: هو الخلال. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (٩٩٨٥) و (١٩٣٦٥). وأخرجه مسلم (١٧٦٧)، والترمذي (١٦٩٩) من طريق أبي الزبير، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠١). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ، مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، عَنْ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِمَعْنَاهُ وَالأَوَّلُ أَتَمُّ .
‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন ... উপরের হাদীসের অনুরূপ। তবে পূর্বের হাদীসটি পূর্ণাঙ্গ।
আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3030)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد صرح أبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- بالسماع في الطريق السابق، فانتفت شبهة تدليسهِ. سفيان: هو الثوري. وأخرجه مسلم (١٧٦٧)، والترمذي (١٦٩٨)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٣٣) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢١٥). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْعَتَكِيُّ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ قَابُوسَ بْنِ أَبِي ظَبْيَانَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ تَكُونُ قِبْلَتَانِ فِي بَلَدٍ وَاحِدٍ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ একই রাষ্ট্রে দু’টি ক্বিবলাহ থাকতে পারে না।
দুর্বলঃ তিরমীযি (৩৩৬)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (633،634) ، قابوس: فیہ لین (تق: 5445) ضعیف ضعفہ الجمہور ، (انوار الصحیفہ ص 110)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف قابوس بن أبي ظبيان -واسم أبي ظبيان حصين بن جندب- وبه أعله ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام " ٥/ ٨١ فقال: وقابوس عندهم ضعيف، وربما ترك بعضهم حديثه. قلنا: ثم إنه قد روى سفيان الثوري عن قابوس، عن أبيه مرسلاً عند أبي عبيد في "الأموال" (١٢١)، وحميد بن زنجويه في "الأموال" (١٨٢) قال: قال رسول الله ﷺ: "ليس على مسلم جزية" وهو جزء من حديثنا، سيأتي عند المصنف مفرداً برقم (٣٠٥٣). وأخرجه الترمذي (٦٨٣) و (٦٣٩) من طريق قابوس بن أبي ظبيان، به. وزاد: "وليس على مسلم جزية". وهو في "مسند أحمد" (١٩٤٩).
حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا عُمَرُ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الْوَاحِدِ - قَالَ قَالَ سَعِيدٌ - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الْعَزِيزِ - جَزِيرَةُ الْعَرَبِ مَا بَيْنَ الْوَادِي إِلَى أَقْصَى الْيَمَنِ إِلَى تُخُومِ الْعِرَاقِ إِلَى الْبَحْرِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ قُرِئَ عَلَى الْحَارِثِ بْنِ مِسْكِينٍ وَأَنَا شَاهِدٌ أَخْبَرَكَ أَشْهَبُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ قَالَ قَالَ مَالِكٌ عُمَرُ أَجْلَى أَهْلَ نَجْرَانَ وَلَمْ يُجْلَوْا مِنْ تَيْمَاءَ لأَنَّهَا لَيْسَتْ مِنْ بِلاَدِ الْعَرَبِ فَأَمَّا الْوَادِي فَإِنِّي أَرَى إِنَّمَا لَمْ يُجْلَ مَنْ فِيهَا مِنَ الْيَهُودِ أَنَّهُمْ لَمْ يَرَوْهَا مِنْ أَرْضِ الْعَرَبِ .
উমার ইবনু ‘আবদুল ওয়াহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, সাইদ ইবনু ‘আবদুল ‘আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন, আরব উপদ্বীপের সীমা হচ্ছেঃ একদিকে ওয়াদিল কুরা হতে ইয়ামানের সীমান্ত পর্যন্ত এবং অপরদিকে ইরাকের সীমান্ত হতে আরব সাগরের তীর পর্যন্ত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح إلى سعيد بن عبد العزيز -وهو التّنوخي الدمشقى-، وهو إمام سَوَّاه الإمامُ أحمد بالأوزاعي. وأخرجه البيهقي ٩/ ٢٠٨ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وقوله: الوادي: يعني وادي القُرى. وقوله: تُخوم: الحدود والمعالم، بفتح التاء وضمها، واحدها تَخَم. قاله المنذري في "مختصر السنن". وفي تحديد جزيرة العرب أقوال متعددة حكاها المنذري في "مختصر السنن".
حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، قَالَ قَالَ مَالِكٌ قَدْ أَجْلَى عُمَرُ رَحِمَهُ اللَّهُ يَهُودَ نَجْرَانَ وَفَدَكَ .
আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, একদা হারিস ইবনু মিসকীনের সম্মুখে হাদীস পাঠ করা হয়। তখন আমি সেখানে উপস্থিত ছিলাম। আশহাব ইবনু ‘আবদুল ‘আযীয বলেন, মালিক বলেছেন, 'উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাজরানবাসীদের বহিষ্কার করেছেন কিন্তু তাইমার অধিবাসীদের বহিষ্কার করেননি। কারণ এটি আরব উপদ্বীপের অংশ নয়। আমার জানা মতে, ওয়াদিল কুরার ইয়াহুদীদের নির্বাসন দেয়া হয়নি। কারণ তাদের এ এলাকাটিকে আরব উপদ্বীপের অংশ মনে করা হয়নি।
সহীহ মাক্বতু'।
মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, 'উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাজরান ও ফাদাক এলাকার ইয়াহুদীদের বিতাড়িত করেছিলেন।
দুর্বল মাওকুফ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: موقوف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف لإنقطاعہ ، مالک بن أنس رحمہ اللّٰہ ولد بعد شہادۃ عمر رضي اللّٰہ عنہ بکثیر ، و فی الروایۃ الثانیۃ: ابن وھب لم یصرح بالسماع و ھو مدلس ، قال تنویر الحق الترمذی: ولہ بعض شواھد ذکرتہ في سیرت عمر بن الخطاب رضی اللہ عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 110، 111)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكنه مرسل، لأن مالكاً لم يدرك عمر بن الخطاب. وأخرجه البيهقي ٩/ ٢٠٩ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وإجلاء عمر لأهل نجران رواه ابن أبي شيبة أيضاً في "مصنفه" ١٤/ ٥٥٠ عن يحيى بن سعيد الأنصاري، وابن أبي شيبة ١٤/ ٥٥٠ - ٥٥١، والفاكهي في "أخبار مكة" (٢٩١٩) عن سالم بن أبي الجعد، ورواه البيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ١٣٥ عن عمر بن عبد العزيز بن مروان وهي -وإن كانت مراسيل- رجالُها ثقات، وبمجموعها يصح ذلك عن عمر بن الخطاب. لكن عمر بن عبد العزيز ذكر في روايته أن عمر بن الخطاب أجلى أيضاً أهل تيماء، خلافاً لمالك في روايته هنا، ووافقه في إجلاء أهل نجران وفَدَك.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا سُهَيْلُ بْنُ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنَعَتِ الْعِرَاقُ قَفِيزَهَا وَدِرْهَمَهَا وَمَنَعَتِ الشَّامُ مُدْيَهَا وَدِينَارَهَا وَمَنَعَتْ مِصْرُ إِرْدَبَّهَا وَدِينَارَهَا ثُمَّ عُدْتُمْ مِنْ حَيْثُ بَدَأْتُمْ " . قَالَهَا زُهَيْرٌ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ شَهِدَ عَلَى ذَلِكَ لَحْمُ أَبِي هُرَيْرَةَ وَدَمُهُ .
আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ (অচিরেই) ইরাকবাসীরা নিজেদের পরিমাপ পদ্ধতি ও দিরহাম ব্যবহার করা হতে বিরত হবে। সিরিয়ার অধিবাসীরাও তাদের পরিমাপ পদ্ধতি ও দীনার ব্যবহার করা হতে বিরত হবে। মিসরবাসীরাও তাদের পরিমাপ পদ্ধতি ও দীনার ব্যবহার করা হতে বিরত হবে। অতঃপর তোমরা যেখানে থেকে শুরু করেছো সেখানেই প্রত্যাবর্তন করবে। অধস্তন বর্ণনাকারী যুহাইর এ কথা তিনবার উচ্চারণ করেন যে, এ হাদীসের উপর আবু হুরায়রার রক্ত-মাংস সাক্ষী।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2896)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. زهير: هو ابن معاوية الجُعْفى. وأخرجه مسلم (٢٨٩٦) من طريق زهير بن معاوية الجعفي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٥٦٥). قال النووي في "شرح مسلم": القفيز: مكيال معروف لأهل العراق، قال الأزهري: هو ثمانية مكاكيك، والمكوك صاع ونصف، وهو خمس كيلجات. قلنا: وبالمكاييل المعاصرة يساوي: (٣٣) لتراً أو (١٢٨) رطلاً بغدادياً. قال النووي: وأما المُدي، فبضم الميم على وزن قُفل، وهو مكيال معروف لأهل الشام، قال العلماء: يسع خمسة عشر مكوكاً. قلنا: وبالمكاييل المعاصرة يساوي: (٨٧٥، ٦١) لتراً أو (٥ ، ٤٨٩٣٧) غراماً، أي (٩٣٧٥ ،٤٨) كيلو غراماً بالوزن. ثم قال النووي: وأما الإرْدَبُّ، فمكيالٌ معروف لأهل مصر، قال الأزهري وآخرون: يسع أربعة وعشرين صاعاً. قلنا: وبالمكاييل المعاصرة يساوي: (٦٦) لتراً، أو (٥٢٢٠٠) غراماً، أي: (٢٠٠، ٥٢) كيلو غراماً بالوزن. ثم قال النووي: وفي معنى "منعت العراق" وغيرها قولان مشهوران: أحدهما: لإسلامهم فتسقط عنهم الجزية، وهذا قد وجد. والثاني، وهو الأشهر: أن معناه أن العجم والروم يستولون على البلاد في آخر الزمان، فيمنعون حصول ذلك للمسلمين، وقد روى مسلم هذا بعد هذا بورقات عن جابر، قال: يوشك أن لا يجيء إليهم قفيز ولا درهم، قلنا: من أين ذلك؟ قال: من قبل العجم يمنعون ذاك، وذكر في منع الروم ذلك بالشام مثله … قال: وقيل: لأنهم يرتدون في آخر الزمان فيمنعون ما لزمهم من الزكاة وغيرها. وقيل: معناه أن الكفار الذين عليهم الجزية تقوى شوكتهم في آخر الزمان فيمتنعون مماكانوا يؤدونه من الجزية والخراج وغير ذلك. قلنا: وهو قول الخطابي في "معالم السنن"، ولعله الأقوى. قال النووي: وأما قوله ﷺ: "وعدتُم من حيث بدأتم" فهو بمعنى الحديث الآخر: "بدأ الإسلام غريباً وسيعود كما بدأ".
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، حَدَّثَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ هَمَّامِ بْنِ مُنَبِّهٍ، قَالَ هَذَا مَا حَدَّثَنَا بِهِ أَبُو هُرَيْرَةَ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَيُّمَا قَرْيَةٍ أَتَيْتُمُوهَا وَأَقَمْتُمْ فِيهَا فَسَهْمُكُمْ فِيهَا وَأَيُّمَا قَرْيَةٍ عَصَتِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ خُمُسَهَا لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ ثُمَّ هِيَ لَكُمْ " .
আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা কোন জনবসতিতে উপস্থিত হয়ে সেখানে অবস্থান করলে তার অংশ তোমরা পাবে। কোন জনপদের লোকেরা আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধাচরণ করলে (তা তোমাদের দখলে এলে) সেখান থেকে আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের জন্য এক-পঞ্চমাংশ পৃথক করার পর অবশিষ্ট সম্পদ তোমাদের থাকবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1756)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. معمر: هو ابن راشد. وهو في"مصنف عبد الرزاق" (١٠١٣٧)، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٧٥٦). وهو في "مسند أحمد" (٨٢١٦)، و"صحيح ابن حبان" (٤٨٢٦). قال الخطايي: فيه دليل على أن أراضي العنوة حكمها حكمُ سائرِ الأموال التي تُغنَم، وأن خمسها لأهلِ الخمس، وأربعة أخماسها للغانمين.
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ، حَدَّثَنَا سَهْلُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ أَبِي زَائِدَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، وَعَنْ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي سُلَيْمَانَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعَثَ خَالِدَ بْنَ الْوَلِيدِ إِلَى أُكَيْدِرِ دُومَةَ فَأُخِذَ فَأَتَوْهُ بِهِ فَحَقَنَ لَهُ دَمَهُ وَصَالَحَهُ عَلَى الْجِزْيَةِ .
আনাস ইবনু মালিক ও ‘উসমান ইবনু আবূ সুলাইমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খালিদ ইবনুল ওয়ালীদকে দূমাতুল জান্দালের শাসক উকাইদির ইবনু ‘আবদুল মালিকের বিরুদ্ধে অভিযানে পাঠালেন। সাহাবীরা তাকে গ্রেফতার করে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসেন। তিনি তাঁর মৃত্যুদন্ড মওকুফ করলেন এবং জিয্য়া দেয়ার শর্তে তার সাথে সন্ধিতে আবদ্ধ হলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، محمد بن إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 111)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد رجاله ثقات غير محمد بن إسحاق -وهو ابن يسار المطلبي مولاهم- فهو صدوقٌ حسنُ الحديث، ولكنه مدلس وقد عنعن، وقد روى هذا الحديثَ غيرُ يحيى بن أبي زائدة -وهو يحيي بن زكريا بن أبي زائدة- عن محمد بن إسحاق مُرسلاً، كذلك هو في "السيرة النبوية" لابن هشام ٤/ ١٧٠، وكذلك رواه سلمة بن الفضل الأبرش، عن محمد بن إسحاق عند الطبري في "تاريخه" ٢/ ١٨٥. وكذلك قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل"١/ ٣٢٤ - وقد أورد قصة أكيدر مطولةً من طريق عبد الله بن إدريس عن محمد بن إسحاق، فقال: آخره خبر من كلام ابن إسحاق - يعني به حديثنا هذا فقد جاء في آخر الخبر عنده. قلنا: لكن جاء الخبر في "سيرة ابن إسحاق" برواية يونس بن بكير، عنه، قال: حدثني يزيد بن رُومان وعبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم كما رواه البيهقي في "السنن" ٩/ ١٨٧ وبذلك حسنه ابنُ الملقن في "البدر المنير" ٩/ ١٨٥، وهو كما قال. عثمان بن أبي سليمان: هو ابن جبير بن مطعم. وأخرجه البيهقي ٩/ ١٨٦ من طريق يحيي بن زكريا بن أبي زائدة، بهذا الإسناد. قال ابن الملقن في "البدر المنير" ٩/ ١٨٦: "أُكيدر" بضم الهمزة تصغير أكدر، وهو الذي في لونه كدرة، وفي "دومة" ثلاث لغات: دومة ودمة ودوما، وهي من بلاد الشام، قال الحازمي في "المؤتلف والمختلف في أسماء الأماكن" (١/ ٤٣٨): دومة بضم الدال - ويقال: بفتحها -: دومة الجندل في أرض الشام، وبينها وبين دمشق خمس ليالٍ، وبينها وبين المدينة خمس عشرة ليلة، وصاحبها أكيدر، وذكره ابن إسحاق، فقال: هو رجل من كندة وكان من دومة، وكان نصرانياً.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ مُعَاذٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمَّا وَجَّهَهُ إِلَى الْيَمَنِ أَمَرَهُ أَنْ يَأْخُذَ مِنْ كُلِّ حَالِمٍ - يَعْنِي مُحْتَلِمًا - دِينَارًا أَوْ عِدْلَهُ مِنَ الْمَعَافِرِيِّ ثِيَابٌ تَكُونُ بِالْيَمَنِ .
মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ইয়ামানে প্রেরণের সময় নির্দেশ দেনঃ প্রত্যেক প্রাপ্তবয়স্ক ব্যক্তি থেকে এক দীনার করে জিয্য়া নিবে কিংবা সমমূল্যের ইয়ামানে উৎপাদিত মু’আফিরী কাপড় গ্রহণ করবে।
সহীহ। এটি যাকাত অধ্যায়ের প্রথম দিকে গত হয়েছে।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، ترمذی (623) نسائی (2455) ابن ماجہ (1803) ، (انوار الصحیفہ ص 111)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات سلف الكلام عليه برقم (١٥٧٦). أبو وائل: هو شقيق بن سلمة، والأعمش: هو سُليمان بن مهران، وأبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ مَسْرُوقٍ، عَنْ مُعَاذٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِثْلَهُ .
মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছ থেকে এ সানাদেও উপরের হাদীসের অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন।
আমি এটি সহীহ এবং যইফেও পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، ترمذی (623) نسائی (2455) ابن ماجہ (1803) ، (انوار الصحیفہ ص 111)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد سلف الكلام عليه برقم (١٥٧٦) مسروق: هو ابن الأجدع، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعى. وانظر ما قبله. قال الخطابي: في قوله: "من كل حالم" دليل على أن الجزية إنما تجب على الذكران منهم دون الإناث، لأن الحالم عبارة عن الرجل، فلا وجوب لها على النساء، ولا على المجانين والصبيان. وفيه بيان أن الدينار مقبول من جماعتهم، أغنياؤهم وأوساطهم في ذلك سواء، لأن النبي ﷺ بعثه إلى اليمن وأمره بقتالهم، ثم أمره بالكف عنهم إذا أعطوا ديناراً، وجعل بذل الدينار حاقناً لدمائهم، فكل من أعطاه فقد حقن دمه، وإلى هذا ذهب الشافعى، قال: وإنما هو على كل محتلم من الرجال الأحرار دون العبيد. وقال أصحاب الرأي وأحمد بن حنبل: يوضع على الموسر منهم ثمانية وأربعون درهماً وأربعة وعشرون واثنا عشر. وقال أحمد: على قدر ما يطيقون، قيل له: فيزداد في هذا اليوم وينقص، قال: نعم، على قدر طاقتهم وعلى قدر ما يرى الإمام، وقد علق الشافعي القول في إلزام الفقير الجزية.
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ هَانِئٍ أَبُو نُعَيْمٍ النَّخَعِيُّ، أَخْبَرَنَا شَرِيكٌ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ مُهَاجِرٍ، عَنْ زِيَادِ بْنِ حُدَيْرٍ، قَالَ قَالَ عَلِيٌّ لَئِنْ بَقِيتُ لِنَصَارَى بَنِي تَغْلِبَ لأَقْتُلَنَّ الْمُقَاتِلَةَ وَلأَسْبِيَنَّ الذُّرِّيَّةَ فَإِنِّي كَتَبْتُ الْكِتَابَ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم عَلَى أَنْ لاَ يُنَصِّرُوا أَبْنَاءَهُمْ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا حَدِيثٌ مُنْكَرٌ بَلَغَنِي عَنْ أَحْمَدَ أَنَّهُ كَانَ يُنْكِرُ هَذَا الْحَدِيثَ إِنْكَارًا شَدِيدًا وَهُوَ عِنْدَ بَعْضِ النَّاسِ شِبْهُ الْمَتْرُوكِ وَأَنْكَرُوا هَذَا الْحَدِيثَ عَلَى عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ هَانِئٍ قَالَ أَبُو عَلِيٍّ وَلَمْ يَقْرَأْهُ أَبُو دَاوُدَ فِي الْعَرْضَةِ الثَّانِيَةِ .
যিয়াদ ইবনু হুদাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, আমি বেঁচে থাকলে খৃস্টান বনূ তাগলিবের যুদ্ধবাজ লোকদের অবশ্যই হত্যা করবো এবং তাদের সন্তানদের বন্দী করবো। কারণ আমি তাদের ও নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর মধ্যে এ মর্মে চুক্তিপত্র লিখেছিলাম যেঃ “তারা তাদের সন্তানদের খৃস্টান বানাবে না।”
আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীসটি মুনকার (প্রত্যাখ্যাত)। আমি জানতে পেরেছি, ইমাম আহমদ ইবনু হাম্বল (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীসটি দৃঢ়ভাবে প্রত্যাখ্যাত করেছেন। কারো মতে এটা মাতরূক হাদীসের পর্যায়ে। অধস্তন বর্ণনাকারী ‘আবদুর রহমান ইবনু হানীর কারণে লোকেরা একে মুনকার হাদীস মনে করতেন। আবূ ‘আলী বলেন, আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) যখন সংকলন দ্বিতীয়বার শুনান, তখন তিনি এতে উল্লেখিত হাদীসটি পাঠ করেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو نعیم النخعي عبد الرحمٰن بن ھانئ ضعیف من جھۃ حفظہ ، ضعفہ الجمہور وفی التحریر (4032): ’’ بل ضعیف جدًا کذّبہ ابن معین‘‘! ، (انوار الصحیفہ ص 111)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف جداً، عبد الرحمن بن هانىء أبو نعيم النخعي ضعيف جداً، وشريك -وهو ابن عبد الله النخعي- ضعيف سيىء الحفظ، وإبراهيم بن مهاجر ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد، ولم يتابع، وقد ضعف هذا الحديث المصنف، وقوله: بلغني عن أحمد أنه كان ينكر هذه الحديث إنكاراً شديداً، فصحيح، فقد ذكره عنه العقيلي في "الضعفاء" ٢/ ٣٤٩ عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، عن أبيه، وقال العقيلى: لا يُتابع عليه، وضعفه كذلك عبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى" ٣/ ١١٦، ووافقه ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والإيهام" ٣/ ١١٩. وقد انفرد الطبري بتصحيح إسناد هذا الحديث في "تهذيب الآثار" -قسم مسند علي- ص ٢٢٣/ (٢٨)!! وأخرجه الطبري في "تهذيب الآثار" -قسم مسند علي- ص ٢٢٣/ (٢٨)، والعقيلي في "الضعفاء" ٢/ ٣٤٩، وابن عدي في ترجمة إبراهيم بن مهاجر من "الكامل"، وأبو نعيم الأصبهانى في "الحلية" ٤/ ١٩٨، والبيهقى ٩/ ٢١٧، والمزي في ترجمة زياد بن حدير من "تهذيب الكمال" من طريق أبي نعيم عبد الرحمن بن هانىء، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو يعلى (٣٢٣) من طريق محمد بن السائب الكلبى، عن أصبغ بن نُباتة، عن علي، ومحمد بن السائب متهم بالكذب، وشيخه متروك الحديث.