হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (3215)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، أَنَّ سُلَيْمَانَ بْنَ الْمُغِيرَةِ، حَدَّثَهُمْ عَنْ حُمَيْدٍ، - يَعْنِي ابْنَ هِلاَلٍ - عَنْ هِشَامِ بْنِ عَامِرٍ، قَالَ جَاءَتِ الأَنْصَارُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ أُحُدٍ فَقَالُوا أَصَابَنَا قَرْحٌ وَجَهْدٌ فَكَيْفَ تَأْمُرُنَا قَالَ ‏"‏ احْفِرُوا وَأَوْسِعُوا وَاجْعَلُوا الرَّجُلَيْنِ وَالثَّلاَثَةَ فِي الْقَبْرِ ‏"‏ ‏.‏ قِيلَ فَأَيُّهُمْ يُقَدَّمُ قَالَ ‏"‏ أَكْثَرُهُمْ قُرْآنًا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أُصِيبَ أَبِي يَوْمَئِذٍ عَامِرٌ بَيْنَ اثْنَيْنِ أَوْ قَالَ وَاحِدٌ ‏.‏




হিশাম ইবনু ‘আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, উহুদের যুদ্ধের দিন আনসাররা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট এসে বললেন, আমরা আহত এবং ক্লান্ত।। আমাদেরকে এখন কি করতে বলেন? তিনি বললেনঃ ক্ববর প্রশস্ত করে খনন করো এবং একই ক্ববরে দুই-তিন জনকে দাফন করো। জিজ্ঞেস করা হলো, কাকে আগে (ডানদিকে) রাখা হবে? তিনি বলেন, যে ব্যক্তি কুরআন সম্পর্কে অধিক পারদর্শী। হিশাম বলেন, সেদিন আমার পিতা ‘আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হন। তাকে দু’জনের অথবা একজনের সাথে ক্ববর দেয়া হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (1703) ، أخرجہ الترمذي (1713 وسندہ صحیح) ورواہ ابن ماجہ (1560 وسندہ صحیح) حمید بن ھلال صرح بالسماع عند أحمد (1/20)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجالُه ثقات لكن حميد بن هلال اختُلف في سماعه من هشام بن عامر، فقال أبو حاتم كلما في "المراسيل" ص ٤٦: حميد بن هلال لم يلق هشام بن عامر، يدخل بينه وبين هشام أبو قتادة العدوي، يقول بعضهم: عن أبي الدهماء، والحفاظ لا يدخلون بينه أحداً عن هشام، قيل له: فأي ذلك أصح؟ قال: ما رواه حماد بن زيد، عن أيوب، عن حميد، عن هشام. وقال العلائي: أخرج له مسلم عن أبي قتادة وأبي الدهماء وغيرهما، عن هشام بن عامر. قلنا: قد وقع تصريح حميد بن هلال من هشام بن عامر عند عبد الرزاق (٦٥٠١) وعنه أحمد بن حنبل في "مسنده" (١٦٢٦١) من طريق معمر، عن أيوب، عن حميد بن هلال، قال: أخبرنا هشام بن عامر. وقرن عبد الرزاق في "مصنفه " بمعمر سفيان بن عيية. ولقاء حميد لهشام محتمل، وعلى تقدير الوهم في التصريح بالسماع فإن الواسطة بين حميد وهشام ثقة، وقد عُرفت من الطرق الأخرى، فيكون الإسناد صحيحاً. وأخرجه النسائي (٢٠١٥) من طريق سليمان بن المغيرة، و (٢٠١٨) من طريق سفيان بن عيينة، عن أيوب السختياني، كلاهما (سليمان وأيوب) عن حميد بن هلال، به. وأخرجه ابن ماجه (١٥٦٠)، والترمذي (١٨١٠)، والنسائي (٢٠١٧) من طريق عبد الوارث بن سعيد، عن أيوب السختياني، عن حميد بن هلال، عن أبي الدهماء، عن هشام بن عامر. فزاد في الإسناد أبا الدهماء -واسمه قِرْفة بن بُهَيس- وهو ثقة. وهو في "مسند أحمد" (١٦٢٥١) و (١٦٢٦٢). وانظر ما بعده. وسيأتي برقم (٣٢١٧) من طريق جرير بن حازم، عن حميد بن هلال، عن سعد ابن هشام بن عامر. عن أبيه. وهذا إسناد صحيح، لأن سعداً ثقة كذلك.









সুনান আবী দাউদ (3216)


حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، - يَعْنِي الأَنْطَاكِيَّ - أَخْبَرَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، - يَعْنِي الْفَزَارِيَّ - عَنِ الثَّوْرِيِّ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ هِلاَلٍ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ زَادَ فِيهِ ‏ "‏ وَأَعْمِقُوا ‏"‏ ‏.‏




হুমাইদ ইবনু হিলাল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, একই সানাদে একই অর্থবোধক হাদীস বর্ণিত। এতে আরো রয়েছে : নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ক্ববর খনন গভীর করবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3215)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحح كسابقه. أيوب: هو ابن أبي تميمة السَّخْتياني، والثوري: هو سفيان بن سعيد، وأبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث، وأبو صالح الأنطاكي: هو محبوب بن موسى الفراء. وأخرجه النسائي (٢٠١٠) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله، وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (3217)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ، - يَعْنِي ابْنَ هِلاَلٍ - عَنْ سَعْدِ بْنِ هِشَامِ بْنِ عَامِرٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ ‏.‏




সা’দ ইবনু হিশাম ইবনু আমির (র:) হতে বর্ণিত, এ সানাদে একই হাদীসে বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3215)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. جرير: هو ابن حازم. وأخرجه النسائي (٢٠١١) من طريق جرير بن حازم، و (٢٥١٦) من طريق حماد ابن زيد، عن أيوب السختياني، كلاهما (جرير وأيوب) عن حميد بن هلال، به. وهو في "مسند أحمد" (١٦٢٦٣) و (١٦٢٦٤). وانظر سابقيه.









সুনান আবী দাউদ (3218)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنَا حَبِيبُ بْنُ أَبِي ثَابِتٍ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ أَبِي هَيَّاجٍ الأَسَدِيِّ، قَالَ بَعَثَنِي عَلِيٌّ قَالَ لِي أَبْعَثُكَ عَلَى مَا بَعَثَنِي عَلَيْهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ لاَ أَدَعَ قَبْرًا مُشْرِفًا إِلاَّ سَوَّيْتُهُ وَلاَ تِمْثَالاً إِلاَّ طَمَسْتُهُ ‏.‏




আবুল হাইয়ায আল-আসাদী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে পাঠালেন এবং বললেন, আমি কি তোমাকে এমন কাজে প্রেরণ করবো যে কাজে আমাকে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঠিয়েছিলেন? তা হলোঃ আমি যেন কোন উঁচু কবর দেখলে তা সমতল করা ব্যতীত এবং কোন মূর্তি দেখলে চূর্ণ-বির্চূন না করে নিভৃত না হই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (969)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو هياج الأسدي: هو حَيَّان بن حُصين، وأبو وائل: هو شقيق بن سلمة، وسفيان: هو الثوري، ومحمد بن كثير: هو العَبْدي. وأخرجه مسلم (٩٦٩)، والترمذي (١٠٧٠)، والنسائي (٢٥٣١) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٨٣) و (٧٤١). وروى البخاري بإثر (١٣٩٠) عن سفيان التمار: أنه رأى قبر النبي ﷺ مُسَنَّماً. قال ابن القيم في "تهذيب السنن": وهذه الآثار لا تضاد بينها، والأمر بتسوية القبور إنما هو تسويتها بالأرض، وأن لا ترفع مشرفة عالية، وهذا لا يناقض تسنيمها شيئاً يسيراً عن الأرض. وقال ابن قدامة في "المغني" ٣/ ٤٣٧: وتسنيم القبر أفضل من تسطيحه. وبه قال مالك وأبو حنيفة والثوري. وقال الشافعي: تسطيحه أفضل، قال: وبلغنا أن رسول الله ﷺ سطح قبر ابنه إبراهيم. وعن القاسم قال: رأيتُ قبر النبي ﷺ وأبي بكر وعمر مُسطَّحة [قلنا: يعني الحديث الآتي برقم (٣٢٢٠)] ولنا ما روى سفيان التمار أنه قال: رأيتُ قبر النبي ﷺ مسنَّماً. رواه البخاري بإسناده، وعن الحسن مثله. ولأن التسطيح يشبه أبنية أهل الدنيا، وهو أشبه بشعار أهل البدع، فكان مكروهاً. وحديثنا أثبتُ من حديثهم وأصح، فكان العمل به أولى. وقال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٢٥٧: المستحب تسنيم القبور، وهو قول أبي حنيفة ومالك وأحمد والمزني وكثير من الشافعية، وادعى القاضي حسين اتفاق الأصحاب عليه، وتعقب بأن جماعة من قدماء الشافعية استحبوا التسطيح كما نص عليه الشافعي، وبه جزم الماوردي وآخرون. قلنا: قوله: "مشرفاً" أي: مرتفعاً غاية الارتفاع، وقيل: أي: عالية أكثر من شبر، قاله القاري.









সুনান আবী দাউদ (3219)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي عَمْرُو بْنُ الْحَارِثِ، أَنَّ أَبَا عَلِيٍّ الْهَمْدَانِيَّ، حَدَّثَهُ قَالَ كُنَّا مَعَ فَضَالَةَ بْنِ عُبَيْدٍ بِرُودِسَ مِنْ أَرْضِ الرُّومِ فَتُوُفِّيَ صَاحِبٌ لَنَا فَأَمَرَ فَضَالَةُ بِقَبْرِهِ فَسُوِّيَ ثُمَّ قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُ بِتَسْوِيَتِهَا ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رُودِسُ جَزِيرَةٌ فِي الْبَحْرِ ‏.‏




আমর ইবনুল হারিস (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আবূ আলী আল-হামদানী (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে এ হাদীসটি জানান। তিনি বলেছেন, আমরা ফাদালাহ ইবনু ‘উবাইদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে রোম দেশের রূযিস নামক স্থানে ছিলাম। আমাদের এক ব্যক্তি এখানে মৃত্যূ বরণ করলো। তার ক্ববর সর্ম্পকে ফাদালাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নির্দেশ মোতাবেক মাটি সমান করে দেয়া হলো। অতঃপর তিনি বললেন, আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে কবর সমতল করার নির্দেশ দিতে শুনেছি। আবু দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘রূযিস’ সমুদ্রে অবস্থিত একটি দ্বীপের নাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (969) ، انظر الحدیث السابق (968)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو علي الهمْداني: هو ثمامة بن شفيّ، وابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه مسلم (٩٦٨)، والنسائي (٢٠٣٠) من طريق عبد الله بن وهْبٍ، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٩٣٤). وجزيرة رُودِس، قال القاضي عياض في "مشارق الأنوار" ١/ ٣٠٥: بضم الراء وكسر الدال وآخره سين مهملة، كذا ضبطناه عن الصدفي والأسدي وغيرهما، إلا الخُشَني والتميمي فإنه عندهما بفتح الراء. قلنا: وهي الآن إحدى جزر الأرخبيل اليوناني. تقع بقرب الساحل الغربي الجنوبي من تركيا الآسيوية.









সুনান আবী দাউদ (3220)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ بْنِ هَانِئٍ، عَنِ الْقَاسِمِ، قَالَ دَخَلْتُ عَلَى عَائِشَةَ فَقُلْتُ يَا أُمَّهْ اكْشِفِي لِي عَنْ قَبْرِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَصَاحِبَيْهِ رضى الله عنهما فَكَشَفَتْ لِي عَنْ ثَلاَثَةِ قُبُورٍ لاَ مُشْرِفَةٍ وَلاَ لاَطِئَةٍ مَبْطُوحَةٍ بِبَطْحَاءِ الْعَرْصَةِ الْحَمْرَاءِ قَالَ أَبُو عَلِيٍّ يُقَالُ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مُقَدَّمٌ وَأَبُو بَكْرٍ عِنْدَ رَأْسِهِ وَعُمَرُ عِنْدَ رِجْلَىْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




আল-ক্বাসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘আয়িশাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট উপস্থিত হয়ে বললাম, ফুফু! রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর দুই সাথীর ক্ববর খুলে আমাকে একটু দেখান। তিনি তিনটি কবরই আমাকে (পর্দা) খুলে দেখালেন। আমি দেখি যে, তা খুব উঁচুও নয়, আবার একেবারে সমতলও নয়। কবর তিনটির উপর আল-আরসা নামক স্থানের লালা কাঁকর বিছানো ছিলো। আবূ আলী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, কথিত আছে, সম্মুখভাগে রাসুলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবর, তাঁর মাথার দিকে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর কবর এবং তাঁর পায়ের দিকে ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর কবর। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মাথা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পায়ের কাছে অবস্থিত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (1712)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. عمرو بن عثمان بن هانىء روى عنه ثلاثة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام": كأنه صدوق. وقد صحح حديثه هذا الحاكم وسكت عنه الذهبي، وصححه كذلك النووي في "المجموع" ٥/ ٢٩٦ وابن الملقن في "البدر المنير"٥/ ٣١٩. وأخرجه أبو يعلى (٤٥٧١)، والحاكم ١/ ٣٦٩ - ٣٧٠، والبيهقي ٤/ ٣ من طريق عمرو بن عثمان بن هانىء، به. قال البيهقي: ومتى ما صحت رؤية القاسم بن محمد قبورهم مبطوحة ببطحاه العرصة، فذلك يدل على التسطيح، وصحت رؤية سفيان التمار قبر النبي ﷺ مُسنَّماً، فكأنه غيِّر عما كان عليه في القديم، فقد سقط جداره في زمن الوليد بن عبد الملك، وقِيل: في زمن عمر بن عبد العزيز ثم أُصلح، وحديث القاسم بن محمد في هذا الباب أصح وأولى أن يكون محفوظاً، إلا أن بعض أهل العلم من أصحابنا استحب التسنيم في هذا الزمان، لكونه جائزاً بالإجماع، وأن التسطيح صار شعار أهل البدع، فلا يكون سبباً لإطالة الألسنة فيه ورميه بما هو منزه عنه من مذاهب أهل البدع، وبالله التوفيق. قال القاري في "مرقاة المفاتيح" ٢/ ٣٧٩: "لا مشرفة": مرتفعة غاية الارتفاع، وقيل: أي: عالية أكثر من شبر، "ولا لاطئة" بالهمزة والياء، أي: مستوية على وجه الأرض، يقال: لطأ بالأرض، أي: لصق بها، "مبطوحة": صفة لقبور، قال ابن الملك: أي: مسوَّاة مبسوطة على الأرض … وفي "النهاية" [١/ ١٣٤]: البطح: التسوية، وبطح المسجد أي: ألقى فيه البطحاء، وهو الحصى الصغار … "ببطحاء العرصة" أي: برمل العرصة، وهي موضع، وقال الطيبي: العرصة جمعها عرصات، وهي كل موضع واسع لا بناء فيه، والبطحاء: مسيل واسع فيه دقاق الحصى، والمراد بها هنا الحصى لإضافتها إلى العرصة، وقوله: "الحمراء" صفة لبطحاء أو العرصة.









সুনান আবী দাউদ (3221)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بَحِيرٍ، عَنْ هَانِئٍ، مَوْلَى عُثْمَانَ عَنْ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ، قَالَ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم إِذَا فَرَغَ مِنْ دَفْنِ الْمَيِّتِ وَقَفَ عَلَيْهِ فَقَالَ ‏ "‏ اسْتَغْفِرُوا لأَخِيكُمْ وَسَلُوا لَهُ التَّثْبِيتَ فَإِنَّهُ الآنَ يُسْأَلُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ بَحِيرُ بْنُ رَيْسَانَ ‏.‏




উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃতের দাফন শেষ করে সেখানে দাঁড়িয়ে বলতেনঃ তোমাদের ভাইয়ের জন্য তোমরা ক্ষমা প্রার্থনা করো এবং সে যেন প্রতিষ্ঠিত থাকে সেজন্য দু’আ করো। কেননা তাকে এখনই জিজ্ঞাসাবাদ করা হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (133)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل هانىء مولى عثمان بن عفان. وعبد الله بن بُحير: هو ابن رَيسَان الصنعاني، وهشام بن يوسف: هو الصنعاني. ونقل ابن الملقن في "البدر المنير"٥/ ٣٣١ عن المنذري أنه حسَّن هذا الحديث. وأخرجه عبد الله بن أحمد بن حنبل في "السنة" (١٤٢٥)، وفي زياداته على "فضائل الصحابة" لأبيه (٧٧٣)، والبزار (٤٤٥)، وابن المنذر في "الأوسط" ٥/ ٤٥٨، والحاكم ١/ ٣٧٠، والبيهقي ٤/ ٥٦، والضياء المقدسي في "المختارة" (٣٨٨)، والمزي في ترجمة هانىء مولى عثمان من "تهذيب الكمال" ٣٠/ ١٤٧ - ١٤٨ من طريق هام بن يوسف، بهذا الإسناد.









সুনান আবী দাউদ (3222)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مُوسَى الْبَلْخِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ ثَابِتٍ، عَنْ أَنَسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ عَقْرَ فِي الإِسْلاَمِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ عَبْدُ الرَّزَّاقِ كَانُوا يَعْقِرُونَ عِنْدَ الْقَبْرِ بَقَرَةً أَوْ شَاةً ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ইসলামে কোন বলিদান নেই। ‘আবদুর রাযযাক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, জাহিলী যুগে লোকেরা ক্ববরের কাছে গরু ছাগল বলি দিতো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "مصف عبد الرزاق" (٦٦٩٠)، ومن طريقه أخرجه أحمد (١٣٠٣٢)، وعبد بن حميد (١٢٥٣)، وابن حبان (٣١٤٦)، والبيهقي ٤/ ٥٧ و ٩/ ٣١٤. قال الخطابي: كان أهل الجاهلية يعقرون الإبل على قبر الرجل الجواد، يقولون: نجازيه على فعله، لأنه كان يعقِرها في حياته فيطعمها الأضياف، فنحن نعقرها عند قبره لتأكلها السباع والطير فيكون مطعماً بعد مماته كما كان مطعماً في حياته. قال الشاعر: عقرت على قبر النجاشي ناقتي … بأبيض عضْب أَخلَصَتْهُ صَيَاقِلُه على قبر مَن لو أنني مُتُّ قبله … لهانت عليه عند قبري رواحلُه ومنهم من كان يذهب في ذلك إلى أنه إذا عُقِرت راحلتُه عند قبره حشر في القيامة راكبًا، ومن لم يعقر عنه حشر راجلاً، وكان هذا على مذهب من يرى البعث منهم بعد الموت.









সুনান আবী দাউদ (3223)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ أَبِي الْخَيْرِ، عَنْ عُقْبَةَ بْنِ عَامِرٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَرَجَ يَوْمًا فَصَلَّى عَلَى أَهْلِ أُحُدٍ صَلاَتَهُ عَلَى الْمَيِّتِ ثُمَّ انْصَرَفَ ‏.‏




উক্ববাহ ইবনু ‘আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনাহ থেকে বেরিয়ে উহুদের শহীদদের ক্ববরের নিকট গিয়ে মৃতের জন্য জানাযার নিয়মে সালাত আদায় করে ফিরে আসলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6426) صحیح مسلم (2296)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الخير: هو مرثد بن عبد الله اليزني. وأخرجه البخاري (١٣٤٤)، ومسلم (٢٢٩٦)، والنسائي (١٩٥٤) من طريق الليث بن سعد، ومسلم (٢٢٩٦) من طريق يحيى بن أيوب، كلاهما عن يزيد بن أبي حبيب، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٣٤٤)، و "صحيح ابن حبان"، (٣١٩٨). وانظر ما بعده. قال البغوي في "شرح السنة" ٥/ ٣٦٦ - ٣٦٧: واختلفوا في الصلاة على الشهيد: فذهب أكثرهم إلى أنه لا يُصلِّى عليه، وهو قول أهل المدينة، وبه قال مالك والشافعي وأحمد. وذهب قوم إلى أنه يُصلى عليه، لأنه روي أن النبي ﷺ صلَّى على حمزة، وهو قول الثوري وأصحاب الرأي، وبه قال إسحاق. وتأول الأولون ما روي من صلاته على حمزة فجعلها بمعنى الدعاء كما روي عن عقبة بن عامر قال: صلَّى النبي ﷺ على قتلى أحد بعد ثماني سنين كالمودع للأحياء والأموات [يعني الرواية التالية عند المصنف]. قلنا: ولأحمد قول آخر ذكره ابن القيم ورجحه، وهو التخيير بين الصلاة عليه وتركه، ذكرناه عند تعليقنا على الحديث السالف برقم (٣١٣٥).









সুনান আবী দাউদ (3224)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ حَيْوَةَ بْنِ شُرَيْحٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ إِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم صَلَّى عَلَى قَتْلَى أُحُدٍ بَعْدَ ثَمَانِ سِنِينَ كَالْمُوَدِّعِ لِلأَحْيَاءِ وَالأَمْوَاتِ ‏.‏




ইয়াযীদ ইবনু আবূ হাবীব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, এ সানাদেও একই হাদীস বর্ণিত হয়েছে। তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আট বছর পর উহুদ যুদ্ধের শহীদদের জন্য জানাযা পড়েছেন জীবিত ও মৃতের দু’আ করার অনুরূপ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4042)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن المبارك: هو عبد الله، والحسن بن علي: هو الخلال. وأخرجه البخاري (٤٠٤٢) من طريق عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وهو في مسند أحمد، (١٧٤٠٢). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (3225)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي أَبُو الزُّبَيْرِ، أَنَّهُ سَمِعَ جَابِرًا، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى أَنْ يُقْعَدَ عَلَى الْقَبْرِ وَأَنْ يُقَصَّصَ وَيُبْنَى عَلَيْهِ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ক্ববরের উপর বসতে, তাতে চুনকাম করতে এবং তার উপর কিছু নির্মাণ করতে নিষেধ করতে শুনেছি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (970)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، وقد صرح بالسماع كل من ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- وأبي الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- فانتفت شبهة تدليسهما. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (٦٤٨٨)، ومن طريقه أخرجه مسلم (٩٧٠). وأخرجه مسلم (٩٧٠)، والنسائي (٢٥٢٨) من طريق حجاج بن محمد المِصِّيصي، والترمذي (١٠٧٤) من طريق محمد بن ربيعة الكلابي، كلاهما عن ابن جريج، به. زاد محمد بن ربيعة في روايته: وأن يُكتب عليها. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وكذلك رواه بهذه الزيادة الحاكم ١/ ٣٧٠ من طريق حفص بن غياث وأبي معاوية، كلاهما عن ابن جريج، وصححه، لكنه قال: الكتابة لفظة صحيحة غريبة، وليس العمل عليها، فإن أئمة المسلمين من الشرق إلى الغرب مكتوب على قبورهم، وهو عمل أخذ به الخلف عن السلف. فتعقبه الذهبي في "تلخيصه" بقوله: ما قلتَ طائلاً، ولا نعلم صحابياً فعل ذلك، وإنما هو شيء أحدثه بعض التابعين فمن بعدهم، ولم يبلغهم النهي. قلنا: وأخرج الحديث بهذه الزيادة أيضاً الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ١/ ٥١٥ و ٥١٦ من طريق حفص بن غياث وأبي معاوية كذلك، عن ابن جريج، وابن حبان (٣١٦٤) من طريق أبي معاوية. وأخرجه مسلم (٩٧٠)، والنسائي (٢٠٢٩) من طريق أيوب السختياني، عن أبي الزبير، عن جابر قال: نُهي عن تقصيص القبور. هذا لفظ مسلم، ولفظ النسائي: نهى رسول الله ﷺ عن تجصيص القبور. قلنا: والتقصيص والتجصيص بمعنى. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٤٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣١٦٢ - ٣١٦٥). وانظر ما بعده. قال النووي في "المجموع" ٥/ ٢٩٨: قال الشافعي والأصحاب: يكره أن يُجصّص القبر وأن يكتب عليه اسم صاحبه أو غير ذلك، وأن يبنى عليه، وهذا لا خلاف فيه عندنا، وبه قال مالك وأحمد وداود وجماهير العلماء، وقال أبو حنيفة: لا يكره. قلنا: لكن نقل الطحاوي في "حاشيته" على "مراقي الفلاح" عن صاحب "البحر" قوله: الحديث المتقدم يمنع الكتابة، فليكن هو المعوّل عليه، وقال إبراهيم الحلبي في "غنية المتملي في شرح منية المصلي" ص ٥٩٩: وكره أبو يوسف الكتابة أيضاً. والتقصيص: قال في "اللسان": والقَصُّ: الجَصُّ، لغة حجازية، وقيل: الحجارة من الجَصِّ، وقد قصَّصَ داره جصَّصها. ومدينة مُقصَّصة: مطلية بالقصِّ، وكذلك قبر مقصَّص … والتقصيص: هو التجصيص.









সুনান আবী দাউদ (3226)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَعُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، قَالاَ حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ غِيَاثٍ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ مُوسَى، وَعَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ عُثْمَانُ أَوْ يُزَادَ عَلَيْهِ وَزَادَ سُلَيْمَانُ بْنُ مُوسَى أَوْ أَنْ يُكْتَبَ عَلَيْهِ وَلَمْ يَذْكُرْ مُسَدَّدٌ فِي حَدِيثِهِ أَوْ يُزَادَ عَلَيْهِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ خَفِيَ عَلَىَّ مِنْ حَدِيثِ مُسَدَّدٍ حَرْفُ وَأَنْ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, এ সানাদেও অনুরূপ হাদীস বর্ণিত হয়েছে। বর্ণনাকারী ‘উসমানের বর্ণনায় রয়েছেঃ এতে অতিরিক্ত কিছু যোগ করতে নিষেধ করেছেন। সুলাইমান ইবনু মূসার বর্ণনায় রয়েছেঃ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ক্ববরের উপর লিখতে নিষেধ করেছেন। ‘উসমানের বর্ণনার অতিরিক্ত অংশটি মুসাদ্দাদের বর্ণনায় নেই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (970)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: هذا الحديث له إسنادان: فالأول: عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر، وهذا إسناد صحيح صرح فيه كل من ابن جريج وأبي الزبير بالسماع في الإسناد السابق عند المصنف، والثاني: عن ابن جريج، عن سليمان بن موسى، عن جابر، وهو منقطع؟ لأن سليمان بن موسى -وهو الأشدق- لم يسمع من جابر، وابن جريج لم يصرح بسماعه من سليمان، ولكن الزيادة التي زادها في حديثه متابع عليها كما بيناه في الحديث السابق. وأخرجه بالإسناد الأول: مسلم (٩٧٠)، والنسائي (٢٠٢٧) من طريق حفص بن غياث، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٣١٦٣) مختصراً بالنهي عن البناء على القبر. وأخرجه بالإسناد الثاني: ابن ماجه (١٥٦٣)، والنسائي (٢٠٢٧) من طريق حفص بن غياث، به. واقتصر ابن ماجه على النهي عن الكتابة. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٤٩) عن محمد بن بكر، عن ابن جريج. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٧٦٩٩) من طريق قيس بن الربيع، عن ابن جريج، عن سليمان بن موسى، عن عطاء، عن جابر. وقيل بن الربيع ضعيف يعتبر به، وقد خالف في إسناده حفصَ بن غياث ومحمدَ بن بكر وهما ثقتان.









সুনান আবী দাউদ (3227)


حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ قَاتَلَ اللَّهُ الْيَهُودَ اتَّخَذُوا قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ مَسَاجِدَ ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আল্লাহ ইয়াহুদীদের ধ্বংস করুন। তারা তাদের নবীদের কবরসমূহকে সাজদাহর স্থানে (মাসজিদে) পরিণত করেছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (437) صحیح مسلم (530)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" -برواية محمد بن الحَسَن- (٣٢١). وأخرجه البخاري (٤٣٧)، ومسلم (٥٣٠)، والنسائي (٢٠٤٧) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٨٢٦)، و"صحيح ابن حبان" (٢٣٢٦). وأخرجه مسلم (٥٣٠) من طريق يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة. قال المناوي في "فيض القدير" ٤/ ٤٦٦: "قاتل الله اليهود" أي: أبعدهم عن رحمته. "اتخذوا قبور أنبيائهم مساجد" أي: اتخذوها جهة قبلتهم مع اعتقادهم الباطل، وأن اتخاذها مساجد لازم لاتخاذ المساجد عليها كعكسه. وهذا بين به سبب لعنهم لما فيه من المغالاة في التعظيم. وخصّ هنا اليهود لابتدائهم هذا الاتخاذ، فهم أظلم، وضم إليهم في رواية البخاري: النصارى [من حديث عائشة وابن عباس عند البخاري (٤٣٥) و (٤٣٦)] وهم وإن لم يكن لهم إلا نبي واحد، ولا قبر له، لأن المراد النبي وكبار أتباعه كالحواريين، أو يقال: الضمير يعود لليهود فقط لتلك الرواية أو على الكل، ويراد بأنبيائهم مَن أُمِروا بالإيمان بهم، وإن كانوا من الأنبياء السابقين كنوح وبراهيم.









সুনান আবী দাউদ (3228)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا خَالِدٌ، حَدَّثَنَا سُهَيْلُ بْنُ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لأَنْ يَجْلِسَ أَحَدُكُمْ عَلَى جَمْرَةٍ فَتَحْرِقَ ثِيَابَهُ حَتَّى تَخْلُصَ إِلَى جِلْدِهِ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَجْلِسَ عَلَى قَبْرٍ ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কেউ যদি আগুনের ফুলকির উপর বসে এবং তাতে তার পরিধের বস্ত্র পুড়ে ঐ আগুন তার শরীরের চামড়া পর্যন্ত পৌঁছে যায় এটা তার জন্য ক্ববরের উপরে বসা থেকে উত্তম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (971)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. خالد: هو ابن عبد الله الواسطي الطحان، ومُسَدَّدٌ: هو ابن مُسَرْهَد. وأخرجه مسلم (٩٧١)، وابن ماجه (١٥٦٦)، والنسائي (٢٠٤٤) من طريق سهيل بن أبي صالح، به. وهو في "مسند أحمد" (٨١٠٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣١٦٦). قال المناوي في "فيض القدير" ٥/ ٢٥٨: قال الطيبي: جعل الجلوس على القبر وسريان ضرره إلى قلبه وهو لا يشعر بمنزلة سراية النار من الثوب إلى الجلد ثم إلى داخله. قال المناوي: وهذا مفسّر بالجلوس للبول والغائط كما في رواية أبي هريرة، فالجلوس والاستناد والوطء على القبر لغير ذلك مكروه لا حرام، بل لا يكره لحاجة. قلنا: حديث أبي هريرة الذي أشار إليه المناوي هو ما أخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ١/ ٥١٧ عنه قال: قال رسول الله ﷺ: "من جلس على قبر يبول عليه أو يتغوط، فكأنما جلس على جمرة نار".









সুনান আবী দাউদ (3229)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، أَخْبَرَنَا عِيسَى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، - يَعْنِي ابْنَ يَزِيدَ بْنِ جَابِرٍ - عَنْ بُسْرِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، قَالَ سَمِعْتُ وَاثِلَةَ بْنَ الأَسْقَعِ، يَقُولُ سَمِعْتُ أَبَا مَرْثَدٍ الْغَنَوِيَّ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تَجْلِسُوا عَلَى الْقُبُورِ وَلاَ تُصَلُّوا إِلَيْهَا ‏"‏ ‏.‏




আবূ মারসাদ আল-গানাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেনঃ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা ক্ববরের উপর বসবে না এবং ক্ববরের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (972)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عيسى: هو ابن يونُس بن أبي إسحاق السَّبيعي، وأبو مَرْثَد الغَنَوي: هو كنَّاز بن الحُصَين بن يَرْبوع. وأخرجه مسلم (٩٧٢)، والترمذي (١٠٧٣)، والنسائي (٧٦٠) من طريق الوليد ابن مسلم الدمشقي، عن عبد الرحمن بن يزبد بن جابر، بهذا الإسناد. وقد صرح الوليد بسماعه في جميع طبقات الإسناد عند أحمد (١٧٢١٥)، وابن خزيمة (٧٩٣). وأخرجه مسلم (٩٧٢)، والترمذي (١٠٧١) و (١٠٧٢) من طريق عبد الله بن المبارك، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن بسر بن عُبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، عن واثلة بن الأسقع، عن أبي مرثد الغنوي. فزاد في الإسناد: أبا إدريس الخولاني. وقال الترمذي بعد ذكره طريق الوليد بن مسلم التي ليس فيها أبو إدريس الخولاني: وهذا الصحيح. ونقل عن البخاري قوله: حديث ابن المبارك خطأ، أخطأ فيه ابن المبارك .. قلنا: وكذلك قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل" ١/ ٨٠، وقال الدارقطني في "العلل" ٧/ ٤٣: المحفوظ ما قاله الوليد -يعني ابن مسلم- ومن تابعه عن ابن جابر لم يذكر أبا إدريس فيه. وهو في "مسند أحمد" (١٧٢١٥)، و"صحيح ابن حبان" (٢٣٢٠) و (٢٣٢٤). قال النووي في "شرح مسلم": فيه تصريح بالنهي عن الصلاة إلى قبر، قال الشافعي ﵀: وأكره أن يعظَّم مخلوق حتى يجعل قبره مسجداً مخافة الفتنة عليه وعلى مَن بعده من الناس. قلنا: وقال الشافعي في "الأم" ١/ ٢٧٨: وان صلَّى إلى القبر أجزأه وقد أساء. وقال المناوي في "فيض القدير" ٦/ ٣٩٠: وفي البخاري عن عمر ما يدل على أن النهي عن ذلك لا يقتضي فساد الصلاة. قلنا: ذكره البخاري تعليقاً في كتاب الصلاة، باب هل تنبش قبور مشركي الجاهلية ويتخذ مكانها مساجد؟ قال: ورأى عمر أنس بن مالك يصلي عند قبر، فقال: القبر القبر، ولم يأمره بالإعادة. ووصله عبد الرزاق (١٥٨١) عن معمر، عن ثابت البناني، عن أنس بن مالك قال: رآني عمر بن الخطاب وأنا أصلي عند قبر فجعل يقول: القبر، قال: فحسبته يقول: القمر، قال: فجعلتُ أرفع رأسي إلى السماء فأنظر، فقال: إنما أقول: القبر، لا تصل إليه.









সুনান আবী দাউদ (3230)


حَدَّثَنَا سَهْلُ بْنُ بَكَّارٍ، حَدَّثَنَا الأَسْوَدُ بْنُ شَيْبَانَ، عَنْ خَالِدِ بْنِ سُمَيْرٍ السَّدُوسِيِّ، عَنْ بَشِيرِ بْنِ نَهِيكٍ، عَنْ بَشِيرٍ، مَوْلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَكَانَ اسْمُهُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ زَحْمُ بْنُ مَعْبَدٍ فَهَاجَرَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏"‏ مَا اسْمُكَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ زَحْمٌ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ بَلْ أَنْتَ بَشِيرٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ بَيْنَمَا أَنَا أُمَاشِي رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَرَّ بِقُبُورِ الْمُشْرِكِينَ فَقَالَ ‏"‏ لَقَدْ سَبَقَ هَؤُلاَءِ خَيْرًا كَثِيرًا ‏"‏ ‏.‏ ثَلاَثًا ثُمَّ مَرَّ بِقُبُورِ الْمُسْلِمِينَ فَقَالَ ‏"‏ لَقَدْ أَدْرَكَ هَؤُلاَءِ خَيْرًا كَثِيرًا ‏"‏ ‏.‏ وَحَانَتْ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَظْرَةٌ فَإِذَا رَجُلٌ يَمْشِي فِي الْقُبُورِ عَلَيْهِ نَعْلاَنِ فَقَالَ ‏"‏ يَا صَاحِبَ السِّبْتِيَّتَيْنِ وَيْحَكَ أَلْقِ سِبْتِيَّتَيْكَ ‏"‏ ‏.‏ فَنَظَرَ الرَّجُلُ فَلَمَّا عَرَفَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَلَعَهُمَا فَرَمَى بِهِمَا ‏.‏




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর মুক্তদাস বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জাহিলী যুগে তার নাম ছিল জাহম ইবনু মা’বদ। তিনি হিজরাত করে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে চলে আসলে তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেনঃ তোমার নাম কি? তিনি বললেন জাহম। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ বরং তোমার নাম বাশীর। তিনি বলেন, একবার আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যাচ্ছিলাম। তিনি মুশরিকদের কতিপয় ক্ববরের পাশ দিয়ে অতিক্রমকালে বললেনঃ এরা বিরাট কল্যাণ লাভের পূর্বেই অতীত হয়ে গেছে। তিনি তিনবার এরূপ বললেন। অতঃপর তিনি কতিপয় মুসলিমের ক্ববরের পাশ দিয়ে অতিক্রমকালে বললেনঃএরা প্রচুর কল্যাণ প্রাপ্ত হয়েছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে জুতা পরিহিত অবস্থায় কবরস্থানের উপর দিয়ে চলতে দেখে বললেনঃ হে জুতা পরিধানকারী! তোমার জন্য দুঃখ হচ্ছে, তুমি জুতা খুলে ফেলো। লোকটি রাসূলুল্লাহ(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর দিকে তাকালো এবং তাঁকে চিনতে পেরে সে তার পায়ের জুতা খুলে ফেলে দিলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (2050 وسندہ صحیح) وابن ماجہ (1568 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن ماجه (١٥٦٨) والنسائي (٢٠٤٨) من طريق الأسود بن شيبان، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٧٨٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣١٧٠). قال ابن الأثير في "النهاية": "يا صاحب السِّبتَيْن اخلع نعليك" السِّبْتُ، بالكسر: جلود البقر المدبوغة بالقَرَظ يتخذ منها النعال، سميت بذلك لأن شعرها قد سُبِتَ عنها: أي: حُلِق وأُزيل، وقيل: لأنها انسبتت بالدباغ، أي: لانت، يريد: يا صاحب النعلين. وفي تسميتهم للنعل المتخذة من السبت سبتاً اتساع، مثل قولهم: فلان يلبس الصوف والقطن والإبرَيْسَم، أي: الثياب المتخذة منها. وإنما أمره بالخلع احتراماً للمقابر، لانه كان يمشي بينها. وقيل: لأنها كان بها قذر، أو لاختياله في مشيه. قلنا: والقَرَظ شجر عظام لها سوق غلاظ أمثال شجر الجوز، وهي من الفصيلة القرنية، وهي نوع من أنواع السنط العربي، يستخرج منه صمغ مشهور. واحدته قَرَظة. وقال الخطابي: وخبر أنس يدل على جواز لبس النعل لزائر القبور، وللماشي بحضرتها وبين ظهرانيها [يعني الحديث الآتي عند المصنف بعده]. فأما خبر السبتيتين فيشبه أن يكون إنما كره ذلك لما فيها من الخيلاء، وذلك أن نعال السِّبت من لباس أهل الترفُّه والتنعُّم … فأحب ﷺ أن يكون دخوله المقابر على زي التواضع ولباس أهل الخشوع.









সুনান আবী দাউদ (3231)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ، - يَعْنِي ابْنَ عَطَاءٍ - عَنْ سَعِيدٍ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ قَالَ ‏ "‏ إِنَّ الْعَبْدَ إِذَا وُضِعَ فِي قَبْرِهِ وَتَوَلَّى عَنْهُ أَصْحَابُهُ إِنَّهُ لَيَسْمَعُ قَرْعَ نِعَالِهِمْ ‏"‏ ‏.‏




আনাস (রা:) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যখন কোন বান্দাকে ক্ববরে রাখা হয়, অতঃপর তার সাথীরা সেখান থেকে চলে যেতে থাকে, তখন সে তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায়।



সহীহঃ এর চেয়ে পরিপূর্ণ বর্ণনা সামনে আসছে (৪৭৫১), সহীহাহ (১৩৪৪)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1338) صحیح مسلم (2870)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحح وهذا إسناد قوي من أجل عبد الوهاب بن عطاء، فهو صدوق لا بأس به، لكنة متابع. قتادة: هو ابن دِعامة السدوسي، وسعيد: هو ابن أبي عروبة. وأخرجه البخاري (١٣٣٨)، ومسلم (٢٨٧٠)، والنسائي (٢١٨٧) و (٢١٨٩) من طريق سعيد بن أبي عروبة، ومسلم (٢٨٧٠)، والنسائي (٢١٨٨) من طريق شيبان ابن عبد الرحمن النحوي، كلاهما عن قتادة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٢٢٧١)، و "صحيح ابن حبان" (٣١٢٠). وسيتكرر برقم (٤٧٥٢).









সুনান আবী দাউদ (3232)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ يَزِيدَ أَبِي مَسْلَمَةَ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ دُفِنَ مَعَ أَبِي رَجُلٌ فَكَانَ فِي نَفْسِي مِنْ ذَلِكَ حَاجَةٌ فَأَخْرَجْتُهُ بَعْدَ سِتَّةِ أَشْهُرٍ فَمَا أَنْكَرْتُ مِنْهُ شَيْئًا إِلاَّ شُعَيْرَاتٍ كُنَّ فِي لِحْيَتِهِ مِمَّا يَلِي الأَرْضَ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার পিতার সাথে (একই ক্ববরে) অন্য এক লোককে দাফন করা হয়েছিল। তাই আমি তার লাশ অন্যত্র সরিতে নেয়ার ইচ্ছা করলাম। অতঃপর ছয় মাস পর আমি পিতার লাশ তুললাম (এবং অন্যত্র দাফন করলাম)। তার শরীরের কোন অংশই পরিবর্তন হয়নি। কেবল দাড়ির কিছু চুল মাটির সংস্পর্শে কিছুটা পরিবর্তিত হয়েছিলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو نَضْرة: هو المنذر بن مالك بن قِطعة العبْدي. وأخرجه بنحوه البخاريُّ (١٣٥١)، والنسائي (٢٠٢١) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن جابر بن عبد الله. ورواية البخاري مطولهَ بقصة استشهاد عبد الله بن حرام والد جابر، وقال في روايته: فاستخرجته بعد ستة أشهر فإذا هو كيوم وضعْتُه غيرَ هُنيَّة، في أذنه.









সুনান আবী দাউদ (3233)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ عَامِرٍ، عَنْ عَامِرِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ مَرُّوا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِجَنَازَةٍ فَأَثْنَوْا عَلَيْهَا خَيْرًا فَقَالَ ‏"‏ وَجَبَتْ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ مَرُّوا بِأُخْرَى فَأَثْنَوْا عَلَيْهَا شَرًّا فَقَالَ ‏"‏ وَجَبَتْ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ إِنَّ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ شُهَدَاءُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে দিয়ে লোকেরা একটা লাশ নিয়ে আসার সময় মৃতের উত্তম প্রশংসা করলো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ (জান্নাত) ওয়াজিব হয়ে গেছে। অতঃপর লোকজন তাঁর সামনে দিয়ে আরেকটি লাশ নিয়ে গেলো এবং তারা মৃত ব্যক্তি সম্পর্কে খারাপ মন্তব্য করলো। তিনি বললেনঃ (জাহান্নাম) ওয়াজিব হয়ে গেছে। অতঃপর তিনি বললেনঃ তোমাদের একজন আরেকজনের বিরুদ্ধে সাক্ষী হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عامر بن سعد -وهو البجلي- فقد روى عنه جمع وروى له مسلم في "صحيحه"، وصحح الترمذي حديثه، ووثقه ابن حبان، وهو متابع. وأخرجه النسائي (١٩٣٣) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (١٤٩٢) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة وإسناده حسن. وهو في "مسند أحمد" (٧٥٥٢) و (١٠٠١٣)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠٢٤). قال أبو عمر بن عبد البر في "الاستذكار" (٣٨٩٣٠): كان أصحاب رسول الله ﷺ ﵃ لا يثنون على أحد إلا بالصدق، ولا يمدحون إلا بالحق، لا لشيء من أعراض الدنيا شهوة أو عصية أو تقية، ومن كان ثناؤه هكذا يصح فيه هذا الحديث وما كان مثله، والله أعلم. وقال الداوودي فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" ٣/ ٢٣٠ - ٢٣١: المعتبر في ذلك شهادة أهل الفضل والصدق، لا الفسقة، لأنهم قد يثنون على من يكون مثلهم، ولا من بينه وبين الميت عداوة، لأن شهادة العدو لا تقبل. وقال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٢٢٩: والمراد بالوجوب الثبوت، إذ هو في صحة الوقوع كالشيء الواجب، والأصل أنه لا يجب على الله شيء، بل الثواب فضلُه، والعقاب عدلُه لا يُسال عما يفعل. وفي الباب عن أنس عند البخاري (١٣٦٧)، ومسلم (٩٤٩)، وأحمد (١٤٨٣٧) وعن عمر بن الخطاب عند البخاري (١٣٦٨).









সুনান আবী দাউদ (3234)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ كَيْسَانَ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ أَتَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَبْرَ أُمِّهِ فَبَكَى وَأَبْكَى مَنْ حَوْلَهُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ اسْتَأْذَنْتُ رَبِّي تَعَالَى عَلَى أَنْ أَسْتَغْفِرَ لَهَا فَلَمْ يُؤْذَنْ لِي فَاسْتَأْذَنْتُ أَنْ أَزُورَ قَبْرَهَا فَأُذِنَ لِي فَزُورُوا الْقُبُورَ فَإِنَّهَا تُذَكِّرُ بِالْمَوْتِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মায়ের ক্ববরের নিকট এসে কাঁদলেন এবং তাঁর সাথীরাও কাঁদলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি আমার মহান প্রভুর নিকট আমার মায়ের জন্য ক্ষমা প্রার্থনার অনুমতি চেয়েছি; কিন্তু আমাকে অনুমতি দেয়া হয়নি। অতঃপর ক্ববর যিয়ারতের অনুমতি চাইলে আমাকে তার অনুমতি দেয়া হয়। সুতরাং তোমরা ক্ববর যিয়ারত করো। কারণ তা মৃত্যুকে স্মরণ করিয়ে দেয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (976)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قري من أجل يزيد بن كيسان، فهو صدوق لا بأس به. وأخرجه ابن ماجه (١٥٦٩) و (١٥٧٢)، والنسائي (٢٠٣٤) من طريق محمد بن عُبيد الطنافسي، بهذا الإسناد. ولفظ ابن ماجه الأول مختصر بلفظ: "زوروا القبور، فإنها تذكركم الآخرة". وهو في "مسند أحمد" (٩٦٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (١٥٧٢).