সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، وَمُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالاَ حَدَّثَنَا الْمُثَنَّى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ طَلْحَةَ بْنِ نَافِعٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " نِعْمَ الإِدَامُ الْخَلُّ " .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-বলেনঃ সিরকা উত্তম তরকারী।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2052)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل طلحة بن نافع -وهو أبو سفيان، مشهور بكنيته- فهو صدوق لا بأس به، وهو متابع في الطريق السالف قبله. وأخرجه مسلم (٢٠٥٢)، والنسائي (٣٧٩٦) من طرق عن أبي سفيان طلحة بن نافع، به. ولفظ مسلم: أن النبي ﷺ سأل أهله الأدُمَ، فقالوا: ما عندنا إلا خلٌّ، فدعا به، فجعل يأكل به ويقول: "نعم الأدُم الخلُّ، نعم الأدُم الخلُّ" قال ابن القيم: هذا ثناء على الخل بحسب الوقت لا لتفضيله على غيره، إذ لو حصل نحو لحمٍ أو عسل أو لبن، كان أحق بالمدح. ولأحمد (١٤٨٠٧) من حديث جابر: (نعم الإدام النحل ما أقفر بيت فيه خل". وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٢٥). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، حَدَّثَنِي عَطَاءُ بْنُ أَبِي رَبَاحٍ، أَنَّ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ أَكَلَ ثُومًا أَوْ بَصَلاً فَلْيَعْتَزِلْنَا - أَوْ لِيَعْتَزِلْ مَسْجِدَنَا - وَلْيَقْعُدْ فِي بَيْتِهِ " . وَإِنَّهُ أُتِيَ بِبَدْرٍ فِيهِ خَضِرَاتٌ مِنَ الْبُقُولِ فَوَجَدَ لَهَا رِيحًا فَسَأَلَ فَأُخْبِرَ بِمَا فِيهَا مِنَ الْبُقُولِ فَقَالَ " قَرِّبُوهَا " . إِلَى بَعْضِ أَصْحَابِهِ كَانَ مَعَهُ فَلَمَّا رَآهُ كَرِهَ أَكْلَهَا قَالَ " كُلْ فَإِنِّي أُنَاجِي مَنْ لاَ تُنَاجِي " . قَالَ أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ بِبَدْرٍ فَسَّرَهُ ابْنُ وَهْبٍ طَبَقٌ
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-বলেছেনঃ যে ব্যক্তি রসুন বা পিয়াজ খেয়েছে সে যেন আমাদের থেকে দূরে থাকে অথবা আমাদের মাসজিদ হতে দূরে থাকে। সে যেন নিজের ঘরে বসে থাকে। তাঁর সামনে একত্রে রান্না করা বিভিন্ন প্রকার তরকারী ভর্তি একটি পাত্র আনা হলে তিনি তা হতে এক ধরনের ঘ্রান পেয়ে প্রশ্ন করলেন। তাঁকে পাত্রের মধ্যকার তরকারী সম্পর্কে জানানো হলে তিনি বলেনঃ অমুক ব্যক্তির নিকট নিয়ে যাও। লোকটি তাঁর সাথেই ছিলো। তিনি যখন দেখলেন সে তা খেতে অপছন্দ করছে তখন তিনি বললেনঃ খাও। নিশ্চয়ই আমি এমন এক মহান সত্তার সাথে অতি গোপনে কথা বলি যাঁর সাথে তোমরা কথা বলতে পারো না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (855) صحیح مسلم (564)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزُّهري، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه البخاري (٨٥٥)، ومسلم (٥٦٤) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه البخاري (٨٥٤)، ومسلم (٥٦٤)، والترمذي (١٩٠٩)، والنسائي (٧٠٧) من طريق ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح، به. وأخرجه مسلم (٥٦٤) من طريق هشام الدستوائي، عن أبي الزبير، عن جابر قال: نهى رسول الله ﷺ عن أكل البصل والكراث، فغلبتنا الحاجة، فأكلنا منها، فقال: " من أكل من هذه الشجرة المنتنة فلا يقربن مسجدنا، فإن الملائكة تأذى مما يتأذى منه الإنس. وهو في "مسند أحمد" (١٥٠١٤) و (١٥٠٦٩) و (١٥٢٧٤)، و"صحيح ابن حبان" (١٦٤٤) و (٢٠٨٦). قال الخطابي: قوله: ببدر، يريد الطبق، وسمي الطبق بدراً لاستدارته، ومنه سمي القمر حين كماله بدراً، وذلك لاستدارته وحسن اتساقه. وقوله: "فليعتزل مسجدنا" إنما أمره باعتزال المسجد عقوبةً له، وليس هذا من باب الأعذار التي تُبيح للمرء التخلف عن الجماعة كالمطر والريح العاصف ونحوهما من الأمور، وقد رأيت بعض الناس صنف في الأعذار المانعة عن حضور الجماعة باباً ووضع فيه أكل الثوم والبصل، وليس هذا من ذاك في شيء، والله أعلم. وقد ألحق بعض أهل العلم بذلك من كان بفيه بخر، أو به جرح له رائحة، وزاد بعضهم، فألحق أصحاب الصنائع كالسَّمَّاك والعاهات كالمجذوم، ومن يؤذي الناس بلسانه.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرٌو، أَنَّ بَكْرَ بْنَ سَوَادَةَ، حَدَّثَهُ أَنَّ أَبَا النَّجِيبِ مَوْلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سَعْدٍ حَدَّثَهُ أَنَّ أَبَا سَعِيدٍ الْخُدْرِيَّ حَدَّثَهُ أَنَّهُ، ذُكِرَ عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الثُّومُ وَالْبَصَلُ قِيلَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَأَشَدُّ ذَلِكَ كُلِّهِ الثُّومُ أَفَتُحَرِّمُهُ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " كُلُوهُ وَمَنْ أَكَلَهُ مِنْكُمْ فَلاَ يَقْرَبْ هَذَا الْمَسْجِدَ حَتَّى يَذْهَبَ رِيحُهُ مِنْهُ " .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে পিয়াজ-রসুন সম্পর্কে কথা উঠলো। বলা হলো, হে আল্লাহ্র রাসূল! এর মধ্যে রসূনের গন্ধটাই খুব বেশি। আপনি কি এটা হারাম করেন? নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা তা খেতে পারো। তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি তা খায় সে যেন মুখের গন্ধ দূর না হওয়া পর্যন্ত অবশ্যই এ মাসজিদের নিকটে না আসে। [৩৮২৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، صححہ ابن خزیمۃ (1669 وسندہ حسن) أبو النجیب وثقہ ابن خزیمۃ وابن حبان فھو حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي النجيب مولى عبد الله بن سعْد، لكن روي الحديث من طريقين آخرين. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" ٢/ ١٤٣، وابن خزيمة (١٦٦٩)، وابن حبان (٢٠٨٥)، والبيهقي ٣/ ٧٧ من طريق أبي النجيب، به. وأخرجه بنحوه مسلم (٥٦٥) من طريق أبي نضرة العَبْدي، عن أبي سعيد الخدري. وأخرجه مسلم (٥٦٦) من طريق عبد الله بن خباب، عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله ﷺ مر على زرّاعة بصل هو وأصحابه. فنزل ناس منهم، فأكلوا منه، ولم يأكل آخرون، فرُحنا إليه، فدعا الذين لم يأكلوا البصلَ، وأخر الآخرين حتى ذهب ريحُها. وهو في "مسند أحمد" (١١٥٨٤) من طريق أبي نضْرة، عن أبي سعيد.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الشَّيْبَانِيِّ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ زِرِّ بْنِ حُبَيْشٍ، عَنْ حُذَيْفَةَ، أَظُنُّهُ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ تَفَلَ تِجَاهَ الْقِبْلَةِ جَاءَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تَفْلُهُ بَيْنَ عَيْنَيْهِ وَمَنْ أَكَلَ مِنْ هَذِهِ الْبَقْلَةِ الْخَبِيثَةِ فَلاَ يَقْرَبَنَّ مَسْجِدَنَا " . ثَلاَثًا .
হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি ক্বিবলাহ্র দিকে থুথু ফেলে, ক্বিয়ামাতের দিন সে ঐ থুথু নিজের দু’চোখের মধ্যখানে পতিত অবস্থায় উপস্থিত হবে। যে ব্যক্তি এ খারাপ তরকারী (পিয়াজ) খাবে সে যেন আমাদের মাসজিদে না আসে। তিনি কথাটি তিনবার বলেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، جریر بن عبدالحمید شک في رفع الحدیث ، فالسند معلل ، وللحدیث طریق موقوف عند ابن أبي شیبۃ (2/ 365) وسندہ صحیح ، (انوار الصحیفہ ص 136)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الشيباني: هو أبو إسحاق سُليمان بن أبي سُليمان، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه البزار في "مسنده" (٢٩٠٥)، وابن خزيمة (٩٢٥) و (١٣١٤) و (١٦٦٣)، وابن حبان (١٦٣٩)، والبيهقي ٣/ ٧٦ من طريق جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد. ولم يذكر البقلة الخبيثة سوى البزار وابن خزيمة في الموضع الأخير والبيهقي. وأخرجه ابن أبي شيبة ٢/ ٣٦٥ عن علي بن مُسهر، عن أبي إسحاق الشيباني، به موقوفاً من قول حذيفة دون ذكر البقلة الخبيثة. وأخرجه البزار (٢٩٠٤) من طريق جرير بن عبد الحميد، به مرفوعاً بلفظ: "إذا بصق أحدكم في المسجد، فلا يبصق عن يمينه ولكن عن يساره أو تحت قدمه".
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ أَكَلَ مِنْ هَذِهِ الشَّجَرَةِ فَلاَ يَقْرَبَنَّ الْمَسَاجِدَ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি এ গাছ (পিয়াজ) খাবে সে অবশ্যই যেন মাসজিদসমূহের নিকটে না আসে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (853) صحیح مسلم (561)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هو ابن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (٨٥٣)، ومسلم (٥٦١)، وابن ماجه (١٠١٦) من طريق عُبيد الله ابن عمر، به. وعندهم أن ذلك كان في غزوة خيبر. وهو في "مسند أحمد" (٤٦١٩)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٨٨).
حَدَّثَنَا شَيْبَانُ بْنُ فَرُّوخَ، حَدَّثَنَا أَبُو هِلاَلٍ، حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ هِلاَلٍ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، عَنِ الْمُغِيرَةِ بْنِ شُعْبَةَ، قَالَ أَكَلْتُ ثُومًا فَأَتَيْتُ مُصَلَّى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَقَدْ سُبِقْتُ بِرَكْعَةٍ فَلَمَّا دَخَلْتُ الْمَسْجِدَ وَجَدَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم رِيحَ الثُّومِ فَلَمَّا قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم صَلاَتَهُ قَالَ " مَنْ أَكَلَ مِنْ هَذِهِ الشَّجَرَةِ فَلاَ يَقْرَبْنَا حَتَّى يَذْهَبَ رِيحُهَا " . أَوْ " رِيحُهُ " . فَلَمَّا قَضَيْتُ الصَّلاَةَ جِئْتُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَاللَّهِ لَتُعْطِيَنِّي يَدَكَ . قَالَ فَأَدْخَلْتُ يَدَهُ فِي كُمِّ قَمِيصِي إِلَى صَدْرِي فَإِذَا أَنَا مَعْصُوبُ الصَّدْرِ قَالَ " إِنَّ لَكَ عُذْرًا " .
আল-মুগীরাহ ইবনু শু’বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রসুন খেয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুসল্লায় সলাত পড়তে আসলাম। তখন এক রাক’আত শেষ হয়েছে। আমি মাসজিদে প্রবেশ করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রসুনের গন্ধ পান। তিনি তাঁর সলাত শেষ করে বললেনঃ “যে ব্যক্তি এই গাছ (রসূন) হতে আহার করলো, তার মুখের দুর্গন্ধ দূর হওয়ার পূর্বে সে অবশ্যই যেন আমাদের নিকট না আসে”। আমি সলাত শেষ করে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম, হে আল্লাহ্র রাসূল! আল্লাহ্র কসম! অবশ্যই আপনার হাতটা আমাকে দিন। মুগীরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাঁর হাত জামার ভিতর দিয়ে আমার বুক পর্যন্ত ঢুকালাম। আমার বুকে পট্টি বাঁধা ছিলো। তিনি বললেনঃ এটা তোমার জন্য ওজর।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، أبو ھلال تابعہ سلیمان بن المغیرۃ عند أحمد (4/252) وصححہ ابن خزیمۃ (1672) وابن حبان (319)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف أبي هلال -وهو محمد بن سُلَيم الراسبي- وقد اختلف في وصله وإرساله، ورجح الدارقطني في "العلل" ٧/ ١٤٥ إرساله. أبو بُردة: هو ابن أبي موسى الأشعري. وأخرجه أحمد (١٨١٧٦)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٢٣٨، والطبراني في "الكبير" ٢٠/ (١٠٠٣)، والبيهقى ٣/ ٧٧ من طرق عن أبي هلال الراسبي، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي شيبة ٢/ ٥١٠ و ٨/ ٣٠٣، وأحمد (١٨٢٠٥)، وابن خزيمة (١٦٧٢)، وابن حبان (٢٠٩٥)، والبيهقي ٣/ ٧٧ من طريق سليمان بن المغيرة، عن حميد بن هلال، به. وسليمان بن المغيرة ثقة. وأخرجه ابن أبي شيبة ٨/ ٣٠٢ عن إسماعيل ابن عُلَيَّه، والطبراني في "الكبير" ٢٠/ (١٠٠٤) من طريق حماد بن زيد، كلاهما عن أيوب السختياني، عن حميد بن هلال، عن أبي بردة أن النبي ﷺ وجد من المغيرة ريح ثوم … فذكره مرسلاً. وذكر الدارقطني في "العلل" ٧/ ١٤٠ أن يونس بن عبيد رواه عن حميد بن هلال مرسلاً أيضاً، ثم قال: وكان المرسل هو الأقوى. قوله: فإذا أنا معصوب الصدر، كان من عادتهم إذا جاع أحدهم أن يشُدَّ جوفَه بعصابة، وربما جعل تحتها حجراً. قاله في "النهاية".
حَدَّثَنَا عَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ، حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ عَمْرٍو، حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ مَيْسَرَةَ، - يَعْنِي الْعَطَّارَ - عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ قُرَّةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ هَاتَيْنِ الشَّجَرَتَيْنِ وَقَالَ " مَنْ أَكَلَهُمَا فَلاَ يَقْرَبَنَّ مَسْجِدَنَا " . وَقَالَ " إِنْ كُنْتُمْ لاَ بُدَّ آكِلِيهِمَا فَأَمِيتُوهُمَا طَبْخًا " . قَالَ يَعْنِي الْبَصَلَ وَالثُّومَ .
মু’আবিয়াহ ইবনু কুররাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’টি গাছ খেতে বারন করেছেন। তিনি বলেছেনঃ যে ব্যাক্তি ঐ গাছ দু’টো খাবে সে যেনো অবশ্যই আমাদের মাসজিদে না আসে। তিনি আরো বলেছেনঃ তোমাদের যদি একান্তই এটা খেতে হয় তাহলে রান্না করে দুর্গন্ধ দুর করে খাও। বর্ণনাকারী বলেন, গাছ দু’টি হলো পিয়াজ ও রসুন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (736)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل خالد بن ميسرة العطار. وقد حسّن البخاري هذا الحديث فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" ٢/ ٧٦٥ - ٧٦٦. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٦٤٧) من طريق خالد بن ميسرة، به وهو في "مسند أحمد" (١٦٢٤٧). وله شاهد من حديث أنس بن مالك عند الطبراني في "الأوسط" (٣٦٦٨)، ومن طريقه الضياء في "المختارة" (١٧٤٠) ورجاله ثقات غير شيخ الطبراني، وهو سليمان ابن داود بن يحى الطيب البصري، فلم نقف له على ترجمة. وقد روى عنه أيضاً ابن قانع وكناه أبا أيوب، وقال: مولى بني هاشم. وجاء عن عمر بن الخطاب موقوفاً من قوله عند مسلم (٥٦٧). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا الْجَرَّاحُ أَبُو وَكِيعٍ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ شَرِيكٍ، عَنْ عَلِيٍّ، عَلَيْهِ السَّلاَمُ قَالَ نُهِيَ عَنْ أَكْلِ الثُّومِ، إِلاَّ مَطْبُوخًا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ شَرِيكُ بْنُ حَنْبَلٍ .
‘আলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কাচাঁ রসুন খেতে নিষেধ করা হয়েছে। রান্না করে খাওয়াতে দোষ নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1808) ، أبو إسحاق عنعن واختلط أیضًا (انظر التقریب: 5065) ، والحدیث ضعفہ الترمذي ، (انوار الصحیفہ ص 136)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف. شريك بن حنبل. روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال ابن سعد: كان معروفاً قليل الحديث، وقد اختُلف عنه، فمرة روي عنه عن علي بلفظ المصنّف بعبارة تحتمل الرفع، وروي عنه عن علي أنه كره الثوم إلا مطبوخاً موقوفاً كذا رواه جماعة كما سيأتي. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي. فأخرجه الترمذي (١٩١١)، والبيهقي ٣/ ٧٨ من طريق مُسدَّد، بهذا الإسناد. وأخرجه أيضاً (١٩١٢) من طريق وكيع بن الجراح، عن أبيه، عن أبي إسحاق، عن شريك بن حنبل، عن علي قال: إنه كره أكل الثوم إلا مطبوخاً. هكذا رواه موقوفاً. وكذلك رواه موقوفاً عبد الرحمن بن مهدي فيما حكاه عبد الله بن أحمد بن حنبل عن أبيه في "العلل" (٤١٦٢)، وكذا يحيى الحماني فيما حكاه الدارقطني في "العلل" ٣/ ٢٤٢، كلاهما عن وكيع. وكذلك رواه سفيان الثوري عن أبي إسحاق موقوفاً فيما حكاه أحمد بن حنبل في "العلل" (٤١٦٢). ويشهد له الحديث السالف قبله.
حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى، أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا حَيْوَةُ بْنُ شُرَيْحٍ، حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ، عَنْ بَحِيرٍ، عَنْ خَالِدٍ، عَنْ أَبِي زِيَادٍ، خِيَارِ بْنِ سَلَمَةَ أَنَّهُ سَأَلَ عَائِشَةَ عَنِ الْبَصَلِ، فَقَالَتْ إِنَّ آخِرَ طَعَامٍ أَكَلَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم طَعَامٌ فِيهِ بَصَلٌ .
আবূ যিয়াদ খিয়ার ইবনু সালামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–কে পিয়াজ খাওয়া সম্পর্কে প্রশ্ন করলেন। তিনি বলেনঃ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সর্বশেষ যে খাবার খেয়েছিলেন তাতে পিয়াজ ছিলো। [৩৮২৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، خیار بن سلمۃ: مجہول (التحریر: 1771) لم یوثقہ غیر ابن حبان ، (انوار الصحیفہ ص 136)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف بقية -وهو ابن الوليد الحمصي- ثم إنه يدلس تدليس التسوية، ولم يصرح بالسماع، وقد اختُلف عليه أيضاً كما بيناه في "مسند أحمد" (٢٤٥٨٥). بَحير: هو ابن سعْد، وخالد: هو ابن مَعْدان. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٦٤٦) من طريق بقية بن الوليد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٥٨٥).
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ حَفْصٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ أَبِي يَحْيَى، عَنْ يَزِيدَ الأَعْوَرِ، عَنْ يُوسُفَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سَلاَمٍ، قَالَ رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَخَذَ كِسْرَةً مِنْ خُبْزِ شَعِيرٍ فَوَضَعَ عَلَيْهَا تَمْرَةً وَقَالَ " هَذِهِ إِدَامُ هَذِهِ " .
ইউসুফ ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি দেখলাম নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক টুকরা যবের রুটি নিয়ে তাতে একটি খেজুর রেখে বললেনঃ এই খেজুর এই রুটির তরকারী। [৩৮৩০]
দূর্বলঃ মিশকাত (৪২২৩)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (3260) ، (انوار الصحیفہ ص 137)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده هالك من أجل محمد بن أبي يحيى -وهو الأسلمي- فهو متروك الحديث، ويزيد الأعور - وهو ابن أبي أمية مجهول. وقد سلف هذا الحديث برقم (٣٢٥٩) و (٣٢٦٠).
حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ عُتْبَةَ، حَدَّثَنَا مَرْوَانُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ بِلاَلٍ، حَدَّثَنِي هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " بَيْتٌ لاَ تَمْرَ فِيهِ جِيَاعٌ أَهْلُهُ " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ঘরে খেজুর নেই সে ঘরের অধিবাসীরা অভুক্ত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2046)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، مروان بن محمد -هو الطاطري- وقد تابعه يحيى بنُ حسان التَّنِّيسيُّ الثقة أيضاً، فقول البخاري فيما نفله عنه الترمذي بإثر الحديث (١٩١٨): لا أعلم أحداً رواه غير يحيى بن حسان. غير مُسلَّم، لما ذكرنا من متابعة مروان بن محمد الطاطري عند المصنف وغيره. وأخرجه ابن ماجه (٣٣٢٧) من طريق مروان بن محمد الطاطري، ومسلم (٢٠٤٦)، والترمذي (١٩١٨) من طريق يحيى بن حسان التِّنِّيسيُّ، كلاهما عن سليمان ابن بلال، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٢٠٤٦)، والنسائي في "الكبرى" كما في "تحفة الأشراف" ١٢/ ٤١٧ من طريق أبي الرجال، عن أمه عمرة، عن عائشة. وقال البغوي في "شرح السنة" (٢٨٨٥): هذا حديث صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٤٥٨) من طريق عمرة عن عائشة، و"صحيح ابن حبان" (٥٢٠٦) من طريق عروة عن عائشة. قال القاضي أبو بكر بن العربي في "عارضته" ٨/ ٨ لأن التمر كان قوتهم، فإذا خلا منه البيت جاع أهله، وأهل كل بلد يقولون في قوتهم الذي اعتادوه مثله. وقال الطيبي: لعله حث على القناعة في بلاد كثر فيها التمر، أي: من قَنِعَ به لا يجوع ".
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ جَبَلَةَ، حَدَّثَنَا سَلْمُ بْنُ قُتَيْبَةَ أَبُو قُتَيْبَةَ، عَنْ هَمَّامٍ، عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ أُتِيَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِتَمْرٍ عَتِيقٍ فَجَعَلَ يُفَتِّشُهُ يُخْرِجُ السُّوسَ مِنْهُ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে পুরাতন খেজুর পরিবেশন করা হলে তিনি তা ছিঁড়ে এর মধ্য হতে পোকা খুঁজে বের করতে থাকেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4226) ، أخرجہ ابن ماجہ (3333 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد تابع سَلْمَ بنَ قتيبة على وصل هذا الحديث محمدُ بن فضيل عند ابن عبد البر في التمهيد" ١٥/ ١٨٨. ورواه محمد بن كثير - وهو العَبْدي في الطريق الآتي بعده عند المصنف عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة مرسلاً. وهذا لا يضعف الموصول، لأن اللذين وصلاه ثقتان. وأخرجه ابن ماجه (٣٣٣٣) من طريق أبي قتيبة سَلْم بن قتيبة، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا هَمَّامٌ، عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُؤْتَى بِالتَّمْرِ فِيهِ دُودٌ فَذَكَرَ مَعْنَاهُ .
ইসহাক্ব ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু আবূ ত্বালহা (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পোকায় ধরা খেজুর দেয়া হতো। বাকী অংশ পূর্ববর্তী হাদীসের অনুরুপ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث السابق (3832)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: مرسل صحيح. رجاله ثقات، وقد صح موصولاً كما هو مبين في الطريق السالف قبله. وأخرجه البيهقي في "السنن" ٧/ ٢٨١، و"شعب الإيمان" (٥٨٨٧) من طريق أبي داود، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا وَاصِلُ بْنُ عَبْدِ الأَعْلَى، حَدَّثَنَا ابْنُ فُضَيْلٍ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ جَبَلَةَ بْنِ سُحَيْمٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الإِقْرَانِ إِلاَّ أَنْ تَسْتَأْذِنَ أَصْحَابَكَ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তোমার সাথীর অনুমতি ছাড়া একত্রে দু’টি খেজুর তুলে খেতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، رواہ البخاري (5446) ومسلم (2045)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عَمرو بن عبد الله السَّبِيعي، وابن فُضَيل: هو محمد. وأخرجه البخاري (٢٤٥٥)، ومسلم (٢٠٤٥) من طريق شعبة بن الحجاج، والبخاري (٢٤٨٩)، ومسلم (٢٠٤٥)، والترمذي (١٩١٧)، والنسائي في "الكبرى" (٦٦٩٤) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن جَبَلة بن سُحَيم، به. وهو في "مسند أحمد" (٥٠٣٧) و (٥٢٤٦)، و"صحيح ابن حبان" (٥٢٣١). يقرن، بضم الراء وكسرها: يجمع بين الشيئين. قال الخطابي: إنما جاء النهي عن القران لمعنى مفهوم، وعلة معلومة، وهي ما كان عليه القوم من شدة العيش، وضيق الطعام وإعوازه، وكانوا يتجوّزون في المأكل ويُواسُون من القليل، فإذا اجتمعوا على الأكل تجافى بعضُهم عن الطعام لبعض، وآثر صاحبه على نفسه، غير أن الطعام ربما يكون مشفوها (قليلاً)، وفي القوم من بلغ به الجوعُ الشدة، فهو يُشفق من فنائه قبل أن يأخذ حاجته منه، فربما قرن بين التمرتين، وأعظم اللقمةَ ليَسُدَّ به الجوع، ويشفي به القَرَم، فأرشد النبيُّ إلى الأدب فيه، وأمر بالاستئذان، ليستطيب به نفس أصحابه. فلا يجدوا في أنفسهم من ذلك إذا رأوه قد استأثر به عليهم. أما اليوم فقد كثر الخير واتسعت الحالُ، وصار الناسُ إذا اجتمعوا تلاطفُوا على الأكل، وتحاضُّوا على الطعام، فهم لا يحتاجون إلى الاستئذان في مثل ذلك. إلا أن يحدث حالٌ من الضيق والإعواز تدعو الضرورة فيها إلى مثل ذلك. فيعود الأمر أبيه إذا عادت العلة. والله أعلم. وقال الحافظ في "الفتح" ٩/ ٥٧١ - ٥٧٢ ثم نسخ (يعني النهي عن الإقران) لمَّا حصلت التوسعة، روى البزار (٢٨٤ - كشف الأستار) والطبراني في "الأوسط" (٧٠٦٨) من حديث بريدة رفعه "كنت نهيتكم عن القِران وإن وسع عليكم فاقرنوا". وقال ابن القيم في "تهذيب السنن": وهذه الكلمة، وهي "الاستئذان" قد قيل: إنها مدرجة من كلام ابن عمر، قال شعبة: لا أرى هذه الكلمة إلا من كلام ابن عمر، يعني "الاستئذان" ذكره البخاري في "الصحيح" [(٥٤٤٦)].
حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ النَّمَرِيُّ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ جَعْفَرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَأْكُلُ الْقِثَّاءَ بِالرُّطَبِ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু জা’ফার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাজা খেজুরের সাথে শসা খেতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5447) صحیح مسلم (2043)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. إبراهيم بن سعْد: هو ابن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف الزهري. وأخرجه البخاري (٥٤٤٠)، ومسلم (٢٠٤٣)، وابن ماجه (٣٣٢٥)، والترمذي (١٩٥٠) من طرق عن إبراهيم بن سعد الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٤١).
حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ نُصَيْرٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْكُلُ الْبِطِّيخَ بِالرُّطَبِ فَيَقُولُ " نَكْسِرُ حَرَّ هَذَا بِبَرْدِ هَذَا وَبَرْدَ هَذَا بِحَرِّ هَذَا " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাজা খেজুর দিয়ে তরমুজ খেতেন। তিনি বলতেনঃ এর ঠান্ডা ওটার গরম কমাবে, এবং এর গরম ওটির ঠান্ডা কমিয়ে দিবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4225)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده جيد. من أجل سعيد بن نُصير -وهو البغدادي ثم الرقي- فهو صدوق لا بأس به. عروة: هو ابن الزبير بن العوام، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه الترمذي (١٩٤٩)، والنسائي في "الكبرى" (٦٦٨٨) من طريق سفيان الثورى، والنسائي (٦٦٨٧) من طريق إبراهيم بن حميد الرؤاسي، كلاهما عن هشام ابن عروة، به دون قوله: "نكسر حرَّ هذا … ". وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٦٩٣) من طريق يزيد بن رومان، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة دون قوله: "نكسر حر هذا … ". قال النسائي فيما نقله عنه المزي في "تحفة الأشراف" ١٢/ ١٠١: ليس هو بمحفوظ من حديث الزهري. وهو في "صحيح ابن حبان" (٥٢٤٦) و (٥٢٤٧). دون قوله: "نكسر حر هذا … ". وقوله: الطِّبِّيخ أثبتناه من (أ) و (ج) و (هـ)، وفي (ب): البطيخ، والطِّبِّيخ لغة في البِطِّيخ. قال الخطابي: فيه إثبات الطب والعلاج ومقابلة الشيء الضار بالشيء المضادّ له في طبعه على مذهب الطب والعلاج، وفيه إباحة التوسع من الأطعمة والنيل من الملاذّ المباحة.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْوَزِيرِ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مَزْيَدٍ، قَالَ سَمِعْتُ ابْنَ جَابِرٍ، قَالَ حَدَّثَنِي سُلَيْمُ بْنُ عَامِرٍ، عَنِ ابْنَىْ، بُسْرٍ السُّلَمِيَّيْنِ قَالاَ دَخَلَ عَلَيْنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَدَّمْنَا زُبْدًا وَتَمْرًا وَكَانَ يُحِبُّ الزُّبْدَ وَالتَّمْرَ .
বুসর আস-সুলামীর দুই পুত্রের সূত্র হতে বর্ণিত, তারা উভয়ে বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের বাড়িতে প্রবেশ করলেন। আমরা তাঁকে পনীর ও খেজুর খেতে দিলাম। তিনি পনীর ও খেজুর খুব পছন্দ করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4232) ، أخرجہ ابن ماجہ (3334 وسندہ صحیح) ابنا بسر سلمیین ھما عبد اللہ بن بسر وعطیۃ بن بسر رضي اللہ عنھما
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن جابر: هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر الدمشقي. وأخرجه ابن ماجه (٣٣٣٤) من طريق صدقة بن خالد، عن عبد الرحمن بن يزيد ابن جابر، به. قال ابن القيم في "زاد المعاد" ٤/ ٣١٨: الزبد حارٌّ رطب، فيه منافع كثيرة، منها الإنضاج والتحليل، ويبرئ الأورام التي تكون إلى جانب الأذنين والحالبين، وأورام الفم، وسائر الأورام التي تعرض في أبدان النساء والصبيان إذا استعمل وحده، وإذا لُعق منه نفع من نفث الدم الذي يكون من الرئة، وأنضج الأورام العارضة فيها. وهو مليِّن للطبيعة والعصب والأورام الصلبة العارضة من المرة السوداء والبلغم، نافع من اليُبس العارض في البدن … وهو نافع مِن السعال العارض من البرد واليبس، ويذهب القُوباء والخشونة التي في البدن، ويَذهَبُ بوخامته الحلُو كالعسل والتمر، وفي جمعه ﷺ بين التمر وبينه من الحكمة إصلاح كل منهما بالآخر.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الأَعْلَى، وَإِسْمَاعِيلُ، عَنْ بُرْدِ بْنِ سِنَانٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ كُنَّا نَغْزُو مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَنُصِيبُ مِنْ آنِيَةِ الْمُشْرِكِينَ وَأَسْقِيَتِهِمْ فَنَسْتَمْتِعُ بِهَا فَلاَ يَعِيبُ ذَلِكَ عَلَيْهِمْ .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে যুদ্ধে যোগদান করতাম। আমরা মুশরিকের পাত্র ও পানপাত্র নিয়ে তা ব্যবহার করতাম। এতে তিনি আমাদের কোনো দোষ ধরেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل بُرْد بن سنان، فهو صدوق لا باس به. عبد الأعلى: هو ابن عبد الأعلى السَّامي، وإسماعيل: هو ابن عُلَيَّه. وأخرجه ابن أبي شيبة ٨/ ٢٧٩ و ١٢/ ٢٥١، وأحمد (١٥٠٥٣)، والطبراني في "مسند الشاميين" (٣٧٤) و (٣٧٥)، والبيهقي ١/ ٣٢ و١٠/ ١١ من طرق عن برد بن سنان، به. وأخرجه بنحوه أحمد (١٤٥٠١)، والحارث بن أبي أسامة (٦٨ - زوائده)، والطحاوي في "شرح معاني الأثار" ١/ ٤٧٣ من طريق سليمان بن موسى، عن عطاء، عن جابر قال: كنا نصيب مع النبيَّ ﷺ في مغانمنا من المشركين الأسقية والأوعية، فنقسمها، وكلها مَيتةٌ. قال الخطابي: ظاهر هذا يبيح استعمال آنية المشركين على الاطلاق، من غير غسل لها وتنظيف. وهذه الإباحة مقيدة بالشرط الذي هو مذكور في الحديث الذي يليه في هذا الباب.
حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَاصِمٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ شُعَيْبٍ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْعَلاَءِ بْنِ زَبْرٍ، عَنْ أَبِي عُبَيْدِ اللَّهِ، مُسْلِمِ بْنِ مِشْكَمٍ عَنْ أَبِي ثَعْلَبَةَ الْخُشَنِيِّ، أَنَّهُ سَأَلَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ إِنَّا نُجَاوِرُ أَهْلَ الْكِتَابِ وَهُمْ يَطْبُخُونَ فِي قُدُورِهِمُ الْخِنْزِيرَ وَيَشْرَبُونَ فِي آنِيَتِهِمُ الْخَمْرَ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنْ وَجَدْتُمْ غَيْرَهَا فَكُلُوا فِيهَا وَاشْرَبُوا وَإِنْ لَمْ تَجِدُوا غَيْرَهَا فَارْحَضُوهَا بِالْمَاءِ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا " .
আবূ সা’লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা তিনি রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আরজ করলেন, আমরা আহলে কিতাবের এলাকায় যাতায়াত করি। তারা তাদের হাঁড়িতে শুকরের গোশত রান্না করে এবং তাদের পানপাত্রে মদ পান করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ যদি তোমরা তাদের পাত্র ছাড়া অন্য পাত্র পাও তবে তাতে পানাহার করো। আর যদি তাদেরগুলা ছারা অন্য কোনো পাত্র না পাও তবে তাদেরগুলা পানি দিয়ে ভালোভাবে ধুয়ে তাতে পানাহার করো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل نصر بن عاصم -وهو الأنطاكي- لكنه متابع. محمد بن شعيب: هو ابن شابور الدمشقي. وأخرجه البيهقي ١/ ٣٣ من طريق نصر بن عاصم، والطبراني في "مسند الشاميين" (٧٨٣) من طريق هشام بن خالد (وتحرف في المطبوع إلى محمد بن خالد)، كلاهما عن محمد بن شعيب، والطبراني في "الكبير" ٢٢/ (٥٨٤) من طريق الوليد بن مسلم، كلاهما (محمد بن شعيب والوليد) عن عبد الله بن العلاء، به. وأخرجه بنحوه البخاري (٥٤٧٨)، ومسلم (١٩٣٠) وابن ماجه (٣٢٧)، والترمذي (١٥٣٢) و (١٦٤٦) من طريق أبي إدريس الخولاني، عن أبي ثعلبة الخشني. وزاد الترمذي في الموضع الأول آنية المجوس. وأخرجه الترمذي (١٩٠١) من طريق أبى قلابة، عن أبي أسماء الرحبي، عن أبي ثعلبة. وأخرجه الترمذي (١٦٤٥) و (١٩٠٠) من طريق أبي قلابة، عن أبي ثعلبة دون ذكر أبي أسماء الرحبي، وقال الترمذي: أبو قلابة لم يسمع من أبي ثعلبة، إنما رواه عن أبي أسماء، عن أبي ثعلبة. قلنا: ثم إنه ذكر في هذه الرواية قدور المجوس لا أهل الكتاب، وهذا وهم، والله تعالى أعلم. وأخرجه الترمذي (١٥٣٢) من طريق حجاج بن أرطاة، عن مكحول، عن أبي ثعلبة. وحجاج ضعيف، ومكحول لم يسمع من أبي ثعلبة فيما قاله غير واحد من أهل العلم. وأخرجه ابن ماجه (٢٨٣١) من طريق أبي فروة يزيد بن سنان، عن عروة بن رويم اللخمي، عن أبي ثعلبة الخشني. وأبو فروة ضعيف. وفي سماع عروة من أبي ثعلبة نظر. وهو في "مسند أحمد" (١٧٧٣١) و (١٧٧٥٠) و (١٧٧٥٢)، و"صحيح ابن حبان، (٥٨٧٩). قال الخطابي: والأصل في هذا أنه إذا كان معلوماً من حال المشركين أنهم يطبخون في قدورهم لحم الخنزير، ويشربون في آنيتهم الخمور، فإنه لا يجوز استعمالها إلا بعد الغسل والتنظيف، فأما مياههم وثيابهم، فإنها على الطهارة، كمياه المسلمين وثيابهم، إلا أن يكونوا من قوم لا يتحاشون النجاسات، أو كان من عادتهم استعمال الأبوال في طهورهم، فإن استعمال ثيابهم غير جائز، إلا أن يعلم أنه لم يصبها شيء من النجاسات، والله أعلم. والرَّحْض: الغسل.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ بَعَثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَمَّرَ عَلَيْنَا أَبَا عُبَيْدَةَ بْنَ الْجَرَّاحِ نَتَلَقَّى عِيرًا لِقُرَيْشٍ وَزَوَّدَنَا جِرَابًا مِنْ تَمْرٍ لَمْ نَجِدْ لَهُ غَيْرَهُ فَكَانَ أَبُو عُبَيْدَةَ يُعْطِينَا تَمْرَةً تَمْرَةً كُنَّا نَمُصُّهَا كَمَا يَمُصُّ الصَّبِيُّ ثُمَّ نَشْرَبُ عَلَيْهَا مِنَ الْمَاءِ فَتَكْفِينَا يَوْمَنَا إِلَى اللَّيْلِ وَكُنَّا نَضْرِبُ بِعِصِيِّنَا الْخَبَطَ ثُمَّ نَبُلُّهُ بِالْمَاءِ فَنَأْكُلُهُ وَانْطَلَقْنَا عَلَى سَاحِلِ الْبَحْرِ فَرُفِعَ لَنَا كَهَيْئَةِ الْكَثِيبِ الضَّخْمِ فَأَتَيْنَاهُ فَإِذَا هُوَ دَابَّةٌ تُدْعَى الْعَنْبَرَ فَقَالَ أَبُو عُبَيْدَةَ مَيْتَةٌ وَلاَ تَحِلُّ لَنَا ثُمَّ قَالَ لاَ بَلْ نَحْنُ رُسُلُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَدِ اضْطُرِرْتُمْ إِلَيْهِ فَكُلُوا فَأَقَمْنَا عَلَيْهِ شَهْرًا وَنَحْنُ ثَلاَثُمِائَةٍ حَتَّى سَمِنَّا فَلَمَّا قَدِمْنَا إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ذَكَرْنَا ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ " هُوَ رِزْقٌ أَخْرَجَهُ اللَّهُ لَكُمْ فَهَلْ مَعَكُمْ مِنْ لَحْمِهِ شَىْءٌ فَتُطْعِمُونَا مِنْهُ " . فَأَرْسَلْنَا مِنْهُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَكَلَ .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশদের একটি কাফেলাকে পাকড়াও করতে আমাদেরকে এক অভিযানে পাঠালেন। তিনি আবূ ‘উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–কে আমাদের অধিনায়ক বানালেন। তিনি আমাদের সাথে এক ব্যাগ খেজুরও দিলেন। এছাড়া আর কিছু আমাদের সাথে ছিলো না। আবূ ‘উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতিদিন আমাদের প্রত্যেককে একটি করে খেজুর দিতেন। আমরা বাচ্চাদের মত তা চুষে খেতাম। অতঃপর পানি পান করতাম। এভাবে আমরা রাত পর্যন্ত সারাদিন কাটিয়ে দিতাম। আমরা নিজেদের লাঠি দিয়ে গাছের পাতা ঝড়িয়ে তা পানিতে ভিজিয়ে খেয়েছি। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা সমুদ্রের কিনারার দিয়ে অগ্রসর হলাম। অতঃপর সমুদ্রের তীরে বালুর ঢিভির ন্যায় একটি বস্তু দেখা গেলো। আমরা গিয়ে দেখলাম, ওটা একটা সামুদ্রিক প্রানী, যার নাম আম্বর (তিমি) মাছ। আবূ ‘উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এটা মৃত প্রানী, আমাদের জন্য হালাল নয়। অতঃপর তিনি মত পাল্টিয়ে বললেন, না! বরং আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর প্রতিনিধি এবং আমরা আল্লাহর রাস্তায় বের হয়েছি। তোমরাও সংকটাপন্ন অবস্হার সম্মুখীন হয়েছো, সুতরাং এটা খাও। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, কেবলমাত্র আমরাই সেখানে অবস্হান করেছিলাম। আমরা সংখ্যায় ছিলাম তিনশো। আমরা প্রতিদিন তা খেয়ে মোটাতাজা হয়ে গেলাম। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট ফিরে এসে তাঁকে ঘটনাটি বললাম। তিনি বললেন, ওটা ছিলো রিযিক। যা আল্লাহ তোমাদের জন্য পাঠিয়েছিলেন। তোমাদের সাথে এর গোশত অবশিষ্ট আছে কি? থাকলে আমাকে খাওয়াও। আমরা মাছের কিছু অংশ রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট পৌছালাম, তিনি তা খেলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2483) صحیح مسلم (1935)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- قد صرح بالسماع عند أحمد (١٤٣٣٧) فانتفت شبهة تدليسه، على أنه متابع. وأخرجه البخاري (٤٣٦٢) مختصراً، ومسلم (١٩٣٥)، والنسائي (٤٣٥٣) و (٤٣٥٤) من طريق أبي الزبير المكي، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٥٦)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٥٩ - ٥٢٦١). وأخرجه مطولاً ومختصراً البخاري (٢٤٨٣) و (٢٩٨٣) و (٤٣٦٥)، ومسلم (١٩٣٥)، وابن ماجه (٤١٥٩)، والترمذي (٢٦٤٣)، والنسائي (٤٣٥١) من طريق وهب بن كيسان، والبخاري (٤٣٦١) و (٤٣٦٢) و (٥٤٩٣) و (٥٤٩٤)، ومسلم (١٩٣٥)، والنسائى (٤٣٥٢) من طريق عمرو بن دينار، ومسلم (١٩٣٥) من طريق عُبيد الله بن مقسم، ثلاثتهم عن جابر بن عبد الله. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٨٦) و (١٤٣١٥) و (١٤٣٣٧)، و"صحيح ابن حبان" وأخرج مسلم (٣٠١٤) من طريق عبادة بن الوليد، عن جابر: شكا الناس إلى رسول الله ﷺ الجوع، فقال: "عسى اللهُ أن يطعمكم" فأتينا سيف البحر، فزخر زخرة، فألقى دابَّه … فذكر نحوه. قلنا: الظاهر أنهما حادثتان، وانظر "فتح الباري" ٨/ ٨١. قال الخطابي: الخَبَط: ورق الشجر يضرب بالعصا فيسقط. وفيه دليل على أن دواب البحر كلها مباحة إلا الضفدع لما جاء من النهي عن قتلها، وفيه أن ميتتها حلال، ألا تراه يقول: "هل معكم من لحمه شيء؟ " فأرسلنا إليه فأكل، وهذا حال رفاهية، لا حال ضرورة. وقد روي عن أبي بكر الصديق ﵁: أن كل دابة في البحر فقد ذبحها الله لكم أو ذكاها لكم. وعن محمد بن علي أنه قال: كل ما في البحر ذكي، وكان الأوزاعي يقول: كل شيء كان عيشه في الماء فهو حلال، قيل: فالتمساح؟ قال: نعم. وغالب مذهب الشافعي إباحة دواب البحر كلها إلا الضفدع لما جاء من النهي عن قتلها. وكان أبو ثور يقول: جميع ما يأوي إلى الماء فهو حلال، فما كان منه يُذكى لم يحل إلا بذكاة، وما كان منه لا يذكى مثل السمك أخذه حياً وميتاً. وكره أبو حنيفة دواب البحر إلا السمك. وقال سفيان الثوري: أرجو أن لا يكون بالسرطان بأس. وقال ابن وهب: سألت الليث بن سعْد عن أكل خنزير الماء وكلب الماء ودواب الماء كلها، فقال: أما إنسان الماء فلا يؤكل على شيء من الحالات، والخنزير إذا سماه الناس خنزيراً فلا يؤكل، وقد حرم الله الخنزير، وأما الكلاب فليس بها بأس في البر والبحر. قلت: لم يختلفوا أن المارماهي مباح أكله، وهو شبيه بالحيات، ويُسمى أيضاً حية، فدل ذلك على بطلان اعتبار معنى الأسماء والأشباه في حيوان البحر، وإنما هي كلها سُموك، وإن اختلف أشكالها وصورها، وقد قال سبحانه: ﴿أُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ الْبَحْرِ وَطَعَامُهُ مَتَاعًا لَكُمْ﴾ [المائدة:٩٦] فدخل كل ما يُصاد من البحر من حيوانه لا يُخَصُّ شيء منه إلا بدليل، وسئل رسول الله ﷺ عن ماء البحر، فقال: "طهور ماؤه، حلال متته"، فلم يستثن شيئاً منها دون شيء، فقضية العموم توجب فيها الإباحة إلا ما استثناه الدليل، والله أعلم.