সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ بُكَيْرٍ، عَنْ بُسْرِ بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ خَالِدٍ، عَنْ أَبِي طَلْحَةَ، أَنَّهُ قَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِنَّ الْمَلاَئِكَةَ لاَ تَدْخُلُ بَيْتًا فِيهِ صُورَةٌ " . قَالَ بُسْرٌ ثُمَّ اشْتَكَى زَيْدٌ فَعُدْنَاهُ فَإِذَا عَلَى بَابِهِ سِتْرٌ فِيهِ صُورَةٌ فَقُلْتُ لِعُبَيْدِ اللَّهِ الْخَوْلاَنِيِّ رَبِيبِ مَيْمُونَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَلَمْ يُخْبِرْنَا زَيْدٌ عَنِ الصُّوَرِ يَوْمَ الأَوَّلِ فَقَالَ عُبَيْدُ اللَّهِ أَلَمْ تَسْمَعْهُ حِينَ قَالَ إِلاَّ رَقْمًا فِي ثَوْبٍ .
যায়িদ ইবনু খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ ত্বালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ঘরে ছবি থাকে সে ঘরে ফেরেশতা প্রবেশ করেন না। বুস্র (রহ) বলেন, অতঃপর যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অসুস্থ হলে আমরা তাকে দেখতে তার বাড়িতে গেলাম। তার ঘরের দরজায় ছবিযুক্ত একটি পর্দা দেখলাম। আমি তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মাইমুনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–এর পালিত পুত্র ‘উবাইদুল্লাহ আল-খাওলানীকে বললাম, যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের ছবি না রাখার হাদীস শুনিয়েছেন। ‘উবাইদুল্লাহ (রহ) বলেন, আপনি কি শুনেন নি, সে হাদীসে তিনি একথাও উল্লেখ করেছেন, কাপড়ের মধ্যে যদি গাছপালা, লতাপাতা ইত্যাদি ছবি থাকে, তা নিষেধ নয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5958) صحیح مسلم (2106)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. بُكير: هو ابن عبد الله بن الأشجّ، والليث: هو ابن سعْد. وأخرجه البخاري (٣٢٢٦) و (٥٩٥٨)، ومسلم (٢١٠٦)، والنسائي في "الكبرى" (٩٦٧٨) من طريق بكير بن عبد الله بن الأشج، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٣٤٥)، و "صحيح ابن حبان" (٥٨٥٠). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٦٧٦) من طريق مخرمة بن سليمان، و (٩٦٧٧) من طريق عَبيدة بن سفيان، كلاهما عن زيد بن خالد الجهني أنه سمع رسول الله ﷺ يقول ذلك. فجعله من مسند زيد بن خالد الجهني، وهو صحابي أيضاً. لكن في الإسنادين إليه عبد الرحمن بن أبي عمرو، وهو مجهول. وأخرجه النسائي أيضاً (٩٦٨٠) من طريق محمد بن إسحاق، و (٩٦٨١) من طريق مالك، كلاهما عن سالم أبي النضر، عن عُبيد الله بن عبد الله بن عتبة أنه دخل على أبي طلحة يعوده … فذكر قصة، وفيها أنه أخبره أن رسول الله ﷺ حين نهى عن الصور قال: "إلا ما كان رقما في ثوب". وقد سلف عند الحديث (٤١٥٣) تخريجه من طريق عُبيد الله عن ابن عباس عن أبي طلحة وذكر الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٣٨١ أن الدارقطني رجح رواية من أثبت ابن عباس، لكن الحافظ احتمل بأن عبيد الله سمعه من ابن عباس، عن أبي طلحة، ثم لقي أبا طلحة لما دخل يعوده فسمعه منه واستدل برواية أبي النضر هذه التي فيها زيادة قصة عيادة أبي طلحة. قال أبو بكر في "عارضة الأحوذي" ٧/ ٢٥٣: أما الوعيد على المصورين فهو كسائر الوعيد في أهل المعاصي، معلق بالمشيئة كما بيناه، وموقوف على التوبة كما شرحناه، وأما كيفية الحكم فيها فإنها محرمة إذا كانت أجساداً بالإجماع فإن كانت رقماً ففيها أربعة أقوال: الأول: أنها جائرة لقوله في الحديث: إلا ما كان رقماً في ثوب. الثاني: أنه ممنوع لحديث عائشة: دخل النبي ﷺ وأنا مستترة بقرام فيه صورة فتلون وجهه، ثم تناول الستر فهتكه ثم قال: "إن أشدَّ الناس عذاباً المصورون" الثالث: أنه إذا كانت صورة متصلة الهيئة قائمة الشكل منع، فإن هتك وقطع وتفرقت أجزاؤه جاز للحديث المتقدم، قالت فيه: وجعلت منه وسادتين كان يرتفق بهما. الرابع: أنه إذا كان ممتهناً جاز وإن كان معلقاً لم يجز، والثالث أصح. والله أعلم.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ الصَّبَّاحِ، أَنَّ إِسْمَاعِيلَ بْنَ عَبْدِ الْكَرِيمِ، حَدَّثَهُمْ قَالَ حَدَّثَنِي إِبْرَاهِيمُ، - يَعْنِي ابْنَ عَقِيلٍ - عَنْ أَبِيهِ، عَنْ وَهْبِ بْنِ مُنَبِّهٍ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَمَرَ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ - رضى الله عنه - زَمَنَ الْفَتْحِ وَهُوَ بِالْبَطْحَاءِ أَنْ يَأْتِيَ الْكَعْبَةَ فَيَمْحُوَ كُلَّ صُورَةٍ فِيهَا فَلَمْ يَدْخُلْهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم حَتَّى مُحِيَتْ كُلُّ صُورَةٍ فِيهَا .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মাক্কাহ বিজয়ের সময় নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আল-বাতহা’ নামক স্থানে দাঁড়িয়ে ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আদেশ দিলেন যেন তিনি কা’বার ভেতরে গিয়ে এর মধ্যে বিদ্যমান সব ছবি মিটিয়ে দেন। অতঃপর সব ছবি মিটিয়ে দেয়ার পূর্ব পর্যন্ত নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভেতরে প্রবেশ করেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أصلہ عند الترمذي (1749 وسندہ صحیح) بلفظ آخر
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن حبان (٥٨٥٧)، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" ٤/ ٧٩، والبيهقي ٧/ ٢٦٨ من طريق إسماعيل بن عبد الكريم، بهذا الإسناد. وقد سقط من إسناد أبي نعيم في المطبوع سقط يُستدرك من هنا. وأخرجه أحمد (١٤٥٩٦) و (١٥١٠٩)، وأبو عوانة في اللباس كما في "إتحاف المهرة" ٣/ ٤٤٦، والبيهقي ٥/ ١٥٨ من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول … وقوله: وهو بالبطحاء، أي: بطحاء مكة، وهو الأبطح، ويضاف إلى مكة أو مني، وهو واحد، وهو المحصب، وهو خيفُ بني كنانة، وكل مسيل واسع فيه دقاق الحصى، فهو أبطح، وقيل الأبطح والبطحاء: الرمل المنبسط على وجه الأرض، وقيل الأبطح: أثر المسيل ضيقاً كان أو واسعاً.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنِ ابْنِ السَّبَّاقِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ حَدَّثَتْنِي مَيْمُونَةُ، زَوْجُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِنَّ جِبْرِيلَ عَلَيْهِ السَّلاَمُ كَانَ وَعَدَنِي أَنْ يَلْقَانِيَ اللَّيْلَةَ فَلَمْ يَلْقَنِي " . ثُمَّ وَقَعَ فِي نَفْسِهِ جَرْوُ كَلْبٍ تَحْتَ بِسَاطٍ لَنَا فَأَمَرَ بِهِ فَأُخْرِجَ ثُمَّ أَخَذَ بِيَدِهِ مَاءً فَنَضَحَ بِهِ مَكَانَهُ فَلَمَّا لَقِيَهُ جِبْرِيلُ عَلَيْهِ السَّلاَمُ قَالَ إِنَّا لاَ نَدْخُلُ بَيْتًا فِيهِ كَلْبٌ وَلاَ صُورَةٌ فَأَصْبَحَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَأَمَرَ بِقَتْلِ الْكِلاَبِ حَتَّى إِنَّهُ لَيَأْمُرُ بِقَتْلِ كَلْبِ الْحَائِطِ الصَّغِيرِ وَيَتْرُكُ كَلْبَ الْحَائِطِ الْكَبِيرِ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট বর্ণনা করেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ জিবরাঈল (আ) আমার সাথে রাতে সাক্ষাত করার ওয়াদা করেছিলান; কিন্তু সাক্ষাত করেননি। অতঃপর তাঁর মনে পড়লো যে, আমাদের বিছনার নীচে একটি কুকুর শাবক আছে। তিনি এটাকে বের করে দিতে আদেশ দিলে তা বের করা হলো। অতঃপর তিনি নিজেই পানি দিয়ে সে স্থানটা ধুয়ে ফেলেন। জিবরাঈল (আ) তাঁর সাথে সাক্ষাতের সময় বললেন, যে ঘরে কুকুর এবং ছবি থাকে সে ঘরে আমরা কখনো প্রবেশ করি না। সকালবেলা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুকুর মারতে আদেশ দিলেন, এমনকি ছোট বাগান পাহারার কুকুর হত্যা করারও আদেশ দেন, বড় বাগানের পাহারাদার কুকুর ছাড়া।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2105)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن السَّبَّاق: هو عُبيد، وابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري، وابن وهب: هو عَبد الله. وأخرجه مسلم (٢١٠٥)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٧٦) من طريقين عن ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٨٠٠)، و "صحيح ابن حبان" (٥٦٤٩) و (٥٨٥٦). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٧٦٩) من طريق محمد بن الوليد الزُّبيدي، عن ابن شهاب، عن ابن السَّبَّاق، قال: أخبرتني ميمونة. فلم يذكر في إسناده ابن عباس. قوله: الحائط: هو الحديقة من النخل، سمي كذلك للتحويط عليه، وقوله: "يترك كلب الحائط الكبير" يعني للحاجة إلى حماتيه بخلاف الصغير الذي يحميه ساكنه. والجرو: ولد الكلب والسباع. قلنا: والأمر بقتل الكلاب منسوخ بحديث جابر في صحيح مسلم (١٥٧٢)، أمرنا رسول الله ﷺ بقتل الكلاب حتى إن المرأة تَقْدَمُ من البادية بكلبها، فنقتُلُه، ثم نهى رسول الله ﷺ عن قتلها.
حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، مَحْبُوبُ بْنُ مُوسَى حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ الْفَزَارِيُّ، عَنْ يُونُسَ بْنِ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ مُجَاهِدٍ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَتَانِي جِبْرِيلُ عَلَيْهِ السَّلاَمُ فَقَالَ لِي أَتَيْتُكَ الْبَارِحَةَ فَلَمْ يَمْنَعْنِي أَنْ أَكُونَ دَخَلْتُ إِلاَّ أَنَّهُ كَانَ عَلَى الْبَابِ تَمَاثِيلُ وَكَانَ فِي الْبَيْتِ قِرَامُ سِتْرٍ فِيهِ تَمَاثِيلُ وَكَانَ فِي الْبَيْتِ كَلْبٌ فَمُرْ بِرَأْسِ التِّمْثَالِ الَّذِي فِي الْبَيْتِ يُقْطَعُ فَيَصِيرُ كَهَيْئَةِ الشَّجَرَةِ وَمُرْ بِالسِّتْرِ فَلْيُقْطَعْ فَلْيُجْعَلْ مِنْهُ وِسَادَتَيْنِ مَنْبُوذَتَيْنِ تُوطَآنِ وَمُرْ بِالْكَلْبِ فَلْيُخْرَجْ " . فَفَعَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَإِذَا الْكَلْبُ لِحَسَنٍ أَوْ حُسَيْنٍ كَانَ تَحْتَ نَضَدٍ لَهُمْ فَأَمَرَ بِهِ فَأُخْرِجَ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَالنَّضَدُ شَىْءٌ تُوضَعُ عَلَيْهِ الثِّيَابُ شِبْهُ السَّرِيرِ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ জিবরীল আমার নিকট এসে বলেন, গত রাতে আমি আপনার কাছে এসেছিলাম, কিন্তু আমি প্রবেশ করিনি। কারণ ঘরের দরজায় ছবি ছিল, ঘরের মধ্যে ছিল ছবিযুক্ত পর্দা এবং ঘরে ভেতরে ছিল কুকুর। সুতরাং আপনি ঘরে ঝুলানো ছবির মাথা কেটে দেয়ার আদেশ করুন, তাহলে তা গাছের আকৃতিতে পরিণত হবে। এর পর্দাটি কেটে দুইটি বালিশের ভেতরের কাপড় বানাতে আদেশ করুন এবং কুকুরটিকে বের করে দেয়ার হুকুম দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপদেশ মত কাজ করলেন। কুকুরটি ছিল হাসান বা হুসাইনের এবং তা তাদের খাটের নীচে শুয়েছিল। তিনি সেটাকেও বের করে দেয়ার আদেশ দেন এবং তা বের করে দেয়া হলো। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আন-নাযাদ হচ্ছে কাপড় রাখার বস্তু, গদি সদৃশ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4501) ، أخرجہ الترمذي (2806 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح دون قصة التمثال، وهذا إسناد حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق السبيعي. وأخرجه الترمذي (٣٠١٤) من طريق عبد الله بن المبارك، عن يونس بن أبي إسحاق السبيعي، به. وقال: هذا حديث حسن صحيح. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٧٠٨) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن مجاهد، به. مختصراً بذكر الستر الذي فيه تماثيل. وهو في "مسند أحمد" (٨٠٤٥). ويشهد له دون قصة التمثال حديث ميمونة السالف قبله. وحديث عائشة عند البخاري (٢٤٧٩)، ومسلم (٢١٠٧). وحديث ابن عمر عند البخاري (٥٩٦٠). وحديث أسامة عند أحمد (٢١٧٧٢) وغيره. وإسناده قوي. القِرام: هو الستر الرقيق، وقيل: الصفيق من صوف ذي ألوان. قاله ابن الأثير. وقال الخطابي: النضد: متاع البيت ينضد بعضه على بعض، أي: يرفع بعضه فوق الآخر. والمنبوذتان: وسادتان لطيفتان وسميتا منبوذتين لخفتهما، يُنبذان ويُطرحان للقعود عليهما، وفيه دليل على أن الصورة إذا غيرت بأن يقطع رأسُها أو تُحَلّ أوصالُها حتى تغير هيئتها عما كانت لم يكن بها بعد ذلك بأس.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ هِشَامِ بْنِ حَسَّانَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُغَفَّلٍ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ التَّرَجُّلِ إِلاَّ غِبًّا .
‘আবদুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সব সময় চুল আঁচড়াতে নিষেধ করেছেন, তবে একদিন পরপর (আঁচড়ালে দোষ নেই)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (756 ا) نسائی (5058) ، ھشام بن حسان مدلس وعنعن ، وحدیث النسائي (8/ 132 ح 5061 وسندہ صحیح) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 147)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد اختلف في رفعه ووقفه وفي وصله وإرساله. فقد أخرجه الترمذي (١٨٥٢) و (١٨٥٣)، والنسائي في "الكبرى" (٩٢٦٤) من طريق هشام بن حسان، به. وقال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح! وخالف هشاماً قتادة، فرواه عند النسائي (٩٢٦٥) عن الحسن عن النبي ﷺ مرسلاً. وخالفهما يونس بن عُبيد عند النسائي أيضاً (٩٢٦٦) فرواه عن الحسن ومحمد ابن سيرين قالا: الترجل غبٌّ. فجعله من قولهما موقوفاً عليهما. وهو في "مسند أحمد" (١٦٧٩٣). لكن يشهد للمرفوع المتصل حديث رجل من أصحاب النبي ﷺ في الحديث التالي عند المصنف. وحديث رجل أيضاً من أصحاب النبي ﷺ سلف عند المصنف برقم (٢٨) وإسناده صحيح. قوله: غِبّاً: قال الحربي في "غريب الحديث" ٢/ ٦١١: قال الأصمعي: الغِبّ إذا شربت الإبلُ يوماً وغبَّت يوماً، ومنه شربت غبّاً، وفلان يزورُني غباً، أي: يأتيني يوماً ويَدَع يوماً. وانظر فقه الحديث عند الحديث الآتي عند المصنف برقم (٤١٦١).
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ الْمَازِنِيُّ، أَخْبَرَنَا الْجُرَيْرِيُّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، أَنَّ رَجُلاً، مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم رَحَلَ إِلَى فَضَالَةَ بْنِ عُبَيْدٍ وَهُوَ بِمِصْرَ فَقَدِمَ عَلَيْهِ فَقَالَ أَمَا إِنِّي لَمْ آتِكَ زَائِرًا وَلَكِنِّي سَمِعْتُ أَنَا وَأَنْتَ حَدِيثًا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم رَجَوْتُ أَنْ يَكُونَ عِنْدَكَ مِنْهُ عِلْمٌ . قَالَ وَمَا هُوَ قَالَ كَذَا وَكَذَا قَالَ فَمَا لِي أَرَاكَ شَعِثًا وَأَنْتَ أَمِيرُ الأَرْضِ قَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَنْهَانَا عَنْ كَثِيرٍ مِنَ الإِرْفَاهِ . قَالَ فَمَا لِي لاَ أَرَى عَلَيْكَ حِذَاءً قَالَ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُنَا أَنْ نَحْتَفِيَ أَحْيَانًا .
‘আবদুলাহ ইবনু বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক সাহাবী মিসরে অবস্থারত ফাদালাহ ইবনু ‘উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পৌঁছেন। অতঃপর তিনি বলেন, আমি কেবল আপনার সাথে সাক্ষাৎ করতে আসিনি, বরং আমি এবং আপনি যে হাদীসটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট শুনেছি, আশা করি এ সম্পর্কে আপনার কিছু জানা আছে। তিনি বললেন, তা কোন বিষয়ে? তিনি বললেন, এরূপ এরূপ। তিনি বলেন, আপনি একটি স্থানের নেতা, অথচ আপনার মাথায় চুল উস্কোখুস্কো দেখছি? সাহাবী বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মাত্রাতিরিক্ত জাঁকজমক দেখাতে নিষেধ করেছেন। তিনি (ফাদালাহ) বলেন, আপনার পায়ে জুতা দেখছি না কেন? তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মাঝেমধ্যে খালি পায়ে চলার আদেশ দিতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سعید بن إیاس الجریري اختلط (انظر الکواکب النیرات ص 178 الرقم: 24) ولم یثبت تحدیثہ بہ قبل اختلاطہ ، وحدیث النسائي (185/8 ح 5241) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 147)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الجُرَيري: هو سعيد بن إياس، وكان قد اختلط، ويزيد -وهو ابن هارون- وإن كان اختُلِفَ في سماعِه من الجريري أكان قبل اختلاطه أم بعده، تابعه إسماعيل ابنُ عُلَيّة، وهو ممن سمع من الجُريري قبل اختلاطه. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٢٦٨) من طريق إسماعيل ابن عُلَيّة، عن سعيد الجُريري، به. وسمى الصحابيَّ عُبيداً. لكن قال المزي في "التحفة" ٧/ ٢٢٦: وهو وهم، والصواب: فضالة بن عُبيد. يعني كما في رواية المصنف. وأخرجه النسائي (٩٢٦٧) من طريق كهْمَس، عن عبد الله بن شقيق، عن رجل من أصحاب النبي ﷺ عاملاً بمصر. قال الخطابي: الإرفاه: الاستكثار من الزينة وأن لا يزال يهيئ نفسه، وأصله من الرفه، وهو أن ترد إلابل الماء كل يوم، فإذا وردت يوماً ولم ترد يوماً فذلك الغِبُّ … قال: كره رسول الله ﷺ الإفراط في التنعُّم والتدلُّك والتدهن والترجيل في نحو ذلك من أمر الناس، فأمر بالقصد في ذلك، وليس معناه ترك الطهارة والتنظيف، فإن الطهارة والنظافة من الدين. والله أعلم. وانظر كلام ابن عبد البر الآتي ذكره عند الحديث التالي.
حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي أُمَامَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ، قَالَ ذَكَرَ أَصْحَابُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمًا عِنْدَهُ الدُّنْيَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَلاَ تَسْمَعُونَ أَلاَ تَسْمَعُونَ إِنَّ الْبَذَاذَةَ مِنَ الإِيمَانِ إِنَّ الْبَذَاذَةَ مِنَ الإِيمَانِ " . يَعْنِي التَّقَحُّلَ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ هُوَ أَبُو أُمَامَةَ بْنُ ثَعْلَبَةَ الأَنْصَارِيُّ .
আবূ উমামাহ সা’লাবা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাঁর সামনে দুনিয়াদারী সম্পর্কে আলোচনা করছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা কি শুনেতে পাও না! তোমরা কি শুনতে পাও না যে, পোশাক-পরিচ্ছেদে নম্রতা প্রকাশ ঈমানের অঙ্গ, পোশাক-পরিচ্ছেদে নম্রতা প্রকাশ ঈমানের অঙ্গ অর্থাৎ পোশাক পরিচ্ছদে বাবুগিরি প্রদর্শন না করা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (4118) ، ابن إسحاق عنعن ، وحدیث الطحاوي (مشکل الآثار: 1/ 478،6/ 151) والطبراني (الکبیر: 1/ 272 ح 790،وسندہ حسن) یغني عنہ و لفظ الطبراني: قال رسول اللّٰہ ﷺ: ((إن البذاذۃ من الإیمان،إن البذاذۃ من الإیمان)) ، (انوار الصحیفہ ص 147)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد اختلف فيه عن محمد بن إسحاق كما بيناه في "مسند أحمد" (٢٤٠٠٩/ ٥٨)، لكن روي الحديث من غير طريق ابن إسحاق بإسناد حسن. ابن نُفيل: هو عبد الله بن محمد بن علي بن نفيل النُّفيليّ. وأخرجه ابن ماجه (٤١١٨) من طريق أسامة بن زيد، عن عبد الله بن أبي أمامة عن أبيه. وفي إسناده أيوب بن سويد، وهو وإن كان ضعيفاً، تابعه صالح بن كيسان، عند أحمد في "مسنده" (٢٤٠٠٩/ ٥٨) وغيره، فرواه عن عبد الله بن أبي أمامة أن أباه أخبره .. بالحديث، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الله بن أبي أمامة، وقد صرح فيه بسماعه من أبيه، فلا تقدحُ فيه روايةُ ابن إسحاق. وانظر تمام تخريجه في "مسند أحمد". قال ابن عبد البر في "الاستذكار" ٣/ ٢٠٢ عند حديث عائشة الذي فيه أنها كانت ترجل شعر رسول الله ﷺ وهو معتكف وهي حائض، وهو في"صحيح البخاري" (٢٩٦)، ومسلم (٢٩٧)، قال: وفيه ترجيل الشعر، وفي ترجيله لشعره ﵇ وسواكه وأخذه من شاربه ونحو ذلك ما يدل على أنه ليس من السنة ولا الشريعة ما خالف النظافة وحسن الهيئة في اللباس والزينة التي من شكل الرجال للرجال، ومن شكل النساء للنساء، ويدل على أن قوله ﵇: "البذاذة من الإيمان" أراد به اطّراح الشهوة في الملبس، والإسراف فيه، الداعي إلى التبختر والبطر، ليصح معاني الآثار، ولا تتضادّ، وفي معنى هذا الحديث حديث عبد الله بن مغَفَّل: أن رسول الله ﷺ نهى عن الترجل إلا غِبّاً، يريد به الحاجة، لئلا يكون ثائر الرأس شعثه كأنه شيطان، كما جاء عنه ﵇. وانظر "شرح مشكل الآثار" الحديث (١٥٣١) و (٣٠٣٦) للإمام الطحاوي بتحقيقنا.
حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ، عَنْ شَيْبَانَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْمُخْتَارِ، عَنْ مُوسَى بْنِ أَنَسٍ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ كَانَتْ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم سُكَّةٌ يَتَطَيَّبُ مِنْهَا .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি উত্তম আতরদানি ছিল, তিনি তা হতে সুগন্ধি ব্যবহার করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4444) ، أخرجہ الترمذي فی الشمائل بتحقیقي (215 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو أحمد: هو محمد بن عبد الله الزُّبيري الأسدي. وقد جوّد الإِمام ابن المنذر إسناد هذا الحديث فيما نقله عنه الإِمام العيني في "عمدة القاري". وأخرجه الترمذي في "الشمائل المحمدية" (٢١٧)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي" ص ٩٨ من طريق أبي أحمد الزبيري، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" ١/ ٣٩٩، وأبو يعلى في "معجم شيوخه" (١٤١)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي" ٩٨، والضياء المقدسي في "المختارة" (٢٦٦٩) من طريق إسرائيل بن يُونس السَّبيعي، عن عبد الله بن المختار، به. وأخرجه أبو الشيخ ص ٩٨ هن طريق طاهر بن أبي أحمد الزبيري، عن أبيه، عن إبراهيم بن طهمان، عن حسين بن ذكوان المعلم، عن موسى بن أنس، به.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي ابْنُ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ سُهَيْلِ بْنِ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ كَانَ لَهُ شَعْرٌ فَلْيُكْرِمْهُ " .
‘আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যার মাথায় চুল আছে সে যেন এর যত্ন নেয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4450)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل ابن أبي الزناد -وهو عبد الرحمن- أبو صالح: هو ذكوان السَّمّان، وابن وهب: هو عبد الله. وقد حسن إسناده الحافظ في "فتح الباري" ١٠/ ٣٦٨. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (٦٤٥٥)، وفي "الأداب" (٦٩٥) من طريق سعيد بن منصور وداود بن عمرو، عن ابن أبي الزناد، بهذا الإسناد. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٣٣٦٥) من طريق داود بن عمرو، عن ابن أبي الزناد، عن أبيه، عن الأعرج، عن أبي هريرة. ويشهد له حديث عائشة عند بحشل في "تاريخ واسط" ص ٢٤٢، والطحاوي في "شرح المشكل" (٣٣٦٠)، والبيهقي في الشعب" (٦٤٥٦) وحسَّن إسناده أيضاً الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٣٦٨. وليس بين هذا الحديث وحديث عبد الله بن مغفَّل السالف عند المصنف برقم (٤١٥٩) تعارض، كما أشار ابن عبد البر عند الحديث السالف برقم (٤١٦١) ولما قال الخطابيُّ عند الحديث (٤١٦٠): كره رسول الله ﷺ الإفراط في التنعم والتدلُّك والتدهُّن والترجيل في نحو ذلك من أمر الناس، فأمر بالقصد في ذلك، وليس معناه ترك الطهارة والتنظيف، فإن الطهارة والنظافة من الدين. ونحوه ما قاله ابن قيم الجوزية في "تهذيب السنن" ٦/ ٨٥.
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ الْمُبَارَكِ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، قَالَ حَدَّثَتْنِي كَرِيمَةُ بِنْتُ هَمَّامٍ، أَنَّ امْرَأَةً، أَتَتْ عَائِشَةَ - رضى الله عنها - فَسَأَلَتْهَا عَنْ خِضَابِ الْحِنَّاءِ فَقَالَتْ لاَ بَأْسَ بِهِ وَلَكِنِّي أَكْرَهُهُ كَانَ حَبِيبِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَكْرَهُ رِيحَهُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ تَعْنِي خِضَابَ شَعْرِ الرَّأْسِ .
ইয়াহহিয়া ইবনু আবূ কাসীর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কারীমহ বিনতু হাম্মাম (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে বর্ণনা করেন যে, এক মহিলা মেহেদির খেযাব লাগানো সম্পর্কে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, এটা ব্যবহারে কোন দোষ নেই; তবে আমি তা অপছন্দ করি। কারন আমার প্রিয় নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটির গন্ধ অপছন্দ করতেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অর্থাৎ মাথার চুলের খেযাব। [৪১৬৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، قال معاذ: کریمۃ بنت ھمام الطائیۃ: روی لھا یحییٰ بن ابی کثیر وھو لا یروی إلا عن ثقۃ عندہ غالباً وصحح لھا الحاکم والذھبي بتصحیح حدیثھا (المستدرک: 7145)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. كريمة بنت همام روى عنها جمع ولم يؤثر توثيقها عن أحد، وقد انفردت بهذا الحديث. وقد اختلفت رواياتُ "السنن" في هذا الإسناد، فقد جاء في (هـ) وهي برواية ابن داسه: عن علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، قال: حدثتني كريمة … وجاء في (أ) و (ب) و (ج) دون ذكر يحيى بن أبي كثير، وهذه الأصول الثلاثة وإن كانت برواية اللؤلؤي، فقد أشير في هامش (هـ) إلى أنه كذلك في رواية ابن الأعرابي والرملي دون ذكر يحيى بن أبي كثير، فكان هذا هو الصواب فلذلك أثبتناه، ويؤيده أن أحمد والنسائي قد أخرجاه من طريقين آخرين عن علي بن المبارك، فلم يذكرا فيه يحيى بن أبي كثير. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٣١٢) من طريق علي بن المبارك، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٨٦١) و (٢٥٧٦٠).
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَتْنِي غِبْطَةُ بِنْتُ عَمْرٍو الْمُجَاشِعِيَّةُ، قَالَتْ حَدَّثَتْنِي عَمَّتِي أُمُّ الْحَسَنِ، عَنْ جَدَّتِهَا، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ هِنْدًا بِنْتَ عُتْبَةَ، قَالَتْ يَا نَبِيَّ اللَّهِ بَايِعْنِي . قَالَ " لاَ أُبَايِعُكِ حَتَّى تُغَيِّرِي كَفَّيْكِ كَأَنَّهُمَا كَفَّا سَبُعٍ " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ‘উতবাহ্র কন্যা হিন্দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, হে আল্লাহর নাবী! আমার বাই’আত নিন। তিনি বলেনঃ তুমি তোমার দু’ হাতের তালু পরিবর্তন না করা পর্যন্ত তোমাকে বাই’য়াত করবো না। সে দু’টি যেন হিংস্র প্রাণীর থাবার ন্যায়। [৪১৬৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قال الحافظ ابن حجر في غبطۃ و أم الحسن وجدتھا: ’’ وفي إسنادہ مجہولات ثلاث‘‘ (التلخیص الحبیر 236/2) ، (انوار الصحیفہ ص 148)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة غِبطة وعمتها وجدتها. وأخرجه أبو يعلى (٤٧٥٤)، والبيهقي ٧/ ٨٦، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" ٧٠/ ١٨٣، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة غبطة بنت عمرو ٣٥/ ٢٤٥ من طريق غبطة بنت عمرو، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُحَمَّدٍ الصُّورِيُّ، حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، حَدَّثَنَا مُطِيعُ بْنُ مَيْمُونٍ، عَنْ صَفِيَّةَ بِنْتِ عِصْمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ أَوْمَتِ امْرَأَةٌ مِنْ وَرَاءِ سِتْرٍ بِيَدِهَا كِتَابٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَبَضَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَدَهُ فَقَالَ " مَا أَدْرِي أَيَدُ رَجُلٍ أَمْ يَدُ امْرَأَةٍ " . قَالَتْ بَلِ امْرَأَةٌ . قَالَ " لَوْ كُنْتِ امْرَأَةً لَغَيَّرْتِ أَظْفَارَكِ " . يَعْنِي بِالْحِنَّاءِ .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক মহিলা পর্দার আড়াল হতে একটি কিতাব হাতে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে বাড়িয়ে দিলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত না বাড়িয়ে বললেনঃ আমি বুঝতে পারছি না টা কোন পুরুষের হাত নাকি নারীর হাত? সে বললো, বরং নারীর হাত। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি মহিলা হলে অবশ্যই তোমার নখগুলো মেহেদির রং দ্বারা রঞ্জিত করতে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (5092) ، صفیۃ بنت عصمۃ: لا تعرف ومطیع:لین لحدیث (تق: 8624،6820) ، (انوار الصحیفہ ص 148)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف مطيع بن ميمون العنبري، وجهالة صفية بنت عصمة. خالد بن عبد الرحمن: هو الخُراساني. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٣١١) من طريق مطيع بن ميمون، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٢٥٨).
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أَنَّهُ سَمِعَ مُعَاوِيَةَ بْنَ أَبِي سُفْيَانَ، عَامَ حَجَّ وَهُوَ عَلَى الْمِنْبَرِ وَتَنَاوَلَ قُصَّةً مِنْ شَعْرٍ كَانَتْ فِي يَدِ حَرَسِيٍّ يَقُولُ يَا أَهْلَ الْمَدِينَةِ أَيْنَ عُلَمَاؤُكُمْ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنْهَى عَنْ مِثْلِ هَذِهِ وَيَقُولُ " إِنَّمَا هَلَكَتْ بَنُو إِسْرَائِيلَ حِينَ اتَّخَذَ هَذِهِ نِسَاؤُهُمْ " .
হুমাইদ ইবনু ‘আবদুর রহমান (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার রাজত্বকালে হাজ্জ উপলক্ষে এক সমাবেশে মিম্বারে দাঁড়ালেন। তিনি তার দেহরক্ষী পুলিশের হাত হতে একগুচ্ছ কৃত্রিম চুল নিজ হাতে নিয়ে সবাইকে সম্বোধন করে বললেন, হে মাদীনাহ্বাসী! তোমাদের ‘আলেমগণ কোথায়? আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এটা ব্যবহার করতে নিষেধ করতে শুনেছি এবং আমি তাঁকে বলতে শুনেছি যে, বনী ইসরাঈলের নারীরা এ কৃত্রিম চুল ব্যবহারে অভ্যস্থ হওয়ায় ধ্বংস হয়েছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3468) صحیح مسلم (2127)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك"، ٢/ ٩٤٧. وأخرجه البخاري (٣٤٦٨) و (٥٩٣٢)، ومسلم (٢١٢٧)، والترمذي (٢٩٨٧)، والنسائي في "الكبرى" (٩٣١٤) من طرق عن الزهري، به. وأخرجه بنحوه البخاري (٣٤٨٨) و (٥٩٣٨)، ومسلم (٢١٢٧) والنسائي في "الكبرى" (٩٣١٥) و (٩٣١٦) من طريق سعيد بن المسيب، عن معاوية بن أبي سفيان. وهو في "مسند أحمد" (١٦٨٦٥)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥١١) و (٥٥١٢). والحرسيّ، قال ابن الأثير: بفتح الراء: واحِد الحُرّاس، وهم خدم السلطان المُرتَّبون لحفظه وحراسته، والحرسيّ واحد الحرس، كأنه منسوب إليه حيث صار اسم جنسٍ، ويجوز أن يكون منسوباً إلى الجمع شاذّاً. والقصة: الخصلة من الشعر، قال في "عون المعبود" ١١ - / ١٤٩: والحديث حجة للجمهور في منع وصل الشعر بشيء آخر سواء كان شعراً أم لا، ويزيده حديث جابر عند مسلم (٢١٢٦) زجر رسول الله ﷺ أن تصل المرأة بشعرها شيئاً. وذهب الليث ابن سعد وكثير من الفقهاء أن الممتنع وصل الشعر بالشعر، وأما وصل الشعر بغيره من خرقة أو غيرها فلا يدخل في النهي، ويأتي عند المصنف برقم (٤١٧١) عن سعيد بن جبير أنه قال: لا "بأس بالقرامل. والمراد بها خيوط من حرير أو صوف يعمل ضفائر تصل به المرأة شعرها، وإليه ذهب أحمد. وقال محمد بن الحسن في "موطأ مالك" ص ٣٢٢ بروايته بإثر رواية حديث معاوية هذا: وبهذا نأخذ، يكره للمرأة أن تصل شعراً إلى شعرها، أو تتخذ قُصة شعر، ولا بأس بالوصل في الرأس إذا كان صوفاً، فأما الشعر من شعور الناس فلا ينبغي، وهو قول أبي حنيفة والعامة من فقهائنا.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَمُسَدَّدٌ، قَالاَ حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، قَالَ حَدَّثَنِي نَافِعٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْوَاصِلَةَ وَالْمُسْتَوْصِلَةَ وَالْوَاشِمَةَ وَالْمُسْتَوْشِمَةَ .
‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অভিশাপ দিয়েছে ঐসব নারীদেরকে যারা পরচুলা তৈরী করে, যারা তা ব্যবহার করে, যারা দেহে উল্কি লাগিয়ে দেয় ও যারা উল্কি লাগায়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5947) صحیح مسلم (2124)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هو ابن عُمر العُمري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (٥٩٣٧) و (٥٩٤٠) و (٥٩٤٧)، ومسلم (٢١٢٤)، وابن ماجه (١٩٨٧)، والترمذي (١٨٥٧) و (٢٩٨٩) و (٢٩٩٠)، والنسائي في "الكبرى" (٩٣٢٢) من طريق عُبيد الله بن عمر، والبخاري (٥٩٤٢)، ومسلم (٢١٢٤) من طريق صخر بن جويرية، كلاهما عن نافع، به. وجاء عند بعضهم: "لعن الله" بدل: لعن رسول الله وهو في "مسند أحمد" (٤٧٢٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥١٣). قال الخطابي: الواشمات: من الوشم في اليد، وكانت المرأة تغرز معصم يدها بإبرة أو مِسَلَّة حتى تدميه ثم تحشوه بالكحل فيخضرّ، يُفعل ذلك بدارات ونقوش، يقال منه: وشَمَتْ فهي واشمة. والمُستوشمة: هي التي تسأله، وتطلب أن يُفعل بها ذلك. والواصلات: هن اللواتي يصلن شعورهن بشعور غيرهن من النساء يُردْن بذلك طول الشعر، يُوهِمْن أن ذلك من أصل شعورهن، فقد تكون المرأة زعراء قليلة الشعر، أو يكون شعرها أصهب، فتصل شعرها بشعر أسود فيكون ذلك زوراً وكذباً، فنهى عنه. وقال الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٣٧٥: وذهب الليث ونقله أبو عبيدة عن كثير من الفقهاء أن الممتنع من ذلك وصل الشعر بالشعر، وأما إذا وصلت شعرها بغير الشعر من خرقة وغيرها فلا يدخل في النهي.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَعُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ عَلْقَمَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ لَعَنَ اللَّهُ الْوَاشِمَاتِ وَالْمُسْتَوْشِمَاتِ . قَالَ مُحَمَّدٌ وَالْوَاصِلاَتِ وَقَالَ عُثْمَانُ وَالْمُتَنَمِّصَاتِ ثُمَّ اتَّفَقَا وَالْمُتَفَلِّجَاتِ لِلْحُسْنِ الْمُغَيِّرَاتِ خَلْقَ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ . فَبَلَغَ ذَلِكَ امْرَأَةً مِنْ بَنِي أَسَدٍ يُقَالُ لَهَا أُمُّ يَعْقُوبَ . زَادَ عُثْمَانُ كَانَتْ تَقْرَأُ الْقُرْآنَ ثُمَّ اتَّفَقَا فَأَتَتْهُ فَقَالَتْ بَلَغَنِي عَنْكَ أَنَّكَ لَعَنْتَ الْوَاشِمَاتِ وَالْمُسْتَوْشِمَاتِ . قَالَ مُحَمَّدٌ وَالْوَاصِلاَتِ وَقَالَ عُثْمَانُ وَالْمُتَنَمِّصَاتِ ثُمَّ اتَّفَقَا وَالْمُتَفَلِّجَاتِ قَالَ عُثْمَانُ لِلْحُسْنِ الْمُغَيِّرَاتِ خَلْقَ اللَّهِ تَعَالَى . فَقَالَ وَمَا لِي لاَ أَلْعَنُ مَنْ لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ فِي كِتَابِ اللَّهِ تَعَالَى قَالَتْ لَقَدْ قَرَأْتُ مَا بَيْنَ لَوْحَىِ الْمُصْحَفِ فَمَا وَجَدْتُهُ . فَقَالَ وَاللَّهِ لَئِنْ كُنْتِ قَرَأْتِيهِ لَقَدْ وَجَدْتِيهِ ثُمَّ قَرَأَ { وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا } قَالَتْ إِنِّي أَرَى بَعْضَ هَذَا عَلَى امْرَأَتِكَ . قَالَ فَادْخُلِي فَانْظُرِي . فَدَخَلَتْ ثُمَّ خَرَجَتْ فَقَالَ مَا رَأَيْتِ وَقَالَ عُثْمَانُ فَقَالَتْ مَا رَأَيْتُ . فَقَالَ لَوْ كَانَ ذَلِكَ مَا كَانَتْ مَعَنَا .
‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহ্ লা’নাত করেছেন ঐ নারীদের যে নারী উল্কি আঁকে ও যার দেহে অংকন করানো হয়। মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, “যারা কৃত্রিম চুল ব্যবহার করে।” ‘উসমান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, “এবং যারা কপালের উপরের চুল উপড়িয়ে কপাল প্রশস্ত করে”, অতঃপর তারা দু’জনেই একমত হয়ে বলেন, “এবং যারা সৌন্দর্য লাভের জন্যে রেতি ইত্যাদি দ্বারা দাঁত ঘর্ষণ করে সরু করে দাঁতের মধ্যে ফাঁক সৃষ্টি করে, আল্লাহ্র সৃষ্টির পরিবর্তন করে তাদের প্রতিও লা’নাত। তিনি বলেন, বনী আসাদের উম্মু ইয়াকূব নাম্নী এক মহিলা একথা শুনেন এবং ঐ মহিলা কুরআন পড়তেন।” পরে উভয়ে একমত হয়ে বলেন, মহিলাটি তাঁর নিকট এসে বলেন, শুনতে পেলাম আপনি নাকি ঐসব নারীদের অভিশাপ দিয়েছেন, যারা দেহে উল্কি লাগায়, কৃত্রিম চুল ব্যবহার করে, কপালের উপরের চুল উপড়িয়ে কপাল প্রশস্ত করে, এবং যারা রেতি ইত্যাদি দ্বারা দাঁত ঘষে সরু করে, (‘উসমান বলেন), যারা আল্লাহ্র সৃষ্টির পরিবর্তন করে। ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাদের প্রতি অভিশাপ দিয়েছেন, আমি তাদের অভিশাপ দিবো না এ কেমন কথা? অথচ এ বিষয়টি মহান আল্লাহ্র কিতাবে বিদ্যমান। মহিলা বলেন, আমি তো এ কিতাবের আদ্যোপান্ত পড়েছি; কিন্তু এ কথা তো পাইনি। তিনি বলেন, “আল্লাহ্র কসম! তুমি (ভালোভাবে) পড়লে অবশ্যই তা পেয়ে যেতে।” অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেনঃ (অর্থ)
“আর রাসূল তোমাদেরকে যা দেন তা গ্রহণ করো, আর যা হতে তোমাদের বিরত রাখেন, তা হতে বিরত থাকো, আর আল্লাহকে ভয় করো; নিঃসন্দেহে আল্লাহ্ কঠোর শাস্তিদাতা” (সূরাহ হাশরঃ ৭)
মহিলা বললেন, আমি আপনার স্ত্রীকে দেখছি তিনি এসবের কিছু কিছু করেন। তিনি বললেন, তাহলে তুমি ভেতরে গিয়ে দেখে এসো। অতঃপর তিনি ভেতরে ঢুকে বেরিয়ে এলেন। তিনি (‘আবদুল্লাহ) বললেন, কি দেখলেন? ‘উসমান বলেন, তিনি বেরিয়ে এসে বললেন, না এসব করতে দেখিনি। তিনি বললেন, এসব থাকলে সে আমার সাথে থাকতে পারতো না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5931) صحیح مسلم (2125)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. علقمة: هو ابن قيس النخعي، وابراهيم: هو ابن يزيد النخعي، ومنصور: هو ابن المعتمر، وجرير: هو ابن عبد الحميد، ومحمد بن عيسى: هو ابن الطباع. وأخرجه البخاري (٤٨٨٦)، ومسلم (٢١٢٥)، وابن ماجه (١٩٨٩)، والترمذي (٢٩٨٨)،والنسائي في "الكبرى" (٩٣٢٦) و (٩٣٢٧) و (١١٥١٥) من طريق منصور ابن المعتمر، والنسائي (٩٣٢٨) من طريق الأعمش، كلاهما عن إبراهيم النخعي، به. وهو في "مسند أحمد" (٣٩٤٥)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٠٤) و (٥٥٠٥). قال الخطابي: والمتنمصات: من النَّمص، وهو نتف الشعر من الوجه، ومنه قيل للمنقاش: المنماص، والنامصة: هي التي تنتف الشعر بالمنماص، والمتنمصة: هي التي يُفعل ذلك بها، والمتفلجات: هن اللواتي يُعالجن أسنانهن حتى يكون لها تَحَدُّد وأشَر، يقال: ثغر أفلج. ولتفسير باقي الحديث انظر ما قبله.
حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ أُسَامَةَ، عَنْ أَبَانَ بْنِ صَالِحٍ، عَنْ مُجَاهِدِ بْنِ جَبْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لُعِنَتِ الْوَاصِلَةُ وَالْمُسْتَوْصِلَةُ وَالنَّامِصَةُ وَالْمُتَنَمِّصَةُ وَالْوَاشِمَةُ وَالْمُسْتَوْشِمَةُ مِنْ غَيْرِ دَاءٍ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَتَفْسِيرُ الْوَاصِلَةِ الَّتِي تَصِلُ الشَّعْرَ بِشَعْرِ النِّسَاءِ وَالْمُسْتَوْصِلَةُ الْمَعْمُولُ بِهَا وَالنَّامِصَةُ الَّتِي تَنْقُشُ الْحَاجِبَ حَتَّى تَرِقَّهُ وَالْمُتَنَمِّصَةُ الْمَعْمُولُ بِهَا وَالْوَاشِمَةُ الَّتِي تَجْعَلُ الْخِيلاَنَ فِي وَجْهِهَا بِكُحْلٍ أَوْ مِدَادٍ وَالْمُسْتَوْشِمَةُ الْمَعْمُولُ بِهَا .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কোন অসুস্থতা ছাড়া যেসব নারী পরচুলা তৈরী করে, যে নারী তা ব্যবহার করে, যে নারী ভ্রুর চুল উপড়ে ফেলে এবং যে নারী দেহে উল্কি অংকন করে তাদেরকে অভিসম্পাত করা হয়েছে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, (আরবী) শব্দের ব্যাখ্যা হলো, যে নারী অন্য নারীর চুলের সাথে কৃত্রিম চুল সংযোজন করে। অর্থ হলো, (আরবী) যে নারী এরূপ কৃত্রিম চুল ব্যবহার করে। (আরবী) অর্থ যে নারী সরু করার জন্য ভ্রুর চুল উপড়িয়ে দেয়, (আরবী) অর্থ হলো, যে নারী এ কাজ করায়। (আরবী) অর্থ হলো, যে নারী চেহারায় সুরমা বা রঙের কালি দিয়ে চিত্র অঙ্কিত করে। (আরবী) অর্থ হলো যে নারী এ কাজ করায়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبد اللّٰہ بن وھب عنعن ، و لبعض الحدیث شواھد صحیحۃ ، (انوار الصحیفہ ص 148)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون قوله: من غير داء، وهذا إسناد حسن من أجل أسامة -وهو ابن زيد الليثي- لكنه متابع. وهذا الأثر وإن يكن فيه نص بالرفع له حكمه، لأن اللعن لا يكون إلا بتوقيف، على أنه جاء في رواية أخرى عن ابن عباس النص على الرفع كما سيأتي. وأخرجه أحمد (٢٢٦٣) و (٣٠٥٩)، والطبراني في "الكبير" (١١٥٠٢) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الأسود، وابن أبي شيبة، والطبراني في "الكبير" (١١٦٧٨) من طريق زيد الحجام أبي أسامة، كلاهما عن عكرمة، عن ابن عباس. دون ذكر النامصة والمتنمصة. وإسناد رواية أبي أسامة الحجام صحيح. وفيها المى برفع الحديث إلى رسول الله ﷺ. ويشهد لذكر النامصة والمتنمصة حديث ابن مسعود السالف قبله. قال الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٣٧٦ بعد أن ذكر هذا الحديث وحسَّنه: يُستفاد منه أن من صنعت الوشم عن غير قصدٍ له، بل تداوت مثلاً، فنشأ عنه الوشم، أن لا تدخل في الزجر. والخيلان: جمع خَال، وهو شامة أو نُكتة سَوداء في البدن.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرِ بْنِ زِيَادٍ، قَالَ حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ سَالِمٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، قَالَ لاَ بَأْسَ بِالْقَرَامِلِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَأَنَّهُ يَذْهَبُ إِلَى أَنَّ الْمَنْهِيَّ، عَنْهُ شُعُورُ النِّسَاءِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَانَ أَحْمَدُ يَقُولُ الْقَرَامِلُ لَيْسَ بِهِ بَأْسٌ .
সাঈদ ইবনু জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, নারীদের জন্য রেশমী বা পশমী সুতার কৃত্রিম চুল ব্যবহারে দোষ নেই। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, মনে হয় তার মতে নারীদের চুল দ্বারা তৈরী পরচুলা ব্যবহার নিষিদ্ধ। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইমাম আহ্মাদের (রাহিমাহুল্লাহ) মত হলো, রেশমী বা পশমী সুতার কৃত্রিম ব্যবহারে অসুবিধা নেই। [৪১৭১]
দুর্বল মাক্বতু’ মুনকার।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، شریک عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 148)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: سالم: هو الأفطس، وشريك: هو ابن عبد الله النخعي، وهو سيئ الحفظ. ومع ذلك فقد صحح إسناده الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٣٧٥. والقرامل: قال في "النهاية": هي ضفائر من شعر أو صوف أو إبرَيْسَم تصل به المرأة شعرها، والقَرْمَلَ، بالفتح: نبات طويل الفروع لين. تنبيه: هذا الأثر أثبتناه من (أ) و (هـ)، وهي في روايتي ابن العبد وابن داسه.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، وَهَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، - الْمَعْنَى - أَنَّ أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْمُقْرِئَ، حَدَّثَهُمْ عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي أَيُّوبَ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي جَعْفَرٍ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ عُرِضَ عَلَيْهِ طِيبٌ فَلاَ يَرُدَّهُ فَإِنَّهُ طَيِّبُ الرِّيحِ خَفِيفُ الْمَحْمَلِ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কাউকে সুগন্ধি বস্তু উপহার দেয়া হলে সে যেন তা ফিরিয়ে না দেয়। কারণ তা উত্তম সুগন্ধি এবং সহজে বহনযোগ্য।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2253)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز، وأبو عبد الرحمن المقرئ: هو عبد الله بن يزيد. وأخرجه مسلم (٢٢٥٣)، والنسائي في "الكبرى" (٩٣٥١) من طريق أبي عبد الرحمن المقرئ، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٨٢٦٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٠٩).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، أَخْبَرَنَا ثَابِتُ بْنُ عُمَارَةَ، حَدَّثَنِي غُنَيْمُ بْنُ قَيْسٍ، عَنْ أَبِي مُوسَى، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِذَا اسْتَعْطَرَتِ الْمَرْأَةُ فَمَرَّتْ عَلَى الْقَوْمِ لِيَجِدُوا رِيحَهَا فَهِيَ كَذَا وَكَذَا " . قَالَ قَوْلاً شَدِيدًا .
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ নারীরা যখন সুগন্ধি লাগিয়ে জনসমাজকে এর গন্ধ বিলানোর জন্য তাদের পাশ দিয়ে যাতায়াত করে, সে তখন এরূপ এরূপ। একথা বলে তিনি একটি কঠোর মন্তব্য করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (1065) ، أخرجہ الترمذي (2786 وسندہ حسن) ورواہ النسائي (5129 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل ثابت بن عُمارة، فهو لا بأس به. يحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه الترمذي (٢٩٩٣) من طريق يحيى القطان، والنسائي في "الكبرى" (٩٣٦١) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، كلاهما عن ثابت بن عمارة. قال خالد في روايته: "فهي زانية". وهو في "مسند أحمد" (١٩٥٧٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٢٤). قال الطيبي فيما نقله عنه المناوي في "فيض القدير" ٣/ ١٤٧: شبَّه خروجَها من بيتها متطيبة مهيجة لشهوات الرجال التي هي بمنزلة رائد الزنى بالزنى مبالغة وتهديداً وتشديداً عليها. قال المناوي ١/ ٢٧٦: أي هي بسبب ذلك تعرضة للزنى، ساعية في أسبابه، داعية إلى طلابه، فسمت لذلك زانية مجازاً، ومجامع الرجال قلما تخلو ممن في قلبه شدة شبق لهن، سيما مع التعطر، فربما غلبت الشهوة، وصمم العزم، فوقع الزنى الحقيقي. ومثل مرورها بالرجال قعودها في طريقهم ليمُروا بها.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، مَوْلَى أَبِي رُهْمٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ لَقِيَتْهُ امْرَأَةٌ وَجَدَ مِنْهَا رِيحَ الطِّيبِ يُنْفَحُ وَلِذَيْلِهَا إِعْصَارٌ فَقَالَ يَا أَمَةَ الْجَبَّارِ جِئْتِ مِنَ الْمَسْجِدِ قَالَتْ نَعَمْ . قَالَ وَلَهُ تَطَيَّبْتِ قَالَتْ نَعَمْ . قَالَ إِنِّي سَمِعْتُ حِبِّي أَبَا الْقَاسِمِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " لاَ تُقْبَلُ صَلاَةٌ لاِمْرَأَةٍ تَطَيَّبَتْ لِهَذَا الْمَسْجِدِ حَتَّى تَرْجِعَ فَتَغْتَسِلَ غُسْلَهَا مِنَ الْجَنَابَةِ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ الإِعْصَارُ غُبَارٌ .
আবূ হুরাইরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেনঃ একদা আমার সাথে এক মহিলার দেখা হল, যার শরীর থেকে সুগন্ধি বের হচ্ছিল এবং তার (পাতলা) কাপড়ও বাতাসে উড়ছিল। তখন আমি তাকে বলি, হে বেহায়া মহিলা! তুমি কি মাসজিদ থেকে আসছো? সে বলল, হ্যাঁ। তিনি বলেন, তুমি কি খুশবু ব্যবহার করেছো? সে বলল, হ্যাঁ। তখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি আমার প্রিয় আবুল কাসিম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ যে মহিলা খুশবু লাগিয়ে এ মাসজিদে আসে, তার সলাত কবূল হয় না, যতক্ষণ না সে ফিরে গিয়ে নাপাকীর গোসলের ন্যায় গোসল করে। (এমন উত্তমরূপে গোসল করে যাতে তার দেহে কোন সুগন্ধি না থাকে)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (1064) ، عاصم بن عبید اللہ تابعہ عبد الرحمن بن الحارث بن أبي عبید عند البیھقي (3/133، 134 وسندہ حسن) وللحدیث شواھد
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عاصم بن عُبيد الله. لكن روي الحديث من طرق أخرى -وإن كان فيها ضعف- يحسُن الحديثُ بها إن شاء الله، ثم إنه له ما يشهد له. سفيان: هو الثوري. وأخرجه ابن ماجه (٤٠٠٢) من طريق سفيان بن عيينة، عن عاصم بن عُبيد الله، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٥٦). وأخرجه أبو يعلى (٦٣٨٥)، وابن خزيمة (١٦٨٢)، والبيهقي ٣/ ١٣٣ من طريق الأوزاعي، عن موس بن يسار، عن أبي هريرة. ورجاله ثقات لكن رواية موسى بن يسار - وهو الدمشقي عن أبي هريرة منقطعة فيما قاله أبو حاتم الرازي في "الجرح والتعديل" ٨/ ١٦٨. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩٣٦٢) من طريق صفوان بن سُلَيم، عن رجل ثقة، عن أبي هريرة. مختصراً بالمرفوع. وإسناده صحيح لولا إبهام الرجل الذي وصفه صفوان بقوله: عن رجل ثقة. وأخرجه البيهقي ٣/ ١٣٣ - ١٣٤ من طريق العباس الدُّوري عن خالد بن مَخْلَد، عن عبد الرحمن بن الحارث بن أبي عُبيد مولى أبي رهم الغفاري، عن جده، عن أبي هريرة. وإسناده حسن في المتابعات. وله شاهد عن أبي موسى الأشعري موقوفاً عليه كلفظ المرفوع عند ابن أبي شيبة ٩/ ٢٦، وإسناده قوي. ومثله لا يقال بالرأي، فله حكم المرفوع، والله تعالى أعلم. قال السندي في "حاشيته على النسائي": قيل: أمرها بذلك تشديداً عليها، وتشنيعاً لفعلها، وتشبيها له بالزنى، وذلك لأنها هيجت بالتعطر شهوات الرجال، وفتحت باب عيونهم التي بمنزلة بريد الزنى، فحكم عليها بما يحكم على الزاني من الاغتسال من الجنابة.