সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِمَعْنَاهُ قَالَ " أَوْ يَقُولُ أَحَدُهُمَا لِصَاحِبِهِ اخْتَرْ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সুত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ অর্থের হাদীস বর্ণিত। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরো বলেনঃ অথবা উভয়ের একজন অন্যজনকে এরূপ বলা হয়ে, বিক্রয় কার্য চূড়ান্ত করূন।
সহীহ : এর পূর্বেরটি দেখূন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2109) صحیح مسلم (1531)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه. أيوب: هو ابن أبي تميمة السَّختِياني، وحماد: هو ابن سلمة. وأخرجه البخاري (٢١٠٩)، ومسلم (١٥٣١)، والنسائي (٤٤٦٩) و (٤٤٧٠) من طريق أيوب، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٤٨٤). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ ابْنِ عَجْلاَنَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " الْمُتَبَايِعَانِ بِالْخِيَارِ مَا لَمْ يَفْتَرِقَا إِلاَّ أَنْ تَكُونَ صَفْقَةَ خِيَارٍ وَلاَ يَحِلُّ لَهُ أَنْ يُفَارِقَ صَاحِبَهُ خَشْيَةَ أَنْ يَسْتَقِيلَهُ " .
আবদুল্লাহ ইবনু ‘আস ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ পরস্পর বিচ্ছিন্ন হওয়ার পুর্ব পর্যন্ত ক্রেতা-বিক্রেতা উভয়য়ের জন্য (ক্রয়-বিক্রয় প্রত্যাখ্যানের) অবকাশ থাকে, তবে পরবর্তীতেও এ অবকাশ বহাল রাখলে ভিন্ন কথা। আর ক্রেতা বা বিক্রেতার একজন অপরজন থেকে (বিক্রয় প্রত্যাখ্যান হওয়ার আশংকায়) দ্রুত পৃথক হওয়া উচিত নয়।
হাসান : তিরমিযী (১২৭০)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (2804) ، ابن عجلان تابعہ بکیر بن عبد اللہ الأشج عند الدارقطني (3/50) وذکر السماع المسلسل
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. ابن عجلان: هو محمد، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه الترمذي (١٢٩١)، والنسائي (٤٤٨٣) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد. قال الخطابي: هذا قد يحتج به من يرى أن التفرق إنما هو بالكلام، قال: وذلك أنه لو كان له الخيار في فسخ البيع لما احتاج إلى أن يستقيله. قال الشيخ [أي الخطابي]: هذا الكلام وإن خرج بلفظ الاستقالة فمعناه الفسخ، وذلك أنه قد علقه بمفارقته، والاستقالةُ قبل المفارقة وبعدها سواء، لا تأثير لعدم التفرق بالأبدان فيها، والمعنى أنه لا يحل أن يفارقه خشية أن يختار فسخ البيع فيكون ذلك بمنزلة الاستقالة، والدليلُ على ذلك ما تقدم من الأخبار.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ جَمِيلِ بْنِ مُرَّةَ، عَنْ أَبِي الْوَضِيءِ، قَالَ غَزَوْنَا غَزْوَةً لَنَا فَنَزَلْنَا مَنْزِلاً فَبَاعَ صَاحِبٌ لَنَا فَرَسًا بِغُلاَمٍ ثُمَّ أَقَامَا بَقِيَّةَ يَوْمِهِمَا وَلَيْلَتِهِمَا فَلَمَّا أَصْبَحَا مِنَ الْغَدِ حَضَرَ الرَّحِيلُ فَقَامَ إِلَى فَرَسِهِ يُسْرِجُهُ فَنَدِمَ فَأَتَى الرَّجُلَ وَأَخَذَهُ بِالْبَيْعِ فَأَبَى الرَّجُلُ أَنْ يَدْفَعَهُ إِلَيْهِ فَقَالَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ أَبُو بَرْزَةَ صَاحِبُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَأَتَيَا أَبَا بَرْزَةَ فِي نَاحِيَةِ الْعَسْكَرِ فَقَالاَ لَهُ هَذِهِ الْقِصَّةَ . فَقَالَ أَتَرْضَيَانِ أَنْ أَقْضِيَ بَيْنَكُمَا بِقَضَاءِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " الْبَيِّعَانِ بِالْخِيَارِ مَا لَمْ يَتَفَرَّقَا " . قَالَ هِشَامُ بْنُ حَسَّانَ حَدَّثَ جَمِيلٌ أَنَّهُ قَالَ مَا أُرَاكُمَا افْتَرَقْتُمَا .
আবুল ওয়াদী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আমাদের কোন একটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। আমরা এক জায়গায় যাত্রাবিরতি করি। তখন আমাদের একজন একটি গোলামের বিনিময়ে একটি ঘোড়া বিক্রি করে। অতঃপর তারা (ক্রেতা-বিক্রেতা) উভয়ে অবশিষ্ট দিন ও রাত একত্রে অবস্থান করে। অতঃপর পরদিন সকালে বিদায়ের পালা আসলে ক্রেতা তার ঘোড়ার পিঠে জিন বাঁধতে শুরু করলো। এমন সময় বিক্রেতা লজ্জিত অবস্থায় ক্রেতার নিকট এসে চুক্তি বাতিল করে ঘোড়া ফেরত দেওয়ার জন্য অনুরোধ করলো। কিন্তু ক্রেতা তাকে ঘোড়া ফেরত দিতে অস্বীকার করায় বিক্রেতা বললো, তোমার ও আমার মধ্যকার বিবাদ নিষ্পত্তি করে দিবেন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবী আবূ বারযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তারা উভয়ে তাকে ঘটনাটি জানালে তিনি তাদেরকে বললেন, আমি তোমাদেরকে এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ফায়সালার অনুরূপ সিদ্ধান্ত দিবো, তোমরা কি এতে রাজি আছো? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ পরস্পর বিচ্ছিন্ন হওয়ার পূর্ব পর্যন্ত ক্রেতা-বিক্রেতা উভয়ের জন্য অবকাশ থাকে। হিশাম ইবনু হাস্সান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, জামীল (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন, আবূ বারযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি দেখছি তোমরা এখনো বিচ্ছিন্ন হওনি।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ(২১৮২)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ ابن ماجہ (2182 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الوضيء: هو عبّاد بن نُسيَب، وحماد: هو ابن زيد، ومسدَّد: هو ابن مُسَرْهَدٍ. وأخرجه ابن ماجه (٢١٨٢) من طريق حماد بن زيد، بهذا الإسناد. واقتصر على المرفوع من الحديث. وهو في "مسند أحمد" (١٩٨١٣).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حَاتِمٍ الْجَرْجَرَائِيُّ، قَالَ مَرْوَانُ الْفَزَارِيُّ أَخْبَرَنَا عَنْ يَحْيَى بْنِ أَيُّوبَ، قَالَ كَانَ أَبُو زُرْعَةَ إِذَا بَايَعَ رَجُلاً خَيَّرَهُ قَالَ ثُمَّ يَقُولُ خَيِّرْنِي وَيَقُولُ سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ يَفْتَرِقَنَّ اثْنَانِ إِلاَّ عَنْ تَرَاضٍ " .
ইয়াহইয়া ইবনু আইয়ূব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ যুর‘আহ (রাহিমাহুল্লাহ) কারো নিকট কিছু বিক্রি করলে তাকে অবকাশ দিতেন। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনিও বলতেন, আমাকেও অবকাশ দিবে। তিনি বলতেন, আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বলতে শুনেছি , রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ক্রেতা-বিক্রেতা উভয়ে যেন পরস্পরের সম্মতি ছাড়া একে অপরের কাছ থেকে বিচ্ছিন্ন না হয়।
হাসান সহীহঃ তিরমিযী(১২৭১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2805) ، أخرجہ الترمذي (1248 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أيوب -وهو حفيد أبي زرعة بن عمرو بن جرير- فهو صدوق لا بأس به. وأخرجه الترمذي (١٢٩٢) من طريق يحيى بن أيوب، به. وأخرجه بنحوه موقوفاً عبد الرزاق (١٤٢٦٧)، وابن أبي شيبة ٧/ ٨٣ من طريق سفيان الثوري، عن أبي غياث -وهو طلْق بن معاوية-[وتحرف في المطبوع من الكتابين إلى: أبي عتّاب] لم عن أبي زرعة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٠٩٢٢). وفي الباب عن أبي سعيد الخدري عند ابن ماجه (٢١٨٥). وإسناده حسن. وعن سمرة بن جندب عند أحمد (٢٠٢٥٢). وعن أنس بن مالك عند البيهقي ٥/ ٢٧١ وإسناده ضعيف. ويشهد له قوله تعالى: ﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ﴾ [النساء:٢٩] قال القاري: والمراد بالحديث -والله أعلم- أنهما لا يتفارقان إلا عن تراض بينهما فيما يتعلق بعطاء الثمن وقبض المبيع، وإلا فقد يحصل الضرر والضرار وهو منهي في الشرع، أو المراد منه أن يشاور مريد الفراق صاحبه: ألك رغبة في المبيع فإن أراد الإقالة أقاله، وهذا نهي تنزيه للأجماع على حل المفارقة من غير إذن الآخر ولا علمه.
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي الْخَلِيلِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ حَكِيمِ بْنِ حِزَامٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " الْبَيِّعَانِ بِالْخِيَارِ مَا لَمْ يَفْتَرِقَا فَإِنْ صَدَقَا وَبَيَّنَا بُورِكَ لَهُمَا فِي بَيْعِهِمَا وَإِنْ كَتَمَا وَكَذَبَا مُحِقَتِ الْبَرَكَةُ مِنْ بَيْعِهِمَا " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رَوَاهُ سَعِيدُ بْنُ أَبِي عَرُوبَةَ وَحَمَّادٌ وَأَمَّا هَمَّامٌ فَقَالَ " حَتَّى يَتَفَرَّقَا أَوْ يَخْتَارَ " . ثَلاَثَ مِرَارٍ .
হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ পরস্পর পৃথক হওয়ার পূর্ব পর্যন্ত ক্রেতা-বিক্রেতা উভয়ের জন্য (ক্রয়-বিক্রয় প্রত্যাখ্যানের) অবকাশ থাকে। তারা সততার সাথে ক্রয়-বিক্রয় করলে এবং বিক্রিত মালের দোষ-ত্রুটির প্রকাশ করলে তাদের ক্রয়-বিক্রয়ের বরকত হবে। আর যদি তারা মিথ্যার আশ্রয় নেয় এবং বিক্রিত বস্তুর দোষ গোপন করে তাহলে তাদের ক্রয়-বিক্রয়ের বরকত দূর হয়ে যাবে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সাঈদ ইবনু আবূ ‘আরূবাহ ও হাম্মাদ এ হাদীসটি এভাবে বর্ণনা করেছেন। তবে হাম্মামের বর্ণনায় রয়েছেঃ পরস্পর পৃথক না হওয়া পর্যন্ত ক্রেতা-বিক্রেতা উভয়ের জন্য অবকাশ থাকে। তিনি কথাটি তিনবার বলেন।
সহীহঃ তিরমিযী(১২৬৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2079) صحیح مسلم (1532)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الخليل: هو صالح بن أبي مريم، وقتادة: هو ابن دعامة السدوسي، وشعبة: هو ابن الحجاج، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه البخاري (٢٠٧٩)، ومسلم (١٥٣٢)، والترمذي (١٢٩٠)، والنسائي (٤٤٥٧) و (٤٤٦٤) من طريق قتادة بن دعامة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٥٣٢) من طريق أبي التياح يزيد بن حميد، عن عبد الله بن الحارث، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٣١٤)، و"صحيح ابن حبان"، (٤٩٠٤).
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا حَفْصٌ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ أَقَالَ مُسْلِمًا أَقَالَهُ اللَّهُ عَثْرَتَهُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি কোন মুসলিমের (অনুরোধে তার) সাথে সম্পাদিত ক্রয়-বিক্রয়ের চুক্তি বাতিল করবে আল্লাহ তার গুনাহ ক্ষমা করে দিবেন।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ(২১৯৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2199) ، الأعمش عنعن ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 123)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو صالح: هو ذكوان السمان، والأعمش: هو سُليمان بن مهران، وحفص: هو ابن غياث. وأخرجه ابن ماجه (٢١٩٩) من طريق الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٤٣١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٢٩) و (٥٠٣٠). قال ابن الأثير في "النهاية": "أقال نادماً" أي: وافقه على نقض البيع وأجابه إليه، يقال: أقاله يُقيله إقالة، وتقايلا، إذا فسخا البيع وعاد المبيع إلى مالكه، والثمن إلى المشتري إذا كان قد ندم أحدهما أو كلاهما، وتكون الإقالة في البيعة والعهد. وقال العز بن عبد السلام في "الشجرة": إقالة النادم من الإحسان المأمور به في القرآن، لما له من الغرض فيما ندم عليه سيما في بيع العقار وتمليك الجوار.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ زَكَرِيَّا، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " مَنْ بَاعَ بَيْعَتَيْنِ فِي بَيْعَةٍ فَلَهُ أَوْكَسُهُمَا أَوِ الرِّبَا " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি একই দ্রব্য বিক্রয়ে দুই রকম নিয়ম রাখে তাকে দুই মূল্যের মধ্যে অপেক্ষাকৃত কম মূল্যই গ্রহন করতে হবে, নতুবা তা হবে সুদ।
হাসানঃ ইরওয়া (৫/১৪৯-১৫০)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2868) ، رواہ الترمذي (1231 وسندہ حسن) والنسائي (4636 وسندہ حسن) بلفظ ’’نھي عن بیعتین في بیعۃ‘‘
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث ضعيف شاذ بهذا اللفظ، والمحفوظ عنه ﷺ أنه نهى عن بيعتين في بيعة. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة، ٦/ ١٢٠، ومن طريقه أخرجه ابن حبان (٤٩٧٤)، والحاكم ٢/ ٤٥، والبيهقي ٣/ ٣٤٣. ويحيى بن زكريا -وهو ابن أبي زائدة- وإن كان ثقة - قد خالفه جمع من الحفاظ الأثبات، وهم عبدة بن سليمان عند الترمذي (١٢٧٥)، وابن حبان (٤٩٧٣)، ويحيى ابن سعيد القطان عند أحمد (٩٥٨٤)، والنسائي (٤٦٣٢)، وابن الجارود (٦٠٠)، والبيهقي ٥/ ٣٤٣، ويزيد بن هارون عند أحمد (١٠٥٣٥)، والبغوي (٢١١١)، وعبد الوهاب بن عطاء عند أبي يعلى (٦١٢٤)، والبيهقي ٥/ ٣٤٣، رووه عن محمد ابن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة مرفوعاً، بلفظ. نهى عن بيعتين في بيعة. قال البيهقي: وكذلك رواه إسماعيل بن جعفر وعبد العزيز بن محمد الدراوردي ومعاذ ابن معاذ، عن محمد بن عمرو. قلنا: وكذلك رواه من الصحابة عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد (٦٦٢٨)، والبيهقي ٥/ ٣٤٣ و ٣٤٨، بلفظ: نهى عن بيعتين في بيعة، وإسناده حسن. وكذا رواه عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه موقوفاً عليه عند أحمد (٣٧٢٥)، وعبد الرزاق (١٤٦٣٦)، والبزار في مسنده، (٢٠١٦)، وابن خزيمة (١٧٦)، وابن حبان (١٠٥٣)، والطبراني في "الكبير" (٩٦٠٩) وإسناده حسن، وهو وإن كان موقوفاً له حكم الرفع، لأن مثله لا يقال بالرأي. ورواه كذلك يونس بن عبيد، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعاً عند أحمد (٥٣٩٥)، والبزار (١٢٧ - كشف الأستار)، وابن الجارود (٥٩٩)، والبيهقي ٦/ ٧٠، والخطيب البغدادي ١٢/ ٤٨ ورجاله ثقات، لكن أعله بعض أهل العلم بالانقطاع بين يونس بن عبيد وبين نافع! مع أن يونس قد عاصر نافعا بل قاربه في الطبقة، ولا يُعرف بتدليس. فهؤلاء جميعاً رووه كرواية جماعة الحفاظ عن محمد بن عمرو بن سلمة، وليس في شيء من رواياتهم ذكر الأوكس من البيعتين أو الربا مرفوعاً، وإنما صحت بهذا اللفظ عن شُريح القاضي. فقد رواه عبد الرزاق (١٤٦٢٩) عن معمر والثوري، عن أيوب، عن ابن سيرين، عن شُريح قال: بن باع بيعتين في بيعة فله أوكسهما أو الربا. وقد قال الخطابي في "معالم السنن": لا أعلم أحداً من الفقهاء قال بظاهر هذا الحديث أو صحح البيع بأوكس الثمنين إلا شيء يُحكى عن الأوزاعي، وهو مذهب فاسد، وذلك لما تتضمنه هذا العقد من الغرر والجهالة، وإنما المشهور من طريق محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة أن النبي ﷺ نهى عن بيعتين في بيعة. وقال الحافظ المنذري في "مختصر السنن" ٥/ ٩٨: في إسناده محمد بن عمرو ابن علقمة، وقد تكلم فيه غير واحد، والمشهور عن محمد بن عمرو من رواية الدراوردي ومحمد بن عبد الله الأنصاري أنه ﷺ نهى عن بيعتين في بيعة. وقال صاحب "عون المعبود" تعليقاً على قول الحافظ المنذري: قلت: وكذا رواه إسماعيل بن جعفر ومعاذ بن معاذ وعبد الوهاب بن عطاء عن محمد بن عمرو المذكور، ذكره البيهقي في "السنن" وعبدة بن سليمان في الترمذي ويحيى بن سعيد في "المجتبى"، وبهذا يُعرف أن رواية يحيى بن زكريا فيها شذوذ كما لا يخفى. وقال المباركفوري بعدما ذكر هذه الرواية بهذا اللفظ: روي هذا الحديث عن عدة من الصحابة ﵃، ليس في واحد منها هذا اللفظ، فالظاهر أن هذه الرواية" بهذا اللفظ ليست صالحة للاحتجاج. تنبيه: وقد فاتنا أن ننبه إلى شذوذ هذه المتن في تعليقنا على "صحيح ابن حبان" (٤٩٧٤) فليستدرك من هنا. وقد حكى شيخ الإسلام ابن تيمية في "فتاواه" ٢٩/ ٤٩٩ - ٥٠٠ الإجماع على جواز بيع الاجل وهو التقسيط، فقد سئل عن رجل محتاج إلى تاجر عنده قماش، فقال: أعطنى هذه القطعة، فقال التاجر: مشتراها بثلاثين، وما أبيعها إلا بخمسين إلى أجل، فهل يجوز ذلك؟ أم لا؟ فأجاب: المشتري على ثلاثة أنواع: أحدها: أن يكون مقصوده السلعة ينتفع بها للأكل والشرب واللبس والركوب، وغير ذلك. والثاني: أن يكون مقصوده التجارة فيها، فهذان نوعان جائزان بالكتاب والسنة والإجماع، كما قال تعالى: ﴿وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ﴾ [البقرة:٢٧٥]، وقال تعالى: ﴿إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ﴾ [النساء:٢٩]، لكن لا بد من مراعاة الشروط الشرعية، فإذا كان المشتري مضطراً لم يجز أن يباع إلا بقيمة المثل، مثل أن يضطر الإنسان إلى مشترى طعام لا يجده إلا عند شخص، فعليه أن يبيعه إياه بالقيمة، قيمة المثل، وإن لم يبعه إلا بأكثر فللمشتري أن يأخذه بغير اختياره بقيمة المثل، وإذا أعطاه إياه لم يجب عليه إلا قيمة المثل، وإذا باعه إياه بالقيمة إلى ذلك الأجل، فإن الأجل يأخذ قسطاً من الثمن. النوع الثالث: أن يكون المشتري إنما يريد به دراهم مثلاً ليوفي به ديناً، واشترى بها شيئاً، فيتفقان على أن يعطيه مثلاً المئة بمئة وعشرين إلى أجل، فهذا كله منهي عنه. فإن اتفقا على أن يعيد السلعة إليه، فهو بيعتين في بيعة، وإن أدخلا ثالثاً يشتري منه السلعة، ثم تعاد إليه، فكذلك، وإن باعه وأقرضه فكذلك، وقد نهى عنه النبي ﷺ. وإن كان المشتري يأخذ السلعة فيبيعها في موضع آخر: يشتريها بمئة، ويبعها بسبعين لأجل الحاجة إلى دراهم، فهذه تسمى: "مسألة التورق" وفيها نزاع بين العلماء والأقوى أيضاً أنه منهي عنها، وأنها أصل الربا، كما قال ذلك عمر بن عبد العزيز وغيره، والله أعلم. وقال ابن عبد البر في "الاستذكار" ٢٠/ ١٧٨ (٢٩٧٠٩) ولا يجوز عند مالك والشافعي وأبي حنيفة إن افترقا على ذلك بالالتزام حتى يفترقا على وجه واحد. قال: وهو قول الثوري. قلنا: وهذا يعني أنهم أجازوا بيع الأجل أعني بيع التقسيط. قال الخطابي: وتفسير ما نهي عنه من بيعتين في بيعة على وجهين: إحداهما: أن يقول: بعتك هذا الثوب نقداً بعشرة ونسيئة بخمسة عشر، فهذا لا يجوز، لانه لا يُدري أيهما الثمن الذي يختاره منهُما، فيقع به العقد، وإذا جهل الثمن بطل البيع. والوجه الآخر: أن يقول: بعتك هذا العبد بعشرين ديناراً على أن تبيعني جاريتك بعشرة دنانير، فهذا أيضاً فاسد، لأنه جعل ثمن العبد عشرين ديناراً، وشرط عليه أن يبيعه جاريته بعشرة دنانير، وذلك لا يلزمه، وإذا لم يلزمه سقط بعض الثمن، وإذا سقط بعض الثمن صار الباقي مجهولاً. وهذه النقول المتضافرة تفيد مشروعية بيع الأجل أو التقسيط بالإجماع، ولا نعلم أحداً قال بتحريمه قبل الشيخ ناصر الدين الألباني في "صحيحته" (٢٣٢٦) وبعض من يقلده، وقد ردَّ عليه ردّاً مفصلاً محكماً الأستاذ الفاضل أبو الزبير دحان أبو سلمان في رسالة قيمة تنبئ عن رسوخ قدمه في الحديث والفقه زادت صفحاتها على المئة سماها: "الوهم والتخليط عند الشيخ الألباني في البيع بالتقسيط"، فانظرها لزاماً واقرأها بإمعان، فإنه سيتبين لك أن الشيخ ﵀ ينفرد في بعض فتاويه ويخرق بها إجماع العلماء، وهذا شأن من يتكلم في غير فنه.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي حَيْوَةُ بْنُ شُرَيْحٍ، ح وَحَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ التِّنِّيسِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يَحْيَى الْبُرُلُّسِيُّ، حَدَّثَنَا حَيْوَةُ بْنُ شُرَيْحٍ، عَنْ إِسْحَاقَ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ، - قَالَ سُلَيْمَانُ عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْخُرَاسَانِيِّ، - أَنَّ عَطَاءً الْخُرَاسَانِيَّ، حَدَّثَهُ أَنَّ نَافِعًا حَدَّثَهُ عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِذَا تَبَايَعْتُمْ بِالْعِينَةِ وَأَخَذْتُمْ أَذْنَابَ الْبَقَرِ وَرَضِيتُمْ بِالزَّرْعِ وَتَرَكْتُمُ الْجِهَادَ سَلَّطَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ ذُلاًّ لاَ يَنْزِعُهُ حَتَّى تَرْجِعُوا إِلَى دِينِكُمْ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ الإِخْبَارُ لِجَعْفَرٍ وَهَذَا لَفْظُهُ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ যখন তোমরা ঈনা পদ্ধতিতে ব্যবসা করবে, গরুর লেজ আঁকড়ে ধরবে, কৃষিকাজেই সন্তুষ্ট থাকবে এবং জিহাদ ছেড়ে দিবে তখন আল্লাহ তোমাদের উপর লাঞ্ছনা ও অপমান চাপিয়ে দিবেন। তোমরা তোমাদের দ্বীনে ফিরে না আসা পর্যন্ত আল্লাহ তোমাদেরকে এই অপমান থেকে মুক্তি দিবেন না।[২]
সহীহঃ সহীহাহ (১১)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، إسحاق بن أسید ضعیف علی الراجح وقال فی التقریب (342): ’’ فیہ ضعف ‘‘ ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ کلھا ، (انوار الصحیفہ ص 123، 124)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسحاق أبو عبد الرحمن -وهو إسحاق بن أَسيد الأنصاري- قال عنه الذهبي في "الميزان": جائز الحديث، وذكره ابن حبان في "الثقات" وقال: يخطئ، وقال أبو حاتم: شيخ ليس بالمشهور، لا يُشتغل به، وقال أبو أحمد الحاكم: مجهول. وقد روى من طريق آخر عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر كما سيأتي. وأخرجه الدولابي في "الكنى" ٢/ ٦٥، والطبراني في "مسند الشاميين" (٢٤١٧)، وابن عدي في "الكامل" ٥/ ١٩٩٨، وأبو نعيم في "الحلية"، ٥/ ٢٠٨ - ٢٠٩، والبيهقي ٥/ ٣١٦ من طريق حيوة بن شُريح، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٤٨٢٥)، وأبو أمية الطرسوسي في "مسند ابن عمر" (٢٢)، والطبراني في "الكبير" (١٣٥٨٣)، والبيهقي في "الشعب" (٤٢٢٤) من طريق أبي بكر بن عياش، عن الأعمش، وأبو يعلى (٥٦٥٩)، والطبراني (١٣٥٨٥)، والبيهقي في الشعب" (١٠٨٧١)، وأبو نعيم في "الحلية"، ١/ ٣١٣ - ٣١٤ و ٣/ ٣١٨ - ٣١٩ من طريق ليث بن أبي سُليم، عن عبد الملك بن أبي سليمان، كلاهما (الأعمش وعبد الملك) عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر. ولم يذكر أبو نعيم في روايته عبد الملك بن أبي سليمان. وقال بإثر الحديث: هذا حديث غريب من حديث عطاء، عن ابن عمر. قلنا: أبو بكر بن عياش كبر فساء حفظه، وإنما انتقى البخاري من حديثه، وقد ضعفه محمد بن عبد الله بن نمير في الأعمش وغيره وضعفه عثمان بن سعيد الدارمي مطلقاً، ولم يخرج له البخاري من روايته عن الأعمش شيئاً. وليث بن أبي سليم سيئ الحفظ، ثم إن علي ابن المديني قال عن عطاء بن أبي رباح: رأى عبد الله بن عمر، ولم يسمع منه. ولهذا قال ابن القيم في تهذيب السنن،: إنما يُخاف أن لا يكون الأعمش سمعه من عطاء، أو أن عطاء لم يسمعه من ابن عمر. قلنا: وعلى أي حال فطريق عطاء هذه تصلح للاعتبار، فيكون الحديث حسناً إن شاء الله. وأخرجه أحمد (٥٠٠٧) من طريق أبي جناب الكلبي، عن شهر بن حوشب، عن ابن عمر. وأبو جناب الكلبي وشهر ضعيفان. قال ابن الأثير: العينة: هو أن يبيع من رجل سلعة بثمن معلوم إلى أجل مسمى، ثم يشتريها منه بأقل من الثمن الذي باعها به، فإن اشترى بحضرة طالب العينة سلعة من آخر بثمن معلوم وقبضها ثم باعها من طالب العينة بثمن أكثر مما اشتراها إلى أجل مسبى ثم باعها المشتري من البائع الأول بالنقد بأقل من الثمن فهذه أيضاً عينة، وهي أهون من الأولى. قال: وسميت عينةً لحصول النقد لصاحب العينة، لأن العين هو المال الحاضر من النقد، والمشتري إنما يشتريها ليبيعها بعين حاضرة تصل إليه معجلة. وقال المناوي في "فيض القدير" ١/ ٣١٣: هذا دليل قوي لمن حرَّم العينة، ولذلك اختاره بعض الشافعية، وقال: أوصانا الشافعي باتباع الحديث إذا صح بخلاف مذهبه. وانظر كلام ابن قيم الجوزية في "تهذيب السنن" ٥/ ١٠٠ - ١٠٩ فإنه شافٍ وافٍ. وقوله: وأخذتم أذناب البقر ورضيتم بالزرع. قال صاحب "عون المعبود": حمل هذا على الاشتغال بالزرع في زمن يتعين فيه الجهاد.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ ابْنِ أَبِي نَجِيحٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ كَثِيرٍ، عَنْ أَبِي الْمِنْهَالِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَدِمَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهُمْ يُسْلِفُونَ فِي التَّمْرِ السَّنَةَ وَالسَّنَتَيْنِ وَالثَّلاَثَةَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ أَسْلَفَ فِي تَمْرٍ فَلْيُسْلِفْ فِي كَيْلٍ مَعْلُومٍ وَوَزْنٍ مَعْلُومٍ إِلَى أَجَلٍ مَعْلُومٍ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মদীনাহ্য় আসলেন তখন সেখানকার লোকেরা এক, দুই অথবা তিন বছরের মেয়াদে খেজুর অগ্রিম ক্রয়-বিক্রয় করতো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃকেউ খেজুর অগ্রিম ক্রয়-বিক্রয় করলে তাকে তা নির্দিষ্ট পরিমাপে, নির্দিষ্ট ওজনে এবং নির্দিষ্ট মেয়াদে করতে হবে।
সহীহঃ সহীহাহ (১১)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2240) صحیح مسلم (1604)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو المنهال: هو عبد الرحمن بن مطعم البُناني المكي، وابن أبي نجيح: هو عبد الله بن أبي نجيح، وسفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه البخاري (٢٢٣٩) و (٢٢٤٠)، ومسلم (١٦٠٤)، وابن ماجه (٢٢٨٠)، والترمذي (١٣٥٨)، والنسائي (٤٦١٦) من طريق عبد الله بن أبي نجيح، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٢٥). والسلف: هو عقد على موصوف في الذمة مؤجل بثمن مقبوض في مجلس العقد. والسلف لغة أهل العراق، والسلم لغة أهل الحجاز.
حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، ح وَحَدَّثَنَا ابْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا شُعْبَةُ، أَخْبَرَنِي مُحَمَّدٌ، أَوْ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُجَالِدٍ قَالَ اخْتَلَفَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ شَدَّادٍ وَأَبُو بُرْدَةَ فِي السَّلَفِ فَبَعَثُونِي إِلَى ابْنِ أَبِي أَوْفَى فَسَأَلْتُهُ فَقَالَ إِنْ كُنَّا نُسْلِفُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَبِي بَكْرٍ وَعُمَرَ فِي الْحِنْطَةِ وَالشَّعِيرِ وَالتَّمْرِ وَالزَّبِيبِ - زَادَ ابْنُ كَثِيرٍ - إِلَى قَوْمٍ مَا هُوَ عِنْدَهُمْ . ثُمَّ اتَّفَقَا وَسَأَلْتُ ابْنَ أَبْزَى فَقَالَ مِثْلَ ذَلِكَ .
মুহাম্মাদ অথবা ‘আব্দুল্লাহ ইবনু মুজালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, অগ্রিম ক্রয়-বিক্রয়ের সম্পর্কে ‘আব্দুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ ও আবূ বুরদার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মতভেদ করেন। তারা আমাকে ইবনু আবূ ‘আওফার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট পাঠালেন। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর যুগে গম, বার্লি, খেজুর এবং কিসমিস অগ্রিম ক্রয়-বিক্রয় করতাম। ইবনু কাসীরের বর্ণনায় রয়েছেঃ এমন লোকদের নিকট থেকে অগ্রিম ক্রয় করা হতো যাদের কাছে এগুলো বর্তমান থাকতো না। এরপর তারা (হাফ্স ইবনু ‘উমার ও ইবনু কাসীর) একইরূপ বর্ণনা করেন। অতঃপর আমি ইবনু আবযাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনিও একই কথা বললেন।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ(২২৮২)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح خ بلفظ ما كنا نسألهم مكان ما هو عندهم
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2243)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد اختلف فيه قولُ شعبة في تسمية ابن أبي مجالد كما يظهر في هذا الطريق والطريقين التاليين، والصحيح في اسمه محمد، كما نصَّ عليه البخاري في "تاريخه الكبير" ١/ ٢٣١ حيث نقل المُعلِّمي في تحقيقه عن نسخة القسطنطينية أن البخاري قال فيه بعد أن ذكر الخلاف في اسمه: والصحيح محمد، وهي الرواية التي اعتمدها الحافظ مغلطاي في "كمال تهذيب الكمال" ٨/ ١٦٤ حيث نقل نص البخاري هذا، ونقل عن مسلم بن الحجاج قوله في "الطبقات": محمد بن أبي المجالد، وقال شعبة: عبد الله بن أبي المجالد، أخطأ فيه. قلنا: وقال يحيى بن معين في رواية الدوري (٤٠٢٣): شعبة يقول: عبد الله بن أبي المجالد، وغير شعبة، هشيم يقول عن أشعث والشيباني: عن محمد بن أبي المجالد. ففي قول ابن معين هذا إشارة إلى ترجيح محمد بن أبي المجالد، والله أعلم. وذكر مُغلْطاي أيضاً وتبعَه الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" ٢/ ٤١٨ بأن أبا إسحاق الشيباني سليمان بن أبي سليمان قد روى هذا الحديث عن ابن أبي مجالد أيضاً وسماه محمداً دون اختلاف عنه في تسميته. قلنا: روايته في "صحيح البخاري" بالأرقام (٢٢٤٤) و (٢٢٥٤، ٢٢٥٥). وكذلك سماه إسماعيل بن عبد الرحمن السُّدِّي عند الطبري في "تفسيره " ٢/ ١٤٦ وابن أبي حاتم في "تفسيره" عند تفسير قوله تعالى: ﴿الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ﴾ [البقرة: ١٨٥]، وكذلك الجرّاح بن مَليح الرؤاسي عند الطبراني في "الكبير" (١٣٤٧٨)، وفي "الأوسط" (٤٢٩٧)، وأبي نعيم في "الحلية" ٩/ ٢٢٣ - ٢٢٤. ولهذا اقتصر عليه أبو نصر الكلاباذي في "رجال صحيح البخاري" (١١٢٤)، وكذا أبو الوليد الباجي في "التعديل والتجريح لمن خرج عنه البخاري في الجامع الصحيح" (١٤١)، وكذلك ابن الأثير الجزري في "جامع الأصول" في قسم التراجم ٢/ ٨٩٠. وقد فرق ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" بين محمد بن أبي المجالد وعبد الله بن أبي المجالد، وأن الذي روى عنه شعبة والشَّيباني، وروى عنه ابن أبي أوفى وابن أبزى وعبد الله بن شداد إنما هو محمد بن أبي المجالد، وأنه هو الذي سُمِّي ليحيى بن معين وأبي زرعة فوثّقاه. قلنا: وهو الذي سُمِّي للدارقطني فوثقه كذلك. لكن تفريق ابن أبي حانم غير صحيح لأنهما واحدٌ كما بيّنه الخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" ٢/ ٢٠٠ - ٢٠٣، وإنما من سماه عبد الله فقد أخطأ، والله تعالى أعلم. وفي هذا كله ردٌّ على ما قاله أبو داود فيما نقله عنه الآجري في "سؤالاته" (٣٦٩): شعبة يحدِّث عن محمد بن أبي المجالد، والصواب عبد الله بن أبي المجالد، شعبة يخطئ فيه. وأخرجه البخاري (٢٢٤٣) عن حفص بن عمر الحوضي، بهذا الإسناد. على الشك في اسم ابن أبي المجالد. وأخرجه أيضاً (٢٢٤٢) من طريق وكيع بن الجراح، عن شعبة، عن محمد بن أبي المجالد، به فسماه محمداً دون شك. وأخرجه كذلك (٢٢٤٢) عن أبي الوليد -وهو الطيالسي-، عن شعبة، عن ابن أبي المجالد، به فلم يعينه، وهذا لا يعارض رواية من سماه محمداً. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٦١٥) من طريق أبي داود الطيالسي، عن شعبة، عن ابن أبي المجالد، وقال مرة: عبد الله، وقال مرة: محمد. كذا جاء عند النسائي، مع أن الذي في "مسند الطيالسي" (٨١٥) عن شعبة، عن محمد بن أبي المجالد. دون شك، ومن طريق الطيالسي أخرجه أبو نعيم في "الحلية" ٧/ ١٦٢ والبيهقي في السنن الصغير" (٢٠٠٢) فقالا: محمد بن أبي المجالد أيضاً. وممن رواه عن شعبة أيضاً فسماه محمداً: عبد الرحمن بن مهدي عند أبي نعيم في "الحلية" ٧/ ١٦٣. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، وَابْنُ، مَهْدِيٍّ قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي الْمُجَالِدِ، وَقَالَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ، عَنِ ابْنِ أَبِي الْمُجَالِدِ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ عِنْدَ قَوْمٍ مَا هُوَ عِنْدَهُمْ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ الصَّوَابُ ابْنُ أَبِي الْمُجَالِدِ وَشُعْبَةُ أَخْطَأَ فِيهِ .
আব্দুল্লাহ ইবনু মুজালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) অথবা ইবনু আবুল মুজালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি (ইবনু আবূ ‘আওফা) বলেন, এমন লোকদের কাছ থেকে অগ্রিম ক্রয় করতাম যাদের কাছে এগুলো বর্তমান থাকতো না। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সঠিক হল ইবনু আবুল মুজালিদ নামটি। শু‘বাহ তার বর্ণনায় ভুল করেছেন।
সহীহঃ এর পূর্বেরটি দেখুন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3464)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه. يحيى: هو ابن سعيد القطان، وابن مَهدي: هو عبد الرحمن وأخرجه ابن ماجه (٢٢٨٢) عن محمد بن بشار، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٤٦١٤) عن عبيد الله بن سعيد، عن يحيى القطان وحده، به. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُصَفَّى، حَدَّثَنَا أَبُو الْمُغِيرَةِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ أَبِي غَنِيَّةَ، حَدَّثَنِي أَبُو إِسْحَاقَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي أَوْفَى الأَسْلَمِيِّ، قَالَ غَزَوْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الشَّامَ فَكَانَ يَأْتِينَا أَنْبَاطٌ مِنْ أَنْبَاطِ الشَّامِ فَنُسْلِفُهُمْ فِي الْبُرِّ وَالزَّيْتِ سِعْرًا مَعْلُومًا وَأَجَلاً مَعْلُومًا فَقِيلَ لَهُ مِمَّنْ لَهُ ذَلِكَ قَالَ مَا كُنَّا نَسْأَلُهُمْ .
আব্দুল্লাহ ইবনু ‘আওফা আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে সিরিয়ার যুদ্ধে গিয়েছিলাম। তখন সেখানকার কৃষকরা আমাদের কাছে আসলো। আমরা তাদের থেকে গম এবং যাইতূন নির্ধারিত দামে ও নির্দিষ্ট মেয়াদে অগ্রিম কিনতাম। তাকে বলা হলো, আপনারা কি এমন লোকের কাছ থেকে অগ্রিম কিনতেন যার কাছে তা বর্তমান থাকতো? তিনি বলেন, তাদের নিকট ঐ বস্তু আছে কিনা তা আমরা জিজ্ঞেস করতাম না।
সহীহঃ এর পূর্বেরটির দ্বারা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أبو إسحاق ھو سلیمان بن أبي سلیمان الشیباني
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل محمد بن المصفّى. أبو إسحاق: هو سُليمان بن أبي سليمان الشيباني، وأبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجاج الخَولاني. وأخرجه البخاري (٢٢٥٤) و (٢٢٥٥) من طريق عبد الله بن المبارك، عن سفيان الثوري، عن أبي إسحاق سليمان الشيباني، عن محمد بن أبي مجالد، قال: أرسلني أبو بردة وعبد الله بن شداد إلى عبد الرحمن بن أبزى وعبد الله بن أبي أوفى فسألتهما عن السلف، فقالا: كنا نصيب المغانم مع رسول الله ﷺ، فكان يأتينا أنباط من أنباط الشام، فنسلفهم في الحنطة والشعير والزبيب إلى أجل مسمى، قال: قلت: أكان لهم زرع، أو لم يكن لهم زرع؟ قالا: ما كنا نسألهم عن ذلك؟ وانظر ما قبله. الأنباط: جمع نبيط، وهم قوم معروفون كانوا ينزلون بالبطائح من العراقين قاله الجوهري. وأصلهم قوم من العرب دخلوا في العجم، واختلطت أنسابهم، وفسدت ألسنتهم، ويقال لهم: النبي ﷺ، سموا بذلك لمعرفتهم بإنباط الماء، أي: استخراجه لكثرة معالجتهم الفلاحة.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ رَجُلٍ، نَجْرَانِيٍّ عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَجُلاً، أَسْلَفَ رَجُلاً فِي نَخْلٍ فَلَمْ تُخْرِجْ تِلْكَ السَّنَةَ شَيْئًا فَاخْتَصَمَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " بِمَ تَسْتَحِلُّ مَالَهُ ارْدُدْ عَلَيْهِ مَالَهُ " . ثُمَّ قَالَ " لاَ تُسْلِفُوا فِي النَّخْلِ حَتَّى يَبْدُوَ صَلاَحُهُ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আরেক ব্যক্তির একটি গাছের খেজুর অগ্রিম কিনলো। কিন্তু ঐ বছর কোন ফল ধরলো না। তারা উভয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে বিষয়টি উপস্থাপন করলে তিনি বললেনঃ তুমি কিসের বিনিময়ে তার মাল (নিজের জন্য) বৈধ মনে করলে? তার মাল তাকে ফেরত দাও। অতপরঃ তিনি বললেনঃ গাছের খেজুর পরিপক্ক না হওয়া পর্যন্ত তোমরা তার ক্রয়-বিক্রয় করবে না।
দুর্বলঃ ইবনু মাজাহ (২২৮৪), যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (৬২২৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2284) ، رجل نجراني: مجہول (عون المعبود 293/3) ، وأبو إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 124)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لإبهام الرجل النجراني. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وسفيان: هو الثوري، ومحمد بن كثير: هو العبْدي. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٨٤) من طريق أبي الأحوص، عن أبي إسحاق، به. وقد صح عن ابن عمر النهي عن بيع الثمار قبل بدوِّ صلاحها فيما سلف عند المصنف برقم (٣٣٦٧) و (٣٣٦٨).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، حَدَّثَنَا أَبُو بَدْرٍ، عَنْ زِيَادِ بْنِ خَيْثَمَةَ، عَنْ سَعْدٍ، - يَعْنِي الطَّائِيَّ - عَنْ عَطِيَّةَ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ أَسْلَفَ فِي شَىْءٍ فَلاَ يَصْرِفْهُ إِلَى غَيْرِهِ " .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি কোন বস্তু অগ্রিম কিনেছে, সে যেন ঐ বস্তুকে (হস্তগত করার পূর্বে) অন্যের নিকট হস্তান্তর না করে।
দুর্বলঃ ইবনু মাজাহ (২২৮৩), ইরওয়া (১৩৭৫), যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (৫৪১৪), মিশকাত (২৮৯১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2283) ، عطیۃ العوفي ضعیف مدلس ، (انوار الصحیفہ ص 124)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف عطية بن سعْد -وهو العوفي- وقد ضعف هذا الحديث أبو حاتم والبيهقي وعبد الحق الإشبيلي وابن القطان كلما بينه ابنُ الملقن في "البدر المنير" ٦/ ٥٦٣ - ٥٦٤. أبو بدر: هو شجاع بن الوليد. وأخرجه ابنُ ماجه (٢٢٨٣)، والترمذي في "العلل الكبير" ١/ ٥٢٤، والدارقطني (٢٩٧٧)، والبيهقي ٦/ ٣٠ من طريق أبي بدر شجاع بن الوليد، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: لا أعرف هذا الحديث مرفوعاً إلا من هذا الوجه، وهو حديث حسن. وحسنه كذلك السيوطي في "الجامع الصغير"، وقال البيهقي: الاعتماد على حديث النهي عن بيع الطعام قبل أن يُستوفَى، فإن عطية العوفي لا يحتج به. وفي الباب عن عبد الله بن عمر من قوله وفتواه عند ابن أبي شيبة ٦/ ١٥، والبيهقي ٦/ ٣٠ - ٣١. قال الحافظ في "الدراية" ٢/ ١٦٠ عن إسناد ابن أبي شيبة: جيد. وقوله: فلا يصرفه، أي: بالبيع والهبة قبل أن يقبضه.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ بُكَيْرٍ، عَنْ عِيَاضِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، أَنَّهُ قَالَ أُصِيبَ رَجُلٌ فِي عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي ثِمَارٍ ابْتَاعَهَا فَكَثُرَ دَيْنُهُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " تَصَدَّقُوا عَلَيْهِ " . فَتَصَدَّقَ النَّاسُ عَلَيْهِ فَلَمْ يَبْلُغْ ذَلِكَ وَفَاءَ دَيْنِهِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " خُذُوا مَا وَجَدْتُمْ وَلَيْسَ لَكُمْ إِلاَّ ذَلِكَ " .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুগে এক ব্যক্তি (বাগানের) ফল কিনে লোকসানে পড়ে খুব ঋণগ্রস্ত হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা তাকে সদাক্বাহ প্রদান করো। লোকেরা সদাক্বাহ দিলো কিন্তু তা তার ঋণ পরিশোধের সমপরিমাণ হলো না। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ ( হে পাওনাদার) যা পেয়েছো তা নিয়ে নাও, এর অতিরিক্ত আর পাবে না।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২৩৫৬)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1556)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عياض بن عبد الله: هو ابن سعْد بن أبي سّرْح، وبكير: هو ابن عبد الله بن الأشج، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه مسلم (١٥٥٦)، وابن ماجه (٢٣٥٦)، والترمذي (٦٦١)، والنسائي (٤٥٣٠) و (٤٦٧٨) من طريق بكير بن عبد الله بن الأشج، به. وهو في "مسند أحمد" (١١٣١٧)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٣٣). ولفقه الحديث انظر ما سلف برقم (٣٣٧٤).
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، وَأَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ الْهَمْدَانِيُّ، قَالاَ أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي ابْنُ جُرَيْجٍ، ح وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مَعْمَرٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، - الْمَعْنَى - أَنَّ أَبَا الزُّبَيْرِ الْمَكِّيَّ، أَخْبَرَهُ عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِنْ بِعْتَ مِنْ أَخِيكَ تَمْرًا فَأَصَابَتْهَا جَائِحَةٌ فَلاَ يَحِلُّ لَكَ أَنْ تَأْخُذَ مِنْهُ شَيْئًا بِمَ تَأْخُذُ مَالَ أَخِيكَ بِغَيْرِ حَقٍّ " .
জাবির ইবনু ‘আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তুমি যদি তোমার কোন ভাইয়ের কাছে বাগানের খেজুর বিক্রি করো এবং তা প্রাকৃতিক দুর্যোগে বিনষ্ট হয়ে যায়, তাহলে তার কাছ থেকে কোন মূল্য গ্রহণ তোমার জন্য বৈধ নয়। তুমি কিসের বিনিময়ে তোমার ভাইয়ের কাছ থেকে অন্যায়ভাবে মূল্য গ্রহণ করবে?
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২১৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1554)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد صرح بالسماع كلٌّ من ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- وأبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- عند مسلم وغيره. وأخرجه مسلم (١٥٥٤)، وابن ماجه (٢٢١٩)، والنسائي (٤٥٢٧) و (٤٥٢٨) من طريق ابن جريج، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٥٠٣٤) و (٥٠٣٥). وقد سلف ذكر وضع الجوائح عند المصنف برقم (٣٣٧٤) بلفظ: إن النبي ﷺ أمر بوضع الجوائح.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عُثْمَانُ بْنُ الْحَكَمِ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ عَطَاءٍ، قَالَ الْجَوَائِحُ كُلُّ ظَاهِرٍ مُفْسِدٍ مِنْ مَطَرٍ أَوْ بَرْدٍ أَوْ جَرَادٍ أَوْ رِيحٍ أَوْ حَرِيقٍ .
আত্বা (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘জায়িহাহ’ বলা হয় এমন প্রাকৃতিক দুর্যোগকে যাতে প্রকাশ্য ক্ষতিসাধন হয়ে থাকে। যেমন অতিবৃষ্টি, তুষারপাত, পঙ্গপালের আক্রমন, ঝড়, অগ্নিকান্ড ইত্যাদি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: مقطوع رجاله ثقات. ورواية ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- عن عطاء -وهو ابن أبي رباح- محمولة على الاتصال، وإن لم يصرح بالسماع، صرح هو بذلك فيما حكاه عنه يحيى بن سعيد القطان كما في "تاريخ ابن أبي خيثمة" (٨٥٨). ابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه البيهقي ٥/ ٣٠٦ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عُثْمَانُ بْنُ الْحَكَمِ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، أَنَّهُ قَالَ لاَ جَائِحَةَ فِيمَا أُصِيبَ دُونَ ثُلُثِ رَأْسِ الْمَالِ - قَالَ يَحْيَى - وَذَلِكَ فِي سُنَّةِ الْمُسْلِمِينَ .
ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মূলধনের এক-তৃতীয়াংশের কম বিনষ্ট হলে তা প্রাকৃতিক দুর্যোগ গণ্য নয়। ইয়াহইয়া (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এটাই মুসলিমদের প্রচলিত নিয়ম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: مقطوع رجاله ثقات. يحيى بن سعيد: هو الأنصاري.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ يُمْنَعُ فَضْلُ الْمَاءِ لِيُمْنَعَ بِهِ الْكَلأُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ অতিরিক্ত পানি থেকে কাউকে বাধা দেয়া যাবে না। কেননা এতে ঘাস (বাঁচিয়ে রাখাকেই) বাধা দেয়া হবে।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২৪৭৮)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، رواہ البخاري (2353) ومسلم (1566)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو صالح: هو ذكوان السمان، والأعمش: هو سُليمان بن مِهران، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه البخاري (٢٣٥٣)، ومسلم (١٥٦٦)، وابن ماجه (٢٤٧٨)، والترمذي (١٣١٨)، والنسائي في "الكبرى" (٥٧٤٢) من طريق عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، والبخاري (٢٣٥٤) ومسلم (١٥٦٦) من طريق سعيد بن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، ثلاثتهم عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٢٤)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٥٤). وانظر ما بعده. قال الخطابي: الماء إذا جمعه صاحبه في صهريج أو بركة أو خزنه في جُبّ أو قراه في حوض ونحوه، فإن له أن يمنعه وهو شيء قد حازه على سبيل الاختصاص لا يشركه فيه غيره، وهو مخالف لماء البئر، لأنه لا يستخلف استخلاف ماء الآبار ولا يكون له فضل في الغالب كفضل مياه الآبار، والحديث إنما جاء في منع الفضل دون الأصل، ومعناه ما فضل عن حاجته، وعن حاجة عياله وماشيته وزرعه، والله أعلم.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " ثَلاَثَةٌ لاَ يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ رَجُلٌ مَنَعَ ابْنَ السَّبِيلِ فَضْلَ مَاءٍ عِنْدَهُ وَرَجُلٌ حَلَفَ عَلَى سِلْعَةٍ بَعْدَ الْعَصْرِ - يَعْنِي كَاذِبًا - وَرَجُلٌ بَايَعَ إِمَامًا فَإِنْ أَعْطَاهُ وَفَى لَهُ وَإِنْ لَمْ يُعْطِهِ لَمْ يَفِ لَهُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ক্বিয়ামাতের দিন তিন ধরনের লোকের সাথে মহান আল্লাহ কথা বলবেন না-
(১) যে ব্যক্তি তার কাছে রক্ষিত অতিরিক্ত পানি থেকে পথিক ব্যক্তিকে বাঁধা দেয়;
(২) যে ব্যক্তি ‘আসরের পর কোন জিনিসের মূল্য নিয়ে মিথ্যা শপথ করে এবং
(৩) যে ব্যক্তি ইমামের কাছে বাইআত গ্রহণ করে। এরপর ইমাম তাকে পার্থিব স্বার্থ দান করলে সে তার আনুগত্য করে, আর স্বার্থ হাসিল না হলে আনুগত্যের শপথ ভঙ্গ করে।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২০৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2672) صحیح مسلم (108)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٢٣٥٨)، ومسلم (١٠٨)، وابنُ ماجه (٢٢٠٧) و (٢٨٧٠)، والترمذي (١٦٨٥) من طرق عن الأعمش، به. ولفظ الترمذي مختصر بذكر البيعة. وأخرجه بنحوه البخاري (٢٣٦٩) و (٧٤٤٦)، ومسلم (١٠٨) من طريق عمرو ابن دينار، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، إلا أنه قال: "ورجل حلف على يمين كاذبة بعد العصر ليقتطع بها مال رجل مسلم" وزاد البخاري: "فيقول الله: اليوم أمنعك فضلي كما منعت فضلَ ما لم تعمل يداك". وهو في "مسند أحمد" (٧٤٤٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٠٨). وانظر ما بعده. وقوله: بعد العصر. قال القسطلاني: ليس بقيد، بل خرج مخرج الغالب، لأن الغالب، أن مثله كان يقع في آخر النهار حيث يريدون الفراغ من معاملتهم.