সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ الْحَفَرِيُّ، عَنْ بَدْرِ بْنِ عُثْمَانَ، عَنْ عَامِرٍ، عَنْ رَجُلٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " يَكُونُ فِي هَذِهِ الأُمَّةِ أَرْبَعُ فِتَنٍ فِي آخِرِهَا الْفَنَاءُ " .
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর কসম! আমি জানি না আমার সাথীরা ভুলে গেছেন নাকি জেনে শুনে ভুলে আছেন। আল্লাহর কসম! ক্বিয়ামত পর্যন্ত ফিতনার সংখ্যা হবে তিন শতাধিক। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রত্যেকের নাম, পিতার নাম ও গোত্রের নাম আমাদেরকে অবহিত করেছেন। [৪২৪১]
দুর্বলঃ মিশকাত হা/৫৩৯৩।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، فیہ’’ رجل ‘‘ مجہول (عون المعبود 152/4) ، (انوار الصحیفہ ص 151)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لابهام الراوي عن عبد الله -وهو ابن مسعود- أبو داود الحَفَري: هو عمر بن سعْد الكوفي. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٥/ ١٧٠ من طريق بدر بن عثمان، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ عُثْمَانَ بْنِ سَعِيدٍ الْحِمْصِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو الْمُغِيرَةِ، حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَالِمٍ، حَدَّثَنِي الْعَلاَءُ بْنُ عُتْبَةَ، عَنْ عُمَيْرِ بْنِ هَانِئٍ الْعَنْسِيِّ، قَالَ سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ، يَقُولُ كُنَّا قُعُودًا عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَ الْفِتَنَ فَأَكْثَرَ فِي ذِكْرِهَا حَتَّى ذَكَرَ فِتْنَةَ الأَحْلاَسِ فَقَالَ قَائِلٌ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَمَا فِتْنَةُ الأَحْلاَسِ قَالَ " هِيَ هَرَبٌ وَحَرْبٌ ثُمَّ فِتْنَةُ السَّرَّاءِ دَخَنُهَا مِنْ تَحْتِ قَدَمَىْ رَجُلٍ مِنْ أَهْلِ بَيْتِي يَزْعُمُ أَنَّهُ مِنِّي وَلَيْسَ مِنِّي وَإِنَّمَا أَوْلِيَائِيَ الْمُتَّقُونَ ثُمَّ يَصْطَلِحُ النَّاسُ عَلَى رَجُلٍ كَوَرِكٍ عَلَى ضِلَعٍ ثُمَّ فِتْنَةُ الدُّهَيْمَاءِ لاَ تَدَعُ أَحَدًا مِنْ هَذِهِ الأُمَّةِ إِلاَّ لَطَمَتْهُ لَطْمَةً فَإِذَا قِيلَ انْقَضَتْ تَمَادَتْ يُصْبِحُ الرَّجُلُ فِيهَا مُؤْمِنًا وَيُمْسِي كَافِرًا حَتَّى يَصِيرَ النَّاسُ إِلَى فُسْطَاطَيْنِ فُسْطَاطِ إِيمَانٍ لاَ نِفَاقَ فِيهِ وَفُسْطَاطِ نِفَاقٍ لاَ إِيمَانَ فِيهِ فَإِذَا كَانَ ذَاكُمْ فَانْتَظِرُوا الدَّجَّالَ مِنْ يَوْمِهِ أَوْ مِنْ غَدِهِ " .
‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, এই উম্মাতের মাঝে চারটি ফিতনা সংঘটিত হবে অতঃপর ক্বিয়ামত হবে। [৪২৪২]
দুর্বলঃ যইফাহ হা/৪৮৩১।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (5398، 5403)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكن قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "العلل" ٢/ ٤١٧: روى هذا الحديث ابن جابر، عن عمير بن هانئ، عن النبي ﷺ مرسلاً، والحديث عندي ليس بصحيح كأنه موضرع، وقال أبو نعيم: غريب من حديث عمير والعلاء، لم نكتبه مرفرعاً إلا من حديث عبد الله بن سالم. أبو المغيرة: هو عبد القدوس بن الحجاج الخولاني. وأخرجه أحمد (٦١٦٨)، والطبراني في "مسند الشاميين" (٢٥٥١)، والحاكم ٤/ ٤٦٦ - ٤٦٧، وأبو نعيم في "الحلية" ٥/ ١٥٨، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" ٢/ ٤٠٠ - ٤٠١ والبغوي في "شرح السنة" (٤٢٢٦) من طريق أبي المغيرة الخولاني، بهذا الإسناد. وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (٩٣) عن الوليد بن مسلم، عن عبد الرحمن ابن يزيد بن جابر، عن عمير بن هانئ، قال: قال رسول الله ﷺ مرسلاً. قال الخطابي: قوله: "فتنة الأحلاس" إنما أُضيفت الفتنة إلى الأحلاس لدوامها، وطول لبثها، يقال للرجل إذا كان يلزم بيته لا يبرح منه: هو حِلْس بيته، لأن الحِلْس يفترش فيبقى على المكان ما دام لا يُرفع، وقد يحتمل أن تكون هذه الفتنة إنما شبهت بالأحلاس لسواد لونها وظلمتها. والحَرَب: ذهابُ المالِ والأهلِ، يقال: حَرب الرجل فهو حريب: إذا سُلب أهلُه ومالُه، والدَّخَن: الدخان يُريد أنها تثور كالدخان من تحت قدميه، وقوله: "كورك على ضلع" مثل، ومعناه الأمر الذي لا يثبت ولا يستقيم، وذلك أن الضلع لا يقوم بالورك ولا يحمله، وإنما يقال في باب الملائمة والموافقة إذا وصفوا: هو ككف في ساعد وكساعد في ذراع، أو نحو ذلك، يريد: إن هذا الرجل غير خليق للملك ولا مستقِلٍّ به. والدُّهيماء: تصغير الدهماء، وصغرها على مذهب المذمة لها، والله أعلم. وفتنة السراء: قال القاري: والمراد بالسراء النعماء التي تسرّ الناس من الصحة والرخاء والعافية من البلاء والوباء، وأضيفت إلى السراء لأن السبب في وقوعها ارتكاب المعاصي بسبب كثرة التنعم أو لأنها تسر العدوّ. والفسطاط: المدينة التي يجتمع فيها الناس، وكل مدينة فسطاط، ويكون الفسطاط مجتمع أهل الكورة حول جامعها، ومنه فسطاط مصر.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي مَرْيَمَ، أَخْبَرَنَا ابْنُ فَرُّوخَ، أَخْبَرَنِي أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ، أَخْبَرَنِي ابْنٌ لِقَبِيصَةَ بْنِ ذُؤَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَالَ حُذَيْفَةُ بْنُ الْيَمَانِ وَاللَّهِ مَا أَدْرِي أَنَسِيَ أَصْحَابِي أَمْ تَنَاسَوْا وَاللَّهِ مَا تَرَكَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ قَائِدِ فِتْنَةٍ إِلَى أَنْ تَنْقَضِيَ الدُّنْيَا يَبْلُغُ مَنْ مَعَهُ ثَلاَثَمِائَةٍ فَصَاعِدًا إِلاَّ قَدْ سَمَّاهُ لَنَا بِاسْمِهِ وَاسْمِ أَبِيهِ وَاسْمِ قَبِيلَتِهِ
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসা ছিলাম। তিনি ফিতনা সম্পর্কে দীর্ঘ আলোচনা করলেন, এমন কি তিনি আহলাস ফিতনা সম্পর্কে বললেন। তখন একজন বললো, ‘আহলাস’ ফিতনা কি? তিনি বললেন, পলায়ন ও লুটতরাজ। অতঃপর আসবে একটি ফিতনা, যা হবে আনন্দদায়ক, এর অন্ধকারাচ্ছন্ন ধোঁয়া বের হবে আমার পরিবারের জনৈক ব্যক্তির দু’পায়ের নিচ হতে। সে ধারণা করবে যে, সে আমার অন্তর্ভুক্ত, অথচ সে আমার অন্তর্ভুক্ত নয়। কারণ ‘আমার বন্ধু হচ্ছে আল্লাহুভীরু ব্যক্তিগণ। তারপর জনগণ এমন এক ব্যক্তির অধীনে একতাবদ্ধ হবে। সে যেন পাঁজরের উপর কোমরের হার সদৃশ। অতঃপর তিনি ‘দুহায়মা’ বা ঘন অন্ধকারময় ফিতনা প্রসঙ্গে বলেন, সেই ফিতনা এই উম্মতের কোন লোককেই একটি চপেটাঘাত না করে ছারবে না। অতঃপর যখন বলা হবে যে, তা শেষ হয়ে গেছে, তখনই তা আরো প্রসারিত হবে। এ সময় যে লোকটি সকালে মু’মিন ছিল, সন্ধ্যায় সে কাফির হয়ে যাবে। অবশেষে সব মানুষ দু’টি শিবিরে বিভক্ত হবে। একটি হবে ঈমানের শিবির, যেখানে মুনাফিকী থাকবে না। আর একটি মুনাফিকীর শিবির, যেখানে ঈমান থাকবে না। যখন তোমাদের এ অবস্থা হবে, তখন দাজ্জালের আত্মপ্রকাশের অপেক্ষা করবে ঐদিন বা তার পরের দিন থেকে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (5393، 5398) ، عبد اللہ بن فروخ أبو عمر حسن الحدیث وثقہ الجمھور وإسحاق بن قبیصۃ صدوق
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف ابن فزوخ -وهو عبد الله بن فزُوخ الخُراساني- وابن قبيصة بن ذؤيب إن كان إسحاق فهو صدوق، وإلا فهو مجهول لا يُعرف، وأسامة بن زيد -وهو الليثي- فيه ضعف. وذكر الحافظ في "الفتح" ١١/ ٤٩٦ أن القاضي عياضاً أخرج هذا الحديث في "الشفاء" بإسناد الحديث السابق برقم (٤٢٤٠)، قال: ولم أر هذه الزيادة في كتاب أبي داود. قلنا: هو في "الشفا" ١/ ٣٣٦ في فصل: ومن ذلك ما أُطلع عليه من الغيوب.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ نَصْرِ بْنِ عَاصِمٍ، عَنْ سُبَيْعِ بْنِ خَالِدٍ، قَالَ أَتَيْتُ الْكُوفَةَ فِي زَمَنِ فُتِحَتْ تُسْتَرُ أَجْلُبُ مِنْهَا بِغَالاً فَدَخَلْتُ الْمَسْجِدَ فَإِذَا صَدْعٌ مِنَ الرِّجَالِ وَإِذَا رَجُلٌ جَالِسٌ تَعْرِفُ إِذَا رَأَيْتَهُ أَنَّهُ مِنْ رِجَالِ أَهْلِ الْحِجَازِ قَالَ قُلْتُ مَنْ هَذَا فَتَجَهَّمَنِي الْقَوْمُ وَقَالُوا أَمَا تَعْرِفُ هَذَا هَذَا حُذَيْفَةُ بْنُ الْيَمَانِ صَاحِبُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ حُذَيْفَةُ إِنَّ النَّاسَ كَانُوا يَسْأَلُونَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْخَيْرِ وَكُنْتُ أَسْأَلُهُ عَنِ الشَّرِّ فَأَحْدَقَهُ الْقَوْمُ بِأَبْصَارِهِمْ فَقَالَ إِنِّي قَدْ أَرَى الَّذِي تُنْكِرُونَ إِنِّي قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَرَأَيْتَ هَذَا الْخَيْرَ الَّذِي أَعْطَانَا اللَّهُ أَيَكُونُ بَعْدَهُ شَرٌّ كَمَا كَانَ قَبْلَهُ قَالَ " نَعَمْ " . قُلْتُ فَمَا الْعِصْمَةُ مِنْ ذَلِكَ قَالَ " السَّيْفُ " . قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ ثُمَّ مَاذَا يَكُونُ قَالَ " إِنْ كَانَ لِلَّهِ خَلِيفَةٌ فِي الأَرْضِ فَضَرَبَ ظَهْرَكَ وَأَخَذَ مَالَكَ فَأَطِعْهُ وَإِلاَّ فَمُتْ وَأَنْتَ عَاضٌّ بِجِذْلِ شَجَرَةٍ " . قُلْتُ ثُمَّ مَاذَا قَالَ " ثُمَّ يَخْرُجُ الدَّجَّالُ مَعَهُ نَهْرٌ وَنَارٌ فَمَنْ وَقَعَ فِي نَارِهِ وَجَبَ أَجْرُهُ وَحُطَّ وِزْرُهُ وَمَنْ وَقَعَ فِي نَهْرِهِ وَجَبَ وِزْرُهُ وَحُطَّ أَجْرُهُ " . قَالَ قُلْتُ ثُمَّ مَاذَا قَالَ " ثُمَّ هِيَ قِيَامُ السَّاعَةِ " .
সুবাই ইবনু খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তুসতার বিজয় হওয়ার পর কিছু খচ্চর ক্রয় করার জন্য আমি কূফায় আসি। আমি একটি মাসজিদে প্রবেশ করে কয়েক জন লোক দেখতে পেলাম এবং মাঝখানে জনৈক ব্যক্তি বসে আছেন। তুমি তাকে দেখেই চিনতে পারবে যে, তিনি হিজাযের অধিবাসী। বর্ণনাকারী বলেন, আমি বললাম, তিনি কে? উপস্থিত জনতা আমার প্রতি অসন্তোষের দৃষ্টিতে তাকিয়ে বললো, তুমি কি তাঁকে চেনো না? তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবী হুযাইফাহ ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। অতঃপর হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে কল্যাণ সম্পর্কে প্রশ্ন করতো। আর আমি তাঁকে অকল্যাণ সম্পর্কে প্রশ্ন করতাম। একথা শুনে জনতা তা অপছন্দ করতো। নিশ্চয়ই আমি প্রশ্ন করেছি, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি ধারনা করেন যে, মহান আল্লাহ যে কল্যাণ আমাদের দিয়েছেন, এর পরে কি কোন অকল্যাণ আসবে? তিনি বললেন, হ্যাঁ। আমি বললাম, তাহলে তা থেকে রক্ষা পাওয়ার উপায় কি? তিনি বললেন, তলোয়ার। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! তারপর কি হবে? তিনি বললেনঃ পৃথিবীতে যদি কোন আল্লাহর খলীফাহ থাকে, আর সে যদি তোমার পিঠে আঘাত করে এবং তোমার সম্পদ ছিনিয়ে নেয়, তবুও তার আনুগত্য করো, অন্যথায় তুমি বৃক্ষের কাণ্ড সুদৃরভাবে আকড়ে ধরে মৃত্যুবরণ করো। আমি বললাম, তারপর কি হবে? তিনি বললেন, অতঃপর আগুন ও পানির নহর নিয়ে দাজ্জাল আত্মপ্রকাশ করবে। যে ব্যক্তি তার আগুনে পতিত হবে, সে তার প্রতিদান অবশ্যই পাবে এবং তার গুনাহ মাফ করা হবে। আর যে তার নহর এ পতিত হবে, তার অপরাধের শাস্তি অবধারিত হবে এবং সওয়াব বরবাদ হবে। তিনি বলেন, আমি বললাম, তারপর কি হবে? তিনি বললেনঃ অতঃপর ক্বিয়ামত সংগঠিত হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (5396) ، قتادۃ تابعہ الثقۃ حمید بن ھلال عند النسائي فی الکبریٰ (7979، نسخۃ أخریٰ 8032) وغیرہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون ذكر السيف، وهذا إسناد حسن من أجل سُبَيع بن خالد -ويقال: خالد بن سُبيع، ويقال: خالد بن خالد، اليشكري- فقد روى عنه جمع ووثقه العجلي وابن حبان، وقد توبع. وقصة السيف لم تذكر إلا في طريق قتادة، ول يذهبها حميد بن هلال عن نصر، ولا سائر الرواة عن حذيفة. وأخرجه أحمد (٢٣٤٣٠)، الحاكم ٤/ ٤٣٢ - ٤٣٣ من طريق أبي عوانة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٣٦٠٦) و (٧٠٨٤)، ومسلم (١٨٤٧)، وابن ماجه (٣٩٧٩) من طريق بُسر بن عُبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، أنه سمع حذيفة بن اليمان يقول: كان الناس يسألون رسولَ الله ﷺ عن الخير، وكنت أسألُه عن الشر مخافة أن يُدركني، فقلت: يا رسول الله، إنا كما في جاهلية وشر، فجاءنا الله بهذا الخير، فهل بعد هذا الخير من شر؟ قال: "نعم"، قلت: وهل بعد ذلك الشر من خير؟ قال: "نعم، وفيه دَخَنٌ". قلت: وما دخَنُه؟ قال: "قوم يهدون بغير هديي، تعرف منهم وتُنكر". قلت: فهل بعد ذلك الخير من شر؟ قال: "نعم، دُعاة إلى أبواب جهنم، من أجابهم إليها قذفوه فيها، قلت: يا رسول الله، صِفْهم لنا؟ فقال: "هم من جلدتنا ويتكلمون بألسنتنا،، قلت: فما تأمرني إن أدركني ذلك؟ قال: "تلزم جماعة المسلمين وإمامَهم"، قلت: فإن لم يكن لهم جماعة ولا إمام؟ قال: "فاعتزل تلك الفرق كلَّها، ولو أن تَعَضَّ بأصل شجرة، حتى يُدركك الموت وأنت على ذلك". وأخرجه بنحو رواية أبي إدريس الخولاني مختصراً مسلم (١٨٤٧) من طريق زيد ابن سلام، عن أبي سلاّم، قال: قال حذيفة، وزاد فيه: "تسمع وتطيع للأمير، وإن ضرب ظهرك، وأخذ مالك، فاسمع وأطع"، ولم يذكر فيه الاعتزال عند عدم وجود الامام. وأخرج منه قصة سؤال حذيفة النبيَّ ﷺ عن الشر وسؤال الناس له عن الخير: البزار (٢٧٩٤) من طريق جندب بن عبد الله البجلي، والبخاري (٣٦٠٧) والبزار (٢٩٣٩) من طريق قيس بن أبي حازم، كلاهما عن حذيفة. ولفظ البخاري: تعلم أصحابي الخير وتعلمت الشر. وأخرج قصة الدجال منه البخاري (٣٤٥٠)، ومسلم (٢٩٣٤) من طريق ربعي بن حراش، ومسلم (٢٩٣٤)، وابن ماجه (٤٠٧١) من طريق أبي وائل شقيق، كلاهما عن حذيفة. لفظ ربعي عند البخاري: "إن مع الدجال إذا خرج ماء وناراً، فأما الذي يرى الناس أنها النار فماء بارد، وأما الذي يرى الناسُ أنه ماء بارد فنار تحرق، فمن أدرك ذلك منكم فليقع في الذي يرى أنها نار، فإنه عذب بارد". ولفظ أبي وائل: "الدجال أعور العين اليسرى، جُفَالُ الشعر، معه جنة ونار، فناره جنة، وجنته نار". وقوله: جفال الشعر، أي: كثيره. وستأتي قصة الدجال من طريق ربعي بن حراش عند المصنف برقم (٤٣١٥). وانظر تمام تخريجه في "مسند أحمد" (٢٣٢٨٢). وانظر الأحاديث الثلاثة الآتية بعده. قال الخطابي: وروى أبو داود في غير هذه الرواية أنه قال: "هدنة على دخَن، وجماعة على أقذاء". الصدع من الرجال -مفتوحة الدال-: هو الشابّ المعتدل القناة، ومن الوعول الفتى. وقوله: "والجذل، أصل الشجرة إذا قطع أغصانها، ومنه قول القائل من الأنصار: "أنا جُذَيلها المُحكَّك".
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ نَصْرِ بْنِ عَاصِمٍ، عَنْ خَالِدِ بْنِ خَالِدٍ الْيَشْكُرِيِّ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ قُلْتُ بَعْدَ السَّيْفِ قَالَ " بَقِيَّةٌ عَلَى أَقْذَاءٍ وَهُدْنَةٌ عَلَى دَخَنٍ " . ثُمَّ سَاقَ الْحَدِيثَ قَالَ كَانَ قَتَادَةُ يَضَعُهُ عَلَى الرِّدَّةِ الَّتِي فِي زَمَنِ أَبِي بَكْرٍ " عَلَى أَقْذَاءٍ " . يَقُولُ قَذَى . " وَهُدْنَةٌ " . يَقُولُ صُلْحٌ " عَلَى دَخَنٍ " . عَلَى ضَغَائِنَ .
খালিদ ইবনু খালিদ আল-ইয়াশকুরী (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে উপরের বর্ণিত হাদীসে হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি জিজ্ঞেস করলাম, তরবারির পর কি হবে? তিনি বলেন, মানুষ আবর্জনা বা ফিতনায় মগ্ন থাকবে এবং ষড়যন্ত্রমূলক সন্ধি করবে। অতঃপর অনুরূপ হাদীস বর্ণিত হয়েছে। তিনি বলেন, ক্বাতাদাহ একথার দ্বারা আবূ বাক্রের যুগের মুরতাদদের ফিতনাকেই বুঝাতেন। আর তিনি (আরবী) অর্থ বলতেন (আরবী) অর্থ কলঙ্ক (আরবী) সাময়িক যুদ্ধবিরতি। (আরবী) বিদ্বেষ, অপকারেচ্ছা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، قتادۃ تابعہ الثقۃ حمید بن ھلال عند النسائي فی الکبریٰ (7979، نسخۃ أخریٰ 8032) وغیرہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون ذكر السيف، وهذا إسناد حسن كسابقه. وهو في"مصنف عبد الرزاق" (٢٠٧١١)، ومن طريقه أخرجه أحمد (٢٣٤٢٩)، والبغوي في "شرح السنة" (٤٢١٩). وانظر ما قبله، وانظر تالييه أيضاً. وقد زاد في حديث معمر زيادة بعد ذكر الدجال وهي: "ثم يُنتجَ المُهرُ فلا يُركب حتى تقوم الساعة"، وهذه الزيادة أيضاً مروية من طريق صخر بن بدر الآتي عند المصنف برقم (٤٢٤٧)، وهي زيادة لا تصح، لأنها مخالفة لحديث أبي هريرة الآتي عند المصنف برقم (٤٣٢٤) وهو حديث صحيح، ومخالف كذلك لحديث عائشة عند أحمد (٢٤٤٦٧) وهو حديث حسن. ولأن صخراً مجهول. قال الخطابي: قوله: "هدنة على دخَن" معناه: صلح على بقايا من الضغن، وذلك أن الدخان أثر من النار دالٌّ على بقية منها. وقوله: "جماعة على أقذاء" يؤكد ذلك. وقوله: "بقية على أقذاء": قال السندي: أي يبقى الناسُ بقية على فساد قلوبهم، فشبّه ذلك الفساد بالأقذاء، جمع قذى، وهو ما يقع في العين والشراب من غبار ووسخ.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ، - يَعْنِي ابْنَ الْمُغِيرَةِ - عَنْ حُمَيْدٍ، عَنْ نَصْرِ بْنِ عَاصِمٍ اللَّيْثِيِّ، قَالَ أَتَيْنَا الْيَشْكُرِيَّ فِي رَهْطٍ مِنْ بَنِي لَيْثٍ فَقَالَ مَنِ الْقَوْمُ فَقُلْنَا بَنُو لَيْثٍ أَتَيْنَاكَ نَسْأَلُكَ عَنْ حَدِيثِ حُذَيْفَةَ فَذَكَرَ الْحَدِيثَ قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَلْ بَعْدَ هَذَا الْخَيْرِ شَرٌّ قَالَ " فِتْنَةٌ وَشَرٌّ " . قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَلْ بَعْدَ هَذَا الشَّرِّ خَيْرٌ قَالَ " يَا حُذَيْفَةُ تَعَلَّمْ كِتَابَ اللَّهِ وَاتَّبِعْ مَا فِيهِ " . ثَلاَثَ مِرَارٍ . قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَلْ بَعْدَ هَذَا الشَّرِّ خَيْرٌ قَالَ " هُدْنَةٌ عَلَى دَخَنٍ وَجَمَاعَةٌ عَلَى أَقْذَاءٍ فِيهَا أَوْ فِيهِمْ " . قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ الْهُدْنَةُ عَلَى الدَّخَنِ مَا هِيَ قَالَ " لاَ تَرْجِعُ قُلُوبُ أَقْوَامٍ عَلَى الَّذِي كَانَتْ عَلَيْهِ " . قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَبَعْدَ هَذَا الْخَيْرِ شَرٌّ قَالَ " فِتْنَةٌ عَمْيَاءُ صَمَّاءُ عَلَيْهَا دُعَاةٌ عَلَى أَبْوَابِ النَّارِ فَإِنْ تَمُتْ يَا حُذَيْفَةُ وَأَنْتَ عَاضٌّ عَلَى جِذْلٍ خَيْرٌ لَكَ مِنْ أَنْ تَتَّبِعَ أَحَدًا مِنْهُمْ " .
নাস্র ইবনু ‘আসিম আল-লাইসী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা লাইস গোত্রের প্রতিনিধি দলের সঙ্গে আল-ইয়াশকুরীর নিকট উপস্থিত হলে তিনি বললেন, আপনারা কোন গোত্রের লোক? আমরা বললাম, আমরা ‘লাইস গোত্রের, আপনার নিকট হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণিত হাদীস জানার জন্য এসেছি। অতএব তিনি সে হাদীস বর্ণনা করেন। হুযাইফাহ বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এ কল্যাণময় পরিবেশের পর কি অকল্যাণ আসবে? তিনি বললেন, ফিতনা আসবে। তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এই মন্দ অবস্থার পর কি আবার কল্যাণ আসবে? তিনি বললেন, হে হুযাইফাহ! তুমি আল্লাহর কিতাব পড়ো এবং তাতে যা আছে তার অনুসরণ করো। একথা তিনি তিনবার বলেন। হুযাইফাহ বলেন, আমি বললাম হে আল্লাহর রাসূল! এই অকল্যাণের পর আবার কল্যাণ আসবে কি? তিনি বললেন, খিয়ানাত ও মুনাফিকীর সঙ্গে সন্ধি করা হবে, আর কপট একটি দল হবে। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! খিয়ানাতের সঙ্গে সন্ধি বলতে কি বুঝায়? তিনি বললেন, মানুষের অন্তর যেরূপ ছিল, সে অবস্থায় আর ফিরে যাবে না। তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! কল্যাণকর অবস্থার পর কি অকল্যাণ ফিরে আসবে? তিনি বললেন, অন্ধকারাচ্ছন্ন ফিতনা সৃষ্টি হবে, আর সেই সময় ভ্রান্ত ‘আক্বিদাহ-বিশ্বাসের উপর (জাহান্নামের) আগুনের দিকে একদল লোক আহবান করবে। হে হুযাইফাহ! তখন তুমি যদি বৃক্ষমূল আকড়ে ধরে মরে যেতে পারো তবে তা তোমার জন্য তাদের কাউকে অনুসরণ করার চাইতে উত্তম হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (5395) ، سبیع بن خالد الیشکري البصري وثقہ العجلي المعتدل وابن حبان وغیرھما فھو ثقۃ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن سابقيه. واليشكري: هو سُبيع الذي سبق ذكره في الإسنادين السابقين، وقد اختلف في اسمه. وأخرجه الطيالسي (٤٤٢)، وابن أبي شيبة ١٥/ ٩ و ١٧، وأحمد (٢٣٢٨٢)، والنسائي في "الكبرى" (٧٩٧٨)، وابن حبان (٥٩٦٣)، وأبو نعيم في "الحلية" ١/ ٢٧١ - ٢٧٢ من طريق سليمان بن المغيرة، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٧٣٤٣) من طريق أبي عامر صالح بن رستم، عن حميد بن هلال، عن نصر بن عاصم، عن عبد الرحمن بن قرط، عن حذيفة. وقد خالف أبو عامر صالحُ بنُ رستم في إسناده سليمانَ بنَ المغيرة الثقة، كما خالف رواية قتادة عن نصر بن عاصم في الطريقين السابقين، وأبو عامر لينه بعضهم، ثم إنه رواه مرة أخرى فأسقط من إسناده نصر بن عاصم، فلم يضبط الإسناد. فقد أخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٩٧٩)، والحاكم ٤/ ٤٣٢ من طريق أبي عامر صالح بن رستم هذا، عن حميد بن هلال، عن عبد الرحمن بن قرط، عن حذيفة. وعبد الرحمن بن قرط مجهول. وقد رُوي معظم الحديث من طرق أخرى صحيحة كما بيناه عند الحديث السالف برقم (٤٢٤٤). وأخرج منه أمره حذيفةَ بتعلم القرآن واتباع ما فيه، ابن حبان (١١٧)، والبيهقي في "الشعب" (١٩٤١) من طريق عبد الله بن الصامت، والبزار في "مسنده" (٢٧٩٩) من طريق أبي الطُّفيل، كلاهما عن حذيفة. والطريق الأول إسناده صحيح والثاني حسن. وأخرجه دون قصة أمره ﷺ حذيفةَ بتعلم القرآن: البزار (٢٨١١)، والطبراني في "الأوسط" (٣٥٣١) من طريق زيد بن وهب، عن حذيفة. وإسناده حسن.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، حَدَّثَنَا أَبُو التَّيَّاحِ، عَنْ صَخْرِ بْنِ بَدْرٍ الْعِجْلِيِّ، عَنْ سُبَيْعِ بْنِ خَالِدٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ عَنْ حُذَيْفَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " فَإِنْ لَمْ تَجِدْ يَوْمَئِذٍ خَلِيفَةً فَاهْرَبْ حَتَّى تَمُوتَ فَإِنْ تَمُتْ وَأَنْتَ عَاضٌّ " . وَقَالَ فِي آخِرِهِ قَالَ قُلْتُ فَمَا يَكُونُ بَعْدَ ذَلِكَ قَالَ " لَوْ أَنَّ رَجُلاً نَتَجَ فَرَسًا لَمْ تُنْتَجْ حَتَّى تَقُومَ السَّاعَةُ " .
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তুমি যদি তখন কোন খলীফাহ (শাসক) না পাও, তবে তুমি মরে যাওয়া পর্যন্ত পলায়ন করতে থাকো। অতঃপর তুমি যদি কোন বৃক্ষমূল শক্তভাবে আকড়ে ধরে মরে যেতে পারো ...। তিনি হাদীসের শেষাংশে বলেন, আমি বললাম, এরপর কি হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, কেউ যদি তখন ঘোড়ার বাচ্চা প্রসব করাতে যায় তবে তা প্রসব করার পূর্বেই ক্বিয়ামাত সংঘটিত হয়ে যাবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (5396) ، صخر بن بدر تابعہ نصر بن عاصم، انظر الحدیث السابق (4246)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون ذكر السيف الذي في الرواية السالفة (٤٢٤٤) ودون قوله: "لو أن رجلاً نَتج فرساً لم تنتج حتى تقوم الساعة" وهذا إسناد ضعيف لجهالة صخر بن بدر العجلي. وقد روي الحديث دون هذين الحرفين بأسانيد أخرى صحيحة سلفت الإشارة إليها عند الحديثين (٤٢٤٤) و (٤٢٤٦). وللكلام على قوله: "لو أن رجلاً نتج … " انظر الحديث السالف برقم (٤٢٤٥).أبو التياح: هو يزيد بن حميد الضبعي، وعبد الوارث: هو ابن سدِد العنبري. وأخرجه الطيالسي (٤٤٣)، وابن أبي شيبة ١٥/ ٨، وأحمد (٢٣٤٢٥) و (٢٣٤٢٧) و (٢٣٤٢٨) من طريق صخر بن بدر، به. وقوله: "لو أن رجلاً نتج فرساً" أي: لو أنه سعى في تحصيل ولد فرسِه لكان قيام الساعة أقرب زمناً ووقوعاً من حمل الفرس وولادتها.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ زَيْدِ بْنِ وَهْبٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدِ رَبِّ الْكَعْبَةِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ بَايَعَ إِمَامًا فَأَعْطَاهُ صَفْقَةَ يَدِهِ وَثَمَرَةَ قَلْبِهِ فَلْيُطِعْهُ مَا اسْتَطَاعَ فَإِنْ جَاءَ آخَرُ يُنَازِعُهُ فَاضْرِبُوا رَقَبَةَ الآخَرِ " . قُلْتُ أَنْتَ سَمِعْتَ هَذَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ سَمِعَتْهُ أُذُنَاىَ وَوَعَاهُ قَلْبِي . قُلْتُ هَذَا ابْنُ عَمِّكَ مُعَاوِيَةُ يَأْمُرُنَا أَنْ نَفْعَلَ وَنَفْعَلَ . قَالَ أَطِعْهُ فِي طَاعَةِ اللَّهِ وَاعْصِهِ فِي مَعْصِيَةِ اللَّهِ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি একজন ইমামের হাতে হাত রেখে অন্তর থেকে তার আনুগত্যের শপথ করে, তাতে যথাসাধ্য তার আনুগত্য করা কর্তব্য। যদি অপর কোন ব্যক্তি এসে ঐ ইমামের সাথে বিবাদ করে তবে তোমরা তার ঘাড়ে আঘাত করো। বর্ণনাকারী বলেন, আমি বললাম, একথা কি আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে থেকে সরাসরি শুনেছেন? তিনি বললেন, আমার দু’টি কান তা শুনেছে এবং আমার অন্তর তা স্মরণ রেখেছে। আমি বললাম, এই যে তিনি আপনার চাচাতো ভাই মুআবিয়াহ, তিনি আমাদেরকে এই এই কাজ করার আদেশ করেন। তিনি বললেন, আল্লাহ্র আনুগত্যে তোমরা তার আনুগত্য করো আর আল্লাহ্র নাফরমানীতে তার অবাধ্যাচারন করো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1844)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مِهران، وعيسى بن يونس: هو ابن أبي إسحاق السَّبيعي، ومُسدَّد: هو ابن مُسرهَد. وأخرجه مسلم (١٨٤٤)، وابن ماجه (٣٩٥٦)، والنسائي في "الكبرى" (٧٧٦٦) و (٨٦٧٦) من طريق سليمان الأعمش، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٥٠١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٦١). ويشهد للمرفوع منه حديث أبي سعيد الخدري عند مسلم (١٨٥٣) قال: قال رسول الله ﷺ: "إذا بويع لخليفتين فاقتلوا الآخر منهما". قال النووي في "شرح مسلم": المقصود بهذا الكلام أن هذا القائل لما سمع كلام عبد الله بن عمرو بن العاص وذكر الحديث في تحريم منازعة الخليفة الأول، وأن الثاني يقتل، فاعتقد هذا القائل هذا الوصف في معاوية لمنازعته علياً ﵁، وكانت قد سبقت بيعةُ علي، فرأى هذا أن نفقة معاوية على أجناده وأتباعه في حرب علي ومنازعته ومقاتلته إياه من أكل المال بالباطل، ومن قتل النفس؛ لأنه قتال بغير حق فلا يستحق أحد مالاً في مقاتلته. ثم قال: قوله: "أطعه في طاعة الله واعصه في معصية الله" هذا فيه دليل لوجوب طاعة المتولِّين للإمامة بالقهر من غير إجماع ولا عهد.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، عَنْ شَيْبَانَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " وَيْلٌ لِلْعَرَبِ مِنْ شَرٍّ قَدِ اقْتَرَبَ أَفْلَحَ مَنْ كَفَّ يَدَهُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, আরববাসীদের জন্য আফসোস! কেননা তাদের উপর অকল্যাণ ঘনিয়ে এসেছে। যে ব্যক্তি তা হতে হাত গুটিয়ে রাখবে, সে সফল হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح ق زينب دون قوله أفلح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، الأعمش مدلس وعنعن ، وللحدیث شواھد معنویۃ عندالحاکم (4/ 439) وغیرہ،غیر قولہ: ’’أفلح من کف یدہ ‘‘ ، (انوار الصحیفہ ص 151)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو صالح: هو ذكوان السمّان، والأعمش: هو سليمان بن مِهران، وشيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي. وأخرجه أحمد (٩٦٩١) من طريق محمَّد بن عُبيد، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٢٢٩٩) والبيهقي في "شعب الإيمان" (٥٣٣٠) من طريق شيبان بن عبد الرحمن النحوي، وابن بشران في "أماليه" (٣٥٣) من طريق عمر بن عبيد، ونعيم بن حماد في "الفتن" (٣٤٤) عن حفص بن غياث، وأبو نعيم في "الحية" ٨/ ٢٦٥ من طريق سفيان الثوري، كلهم عن الأعمش، به. زاد الطحاوي والبيهقي في روايتيهما: "تقربوا يا بني فروخ إلى الذكر، فإن العرب قد أعرضت والله، والله إن منكم رجالاً لو كان العلم بالثريا لنالوه" وزاد عمر بن عبيد: اللهم لا تدركني إمارة الصبيان. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٥/ ٥٥ عن أبي معاوية، عن الأعمش، به موقوفاً. وأخرجه الحاكم ٤/ ٤٣٩ - ٤٤٠، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (٥٣) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة رفعه: "ويل للعرب من شر قد اقترب، موتوا إن استطعتم" وإسناده حسن. وأخرجه ابن حبان في "صحيحه" (٦٧٠٥)، ونعيم بن حماد في "الفتن" (٤٦٧) من طريق عبد العزيز بن محمَّد الدراوردي، عن ثور بن زيد، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، رفعه "ويل للعرب من شر قد اقترب، من فتنة عمياء صماء بكماء، القاعد فيها خير من القائم، والقائم فيها خير من الماشي، والماشي فيها خير من الساعي، ويل للساعي فيها من الله". وإسناده صحيح. وأخرجه أحمد (٩٠٧٣)، وجعفر الفريابي في "صفة المنافق" (١٠٠) وابن عساكر في "تاريخ دمشق" ٧٠/ ٣٥ من طريق أبي يونس سليم بن جبير، عن أبي هريرة رفعه: "ويل للعرب من شر قد اقترب، فتن كقطع الليل المظلم يصبح الرجل فيها مؤمناً ويمسي كافراً ويمسي مؤمنا ويصبح كافراً، يبيع دينه بعرض من الدنيا، المتمسك منهم يومئذ على دينه كالقابض على خبط الشوك أو جمر الغضى"، وفي إسناده عبد الله بن لهيعة، لكن الراوي عنه عند الفريابي قتيبة، وهو ممن حسَّن أهل العلم روايته عن ابن لهيعة. ويشهد لقوله آخر الحديث: "المتمسك منهم يومئذ على دينه … " حديث أنس عند الترمذي (٢٤١٢)، وحديث أبي ثعلبة الخشني الآتي عند المصنف برقم (٤٣٤١). وأخرجه أحمد (١٠٩٢٦) و (١٠٩٨٤)، والبزار (٣٣٣١ - كشف الأستار)، وأبو يعلى (٦٦٤٥) من طريق عاصم بن بهدلة، عن زياد بن قيس، عن أبي هريرة رفعه: "ويل للعرب من شر قد اقترب، ينقص العلم، ويكثر الهرج" قلت: يا رسول الله ﷺ، وما الهرج؟ قال: "القتل". وزياد بن قيس مجهول، لكن تابعه على الشطر الأول من الحديث من سبق ذكرهم، وأما الشطر الثاني: فتابعه عليه غير واحد كما سيأتي عند الحديث (٤٢٥٥). وأخرجه الحاكم ٤/ ١٨٠ من طريق عاصم بن محمَّد بن زيد، عن أبيه، عن أبي هريرة رفعه: "ويل للعرب من شر قد اقترب" ورجاله ثقات، لكن أعله الذهبي بالانقطاع. وأخرجه عبد الرزاق (٢٠٧٧٧)، ومن طريق نعيم بن حماد (١٩٨١)، والحاكم ٤/ ٤٨٣ عن معمر، عن إسماعيل بن أمية، عن رجل -قال معمر: أراه سعيداً. قلنا: يعني المقبري- عن أبي هريرة موقوفاً عليه من قوله. وقد روي مرفوعاً من هذا الطريق لكن قال الدارقطني في "العلل" ١٠/ ٣٧١، الموقوف أشبه بالصواب. قلنا: يعني من طريق المقبري ولفظه: ويل للعرب من ثر قد اقترب على رأس ستين، تفسير الأمانة غنيمة، والصدقة غرامة، والشهادة بالمعرفة، والحكم بالهوى. وأخرجه موقوفاً كذلك ابن أبي شيبة ١٥/ ٤٩ - ٥٠ من طريق سماك، عن أبي الربيع المدني، عن أبي هريرة. ولفظه: ويل للعرب من شر قد اقترب، إمارة الصبيان، إن أطاعوهم أدخلوهم النار، وإن عصوهم ضربوا أعناقهم. وأخرجه موقوفاً كذلك ابن أبي شيبة ١٥/ ١٨٦ - ١٨٧ من طريق ابن عَون، عن عمير بن إسحاق، عن أبي هريرة، بنحو لفظ أبي الغيْث عن أبي هريرة المرفوع.
قَالَ أَبُو دَاوُدَ حُدِّثْتُ عَنِ ابْنِ وَهْبٍ، قَالَ حَدَّثَنَا جَرِيرُ بْنُ حَازِمٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " يُوشِكُ الْمُسْلِمُونَ أَنْ يُحَاصَرُوا إِلَى الْمَدِينَةِ حَتَّى يَكُونَ أَبْعَدُ مَسَالِحِهِمْ سَلاَحَ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, অচিরেই মুসলিমদেরকে মাদীনাহ্তে অবরোধ করা হবে, এমনকি তাদের দূরতম যুদ্ধক্ষেত্র হবে ‘সালাহ’।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (5427) ، أخرجہ الطبراني فی الصغیر (2/113 ح873) والأوسط (6/286 ح6432) وسندھما صحیح وصححہ الحاکم (4/511 ح8560 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد فيه راوٍ لم يُسَمَّ، وقد توبع. ابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه ابن حبان (٦٧٧١)، والطبراني في "الأوسط" (٦٤٣٢)، وفي "الصغير" (٨٧٣)، والحاكم ٤/ ٥١١، وتمام في "فوائده" (١٧٣٣) من طرق عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٦٧٤٣)، وفي "الصغير" (٦٤٤) من طريق هشام بن عمار، عن سعيد بن يحيى اللحْمي، عن يونس بن يزيد، عن الزهري، عن قبيصة بن ذؤيب وأبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة. وهشام بن عمار متكلم فيه وقد خولف في إسناد هذا الحديث: فقد أخرجه الحاكم ٤/ ٥١١ من طريق ابن وهب، عن يونس بن يزيد، عن الزهري، عن سالم، عن أبي هريرة موقوفاً: يوشك أن يكون أقصى مسالح المسلمين سلاح، وسلاح قريب من خيبر. وإسناده صحيح. وسيتكرر برقم (٤٢٩٩). قوله: "مسالح"، قال في "النهاية": المَسْلَحة: القوم الذين يحفظون الثغور من العدو، وسُمُّوا مَسْلحة لأنهم يكونون ذوي سلاح، أو لأنهم يسكنون المسْلَحة، وهي كالثغر والمرقب يكون فيه أقوام يرقبون العدو لئلا يَطرقهم على غفلة، فإذا رأوه أعلموا أصحابهم ليتأهبوا له، وجمع المسلح مسالح. تنبيه: هذا الحديث والأثر الذي بعده جاءا في (أ) و (ج) آخر الباب بعد الحديث (٤٢٥٥)، ولم يرد في (ب) و (هـ)، ونحن تركناه هنا إبقاءً على ترتيب المطبوع. وعلى أي حالي فسيتكرران برقم (٤٢٩٩) و (٤٣٠٠).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، عَنْ عَنْبَسَةَ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، قَالَ وَسَلاَحُ قَرِيبٌ مِنْ خَيْبَرَ .
ইমাম যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, সালাহ হলো খায়বারের নিকটবর্তী একটি স্থান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، قَالاَ حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَبِي أَسْمَاءَ، عَنْ ثَوْبَانَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنَّ اللَّهَ زَوَى لِيَ الأَرْضَ " . أَوْ قَالَ " إِنَّ رَبِّي زَوَى لِيَ الأَرْضَ فَرَأَيْتُ مَشَارِقَهَا وَمَغَارِبَهَا وَإِنَّ مُلْكَ أُمَّتِي سَيَبْلُغُ مَا زُوِيَ لِي مِنْهَا وَأُعْطِيتُ الْكَنْزَيْنِ الأَحْمَرَ وَالأَبْيَضَ وَإِنِّي سَأَلْتُ رَبِّي لأُمَّتِي أَنْ لاَ يُهْلِكَهَا بِسَنَةٍ بِعَامَّةٍ وَلاَ يُسَلِّطَ عَلَيْهِمْ عَدُوًّا مِنْ سِوَى أَنْفُسِهِمْ فَيَسْتَبِيحَ بَيْضَتَهُمْ وَإِنَّ رَبِّي قَالَ لِي يَا مُحَمَّدُ إِنِّي إِذَا قَضَيْتُ قَضَاءً فَإِنَّهُ لاَ يُرَدُّ وَلاَ أُهْلِكُهُمْ بِسَنَةٍ بِعَامَّةٍ وَلاَ أُسَلِّطُ عَلَيْهِمْ عَدُوًّا مِنْ سِوَى أَنْفُسِهِمْ فَيَسْتَبِيحَ بَيْضَتَهُمْ وَلَوِ اجْتَمَعَ عَلَيْهِمْ مَنْ بَيْنَ أَقْطَارِهَا أَوْ قَالَ بِأَقْطَارِهَا حَتَّى يَكُونَ بَعْضُهُمْ يُهْلِكُ بَعْضًا وَحَتَّى يَكُونَ بَعْضُهُمْ يَسْبِي بَعْضًا وَإِنَّمَا أَخَافُ عَلَى أُمَّتِي الأَئِمَّةَ الْمُضِلِّينَ وَإِذَا وُضِعَ السَّيْفُ فِي أُمَّتِي لَمْ يُرْفَعْ عَنْهَا إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَلاَ تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى تَلْحَقَ قَبَائِلُ مِنْ أُمَّتِي بِالْمُشْرِكِينَ وَحَتَّى تَعْبُدَ قَبَائِلُ مِنْ أُمَّتِي الأَوْثَانَ وَإِنَّهُ سَيَكُونُ فِي أُمَّتِي كَذَّابُونَ ثَلاَثُونَ كُلُّهُمْ يَزْعُمُ أَنَّهُ نَبِيٌّ وَأَنَا خَاتَمُ النَّبِيِّينَ لاَ نَبِيَّ بَعْدِي وَلاَ تَزَالُ طَائِفَةٌ مِنْ أُمَّتِي عَلَى الْحَقِّ " . قَالَ ابْنُ عِيسَى " ظَاهِرِينَ " . ثُمَّ اتَّفَقَا " لاَ يَضُرُّهُمْ مَنْ خَالَفَهُمْ حَتَّى يَأْتِيَ أَمْرُ اللَّهِ " .
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, নিশ্চয়ই আল্লাহ্ (অথবা) আমার রব পৃথিবীকে আমার জন্য সংকুচিত করে দিয়েছেন এবং আমাকে এর পূর্ব ও পশ্চিম সীমানা দেখানো হয়েছে। আর যতটুকু আমার জন্য সংকুচিত করা হয়েছে, ততটুকুতে অচিরেই আমার উম্মাতের রাজত্ব বিস্তার লাভ করবে। আমাকে লাল ও সাদা (স্বর্ণ ও রূপার) দু’টি ধনভান্ডার দেয়া হয়েছে। আর আমি আমার মহান প্রতিপালকের নিকট আমার উম্মাতের জন্য এই কথার আবেদন করেছি যে, তিনি তাদের সবাইকে যেন দুর্ভিক্ষে ধ্বংস না করেন এবং তাদের নিজেদের ব্যতীত কোন শত্রু যেন তাদের উপর কর্তৃত্ব করতে না পারে যারা তাদের ধ্বংস করে দিবে। নিশ্চয়ই আমার রব আমাকে বলেছেন, হে মুহাম্মাদ! আমি যা ফায়সালা করি, তা বাতিল হয় না। তবে আমি তাদের সবাইকে একসঙ্গে দূর্ভিক্ষে ধ্বংস করবো না এবং তাদের নিজেদের ছাড়া দিগ্বিদিক হতে আগত তাদের সমূলে বিনাশকারী বিধর্মী শত্রুকে তাদের উপর কর্তৃত্ব করতে দিবো না, তবে তাদের কতক অপরদের ধ্বংস করবে এবং কতক অপরাধে বন্দী করবে। আর আমি আমার উম্মাতের পথভ্রষ্ট নেতাদের ব্যাপারে শঙ্কিত। আমার উম্মাত যখন পরস্পর যুদ্ধে লিপ্ত হবে, তখন ক্বিয়ামাত সংঘটিত হওয়ার পূর্ব পর্যন্ত তারা বিরত হবে না। আর আমার উম্মাতের কিছু সংখ্যক মুশরিকদের সঙ্গে মিলিত না হওয়া পর্যন্ত এবং আমার উম্মাতের কতিপয় গোত্র মূর্তি পূজায় লিপ্ত না হওয়া পর্যন্ত ক্বিয়ামাত সংঘটিত হবে না। অবিলম্বে আমার উম্মাতের মধ্যে ত্রিশজন মিথ্যাবাদীর আবির্ভাব ঘটবে, তাদের প্রত্যেকেই নিজেকে নবী বলে দাবী করবে। অথচ আমিই সর্বশেষ নবী এবং আমার পরে আর কোন নবী আসবে না। তবে আমার উম্মাতের একটি দল সর্বদা সত্যের উপর অটল থাকবে। যারা তাদের বিরোধিতা করবে, তারা তাদের কোন ক্ষতি করতে পারবে না, এমনকি এ অবস্থায় আল্লাহ্র নির্দেশ (ক্বিয়ামাত) এসে যাবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2889) ، مشکوۃ المصابیح (5394، 5406)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو أسماء: هو عمرو بن مرثد الرَّحَبي، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرمي، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني. وأخرجه مسلم (٢٨٨٩)، والترمذي (٢٣١٧) و (٢٣٧٩) من طريق أيوب السختياني، ومسلم (٢٨٨٩)، وابن ماجه (١٠) و (٣٩٥٢) من طريق قتادة بن دعامة، كلاهما عن أبي قلابة عبد الله بن زيد الجرمي، به. ولم يخرج أحدٌ منهم الحديث بتمامه كما هو عند المصنف. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٣٩٤) بتمامه، و"صحيح ابن حبان" (٦٧١٤) و (٧٢٣٨). قال الخطابي: قوله: "زوى لي الأرض" معناه: قبضها وجمعها، ويقال: انزوى الشيء إذا انقبض وتجمع. وقوله: "ما زوي لي منها" يتوهم بعض الناس أن حرف "مِن" ها هنا معناه التبعيض، فيقول: كيف اشترط في الكلام الاستيعاب، ورد آخره إلى التبعيض. وليس ذلك على ما يقدِّرونه، وإنما معناه التفصيل للجملة المتقدمة. والتفصيل لا يناقض الجملة، ولا يبطل شيئاً منها، لكنه يأتي عليها شيئاً شيئاً، ويستوفيها جزءاً جزءاً، والمعنى أن الأرض زُويت جملتها له مرة واحدة، فرآها، ثم يُفتح له جزء جزء منها، حتى يأتي عليها كلها، فيكون هذا معنى التبعيض فيها. والكنزان: هما الذهب والفضه. وقوله: "لا يهلكها بسنة بعامة" فإن السنة القحط والجدْب، وإنما جرت الدعوة بأن لا تعمهم السنة كافة، فيهلكوا عن آخرهم، فأما أن يُجدِب قوم ويُخصِب آخرون فإنه خارج عما جرت به الدعوة، وقد رأينا الجدب في كثير من البلدان، وكان عام الرمادة في زمن عمر بن الخطاب ﵁، ووقع الغلاء بالبصرة أيام زياد، ووقع ببغداد في عصرنا الغلاء، فهلك خلق كثير من الجوع، إلا أن ذلك لم يكن على سبيل العموم والاستيعاب لكافة الأمة، فلم يكن في شي منها خُلْف للخبر. قلنا: وقوله: "يستبيح بيضتهم" قال في النهاية! أي: مجتمعهم وموضع سلطانهم ومُستقر دعوتهم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَوْفٍ الطَّائِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنِي أَبِي، - قَالَ ابْنُ عَوْفٍ وَقَرَأْتُ فِي أَصْلِ إِسْمَاعِيلَ - قَالَ حَدَّثَنِي ضَمْضَمٌ، عَنْ شُرَيْحٍ، عَنْ أَبِي مَالِكٍ، - يَعْنِي الأَشْعَرِيَّ - قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنَّ اللَّهَ أَجَارَكُمْ مِنْ ثَلاَثِ خِلاَلٍ أَنْ لاَ يَدْعُوَ عَلَيْكُمْ نَبِيُّكُمْ فَتَهْلِكُوا جَمِيعًا وَأَنْ لاَ يَظْهَرَ أَهْلُ الْبَاطِلِ عَلَى أَهْلِ الْحَقِّ وَأَنْ لاَ تَجْتَمِعُوا عَلَى ضَلاَلَةٍ " .
আবূ মালিক আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তোমাদেরকে তিনটি বিপদ হতে মুক্তি দিয়েছেন। তা হলো (১) তোমাদের নবী তোমাদের অভিশাপ দিবেন না, অন্যথায় তোমরা সকলেই ধ্বংস হয়ে যেতে। (২) বাতিলপন্থী কখনো সত্যপন্থীদের উপর বিজয়ী হবে না এবং (৩) তোমরা সকলে এক সাথে পথভ্রষ্ট হবে না। [৪২৫৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف لكن الجملة الثالثة صحيحة
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قال أبو حاتم الرازي:’’ شریح بن عبید عن أبي مالک الأشعري: مرسل ‘‘ (المراسیل ص90ت:327) ، (انوار الصحیفہ ص 151)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف، محمَّد بن إسماعيل -وهو ابن عياش- قال المصنف فيما سأله عنه الآجري: لم يكن بذاك، قد رأيته، ودخلت حمص غير مرة وهو حي، وسألت عمرو بن عثمان عنه فدفعه. وقال الحافظ في "تهذيب التهذيب": وقد أخرج أبو داود عن محمَّد بن عوف، عنه، عن أبيه عدة أحاديث، لكن يروونها بأن محمَّد بن عوف رآها في أصل إسماعيل. قلنا: ثم إنه اختُلف فيه عن إسماعيل بن عياش، فرواه يحيى بن يحيى النيسابوري الثقة الحافظ وغيره عنه، عن يحيى بن عُبيد الله بن عَبد الله ابن مَوْهَب، عن أبيه، عن أبي هريرة، ويحيى بن عُبيد الله متروك. وقال أبو حاتم الرازي عن رواية شريح -وهو ابن عُبيد الحضرمي-: حديثه عن أبي مالك الأشعري مرسل. ولهذا قال الحافظ في "التلخيص" ٣/ ١٤١: في إسناده انقطاع. وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (٩٢) عن محمَّد بن عوف، بهذا الإسناد. إلا أنه قال في روايته: "لا يجوعوا" بدل: "أن لا يدعو عليكم نبيكم فتهلكوا". وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٣٤٤٠)، وفي "مسند الشاميين" (١٦٦٣) عن هاشم ابن مرثد الطبراني، عن محمَّد بن إسماعيل بن عياش، به، وعنده زيادة في متن الحديث. وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (٤٢١) عن يحيى بن يحيى النيسابوري، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" (٥٩ - زوائد الهيثمي) عن إسماعيل بن أبي إسماعيل المؤدب، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (٣٦٧) من طريق علي بن معبد، ثلاثتهم عن إسماعيل بن عياش، عن يحيى بن عُبيد الله بن عَبد الله بن مُوهَب، عن أبيه عن أبي هريرة. وأخرجه مختصراً ابنُ أبي عاصم في "السُّنَّة" (٨٢) من طريق سعيد بن زُربي، عن الحسن البصري، عن أبي مالك كعب بن عاصم الأشعري، سمع النبي ﷺ يقول: "إن الله قد أجار أمتي من أن تجتمع على ضلالة" وسعيد بن زُربي منكر الحديث، والحسن لم يصرح بسماعه. قلنا: لكن لهذا القطعة شواهد كثيرة تصح بها، ذكرناها في "جامع الترمذي" (٢٣٠٥) بتحقيقنا، وانظر شواهدها أيضاً في "مسند أحمد" (٢١٢٩٣).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ رِبْعِيِّ بْنِ حِرَاشٍ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ نَاجِيَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " تَدُورُ رَحَى الإِسْلاَمِ لِخَمْسٍ وَثَلاَثِينَ أَوْ سِتٍّ وَثَلاَثِينَ أَوْ سَبْعٍ وَثَلاَثِينَ فَإِنْ يَهْلِكُوا فَسَبِيلُ مَنْ هَلَكَ وَإِنْ يَقُمْ لَهُمْ دِينُهُمْ يَقُمْ لَهُمْ سَبْعِينَ عَامًا " . قَالَ قُلْتُ أَمِمَّا بَقِيَ أَوْ مِمَّا مَضَى قَالَ " مِمَّا مَضَى " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ مَنْ قَالَ خِرَاشٍ فَقَدْ أَخْطَأَ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু মাস’ঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, ইসলামের চাকা (হুকুমাত) পঁয়ত্রিশ, ছত্রিশ বা সাঁইত্রিশ বছর চালু থাকবে। এ সময়ে তারা ধ্বংস হলে তাদের পথ হবে তাদের পূর্ববর্তীদের মত। আর এ সময় যদি তাদের দ্বীন প্রতিষ্ঠিত থাকে তবে সত্তর বছর পর্যন্ত তা প্রতিষ্ঠিত থাকবে। তিনি বলেন, আমি বললাম, এর গণনা কি অতীত হতে না এখন হতে শুরু হবে? তিনি বললেন, অতীত হতে শুরু হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (5407) ، سفیان صرح بالسماع عند أحمد (1/393) وتابعہ شیبان بن عبد الرحمن (4/521، 3/114)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة البراء بن ناجية، وقال البخاري في "تاريخه الكبير" ٢/ ١١٨: لم يذكر سماعا من ابن مسعود. ولكنه متابع. منصور: هو ابن المعتمر، وسفيان: هو ابن سعيد الثوري، وعبد الرحمن: هو ابن مَهدي. وأخرجه الطيالسي (٣٨٣)، ونعيم بن حماد في "الفتن" (١٩٦٣) و (١٩٦٥)، وأحمد في "مسنده" (٣٧٣٠) و (٣٧٣١) و (٣٧٥٨)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" ٣/ ٣٥٥، وإبراهيم بن الحسين بن ديزيل في "سيرة علي" كما في "البداية والنهاية" لابن كثير ٧/ ٢٨٦، وأبو يعلى (٥٢٨١)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (١٦٠٩) و (١٦١١) و (١٦١٣)، وابن الأعرابي في "معجمه"، (٨٣٥) و (٨٣٦) و (١٤٦٩)، والخطابي في "غريب الحديث" ١/ ٥٤٩، والحاكم ٣/ ١٠١ و ١١٤، والبيهقي في "دلائل النبوة" ٦/ ٣٩٣، والبغوي (٤٢٢٥)، من طريق منصور بن المعتمر، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٣٧٠٧)، وأبو يعلى (٥٠٠٩) و (٥٢٩٨)، والبزار (١٩٩٦) و (١٩٩٧)، والطحاوي (١٦١٠)، وابن الأعرابي في معجمه (١٤٧٠)، وابن حبان (٦٦٦٤)، والطبراني في "الكبير"، (١٠٣٥٦)، والخطابي في "غريب الحديث" ١/ ٥٤٩ من طريق القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، عن جده. وإسناده صحيح، وقد ثبَّت غير واحد من أهل العلم سماع عبد الرحمن من أبيه. وأخرجه البزار (١٩٤٢)، وبإثر الحديث (١٩٩٧)، وابن ديزيل كما في "البداية والنهاية" ٧/ ٢٨٦، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (١٦١٢)، والطبراني (١٠٣١١) من طريق شريك النخعي، عن مجالد بن سعيد، عن عامر الشعبي، عن مسروق، عن عبد الله بن مسعود. وأخرجه موقوفاً الطبراني في "الكبير"، (٩١٥٩) من طريق أبي الأحوص، عن عبد الله ابن مسعود. وإسناده صحيح. وقال الطبراني بإثره: هكذا رواه الأحوص موقوفاً، ورفعه مسروق وعبد الرحمن بن عبد الله والبراء بن ناجية. قال الخطابي: قوله: "تدور رحى الإسلام" دوران الرحى كناية عن الحرب والقتال، شبهها بالرحى الدوارة التي تطحن الحب لما يكون فيه من تلف الأرواح وهلاك الأنفس.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَنْبَسَةُ، حَدَّثَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، قَالَ حَدَّثَنِي حُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " يَتَقَارَبُ الزَّمَانُ وَيَنْقُصُ الْعِلْمُ وَتَظْهَرُ الْفِتَنُ وَيُلْقَى الشُّحُّ وَيَكْثُرُ الْهَرْجُ " . قِيلَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَيَّةُ هُوَ قَالَ " الْقَتْلُ الْقَتْلُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, সময় ছোট হয়ে আসবে, দ্বীনি জ্ঞান হ্রাস পাবে, ফিতনা প্রকাশ পাবে, কৃপণতা মানুষের অন্তর দখল করবে, হারাজ বেড়ে যাবে। জিজ্ঞেস করা হলো, হে আল্লাহ্র রাসূল! ‘হারাজ’ কি? তিনি বলেন, গণহত্যা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (157 بعد ح2672)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل عنبسة -وهو ابن خالد بن يزيد الأموي- وقد توبع. يونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم الزهري. وأخرجه البخاري (٦٠٣٧)، ومسلم بإثر الحديث (٢٦٧٢) من طريقين عن ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه البخاري (٨٥) و (١٠٣٦) و (١٤١٢) و (٧٠٦١) و (٧١٢١)، ومسلم بإثر الحديث (٢٦٧٢)، وبإثر (٢٨٨٨)، وابن ماجه (٤٠٤٧) و (٤٠٥٢) من طرق عن أبي هريرة. ولم يذكروا "ويُلقي الشُّح" سوى البخاري (٧٠٦١)، ومسلم في بعض طرقه، وهي طريق سعيد بن المسيب عن أبي هريرة. وزاد بعضهم: "وتكثر الزلازل"، وبعضهم يزيد أيضاً: "حتى يكثر فيكم المال فيفيض" وروايتا مسلم وابن ماجه الأوليتان مختصرتان. وهو في "مسند أحمد" (٧١٨٦)، و"صحيح ابن حبان" (٦٧١١) و (٦٧١٧). قال الخطابي: ومعنى يتقارب الزمان: قصر زمان الأعمار وقلة البركة فيها، وقيل: هو دنو زمان الساعة، وقيل؟ هو قصر مدة الأيام والليالي على ما روي أن الزمان يتقارب حتى تكون السنة كالشهر والشهر كالجمعة، والجمعة كاليوم واليوم كالساعة، والساعة كاحتراق الشمعة. والهرج أصله القتال، يقال: رأيتهم يتهارجون، أي: يتقاتلون.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ عُثْمَانَ الشَّحَّامِ، قَالَ حَدَّثَنِي مُسْلِمُ بْنُ أَبِي بَكْرَةَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنَّهَا سَتَكُونُ فِتْنَةٌ يَكُونُ الْمُضْطَجِعُ فِيهَا خَيْرًا مِنَ الْجَالِسِ وَالْجَالِسُ خَيْرًا مِنَ الْقَائِمِ وَالْقَائِمُ خَيْرًا مِنَ الْمَاشِي وَالْمَاشِي خَيْرًا مِنَ السَّاعِي " . قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا تَأْمُرُنِي قَالَ " مَنْ كَانَتْ لَهُ إِبِلٌ فَلْيَلْحَقْ بِإِبِلِهِ وَمَنْ كَانَتْ لَهُ غَنَمٌ فَلْيَلْحَقْ بِغَنَمِهِ وَمَنْ كَانَتْ لَهُ أَرْضٌ فَلْيَلْحَقْ بِأَرْضِهِ " . قَالَ فَمَنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ شَىْءٌ مِنْ ذَلِكَ قَالَ " فَلْيَعْمِدْ إِلَى سَيْفِهِ فَلْيَضْرِبْ بِحَدِّهِ عَلَى حَرَّةٍ ثُمَّ لِيَنْجُ مَا اسْتَطَاعَ النَّجَاءَ " .
মুসলিম ইবনু আবু বাকরাহ (রা) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, নিশ্চয়ই ফিতনা আসবে। তখন বসে থাকা ব্যক্তির চেয়ে শয়নকারী এবং দাড়ানো ব্যক্তির চেয়ে হেঁটে চলা ব্যক্তি উত্তম হবে। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল। এ ব্যাপারে আপনি আমাকে কি নির্দেশ দেন। তিনি বললেন, যার উট আছে, সে যেন তার উটের সঙ্গে, যার বকরী আছে, সে তার বকরীর সঙ্গে এবং যার জমি আছে সে তার জমি নিয়ে ব্যস্ত থাকে। তিনি প্রশ্ন করলেন, যার এসবের কিছুই নেই? তিনি বললেন, সে যেন তার তলোয়ারের দিকে মনোনিবেশ করে এবং পাথরের আঘাতে তরবারির ধার চূর্ণ করে দেয়, অতঃপর যথাসাধ্য চেষ্টা করে সেই ফিতনা হতে মুক্তি পাওয়ার।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2887)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل مسلم بن أبي بكرة وعثمان الشحام فهما صدوقان لا بأس بهما. وأخرجه مسلم (٢٨٨٧) من طريق عثمان الشَّحَّام، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٤١٢)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٦٥). وفي الباب عن أبي هريرة عند البخاري (٣٦٠١)، ومسلم (٢٨٨٦). وعن سعد بن أبي وقاص وأبي موسى الأشعري، سيأتيان بعده وبرقم (٤٢٥٩). وحديث محمَّد بن مسلمة عند أحمد (١٧٩٧٩) وغيره، وانظر تمام شواهده هناك. ولقوله: "من كانت له غنم فليلحق بغنمه" شاهد من حديث أبي سعيد الخدري عند البخاري (١٩)، وسيأتي عند المصنف برقم (٤٢٦٧) ولفظه: "يوشك أن يكون خير مال المسلم غنماً يتبع بها شعف الجبال ومواقع القطر يفر بدينه من الفتن". وقوله: "على حرَّة"، الحرة: أرض ذات حجارة سود، والمدينة تقع بين حرَّتين حرة واقم وحرة الوبرة. "والنَّجاء" بفتح النون والمد، أي: الاسراع.
حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدٍ الرَّمْلِيُّ، حَدَّثَنَا مُفَضَّلٌ، عَنْ عَيَّاشٍ، عَنْ بُكَيْرٍ، عَنْ بُسْرِ بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ حُسَيْنِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الأَشْجَعِيِّ، أَنَّهُ سَمِعَ سَعْدَ بْنَ أَبِي وَقَّاصٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي هَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَرَأَيْتَ إِنْ دَخَلَ عَلَىَّ بَيْتِي وَبَسَطَ يَدَهُ لِيَقْتُلَنِي قَالَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " كُنْ كَابْنَىْ آدَمَ " . وَتَلاَ يَزِيدُ { لَئِنْ بَسَطْتَ إِلَىَّ يَدَكَ } الآيَةَ .
সা’দ ইবনু আবু ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে উপরে বর্ণিত হাদীস প্রসঙ্গে বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনার কি মত যদি কেউ আমার ঘরে ঢুকে পড়ে এবং আমাকে হত্যা করার জন্য আর হাত প্রসারিত করে? তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি তখন আদম (আঃ)-এর পুত্রের মতো (হাবীলের) হয়ে যাও। অতঃপর বর্ণনাকারী ইয়াযীদ এ আয়াত তিলাওয়াত করেন। “তুমি যদি আমাকে হত্যা করতে হাত প্রসারিত করো .........”(সুরা আল-মায়িদাহঃ ২৮)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث الآتي (4259)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف فيه عن بكير -وهو ابن عبد الله بن الأشج- كما بينه الدارقطني في "العلل"، ٤/ ٣٨٤ - ٣٨٥ ثم قال بعد ذلك: وحديث مفضَّل بن فضالة أشبه بالصواب، والله أعلم. قلنا: وحسين بن عبد الرحمن -ويقال: عبد الرحمن بن حسين- الأشجعي مجهول، لكن للحديث طريق أخرى صحيحة. وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق"، ٦٤/ ٧ - ٨، والضياء في "المختارة" (٩٤٢)، والمزي في ترجمة حسين بن عبد الرحمن من "تهذيب الكمال" ٦/ ٣٨٩ - ٣٩٠ من طريق مُفضل بن فضالة، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "المعجم الأوسط" (٨٦٧٨) من طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث، عن الليث بن سعد، عن عياش بن عباس القتباني، عن بكير بن عبد الله ابن الأشج، عن بسر، عن عبد الرحمن بن حسين الأشجعي، عن سعد بن أبي وقاص. وخالف عبد الله بن صالح قتيبةُ بن سعيد، عند أبي خيثمة زهير بن حرب في "مسنده" كما في: "النكت الظراف" ٣/ ٢٨٠، وأحمد (١٦٠٩)، والترمذي (٢٣٤٠)، وأبي يعلى (٧٥٠)، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (١٢٦)، والسهمي في "تاريخ جرجان" ترجمة (١١٦٠) والضياء في "المختارة" (٩٣٨) عن الليث بن سعد، عن عياش بن عباس، عن بكير ابن الأشج، عن بُسر بن سعيد، عن سعد بن أبي وقاص. دون ذكر الأشجعي. وقد صوّب الدارقطني ذكره كما ذكرناه آنفا. وأخرجه أحمد (١٤٤٦) من طريق عبد الله بن لهيعة، عن بكير ابن الأشج، أنه سمع عبد الرحمن بن حسين يحدث أنه سمع سعد بن أبي وقاص. فأسقط من إسناده بسر بن سعيد، وابن لهيعة سيء الحفظ. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٥/ ٧، والدورقي في "مسند سعد" (١١٥)، والبزار (١٢٢٣) و (١٢٢٤)، وأبو يعلى (٧٨٩) من طرق عن داود بن أبي هند، عن أبي عثمان النهدي، عن سعد بن أبي وقاص، دون قوله: يا رسولَ الله، أرأيت إن دخل عليَّ بيتي وبسط يده ليقتلني … إلى آخر الحديث. وإسناده صحيح. ويشهد لهذا الحديث حديث أبي بكرة السالف قبله، وحديث أبي موسى الأشعري الآتي برقم (٤٢٥٩)، وحديث أبي هريرة الذي سلفت الإشارة إليه عند الحديث السابق. ويشهد للقطعة الأخيرة منه في قوله ﷺ: "كن كابنى آدم" حديث أبي موسى الآتي برقم (٤٢٥٩). وحديث أبي ذر الآتي عند المصنف برقم (٤٢٦١) وهو حديث صحيح. وحديث أبي بكرة عند مسلم (٢٨٨٧). وقوله: "كن كابن آدم" قال في "عون المعبود": المطلق ينصرف إلى "الكامل"، وفيه إشارة لطيفة إلى أن هابيل المقتول ظلماً هو ابن آدم لا قابيل القاتل الظالم كما قال تعالى في حق ولد نوح ﵇: ﴿إِنَّهُ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ إِنَّهُ عَمَلٌ غَيْرُ صَالِحٍ﴾ وفي بعض: كابني آدم، وفي بعض النسخ: كخير ابني آدم، أي: فلتستسلم حتى تكون قتيلاً كهابيل، ولا تكن قاتلاً. وانظر الحديث الآتي برقم (٤٧٧١).
حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا شِهَابُ بْنُ خِرَاشٍ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ غَزْوَانَ، عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ رَاشِدٍ الْجَزَرِيِّ، عَنْ سَالِمٍ، حَدَّثَنِي عَمْرُو بْنُ وَابِصَةَ الأَسَدِيُّ، عَنْ أَبِيهِ، وَابِصَةَ، عَنِ ابْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ فَذَكَرَ بَعْضَ حَدِيثِ أَبِي بَكْرَةَ قَالَ " قَتْلاَهَا كُلُّهُمْ فِي النَّارِ " . قَالَ فِيهِ قُلْتُ مَتَى ذَلِكَ يَا ابْنَ مَسْعُودٍ قَالَ تِلْكَ أَيَّامُ الْهَرْجِ حَيْثُ لاَ يَأْمَنُ الرَّجُلُ جَلِيسَهُ . قُلْتُ فَمَا تَأْمُرُنِي إِنْ أَدْرَكَنِي ذَلِكَ الزَّمَانُ قَالَ تَكُفُّ لِسَانَكَ وَيَدَكَ وَتَكُونُ حِلْسًا مِنْ أَحْلاَسِ بَيْتِكَ . فَلَمَّا قُتِلَ عُثْمَانُ طَارَ قَلْبِي مَطَارَهُ فَرَكِبْتُ حَتَّى أَتَيْتُ دِمَشْقَ فَلَقِيتُ خُرَيْمَ بْنَ فَاتِكٍ فَحَدَّثْتُهُ فَحَلَفَ بِاللَّهِ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ لَسَمِعَهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَمَا حَدَّثَنِيهِ ابْنُ مَسْعُودٍ .
ইবনু মাস’উদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি ..... অতঃপর তিনি আবূ বাকরাহ বর্ণিত হাদীসের অংশ বিশেষ বর্ণনা করে বলেন, ঐ ফিতনায় নিহত সকল লোকই জাহান্নামী হবে। তিনি তাতে বলেন, আমি বললাম, হে ইবনূ মাস’উদ! ঐ পরিস্থিতি কখন হবে? তিনি বললেন, সেই মারামারির যুগে কোন ব্যক্তি তার বন্ধুর নিকটেও নিরাপদ থাকবেনা। আমি বললাম, সেই যুগ যদি আমাকে পেয়ে বসে, তাহলে আমাকে কি করতে আদেশ করেন? তিনি বলেন, তোমার জিহবা নিয়ন্ত্রণে রাখবে, হাত গুটিয়ে রাখবে আর তুমি তোমার ঘরের বাইরে বের হবে না। অতঃপর যখন ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হলেন, তখন আমার ফিতনার কথা স্মরণ হল। সুতরাং আমি যাত্রা করে দামিশকে চলে এলাম এবং খুরাইম ইবনু ফাতিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাতে এ হাদীস বর্ণনা করলাম। তিনি যেই সত্তা ছাড়া কোন ইলাহা নেই সেই আল্লাহ্র কসম করে বললেন, আমি তাঁর নিকট ইবনু মাস’উদের যে হাদীস বর্ণনা করেছি, অনুরূপ হাদীস তিনিও রাসুলুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট হতে শুনেছেন। [৪২৫৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، القاسم بن غزوان لم یوثقہ غیر ابن حبان فھو مجہول الحال کما فی التحریر (5480) ، (انوار الصحیفہ ص 151)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة القاسم بن غزوان وعمرو بن وابصة. وسالم المذكور في هذا الإسناد اختلف فيه أهو ابن أبي الجعد أو ابن أبي المهاجر أو ابن عجلان الأفطس، وهؤلاء الثلاثة كلهم ثقات، لكن روى الحديث معمر بن راشد الثقة، عن إسحاق بن راشد فلم يذكر سالماً هذا، وذكر الحافظ ابن عساكر في "تاريخه" ٦٢/ ٣٣٥ أن سليمان بن صهيب الرقي رواه أيضاً عن إسحاق بن راشد فلم يذكر سالماً، وأسنده ابن عساكر من طريقه، وعلى كل حال تبقى جهالة عمرو بن وابصة هذا. وأخرجه المزي في ترجمة القاسم بن غزوان من "تهذيب الكمال" ٢٣/ ٤٠٧ من طريق شهاب بن خراش، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (٢٠٧٢٧)، ومن طريقه أخرجه البزار (١٤٤٤)، والطبراني في "الكبير" (٩٧٧٤)، والخطابي في "العُزلة" (١١)، والحاكم ٣/ ٣٢٠ و ٤/ ٤٢٦ - ٤٢٧، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" ٦٢/ ٣٣٦ - ٣٣٧، وابن أبي شيبة ١٥/ ١٢٠، ونعيم بن حماد في "الفتن" (١٥٧) و (٣٤٢)، وأحمد (٤٢٨٧)، وإبراهيم الحربي في "غريب الحديث" ١/ ١٣٢ و ٢/ ٤٤٢ من طردتى عن ابن المبارك، كلاهما (عبد الرزاق وابن المبارك) عن معمر بن راشد، وابن عساكر ٦٢/ ٣٣٥ من طريق سليمان بن صهيب الرقي، كلاهما (معمر وسليمان) عن إسحاق بن راشد، عن عمرو ابن وابصة، عن أبيه، عن ابن مسعود، به فلم يذكرا في الإسناد سالماً. وأخرجه أحمد (٤٢٧٦) عن عبد الرزاق، عن معمر، عن رجل، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه، عن ابن مسعود. فلم يسمِّ الرجل، وجزم الدارقطني في "العلل" ٥/ ٢٨١ بأنه إسحاق بن راشد، وتبعه الحافظ ابن حجر في "تعجيل المنفعة". وأخرجه ابن المبارك في "مسنده" -برواية حبان بن موسى- (٢٦٢) عن معمر بن راشد، عن سالم، عن إسحاق بن راشد، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه، عن ابن مسعود. كذا وقع في المطبوع، ولا ندري أثمَّ تقديم وتأخير لم يتنبه له المحقق، فيكون سالم بين إسحاق وعمرو بن وابصة، أم هو كذلك في رواية حبان بن موسى، فإن يكن كذلك فقد خالفه جماعة أصحاب ابن المبارك فلم يذكروا سالماً هذا في الإسناد كما سلف ولم يذكره الدارقطني أيضاً في "العلل"، ٥/ ٢٨٠ - ٢٨١ حين ساق الاختلاف في إسناد هذا الحديث، والله تعالى أعلم.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ جُحَادَةَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ ثَرْوَانَ، عَنْ هُزَيْلٍ، عَنْ أَبِي مُوسَى الأَشْعَرِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِنَّ بَيْنَ يَدَىِ السَّاعَةِ فِتَنًا كَقِطَعِ اللَّيْلِ الْمُظْلِمِ يُصْبِحُ الرَّجُلُ فِيهَا مُؤْمِنًا وَيُمْسِي كَافِرًا وَيُمْسِي مُؤْمِنًا وَيُصْبِحُ كَافِرًا الْقَاعِدُ فِيهَا خَيْرٌ مِنَ الْقَائِمِ وَالْمَاشِي فِيهَا خَيْرٌ مِنَ السَّاعِي فَكَسِّرُوا قِسِيَّكُمْ وَقَطِّعُوا أَوْتَارَكُمْ وَاضْرِبُوا سُيُوفَكُمْ بِالْحِجَارَةِ فَإِنْ دُخِلَ - يَعْنِي عَلَى أَحَدٍ مِنْكُمْ - فَلْيَكُنْ كَخَيْرِ ابْنَىْ آدَمَ " .
আবূ মুসা আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, নিশ্চয়ই কিয়ামাতের কাছাকাছি সময়ে অন্ধকার রাতের টুকরার ন্যায় বিপদ আসতে থাকবে। তখন সকালবেলা যে ঈমানদার ছিল, সন্ধ্যাবেলা সে কাফির হয়ে যাবে। আর সন্ধ্যাবেলা যে ঈমানদার ছিল, সে সকালবেলা কাফির হয়ে যাবে। তখন দাঁড়ানো ব্যাক্তির চাইতে বসা ব্যাক্তি এবং হেটে চলা লোক দৌড়ে চলা লোকের চাইতে উত্তম হবে। তখন তোমরা তোমাদের ধনুকগুলো ভেঙে চুরমার করে ফেলো, ধনুকের ছিলাগুলো কাটে ফেলো এবং তরবারিগুলো পাথরে আঘাত করে চূর্ণ-বিচূর্ণ করো। তবুও যদি তোমাদের কারো কারো নিকট কেউ এসে পড়ে, তবে যেন সে আদম (আঃ)-এর দু’পুত্রের মধ্যে উত্তমটির (হাবীলের) মতো হয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (5399)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن ثروان، وقد روي الحديث من طريق آخر سيأتي عند المصنف برقم (٤٢٦٢)، وله شواهد نذكرها في هذا التعليق. وأخرجه ابن ماجه (٣٩٦١) من طريق عبد الوارث بن سعيد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٩٧٣٠)، و "صحيح ابن حبان" (٥٩٦٢). وأخرجه مختصراً ابنُ أبي شيبة ١١/ ١٩ من طريق الحسن البصري، عن أبي موسى رفعه: "تكون في آخر الزمان فتن كقطع الليل المظلم، يصبح الرجل مؤمناً ويمسي كافراً، ويمسي مؤمناً ويصبح كافراً". والحسن لم يسمع أبا موسى. وسيأتي من طريق آخر برقم (٤٢٦٢). ويشهد لأوله حديث أبي هريرة عند مسلم (١١٨)، والترمذي (٢٣٤١) بلفظ: "بادروا بالأعمال فتناً كقطع الليل المظلم، يصبح الرجل فيها مؤمناً ويمسي كافراً، أو يمسي مؤمناً ويصبح كافراً، يبيع دينه بعرض من الدنيا، وهو في "مسند أحمد" (٨٠٣٠). ويشهد لتفضيل القاعد في هذه الفتن على القاتم، والماشي على الساعي حديث أبي بكرة وحديث سعد بن أبي وقاص السالفان برقم (٤٢٥٦) و (٤٢٥٧). وحديث أبي هريرة عند البخاري (٣٦٠١)، ومسلم (٢٨٨٦). ويشهد لكسر السلاح عند الفتن والنزام البيوت حديث أبي بكرة وسعد السالفين أيضاً. وحديث أبي ذر الآتي برقم (٤٢٦١). وحديث محمَّد بن مسلمة عند أحمد (١٧٩٧٩) وغيره، وانظر تمام شواهده عنده. وانظر في اختلاف العلماء في قتال الفتنة "شرح مسلم" للإمام النووي ١٨/ ٨ عند الحديث (٢٨٨٦). وقوله: "كقطع الليل المظلم" قطع الليل: طائفةٌ منه، وقِطعةٌ، وجمعُ القِطْعة قِطَع، أراد: فتنة مظلمة سوداء تعظيماً لشأنها.
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ رَقَبَةَ بْنِ مَصْقَلَةَ، عَنْ عَوْنِ بْنِ أَبِي جُحَيْفَةَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، - يَعْنِي ابْنَ سَمُرَةَ - قَالَ كُنْتُ آخِذًا بِيَدِ ابْنِ عُمَرَ فِي طَرِيقٍ مِنْ طُرُقِ الْمَدِينَةِ إِذْ أَتَى عَلَى رَأْسٍ مَنْصُوبٍ فَقَالَ شَقِيَ قَاتِلُ هَذَا . فَلَمَّا مَضَى قَالَ وَمَا أَرَى هَذَا إِلاَّ قَدْ شَقِيَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنْ مَشَى إِلَى رَجُلٍ مِنْ أُمَّتِي لِيَقْتُلَهُ فَلْيَقُلْ هَكَذَا فَالْقَاتِلُ فِي النَّارِ وَالْمَقْتُولُ فِي الْجَنَّةِ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ الثَّوْرِيُّ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سُمَيْرٍ أَوْ سُمَيْرَةَ وَرَوَاهُ لَيْثُ بْنُ أَبِي سُلَيْمٍ عَنْ عَوْنٍ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سُمَيْرَةَ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ لِي الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ - يَعْنِي بِهَذَا الْحَدِيثِ - عَنْ أَبِي عَوَانَةَ وَقَالَ هُوَ فِي كِتَابِي ابْنُ سَبْرَةَ وَقَالُوا سَمُرَةَ وَقَالُوا سُمَيْرَةَ هَذَا كَلاَمُ أَبِي الْوَلِيدِ .
আব্দুর রহমান ইবনু সামুরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে মদিনাহর কোন এক রাস্তায় ছিলাম। হঠাৎ তিনি একটি ঝুলন্ত মাথার নিকট এসে বললেন, এর হত্যা বড়ই দুর্ভাগা! তিনি যেতে যেতে বললেন, আমার মতে সে অত্যন্ত দুর্ভাগা। কেননা আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, যদি আমার উম্মতের কাউকে হত্যা করার জন্য কোন লোক অগ্রসর হয়, তাহলে তাকে এভাবে বলো, হত্যাকারী জাহান্নামে যাবে, আর নিহত ব্যাক্তি জান্নাতে যাবে। [৪২৬০]
দুর্বলঃ যঈফাহ হা/৪৬৬৪।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبد الرحمٰن بن سمیرۃ: مجہول (التحریر: 3889) وثقہ ابن حبان وحدہ ، (انوار الصحیفہ ص 151)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة عبد الرحمن الراوى عن ابن عمر، وقد اختلف في اسم أبيه، فقيل: سمرة، وقيل: سمير، وقيل: سميرة إلى غير ذلك كما بينه المصنف بإثر الحديث. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكرى، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٥/ ١٢١، وأحمد (٥٧٠٨) و (٥٧٥٤)، وأبو يعلى (٥٧٣٢)، والطبراني في "الأوسط" (١٩٩٤)، وأبو نعيم في "الحلية" ٨/ ٢٥٠، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" ٦٤/ ٧، والمزي في ترجمة عبد الرحمن من "تهذيب الكمال" ١٧/ ١٦١ من طرق عن عون بن أبي جُحيفة، به.