হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (3075)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ الدَّارِمِيُّ، حَدَّثَنَا وَهْبٌ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ إِلاَّ أَنَّهُ قَالَ عِنْدَ قَوْلِهِ مَكَانَ الَّذِي حَدَّثَنِي هَذَا فَقَالَ رَجُلٌ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَأَكْثَرُ ظَنِّي أَنَّهُ أَبُو سَعِيدٍ الْخُدْرِيُّ فَأَنَا رَأَيْتُ الرَّجُلَ يَضْرِبُ فِي أُصُولِ النَّخْلِ ‏.‏




ইবনু ইসহাক্ব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, ইবনু ইসহাক্ব (রাহিমাহুল্লাহ) তার নিজস্ব সানাদে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেন। তবে তাতে রয়েছেঃ 'উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবীদের মধ্যকার এক ব্যক্তি বলেছেন। আমার ধারণা সম্ভবত তিনি হলেন আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি বলেছেন, আমি দেখলাম, লোকটি খেজুর গাছের গোড়া কেটে ফেলছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (3074) ، (انوار الصحیفہ ص 113)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن كسابقه. وأخرجه البيهقي ٦/ ٩٩، وابن عبد البر في "التمهيد" ٢٢/ ٢٨٣ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله، وما سلف برقم (٣٠٧٣) و (٣٠٧٤).









সুনান আবী দাউদ (3076)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ الآمُلِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُثْمَانَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ، أَخْبَرَنَا نَافِعُ بْنُ عُمَرَ، عَنِ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ، عَنْ عُرْوَةَ، قَالَ أَشْهَدُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَضَى أَنَّ الأَرْضَ أَرْضُ اللَّهِ وَالْعِبَادَ عِبَادُ اللَّهِ وَمَنْ أَحْيَا مَوَاتًا فَهُوَ أَحَقُّ بِهِ جَاءَنَا بِهَذَا عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم الَّذِينَ جَاءُوا بِالصَّلَوَاتِ عَنْهُ ‏.‏




'উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফয়সালা করেছেনঃ জমিন আল্লাহর, বান্দাও আল্লাহর। যে ব্যক্তি পতিত জমি আবাদ করবে সে-ই এর অগ্রাধিকারী প্রাপক। এ হাদীস আমাদের কাছে তারা বর্ণনা করেছেন যারা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছ থেকে আমাদের জন্য সলাতের হাদীস বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مرسل ، قال معاذ: وحدیث السابق (3073) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 113)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد سمعه عروة من جمع من الصحابة كما ترى، لأن الذين جاؤوا بالصلوات عنه ﷺ إنما هم الصجابة. ابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عُبيد الله ابن عَبد الله بن أبي مليكة. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ١٤٢، وابن عبد البر في "التمهيد" ٢٢/ ٢٨٣ من طريق أبي داود السجستانى، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٨٢٢٨) من طريق موسى بن داود الضبي، عن نافع بن عمر الجمحي، عن ابن أبي مُليكة، عن عروة بن الزبير، عن عبد الملك بن مروان، عن مروان بن الحكم عن النبي ﷺ. قال الحافظ في "الدراية" ٢/ ٢٤٤: رجال إسناده ثقات. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٧٢٦٧) من طريق عصام بن روّاد بن الجراح، عن أبيه، عن نافع بن عمر، عن ابن أبي مليكة، عن عروة بن الزبير، عن عائشة أنها سمعت رسول الله ﷺ يقول: "من أحيا أرضاً مواتاً فهي له، وليس لعرق ظالم حقٌ". وإسناده حسن في الشواهد. وقد صح بهذا اللفظ عن عروة عن عائشة من طريق آخر سلف ذكره برقم (٣٠٧٣). وانظر سابقيه.









সুনান আবী দাউদ (3077)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ سَمُرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ أَحَاطَ حَائِطًا عَلَى أَرْضٍ فَهِيَ لَهُ ‏"‏ ‏.‏




সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কেউ (মালিকানাহীন) জমির চারপাশে দেয়াল বাঁধলে সেটা তারই প্রাপ্য।



দুর্বলঃ ইরওয়া (৫/৩৫৫, ১৫২০), মিশকাত (২৯৯৬)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی فی الکبریٰ (5763) ، قتادۃ مدلس وعنعن ، ومع ذلک صححہ ابن الجا رود (1015) ! ، (انوار الصحیفہ ص 113)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد اختلف في سماع الحسن -وهو البصري- من سمرة لغير حديث العقيقة، وقد روى عنه نسخة كبيرة غالبها في "السنن" الأربعة وعند علي ابن المدينى أن كلها سماع، وكذلك حكى الترمذي عن البخاري نحو هذا. وقال يحيى بن سعيد القطان وجماعة كثيرون: هي كتاب، قال العلائي ووافقه أبو زرعة ابن العراقي: وذلك لا يقتضي الانقطاع! سعيد: هو ابن أبي عروبة. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٧٣١) من طريق سفيان بن حبيب، عن سعيد ابن أبي عروبة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠١٣٠). وفي الباب عن عدد من الصحابة سلف ذكرهم في الأحاديث (٣٠٧٣) - (٣٠٧٦).









সুনান আবী দাউদ (3078)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي مَالِكٌ، قَالَ هِشَامٌ الْعِرْقُ الظَّالِمُ أَنْ يَغْرِسَ الرَّجُلُ فِي أَرْضِ غَيْرِهِ فَيَسْتَحِقَّهَا بِذَلِكَ ‏.‏ قَالَ مَالِكٌ وَالْعِرْقُ الظَّالِمُ كُلُّ مَا أُخِذَ وَاحْتُفِرَ وَغُرِسَ بِغَيْرِ حَقٍّ ‏.




মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, হিশাম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ঐ ব্যক্তি অন্যায়ভাবে দখলকারী যে নিজের অবৈধ অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য অন্যের জমিতে গাছ লাগায়। মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে পতিত জমি থেকে কিছু নিবে, তাতে গর্ত খনন করবে কিংবা রোপণ করবে সে অত্যাচারী।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. هشام: هو ابن عروة بن الزبير بن العوام، وابن وهب: هو عَبد الله. قال ابن عبد البر في "التمهيد" بعد أن ذكر هذا التفسير بإسناده إلى أبي داود ٢٢/ ٢٨٤: فسرهُ هشام بن عروة ومالك بن أنس بما لا أعلم فيه لغيرهما خلافاً.









সুনান আবী দাউদ (3079)


حَدَّثَنَا سَهْلُ بْنُ بَكَّارٍ، حَدَّثَنَا وُهَيْبُ بْنُ خَالِدٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ يَحْيَى، عَنِ الْعَبَّاسِ السَّاعِدِيِّ، - يَعْنِي ابْنَ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ - عَنْ أَبِي حُمَيْدٍ السَّاعِدِيِّ، قَالَ غَزَوْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم تَبُوكَ فَلَمَّا أَتَى وَادِيَ الْقُرَى إِذَا امْرَأَةٌ فِي حَدِيقَةٍ لَهَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لأَصْحَابِهِ ‏"‏ اخْرُصُوا ‏"‏ ‏.‏ فَخَرَصَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَشَرَةَ أَوْسُقٍ فَقَالَ لِلْمَرْأَةِ ‏"‏ أَحْصِي مَا يَخْرُجُ مِنْهَا ‏"‏ ‏.‏ فَأَتَيْنَا تَبُوكَ فَأَهْدَى مَلِكُ أَيْلَةَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَغْلَةً بَيْضَاءَ وَكَسَاهُ بُرْدَةً وَكَتَبَ لَهُ - يَعْنِي - بِبَحْرِهِ ‏.‏ قَالَ فَلَمَّا أَتَيْنَا وَادِيَ الْقُرَى قَالَ لِلْمَرْأَةِ ‏"‏ كَمْ كَانَ فِي حَدِيقَتِكِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ عَشَرَةَ أَوْسُقٍ خَرْصَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنِّي مُتَعَجِّلٌ إِلَى الْمَدِينَةِ فَمَنْ أَرَادَ مِنْكُمْ أَنْ يَتَعَجَّلَ مَعِي فَلْيَتَعَجَّلْ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে তাবূকের যুদ্ধে যোগদান করেছি। তিনি ওয়াদিল কুরায় পৌঁছলে এক মহিলাকে তার বাগানের মধ্যে দেখতে পান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের বললেনঃ এ বাগানের ফলের পরিমাণ কতটুকু? অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেই দশ ওয়াসাক অনুমান করলেন। তিনি মহিলাটিকে বললেনঃ তোমার বাগানের ফলের পরিমাণ ওজন করে দেখবে। অতঃপর আমরা তাবূকে পৌঁছলাম। তখন 'ঈলা' নামক স্থানের রাজা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি সাদা খচ্চর উপহার পাঠালেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাজাকে একটি চাঁদর দিলেন এবং জিয্‌য়ার বিনিময়ে তার এলাকায় নিরাপত্তার নিশ্চয়তা দিয়ে ফরমান লিখে পাঠালেন। বর্ণনাকারী বলেন, আমরা ওয়াদিল কুরায় প্রত্যাবর্তন করলে তিনি মহিলাটিকে বললেনঃ তোমার বাগানে কি পরিমাণ ফল এসেছে? সে বললো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে দশ ওয়াসাক অনুমান করেছেন তাই। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি খুব দ্রুত মদিনায় পৌঁছতে চাই। তোমাদের মধ্যে যে আমার সাথে দ্রুত যেতে চায় সে যেন তাড়াতাড়ি করে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1481) صحیح مسلم (1392 بعد ح 2281)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عمرو بن يحيي: هو ابن عمارة المازني. وأخرجه البخاري (١٤٨١)، ومسلم (١٣٩٢)، وبإثر (٢٢٨١) من طريق عمرو ابن يحيى، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٦٠٤)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٠٣) و (٦٥٠١). قال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٣٤٤: الخرص، بفتح المعجمة وحُكي كسرها، وبسكون الراء بعدها مهملة: هو حَزْر ما على النخل من الرطب تمراً، حكى الترمذي عن بعض أهل العلم أن تفسيره أن الثمار إذا أدركت من الرطب والعنب مما تجب فيه الزكاة بعث السلطان خارصاً ينظر فيقول: يخرج من هذا كذا وكذا زبيباً، وكذا وكذا تمراً، فيحصيه، وينظر مبلغ العشر فيثبته عليهم، ويُخلّي بينهم وبين الثمار، فإذا جاء وقت الجذاذ أخذ منهم العشر. انتهى. وفائدة الخرص التوسعة على أرباب الثمار في التناول منها، والبيع من زهوها، وإيثار الأهل والجيران والفقراء، لأن في منعهم منها تضييقاً لا يخفى. وقال الخطابي: أنكر أصحاب الرأي الخرص، وقال بعضهم: إنما كان يفعل تخويفاً للمزارعين لئلا يخونوا، لا ليلزم به الحكم، لأنه تخمين وغرور، أو كان يجوز قيل تحريم الربا والقمار، وتعقبه الخطابي بأن تحريم الربا والميسر متقدم، والخرص عمل به في حياة النبي ﷺ حتى مات، ثم أبو بكر وعمر فمن بعدهم، ولم ينقل عن أحد منهم ولا من التابعين تركه إلا عن الشعبي. قال: وأما قولهم: إنه تخمين وغرور، فليس كذلك، بل هو اجتهاد في معرفة مقدار التمر وإدراكه بالخرص الذي هو نوع من المقادير. وحكى أبو عبيد عن قوم منهم أن الخرص كان خاصاً بالنبي ﷺ، لأنه كان يوفق من الصواب ما لا يوفق له غيره، وتعقبه بأنه لا يلزم من كون غيره لا يُسدد لما كان يُسدد له سواء أن تثبت بذلك الخصوصية، ولو كان المرء لا يجب عليه الاتباع إلا فيما يعلم أنه يسدد فيه كتسديد الأنبياء لسَقَطَ الاتباع، وترد هذه الحجة أيضاً بإرسال النبي ﷺ الخراص في زمانه، والله أعلم. واعتل الطحاوي بأنه يجوز أن يحصل للثمرة آفة فتتلفها فيكون ما يؤخذ من صاحبها مأخوذاً بدلاً مما لم يُسلم له، وأجيب بأن القائلين به لا يُضمّنون أرباب الأموال ما تلف بعد الخرص، قال ابن المنذر: أجمع من يحفظ عنه العلم أن المخروص إذا أصابته جائحة قبل الجذاذ فلا ضمان. وقال الحافظ أيضاً: "أحصي" أي: احفظي عدد كيلها. قلنا: وأيلة، قال ياقوت: بالفتح، مدينة على ساحر بحر القُلزُم مما يلي الشام وقيل: هي آخر الحجاز وأول الشام. قلنا: هي الآن مدينة العَقَبة في المملكة الأردنية الهاشمية على ساحل البحر الأحمر الذي كان يُسمى قديماً بحر القُلزُم، وهي الميناء الوحيد للمملكة على البحر الأحمر، وإلى هذه المدينة ينسب بعض الرواة مثل يونس ابن يزيد وعُقيل بن خالد الأيليان صاحبا الزهري. وقوله: "كتب له ببحره"، قال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٣٤٥: أي: ببلده، أو المراد بأهل بحره، لأنهم كانوا سكاناً بساحل البحر، أي: أنه أقرّه عليه بما التزموه من الجزية. قلنا: فضمير كتب يعود إلى النبي ﷺ. والوسق: ستون صاعاً، والصاع يساوي بالمكاييل المعاصرة (٢.٧٥) لتراً، أو (٢١٧٥) غراماً، فيكون الستون صاعاً -يعني الوسق- يساوي (١٦٥) لتراً، أو (١٣٠.٥) كيلو غراماً.









সুনান আবী দাউদ (3080)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ غِيَاثٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ زِيَادٍ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ جَامِعِ بْنِ شَدَّادٍ، عَنْ كُلْثُومٍ، عَنْ زَيْنَبَ، أَنَّهَا كَانَتْ تَفْلِي رَأْسَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَعِنْدَهُ امْرَأَةُ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ وَنِسَاءٌ مِنَ الْمُهَاجِرَاتِ وَهُنَّ يَشْتَكِينَ مَنَازِلَهُنَّ أَنَّهَا تَضِيقُ عَلَيْهِنَّ وَيُخْرَجْنَ مِنْهَا فَأَمَرَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ تُوَرَّثَ دُورَ الْمُهَاجِرِينَ النِّسَاءُ فَمَاتَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْعُودٍ فَوَرِثَتْهُ امْرَأَتُهُ دَارًا بِالْمَدِينَةِ ‏.‏




যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা তিনি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথার উঁকুন তারাশ করছিলেন। এ সময় তাঁর কাছে 'উসমান ইবনু 'আফফানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) স্ত্রী এবং কতিপয় মুহাজির মহিলা উপস্থিত ছিলেন। তাঁর কাছে তারা তাদের বাসস্থানের সংকীর্ণতার অভিযোগ পেশ করেন। তাদেরকে ঘর থেকে বহিস্কার করা হতো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিলেনঃ মুহাজিরদের (মৃত্যুর পর) তাদের স্ত্রীরা তাদের বাসস্থানের উত্তরাধিকারী হবে। সুতরাং ‘আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেলে তার স্ত্রী তার মাদীনাহ্‌র বাসস্থানের ওয়ারিস হন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، الأعمش عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 113)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. زينب، قال أبو القاسم بن عساكر كما في "تحفة الأشراف" ١١/ ٣٢٩: أظنها امرأة ابن مسعود. وكذلك قال المنذري في "مختصر السنن": ويظن أنها امرأة عبد الله بن مسعود، قلنا: وقد روى هذا الحديث الإمامُ أحمد في "المسند" فجعله من مسندها، لكن المزي في "التحفة"رد على أبي القاسم بن عساكر بقوله: وأما قوله: "وأظنها امرأة عبد الله بن مسعود، فهو بعيد جداً، لأنه ليس بينها وبين النبي ﷺ محرمية، فكيف تفلي رأسَه؟ والأشبه أنها زينب بنت جحش زوج النبي ﷺ. قلنا: هذا ليس بحجة، فقد كانت أم حرام بنت ملحان يدخل عليها رسول الله ﷺ وهي تحت عبادة بن الصامت، وكانت تفلي رأس رسول الله ﷺ، وكان ينام عندها، ولم يثبت أن بينهما محرمية، وقصتها عند البخاري (٢٧٨٨). وأما كلثوم فهو كلثوم بن المصطلق، وهو كلثوم بن علقمة بن ناجية بن المصطلق، وهو ابن عامر بن الحارث بن أبي ضرار بن المصطلق نفسه، كما حققه الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" وكذلك يظهر من صنيع المزي حيث ذكر في الرواة عن كلثوم بن المصطلق: مهاجر أبو الحسن، الذي ذكر مَن ترجم لكلثوم بن عامر أنه من الرواة عنه، فكأنه عدهما واحداً، والصحيح أنه تابعي روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، فيكون حسن الحديث. وبقية رجال الإسناد ثقات. وأخرجه أحمد (٢٧٠٥٠)، والبيهقي ٦/ ١٥٦ من طريق عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٢٧٠٤٩) عن أسود بن عامر، عن شريك، عن الأعمش، عن جامع بن شداد عن كلثوم، عن زينب: أن النبي ﷺ ورّث النساء خِطَطَهنَّ. وشريك -وهو النخعي- ضعيف يعتبر به في المتابعات. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٣/ (٧٣٣) من طريق عاصم بن علي، عن قيس ابن الربيع، عن جامع بن شداد، عن كلثوم الخزاعي، عن أم سلمة أنها كانت تفلي رأس رسول الله ﷺ فجاءت زينب امرأة عبد الله بن مسعود … الحديث. فجعل الحديث من مسند أم سلمة، وأنها هي التي كانت تفلي رأس رسول الله ﷺ! وعاصم فيه ضعف، وقيس بن الربيع ضعيف يعتبر به إذا توبع، ولم يتابعه أحد على ذلك، بل خالفه الأعمش، وهو ثقة. قال الخطابي: قد روي عن النبي ﷺ أنه أقطع المهاجرين الدور بالمدينة، فتأولوها على وجهين: أحدهما: أنه إنماكان أقطعهم العَرَصَة ليبتنوا فيها الدور، فعلى هذا الوجه يصح ملكهم في البناء الذي أحدثوه في العَرَصَة. والوجه الآخر: أنهم إنما أُقطِعوا الدور عارية، وإليه ذهب أبو إسحاق المروزي، وعلى هذا الوجه لا يصح الملك فيها، وذلك أن الميراث لا يجري إلا فيما كان المورث مالكاً له، وقد وضعَه أبو داود في باب إحياء الموات، فقد يحتمل أن يكون إنما أحيا تلك البقاع بالبناء فيها إذ كانت غير مملوكة لأحد قبل، والله أعلم. وقد يكون نوع من الإقطاع إرفاقاً من غير تمليك، وذلك كالمقاعد في الأسواق والمنازل في الأسفار إنما يرتفق بها ولا تمتلك. فأما توريثه الدورَ نساءَ المهاجرين خصوصاً، فيشبه أن يكون ذلك على معنى القسمة بين الورثة، وإنما خصصهن بالدور لأنهن بالمدينة غرائب لا عشيرة لهن بها، فجاز لهن الدور لما رأى من المصلحة ذلك. وفيه وجه آخر: وهو أن تكون تلك الدور في أيديهن مدى حياتهن على سبيل الإرفاق بالسكنى دون الملك، كما كانت دور النبي ﷺ وحُجَرُه في أيدي نسائه بعده لا على سبيل الميراث فإنه ﷺ قال: "نحن لا نورث، ما تركناه صدقه" ويحكى عن سفيان بن عيينة أنه قال: كان نساء النبي ﷺ في معنى المعتدات لأنهن لا ينكحن، وللمعتدة السكنى، فجعل لهن سكنى البيوت ما عِشن ولا يملكن رقابها.









সুনান আবী দাউদ (3081)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ بَكَّارِ بْنِ بِلاَلٍ، أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، - يَعْنِي ابْنَ سُمَيْعٍ - حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ وَاقِدٍ، حَدَّثَنِي أَبُو عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ مُعَاذٍ، أَنَّهُ قَالَ مَنْ عَقَدَ الْجِزْيَةَ فِي عُنُقِهِ فَقَدْ بَرِئَ مِمَّا عَلَيْهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, যে ব্যক্তি জিয্য়ার জমি ক্রয় করেছে, সে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুসৃত পথ থেকে দূরে সরে গেলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مسلم أبو عبد اللّٰہ الخزاعي لم أجد من وثقہ وھو مقبول (أي مجہول الحال) انظر التقریب (6658) وفي سماعہ من معاذ رضي اللّٰہ عنہ نظر ، (انوار الصحیفہ ص 113)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن إن شاء الله، أبو عبد الله اختُلف في تعيينه، فذهب الطبراني في "المعجم الكبير"٢٠/ (١٩٦)، وفي "مسند الشاميين" (١٢٢٢) إلى أنه أبو عبد الله الأشعري، وإلى ذلك ذهب المزي في "تحفة الأشراف"، و "تهديب الكمال"، ولكن أبا القاسم ابن عساكر ذهب إلى أنه رجل آخر غير الأشعري، وأن اسمه مسلم الخزاعي مولاهم صاحب حرس معاوية، وهو أول من ولي الحرس، ومال إلى قوله ابن حجر في "تهذيب التهذيب"، قلنا: ولا يبعد أن يكون هو مسلم بن مِشكَم الخزاعي الدمشقي كاتب أبي الدرداء، فقد روى الحديث الطبراني في "المعجم الأوسط" (٨٢٤٧) فقال: مسلم بن مِشكَم، وقد ذكر المزي وتبعه ابن حجر أن في الرواة عنه زيد بن واقد، وذكر ابن حجر أن في شيوخه معاذ بن جبل. قلنا: وسواء كان هذا أو هذا أو ذاك، فالثلاثة ثقات، فهذا اختلاف لا يضر إن شاء الله. لكن المزي في "تهذيب الكمال" ذكر في ترجمة أبي عبد الله الأشعري أن رواية زيد بن واقد عنه مرسلة جزماً، أما في ترجمة زيد بن واقد في "التهذيب" فقد ذكر ذلك بصيغة التمريض، فقال: يقال: مرسل. قلنا: سماعُه منه محتمل، فقد روى عن مثل طبقة أبي عبد الله هذا، وقد صرح هنا بالسماع. وأخرجه الييهقى ٩/ ١٣٩، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" ٥٨/ ١٥٠ - ١٥١ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٠/ (١٩٦)، وفي "مسند الشاميين" (١٢٢٢) من طريق عثمان بن عبد الرحمن الطرائفي، عن صدقة بن خالد، عن زيد بن واقد، به. ولفقه الحديث انظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (3082)


حَدَّثَنَا حَيْوَةُ بْنُ شُرَيْحٍ الْحَضْرَمِيُّ، حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ، حَدَّثَنِي عُمَارَةُ بْنُ أَبِي الشَّعْثَاءِ، حَدَّثَنِي سِنَانُ بْنُ قَيْسٍ، حَدَّثَنِي شَبِيبُ بْنُ نُعَيْمٍ، حَدَّثَنِي يَزِيدُ بْنُ خُمَيْرٍ، حَدَّثَنِي أَبُو الدَّرْدَاءِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ أَخَذَ أَرْضًا بِجِزْيَتِهَا فَقَدِ اسْتَقَالَ هِجْرَتَهُ وَمَنْ نَزَعَ صَغَارَ كَافِرٍ مِنْ عُنُقِهِ فَجَعَلَهُ فِي عُنُقِهِ فَقَدْ وَلَّى الإِسْلاَمَ ظَهْرَهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَسَمِعَ مِنِّي خَالِدُ بْنُ مَعْدَانَ هَذَا الْحَدِيثَ فَقَالَ لِي أَشَبِيبٌ حَدَّثَكَ قُلْتُ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ فَإِذَا قَدِمْتَ فَسَلْهُ فَلْيَكْتُبْ إِلَىَّ بِالْحَدِيثِ ‏.‏ قَالَ فَكَتَبَهُ لَهُ فَلَمَّا قَدِمْتُ سَأَلَنِي خَالِدُ بْنُ مَعْدَانَ الْقِرْطَاسَ فَأَعْطَيْتُهُ فَلَمَّا قَرَأَهُ تَرَكَ مَا فِي يَدَيْهِ مِنَ الأَرَضِينَ حِينَ سَمِعَ ذَلِكَ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا يَزِيدُ بْنُ خُمَيْرٍ الْيَزَنِيُّ لَيْسَ هُوَ صَاحِبَ شُعْبَةَ ‏.‏




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি জিয্‌য়া দেয়ার শর্তে জমি ক্রয় করলো সে নিজের হিজরাতের শর্ত বাতিল করলো। আর যে ব্যক্তি কোন কাফিরের অমর্যাদা করে তার গরদান থেকে নিজ গরদানে তুলে নিলো, সে যেন ইসলাম থেকে পৃষ্ঠ প্রদর্শন করলো। অধস্তন বর্ননাকারী সিনান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীস খালিদ ইবনু মা‘দান আমার কাছ থেকে শুনে আমাকে জিজ্ঞেস করেন, শাবীব কি তোমার কাছে এ হাদীস বর্ণনা করেছে? আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, তুমি পুনরায় তার কাছে গেলে তাকে বলবে, তিনি যেন আমাকে এ হাদীসটি লিখে দেন। সিনান বলেন, শাবীব তাকে এ হাদীসটি লিখে দেন। অতঃপর আমি খালিদের কাছে এলে তিনি আমার কাছে লিখিত কাগজটি চান। আমি তাকে তা দিলাম। তিনি তা পড়ে নিজ মালিকানাধীন সমস্ত জিয্য়ার জমি ছেড়ে দেন, এ হাদীস শুনার পর। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ ইয়াযীদ ইবনু খুমাইর আল-ইয়াযান্নী শু‘বাহর ছাত্র নন।



সানাদ দুর্বলঃ যঈফ আল-জামি'উস সাগীর (৫৩৬৩), মিশকাত (৩৫৪৬)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عمارۃ مجہول و سنان بن قیس مقبول (تقریب التہذیب: 4850،2643) أي مجہول الحال ، (انوار الصحیفہ ص 114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف بقية -وهو ابن الوليد- وجهالة شيخه عمارة. وأخرجه البيهقي ٩/ ١٣٩ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. قال الخطابي: معنى الجزية ها هنا الخراج، ودلالة الحديث أن المسلم إذا اشترى أرضاً خراجية من كافر، فإن الخراج لا يسقط عنه، وإلى هذا ذهب أصحاب الرأي، إلا أنهم لم يروا فيما أخرجت من حب عشراً، وقالوا: لا يجتمع الخراج مع العشر. وقال عامة أهل العلم: العشر عليه واجب فيما أخرجته الأرض من حب إذا بلغ خمسة أوساق. والخراج عند الشافعي على وجهين: أحدهما جزية والآخر بمعنى الكراء والأجرة، فإذا فتحت الأرض صلحاً على أن أرضها لأهلها، فما وضع عليها من خراج فمجراها مجرى الجزية التى تؤخذ من رؤوسهم، فمن أسلم منهم سقط ما عليه من الخراج كما يسقط ما على رقبته من الجزية ولزومه العشر فيما أخرجت أرضه وإن كان الفتح إنما وقع على أن الأرض للمسلمين، ويؤدي في كل سنة عنها شيئاً، فالأرض للمسلمين وما يؤخذ منهم عنها، فهو أجرة الأرض، فسواء من أسلم منهم، أو أقام على كفره، فعليه أداء ما اشترط عليه، ومن باع منهم شيئاً من تلك الأرضين، فبيعه باطل، لأنه باع ما لا يملك. وهذا سبيل أرض السواد عنده.









সুনান আবী দাউদ (3083)


حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ الصَّعْبِ بْنِ جَثَّامَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ حِمَى إِلاَّ لِلَّهِ وَلِرَسُولِهِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ ابْنُ شِهَابٍ وَبَلَغَنِي أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَمَى النَّقِيعَ ‏.‏




আস-সা‘ব ইবনু জাসসামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আল্লাহ ও তাঁর রাসূল ছাড়া চারণভূমি সংরক্ষণ করার অধিকার অন্য কারো নাই। ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি জানতে পারলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আন-নাকী' নামক স্থানের চারণভূমি সংরক্ষণ করেছেন।



সহীহঃ আত-তা‘লীকু 'আলা রাওযাতিন নাদিয়্যাহ (২/১৪০)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2370)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن وهب: هو عبد الله، وابن السَّرْح: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله أبو الطاهر المصري. وأخرجه البخاري (٢٣٧٠)، والنسائي في "الكبرى" (٥٧٤٣) و (٨٥٧٠) من طريق الزهري، بهذا الإسناد. هو في "مسند أحمد" (١٦٤٢٢) و (١٦٤٢٥)، و"صحيح ابن حبان" (١٣٦) و (٤٦٨٤). وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "لا حمى إلا لله ولرسوله": يريد: لا حمى إلا على معنى ما أباحه رسول الله ﷺ، وعلى الوجه الذي حماه، وفيه إبطال ما كان أهل الجاهلية يفعلونه من ذلك، وكان الرجل العزيز منهم إذا انتجع بلداً مُخصباً، أوفَى بكلب على جبل، أو على نَشزٍ من الأرض، ثم استعوى الكلب ووقف له من يسمع منتهى صوته بالعواء، فحيث انتهى صوته حماه من كل ناحية لنفسه ومنع الناس منه. فأما ما حماه رسول الله ﷺ لمهازيل إبل الصدقة ولضعفَى الخيل، كالنقيع - (وهو موضع قريب من المدينة على عشرين فرسخاً منها) مستنقع للمياه ينبت فيه الكلام- وقد يقال: إنه مكان ليس بحدٍّ واسع يضيقُ بمثله على المسلمين المرعى فهو مباح، وللأئمة أن يفعلوا ذلك على النظر ما لم يضق منه على العامة المرعى، وهذا الكلام الذي سقتُه معنى كلام الشافعي في بعض كتبه.









সুনান আবী দাউদ (3084)


حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُحَمَّدٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ الصَّعْبِ بْنِ جَثَّامَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم حَمَى النَّقِيعَ وَقَالَ ‏ "‏ لاَ حِمَى إِلاَّ لِلَّهِ عَزَّ وَجَلَّ ‏"‏ ‏.‏




‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে আস-সা‘ব ইবনু জাসসামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আন-নাকী‘ নামক চারণভূমি সংরক্ষণ করেছিলেন। তিনি বলেছেনঃ চারণভূমি সংরক্ষণ করার অধিকার মহান আল্লাহ ব্যতীত অন্য কারো নাই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3083)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل عبد الرحمن بن الحارث -وهو ابن عبد الله بن عياش المخزومى- فهو ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد توبع كما في الطريق السالفة.









সুনান আবী দাউদ (3085)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، وَأَبِي، سَلَمَةَ سَمِعَا أَبَا هُرَيْرَةَ، يُحَدِّثُ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ فِي الرِّكَازِ الْخُمُسُ ‏"‏ ‏.‏




সা'ঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব ও আবূ সালামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তারা উভয়ে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ হাদীস বলতে শুনেছেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ গুপ্তধনে এক-পঞ্চমাংশ ধার্য হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1499) صحیح مسلم (1710)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف الزهري، وسفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه البخاري (١٤٩٩) و (٦٩١٢)، ومسلم (١٧١٠)، وابن ماجه (٢٥٠٩)، والترمذي (٦٤٧) و (١٤٣٢) و (١٤٣٣)، والنسائي (٢٤٩٥) و (٢٤٩٦) من طريق الزهري، به. وأخرجه البخاري (٢٣٥٥) و (٦٩١٣)، ومسلم (١٧١٠)، والنسائي (٢٤٩٦) من طرق عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧١٢٠) و (٧٢٥٤)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠٠٥). وسيتكرر ضمن الحديث (٤٥٩٣). قال الخطابي: الركاز على وجهين: فالمال الذي يوجد مدفوناً لا يُعلم له مالك رِكاز، لأن صاحبه قد كان ركزه في الأرض، أي: أثبته فيها. والوجه الثاني من الركاز: عروق الذهب والفضة، فتستخرج بالعلاج، ركزها الله في الأرض رَكزاً، والعرب تقول: أركز المعدن، إذا نال الركاز. والحديث إنما جاء في النوع الأول منهما، وهو الكنز الجاهلي على ما فسرهُ الحسن، وإنما كان فيه الخمس لكثرة نفعه، وسهولة نيله، والأصل أن ما خفت مؤونته كثر مقدار الواجب فيه، وما كثرت مؤونته قل مقدار الواجب فيه، كالعشر فيما سقى بالأنهار، ونصف العشر فيما سقي بالدواليب. واختلفوا في مصرف الركاز: فقال أبو حنيفة: يصرف مصرف الفيء، وقال الشافعي: يصرف مصرف الصدقات، واحتجوا لأبي حنيفة بأنه مال مأخوذ من أيدي المشركين، واحتجوا للشافعي بأنه مال مستفاد من الأرض كالزرع، وبأن الفيء يكون أربعة أخماسه للمقاتلة، وهذا المال يختص به الواجد له كمالِ الصدقة.









সুনান আবী দাউদ (3086)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ، حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ الْعَوَّامِ، عَنْ هِشَامٍ، عَنِ الْحَسَنِ، قَالَ الرِّكَازُ الْكَنْزُ الْعَادِيُّ




আল-হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, রিকায অর্থ ইসলাম-পূর্ব যুগে ভূগর্ভে প্রোথিত সম্পদ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ھشام بن حسان عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. الحسن: هو ابن أبي الحسن البصري، وهشام: هو ابن حسّان القُردوسي، ويحيى بن أيوب: هو المَقابري البغدادي. وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" ٣/ ٢٢٥ و ١٢/ ٢٥٦ عن عباد بن العوام، به. والعادي: الجاهلي، ويقال لكل قديم: عادي ينسبونه إلى عاد وإن لم يدركهم. تنبيه: هذا الأثر أثبتناه من (هـ) وحدها.









সুনান আবী দাউদ (3087)


حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، حَدَّثَنَا الزَّمْعِيُّ، عَنْ عَمَّتِهِ، قُرَيْبَةَ بِنْتِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ وَهْبٍ عَنْ أُمِّهَا، كَرِيمَةَ بِنْتِ الْمِقْدَادِ عَنْ ضُبَاعَةَ بِنْتِ الزُّبَيْرِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ بْنِ هَاشِمٍ، أَنَّهَا أَخْبَرَتْهَا قَالَتْ، ذَهَبَ الْمِقْدَادُ لِحَاجَتِهِ بِبَقِيعِ الْخَبْخَبَةِ فَإِذَا جُرَذٌ يُخْرِجُ مِنْ جُحْرٍ دِينَارًا ثُمَّ لَمْ يَزَلْ يُخْرِجُ دِينَارًا دِينَارًا حَتَّى أَخْرَجَ سَبْعَةَ عَشَرَ دِينَارًا ثُمَّ أَخْرَجَ خِرْقَةً حَمْرَاءَ - يَعْنِي فِيهَا دِينَارٌ - فَكَانَتْ ثَمَانِيَةَ عَشَرَ دِينَارًا فَذَهَبَ بِهَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَأَخْبَرَهُ وَقَالَ لَهُ خُذْ صَدَقَتَهَا ‏.‏ فَقَالَ لَهُ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ هَلْ هَوَيْتَ إِلَى الْجُحْرِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ لاَ ‏.‏ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ بَارَكَ اللَّهُ لَكَ فِيهَا ‏"‏ ‏.‏




আল-মিক্বদাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কন্যা কারীমাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে যুবাইর ইবনু 'আবদুল মুত্তালিব ইবনু হিশামের কন্যা দাবাআহ্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি তাকে এ হাদীস জানিয়েছেন। তিনি বলেন, আল–মিক্বদাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রাকৃতিক প্রয়োজনে নাকীউল খাবখাবাহ নামক স্থানে যান। তিনি হঠাৎ দেখতে পান, একটি ইঁদুর গর্ত থেকে একটি একটি করে দীনার বের করছে। এরপর ইঁদুরটি একাধারে সতেরটি দীনার বের করলো, অতঃপর একটি লাল রঙ্গের পুটুলি বের করে আনলো। তাতেও একটি দীনার ছিল। এতে সর্বমোট দীনার হলো আঠারটি। মিক্বদাদ এগুলো নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে উপস্থিত হয়ে তাঁকে ঘটনাটি জানালেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলেন, আপনি এর যাকাত নিন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি কি নিজে এগুলো গর্ত থেকে বের করেছ? তিনি বললেন, না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ এ সম্পদে আল্লাহ্ তোমাকে বরকত দান করুন।



দুর্বল : ইবনু মাজাহ (২৫০৮)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2508) ، قریبۃ مجہولۃ کما فی التحریر (8664) ، (انوار الصحیفہ ص 114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف الزمعي -وهو موسى بن يعقوب-، وجهالة عمته قريبة بنت عبد الله بن وهب. وأخرجه ابن ماجه (٢٥٠٨) من طريق موسى بن يعقوب الزمعي، بهذا الإسناد. قال الخطابي: قوله: "هل أهويت للجُحر" يدل على أنه لو أخذها من الجُحر لكان ركازاً يجب فيه الخمس. وقوله: "بارك الله لك فيها" لا يدل على أنه جعلها له في الحال، ولكنه محمول على بيان الأمر في اللقطة التي إذا عرفت سنة، فلم تعرف، كانت لآخذها. قلنا: وبقيع الخبخبة، قال ابن الأثير: هو بفتح الخاءين وسكون الباء الأولى: موضع بنواحي المدينة. ووقع في "مستدرك الحاكم" في مناقب عثمان بن مظعون ٣/ ١٩٠ ما نصه: كان رسول الله ﷺ يرتاد لأصحابه مقبرةً يدفنون فيها، فكان قد طلب نواحي المدينة وأطرافها، ثم قال: "أُمرت بهذا الموضع" يعني البقيع، وكان يقالُ له: بقيع الخبخبة، وكان أكثر نباته الغرقد، وكان أول مَن قُبِر هناك عثمان بن مظعون.









সুনান আবী দাউদ (3088)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا وَهْبُ بْنُ جَرِيرٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، سَمِعْتُ مُحَمَّدَ بْنَ إِسْحَاقَ، يُحَدِّثُ عَنْ إِسْمَاعِيلَ بْنِ أُمَيَّةَ، عَنْ بُجَيْرِ بْنِ أَبِي بُجَيْرٍ، قَالَ سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَمْرٍو، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ حِينَ خَرَجْنَا مَعَهُ إِلَى الطَّائِفِ فَمَرَرْنَا بِقَبْرٍ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ هَذَا قَبْرُ أَبِي رِغَالٍ وَكَانَ بِهَذَا الْحَرَمِ يَدْفَعُ عَنْهُ فَلَمَّا خَرَجَ أَصَابَتْهُ النِّقْمَةُ الَّتِي أَصَابَتْ قَوْمَهُ بِهَذَا الْمَكَانِ فَدُفِنَ فِيهِ وَآيَةُ ذَلِكَ أَنَّهُ دُفِنَ مَعَهُ غُصْنٌ مِنْ ذَهَبٍ إِنْ أَنْتُمْ نَبَشْتُمْ عَنْهُ أَصَبْتُمُوهُ مَعَهُ ‏"‏ ‏.‏ فَابْتَدَرَهُ النَّاسُ فَاسْتَخْرَجُوا الْغُصْنَ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু 'আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে তায়িফের দিকে রওয়ানা হই। আমরা একটি ক্ববরের পাশ দিয়ে অতিক্রমকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কবরটি আবূ রিগালের (সামূদ জাতির লোক)। সে গযব থেকে বাঁচার জন্য হেরেম শরীফের অভ্যন্তরে অবস্থান করতো। অতঃপর সেখান থেকে বের হয়ে এখানে পৌছলে সে উক্ত গযবে পতিত হয়, যাতে তার জাতির লোকেরা ধ্বংস হয়ে যায়। তাকে এ স্থানে দাফন করা হয়েছে। আর এর নিদর্শন হচ্ছে, তার সাথে লাঠি সদৃশ একটি স্বর্ণের লাঠিও দাফন করা আছে। তোমরা তার ক্ববর খুঁড়ে দেখলে সেটা তার সাথেই পাবে। লোকেরা দ্রুত তার ক্ববর খুঁড়ে স্বর্ণের লাঠিটি বের করলো।



দুর্বল : যঈফাহ (৪৭৩৬), যঈফ আল-জামি'উস সাগীর (৬০৮২)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، بجیر مجہول (تق: 636) ، (انوار الصحیفہ ص 114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة بجير بن أبي بجير، وقد تفرد بوصل هذا الحديث كما قال ابنُ كثير في "تفسيره" ٣/ ٤٤٠، وقال: وعلى هذا يُخشى أن يكون وهم في رفع هذا الحديث، وإنما يكونُ من كلام عبد الله بن عمرو، مما أخذه من الزاملتين، ثم قال: قال شيخنا أبر الحجاج [يعني المزي]، بعد أن عرضتُ عليه ذلك: وهذا محتمل، والله أعلم. قلنا: وقد روى هذا الحديثَ معمرُ بنُ راشد، عن إسماعيل بن أمية مرسلاً، ولعله أصح من الموصول، والله تعالى أعلم. ولم ينفرد به ابن إسحاق كما قال الذهبي في "ميزان الاعتدال" في ترجمة بجير، فقد رواه روح بن القاسم عن إسماعيل بن أمية كذلك كما سيأتي. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٣٧٥٤)، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٣/ ١٤٥ - ١٤٦، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة بجير بن أبي بجير، والذهبي في "سير أعلام النبلاء" ٩/ ٤٤٥، وفي "تذكرة الحفاظ" ١/ ٣٣٦، وفي "ميزان الاعتدال" في ترجمة بجير بن أبي بجير، من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه الطحاوي (٣٧٥٣)، وابن حبان (٦١٩٨)، والطبراني في "الأوسط" (٢٧٨٧) و (٨٥٣٣)، والبيهقي ٤/ ١٥٦، وابن عبد البر ١٣/ ١٤٨ من طريق روح بن القاسم، عن إسماعيل بن أمية، به. وأخرجه مرسلاً عبدُ الرزاق في "تفسيره" ٢/ ٢٣٢، ومن طريقه الطبري في "تفسيره" ٨/ ٢٣٠، وأخرجه الطبري كذلك ٨/ ٢٣٠ من طريق محمد بن ثور الصنعانى، كلاهما (عبد الرزاق وابن ثور) عن معمر بن راشد، عن إسماعيل بن أمية. وفي الباب عن جابر بن عبد الله عند أحمد (٤١٦٠)، والبزار (١٨٤٤)، والطبري في "تفسيره" ٨/ ٢٣٠ و ١٤/ ٥٠، والطحاوي في "شرح المشكل" (٣٧٥٥) و (٣٧٥٦) و (٣٧٥٧)، وابن حبان (٦١٩٧)، والحاكم ٢/ ٣٢٠ و ٣٤٠ - ٣٤١،وإسناد الطبري في الموضع الثاني والطحاوي في الموضع الثالث قوي - واللفظ عند الطحاوي: أن رسول الله ﷺ وهو في الحِجْر: "هؤلاء قوم صالح، أهلكهم الله ﷿ إلا رجلاً كان في حرم الله ﷿ منعه الله من عذاب الله" قيل: يا رسول الله، من هو؟ قال: "أبو رغال". وجاء عند بعضهم: "فلما خرج أصابه ما أصاب قومه".









সুনান আবী দাউদ (3089)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، قَالَ حَدَّثَنِي رَجُلٌ، مِنْ أَهْلِ الشَّامِ يُقَالُ لَهُ أَبُو مَنْظُورٍ عَنْ عَمِّهِ، قَالَ حَدَّثَنِي عَمِّي، عَنْ عَامِرٍ الرَّامِ، أَخِي الْخُضْرِ - قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ النُّفَيْلِيُّ هُوَ الْخُضْرُ وَلَكِنْ كَذَا قَالَ - قَالَ إِنِّي لَبِبِلاَدِنَا إِذْ رُفِعَتْ لَنَا رَايَاتٌ وَأَلْوِيَةٌ فَقُلْتُ مَا هَذَا قَالُوا هَذَا لِوَاءُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَتَيْتُهُ وَهُوَ تَحْتَ شَجَرَةٍ قَدْ بُسِطَ لَهُ كِسَاءٌ وَهُوَ جَالِسٌ عَلَيْهِ وَقَدِ اجْتَمَعَ إِلَيْهِ أَصْحَابُهُ فَجَلَسْتُ إِلَيْهِمْ فَذَكَرَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الأَسْقَامَ فَقَالَ ‏"‏ إِنَّ الْمُؤْمِنَ إِذَا أَصَابَهُ السَّقَمُ ثُمَّ أَعْفَاهُ اللَّهُ مِنْهُ كَانَ كَفَّارَةً لِمَا مَضَى مِنْ ذُنُوبِهِ وَمَوْعِظَةً لَهُ فِيمَا يَسْتَقْبِلُ وَإِنَّ الْمُنَافِقَ إِذَا مَرِضَ ثُمَّ أُعْفِيَ كَانَ كَالْبَعِيرِ عَقَلَهُ أَهْلُهُ ثُمَّ أَرْسَلُوهُ فَلَمْ يَدْرِ لِمَ عَقَلُوهُ وَلَمْ يَدْرِ لِمَ أَرْسَلُوهُ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ رَجُلٌ مِمَّنْ حَوْلَهُ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَمَا الأَسْقَامُ وَاللَّهِ مَا مَرِضْتُ قَطُّ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ قُمْ عَنَّا فَلَسْتَ مِنَّا ‏"‏ ‏.‏ فَبَيْنَا نَحْنُ عِنْدَهُ إِذْ أَقْبَلَ رَجُلٌ عَلَيْهِ كِسَاءٌ وَفِي يَدِهِ شَىْءٌ قَدِ الْتَفَّ عَلَيْهِ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي لَمَّا رَأَيْتُكَ أَقْبَلْتُ إِلَيْكَ فَمَرَرْتُ بِغَيْضَةِ شَجَرٍ فَسَمِعْتُ فِيهَا أَصْوَاتَ فِرَاخِ طَائِرٍ فَأَخَذْتُهُنَّ فَوَضَعْتُهُنَّ فِي كِسَائِي فَجَاءَتْ أُمُّهُنَّ فَاسْتَدَارَتْ عَلَى رَأْسِي فَكَشَفْتُ لَهَا عَنْهُنَّ فَوَقَعَتْ عَلَيْهِنَّ مَعَهُنَّ فَلَفَفْتُهُنَّ بِكِسَائِي فَهُنَّ أُولاَءِ مَعِي ‏.‏ قَالَ ‏"‏ ضَعْهُنَّ عَنْكَ ‏"‏ ‏.‏ فَوَضَعْتُهُنَّ وَأَبَتْ أُمُّهُنَّ إِلاَّ لُزُومَهُنَّ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لأَصْحَابِهِ ‏"‏ أَتَعْجَبُونَ لِرُحْمِ أُمِّ الأَفْرَاخِ فِرَاخَهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا نَعَمْ يَا رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَوَالَّذِي بَعَثَنِي بِالْحَقِّ لَلَّهُ أَرْحَمُ بِعِبَادِهِ مِنْ أُمِّ الأَفْرَاخِ بِفِرَاخِهَا ارْجِعْ بِهِنَّ حَتَّى تَضَعَهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَخَذْتَهُنَّ وَأُمُّهُنَّ مَعَهُنَّ ‏"‏ ‏.‏ فَرَجَعَ بِهِنَّ ‏.‏




আল-খুদর গোত্রের তীরন্দাজ ‘আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নুফাইলী বলেন, শব্দটি ‘খাদরি’ নয়, বরং খুদর, তবে ব্যবহারে তা প্রচলিত হয়ে গেছে। ‘আমির বলেন, আমি আমাদের শহরেই ছিলাম। এমন সময় আমরা কিছু পতাকা উড্ডীন দেখতে পেয়ে লোকদের জিজ্ঞেস করি, এসব কি? তারা বললো, এগুলো রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পতাকা। আমি তাঁর নিকট আসলাম। তখন তিনি একটি গাছের নিচে তাঁর জন্য বিছানো একটি কম্বলের উপর বসা ছিলেন। তাঁর চারপাশে তাঁর সাহাবীগণও বসা ছিলেন। আমি তাদের কাছে বসলাম।

রাসূল্ললাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোগ সম্পর্কে আলোচনা করলেন। তিনি বললেনঃ মুমিন ব্যক্তি যখন অসুস্থ হয়, অতঃপর আল্লাহ্ তাঁকে রোগমুক্তি দেন, এটা তার অতীতের গুনাহের জন্য কাফফারা স্বরূপ এবং তার ভবিষ্যৎ জীবনের জন্য শিক্ষণীয়। পক্ষান্তরে কোন মুনাফিক অসুস্থ হওয়ার পর তাকে তা থেকে মুক্তি দেয়া হলে সে এমন উটের মত যাকে তার মালিক শক্ত করে বেঁধে আবার ছেড়ে দিলো। কিন্তু সে কিছুই বুঝলো না, তার মালিক তাকে কেনই বা শক্ত করে বাঁধলো আর কেনই বা ছেড়ে দিলো। তাঁর আশেপাশে বসা লোকদের মধ্য হতে এক ব্যক্তি বললো, হে আল্লাহ্‌র রাসূল! কিসের অসুস্থতা? আল্লাহ্‌র শপথ! আমি তো কখনও অসুস্থ হইনি? নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি আমাদের এখান থেকে উঠে যাও, কারণ তুমি আমাদের দলভুক্ত নও।

বর্ণনাকারী বলেন, আমরা তাঁর কাছে বসা। এমতাবস্থায় তাঁর কাছে এক ব্যক্তি আসলো। তার গায়ে কম্বল জড়ানো এবং তার হাতে কিছু একটা ছিলো। সে বললো, হে আল্লাহ্‌র রাসূল! আমি আপনাকে দেখতে পেয়েই আপনার কাছে উপস্থিত হলাম। গাছপালার মধ্য দিয়ে পথ অতিক্রম করার সময় আমি পাখির বাচ্চার আওয়াজ শুনতে পাই। আমি সেগুলো ধরে আমার কম্বলের মধ্যে রাখি। বাচ্চাগুলোর মা এসে আমার মাথার উপর চক্কর দিতে লাগলো। আমি বাচ্চাগুলোকে তাদের মায়ের জন্য কম্বলের মধ্য থেকে বের করে দিলাম। পাখিটি এসে বাচ্চাগুলোর সাথে মিলিত হলো। আমি সবগুলোকে আমার কম্বল দিয়ে লেপটিয়ে ধরে ফেললাম। এখন সবগুলো পাখি আমার সাথে রয়েছে। তিনি বললেনঃ সেগুলো বের করে রাখো। সুতারাং আমি বের করলাম। কিন্তু মা পাখিটা বাচ্চাদের রেখে যেতে চাইলো না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের বললেনঃ বাচ্চাদের প্রতি মা পাখিটার মায়ায় তোমরা কি আশ্চর্যবোধ করছো না! তারা বললেন, হাঁ হে আল্লাহ্‌র রাসূল! তিনি বললেনঃ সেই সত্তার শপথ, যিনি আমাকে সত্য দ্বীনসহ পাঠিয়েছেন! বাচ্চাদের প্রতি মা পাখিটার যে মায়া রয়েছে, আল্লাহ্ অবশ্যই তাঁর বান্দাদের প্রতি আরো অধিক মমতাময়ী। তুমি যেখান থেকে বাচ্চাগুলোকে ধরে এনেছ মা-সহ তাদেরকে সেখানে রেখে আসো। সুতারাং সে পাখিগুলো সেখানে রেখে এলো।



দুর্বল : মিশকাত (১৫৭১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو منظور الشامي مجہول: (تقریب التہذیب: 8394) والسند مظلم ، (انوار الصحیفہ ص 114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة أبي منظور وعمه، وقد روى هذا الحديث ابن الأثير في "أسد الغابة" من طريق المصنف، فقال: عن أبي منظور، عن عمه، عن عامر الرامي، وكذلك رواه المزي في ترجمة عامر الرامي في "تهذيب الكمال" من طريق عبد الله بن محمد النُّفيلي، قال الحافظ في "النكت الظراف" ٤/ ٢٣٦ - ٢٣٧: ليس بين الروايتين اختلاف، إلا أن ظاهر الرواية أنه عن أبي منظور: عن عمه، عن عمه، مرتين، وليس ذلك المراد، وإنما المراد أن الراوي بعد أن قال: عن عمه، بالعنعنة بيّن أن عمه صرح له بالحديث، فقال: حدثني عمي، بعد أن قاله بلفظ: عن عمه. وأخرجه تاماً ومختصراً ابن أبي الدنيا في "حسن الظن بالله" (٢٠)، وابن قانع في "معجم الصحابة" ٢/ ٢٣٦ - ٢٣٧، وابنُ السكن كما في "الإصابة" للحافظ ٣/ ٦٠٦، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٧١٣٠)، وابن عبد البر في "التمهيد" ٢٤/ ٥٨، والبغوي في شرح السنة" (١٤٤٠)، وابن الأثير في "أسد الغابة" ٣/ ١٢١، والمزي في ترجمة عامر الرامي من "تهذيب الكمال" ٤/ ٨٦ - ٨٧ من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري معلقاً في "التاريخ الكبير" ٦/ ٤٤٦ عن إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق، حدثني الحسن بن عمارة، عن أبي منظور، عن عمه، عن عامر الخضر الرام. قال الحافظ في "الإصابة" ٣/ ٦٠٦: هذا يدل على وهم أبي أويس، أو يكون ابن إسحاق سمعه من الحسن، عن أبي منظور. وفي باب أن الأمراض والبلاء فيهما تكفير للذنوب عن عدد من الصحابة، منها: عن أنس بن مالك عند الترمذي (٢٥٥٩)، وابن ماجه (٤٠٣١) رفعه، ولفظه: "إن عظم الجزاء مع عظم النبلاء، فإن الله إذا أحب قوماً ابتلاهم، فمن رضي فله الرضا، ومن سخط فله السخط، وحسنه الترمذي. ونحو هذا اللفظ عن محمود بن لبيد عند أحمد (٢٣٦٢٣) وإسناده جيد. وعن عائشة عند البخاري (٥٦٤٠)، ومسلم (٢٥٧٢) رفعته: "ما من مصيبة تصيب المسلم إلا كفر الله بها عنه، حتى الشوكة يُشاكها" وسيأتي عند المصنف نحوه برقم (٣٠٩٣). وعن أبي هريرة عند البخاري (٥٦٤١) و (٥٦٤٢)، ومسلم (٢٥٧٣) رفعه: "ما يصيب المسلم من نصب ولا وصب، ولا هم ولا حزن، ولا أذى ولا غم، حتى الشوكة يُشاكها، إلا كفر الله بها من خطاياه، وفي رواية لأبي هريرة عند البخاري (٥٦٤٥) رفعه: "من يرد الله به خيراً يُصب منه". وفي رواية لأبي هريرة عند ابن ماجه (٢٥٦٢) رفعه: "ما يزال البلاء بالمؤمن والمؤمنة في نفسه وولده وماله، حتى يلقى الله، وما عليه خطيئة". وإسناده حسن. وعن عبد الله بن مسعود عند البخاري (٥٦٦٠)، ومسلم (٢٥٧١) رفعه: "ما من مسلم يصيبه أذى، مرض فما سواه، إلا حط الله له سيئاته، كما تحط الشجرة ورقها". وعن سعد بن أبي وقاص عند ابن ماجه (٤٠٢٣)، والترمذي (٢٥٦١)، والنسائي في "الكبرى" (٧٤٣٩) قال: قلت: يا رسول الله، أي الناس أشد بلاء؟ قال: "الأنبياء، ثم الأمثل فالأمثل، يُبتَلى الرجل على حسب دينه، فإن كان دينه صُلبا، اشتد بلاؤه، وإن كان في دينه رقة ابتُلي على قدر دينه، فما يبرح البلاء بالعبد حتى يتركه يمشي على الأرض وما عليه خطيئة". وهو حديث صحيح. وعن أم العلاء سيأتي عند المصنف برقم (٣٠٩٢). وفي باب أن الله ﷾ أرحم بعباده من الأم بولدها عن عمر بن الخطاب عند البخاري (٥٩٩٩)، ومسلم (٢٧٥٤)، قال: قدم على النبي ﷺ سبي، فإذا امرأة من السبي قد تحلُبُ ثديَها تسقي، إذا وجدت صبياً في السبي أخذته، فالصقته ببطنها وأرضعته، فقال لنا النبي ﷺ أترون هذه طارحة ولدها في النار؟! قلنا: لا، وهي تقدر على أن لا تطرحه، فقال: "الله أرحم بعباده من هذه بولدها".









সুনান আবী দাউদ (3090)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، وَإِبْرَاهِيمُ بْنُ مَهْدِيٍّ الْمِصِّيصِيُّ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو الْمَلِيحِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ خَالِدٍ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ إِبْرَاهِيمُ بْنُ مَهْدِيٍّ السُّلَمِيُّ - عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، وَكَانَتْ، لَهُ صُحْبَةٌ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏"‏ إِنَّ الْعَبْدَ إِذَا سَبَقَتْ لَهُ مِنَ اللَّهِ مَنْزِلَةٌ لَمْ يَبْلُغْهَا بِعَمَلِهِ ابْتَلاَهُ اللَّهُ فِي جَسَدِهِ أَوْ فِي مَالِهِ أَوْ فِي وَلَدِهِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ زَادَ ابْنُ نُفَيْلٍ ‏"‏ ثُمَّ صَبَّرَهُ عَلَى ذَلِكَ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ اتَّفَقَا ‏"‏ حَتَّى يُبْلِغَهُ الْمَنْزِلَةَ الَّتِي سَبَقَتْ لَهُ مِنَ اللَّهِ تَعَالَى ‏"‏ ‏.‏




মুহাম্মাদ ইবনু খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা ও দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি (দাদা) রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহচর্য লাভ করেছেন। তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি : কোন ব্যক্তির জন্য বিনাশ্রমে আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে মর্যাদার আসন নির্ধারিত হলে আল্লাহ্ তার দেহ, সম্পদ অথবা সন্তানকে বিপদগ্রস্ত করেন। অতঃপর সে তাতে ধৈর্য ধারণ করলে শেষ পর্যন্ত বরকতময় মহান আল্লাহ্ কর্তৃক নির্ধারিত উক্ত মর্যাদার স্তরে উপনীত হয়।



সহীহ : সহীহাহ (২৫৯৯)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (1568) ، وللحدیث شاھد عند أبي یعلٰی الموصلي (10/482 ح 6095 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة محمد بن خالد ومن فوقه. أبو المليح: هو الحسن بن عمر بن يحيى. وأخرجه ابن سعد ٧/ ٤٧٧، وأحمد (٢٢٣٣٨)، وابن أبي الدنيا في "المرض والكفارات" (٣٩)، وابن أبي عاصم في "الآحاد" (١٤١٦)، وأبو يعلى (٩٢٣)، والدولابي في "الكنى" ١/ ٢٧، والطبراني في "الكبير" ٢٢/ (٨٠١) و (٨٠٢)، وفي "الأوسط" (١٠٨٥)، والبيهقي ٣/ ٣٧٤ من طرق عن أبي المليح الرقيّ، بهذا الإسناد. ويشهد له حديث أبي هريرة عند أبي يعلى (٦٠٩٥)، وابن حبان (٢٩٠٨)، والحاكم ١/ ٣٤٤، وسنده حسن، ولفظه "إن الرجل لتكون له عند الله المنزلة، فما يبلغها بعمل، فلا يزال الله يبتليه بما يكره حتى يبلغه إياها". وفي رواية لأبي هريرة عند ابن ماجه (٢٥٦٢) بلفظ آخر سلف ذكره في الطريق السابق. تنبيه: هذا الحديث أثبتاه من (هـ) وهي برواية أبي بكر بن داسة، وهو أيضاً في رواية أبي الحسن بن العبد كما في "الأطراف" (١٥٥٦٢). وقد زيد في هامش (ج) وكتب عليه إشارة: صح.









সুনান আবী দাউদ (3091)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَمُسَدَّدٌ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، عَنِ الْعَوَّامِ بْنِ حَوْشَبٍ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ السَّكْسَكِيِّ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِي مُوسَى، قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم غَيْرَ مَرَّةٍ وَلاَ مَرَّتَيْنِ يَقُولُ ‏ "‏ إِذَا كَانَ الْعَبْدُ يَعْمَلُ عَمَلاً صَالِحًا فَشَغَلَهُ عَنْهُ مَرَضٌ أَوْ سَفَرٌ كُتِبَ لَهُ كَصَالِحِ مَا كَانَ يَعْمَلُ وَهُوَ صَحِيحٌ مُقِيمٌ ‏"‏ ‏.‏




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একবার দুইবার নয়, বহুবার বলতে শুনেছি : কোন বান্দা নেক কাজ করলে এবং পড়ে রোগ বা সফর তাকে সে কাজ হতে বিরত রাখলে তার আমলনামায় সুস্থ ও আবাসে অবস্থানকালে তার কৃত সৎ আমলের ন্যায় সওয়াব লেখা হবে।



হাসান : ইরওয়া (৫৬০)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2996)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. إبراهيم بن عبد الرحمن السَّكسكىُّ، وإن كان ضعيفاً، قد انتقى له البخاري هذا الحديث، فقد أخرجه في "صحيحه" (٢٩٩٦) من طريق يزيد بن هارون، عن العوام بن حوشب، بهذا الإسناد. وباقي رجاله ثقات. وهو في مسند أحمد، (١٩٦٧٩)، و "صحيح ابن حبان" (٢٩٢٩). وله شاهد عن عبد الله بن عمرو بن العاص عند ابن أبي شيبة ٣/ ٢٣٠، وأحمد (٦٤٨٢)، وهناد في "الزهد" (٤٣٨)، والدرامي (٢٧٧٠)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٥٠٠)، وأبي نعيم في "الحلية" ٦/ ٨٣، والحاكم ١/ ٣٤٨ والبيهقي في "شعب الإيمان" (٩٩٢٩)، بلفظ: "ما أحد من الناس يُصاب ببلاء في جسده إلا أمر الله ﷿ الملائكة الذين يحفظونه، فقال: اكتبوا لعبدي في كل يوم وليلة ما كان يعمل من خير، ما كان في وثاقي". وإسناده صحيح. وآخر عن أنس بن مالك عند ابن أبي شيبة ٣/ ٢٣٣، وأحمد (١٢٥٠٣)، والبخاري في الأدب المفرد، (٥٠١)، وأبي يعلى (٤٢٣٣) و (٤٢٣٥)، والبغوي (١٤٣٠) وسنده حسن، قال رسول الله ﷺ: "إذا ابتلى الله العبد المسلم ببلاء في جسده، قال الله: اكتب له صالح عمله الذي كان يعمله، فإن شفاه غسله وطهره، وإن قبضه غفر له ورحمه". وثالث عن عقبة بن عامر عند أحمد (١٧٣١٦) والروياني في "مسنده" (١٧٧)، والطبراني في "الكبير" ١٧/ (٧٨٢)، والبغوي في شرح السنة" (١٤٢٨). وإسناده حسن أن النبي ﷺ قال: "ليس من عمل يوم إلا وهو يُختَمُ عليه، فإذا مرض المؤمن، قالت الملائكة: يا ربنا عبدك فلان قد حبسته، فيقول الربُّ ﷿: اختموا له على مثل عمله حتى يبرأ أو يموت". وقال ابن كثير في تفسيره" ٥/ ٤٩ عند قوله تعالى: ﴿وَكُلَّ إِنْسَانٍ أَلْزَمْنَاهُ طَائِرَهُ فِي عُنُقِهِ﴾ [الإسراء:١٣]: إسناد جيد قوي.









সুনান আবী দাউদ (3092)


حَدَّثَنَا سَهْلُ بْنُ بَكَّارٍ، عَنْ أَبِي عَوَانَةَ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ عُمَيْرٍ، عَنْ أُمِّ الْعَلاَءِ، قَالَتْ عَادَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَنَا مَرِيضَةٌ فَقَالَ ‏ "‏ أَبْشِرِي يَا أُمَّ الْعَلاَءِ فَإِنَّ مَرَضَ الْمُسْلِمِ يُذْهِبُ اللَّهُ بِهِ خَطَايَاهُ كَمَا تُذْهِبُ النَّارُ خَبَثَ الذَّهَبِ وَالْفِضَّةِ ‏"‏ ‏.‏




উম্মূল ‘আলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি অসুস্থ হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে আসলেন। তিনি বললেনঃ হে ‘আলার মা! সুসংবাদ গ্রহণ করো, আগুন যেভাবে সোনা-রূপার ময়লা দূর করে দেয় তদ্রুপ মহান আল্লাহ্ কোন মুসলিমের রোগের দ্বারা তার গুনাহসমূহ দূর করে দেন।



সহীহ : সহীহাহ (৭১৪)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، قال معاذ: انظر المعجم الکبیر للطبراني (10/186 ح 10406 وسندہ حسن) وھو یغني عنہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل عبد الملك بن عُمير، فهو صدوق حسن الحديث، وقد حسَّن هذا الحديثَ الحافظُ المنذري في "مختصر السنن". أبو عوانة: هو الوضاح ابن عبد الله اليَشْكُري. وأخرجه عبد بن حميد (١٥٦٤)، والطبراني في "الكبير" ٢٥/ (٣٤٠)، والمزي في ترجمة أم العلاء من "تهذيب الكمال، (٣٤٠) من طريق أبي عوانة الوضاح، به. إلا أن الطبراني قال في روايته: "كما تذهب النار خبث الحديد".









সুনান আবী দাউদ (3093)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، ح وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ عُمَرَ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهَذَا لَفْظُ ابْنِ بَشَّارٍ - عَنْ أَبِي عَامِرٍ الْخَزَّازِ، عَنِ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي لأَعْلَمُ أَشَدَّ آيَةٍ فِي الْقُرْآنِ قَالَ ‏"‏ أَيَّةُ آيَةٍ يَا عَائِشَةُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ قَوْلُ اللَّهِ تَعَالَى ‏{‏ مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ ‏}‏ قَالَ ‏"‏ أَمَا عَلِمْتِ يَا عَائِشَةُ أَنَّ الْمُؤْمِنَ تُصِيبُهُ النَّكْبَةُ أَوِ الشَّوْكَةُ فَيُكَافَأُ بِأَسْوَإِ عَمَلِهِ وَمَنْ حُوسِبَ عُذِّبَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ أَلَيْسَ اللَّهُ يَقُولُ ‏{‏ فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًا يَسِيرًا ‏}‏ قَالَ ‏"‏ ذَاكُمُ الْعَرْضُ يَا عَائِشَةُ مَنْ نُوقِشَ الْحِسَابَ عُذِّبَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهَذَا لَفْظُ ابْنِ بَشَّارٍ قَالَ أَخْبَرَنَا ابْنُ أَبِي مُلَيْكَةَ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম : হে আল্লাহ্‌র রাসূল! মহান আল্লাহ্‌র কিতাবের সবচেয়ে কঠোর আয়াতটি আমি অবশ্যই অবহিত আছি। তিনি জিজ্ঞেস করলেন : হে ‘আয়িশাহ! সেটি কোন আয়াত? তিনি বললেনঃ মহান আল্লাহ্‌র বাণী : “কেউ পাপ করলে তার প্রতিফলন সেই পাবে এবং সে আল্লাহ্‌র বিপক্ষে কোন বন্ধু ও সাহায্যকারী পাবে না” (সূরাহ আন-নিসা : ১২৩)। তিনি বললেনঃ হে ‘আয়িশাহ! তুমি কি জানো, কোন মুসলিম যখন বিপদগ্রস্ত বা নির্যাতিত হয়, এতে তার আমলের মন্দ দিকগুলো দূরীভূত হয়ে যায়। যে ব্যক্তির হিসাব নেয়া হবে সে মারা পড়বে বা শাস্তি পাবে। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহ্ কি বলেননি, “যার আমলনামা তার ডান হাতে দেয়া হবে তার হিসাব সহজে গ্রহণ করা হবে” (সূরা আল-ইনশিক্বাক্ব : ৮)। তিনি বললেনঃ হে ‘আয়িশাহ! এর অর্থ আমল পেশ করা। অন্যথায় যার হিসাবে কড়াকড়ি হবে সে তো মারা পড়বে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد لكن شطر من حوسب عذب الخ صحيح ق




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أبو عامر الخزاز صالح بن رستم: حسن الحدیث، وأصلہ متفق علیہ بالإختصار البخاري (4939) ومسلم (2876)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل أبي عامر الخزاز -واسمه صالح بن رستم- فهو ضعيف يُعتبر به، وباقي رجاله ثقات، وقد روي بنحوه من أوجه أخرى عن عائشة كما سيأتي. ابن أبي مليكة: هو عبد الله ابن عُبيد الله، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، ومُسدَّد: هو ابن مسرهد. وأخرجه إسحاق بن راهوية في "مسنده" -قسم مسند عائشة- (١٢٤٩)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" كما في تفسير ابن كثير" ٢/ ٣٧١ - ٣٧٢، والطبري في "تفسيره" ٥/ ٢٩٥، والبيهقي في "الشعب" (٩٨١٠)، وابن حجر في "تغليق التعليق" ٥/ ١٨٢ من طريق أبي عامر الخزاز صالح بن رستم، به ولم يذكر ابن أبي حاتم في روايته مناقشة الحساب في الآخرة. وأخرج الشطر الأول من الحديث، وهو تكفير الذنوب بما يصيب المؤمن: أحمد (٢٥٦٧٦)، والبيهقي في "الشعب" (٩٨١١) من طريق ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة، عن النبي ﷺ قال: "ما أصاب المسلم شيء إلا كان له كفارة". وأخرج هذا الشطر أيضاً بنحوه سعيد بن منصور (٦٩٩) -قسم التفسير- من طريق عُبيد بن عمير، وأبو داود الطيالسي في "مسنده" (١٥٨٤) والطبري في "تفسيره" ٥/ ٢٩٥ من طريق أمية بنت عبد الله، وابن مردويه في "تفسيره" كما في "تفسير ابن كثير" ٢/ ٣٧٢ من طريق محمد بن زيد بن المهاجر بن قنفذ، ثلاثتهم عن عائشة وفي الأسانيد إلى عائشة مقالٌ. وأخرجه أيضاً بنحوه الطبري في "تفسيره" ٥/ ٢٩٤ من طريق محمد بن زيد بن المهاجر، عن عائشة عن أبي بكر الصديق. وإسناده قوي، ولا يضر كونه عن عائشة أو عن عائشة عن أبي بكر. ولأحمد (٦٨) وابن حبان (٢٩١٠) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن أبي بكر بن أبي زهير الثقفي عن أبي بكر الصديق أنه قال: يا رسول الله كيف الصلاح بعد هذه الآية ﴿لَيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَا أَمَانِيِّ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ﴾ [النساء:١٢٣]، وكلّ شيء عَمِلْنَاه جُزينا به؟ فقال: "غفر الله لك يا أبا بكر ألست تمرض، ألست تحزن، ألست تصيبك اللأواء؟ قال: قلتُ: بلى، قال: هو ما تجزون به". وأخرج البخاري (٥٦٤٠)، ومسلم (٢٥٧٢) من طريق عروة بن الزبير، ومسلم (٢٥٧٢) من طريق الأسود بن يزيد، و (٢٥٧٢) من طريق عمرة بنت عبد الرحمن، ثلاثتهم عن عائشة قالت: -واللفظ لعروة عند البخاري- قال رسول الله ﷺ: "ما من مصيبة تصيب المسلم إلا كفّر الله بها عنه، حتى الشوكة يُشاكها" وأما الأسود وعمرة ففي روايتهما: "إلا رفعه الله بها درجة، أو حط عنه بها خطيئة". ويشهد لهذا الشطر بتمامه كما رواه المصنف حديثُ أبي هريرة عند مسلم (٢٥٧٤) ويشهد له بمعناه أحاديث أخرى ذكرناها عند الحديث السالف برقم (٣٠٨٩). وأما الشطر الثاني من الحديث وهو قوله ﷺ: "ومن حُوسِب عُذِّب" … إلى آخر الحديث، فأخرجه البخاري (١٠٣) و (٤٩٣٩) و (٦٥٣٦) و (٦٥٣٧)، ومسلم (٢٨٧٦)، والترمذي (٢٥٩٥) و (٣٦٢٧)،والنسائي في "الكبرى" (١١٥٥٤) و (١١٥٥٥) و (١١٥٩٥) من طرق عن ابن أبي مليكة، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٠٠)، و"صحيح ابن حبان (٧٣٦٩) و (٧٣٧٠).









সুনান আবী দাউদ (3094)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ، قَالَ خَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَعُودُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ أُبَىٍّ فِي مَرَضِهِ الَّذِي مَاتَ فِيهِ فَلَمَّا دَخَلَ عَلَيْهِ عَرَفَ فِيهِ الْمَوْتَ قَالَ ‏ "‏ قَدْ كُنْتُ أَنْهَاكَ عَنْ حُبِّ يَهُودَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَقَدْ أَبْغَضَهُمْ أَسْعَدُ بْنُ زُرَارَةَ فَمَهْ فَلَمَّا مَاتَ أَتَاهُ ابْنُهُ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ أُبَىٍّ قَدْ مَاتَ فَأَعْطِنِي قَمِيصَكَ أُكَفِّنْهُ فِيهِ ‏.‏ فَنَزَعَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَمِيصَهُ فَأَعْطَاهُ إِيَّاهُ ‏.‏




উসামাহ ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, (মুনাফিক সর্দার) ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই মরণ ব্যাধিতে আক্রান্ত হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে যান। তিনি তার কাছে প্রবেশ করে তার চেহারায় মৃত্যুর ছাপ দেখে বললেনঃ আমি তোমাকে ইয়াহুদীদেরকে ভালোবাসতে নিষেধ করতাম। ‘আবদুল্লাহ বললো, তাদের প্রতি আস’আদ ইবনু যুরারাহ বিদ্বেষ পোষণ করে কী পেয়েছে? ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই মারা গেলে তার ছেলে ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে বললেন, হে আল্লাহ্‌র নাবী! ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই মারা গেছে। তাকে কাফন দেয়ার জন্য আপনার একটা জামা দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর গায়ের চাঁদরটি খুলে তাকে দিলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد لكن قصة القميص صحيحة ق




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 114)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. محمد بن إسحاق -وهو ابن يسار المطلبي مولاهم- مدلس وقد عنعن. وأخرجه أحمد (٢١٧٥٨)، والبزار في مسنده (٢٥٧١)، وأبو يعلى كما في "المختارة" للضياء المقدسي ٤/ ١١٨، والطبراني في "الكبير" (٣٩٠)، والحاكم ١/ ٣٤١، والخطب في "الجامع لأخلاق الراوي وآداب السامع" (١٣٧٢)، والضياء في "المختارة" (١٣٢٨) - (١٣٣٠) من طريق محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وقصة إلباس النبي ﷺ قميصه لعبد الله بن أُبيّ ثابتة في حديث عبد الله بن عمر عند البخاري (١٢٦٩)، ومسلم (٢٤٠٠). وحديث جابر بن عبد الله عند البخاري (١٢٧٠)، ومسلم (٢٧٧٣). قال الخطابي: كان أبو سعيد بن الأعرابي يتأول ما كان من تكفين النبي ﷺ عبد الله ابن أبيٍّ بقميصه على وجهين. أحدهما: أن يكون أراد به تألُفَ ابنه وإكرامَه فقد كان مسلماً بريئا من النفاق. والوجه الآخر: أن عبد الله بن أبيّ كان قد كسا العباسَ بنَ عبد المطلب قميصاً، فأراد النبيُّ ﷺ أن يكافئه على ذلك لئلا يكون لمنافق عنده يد لم يجازه عليها. وحدثنا بهذه القصة ابنُ الأعرابي، حدَّثنا سعدان بن نصر، حدَّثنا سفيان بن عيينة، عن عمرو ابن دينار، سمع جابر بن عبد الله يقول: كان العباسُ بن عبد المطلب بالمدينة، فطلبت الأنصارُ له ثوباً يكسونه، فلم يجدوا قميصاً يصلح عليه إلا قميص عبد الله بن أُبيّ، فكسوه إياه. وكان أيضاً حدَّثنا بالحديث الأول الذي رواه أبو داود زادنا فيه شيئاً لم يذكره أبو داود. قلت (القائل الخطابي): عبدُ الله بن أبيّ منافق ظاهر النفاق، أنزل الله تعالى في كفره ونفاقه آيات من القرآن تتلى، فاحتمل أن يكون ﷺ إنما فعل ذلك قبل أن ينزلَ قوله تعالى: ﴿وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ﴾ [التوبة: ٨٤]، وأحتمل أن يكون معناه ما ذهب إليه ابن الأعرابي من التأويل -والله أعلم-. وفي الحديث دليل على جواز التكفين بالقميص، وفيه دليل على جواز إخراج الميت من القبر بعد الدفن لعلة أو سبب.