সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا وَهْبُ بْنُ بَقِيَّةَ، عَنْ خَالِدٍ، عَنْ عَوْفٍ، عَنْ أَبِي الْقَمُوصِ، زَيْدِ بْنِ عَلِيٍّ حَدَّثَنِي رَجُلٌ، كَانَ مِنَ الْوَفْدِ الَّذِينَ وَفَدُوا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِنْ عَبْدِ الْقَيْسِ يَحْسِبُ عَوْفٌ أَنَّ اسْمَهُ قَيْسُ بْنُ النُّعْمَانِ فَقَالَ " لاَ تَشْرَبُوا فِي نَقِيرٍ وَلاَ مُزَفَّتٍ وَلاَ دُبَّاءٍ وَلاَ حَنْتَمٍ وَاشْرَبُوا فِي الْجِلْدِ الْمُوكَإِ عَلَيْهِ فَإِنِ اشْتَدَّ فَاكْسِرُوهُ بِالْمَاءِ فَإِنْ أَعْيَاكُمْ فَأَهْرِيقُوهُ " .
আবুল কামূস যায়িদ ইবনু ‘আলী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আবদুল ক্বায়িস গোত্রের প্রতিনিধি দলের সাথে যারা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসেছিল তাদেরই একজন আমাকে এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। ‘আওফের ধারণা তার নাম ক্বায়িস ইবনুল নু’মান। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কাঠের পাত্রে, তৈলাক্ত পাত্রে, লাউয়ের খোলের পাত্রে এবং মাটির সবুজ পাত্রে পান করো না। যদি তা (নাবীয) কড়া হয়ে যায় তবে পানি মিশিয়ে এর তেজী ভাব দূর করো। যদি কড়া কমাতে না পারো তবে তা ঢেলে ফেলে দাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل أبي القموص زيد بن علي. عوف: هو ابن أبي جميلة الأعرابي، وخالد: هو ابن عبد الله الواسطي الطحان. وأخرجه أحمد (١٧٨٢٩)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ، ١/ ٢٩٧ - ٢٩٨. وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٩٣٤)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار، ٤/ ٢٢١، وابن قانع ٢/ ٣٤٦، والبيهقي ٨/ ٣٠٢ من طريق عوف الأعرابي، به. ويشهد له حديث ابن عباس الآتي بعده والسالف برقم (٣٦٩٢). وحديث أبي هريرة السالف برقم (٣٦٩٣).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ بَذِيمَةَ، حَدَّثَنِي قَيْسُ بْنُ حَبْتَرٍ النَّهْشَلِيُّ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ وَفْدَ عَبْدِ الْقَيْسِ، قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ فِيمَ نَشْرَبُ قَالَ " لاَ تَشْرَبُوا فِي الدُّبَّاءِ وَلاَ فِي الْمُزَفَّتِ وَلاَ فِي النَّقِيرِ وَانْتَبِذُوا فِي الأَسْقِيَةِ " . قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ فَإِنِ اشْتَدَّ فِي الأَسْقِيَةِ قَالَ " فَصُبُّوا عَلَيْهِ الْمَاءَ " . قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ . فَقَالَ لَهُمْ فِي الثَّالِثَةِ أَوِ الرَّابِعَةِ " أَهْرِيقُوهُ " . ثُمَّ قَالَ " إِنَّ اللَّهَ حَرَّمَ عَلَىَّ أَوْ حُرِّمَ الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْكُوبَةُ " . قَالَ " وَكُلُّ مُسْكِرٍ حَرَامٌ " . قَالَ سُفْيَانُ فَسَأَلْتُ عَلِيَّ بْنَ بَذِيمَةَ عَنِ الْكُوبَةِ قَالَ الطَّبْلُ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আবদুল ক্বায়িসের প্রতিনিধি দল বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কিসে করে পান করবো? তিনি বলেনঃ তোমরা লাউয়ের খোলের পাত্রে, তৈলাক্ত পাত্রে এবং কাঠের পাত্রে পান করবে না। তোমাদের কলসে নাবীয প্রস্তুত করো। তারা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! কলসের নাবীযে যদি তেজী ভাব আসে? তিনি বলেনঃ তাতে পানি ঢেলে দাও। তারা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! (পূর্বের অনুরূপ)! তিনি তাদেরকে তৃতীয় বা চতুর্থবারে বললেনঃ তা ঢেলে ফেলে দাও। অতঃপর তিনি বললেনঃ নিশ্চয়ই আল্লাহ আমার উপর হারাম করেছেন অথবা হারাম করা হয়েছে মদ, জুয়া এবং যাবতীয় বাদ্যযন্ত্র। তিনি আরো বলেনঃ নেশা উদ্রেককারী সকল জিনিস হারাম। সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি ‘আলী ইবনু বাযীমাকে ‘কুবাহ’ সম্পর্কে প্রশ্ন করলে তিনি বলেন, তা হলো তবলা বা ঢোল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4503)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن سعيد الثورى، وأبو أحمد: هو محمد بن عبد الله بن الزبير الأسدي. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٢٤٧٦)، وفي "الأشربة" (١٩٢ - ١٩٤) وأبو يعلى (٢٧٢٩)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٢٢٣، وابن حبان (٥٣٦٥)، والبيهقي ١٠/ ٢٢١ من طريق أبي أحمد الزُّبيري، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (١٢٥٩٨) و (١٢٥٩٩)، والبيهقي ٨/ ٣٠٣ من طريق إسرائيل، عن علي بن بذيمة، به. وأخرج قوله: "كل مسكر حرام" الطبراني (١٢٦٠٠) من طريق موسى بن أعين، عن علي بن بذيمة، عن سعيد بن جبير، عن قيس بن حبتر، به. وأخرج قوله: "إن الله حرّم الخمر والميسر والكوبة، وكل مسكر حرام" أحمد في "مسنده" (٢٦٢٥) و (٣٢٧٤)، وفي "الأشربة، (١٤)، والطحاوي ٤/ ٢١٦، والبيهقي ١٠/ ٢٢١ من طريق عبد الكريم بن مالك الجزري، عن قيس بن حبتر، به. وانظر ما سلف بالرقمين (٣٦٩٠) و (٣٦٩٢). وللكلام على الكوبة انظر حديث عبد الله بن عمرو السالف برقم (٣٦٨٥).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ سُمَيْعٍ، حَدَّثَنَا مَالِكُ بْنُ عُمَيْرٍ، عَنْ عَلِيٍّ، عَلَيْهِ السَّلاَمُ قَالَ نَهَانَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الدُّبَّاءِ وَالْحَنْتَمِ وَالنَّقِيرِ وَالْجِعَةِ .
‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে লাউয়ের খোলের পাত্র, মাটির সবুজ পাত্র, ও কাঠের পাত্র ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন এবং জি’আহ নামক নাবীয পান করতেও নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، أخرجہ النسائي (5173، مالک بن عمیر اختلف في صحبتہ وروی لہ الضیاء المقدسي فی الأحادیث المختارۃ فھو حسن الحدیث، ورواہ عن صعصعۃ بن صوحان فالسند متصل)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي، مالك بن عمير تابعي مخضرم أدرك الجاهلية حتى عدَّه يعقوب ابن سفيان في الصحابة، وقد سمع علي بن أبي طالب فيما أشار إليه الدارقطني في "العلل" ٣/ ٢٤٦ حيث صحح رواية من قال: عن مالك بن عمير قال: كنت جالساً عند علي فجاءه صعصعة بن صوحان - يعني بهذا الحديث، وفي ذلك رد على ما زعمه أبو زرعة الرازي فيما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" ص ٢٢١ أن روايته عن علي مرسلة. عبد الواحد: هو ابن زياد. وأخرجه النسائي (٥١٧٠) من طريق مروان بن معاوية و (٥١٧١) و (٥٦١٢) من طريق عبد الواحد كلاهما عن إسماعيل بن سميع، به. وأخرجه النسائي كذلك (٥١٦٩) من طريق إسرائيل، عن إسماعيل بن سميع، عن مالك بن عمير، عن صعصعة بن صوحان، قال: قلت لعلي: انهنا عما نهاك عنه رسول الله … فذكر الحديث قال النسائي: حديث مروان وعبد الواحد أولى بالصواب من حديث إسرائيل. قلنا: وبنحو كلام النسائي هذا قال الدارقطني في "علله" ٣/ ٢٤٦. وهو في "مسند أحمد" (٩٦٣) و (١١٦٢) و (١١٦٣). وأخرجه النسائي (٥١٦٨) و (٥٦١١) من طريق عمار بن رُزَيق، عن أبي إسحاق، عن صعصعة بن صوحان، عن علي. قال الدارقطني في "علله" ٣/ ٢٤٦: هذا غريب من حديث أبي إسحاق. وأخرجه الترمذي (٣٠١٦)، والنسائي (٥١٦٥) من طريق أبي الأحوص، والنسائي (٥١٦٧) من طريق زهير بن معاوية، كلاهما عن أبي إسحاق، عن هُبيرة بن يَريم، عن علي بذكر النهي عن الجِعة. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وقد جاء في رواية النسائي من طريق زهير: وعن الجِعة: شراب يصنع من الشعير والحنطة.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا مُعَرِّفُ بْنُ وَاصِلٍ، عَنْ مُحَارِبِ بْنِ دِثَارٍ، عَنِ ابْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " نَهَيْتُكُمْ عَنْ ثَلاَثٍ وَأَنَا آمُرُكُمْ بِهِنَّ نَهَيْتُكُمْ عَنْ زِيَارَةِ الْقُبُورِ فَزُورُوهَا فَإِنَّ فِي زِيَارَتِهَا تَذْكِرَةً وَنَهَيْتُكُمْ عَنِ الأَشْرِبَةِ أَنْ تَشْرَبُوا إِلاَّ فِي ظُرُوفِ الأَدَمِ فَاشْرَبُوا فِي كُلِّ وِعَاءٍ غَيْرَ أَنْ لاَ تَشْرَبُوا مُسْكِرًا وَنَهَيْتُكُمْ عَنْ لُحُومِ الأَضَاحِي أَنْ تَأْكُلُوهَا بَعْدَ ثَلاَثٍ فَكُلُوا وَاسْتَمْتِعُوا بِهَا فِي أَسْفَارِكُمْ " .
ইবনু বুরাইদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আমি তোমাদেরকে তিনটি বিষয় হতে বিরত থাকতে বলেছিলাম। এখন আমি সেসব বিষয়ে তোমাদেরকে অনুমতি দিচ্ছি। আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম। এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। কেননা তা দর্শনে (মৃত্যুকে) স্মরণ হয়। আমি তোমাদেরকে পানপাত্র সম্পর্কে নিষেধ করেছিলাম যে, তোমরা চামড়ার পাত্রে নাবীয পান করবে। এখন তোমরা যে কোন পাত্রে পান করতে পারো। কিন্তু তোমরা কখনও মাদক দ্রব্য পান করো না। আমি তোমাদের উপর কুরবানীর গোশতের ব্যাপারে তা তিন দিনের পর না খেতে বলেছিলাম। এখন তোমরা তা (দীর্ঘদিন) খেতে পারো এবং তোমাদের সফরে তা কাজে লাগাতে পারো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (977)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن بريدة: هو عبد الله. وأخرجه مسلم (٩٧٧)، وبإثر (١٩٧٥) و (١٩٩٩)، والنسائي (٢٠٣٢) و (٤٤٢٩) و (٥٦٥٢) و (٥٦٥٣) من طريق محارب بن دثار، به. وقد سمي ابن بريدة في بعض الروايات عبد الله. وأخرجه مسلم (٩٧٧) من طريق عطاء الخراساني، والنسائي (٢٠٣٣) من طريق المغيرة بن سبيع، و (٥٦٥٤) من طريق حماد بن أبي سليمان، و (٥٦٥٥) من طريق عيسى بن عبيد الكندي، أربعتهم بن عبد الله بن بريدة، عن أبيه. واقتصر بعضهم على ذكر الرخصة في الانتباذ في الأوعية واجتناب المسكر. وأخرجه مسلم (٩٧٧) وبإثر (١٩٧٥) و (١٩٩٩)، والترمذي (١٥٨٧) و (١٩٧٧) من طريق علقمة بن مرثد، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه. فذكر سيمان بدل أخيه عبد الله، وجاء في بعض الروايات: ابن بريدة غير مقيد. والحديث عند الترمذي مقطَّع. وأخرجه ابن ماجه (٣٤٠٥) من طريق القاسم بن مخيمرة، والنسائي (٤٤٣٠) و (٥٦٥١) من طريق الزبير بن عدي، كلاهما عن ابن بريدة، عن أبيه. هكذا قالا: ابن بريدة غير مقيد. والذي جاء في "تهذيب الكمال" للمزي أن القاسم روى عن سليمان بن بريدة، والزبير روى عن عبد الله، واقتصر ابن ماجه على ذكر الإذن في الانتباذ. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٩٥٨) و (٢٣٠١٦)، و"صحيح ابن حبان" (٣١٦٨) و (٥٣٩٠). وقد سلف الاذن في زيارة القبور بهذا الإسناد عند المصنف برقم (٣٢٣٥).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ سُفْيَانَ، حَدَّثَنِي مَنْصُورٌ، عَنْ سَالِمِ بْنِ أَبِي الْجَعْدِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ لَمَّا نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الأَوْعِيَةِ قَالَ قَالَتِ الأَنْصَارُ إِنَّهُ لاَ بُدَّ لَنَا . قَالَ " فَلاَ إِذًا " .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বিভিন্ন পাত্র সম্পর্কে নিষেধাজ্ঞা আরোপ করলেন, তখন আনসারগণ বললেন, এছাড়া আমাদের একেবারেই চলেনা। তিনি বলেনঃ তাহলে আপত্তি নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5592)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. منصور: هو ابن المعتمر: وسفيان: هو الثوري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (٥٥٩٢)، والترمذي (١٩٧٨)، والنسائي (٥٦٥٦) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٤٤). وقوله: "فلا إذن" أي: فلا أنهاكم عنها إذن.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ زِيَادٍ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ زِيَادِ بْنِ فَيَّاضٍ، عَنْ أَبِي عِيَاضٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، قَالَ ذَكَرَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الأَوْعِيَةَ الدُّبَّاءَ وَالْحَنْتَمَ وَالْمُزَفَّتَ وَالنَّقِيرَ فَقَالَ أَعْرَابِيٌّ إِنَّهُ لاَ ظُرُوفَ لَنَا . فَقَالَ " اشْرَبُوا مَا حَلَّ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুব্বা, হানতাম, মুযাফ্ফাত, নাকীর ইত্যাদি পাত্রের কথা উল্লেখ করলেন (ব্যবহার করতে বারণ করলেন)। তখন এক বেদুঈন বললো, এছাড়া আমাদের অন্য কোন পাত্র নেই। তিনি বলেনঃ যা হালাল তা পান করো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5593) صحیح مسلم (2000)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لسوء حفظ شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- وقد توبع. أبو عياض: هو عمرو بن الأسود. وأخرجه البخاري (٥٥٩٣)، ومسلم (٢٠٠٠)، والنسائي (٥٦٥٠) من طريق سليمان الاحول، عن مجاهد، عن أبي عياض، عن عبد الله بن عمرو رضي الله عهما قال: لما نهى النبي ﷺ عن الأسقية قيل للنبي: ليس كلُّ الناس يجد سقاء، فرخص لهم في الجرِّ غير المزفَّت. وهو في "مسند أحمد" (٦٤٩٧). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ، - يَعْنِي ابْنَ عَلِيٍّ - حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، بِإِسْنَادِهِ قَالَ " اجْتَنِبُوا مَا أَسْكَرَ " .
শারীক (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি তার সানাদে বর্ণনা করেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা নেশা উদ্রেককারী বস্তু বর্জন করো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3700)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح كسابقه.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كَانَ يُنْبَذُ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سِقَاءٍ فَإِذَا لَمْ يَجِدُوا سِقَاءً نُبِذَ لَهُ فِي تَوْرٍ مِنْ حِجَارَةٍ .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর জন্য মশকে নাবীয ঢালা হতো। মশক না পাওয়া গেলে পাথরের তৈরী পাত্রে তাঁর জন্য নাবীয ঢালা হতো l
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1998)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- قد صرح بسماعه من جابر عند أحمد (٤٩١٤)، ومسلم (١٩٩٩) وغيرهما، فانتفت شبهة تدليسه. زهير: هو ابن معاوية الجُعفي. وأخرجه مسلم (١٩٩٩)، وابن ماجه (٣٤٠٠)، والنسائي (٥٦٤٧) و (٥٦٤٨) من طرق عن أبي الزبير، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٩١٤) و (١٤٢٦٧)، و"صحيح ابن حبان" (٥٤١٣). قوله: تَور: هو إناء صغير من صُفْر أو حجارة يُشرَبُ منه، وقد يُتوضأ منه.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ أَبِي رَبَاحٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ نَهَى أَنْ يُنْتَبَذَ الزَّبِيبُ وَالتَّمْرُ جَمِيعًا وَنَهَى أَنْ يُنْتَبَذَ الْبُسْرُ وَالرُّطَبُ جَمِيعًا
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুর ও আঙ্গুরের সমন্বয়ে নাবীয তৈরী করতে বারণ করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাঁচা ও পাকা খেজুর একত্রে করেও নাবীয বানাতে বারণ করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5601) صحیح مسلم (1986)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الليث: هو ابن سعْد. وأخرجه البخاري (٥٦٠١) في الأشربة: باب من رأى أن لا يخلط البسر والتمر إذا كان مسكراً، وأن لا يجعل إدامين في إدام، ومسلم (١٩٨٦)، وابن ماجه بإثر (٣٣٩٥)، والترمذي (١٩٨٤)، والنسائى (٥٥٥٦) من طرق عن عطاء بن أبي رباح، به. وأخرجه مسلم (١٩٨٦)، وابن ماجه (٣٣٩٥)، والنسائي (٥٥٦٢) من طريق الليث بن سعد، عن أبي الزبير المكي، والنسافى (٥٥٦٠) من طريق عمرو بن دينار، كلاهما (أبو الزبير وعمرو بن دينار) عن جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٣٤) و (١٥١٧٧)، و"صحيح ابن حبان" (٥٣٧٩). وأخرج النسائي (٥٥٤٦) من طريق الأعمش، عن محارب بن دثار، عن جابر رفعه: "الزبيب والتمر هو الخمر". وأخرج كذلك (٥٥٤٤) من طريق شعبة، و (٥٥٤٥) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن محارب بن دثار، عن جابر موقوفاً عليه: البسر والتمر خمر. قال الخطابي: قد ذهب غير واحد من أهل العلم إلى تحريم الخليطين وإن لم يكن الشراب المتخذ منها مسكراً قولاً بظاهر الحديث، ولم يجعلوه معلولاً بالإسكار، وإليه ذهب عطاء وطاووس، وبه قال مالك وأحمد بن حنبل وإسحاق وعامة أهل الحديث، وهو غالب مذهب الشافعي، وقالوا: إذا شرب الخليطين قبل حدوث الشدة فهو آثم من جهة واحدة، وإذا شرب بعد حدوث الشدة كان آثماً من جهتين، أحدهما: شرب الخليطين، والآخر: شرب المسكر، ورخص فيه سفيان الثوري وأبو حنيفة وأصحابه، وقال الليث بن سعْد: إنما جاءت الكراهة أن يُنبذا جميعاً، لأن أحدهما يشدُّ صاحبَه. وانظر "فح الباري" ١٠/ ٦٧. وقال أبو بكر بن العربي: ثبت تحريم الخمر لما يحدث عنها من السكر، وجواز النبيذ الحلو الذي لا يحدث عنه سكر، وثبت النهي عن الانتباذ في الأوعية ثم نسخ، وعن الخليطين، فاختلف العلماء، فقال أحمد وإسحاق وأكثر الشافعية بالتحريم ولو لم يسكر، وقال الكوفيون بالحل.
حَدَّثَنَا أَبُو سَلَمَةَ، مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ حَدَّثَنَا أَبَانُ، حَدَّثَنِي يَحْيَى، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي قَتَادَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّهُ نَهَى عَنْ خَلِيطِ الزَّبِيبِ، وَالتَّمْرِ، وَعَنْ خَلِيطِ الْبُسْرِ، وَالتَّمْرِ، وَعَنْ خَلِيطِ الزَّهْوِ، وَالرُّطَبِ، وَقَالَ، " انْتَبِذُوا كُلَّ وَاحِدٍ عَلَى حِدَةٍ " . قَالَ وَحَدَّثَنِي أَبُو سَلَمَةَ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِي قَتَادَةَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِهَذَا الْحَدِيثِ .
আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিশমিশ ও শুকনো খেজুর একত্রে মিশিয়ে এবং কাঁচা ও পাকা খেজুর একত্রে মিশিয়ে এবং পাকা রং ধারণকৃত ও শুকনো খেজুর একত্রে মিশিয়ে পানীয় বানাতে নিষেধ করেছেন। তিনি বলেছেনঃ প্রতিটি ফল দিয়ে ভিন্ন ভিন্নভাবে তোমরা নাবীয বানাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5602) صحیح مسلم (1988)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيى: هو ابن أبي كثير، وأبان: هو ابن يزيد العطار. وأخرجه البخاري (٥٦٠٢)، ومسلم (١٩٨٨)، وابن ماجه (٣٣٩٧)، والنسائي (٥٥٥١) و (٥٥٦١) و (٥٥٦٦) و (٥٥٦٧) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله ابن أبي قتادة، عن أبيه. وأخرجه مسلم (١٩٨٨)، والنسائي (٥٥٥٢) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي قتادة. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٥٢١) و (٢٢٦١٨).
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، وَحَفْصُ بْنُ عُمَرَ النَّمَرِيُّ، قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنِ ابْنِ أَبِي لَيْلَى، - عَنْ رَجُلٍ، - قَالَ حَفْصٌ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ نَهَى عَنِ الْبَلَحِ وَالتَّمْرِ وَالزَّبِيبِ وَالتَّمْرِ .
ইবনু আবূ লাইলাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে জনৈক ব্যক্তি সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর একদল সাহাবী নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি কাঁচা ও পাকা খেজুর একত্রে মিশিয়ে এবং আঙ্গুর ও খেজুর একত্রে মিশিয়ে নাবীয তৈরি করতে নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (5549 وسندہ صحیح) الحکم بن عتیبۃ صرح بالسماع عند أحمد (4/314) وروایۃ شعبۃ عن المدلسین محمولۃ بالسماع
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن أبي ليلى: هو عبد الرحمن، والحكم: هو ابن عُتيبة. وأخرجه النسائي (٥٥٤٧) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٨٢٠).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ ثَابِتِ بْنِ عُمَارَةَ، حَدَّثَتْنِي رَيْطَةُ، عَنْ كَبْشَةَ بِنْتِ أَبِي مَرْيَمَ، قَالَتْ سَأَلْتُ أُمَّ سَلَمَةَ مَا كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَنْهَى عَنْهُ قَالَتْ كَانَ يَنْهَانَا أَنْ نَعْجُمَ النَّوَى طَبْخًا أَوْ نَخْلِطَ الزَّبِيبَ وَالتَّمْرَ .
কাবশাহ বিনতু আবূ মারইয়াম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উম্মু সালামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–কে প্রশ্ন করলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন বস্তু থেকে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন, তিনি আমাদের খেজুরের আঁটি পাকাতে নিষেধ করেছেন এবং কাঁচা ও পাকা খেজুর একত্রে মিশ্রিত করে নাবীয তৈরি করতে নিষেধ করেছেন। [৩৭০৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ریطۃ: لا تعرف،وکبشۃ بنت أبي مریم،لا یعرف حالھا (تقریب التہذیب: 8592،8670) ، (انوار الصحیفہ ص 132)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: قولها: "نخلط الزبيب والتمر" صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة كبشة بنت أبي مريم ورَيطة -وهي بنت حريث-، فلم يؤثر توثيقهما عن أحد، وجهلهما الحافظ في "التقريب". وأخرجه أحمد (٢٦٥٠٥)، وأبو يعلى (٦٩٨٤)، والطبراني في "الكبير" ٢٣/ ٨٧٩ و (٨٨٠)، والبيهقي ٨/ ٣٠٧، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة ريطة من طريق ريطة بنت حريث، به. ويشهد لقولها: "نخلط الزبيب والتمر" الأحاديث السالفة في هذا الباب. قال الخطابي: قولها: "نعجم النوى طبخاً، يريد أن نبلغ به النضج إذا طبخنا التمر فعصدناه. يقال: عجمتُ النوى أعجُمه عجما إذا لُكته في فيك، وكذلك إذا أنت طبخته أو أنضجته، ويشبه أن يكون إنما كره ذلك من أجل أنه يفسد طعم التمر أو لأنه علف الدواجن، فتذهب قوته إذا هو نضج.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ دَاوُدَ، عَنْ مِسْعَرٍ، عَنْ مُوسَى بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ امْرَأَةٍ، مِنْ بَنِي أَسَدٍ عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُنْبَذُ لَهُ زَبِيبٌ فَيُلْقِي فِيهِ تَمْرًا وَتَمْرٌ فَيُلْقِي فِيهِ الزَّبِيبَ .
‘আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আঙ্গুরের নাবীয তৈরি করা হতো, অতঃপর তাতে খেজুর ছেড়ে দেয়া হতো বা খেজুরের নাবীয তৈরি করা হতো এবং তাতে আঙ্গুর ছেড়ে দেয়া হতো। [৩৭০৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، امرأۃ من بني أسد: مجہولۃ کما قال المنذري (انظر عون المعبود 384/3) ، (انوار الصحیفہ ص 132)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لإبهام المرأة الأسدية، وقد اختُلف فيه على مسعر -وهو ابن كدام- كما أوضحناه في "مسند أحمد" (٢٤١٩٨). وأخرجه البيهقي ٨/ ٣٠٧ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٧٨٢٨) من طريق حميد بن سليمان، عن مجاهد، عن عائشة. وإسناده ضعيف لجهالة حميد بن سليمان. وسيأتي الحديث عن عائشة بلفظ آخر ليس فيه خلط شيئين عند المصنف برقم (٣٧١١). وانظر ما بعده. وانظر تمام الكلام عليه وتخريجه وبيان ألفاظه في "مسند أحمد" (٢٤١٩٨).
حَدَّثَنَا زَيَادُ بْنُ يَحْيَى الْحَسَّانِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو بَحْرٍ، حَدَّثَنَا عَتَّابُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ الْحِمَّانِيُّ، حَدَّثَتْنِي صَفِيَّةُ بِنْتُ عَطِيَّةَ، قَالَتْ دَخَلْتُ مَعَ نِسْوَةٍ مِنْ عَبْدِ الْقَيْسِ عَلَى عَائِشَةَ فَسَأَلْنَاهَا عَنِ التَّمْرِ وَالزَّبِيبِ فَقَالَتْ كُنْتُ آخُذُ قَبْضَةً مِنْ تَمْرٍ وَقَبْضَةً مِنْ زَبِيبٍ فَأُلْقِيهِ فِي إِنَاءٍ فَأَمْرُسُهُ ثُمَّ أَسْقِيهِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم .
সাফিয়্যাহ বিনতু ‘আত্বিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘আবদুল ক্বায়িস গোত্রের মহিলাদের সঙ্গে আমি ‘‘আয়িশাহ্হ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট উপস্থিত হলাম। আমরা তাকে খেজুর ও আঙ্গুর মিশ্রিত শরবত সম্পর্কে প্রশ্ন করলে তিনি বলেন, আমি এক মুষ্টি খেজুর ও এক মুষ্টি আঙ্গুর একটি পাত্রে ঢালতাম। তা আঙ্গুল দিয়ে চেপে রস বের করতাম, অতঃপর তা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে পান করাতাম। [৩৭০৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، صفیۃ بنت عطیۃ لا تعرف (تق: 8625) وأبو بحر عبد الرحمٰن بن عثمان البکراوي ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 132)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة صفية بنت عطية، وضعف أبي بحر -وهو عبد الرحمن ابن عثمان البكراوي-. وأخرجه البيهقي ٨/ ٣٠٨ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. والصحيح عن عائشة ما سيأتي برقم (٣٧١١). قال الخطابي: قولها: "أمرسه" تريد أنها تدلكه باصابعها في الماء، والمرس والمرث بمحنى واحد.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ هِشَامٍ، حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ جَابِرِ بْنِ زَيْدٍ، وَعِكْرِمَةَ، أَنَّهُمَا كَانَا يَكْرَهَانِ الْبُسْرَ وَحْدَهُ وَيَأْخُذَانِ ذَلِكَ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ . وَقَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ أَخْشَى أَنْ يَكُونَ الْمُزَّاءَ الَّذِي نُهِيَتْ عَنْهُ عَبْدُ الْقَيْسِ . فَقُلْتُ لِقَتَادَةَ مَا الْمُزَّاءُ قَالَ النَّبِيذُ فِي الْحَنْتَمِ وَالْمُزَفَّتِ .
ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে জাবির ইবনু যায়িদ ও ‘ইকরামাহ্ সূত্র হতে বর্ণিত, তারা দু’জনেই কেবল কাঁচা খেজুরের তৈরী শরবত অপছন্দ করতেন। তারা ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এটা বর্ণনা করেন। ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার আশংকা হচ্ছে- এটা যেন মুয্যাআ না হয়। কেননা ‘আবদুল ক্বায়িস গোত্রকে তা পান করতে নিষেধ করা হয়েছে। (বর্ণনাকারী হিশাম বলেন), আমি ক্বাতাদাহ্কে বললাম, ‘মুয্যাআ’ কি? তিনি বলেন, মাটির সবুজ পাত্রে ও তৈলাক্ত পাত্রে ভিজানো নাবীয।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قتادۃ مدلس وعنعن ، وحدیث النسائي (5573) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 132)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. قتادة: هو ابن دِعامة السَّدوسي، وهشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّستُوائي. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٢٨٣٠) و (٣٠٩٥)، وفي "الأشربة" (٢١٧) والطبراني في "المعجم "الكبير"، (١١٨٣٧) من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، عن عكرمة وحده، عن ابن عباس.
حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا ضَمْرَةُ، عَنِ السَّيْبَانِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الدَّيْلَمِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ أَتَيْنَا رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْنَا يَا رَسُولَ اللَّهِ قَدْ عَلِمْتَ مَنْ نَحْنُ وَمِنْ أَيْنَ نَحْنُ فَإِلَى مَنْ نَحْنُ قَالَ " إِلَى اللَّهِ وَإِلَى رَسُولِهِ " . فَقُلْنَا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ لَنَا أَعْنَابًا مَا نَصْنَعُ بِهَا قَالَ " زَبِّبُوهَا " . قُلْنَا مَا نَصْنَعُ بِالزَّبِيبِ قَالَ " انْبِذُوهُ عَلَى غَدَائِكُمْ وَاشْرَبُوهُ عَلَى عَشَائِكُمْ وَانْبِذُوهُ عَلَى عَشَائِكُمْ وَاشْرَبُوهُ عَلَى غَدَائِكُمْ وَانْبِذُوهُ فِي الشِّنَانِ وَلاَ تَنْبِذُوهُ فِي الْقُلَلِ فَإِنَّهُ إِذَا تَأَخَّرَ عَنْ عَصْرِهِ صَارَ خَلاًّ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু দায়লামী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্রে হতে বর্ণিত, তিনি (পিতা) বলেন, একদা আমার নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলি, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি জানেন যে, আমরা কারা, কোথাকার অধিবাসী এবং কার নিকট এসেছি। তিনি বললেনঃ আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের নিকট এসেছো। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের এখানে আঙ্গুর উৎপাদিত হয়। আমরা এগুলো কি করবো? তিনি বলেনঃ এগুলো শুকিয়ে কিশমিশ বানাও। আমরা বললাম, কিশমিশ দিয়ে কি করবো? তিনি বলেনঃ শরবত তৈরীর জন্য তা সকালে ভিজাবে এবং রাতে পান করবে অথবা রাতে ভিজাবে এবং সকালে পান করবে। তা চামড়ার মশকে ভিজাবে। মাটির কলসীতে অথবা বড় পাত্রে নাবীয বানাবে না। কেননা নিংড়াতে দেরী হলে তা সিরকায় পরিণত হবে। [৩৭১০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (5739 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الديلمي: هو. فيروز، والسَّيباني: هو يحيى بن أبي عمرو، وضمرة: هو ابن ربيعة الفلسطيني. وأخرجه النسائي (٥٧٣٥) و (٥٧٣٦) من طريقين عن يحيى بن أبي عمرو السيباني، به. وهو في "مسند أحمد" (١٨٠٤٢). قال الخطابي: "الشِّنان": الأسقية من الأدم وغيرها واحدها شَنٌّ، وأكثر ما يقال ذلك في الجلد الرقيق أو البالي من الجلود، و"القُلل": الجرار الكبار واحدتها قُلَّة، ومنه الحديث: "إذا بلغ الماء قلتين لم يحمل خبثاً".
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنِي عَبْدُ الْوَهَّابِ بْنُ عَبْدِ الْمَجِيدِ الثَّقَفِيُّ، عَنْ يُونُسَ بْنِ عُبَيْدٍ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ أُمِّهِ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ كَانَ يُنْبَذُ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سِقَاءٍ يُوكَأُ أَعْلاَهُ وَلَهُ عَزْلاَءُ يُنْبَذُ غُدْوَةً فَيَشْرَبُهُ عِشَاءً وَيُنْبَذُ عِشَاءً فَيَشْرَبُهُ غُدْوَةً .
‘আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য একটি পাত্রে নাবীয বানানো হতো, তার উপরের মুখ বন্ধ করে দেয়া হতো এবং এর নীচের দিকেও মুখ ছিল। তাঁর জন্য সকালে যে নাবীয বানানো হতো তিনি রাতের বেলা তা পান করতেন। আবার রাতে যে নাবীয বানানো হতো তিনি তা সকালে পান করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2005)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. واسم أم الحسن -وهو البصري- خَيرة. وأخرجه مسلم (٢٠٠٥)، والترمذي (١٩٧٩) عن محمد بن المثنى، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه مسلم (٢٠٠٥)، والنسائي (٥٦٣٨) من طريق ثمامة بن حزن، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤١٩٨) و (٢٤٩٣٠)، و "صحيح ابن حبان" (٥٣٨٥). وانظر ما سلف برقم (٣٧٠٧) و (٣٧٠٨). وانظر ما بعده. يوكأ: يُربط، والعزلاء: فم المزادة، وقد يكون ذلك للسقاء من أسفله، ويجمع على العزالي.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا الْمُعْتَمِرُ، قَالَ سَمِعْتُ شَبِيبَ بْنَ عَبْدِ الْمَلِكِ، يُحَدِّثُ عَنْ مُقَاتِلِ بْنِ حَيَّانَ، قَالَ حَدَّثَتْنِي عَمَّتِي، عَمْرَةُ عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّهَا كَانَتْ تَنْبِذُ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم غُدْوَةً فَإِذَا كَانَ مِنَ الْعَشِيِّ فَتَعَشَّى شَرِبَ عَلَى عَشَائِهِ وَإِنْ فَضَلَ شَىْءٌ صَبَبْتُهُ - أَوْ فَرَغْتُهُ - ثُمَّ تَنْبِذُ لَهُ بِاللَّيْلِ فَإِذَا أَصْبَحَ تَغَدَّى فَشَرِبَ عَلَى غَدَائِهِ قَالَتْ نَغْسِلُ السِّقَاءَ غُدْوَةً وَعَشِيَّةً فَقَالَ لَهَا أَبِي مَرَّتَيْنِ فِي يَوْمٍ قَالَتْ نَعَمْ .
‘আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য সকালে নাবীয তৈরি করতেন। যখন রাত হতো তিনি তা পান করতেন। কিছু উদ্বৃত্ত থাকলে তিনি তা ঢেলে ফেলে দিতেন বা শেষ করে দিতেন। অতঃপর তিনি রাতে নাবীয তৈরি করতেন। যখন সকাল হতো তিনি তা পান করতেন। ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি সকাল-সন্ধ্যায় নাবীয পাত্র ধুয়ে নিতাম। মুকাতিল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমার পিতা তাকে বললেন, দৈনিক দুইবার? তিনি বলেন, হাঁ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، دون قولها: "وإن فضل شيء صببتُه -أو فرَّغته-" وهذا إسناد ضعيف لجهالة حال عمرة عمة مقاتل بن حيان النبطي لكن روي الحديث من طريق آخر صحيح كما في الحديث السالف قبله. ثم إن النبي ﷺ كان يشرب النبيذ ثلاثة أيام ثم يسقيه بعد ذلك الخدم أو يهراق كما في حديث ابن عباس الآتي بعده. وأخرجه أحمد (٢٤٩٣٠)، والبخاري في "تاريخه"الكبير"٤/ ٢٣٢، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي ﷺ " ص ٢١٠، والبيهقي ٨/ ٣٠٠، والخطيب في "تاريخه" ١٢/ ٤٧٠ من طريق شبيب بن عبد الملك التيمي، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا مَخْلَدُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي عُمَرَ، يَحْيَى الْبَهْرَانِيِّ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كَانَ يُنْبَذُ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم الزَّبِيبُ فَيَشْرَبُهُ الْيَوْمَ وَالْغَدَ وَبَعْدَ الْغَدِ إِلَى مَسَاءِ الثَّالِثَةِ ثُمَّ يَأْمُرُ بِهِ فَيُسْقَى الْخَدَمَ أَوْ يُهَرَاقُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ مَعْنَى يُسْقَى الْخَدَمَ يُبَادَرُ بِهِ الْفَسَادُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ أَبُو عُمَرَ يَحْيَى بْنُ عُبَيْدٍ الْبَهْرَانِيُّ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আঙ্গুরের নাবীয বানানো হতো। তিনি তা সারা দিন পান করতেন, দ্বিতীয় দিন এবং তৃতীয় দিনও বিকাল পর্যন্ত পান করতেন। অতঃপর তিনি আদেশ দিলে অবশিষ্ট শরবত খাদেমদেরকে পান করানো হতো কিংবা ফেলে দেয়া হতো। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, খাদেমদের পান করানোর অর্থ হলো, তাতে নেশা প্রকাশ পাওয়ার আগে তারা তা পান করতো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2004)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو معاوية: هو محمد ابن خازم الضرير. وأخرجه مسلم (٢٠٠٤)، وابن ماجه (٣٣٩٩)، والنسائي (٥٧٣٨) و (٥٧٣٩) من طرق عن يحيى بن عُبيد البَهْراني، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٦٣)، و"صحيح ابن حبان" (٥٣٨٤) و (٥٣٨٦). وقوله: يسقى الخدم يبادر به الفساد، أي: يسقى الخدم قبل أن يفسد ويسكر.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالَ قَالَ ابْنُ جُرَيْجٍ عَنْ عَطَاءٍ، أَنَّهُ سَمِعَ عُبَيْدَ بْنَ عُمَيْرٍ، قَالَ سَمِعْتُ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم تُخْبِرُ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَمْكُثُ عِنْدَ زَيْنَبَ بِنْتِ جَحْشٍ فَيَشْرَبُ عِنْدَهَا عَسَلاً فَتَوَاصَيْتُ أَنَا وَحَفْصَةُ أَيَّتُنَا مَا دَخَلَ عَلَيْهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَلْتَقُلْ إِنِّي أَجِدُ مِنْكَ رِيحَ مَغَافِيرَ فَدَخَلَ عَلَى إِحْدَاهُنَّ فَقَالَتْ لَهُ ذَلِكَ فَقَالَ " بَلْ شَرِبْتُ عَسَلاً عِنْدَ زَيْنَبَ بِنْتِ جَحْشٍ وَلَنْ أَعُودَ لَهُ " . فَنَزَلَتْ { لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ تَبْتَغِي } إِلَى { إِنْ تَتُوبَا إِلَى اللَّهِ } لِعَائِشَةَ وَحَفْصَةَ رضى الله عنهما { وَإِذْ أَسَرَّ النَّبِيُّ إِلَى بَعْضِ أَزْوَاجِهِ حَدِيثًا } لِقَوْلِهِ " بَلْ شَرِبْتُ عَسَلاً " .
‘উবাইদ ইবনু ‘উমাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেতে শুনেছিঃ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাইনাব বিনতু জাহ্শ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে আসতেন এবং সেখানে মধু খেতেন। একদিন আমি ও হাফসাহ পরামর্শ করলাম যে, আমাদের দু’জনের যার ঘরেই নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করবেন। সে যেন বলে, আমি আপনার মুখ হতে মাগাফীরের গন্ধ পাচ্ছি। তিনি তাদের কোন একজনের ঘরে ঢুকলে তিনি তাঁকে ঐ কথা বললেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ বরং আমি যাইনাব বিনতু জাহ্শের ঘরে মধু পান করেছি। ঠিক আছে আমি আজ হতে কখনো তা পান করবো না। অতঃপর কুরআনের আয়াত অবতীর্ণ হলোঃ “হে নাবী! আল্লাহ আপনার জন্য যা হালাল করেছেন তা কেন হারাম করছেন? আপনি কি স্ত্রীদের সন্তুষ্টি লাভ করতে চান?... তোমরা উভয়ে যদি আল্লাহর নিকট তাওবাহ কর” (সূরাহ তাহরীমঃ ১-৫), এ আয়াতগুলোতে ‘আয়িশাহ্ ও হাফসাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাওবাহ করতে বলা হয়েছে। “যখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটা কথা স্বীয় এক স্ত্রীর নিকট সংগোপনে বলেছিলেন” এ আয়াতটি ‘বরং আমি মধু পান করেছি’ কথার ব্যাখ্যায় অবতীর্ণ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5267) صحیح مسلم (1474)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وابنُ جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- إذا لم يصرح بسماعه من عطاء -وهو ابنُ أبي رباح- فروايته عنه محمولة على الاتصال كما صرح هو نفسُه بذلك فيما أسنده عنه ابن أبي خيثمة في "تاريخه" (٨٥٨)، فكيف وقد صرح بسماعه منه عند مسلم (١٤٧٤) وغيره. وأخرجه البخاري (٥٢٦٧) و (٦٦٩١)، ومسلم (١٤٧٤)، والنسائي (٣٤٢١) و (٣٧٩٥) و (٣٩٥٨) من طريق حجاج بن محمد المصيصي، والبخاري (٤٩١٢) من طريق هشام بن يوسف، كلاهما عن ابن جريج، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٨٥٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤١٨٣). وانظر ما بعده. قوله: "مغافير" قال الخطابي: واحدها: مغفور، ويقال له أيضاً: مغثور، والفاء والثاء يتعاقبان كما قالوا: فوم وثوم، وجَدَث وجَدَف، وهو شيء يتولد من العُرفط، حلو كالناطف وريحه منكر، والعرفط شجر له شوك، وقوله: جرست نحله العرفط، أي: أكلت، ويقال للنحل: جوارس. وفي هذا الحديث دليل على أن يمين النبي ﷺ إنما وقعت في تحريم العسل لا في تحريم أم ولده مارية القبطية كما زعمه بعض الناس. قلنا: جزمه بأن اليمين وقعت في تحريم العسل لا في تحريم أم ولده مارية: فيه نظر، فقد أخرج النسائي (٣٩٥٩) بسند صحيح كما قال ابن كثير في "تفسيره" وابن حجر في "الفتح" ٩/ ٦٨ من حديث أنس أن النبي ﷺ كانت له أمة يطؤها، فلم تزل به حفصة وعائشة حتى حرمها، فأنزل الله ﷿: ﴿يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ﴾ [التحريم:١] إلى آخر الآية. وله شاهد مرسل أخرجه الطبري ٢٨/ ١٥٥ بسند صحيح كما قال الحافظ عن زيد ابن أسلم التابعي الشهير قال: أصاب رسول الله ﷺ أمَّ إبراهيم ولده في بيت بعض نسائه، فقالت: أي رسول الله ﷺ في بيتي وعلى فراشي؟ فجعلها عليه حراماً، فقالت: يا رسول الله ﷺ كيف تحرم عليك الحلال؟ فحلف لها بالله: لا يُصيبها، فأنزل الله تعالى: ﴿يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ﴾ قال زيد بن أسلم: فقول الرجل لامرأته: أنت علي حرام لغو وإنما تلزمه كفارة يمين إن حلف. وقال الحافظ في "الفتح" ٩/ ٢٨٩ - ٢٩٠: وقد اختلف في الذي حرم على نفسه، وعوقب على تحريمه، كما اختلف في سبب حلفه على أن لا يدخل على نسائه على أقوال، فالذي في "الصحيحين" أنه العسل … وقول آخر: أنه في تحريم جاريته مارية، ووقع في رواية يزيد بن رومان عن عائشة عند ابن مردويه ما يجمع القولين، وذكر غيره ثم قال: والراجح من الأقوال كلها قصة مارية لاختصاص عائشة وحفصة بها بخلاف العسل، فإنه اجتمع فيه جماعة منهن، قال: ويحتمل أن تكون الأسباب جميعها اجتمعت فأشير إلى أهمها، ويؤيد شمول الحلف للجميع، ولو كان مثلاً في قصة مارية فقط، لاختص بحفصة وعائشة.