হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (4115)


حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ حَبِيبِ بْنِ أَبِي ثَابِتٍ، عَنْ وَهْبٍ، مَوْلَى أَبِي أَحْمَدَ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم دَخَلَ عَلَيْهَا وَهِيَ تَخْتَمِرُ فَقَالَ ‏"‏ لَيَّةً لاَ لَيَّتَيْنِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ مَعْنَى قَوْلِهِ ‏"‏ لَيَّةً لاَ لَيَّتَيْنِ ‏"‏ ‏.‏ يَقُولُ لاَ تَعْتَمَّ مِثْلَ الرَّجُلِ لاَ تُكَرِّرْهُ طَاقًا أَوْ طَاقَيْنِ ‏.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট এলেন, এ সময় তিনি ঘোমটা দেয়া অবস্থায় ছিলেন। তিনি বললেন, এক ভাঁজে ঘোমটা দাও, দুই ভাঁজে নয়, দুই ভাঁজে নয়। ইমাম আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তাঁর একথার অর্থ হলো, তোমরা পুরুষদের পাগড়ির মত একাধিক ভাঁজ করবে না। [৪১১৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، حبیب عنعن وشیخہ وہب مولی أبي أحمد: مجہول (تقریب التہذیب: 7486) ، (انوار الصحیفہ ص 146)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات غير وهب مولى أبي أحمد، فقد اختُلف في تعيينه، فذكر الدارقطني والحاكم أنه أبو سفيان مولى ابن أبي أحمد الثقة المخرج له في "الصحيحين" وهذا وثقه ابن سعْد وابن حبان والدارقطني، واحتمل المزي أن يكون هو هذا، وأما ابن عبد البر فقال: أبو سفيان لم يصح له اسم غير كنيته. قلنا: ولهذا جهّل المنذري وابن القطان والذهبي وابن حجر وهباً مولى أبي أحمد، فإن كان وهب هو أبو سفيان كما قرره الدارقطني والحاكم فالإسناد صحيح، وإلا فهو رجل لا يُعرف مجهول كما قرره المنذري ومن تبعه، فيكون الإسناد ضعيفاً، والله تعالى أعلم. وأخرجه الطيالسي (١٦١٢)، وعبد الرزاق (٥٠٥٠)، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" مسند أم سلمة ٤/ (٨٩) و (١٥٦)، وأحمد (٢٦٥٢٢) و (٢٦٥٣٨) و (٢٦٦١٧)، وأبو يعلى (٦٩٧١)، والطبراني في "الكبير" ٢٣/ (٧٠٥)، والحاكم ٤/ ١٩٤ - ١٩٥، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٦١٤٤)، والمزي في ترجمة وهب مولى أبي أحمد من "تهذيب الكمال" ٣١/ ١٦٢ - ١٦٣ من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وصححه الحاكم وسكت عنه الذهبي.









সুনান আবী দাউদ (4116)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، وَأَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ الْهَمْدَانِيُّ، قَالاَ أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنَا ابْنُ لَهِيعَةَ، عَنْ مُوسَى بْنِ جُبَيْرٍ، أَنَّ عُبَيْدَ اللَّهِ بْنَ عَبَّاسٍ، حَدَّثَهُ عَنْ خَالِدِ بْنِ يَزِيدَ بْنِ مُعَاوِيَةَ، عَنْ دِحْيَةَ بْنِ خَلِيفَةَ الْكَلْبِيِّ، أَنَّهُ قَالَ أُتِيَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِقَبَاطِيَّ فَأَعْطَانِي مِنْهَا قُبْطِيَّةً فَقَالَ ‏"‏ اصْدَعْهَا صَدْعَيْنِ فَاقْطَعْ أَحَدَهُمَا قَمِيصًا وَأَعْطِ الآخَرَ امْرَأَتَكَ تَخْتَمِرُ بِهِ ‏"‏ ‏.‏ فَلَمَّا أَدْبَرَ قَالَ ‏"‏ وَأْمُرِ امْرَأَتَكَ أَنْ تَجْعَلَ تَحْتَهُ ثَوْبًا لاَ يَصِفُهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ يَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ فَقَالَ عَبَّاسُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ ‏.‏




দিহ্‌ইয়াহ ইবনু খলীফাহ আল-কাল্‌বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট কিছু মিসরীয় কাতান কাপড় এলো। তিনি সেগুলো থেকে আমাকে একটি কাতান দিয়ে বললেনঃ এটাকে দুই টুকরা করো। এক টুকরা কেটে জামা বানাবে এবং অপরটি তোমার স্ত্রীকে ওড়না বানাতে দিবে। তিনি ফিরে যাওয়ার সময় নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমার স্ত্রীকে এর নীচে আরেকটি কাপড় লাগিয়ে নিতে বলবে, যেন তার দেহের আকৃতি দেখা না যায়। [৪১১৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (4366) ، وللحدیث شواھد عند الحاکم (4/187 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه، فإن خالد بن يزيد بن معاوية لم يلق دحية الكلبي فيما قاله الحافظ الذهبي في "تلخيص المستدرك" ٤/ ١٨٧، و"سير أعلام النبلاء" ٤/ ٣٨٢. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٤١٩٩)، والحاكم ٤/ ١٨٧، والبيهقي ٢/ ٢٣٤ من طريقين عن موسى بن جبير، بهذا الإسناد. وصححه الحاكم وتعقبه الذهبي بقوله: فيه انقطاع. وفي باب قوله: "وأمر امرأتك أن تجعل تحته ثوباً لا يصفُها، عن أسامة بن زيد عند ابن سعد في "طبقاته" ٤/ ٦٤ - ٦٥، وابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (٥٤٩٦)، وأحمد (٢١٧٨٦)، وغيرهم. وإسناده محتمل لتحسين. والقبطية مضمومة القاف: الشقة أو الثوب من القباطي وهي ثياب تعمل بمصر. وقوله: اصدعها. يريد شقها نصفين، فكل شق منها صِدع بكسر الصاد، والصَّدع مفتوحة الصاد مصدر صدعت الشيء إذا شققته، واصدعه صدعاً.









সুনান আবী দাউদ (4117)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ نَافِعٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ صَفِيَّةَ بِنْتِ أَبِي عُبَيْدٍ، أَنَّهَا أَخْبَرَتْهُ أَنَّ أُمَّ سَلَمَةَ زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَتْ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ ذَكَرَ الإِزَارَ فَالْمَرْأَةُ يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ تُرْخِي شِبْرًا ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ أُمُّ سَلَمَةَ إِذًا يَنْكَشِفُ عَنْهَا ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَذِرَاعًا لاَ تَزِيدُ عَلَيْهِ ‏"‏ ‏.




সাফিয়্যাহ বিনতু আবু ‘উবাইদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বর্ণনা করেন যে, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে প্রশ্ন করলেন, যখন তিনি পরিধেয় বস্ত্র সম্পর্কে আলোচনা করছিলেন, হে আল্লাহ্‌র রাসুল! নারীদের ইযার ব্যবহারের বিধান কি? তিনি বললেনঃ তারা এক বিঘত নীচে পর্যন্ত ঝুলিয়ে রাখতে পারে। উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এতেও তার কিছু অংশ খোলা থাকবে। তিনি বললেনঃ তবে এক হাত ঝুলিয়ে পরবে; এর বেশি নয়।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4334) ، رواہ النسائي (5340 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي بكر بن نافع مولى عبد الله ابن عمر، وهو متابع. وقد اختلف في إسناد هذا الحديث اختلافاً كثيراً كما بيناه في "مسند أحمد" (٢٦٥١١) لكن ذكر ابن عبد البر في التمهيد ٢٤/ ١٤٨ أن الصواب رواية مالك ومن تبعه. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٩١٥. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٦٥٧) من طريق أيوب بن موسى بن عمرو بن سعيد بن العاص، و (٩٦٥٨) من طريق محمد بن إسحاق، كلاهما عن نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٥١١) و (٢٦٥٣٢)، و "صحيح ابن حبان" (٥٤٥١). وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (4118)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى، أَخْبَرَنَا عِيسَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِهَذَا الْحَدِيثِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ ابْنُ إِسْحَاقَ وَأَيُّوبُ بْنُ مُوسَى عَنْ نَافِعٍ عَنْ صَفِيَّةَ ‏.‏




নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে পূর্বোক্ত হাদীস বর্ণিত। ইমাম আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অপর সনদে নাফি’ হতে সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণিত হয়েছে। [নাসায়ী]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، انظر الحدیث السابق (4117)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد اختلف فيه عن عُبيد الله بن عمر كما سيأتي بيانه. عيسى: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي. فأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٦٥٩) من طريق معتمر بن سليمان، و (٩٦٦٠) من طريق عبد الرحيم بن سليمان الرازي، كلاهما عن عُبيد الله، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي أيضاً (٩٦٦١) من طريق خالد بن الحارث، عن عُبيد الله، عن نافع، عن سليمان بن يسار: أن أم سلمة ذكرت ذيول النساء … هكذا رواه مرسلاً وكذلك أخرجه مرسلاً أحمد (٥١٧٣) عن يحى بن سعيد القطان، عن عُبيد الله بن عمر. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (4119)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ سُفْيَانَ، أَخْبَرَنِي زَيْدٌ الْعَمِّيُّ، عَنْ أَبِي الصِّدِّيقِ النَّاجِيِّ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ رَخَّصَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لأُمَّهَاتِ الْمُؤْمِنِينَ فِي الذَّيْلِ شِبْرًا ثُمَّ اسْتَزَدْنَهُ فَزَادَهُنَّ شِبْرًا فَكُنَّ يُرْسِلْنَ إِلَيْنَا فَنَذْرَعُ لَهُنَّ ذِرَاعًا ‏.




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মুল মু’মিনীনদেরর জন্য এক বিঘত আঁচল (নীচে) ঝুলানোর অনুমতি দিয়েছেন। অতঃপর তারা আরও বাড়িয়ে দেয়ার আবেদন জানালে তিনি তাদের জন্য আরও এক বিঘত বাড়ানোর অনুমতি দিয়েছেন। অতঃপর তারা আমাদের নিকট তাদের কাপড় পাঠিয়ে দিতেন, আর আমরা এক গজ করে মেপে দিতাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (3581) ، زید العمي: ضعیف (تق: 2131) وقال الھیثمي: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد 10 / 110) ، والحدیث السابق (الأصل: 4117) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 146)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، لضعف زيد العَمِّي -وهو ابن الحواريّ-، سفيان: هو الثوري. وأخرجه ابن ماجه (٣٥٨١) من طريق سفيان الثوري، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٦٥٠) من طريق مطرف بن طريف، عن زيد العمي، عن أبي الصدّيق، عن ابن عمر عن عمر. فجعله من مسند عمر. وهو في مسند أحمد" (٤٦٨٣) و (٤٧٧٣) و (٥٦٣٧). وفي الباب عن أم سلمة في الحديث السالف قبله.









সুনান আবী দাউদ (4120)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَوَهْبُ بْنُ بَيَانٍ، وَعُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَابْنُ أَبِي خَلَفٍ، قَالُوا حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، - قَالَ مُسَدَّدٌ وَوَهْبٌ - عَنْ مَيْمُونَةَ، قَالَتْ أُهْدِيَ لِمَوْلاَةٍ لَنَا شَاةٌ مِنَ الصَّدَقَةِ فَمَاتَتْ فَمَرَّ بِهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏"‏ أَلاَ دَبَغْتُمْ إِهَابَهَا فَاسْتَمْتَعْتُمْ بِهِ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّهَا مَيْتَةٌ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ إِنَّمَا حُرِّمَ أَكْلُهَا ‏"‏ ‏.‏




মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের এক মুক্তদাসীকে যাকাতের একটি বকরী দান করা হলো। পরে সেটা মারা গেলো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটির পাশ দিয়ে অতিক্রমের সময় বললেনঃ তোমরা এর চামড়া পাকা করলে না কেন? তোমরা তো এর দ্বারা উপকৃত হতে পারতে। তারা বলল, হে আল্লাহ্‌র রাসুল! এটা তো মৃত। তিনি বললেনঃ এটা খাওয়া হারাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1492) صحیح مسلم (363)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهذا الاختلاف الذي في إسناده بأن جعله بعضهم عن ابن عباس مرفوعاً وبعضهم عن ابن عباس عن ميمونة مرفوعاً - لا يضر، فإنه مرسل صحابي، وهو حجة. وقال الحافظ في "الفتح" ٩/ ٦٥٨: والراجح عند الحفاظ في حديث الزهري ليس فيه ميمونة. وأخرجه مسلم (٣٦٣)، وابن ماجه (٣٦١٠)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٤٦) من طريق سفيان بن عيينه، بهذا الإسناد. فجعله من مسند ميمونة. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٧٩٥)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٨٥) و (١٢٨٩). وأخرجه مسلم (٣٦٣) من طريق سفيان بن عيينة، به. فجعله من مسند ابن عباس. وأخرجه مسلم (٣٦٤)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٤٩) من طريق عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس، عن ميمرنة فجعله من مسندها. دون ذكر الدباغ. وأخرجه مسلم (٣٦٣) و (٣٦٥)، والترمذي (١٨٢٤)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٥٠) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس رفعه. فجعله من "مسنده". ولم يذكر مسلم في روايته الثانية الدباغ، وأخرجه النسائي (٤٥٥١) من طريق عامر الشعبي، عن ابن عباس. فجعله من مسند ابن عباس أيضاً دون ذكر الدباغ. وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (٤١٢٣) و (٤١٢٦).









সুনান আবী দাউদ (4121)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ، حَدَّثَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، بِهَذَا الْحَدِيثِ لَمْ يَذْكُرْ مَيْمُونَةَ قَالَ فَقَالَ ‏ "‏ أَلاَ انْتَفَعْتُمْ بِإِهَابِهَا ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ ذَكَرَ مَعْنَاهُ لَمْ يَذْكُرِ الدِّبَاغَ ‏.‏




যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে এ হাদীস বর্ণিত। এতে মাইমুনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর উল্লেখ নেই। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা এর চামড়া কাজে লাগাও না কেন? অতঃপর অনুরূপ অর্থের হাদীস বর্ণনা করেন, তবে বর্ণনাকারী চামড়া দাবাগাত করার কথা উল্লেখ করেননি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1492) صحیح مسلم (363)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يزيد: هو ابن زُريع. وأخرجه البخاري (٢٢٢١) و (٥٥٣١)، ومسلم (٣٦٣) من طريق صالح بن كيسان، والبخاري (١٤٩٢)، ومسلم (٣٦٣) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٤٧) من طريق مالك بن أنس، و (٤٥٤٨) من طريق حفص ابن الوليد، كلهم عن ابن شهاب الزهري، به. ولم يذكر أحدٌ منهم خلا حفص بن الوليد الدباغ. وهو في "مسند أحمد" (٣٠١٦)، و"صحح ابن حبان" (١٢٨٤). وانظر ما قبله، وما سيأتي برقم (٤١٢٣).









সুনান আবী দাউদ (4122)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، قَالَ قَالَ مَعْمَرٌ وَكَانَ الزُّهْرِيُّ يُنْكِرُ الدِّبَاغَ وَيَقُولُ يُسْتَمْتَعُ بِهِ عَلَى كُلِّ حَالٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ لَمْ يَذْكُرِ الأَوْزَاعِيُّ وَيُونُسُ وَعُقَيْلٌ فِي حَدِيثِ الزُّهْرِيِّ الدِّبَاغَ وَذَكَرَهُ الزُّبَيْدِيُّ وَسَعِيدُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ وَحَفْصُ بْنُ الْوَلِيدِ ذَكَرُوا الدِّبَاغَ ‏.‏




মা’মার (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) চামড়া দাবাগাত করা শব্দটি অস্বীকার করতেন। তিনি বলতেন, চামড়া দ্বারা বিভিন্ন প্রকার কাজে উপকৃত হওয়া যায়। ইমাম আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আওযাঈ, ইউনুস ও ‘উকাইল যুহরী বর্ণিত হাদীসে দাবাগাতের কথা উল্লেখ করেননি। কিন্তু যুবাইদী, সাইদ ইবনু ‘আবদুল ‘আযীয এবং হাফ্স ইবনু ওয়ালীদ দাবাগাতের কথা উল্লেখ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مسند أحمد (1/ 365) ، عبدالرزاق لم یصرح بالسماع ، والحدیث المرفوع صحیح ، (انوار الصحیفہ ص 146)









সুনান আবী দাউদ (4123)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ وَعْلَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ إِذَا دُبِغَ الإِهَابُ فَقَدْ طَهُرَ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ চামড়া দাবাগাত করা হলে পবিত্র হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (366)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري. وأخرجه مسلم (٣٦٦)، وابن ماجه (٣٦٠٩)، والترمذي (١٨٤٥) والنسائي في "الكبرى" (٤٥٥٣) و (٤٥٥٤) من طريق عبد الرحمن بن وعلة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٨٩٥)، و"صحيح ابن حيان" (١٢٨٧) و (١٢٨٨). وانظر ما سلف برقم (٤١٢٠) و (٤١٢١). قال الخطابي: الإهاب: الجلد، ويجمع على أهب، وزعم قوم أن جلد ما لا يؤكل لا يسمى إهاباً، وذهبوا إلى أن الدباغ لا يعمل من الميتة، إلا في الجنس المأكول اللحم، وهو قول الأوزاعي وابن المبارك وإسحاق بن راهويه وأبي ثور. وذهب أبو حنيفة وأصحابه ومالك والشافعي إلى أن جلد الميتة مما يؤكل لحمه ومما لا يؤكل يطهر بالدباغ إلا أن أبا حنيفة وأصحابه استثنوا منها جلد الخنزير واستثنى الشافعي مع الخنزير جلد الكلب، وكان مالك يكره الصلاة في جلود السباع وإن دبغت، ويرى الانتفاع بها، ويمتنع من بيعها، وعند الشافعي بيعها والانتفاع بها على جميع الوجره جائز لأنها طاهرة. وقال ابن المنذر في "الأوسط" ٤/ ٢٨٠: وأجمع أهل العلم على تحريم الخنزير، والخنزير محرم بالكتاب والسنة واتفاق الأمة، واختلفوا في استعمال شعره فرخصت طائفة أن يخرز به، رخص فيه الحسن البصري ومالك والأوزاعي والنعمان، وقد روينا عن الشعبي أنه سئل عن جرب من جلود الخنازير يحمل فيها مديد من أذربيجان، فقال: لا بأس به. وقال القرطبي في "تفسيره" ٢/ ٢٢٣: لا خلاف أن جملة الخنزير محرمة إلا الشعر، فإنه يجوز الخِرازة به. ونقل ابن عبد البر في "الاستذكار" ١٥/ ٣٤٧ عن سحنون: أنه لا بأس بجلد الخنزير إذا دبغ، وكذلك قال داود بن علي ومحمد بن عبد الله بن عبد الحكم، وحجتهم عموم قوله ﷺ: "أيما إهاب دبغ فقد طهر".









সুনান আবী দাউদ (4124)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ قُسَيْطٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ ثَوْبَانَ، عَنْ أُمِّهِ، عَنْ عَائِشَةَ، زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَرَ أَنْ يُسْتَمْتَعَ بِجُلُودِ الْمَيْتَةِ إِذَا دُبِغَتْ ‏.‏




নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃত প্রাণীর চামড়া দাবাগাত করার পর কাজে লাগিয়ে উপকৃত হওয়ার অনুমতি দিয়েছেন। [৪১২৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (509) ، أخرجہ ابن ماجہ (3612 وسندہ حسن) والنسائي (4257 وسندہ حسن) أم محمد بن عبد الرحمٰن بن ثوبان: وثقھا ابن حبان و ابن عبد البر و یعقوب بن سفیان الفارسي (المعرفۃ والتاریخ1/ 349، 350، 425) فالسند حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة والدة محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، لكنها قد توبعت. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٤٩٨، ومن طريقه أخرجه ابن ماجه (٣٦١٢)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٦٤). وهو في "مسند أحمد" (٢٤٤٤٧)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٨٦). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٥٥٩) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، عن الأعمش، عن إبراهيم النخعي، عن الأسود النخعي، عن عائشة قالت، قال رسول الله ﷺ: "ذكاة الميتة دباغها". وهذا إسناد صحيح.









সুনান আবী দাউদ (4125)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، وَمُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، قَالاَ حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ جَوْنِ بْنِ قَتَادَةَ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ الْمُحَبَّقِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةِ تَبُوكَ أَتَى عَلَى بَيْتٍ فَإِذَا قِرْبَةٌ مُعَلَّقَةٌ فَسَأَلَ الْمَاءَ فَقَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّهَا مَيْتَةٌ ‏.‏ فَقَالَ ‏ "‏ دِبَاغُهَا طُهُورُهَا ‏"‏ ‏.‏




সালামাহ ইবনুল মুহাব্বিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তাবুক যুদ্ধের সময় রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক বাড়িতে গিয়ে সেখানে একটি ঝুলন্ত মশক দেখে তা হতে পানি চাইলেন। তারা বললেন, হে আল্লাহ্‌র রাসুল! এটা তো মৃত প্রাণীর চামড়ার তৈরি মশক। তিনি বললেনঃ দাবাগাত করলেই এটা পবিত্র হয়ে যায়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4248) ، الحسن البصري مدلس وعنعن ، والحدیث السابق (الأصل: 4123) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 146)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: مرفوعه صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة جَوْن بن قتادة. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٥٥٥) من طريق هشام بن أبي عبد الله الدستوائي. عن قتادة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٩٠٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٢٢). ويشهد لمرفوعه حديث ميمونة وابن عباس وعائشة السالفة أحاديثهم عند المصنف بالأرقام (٤١٢٠) و (٤١٢١) و (٤١٢٣) و (٤١٢٤).









সুনান আবী দাউদ (4126)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرٌو، - يَعْنِي ابْنَ الْحَارِثِ - عَنْ كَثِيرِ بْنِ فَرْقَدٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَالِكِ بْنِ حُذَافَةَ، حَدَّثَهُ عَنْ أُمِّهِ الْعَالِيَةِ بِنْتِ سُبَيْعٍ، أَنَّهَا قَالَتْ كَانَ لِي غَنَمٌ بِأُحُدٍ فَوَقَعَ فِيهَا الْمَوْتُ فَدَخَلْتُ عَلَى مَيْمُونَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرْتُ ذَلِكَ لَهَا فَقَالَتْ لِي مَيْمُونَةُ لَوْ أَخَذْتِ جُلُودَهَا فَانْتَفَعْتِ بِهَا ‏.‏ فَقَالَتْ أَوَيَحِلُّ ذَلِكَ قَالَتْ نَعَمْ ‏.‏ مَرَّ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم رِجَالٌ مِنْ قُرَيْشٍ يَجُرُّونَ شَاةً لَهُمْ مِثْلَ الْحِمَارِ فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لَوْ أَخَذْتُمْ إِهَابَهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا إِنَّهَا مَيْتَةٌ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ يُطَهِّرُهَا الْمَاءُ وَالْقَرَظُ ‏"‏ ‏.‏




আল-‘আলিয়াহ বিনতু সুবাই’ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, উহুদের ময়দানে আমার বকরী ছিল। সেখানে মহামারী দেখা দিলে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী মাইমুনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট গিয়ে বিষয়টি তাকে জানালাম। তিনি আমাকে বললেন, তুমি তো এর চামড়া নিয়ে এর দ্বারা উপকৃত হতে পারো। আমি বললাম, এর দ্বারা উপকৃত হওয়া কি বৈধ? তিনি বলেন, হাঁ, কতিপয় কুরাইশী পুরুষ প্রায় গাধার সমান তাদের একটি বকরী রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পাশ দিয়ে টেনে নিয়ে যাচ্ছিল। তখন রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের বললেনঃ তোমরা যদি এর চামড়া রেখে দিতে? তারা বলল, এটা মৃত। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ পানি ও ছলম বৃক্ষের পাতার রস এটাকে পবিত্র করে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (510) ، أخرجہ النسائي (4253 وسندہ حسن) وللحدیث شواھد




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: مرفوعه صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الله بن مالك وأمه. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٥٦٠) من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٨٣٣)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٩١). وقد سلف ذكر الانتفاع بالاهاب بعد دباغه عن ميمونة بإسناد صحيح برقم (٤١٢٠). قال الخطابي: القرظ: شجر تُدبغ به الأُهب وهو لما فيه من القبض والعُفوصة، يُنشِّف البلَّة، ويذهب الرخاوة، ويخصف الجلد، ويصلحه ويُطيبه، فكل شيء عَمِل عَمَل القرظ كان حكمه في التطهير حكم القرظ.









সুনান আবী দাউদ (4127)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُكَيْمٍ، قَالَ قُرِئَ عَلَيْنَا كِتَابُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِأَرْضِ جُهَيْنَةَ وَأَنَا غُلاَمٌ شَابٌّ ‏ "‏ أَنْ لاَ تَسْتَمْتِعُوا مِنَ الْمَيْتَةِ بِإِهَابٍ وَلاَ عَصَبٍ ‏"‏ ‏.‏




‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উকাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি যখন যু্বক, তখন জুহাইনাহ গোত্রের এলাকায় অবস্থানকালে আমাদেরকে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি পত্র পাঠ করে শুনানো হয়। তাতে ছিলঃ “তোমরা মৃত প্রাণীর চামড়া ও পেশিতন্ত দ্বারা উপকৃত গ্রহণ করো না।”




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (508) ، أخرجہ ابن ماجہ (3613 وسندہ حسن) والنسائي (4254 وسندہ حسن) من حدیث شعبۃ عن الحکم بہ والحکم صرح بالسماع عند أحمد (4/311 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. عبد الله بن عُكيم، قال عنه البخاري في "تاريخه الكبير" ٥/ ٣٩، وذلك أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في الجرح والتعديل" ٥/ ١٢١: أدرك زمان رسول الله ﷺ ولا يُعرف له سماع صحيح، ثم هو مضطرب كما بيناه في "مسند أحمد" (١٨٧٨٠) الحكم: هو ابن عتيبه. وأخرجه ابن ماجه (٣٦١٣)، والترمذي (١٨٢٦)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٦١) و (٤٥٦٢) من طرق عن الحكم بن عتيبة، به. وقال الترمذي: هذا حديث حسن ويروى عن عبد الله بن عكيم عن أشياخ لهم هذا الحديث، وليس العمل على هذا عند أكثر أهل العلم. وهو في "مسند أحمد" (١٨٧٨٠)، و"صحيح ابن حبان" (١٢٧٧). وانظر ما بعده. قال الخطابي: مذهب عامة العلماء على جواز الدباغ والحكم بطهارة الإهاب إذا دبغ، ووهَّنوا هذا الحديث، لأن عبد الله بن عكيم لم يلق النبي ﷺ، وإنما هو حكايته عن كتاب أتاهم، فقد يحتمل لو ثبت الحديث أن يكون النهي إنما جاء عن الانتفاع به قبل الدباغ، ولا يجوز أن تترك به الأخبار الصحيحة التي قد جاءت في الدباغ وأن يحمل على النسخ، والله أعلم. وقال ابن حبان بإثر حديث عبد الله بن عكيم (١٢٧٩) ومعنى هذا الخبر: أن لا تنتفعوا من الميتة بإهاب ولا عصب، يريد به قبل الدباغ، والدليل على صحته قوله ﷺ: "أيما إهاب دبغ فقد طهر". وقال الحافظ في "التلخيص" ١/ ٤٨: وقد تكلم الحازمي في "الناسخ والمنسوخ" على هذا الحديث فشفى، ومحصل ما أجاب به الشافعية وغيرهم عنه التعليل بالإرسال، وهو أن عبد الله بن عُكيم لم يسمعه من النبي ﷺ. والانقطاع بأن عبد الرحمن بن أبي ليلى لم يسمعه من عبد الله بن عكيم. والاضطراب في سنده، فإنه تارة قال: عن كتاب النبي ﷺ، وتارة عن مشيخة من جهينة، وتارة: عمن قرأ الكتاب. والاضطراب في المتن، فرواه الأكثر من غير تقييد، ومنهم من رواه بتقييد شهر أو شهرين، أو أربعين يوماً، أو ثلاثة أيام. والترجيح بالمعارضة بأن الأحاديث الدالة على الدباغة أصح. والقول بموجبه بأن الإهاب اسم للجلد قبل الدباغ لا بعده، حمله على ذلك ابن عبد البر والبيهقي، وهو منقول عن النضر بن شميل والجوهري قد جزم به. وقال الحازمي: وطريق الإنصاف فيه أن يقال: إن حديث ابن عُكيم ظاهر الدلالة في النسخ لو صح، ولكنه كثير الاضطراب، ثم لا يقاوم حديث ميمونة في الصحة.









সুনান আবী দাউদ (4128)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، مَوْلَى بَنِي هَاشِمٍ حَدَّثَنَا الثَّقَفِيُّ، عَنْ خَالِدٍ، عَنِ الْحَكَمِ بْنِ عُتَيْبَةَ، أَنَّهُ انْطَلَقَ هُوَ وَنَاسٌ مَعَهُ إِلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُكَيْمٍ - رَجُلٍ مِنْ جُهَيْنَةَ - قَالَ الْحَكَمُ فَدَخَلُوا وَقَعَدْتُ عَلَى الْبَابِ فَخَرَجُوا إِلَىَّ فَأَخْبَرُونِي أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُكَيْمٍ أَخْبَرَهُمْ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَتَبَ إِلَى جُهَيْنَةَ قَبْلَ مَوْتِهِ بِشَهْرٍ أَنْ لاَ يَنْتَفِعُوا مِنَ الْمَيْتَةِ بِإِهَابٍ وَلاَ عَصَبٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ فَإِذَا دُبِغَ لاَ يُقَالُ لَهُ إِهَابٌ إِنَّمَا يُسَمَّى شَنًّا وَقِرْبَةً قَالَ النَّضْرُ بْنُ شُمَيْلٍ يُسَمَّى إِهَابًا مَا لَمْ يُدْبَغْ ‏.




আল-হাকাম ইবনু উতাইবাহ (রহ) হতে বর্ণিত, তিনি কতিপয় লোকসহ জুহাইনাহ গোত্রের ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উকাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলেন। হাকাম বলেন, তারা ভেতরে ঢুকলেন আর আমি বাইরে দরজার পাশে বসে রইলাম। অতঃপর তারা বেরিয়ে এসে আমার কাছে বর্ণনা করলেন যে, ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উকাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মৃত্যুর এক মাস পূর্বে জুহাইনাহ গোত্রে এ কথা লিখে একটি পত্র প্রেরণ করেছেনঃ “তোমরা মৃত জন্তর চামড়া ও তন্তু দ্বারা উপকৃত হয়ো না”। ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আন-নাদর ইবনু শুমাইল (রহ) বলে দাবাগাত না করা পর্যন্ত চমড়াকে ‘ইহাব’ বলে। দাবাগাত করার পর একে শান্ন ও ক্বিরবাহ (পাকা চামড়া) বলা হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (508) ، انظر الحدیث السابق (4128)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف كسابقه. وهو في "مسند أحمد" (١٨٧٨٢). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (4129)


حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، عَنْ وَكِيعٍ، عَنْ أَبِي الْمُعْتَمِرِ، عَنِ ابْنِ سِيرِينَ، عَنْ مُعَاوِيَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تَرْكَبُوا الْخَزَّ وَلاَ النِّمَارَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ وَكَانَ مُعَاوِيَةُ لاَ يُتَّهَمُ فِي الْحَدِيثِ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ قَالَ لَنَا أَبُو سَعِيدٍ قَالَ لَنَا أَبُو دَاوُدَ أَبُو الْمُعْتَمِرِ اسْمُهُ يَزِيدُ بْنُ طَهْمَانَ كَانَ يَنْزِلُ الْحِيرَةَ ‏.‏




মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা রেশমের এবং চিতা বাঘের তৈরী গদিতে আরোহী হবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4357) ، أخرجہ ابن ماجہ (3656 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن سيرين: هو محمد، وأبو المعتمر: هو يزيد بن طهمان، ووكيع: هو ابن الجراح. وأخرجه ابن ماجه (٣٦٥٦) من طريق وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٨٤٠). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٧٣٠) من طريق قتادة بن دعامة، عن أبي شيخ الهُنائي، أنه سمع معاوية وعنده جمع من أصحاب محمد في الكعبة قال: أتعلمون أن نبي الله ﷺ نهى عن ركوبٍ على جلد النمور؟ قالوا: نعم. وإسناده حسن. ورواه يحيى بن أبي كثير، عن أبي شيخ الهنائي، واختلف عليه كما بينه النسائي في "الكبرى" (٩٧٣٢ - ٩٧٣٧). وسَلِم طريقُ قتادة. وهو في "مسند أحمد" (١٦٨٣٣). وانظر ما سيأتي برقم (٤١٣١) و (٤٢٣٩). قال ابن الأثير في "النهاية": إنما نهى عن استعمال جلود النمور لما فيها من الزينة والخيلاء.









সুনান আবী দাউদ (4130)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، حَدَّثَنَا عِمْرَانُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ زُرَارَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَصْحَبُ الْمَلاَئِكَةُ رُفْقَةً فِيهَا جِلْدُ نَمِرٍ ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মালায়িকাহ (ফেরেশতারা) চিতা বাঘের চামড়ার তৈরী আসনে আসীন ব্যক্তির সঙ্গী হয় না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قتادۃ عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 146)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف وفيه اضطراب. عمران -وهو ابنُ دَاوَر القطّان- ضعَّفه الأكثرون، وقد تفرذ بهذا الحديث عن أبي هريرة بهذا الإسناد، وخالفه هشام الدستوائي الثقة فرواه عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة بلفظ: "لا تصحب الملائكة رفقة فيها جرس". وكذلك رواه سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة بهذا اللفظ. فدل على وهم عمران القطان فيه، على أنه رواه مرة موقوفاً على أبي هريرة وبلفظ هشام كما أشار إليه الدارقطني في "العلل" ١٠/ ٣٢٨. ورواه سعيدُ بن بَشير -وهو لين الحديث- فاضطرب في إسناده ومتنه، فرواه مرة عن قتادة عن زرارة، عن سعد بن هشام، عن عائشة فجمع الحديثين بذكر الجرس وجلد النمر، قال الدارقطني في "العلل" ١٠/ ٣٢٩: ورواه سعيد بن بشير عن قتادة، عن زرارة، عن سعد بن هشام، عن عائشة عن النبي ﷺ، واختُلف عن سعيد بن بشير في متنه، فقيل عنه: "لا تصحب الملائكة رفقة فيها جلد نمر" ولا يصح القولان. قلنا: يعني لا الإسناد ولا المتن. ورواه سعيد بن بشير مرة أخرى فقال: عن أبي الزبير، عن جابر كذا ذكره ابن أبي حاتم في "العلل" ١/ ٤٨٦، ونقل عن أبيه أنه قال فيه: هذا حديث منكر. وذكر ابنُ حبان هذا الحديث من منكرات سعيد بن بشير في "المجروحين" ١/ ٣١٩. وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" ٢/ ٢٩٩ من طريق محمد بن عثمان التنوخي، عن سعيد بن بشير، عن قتادة، عن زرارة، عن سعد بن هشام، عن عائشة أن نبي الله ﷺ قال: "لا تقرب الملائكة رفقة فيها جرس ولا جلد نمر". وأخرجه ابن حبان في "المجروحين" ١/ ٣١٩ من طريق الوليد بن مسلم، عن سعيد بن بشير، عن أبي الزبير، عن جابر. وأخرج إسحاق بن راهويه في "مسنده" في مسند أبي هريرة (٢٨٠)، وأحمد بن حنبل في "مسنده" (٨٩٩٨)، والنسائي في "الكبرى" (٨٧٥٩) من طريق معاذ بن هشام الدستوائي، عن أبيه، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة أن النبي ﷺ قال: "لا تصحب الملائكة رفقة فيها جرس". وأخرجه ابن أبي شيبة ١٢/ ٢٢٩ عن وكيع، عن هشام الدستوائي، عن قتادة، عن زرارة عن أبي هريرة قال: الملائكة لا تصحب رفقه فيها جرس. فجعله موقوفاً عليه من قوله. وهذا لا يُعل المرفوع، لأن الحديث ثبت مرفوعاً من طريق آخر عن أبي هريرة: وهو ما أخرجه أحمد في "مسنده" (٧٥٦٦)، ومسلم (٢١١٣)، والترمذي (١٧٩٨)، والنسائي في "الكبرى" كما في "تحفة الأشراف" ٩/ ٣٩٥ وغيرهم من طريق سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة. وقد سلف عند المصنف برقم (٢٥٥٥).









সুনান আবী দাউদ (4131)


حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ بْنِ سَعِيدٍ الْحِمْصِيُّ، حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ، عَنْ بَحِيرٍ، عَنْ خَالِدٍ، قَالَ وَفَدَ الْمِقْدَامُ بْنُ مَعْدِيكَرِبَ وَعَمْرُو بْنُ الأَسْوَدِ وَرَجُلٌ مِنْ بَنِي أَسَدٍ مِنْ أَهْلِ قِنَّسْرِينَ إِلَى مُعَاوِيَةَ بْنِ أَبِي سُفْيَانَ فَقَالَ مُعَاوِيَةُ لِلْمِقْدَامِ أَعَلِمْتَ أَنَّ الْحَسَنَ بْنَ عَلِيٍّ تُوُفِّيَ فَرَجَّعَ الْمِقْدَامُ فَقَالَ لَهُ رَجُلٌ أَتَرَاهَا مُصِيبَةً قَالَ لَهُ وَلِمَ لاَ أَرَاهَا مُصِيبَةً وَقَدْ وَضَعَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي حِجْرِهِ فَقَالَ ‏ "‏ هَذَا مِنِّي وَحُسَيْنٌ مِنْ عَلِيٍّ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ الأَسَدِيُّ جَمْرَةٌ أَطْفَأَهَا اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ ‏.‏ قَالَ فَقَالَ الْمِقْدَامُ أَمَّا أَنَا فَلاَ أَبْرَحُ الْيَوْمَ حَتَّى أُغِيظَكَ وَأُسْمِعَكَ مَا تَكْرَهُ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ يَا مُعَاوِيَةُ إِنْ أَنَا صَدَقْتُ فَصَدِّقْنِي وَإِنْ أَنَا كَذَبْتُ فَكَذِّبْنِي قَالَ أَفْعَلُ ‏.‏ قَالَ فَأَنْشُدُكَ بِاللَّهِ هَلْ تَعْلَمُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ لُبْسِ الذَّهَبِ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ فَأَنْشُدُكَ بِاللَّهِ هَلْ سَمِعْتَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنْهَى عَنْ لُبْسِ الْحَرِيرِ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ فَأَنْشُدُكَ بِاللَّهِ هَلْ تَعْلَمُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ لُبْسِ جُلُودِ السِّبَاعِ وَالرُّكُوبِ عَلَيْهَا قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ فَوَاللَّهِ لَقَدْ رَأَيْتُ هَذَا كُلَّهُ فِي بَيْتِكَ يَا مُعَاوِيَةُ ‏.‏ فَقَالَ مُعَاوِيَةُ قَدْ عَلِمْتُ أَنِّي لَنْ أَنْجُوَ مِنْكَ يَا مِقْدَامُ قَالَ خَالِدٌ فَأَمَرَ لَهُ مُعَاوِيَةُ بِمَا لَمْ يَأْمُرْ لِصَاحِبَيْهِ وَفَرَضَ لاِبْنِهِ فِي الْمِائَتَيْنِ فَفَرَّقَهَا الْمِقْدَامُ فِي أَصْحَابِهِ قَالَ وَلَمْ يُعْطِ الأَسَدِيُّ أَحَدًا شَيْئًا مِمَّا أَخَذَ فَبَلَغَ ذَلِكَ مُعَاوِيَةَ فَقَالَ أَمَّا الْمِقْدَامُ فَرَجُلٌ كَرِيمٌ بَسَطَ يَدَهُ وَأَمَّا الأَسَدِيُّ فَرَجُلٌ حَسَنُ الإِمْسَاكِ لِشَيْئِهِ ‏.‏




খালিদ (রহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আল-মিক্বদাম ইবনু মা‘দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), ‘আমর ইবনুল আসওয়াদ ও কিন্নাসিরীনবাসী বনী আসাদের এক লোক মু‘আবিয়াহ ইবনু আবূ সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলেন। মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিক্বদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, জানতে পারলাম, হাসান ইবনু ‘আলী মারা গেছেন। একথা শুনে মিক্বদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) “ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন” পড়লেন। অমুক ব্যক্তি মু‘আবিয়াহকে বললেন, এর মৃত্যুকে আপনি কি বিপদ মনে করেন? তিনি বললেন, আমি এটাকে কেন বিপদ মনে করবো না, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকে নিজের কোলে নিয়ে বলতেনঃ হাসান আমার এবং হুসাইন ‘আলীর। আমাদী বললো, তিনি ছিলেন এক জ্বলন্ত কয়লা যাকে আল্লাহ নিভিয়ে দিয়েছেন। বর্ণনাকারী, অতঃপর মিক্বদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আজ আমি আপনাকে অসন্তুষ্ট না করে ছাড়বোনা। তিনি বললেন, হে মু‘আবিয়াহ! আমি যদি সত্য বলি তবে আমাকে সমর্থন করবেন আর মিথ্যা বললে আমাকে মিথ্যাবাদী বলাবেন। তিনি বললেন, ঠিক আছে। তিনি বলেন, আপনাকে আল্লাহর কসম দিয়ে বলছি, আপনি কি শুনেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বর্ণ (পুরুষদের) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন, হাঁ। তিনি আবার বললেন, আপনাকে আল্লাহর কসম দিয়ে বলছি, আপিন কি জানেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রেশমী পোশাক (পুরুষদের) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন, হাঁ। তিনি আবারও বললেন, আল্লাহর কসম দিয়ে আপনাকে প্রশ্ন করছি, আপনি কি জানেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিংস্র জন্তুর চামড়া ব্যবহার করতে এবং এর চামড়ার তৈরী আসনে আরোহী হতে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন, হাঁ। তিনি বলেন, আল্লাহর শপথ! আমি আপনার প্রাসাদে এসবের কিছুই দেখছি না। মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, হে মিক্বদাম! আমি জানতাম যে, তোমার কাছ থেকে রক্ষা পাবো না। খালিদ (রহ) বলেন, অতঃপর মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য এত পরিমাণ সম্পদ দেয়ার আদেশ দেন, যা অপর দু’জন সাথীর জন্য দেননি। আর তার ছেলের জন্য দুইশো দীনার প্রদান করেন। মিক্বদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এগুলো তার সাথীদের মাঝে বন্টন করে দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, আসাদী এখানে যা পেয়েছে তা থেকে কাউকে কিছু দেয়নি। এ সংবাদ মু‘আবিয়াহ্‌র নিকট পৌঁছলে তিনি বলেন, মিক্বদাম হলো লম্বা হাতের দানশীল লোক, আর আসাদী নিজের জন্য আটকিয়ে রাখার লোক।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (505) ، أخرجہ النسائي (4260 وسندہ حسن) روایۃ بقیۃ عن بحیر صحیحۃ لأنھا من کتاب




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف بقية -وهو ابن الوليد الحمصي- وخالد -وهو ابن مَعدان- قد سمع المقدام بن معدى كرب كما قال البخاري في "تاريخه الكبير" ٣/ ١٧٦. عمرو بن عثمان: هو ابن سعيد الحمصي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٥٦٦) و (٤٥٦٧) من طريق بقية بن الوليد، بهذا الإسناد. وقد صح النهي عن هذه الأمور التي ذكرها المقدام عن عدة من الصحابة". منها حديث البراء بن عازب عند البخاري (١٢٣٩)، ومسلم (٢٠٦٦) بلفظ: ونهانا النبي ﷺ عن آنية الفضة وخاتم الذهب والحرير والديباج والقَسي والاستبرق. وحديث علي بن أبي طالب السالف عند المصنف برقم (٤٠٥٧) بلفظ: إن نبي الله ﷺ أخذ حريراً فجعله في يمينه، وأخذ ذهبا فجعله في شماله، ثم قال: "ان هذين حرام على ذكور أمتي" وهو صحيح لغيره له ما يشهد له بلفظه عن عدة من الصحابة ذكرهم ابن الملقن في "البدر المنير" ١/ ٦٤٠ - ٦٥٠. وأما جلود السباع فقد صح النهي عنها في حديث معاوية السالف برقم (٤١٢٩)، وحديث أسامة بن عمير الآتي بعده.









সুনান আবী দাউদ (4132)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدُ بْنُ مُسَرْهَدٍ، أَنَّ يَحْيَى بْنَ سَعِيدٍ، وَإِسْمَاعِيلَ بْنَ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَاهُمُ - الْمَعْنَى، - عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي عَرُوبَةَ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي الْمَلِيحِ بْنِ أُسَامَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ جُلُودِ السِّبَاعِ ‏.‏




আবুল মালীহ ইবনু উসামাহ (রহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিংস্র প্রাণীর চামড়া ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (506) ، ولہ شاھد حسن عند البیھقي (1/21)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. إسماعيل بن إبراهيم: هو ابن مِقْسَم، المعروف بابن عُلَيّهَ. ويحيى بن سعيد: هو القطان. وأخرجه الترمذي (١٨٧٠) و (١٨٧١)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٦٥) من طريق سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٧٠٦). وقال المناوي في "فيض القدير" ٦/ ٣٢٨: والنهي للسرف والخيلاء، أو لأن افتراشها دأب الجبابرة وسجية المترفين، أو لنجاسة ما عليها من الشعر، والشعر ينجس بالموت ولا يطهر بالدباغ عند الشافعية. وخبْث الملبس يُكسب القلب هيئة خبيثة، كما أن خبث المطعم يُكسبه ذلك، فإن الملابسة الظاهرة تسري إلى الباطن، ومن ثم حُرّم على الذكر لبس الحرير والذهب لما يُكسب القلبَ من الهيئة التي تكون لمن ذلك لبسه من نساء وأهل الفخر والخيلاء، وفيه أنه يحرم الجلوس على جلد كسبع ونمر وفهد، أي: به شعر، وإن جُعل على الأرض على الأوجَه، لكونه من شأن المتكبرين كما تقرر.









সুনান আবী দাউদ (4133)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ الْبَزَّازُ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ مُوسَى بْنِ عُقْبَةَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي سَفَرٍ فَقَالَ ‏ "‏ أَكْثِرُوا مِنَ النِّعَالِ فَإِنَّ الرَّجُلَ لاَ يَزَالُ رَاكِبًا مَا انْتَعَلَ ‏"‏ ‏.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে এক সফরে ছিলাম। তিনি বলেনঃ তোমার (সফরকালে) জুতা বেশী রাখবে। কারণ জুতা পরিধান করে সব সময় সফর করা যায়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2096) ، ورواہ مسلم (3096) نحو المعنیٰ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي- وإن لم يصرح بسماعه من جابر في شيء من طرق الحديث، متابع، وقد صحح له مسلم هذا الحديث، وكذا ابن حبان. وأخرجه مسلم (٢٠٩٦)، والنسائي في "الكبرى" (٩٧١٥) من طريق معقل بن عُبيد الله، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٦٢٦)، و"صحيح ابن حبان" (٥٤٥٧). وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" ٨/ ٤٤، وابن عدي في "الكامل" ٦/ ٢٤١٩ من طريق النضر بن شميل، عن مُجَّاعة بن الزبير، عن الحسن البصري، عن جابر. ومجَّاعة تصلح روايته للمتابعة. وقد اختُلف عنه في تعيين الصحابي فمرة ذكر جابراً، ومرة ذكر عمران بن حصين. وكلاهما لم يصرح الحسن البصري بسماعه منهم، لكن مع ذلك تصلح روايته هذه للاعتبار.









সুনান আবী দাউদ (4134)


حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ نَعْلَ النَّبِيِّ، صلى الله عليه وسلم كَانَ لَهَا قِبَالاَنِ ‏.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)–এর জুতার দু’টি তসমা (ফিতা) ছিল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5857)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. قتادة: هو ابن دِعامة السدوسي، وهمام: هو ابن يحيى العَوْذي. وأخرجه البخاري (٥٨٥٧)، وابن ماجه (٣٦١٥)، والتر مذي (١٨٧٤) و (١٨٧٥)، والنسائي في "الكبرى" (٩٧١٦) من طريق همام بن يحيى، به. وهو في "مسند أحمد" (١٢٢٢٩). وأخرجه البخاري (٣١٠٧) و (٥٨٥٨) من طريق عيسى بن طهمان، عن أنس نحوه. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ١/ ٤٧٨ من طريق عفان عن همام عن قتادة، عن أنس قال: كانت نعل النبي ﷺ لها قبالان من سبت ليس عليها شعر. قال ابن الأثير: القبالان: تثنية قِبال: زمام النعل، وهو السير الذي يكون بين الأصبعين.