হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (3541)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ عُمَرَ بْنِ مَالِكٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي جَعْفَرٍ، عَنْ خَالِدِ بْنِ أَبِي عِمْرَانَ، عَنِ الْقَاسِمِ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ شَفَعَ لأَخِيهِ بِشَفَاعَةٍ فَأَهْدَى لَهُ هَدِيَّةً عَلَيْهَا فَقَبِلَهَا فَقَدْ أَتَى بَابًا عَظِيمًا مِنْ أَبْوَابِ الرِّبَا ‏"‏ ‏.‏




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কোন ব্যক্তি তার কোন ভাইয়ের জন্য কোন বিষয়ে সুপারিশ করার কারণে যদি সে তাকে কিছু উপহার দেয় এবং সে তা গ্রহণ করে তাহলে সে সুদের একটি বড় দরজা দিয়ে প্রবেশ করলো।



হাসানঃ মিশকাত (৩৭৫৭)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبد اللّٰہ بن وھب عنعن ، و للحدیث شواھد ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 125)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: منكر. القاسم -وهو ابن عبد الرحمن الدمشقي- ان كان ثقة يُغرب كثيراً كما قال الحافظ، وهذا الحديث من أفراده، ؤقد جاء في حديث ابن عمر ما يخالفه، ففيه: "من آتى إليكم معروفا فكافئوه" أخرجه أحمد (٥٣٦٥) وسيأتي عند المصنف برقم (٥١٠٩)، وإسناده صحيح. وقد أورد ابنُ القطان الفاسي هذا الحديث في "الوهم والإيهام" ٤/ ٥١٩ في باب الأحاديث التي سكت عنها عبد الحق الإشبيلي مصححاً لها وليست بصحيحة. وأخطأ الشيخ ناصر الألباني، فحسنه في "صحيحته" (٣٤٦٥). وأخرجه أحمد (٢٢٢٥١) من طريق ابن لهيعة، عن عُبيد الله بن أبي جعفر، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في الكبير (٧٩٢٨)، ومن طريقه الشجري في "أماليه" ٢/ ٢٣٦ من طريق أسد بن موسى، عن ابن لهيعة، عن عُبيد الله بن زحْر، عن خالد بن أبي عمران، به فذكر عُبيد الله بن زَحْر بدل عُبيد الله بن أبي جعفر! وأخرجه الطبراني (٧٨٥٣) من طريق يحيى بن أيوب، عن عُبيد الله بن زحر، عن علي بن يزيد، عن القاسم، عن أبي أمامة.









সুনান আবী দাউদ (3542)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، أَخْبَرَنَا سَيَّارٌ، وَأَخْبَرَنَا مُغِيرَةُ، وَأَخْبَرَنَا دَاوُدُ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، وَأَنْبَأَنَا مُجَالِدٌ، وَإِسْمَاعِيلُ بْنُ سَالِمٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنِ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ، قَالَ أَنْحَلَنِي أَبِي نُحْلاً - قَالَ إِسْمَاعِيلُ بْنُ سَالِمٍ مِنْ بَيْنِ الْقَوْمِ نِحْلَةً غُلاَمًا لَهُ - قَالَ فَقَالَتْ لَهُ أُمِّي عَمْرَةُ بِنْتُ رَوَاحَةَ إِيتِ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَشْهِدْهُ فَأَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَشْهَدَهُ فَذَكَرَ ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ إِنِّي نَحَلْتُ ابْنِي النُّعْمَانَ نُحْلاً وَإِنَّ عَمْرَةَ سَأَلَتْنِي أَنْ أُشْهِدَكَ عَلَى ذَلِكَ قَالَ فَقَالَ ‏"‏ أَلَكَ وَلَدٌ سِوَاهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ قُلْتُ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَكُلَّهُمْ أَعْطَيْتَ مِثْلَ مَا أَعْطَيْتَ النُّعْمَانَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ لاَ قَالَ فَقَالَ بَعْضُ هَؤُلاَءِ الْمُحَدِّثِينَ ‏"‏ هَذَا جَوْرٌ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ بَعْضُهُمْ ‏"‏ هَذَا تَلْجِئَةٌ فَأَشْهِدْ عَلَى هَذَا غَيْرِي ‏"‏ ‏.‏ قَالَ مُغِيرَةُ فِي حَدِيثِهِ ‏"‏ أَلَيْسَ يَسُرُّكَ أَنْ يَكُونُوا لَكَ فِي الْبِرِّ وَاللُّطْفِ سَوَاءً ‏"‏ ‏.‏ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَأَشْهِدْ عَلَى هَذَا غَيْرِي ‏"‏ ‏.‏ وَذَكَرَ مُجَالِدٌ فِي حَدِيثِهِ ‏"‏ إِنَّ لَهُمْ عَلَيْكَ مِنَ الْحَقِّ أَنْ تَعْدِلَ بَيْنَهُمْ كَمَا أَنَّ لَكَ عَلَيْهِمْ مِنَ الْحَقِّ أَنْ يَبَرُّوكَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ فِي حَدِيثِ الزُّهْرِيِّ قَالَ بَعْضُهُمْ ‏"‏ أَكُلَّ بَنِيكَ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ بَعْضُهُمْ ‏"‏ وَلَدِكَ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ ابْنُ أَبِي خَالِدٍ عَنِ الشَّعْبِيِّ فِيهِ ‏"‏ أَلَكَ بَنُونَ سِوَاهُ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ أَبُو الضُّحَى عَنِ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ ‏"‏ أَلَكَ وَلَدٌ غَيْرُهُ ‏"‏ ‏.




নু‘মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার পিতা আমাকে অতিরিক্ত কিছু দিলেন। এ হাদীসের অন্যতম বর্ণনাকারী ইসমাঈল ইবনু সালিমের বর্ণনায় রয়েছেঃ তিনি তাকে একটি গোলাম দান করেন। বর্ণনাকারী (নু‘মান) বলেন, আমার মা ‘আমরাহ বিনতু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার পিতাকে বললেন, আপনি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট গিয়ে তাঁকে এ বিষয়ে সাক্ষী রাখুন। তিনি (পিতা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে গিয়ে বিষয়টি জানালেন। তিনি বললেন, আমি আমার ছেলে নু‘মানকে কিছু উপহার দিয়েছি। এ ব্যাপারে আপনাকে সাক্ষী রাখার জন্য ‘আমরাহ আমাকে অনুরোধ করেছে। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি বললেন, সে ছাড়াও তোমার আরো সন্তান আছে কি? তিনি বললেন, হাঁ। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি কি তোমার প্রত্যেক সন্তানকে অনুরূপ দিয়েছো, যেমন নু‘মানকে দিয়েছো? তিনি বললেন, না। কতিপয় মুহাদ্দিসের বর্ণনায় রয়েছেঃ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “এটা অন্যায় কাজ”। আর কতিপয় মুহাদ্দিস বলেন, নবী বলেছেনঃ “এতো নীতি বিরোধী কাজ”। সুতরাং আমাকে বাদ দিয়ে অন্য কাউকে সাক্ষী রাখো। মুগীরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) তার বর্ণিত হাদীসে উল্লেখ করেন, “তোমার সব সন্তানই সমান সৌভাগ্যবান হোক, এতে কি তুমি খুশি হবে না? তিনি বললেন, হাঁ। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ “আমাকে বাদ দিয়ে অন্য কাউকে এর সাক্ষী রাখো”। মুজালিদ তার বর্ণিত হাদীসে উল্লেখ করেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ “তোমার উপর তাদের হক্ব রয়েছে যে, তুমি তাদের সাথে সমান ব্যবহার করবে এবং তাদের প্রতি ইনসাফ করবে। যেমন অধিকার রয়েছে তাদের উপর তোমার; তারা সবাই তোমার সাথে সদ্ব্যবহার করুক”।

ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, যুহ্‌রীর বর্ণিত হাদীসে রয়েছে, কতিপয় বর্ণনাকারী “তোমরা সন্তান” শব্দ বর্ণনা করেছেন। ইবনু খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, শা‘বীর বর্ণিত হাদীসে রয়েছেঃ “সে ছাড়া তোমার আরো সন্তান আছে কি?”। আবুদ্‌ দুহা (রাহিমাহুল্লাহ) নু‘মান ইবনু বাশীর সূত্রে হাদীসে বলেন, (সে ব্যতীত তোমার কি আরো সন্তান আছে?”



সহীহঃ তবে মুজালিদের অতিরিক্ত সংযোজন ““...... (আরবি)”” অংশটুকু বাদে। গায়াতুল মারাম (২৭৩,২৭৪)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح إلا زيادة مجالد إن لهم




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مجالد ضعیف ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 125، 126)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الشعبي: هو. عامر بن شراحيل، وداود: هو ابن أبي هند، ومغيرة: هو ابن مِقسَم الضبي، اسماعيل بن سالم: هو الأسدي الكوفي، ومجالد: هو ابن سعيد، وسيار: هو أبو الحكم العنزي، وهشيم: هو ابن بشير الواسطي. وبيان هذا الإسناد أن سياراً وداود بن أبي هند ومغيرة بن مقسم ومجالداً وإسماعيل بن سالم، هؤلاء الخمسة رووا الحديث عن الشعبي، وروى عنهم الحديث جميعاً هشيم بن بشير. وأخرجه البخاري (٢٥٨٧) و (٢٦٥٠)، ومسلم (١٦٢٣)، وابن ماجه (٢٣٧٥)، والنسائي (٣٦٧٩ - ٣٦٨٢) من طرق عن الشعبي، عن النعمان. وأخرجه البخاري (٢٥٨٦)، ومسلم (١٦٢٣)، وابن ماجه (٢٣٧٦)، والترمذي (١٣٦٧) والنسائي (٣٦٧٢ - ٣٦٧٤) من طريق الزهري، عن حميد بن عبد الرحمن ومحمد بن النعمان بن بشير، والنسائي (٣٦٨٥) و (٣٦٨٦) من طريق فطر بن خليفة، عن مسلم بن صبيح، كلهم عن النعمان بن بشير. وهو في "مسند أحمد" (١٨٣٦٣) و (١٨٣٨٢)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٩٧) و (٥٠٩٨) و (٥١٠٢). وانظر تالييه. قال الخطابي: واختلف أهل العلم في جواز تفضيل بعض الأبناء على بعض في النحل والبر، فقال مالك والشافعي: التفضيل مكروه، فإن فعل ذلك نفذ، وكذلك قال أصحاب الرأي. وعن طاووس أنه قال: إن فعل ذلك لم ينفذ، وكذلك قال إسحاق بن راهويه، وهو قول داود. وقال أحمد بن حنبل: لا يجوز التفضيل، ويُحكى ذلك أيضاً عن سفيان الثوري. واستدل بعض من منع ذلك بقوله: "هذا جور" وبقوله: "هذا تلجئة" والجور مردود، والتلجئة غير جائزة، ويدل على ذلك حديثه الآخر. قلنا: وقول الأمام أحمد: لا يجوز التفضيل، ليس هو على إطلاقه، فقد قال ابن قدامة في "المغني" ٨/ ٢٥٨: فإن خص بعض أولاده لمعنى يقضي تخصيصه، مثل اختصاصه بحاجة أو زمانة أو عمى أو كثرة عائلة أو اشتغاله بالعلم أو نحوه من الفضائل، أو صرف عطيته عن بعض ولده لفسقه أو بدعته أو لكونه يستعين بما يأخذه على معصية الله أو ينفقه فيها، فقد روي عن أحمد ما يدل على جواز ذلك لقوله في تخصيص بعضهم بالوقف. لا بأس به إذا كان لحاجة، وأكرهه إذا كان على سبيل الأثرة، والعطية في معناه. ثم قال الخطابي: فأما قوله: "هذا جور" فمعناه: هذا ميل عن بعضهم إلى بعض، وعدول عن الفعل الذي هو أفضل وأحسن، ولا خلاف أنه لو آثر بجميع ما له أجنبياً وحرمه أولاده أن فعله ماضٍ، فكيف يُردُّ فعلُه في إيثار بعض أولاده على بعض؟ وقد فضل أبو بكر عائشة ﵄ بجذاذ عشرين وسقا ونحلها إياه دون أولاده وهم عدد، فدل ذلك على جوازه وصحة وقوعه. وقد قال بعض أهل العلم: إنما كره ذلك لأنه يقع في نفس المفضول بالبر شيء فيمنعه ذلك من حسن الطاعة والبر، وربما كان سببا لعقوق الولد وقطيعة الرحم بينه وبين إخوته. وذهب قوم إلى أنه لا يجوز أن يسوي بين أولاده الذكران والإناث في البر والصلة أيام حياته، ولكن يفضل ويقسم على سهام الميراث وروي ذلك عن شريح. وإليه ذهب أحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه، واحتج من رأى التسوية بين الذكر والأنثى بقوله: "أليس يسرُّك أن يكونوا في البر واللطف سواء" قال: نعم، أي: فسوِّ كذلك في العطية بينهم، وقالوا: لم يستثن ذكراً من أنثى.









সুনান আবী দাউদ (3543)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، حَدَّثَنِي النُّعْمَانُ بْنُ بَشِيرٍ، قَالَ أَعْطَاهُ أَبُوهُ غُلاَمًا فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ مَا هَذَا الْغُلاَمُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ غُلاَمِي أَعْطَانِيهِ أَبِي ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَكُلَّ إِخْوَتِكَ أَعْطَى كَمَا أَعْطَاكَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ لاَ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَارْدُدْهُ ‏"‏ ‏.‏




নু‘মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তার পিতা তাকে একটি গোলাম দান করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নু‘মানকে জিজ্ঞেস করলেনঃ এটি কার গোলাম? তিনি বললেন, আমার গোলাম, আমার পিতা আমাকে দান করেছেন। তিনি পুনরায় জিজ্ঞেস করলেনঃ সে তোমার মতো তোমার অন্য ভাইদেরকেও কি দিয়েছে? নু‘মান বললেন, না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি এটি ফেরত দাও।



সহীহঃ ইরওয়া (৬/৪২)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1623)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوّام، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه مسلم (١٦٢٣)، والنسائي (٣٦٧٦) من طريق هشام بن عروة، به وهو في "مسند أحمد" (١٨٣٥٤). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (3544)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ حَاجِبِ بْنِ الْمُفَضَّلِ بْنِ الْمُهَلَّبِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ سَمِعْتُ النُّعْمَانَ بْنَ بَشِيرٍ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ اعْدِلُوا بَيْنَ أَوْلاَدِكُمْ اعْدِلُوا بَيْنَ أَبْنَائِكُمْ ‏"‏ ‏.‏




নু‘মান ইবনু বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের সন্তানদের সাথে সমান আচরণ করো; তোমাদের সন্তানদের সাথে ইনসাফ করো।



সহীহঃ গায়াতুল মারাম (২৭২)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (3717 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل المفضل بن المهلب -وهو ابن أبي صُفرة- حماد: هو ابن زيد. وأخرجه النسائي (٣٦٨٧) من طريق سليمان بن حرب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٤٢٢). وانظر سابقيه.









সুনান আবী দাউদ (3545)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رَافِعٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ قَالَتِ امْرَأَةُ بَشِيرٍ انْحَلِ ابْنِي غُلاَمَكَ وَأَشْهِدْ لِي رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَتَى رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ إِنَّ ابْنَةَ فُلاَنٍ سَأَلَتْنِي أَنْ أَنْحَلَ ابْنَهَا غُلاَمًا وَقَالَتْ لِي أَشْهِدْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ فَقَالَ ‏"‏ لَهُ إِخْوَةٌ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَكُلَّهُمْ أَعْطَيْتَ مِثْلَ مَا أَعْطَيْتَهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ لاَ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَلَيْسَ يَصْلُحُ هَذَا وَإِنِّي لاَ أَشْهَدُ إِلاَّ عَلَى حَقٍّ ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর স্ত্রী তাকে বলেন, আপনার গোলামটি আমার ছেলেকে দিয়ে দিন এবং এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাক্ষী রাখুন।। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে এসে বললেন, অমুকের কণ্যা (আমার স্ত্রী) আপনার কাছে আবেদন করেছে, আমি যেন তার ছেলেকে আমার গোলামটি দান করি। সে আমাকে এটাও বলেছে যে, এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাক্ষী রাখুন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তার আরো ভাই আছে কি? বাশীর বললেন, হাঁ। তিনি বললেনঃ তাকে যেরূপ দান করেছো অন্যদেরও কি সেরূপ দিয়েছো? তিনি বললেন, না। তিনি বললেনঃ এটা উচিত নয়। আমি সত্য ব্যতীত অন্য কিছুর সাক্ষী হই না।



সহীহঃ ইরওয়া (৬/৪২)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1624)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: *(3545-1) حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أن أبا الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- لم يصرح بسماعه من جابر. وقد روي هذا الحديث عن النعمان بن بشير نفسه كما سلف عند المصنف برقم (٣٥٤٢) و (٣٥٤٣) وهو في "الصحيحين"، زهير: هو ابن معاوية. وأخرجه مسلم (١٦٢٤) من طريق زهير بن معاوية، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤٤٩٢)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٠١). *(3545-2) إسناده صحيح. وهو مكرر الحديث السالف بالأرقام (١٦٥٦) و (٢٨٧٧) و (٣٣٠٩).









সুনান আবী দাউদ (3546)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ دَاوُدَ بْنِ أَبِي هِنْدٍ، وَحَبِيبٍ الْمُعَلِّمِ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ يَجُوزُ لاِمْرَأَةٍ أَمْرٌ فِي مَالِهَا إِذَا مَلَكَ زَوْجُهَا عِصْمَتَهَا ‏"‏ ‏.‏




আমর ইবনু শু‘আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ স্বামী যদি স্ত্রীর সতীত্বের হিফাযাতকারী হয় তাহলে কোন স্ত্রীর পক্ষে (স্বামীর বিনা অনুমতিতে) তার মাল থেকে ব্যয় করা জায়িয নয়।



হাসান সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২৩৮৮)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (3787 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. حماد: هو ابن سلمة. وأخرجه النسائي (٣٧٥٦) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٨٨) من طريق المثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب، به. وهو في "مسند أحمد" (٦٦٨١)، وانظر ما بعده. قلنا: يغلب على ظننا أن زيادة: "في مالها" مدرجة من بعض الرواة، ظن أن قوله ﷺ: "لا يجوز للمرأة عطية إلا بإذن زوجها" أن هذه العطية من مالها، كما التبس على بعض الرواة الأمر في حديث: "إن الله خلق آدم على صورته" فظن أن الضمير يعود على الله، فأبدل المكني بالاسم المظهر، فقال: إن الله خلق آدم على صورة الرحمن. وقد ذكر البيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ٦٠ - ٦١ من طريق أبي العباس الأصم، أنبأنا الربيع قال: قال الشافعي (يعني في هذا الحديث): سمعناه وليس بثابت فيلزمنا أن نقول به والقرآن يدل على خلافة، ثم السنة، ثم الأثر، ثم المعقول، وقال في "مختصر البويطي والربيع": قد يمكن أن يكون هذا في موضع الاختيار، كما قيل: ليس لها أن تصوم يوماً وزوجها حاضر إلا بإذنه، فإن فعلت فصومها جائز، وإن خرجت بغير إذنه فباعت فجائز، وقد اعتقت ميمونة ﵂ قبل أن يعلم النبي ﷺ، فلم يَعب ذلك عليها، فدل هذا مع غيره على أن قول النبي ﷺ -إن كان قاله- أدب واختيار لها. قال البيهقي: الطريق في هذا الحديث إلى عمرو بن شعيب صحيح، ومن أثبت أحاديث عمرو بن شعيب لزمه إثبات هذا، إلا أن الأحاديث التي مضت في الباب قبله أصح إسناداً، وفيها وفي الآيات التي احتج بها الشافعي ﵀ دلالة على نفوذ تصرفها في مالها دون الزوج، فيكون حديث عمرو بن شعيب محمولاً على الأدب والاختيار كما أشار إليه في كتاب البويطي، وبالله التوفيق. وانظر لزاما "الأم" للشافعي ٣/ ٢١٦، و"شرح معاني الآثار" ٤/ ٣٥١ - ٣٥٤.









সুনান আবী দাউদ (3547)


حَدَّثَنَا أَبُو كَامِلٍ، حَدَّثَنَا خَالِدٌ، - يَعْنِي ابْنَ الْحَارِثِ - حَدَّثَنَا حُسَيْنٌ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، أَنَّ أَبَاهُ، أَخْبَرَهُ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ يَجُوزُ لاِمْرَأَةٍ عَطِيَّةٌ إِلاَّ بِإِذْنِ زَوْجِهَا ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ স্বামীর বিনা অনুমতিতে কোন স্ত্রীর পক্ষে (তার মাল থেকে) কিছু দান করা জায়িয নয়।



হাসান সহীহ: এর পূর্বেরটি দেখুন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، أخرجہ النسائي (2541 وسندہ حسن) وانظر الحدیث السابق (3546)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن كسابقه. حسين: هو المُعلِّم، وأبو كامل: هو فضيل بن حسين الجَحْدري. وأخرجه النسائي (٢٥٤٠) و (٣٧٥٧) من طريق حسين المعلم، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٦٨١). وانظر ما قبله. وقوله: "لامرأة عطية" قال السندي أي: من مال الزوج، وإلا فالعطية من مالها لا يحتاج إلى إذن عند الجمهور.









সুনান আবী দাউদ (3548)


حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ النَّضْرِ بْنِ أَنَسٍ، عَنْ بَشِيرِ بْنِ نَهِيكٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الْعُمْرَى جَائِزَةٌ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ সারা জীবনের জন্য কাউকে কিছু দান করা জায়িয।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2626) صحیح مسلم (1626)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. قتادة: هو ابن دعامة، وهمام: هو ابن يحيى العَوْذي، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه البخاري (٢٦٢٦)، ومسلم (١٦٢٦)، والنسائي (٣٧٥٤) من طريق قتادة، به. وجاء عند مسلم في إحدى روايتيه: "العمرى ميراث لأهلها" أو قال: "جائزة". وهو في "مسند أحمد" (٨٥٦٧). وأخرج ابن ماجه (٢٣٧٩)، والنسائي (٣٧٥٣) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة رفعه: "لا عمرى، فمن أُعمر شيئاً فهو له". هذا لفظ ابن ماجه. قوله: "عُمرى" قال الخطابي: هي أن يقول الرجل لصاحبه: أعمرتك هذه الدار، ومعناه: جعلتها لك مدة عمرك، فهذا إذا اتصل به القبض كان تمليكاً لرقبة الدار، وإذا ملكها في حال حياته وجاز له التصرت فيها ملكلها بعده وارثُه الذي يرث سائر أملاكه، وهذا قول الشافعي وقول أصحاب الرأي. وقال في "المغني" ٨/ ٢٨٣: قال جابر بن عبد الله وابن عمر وابن عباس وشُريح ومجاهد وطاووس والثوري والشافعي وأصحاب الرأي: إن العُمرى تَنفُلُ الملك إلى المُعْمَر، وروي ذلك عن علي. وقال مالك والليث: العمرى تمليك المنافع، ولا تُملك بها رقبة المُعمرَ بحال، ويكون للمُعمَر السكنى، فإذا مات عادت إلى المُعمَر. وإن قال: له ولعقبه، كان سكناها لهم، فإذا انقرضوا عادت إلى المُعمِر.









সুনান আবী দাউদ (3549)


حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ سَمُرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِثْلَهُ ‏.‏




সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্র হতে বর্ণিত, পূর্বোক্ত হাদীসের অনূরূপ বর্ণিত।



সহীহ পূর্বেরটি দ্বারা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لغيره




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3545)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن الحسن -وهو البصري- لم يصرح بسماعه من سمرة -وهو ابن جندب-. قتادة: هو ابن دعامة، وهمام: هو ابن يحيى. وأخرجه الترمذي (١٣٩٩) من طريق قتادة بن دعامة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٠٨٤).









সুনান আবী দাউদ (3550)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ، عَنْ يَحْيَى، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقُولُ ‏ "‏ الْعُمْرَى لِمَنْ وُهِبَتْ لَهُ ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেনঃ সারা জীবনের জন্য প্রদত্ত বস্তু তারই প্রাপ্য যাকে তা দেয়া হয়।



সহীহ: নাসায়ী (৩৭৫০)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2625) صحیح مسلم (1625)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف، ويحيى: هو ابن أبي كثير، وأبان: هو ابن يزيد العطَّار. وأخرجه البخاري (٢٦٢٥)، ومسلم (١٦٢٥)، والنسائي (٣٧٥٠) و (٣٧٥١) من طرق عن يحيى بن أبي كثير، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٤٣) و (١٤٢٧٠)، و "صحيح ابن حبان"، (٥١٣٠). وانظر ما سيأتي بالأرقام (٣٥٥١ - ٣٥٥٨).









সুনান আবী দাউদ (3551)


حَدَّثَنَا مُؤَمَّلُ بْنُ الْفَضْلِ الْحَرَّانِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ شُعَيْبٍ، أَخْبَرَنِي الأَوْزَاعِيُّ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ أُعْمِرَ عُمْرَى فَهِيَ لَهُ وَلِعَقِبِهِ يَرِثُهَا مَنْ يَرِثُهُ مِنْ عَقِبِهِ ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যাকে সারা জীবনের জন্য কিছু দেয়া হয় তার মালিক সে-ই। তার অবর্তমানে যারা তার উত্তরাধিকারী হয় তারা এর উত্তরাধিকারী হবে।



সহীহ: নাসায়ী (৩৭৪০-৩৭৪১)।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث الآتي (3553)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوّام، والأوزاعي: هو عبد الرحمن ابن عمرو، ومحمد بن شعيب: هو ابن شابور الدمشقي. وأخرجه النسائي (٣٧٤٠) من طريق الأوزاعي، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله، وما سيأتي برقم (٣٥٥٣).









সুনান আবী দাউদ (3552)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي الْحَوَارِيِّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، وَعُرْوَةَ، عَنْ جَابِرٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِمَعْنَاهُ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهَكَذَا رَوَاهُ اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ عَنْ جَابِرٍ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্র হতে বর্ণিত, উপরের হাদীসের অনুরূপ অর্থের হাদীস বর্ণিত হয়েছে।



আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث الآتي (3553)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. الوليد -وهو ابن مسلم الدمشقي- وإن لم يصرح بالسماع في جميع طبقات الإسناد، متابع كما في الحديث الآتي بعده، وكما في الحديث السالف. وأخرجه النسائي (٣٧٤٢) من طريق أبي عمرو الأوزاعي، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٣٧٤١) من طريق الأوزاعي، عن الزهري، عن أبي سلمة وحده، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٥١٣٥). وانظر سابقيه، وما سيأتي بعده.









সুনান আবী দাউদ (3553)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، قَالاَ حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا مَالِكٌ، - يَعْنِي ابْنَ أَنَسٍ - عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ أَيُّمَا رَجُلٍ أُعْمِرَ عُمْرَى لَهُ وَلِعَقِبِهِ فَإِنَّهَا لِلَّذِي يُعْطَاهَا لاَ تَرْجِعُ إِلَى الَّذِي أَعْطَاهَا لأَنَّهُ أَعْطَى عَطَاءً وَقَعَتْ فِيهِ الْمَوَارِيثُ ‏"‏ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি সারা জীবনের জন্য কাউকে কিছু দান করে বলে, তাকে এবং তার উত্তরাধিকারীকে জীবনস্বত্ব দেয়া হলো। তাহলে এই জীবনস্বত্ব মালিক সে এবং তার ওয়ারিসরা হবে, যা কখনো গ্রহীতার কাছ থেকে দাতার নিকট ফিরে আসবে না। কারণ সে এমনভাবে দান করেছে, যাতে উত্তরাধিকারস্বত্ব প্রতিষ্ঠিত হয়েছে।



সহীহ: নাসায়ী (৩৭৪৫)।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1625)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٧٥٦، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٦٢٥)، والترمذي (١٤٠٠)، والنسائي (٣٧٤٥). وأخرجه مسلم (١٦٢٥)، والنسائي (٣٧٤٧) من طريق ابن أبي ذئب، ومسلم (١٦٢٥) من طريق ابن جريج، والنسائي (٣٧٤٦) من طريق شعيب بن أبي حمزة، ومسلم (١٦٢٥)، وابن ماجه (٢٣٨٠)، والنسائي (٣٧٤٤) من طريق الليث بن سعد، والنسائي (٣٧٤٩) من طريق يزيد بن أبي حبيب، خمستهم عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٣١) و (١٤٨٧١) و (١٥٢٩٠)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٣٧) و (٥١٣٨) و (٥١٣٩). وانظر تالييه، وما قبله، وما سلف برقم (٣٥٥٠).









সুনান আবী দাউদ (3554)


حَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ أَبِي يَعْقُوبَ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ صَالِحٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رَوَاهُ عُقَيْلٌ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، وَيَزِيدُ بْنُ أَبِي حَبِيبٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، وَاخْتُلِفَ، عَلَى الأَوْزَاعِيِّ فِي لَفْظِهِ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، وَرَوَاهُ، فُلَيْحُ بْنُ سُلَيْمَانَ مِثْلَ حَدِيثِ مَالِكٍ ‏.‏




ইবনু শিহাব হতে বর্ণিত, ইবনু শিহাব তার সানাদ পরম্পরায় উপরের হাদীসে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন।



আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3554)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. صالح: هو ابن كيسان. وأخرجه النسائي (٣٧٤٨) من طريق صالح بن كيسان، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله، وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (3555)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ إِنَّمَا الْعُمْرَى الَّتِي أَجَازَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَقُولَ هِيَ لَكَ وَلِعَقِبِكَ ‏.‏ فَأَمَّا إِذَا قَالَ هِيَ لَكَ مَا عِشْتَ ‏.‏ فَإِنَّهَا تَرْجِعُ إِلَى صَاحِبِهَا ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেরূপ জীবনস্বত্ব দানের অনুমতি দিয়েছেন তা হলো, দাতা এরূপ বলবেঃ এটা তোমার জন্য এবং তোমার ওয়ারিসদের জন্য। কিন্তু সে যদি তা না বলে এটা বলেঃ “যতদিন তুমি বেঁচে থাকবে ততদিন এটা তোমার জন্য”, এ অবস্থায় (গ্রহীতার মৃত্যুর পর) ঐ দান দাতার নিকট ফেরত আসবে।



সহীহ : ইরওয়া (১৬১২)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1625)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٦٨٨٧)، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٦٢٥) وهو في "مسند أحمد" (١٤١٣١)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٣٩). وانظر ما سلف برقم (٣٥٥٠) و (٣٥٥٣) و (٣٥٥٤).









সুনান আবী দাউদ (3556)


حَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تُرْقِبُوا وَلاَ تُعْمِرُوا فَمَنْ أُرْقِبَ شَيْئًا أَوْ أُعُمِرَهُ فَهُوَ لِوَرَثَتِهِ ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা পুনরায় ফেরত পাবার আশায় এরূপ (বলে) দান করবে না যে, যদি আমি আগে মরে যাই তবে এটা তোমার; আর যদি তুমি আগে মরে যাও তবে এটা আমার। অথবা যতদিন তুমি বেঁচে থাকবে এটা তোমার। যাকে রুক্ববা অথবা জীবনস্বত্ব দান করা হয় সেটা তার উত্তরাধিকারীদের জন্য হয়ে যায়।



সহীহ: নাসায়ী (৩৭৩১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1625) ، مشکوۃ المصابیح (3013)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ورواية ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- وإن لم يصرح بسماعه من عطاء -وهو ابن أبي رباح- محمولة على الاتصال، كما صرح هو نفسه بذلك فيما رواه ابنُ أبي خيثمة في "تاريخه" (٨٥٨). سفيان: هو ابن عيينة، وإسحاق بن إسماعيل: هو الطالقاني. وأخرجه النسائي (٣٧٣١) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢٦٢٦)، ومسلم (١٦٢٥)، والنسائي (٣٧٢٩) و (٣٧٥٥) من طريق قتادة بن دعامة، والنسائي (٣٧٢٧) من طريق مالك بن دينار، كلاهما عن عطاء بن أبي رباح، به. بلفظ: "العمرى جائزة"، وفي رواية لمسلم: "العُمرى ميراث لأهلها" وأخرجه النسائي (٣٧٢٨) من طريق عبد الكريم بن مالك الجزري، و (٣٧٣٠) من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، كلاهما عن عطاء بن أبي رباح مرسلاً. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٧٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٢٩). وانظر ما سلف برقم (٣٥٥٠).









সুনান আবী দাউদ (3557)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ هِشَامٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ حَبِيبٍ، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي ثَابِتٍ - عَنْ حُمَيْدٍ الأَعْرَجِ، عَنْ طَارِقٍ الْمَكِّيِّ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي امْرَأَةٍ مِنَ الأَنْصَارِ أَعْطَاهَا ابْنُهَا حَدِيقَةً مِنْ نَخْلٍ فَمَاتَتْ فَقَالَ ابْنُهَا إِنَّمَا أَعْطَيْتُهَا حَيَاتَهَا ‏.‏ وَلَهُ إِخْوَةٌ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ هِيَ لَهَا حَيَاتَهَا وَمَوْتَهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ كُنْتُ تَصَدَّقْتُ بِهَا عَلَيْهَا ‏.‏ قَالَ ‏"‏ ذَلِكَ أَبْعَدُ لَكَ ‏"‏ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জনৈক আনসারী মহিলাকে তার পুত্র কর্তৃক দান করা একটি খেজুর বাগান সম্পর্কে ফায়সালা দিয়েছিলেন। অতঃপর মহিলাটি মারা গেলে তার ছেলে বললো, আমি তাকে তার জীবিত থাকাকালীন সময়ের জন্যই দান করেছিলাম। ছেলেটির আরো কয়েকটি ভাই ছিলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ জীবিত ও মৃত্যু উভয় অবস্থায়ই বাগানটি তার হয়ে গেছে। ছেলেটি বললো, বাগানটি আমি তাকে সদাক্বাহ স্বরূপ দিয়েছিলাম। তিনি বললেনঃ তাহলে তো এটা তোমার থেকে দূরে সরে গেছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، الثوري و حبیب عنعنا ، (انوار الصحیفہ ص 126)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد اضطرب فيه معاوية بن هشام على سفيان -وهو الثوري-، والمحفوظ عن سفيان الثوري، روايته هذا الحديث عن حميد الأعرج -وهو ابن قيس- عن محمد بن إبراهيم، عن جابر - يعني منقطعا، لأن محمد بن إبراهيم -وهو التيمي- لم يسمع من جابر بن عبد الله. أخرجه أحمد (١٤١٩٧) عن يحيى القطان وروح بن عبادة عن سفيان الثوري قال ابن عدي عن معاوية بن هشام: قد أغرب عن الثوري بأشياء، وأرجو أنه لا بأس به. وأما حبيب بن أبي ثابت، فالمحفوظ عنه أنه رواه عن حميد الكندي، عن جابر كما أخرجه ابن أبي شيبة ١٠/ ١٦٧، والطحاوي ٤/ ٩٣ عن يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن أبيه، عن حبيب بن أبي ثابت، عن حميد الكندي، عن جابر. قلنا: وإسناده إلى حبيب صحيح، وأما حميد الكندي فقد ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" ٣/ ٢٣٢، وسكت عنه. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٠/ ١٨٣، والبيهقي ٦/ ١٧٤ عن معاوية بن هشام، بهذا الإسناد. وأخرج عبد الرزاق (١٦٨٨٦)، ومن طريقه مسلم (١٦٢٥)، والبيهقي ٦/ ١٧٣ عن ابن جريح، عن أبي الزبير، عن جابر، قال: أَعْمَرت امرأة بالمدينة حائطا لها ابناً لها، ثم توفي وتوفيت بعده، وله إخوة بنو المُعمِرة، فقال: ولد المُعمِرة: رجع الحائط إلينا، وقال بنو المُعمَرة: بل كان لأبينا حياتَه وموتَه، فاختصموا إلى طارق مولى عثمان، فدعا جابراً فشهد على النبي ﷺ بالعمرى لصاحبها، فقضى بذلك، ثم كتب إلى عبد الملك: صدق جابر. وأمضى ذلك طارق، فإن ذلك الحائط لبني المُعمَر حتى اليوم. وأخرج الشافعي ٢/ ١٦٩، وابن أبي شيبة ٧/ ١٣٧، وأحمد (١٥٠٧٧)، ومسلم (١٦٢٥)، وأبو يعلى (١٨٣٥)، والطحاوي ١/ ٩١، والبيهقي ٦/ ١٧٣ - ١٧٤ من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن سليمان بن يسار: أن طارقاً كان أميراً بالمدينة، فقضى بالعمرى للوارث عن قول جابر بن عبد الله عن النبي ﷺ. وانظر ما سلف بالأرقام (٣٥٥٠ - ٣٥٥٦).









সুনান আবী দাউদ (3558)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، أَخْبَرَنَا دَاوُدُ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ الْعُمْرَى جَائِزَةٌ لأَهْلِهَا وَالرُّقْبَى جَائِزَةٌ لأَهْلِهَا ‏"‏ ‏.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যাকে জীবনস্বত্ব দেয়া হয় সেটা তারই হয়ে যায়। রুকবা যাকে দেয়া সে-ই হয় এর স্বত্বাধিকারী।



সহীহ: ইবনু মাজাহ (২৩৮৩)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3014) ، أبو الزبیر صرح بالسماع فی الروایۃ الطویلۃ وللحدیث شواھد




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد صرح أبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- بسماعه من جابر عند النسائي (٣٧٣٥) و (٣٧٣٦). داود: هو ابن أبي هند، وهشيم، هو ابن بشير الواسطي. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٨٣)، والترمذي (١٤٠١)، والنسائي (٣٧٣٨) (٣٧٣٩) من طريق داود بن أبي هند، به. وقال الترمذي: حديث حسن. واقتصر النسائي في الموضع الأول على ذكر الرقبى. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٥٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٣٦). لكن لفظ رواية ابن حبان: "لا تعمروا أموالكم، فمن أُعمِر شيئاً حياتَه، فهو له ولورثته إذا مات". وأخرجه مسلم (١٦٢٥)، والنسائي (٣٧٣٦) و (٣٧٣٧) من طرق عن أبي الزبير، عن جابر، ولفظه: "أمسكوا عليكم أموالكم ولا تفسدوها، فإنه من أعمر عُمرى فهي للذي أُعمِرها، حياً وميتاً ولعقبه". وأخرجه النسائي (٣٧٣٥) من طريق ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابراً يقول: قال رسول الله ﷺ: "من أعمر شيئاً فهو له حياته ومماته". وهو في "مسند أحمد" (١٤١٢٦)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٤٠) و (٥١٤١). قال الترمذي: والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي ﷺ وغيرهم: أن الرقبى جائزة مثل العُمرى، وهو قول أحمد وإسحاق. وفرق بعض أهل العلم من أهل الكوفة وغيرهم بين العُمرى والرُّقبى، فأجازوا العُمرى، ولم يجيزوا الرُّقبى. وتفسير الرقبى: أن يقول: هذا الشيء لك ما عشتَ، فإن متَّ قبلي فهي راجعة إليَّ. وقال أحمد وإسحاق: الرقبى مثل العُمرى، وهي لمن أُعطيها، ولا ترجع إلى الأول. قلنا: وقال الخطابي: والرقبى: أن يرقب كل واحد منهما موت صاحبه، فتكون الدار التي جعلها رقبى لآخر من بقي منهما. وقال أبر حنيفة: العمرى موروثة، والرقبى عاريّة، وعند الشافعي: الرقبى موروثة كالعُمرى، وهو حكم ظاهر الحديث. وانظر ما سيأتي عند المصنف برقم (٣٥٦٠).









সুনান আবী দাউদ (3559)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، قَالَ قَرَأْتُ عَلَى مَعْقِلٍ عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ طَاوُسٍ، عَنْ حُجْرٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ أَعْمَرَ شَيْئًا فَهُوَ لِمُعْمَرِهِ مَحْيَاهُ وَمَمَاتَهُ وَلاَ تُرْقِبُوا فَمَنْ أَرْقَبَ شَيئًا فَهُوَ سَبِيلُهُ ‏"‏ ‏.‏




যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যদি কেউ কাউকে জীবনস্বত্বরূপে কিছু দান করে তাহলে যাকে তা দান করা হয়েছে সেই হবে জীবনে মরণে এর স্বত্বাধিকারী। তোমরা রুক্ববা করো না। কেউ রুক্ববা করলে তা গ্রহীতার মালিকানায় চলে যায়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ ابن ماجہ (2381 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. وهذا إسناد حسن من أجل معقل -وهو ابن عُبيد الله الجزري- وهو متابع. حُجْر: هو ابن قيس الهمْداني الحَجُوري المَدَرى. وأخرجه النسائي (٣٧٢٣) من طريق معقل بن عُبيد الله، بهذا الإسناد. لكن لم يذكر في إسناده طاووساً! وأخرجه أحمد (٢١٦٥١)، والطبراني في "الكبير" (٤٩٤٨)، والبيهقي ٦/ ١٧٥ من طريق عبد الله بن الحارث، عن شبل بن عباد المكي، عن عمرو بن دينار، به. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٨١)، والنسائي (٣٧١٩) و (٣٧٢١) و (٣٧٢٢) من طريق عمرو بن دينار، به. بلفظ: أن النبي ﷺ جعل العُمرى للوارث. وأخرجه بهذا اللفظ النسائي (٣٧١٥) و (٣٧١٨) و (٣٧٢٠) من طريقين عن طاووس، عن زيد - دون ذكر حجر المدري، والصحيح ذكره: فقد أخرجه النسائي (٣٧١٦) و (٣٧١٧) من طريقين عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن حُجر المدري، عن زيد بن ثابت. وهو في "مسند أحمد" (٢١٥٨٦)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٣٢ - ٥١٣٤) باللفظ المذكور آنفاً.









সুনান আবী দাউদ (3560)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْجَرَّاحِ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ مُوسَى، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ الأَسْوَدِ، عَنْ مُجَاهِدٍ، قَالَ الْعُمْرَى أَنْ يَقُولَ الرَّجُلُ لِلرَّجُلِ هُوَ لَكَ مَا عِشْتَ فَإِذَا قَالَ ذَلِكَ فَهُوَ لَهُ وَلِوَرَثَتِهِ وَالرُّقْبَى هُوَ أَنْ يَقُولَ الإِنْسَانُ هُوَ لِلآخِرِ مِنِّي وَمِنْكَ ‏.‏




মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, জীবনস্বত্ব হলোঃ কোনো ব্যক্তি কাউকে বললো, যতদিন তুমি বেঁচে থাকবে এটা তোমার। দাতা এরূপ বললে এটা গ্রহীতার হয়ে যাবে এবং তার মৃত্যুর পর তার ওয়ারিসরা এর স্বত্বাধিকারী হবে। আর রুক্ববা হলোঃ কোন ব্যক্তির এরূপ বলা, যদি আমি আগে মারা যাই তবে এটা তোমার, আর যদি তুমি আগে মারা যাও তবে এটা আমার।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. مجاهد: هو ابن جبْر المكي. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ١٧٦ من طريق أبي داود، به.