সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا الْحِمَّانِيُّ، - يَعْنِي عَبْدَ الْحَمِيدِ بْنَ عَبْدِ الرَّحْمَنِ - عَنْ طَلْحَةَ بْنِ يَحْيَى، وَبُرَيْدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِي مُوسَى، قَالَ قَدِمَ عَلَىَّ مُعَاذٌ وَأَنَا بِالْيَمَنِ، وَرَجُلٌ، كَانَ يَهُودِيًّا فَأَسْلَمَ فَارْتَدَّ عَنِ الإِسْلاَمِ، فَلَمَّا قَدِمَ مُعَاذٌ قَالَ لاَ أَنْزِلُ عَنْ دَابَّتِي حَتَّى يُقْتَلَ . فَقُتِلَ . قَالَ أَحَدُهُمَا وَكَانَ قَدِ اسْتُتِيبَ قَبْلَ ذَلِكَ .
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইয়ামানে অবস্থানকালে মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট আসলেন। একটি লোক ইয়াহুদী ছিল, সে মুসলিম হয়ে আবার ইসলাম ত্যাগ করে মুরতাদ হয়ে যায়। মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে বলেন, একে হত্যা না করা পর্যন্ত আমি আমার জন্তুযান হতে নামবো না। অতঃপর তাকে হত্যা করা হলো। তাল্হা ও বুরাইদাহ উভয়ের একজন বলেন, হত্যা করার পূর্বে তাকে ইসলামে ফিরে আসার আহবান জানানো হয়েছিল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، وانظر الحدیث السابق (4354)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل عبد الحميد بن عبد الرحمن الحِمّاني وطلحة بن يحيى -وهو ابن طلحة بن عُبيد الله التيمي-، فهما صدوقان حسناً الحديث. وقال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٢٧٥: هذه الرواية أقوى من رواية المسعودي عن القاسم. قلنا: يعني الرواية الآتية برقم (٤٣٥٧). وأخرجه البيهقي ٨/ ٢٠٦ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله، وتالييه.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، حَدَّثَنَا حَفْصٌ، حَدَّثَنَا الشَّيْبَانِيُّ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، بِهَذِهِ الْقِصَّةِ قَالَ فَأُتِيَ أَبُو مُوسَى بِرَجُلٍ قَدِ ارْتَدَّ عَنِ الإِسْلاَمِ، فَدَعَاهُ عِشْرِينَ لَيْلَةً أَوْ قَرِيبًا مِنْهَا فَجَاءَ مُعَاذٌ فَدَعَاهُ فَأَبَى فَضُرِبَ عُنُقُهُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ عُمَيْرٍ عَنْ أَبِي بُرْدَةَ لَمْ يَذْكُرْ الاِسْتِتَابَةَ وَرَوَاهُ ابْنُ فُضَيْلٍ عَنِ الشَّيْبَانِيِّ عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي بُرْدَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ أَبِي مُوسَى وَلَمْ يَذْكُرْ فِيهِ الاِسْتِتَابَةَ .
একই ঘটনা প্রসঙ্গে আবূ বুরদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেনঃ আবূ মুসার নিকট ইসলাম ত্যাগী একটি লোককে নিয়ে আসা হলো। তিনি তাকে বিশ দিন অথবা এর কাছাকাছি সময় পর্যন্ত ইসলামে ফিরে আসার আহবান জানান। অতঃপর মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসেও তাকে আহবান জানালেন; কিন্তু সে অস্বীকার করলো। সুতরাং তাকে হত্যা করা হলো। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবূ বুরদাহ হতে ‘আবদুল মালিক ইবনু ‘উমাইরের বর্ণিত হাদীসে ‘ইসলামে ফিরে আসার’ কথা উল্লেখ নেই। আর ইবনু ফুদাইল শাইবানীর সূত্রে সাঈদ ইবনু আবূ বুরদাহ হতে তার পিতা আবূ মুসা সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তাতেও ‘ইসলামে ফিরে আসার’ জন্য আহবান করার কথা উল্লেখ নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وانظر الحدیث السابق (4354)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الشيباني: هو أبو إسحاق سُليمان بن أبي سُليمان، وحفص: هو ابن غياث. وأخرجه البيهقي ٨/ ٢٠٦ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وانظر سابقيه، وما بعده. وانظر الكلام على فقه الحديث عند الرواية السالفة برقم (٤٣٥٤).
حَدَّثَنَا ابْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا الْمَسْعُودِيُّ، عَنِ الْقَاسِمِ، بِهَذِهِ الْقِصَّةِ قَالَ فَلَمْ يَنْزِلْ حَتَّى ضُرِبَ عُنُقُهُ وَمَا اسْتَتَابَهُ .
ক্বাসিম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, ক্বাসিম (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে অনুরূপ ঘটনা বর্ণিত। তিনি বলেন, তাকে হত্যা না করা পর্যন্ত তিনি (মু‘আয) অবতরণ করেননি। আর তাকে ইসলামে ফিরে আসার আহবানও করা হয়নি। [৪৩৫৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، السند منقطع ، القاسم بن عبد الرحمٰن بن عبد اللّٰہ بن مسعود لم یذکر عمن سمعہ ، (انوار الصحیفہ ص 154)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكن المسعودي -وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن عُتبة- اختلط، والراوي عنه معاذ بن معاذ العنبري قد ذكر أنه لما قدم على المسعودي وهو ببغداد في القدمة الثانية وجده قد اختلط، فلعله حمل عنه هذا الخبر في حال اختلاطه؛ لأنه نص فيه على عدم الاستتابة، والروايات الأخرى جاءت إما ناصَّةَ على الاستتابة هاما ساكتة عنها، وعلى فرض ثبوتها تُقدَّم الروايةُ المثبِتةُ كما قال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٢٧٥ لأن رواية الاثبات أقوى. ثم لأن إجماع الصحابة على الاستتابة فيما حكاهُ ابنُ عبد البر وابنُ تيمية كما سلف بيانه برقم (٤٣٥٤). وانظر الروايات الثلاث السالفة قبله.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدٍ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ الْحُسَيْنِ بْنِ وَاقِدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ يَزِيدَ النَّحْوِيِّ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كَانَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعْدِ بْنِ أَبِي سَرْحٍ يَكْتُبُ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَزَلَّهُ الشَّيْطَانُ فَلَحِقَ بِالْكُفَّارِ فَأَمَرَ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يُقْتَلَ يَوْمَ الْفَتْحِ فَاسْتَجَارَ لَهُ عُثْمَانُ بْنُ عَفَّانَ فَأَجَارَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আবদুল্লাহ ইবনু সা‘দ ইবনু আসুস সার্হ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর (ওয়াহী) লেখকদের অন্তর্ভুক্ত ছিল। শয়তান তাকে পথভ্রষ্ট করে এবং সে কাফিরদের সঙ্গে মিশে যায়। মাক্কাহ বিজয়ের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে হত্যার আদেশ দিলেন। কিন্তু ‘উসমান ইবনু ‘আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য নিরাপত্তা প্রার্থনা করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নিরাপত্তা প্রদান করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (4074 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل علي بن الحُسين بن واقد، فهو صدوق حسن الحديث، وهو متابع. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥١٨) من طريق علي بن الحسين بن واقد، بهذا الإسناد. وأخرجه الحاكم في "المستدرك" ٣/ ٤٥، ومن طريقه البيهقي ٨/ ١٩٦ من طريق إبراهيم بن هلال عن علي بن الحَسَن بن شقيق، عن الحسين بن واقد، به. وصححه الحاكم وسكت عنه الذهبي. وهذه متابعة لعلي بن الحسين بن واقد قوية. وأخرجه الطبري في "تفسيره" ١٤/ ١٨٤ - ١٨٥ عن محمَّد بن حميد الرازي، عن يحيى بن واضح، عن الحسين بن واقد، عن يزيد النحوي، عن عكرمة والحسن البصري مرسلاً. ومحمد بن حميد متروك. ويشهد له حديث سعد بن أبي وقاص الآتي بعده.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ الْمُفَضَّلِ، حَدَّثَنَا أَسْبَاطُ بْنُ نَصْرٍ، قَالَ زَعَمَ السُّدِّيُّ عَنْ مُصْعَبِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ سَعْدٍ، قَالَ لَمَّا كَانَ يَوْمُ فَتْحِ مَكَّةَ اخْتَبَأَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعْدِ بْنِ أَبِي سَرْحٍ عِنْدَ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ فَجَاءَ بِهِ حَتَّى أَوْقَفَهُ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ بَايِعْ عَبْدَ اللَّهِ . فَرَفَعَ رَأْسَهُ فَنَظَرَ إِلَيْهِ ثَلاَثًا كُلُّ ذَلِكَ يَأْبَى فَبَايَعَهُ بَعْدَ ثَلاَثٍ ثُمَّ أَقْبَلَ عَلَى أَصْحَابِهِ فَقَالَ " أَمَا كَانَ فِيكُمْ رَجُلٌ رَشِيدٌ يَقُومُ إِلَى هَذَا حَيْثُ رَآنِي كَفَفْتُ يَدِي عَنْ بَيْعَتِهِ فَيَقْتُلَهُ " . فَقَالُوا مَا نَدْرِي يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا فِي نَفْسِكَ أَلاَّ أَوْمَأْتَ إِلَيْنَا بِعَيْنِكَ قَالَ " إِنَّهُ لاَ يَنْبَغِي لِنَبِيٍّ أَنْ تَكُونَ لَهُ خَائِنَةُ الأَعْيُنِ " .
সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মাক্কাহ বিজয়ের দিন ‘আবদুল্লাহ ইবনু সা’দ ইবনু আবূ সার্হ ‘উসমান ইবনু ‘আফফান এর নিকট আত্মগোপন করে। তিনি তাকে নিয়ে এসে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে দাঁড় করিয়ে বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! ‘আবদুল্লাহকে বাই’আত করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা উঠিয়ে তিনবার তার দিকে তাকান এবং প্রতিবারই বাই’আত করতে অস্বীকৃতি জানান। তিনবারের পর তাকে বাই’আত করেন। অতঃপর তিনি সাহাবীদের দিকে ফিরে বলেনঃ তোমাদের মধ্যে কি সঠিক নির্দেশ উপলব্ধি করার মত কেউ ছিলনা, যে এর সামনে গিয়ে দাঁড়াত, আর যখন দেখত আমি তার বাই’আত গ্রহন না করার জন্য হাত গুটিয়ে নিচ্ছি, তখন সে তাকে হত্যা করতো? সাহাবীরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনার মনের ইচ্ছা উপলব্ধি করতে পারিনি। আপনি কেন আমাদের চোখ দিয়ে ইশারা করলেন না? তিনি বললেনঃ কোন নাবীর পক্ষে চোখের খেয়ানাতকারী হওয়া শোভা পায় না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، أخرجہ النسائي (4072 وسندہ حسن) وانظر الحدیث السابق (2683)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن، وهو مكرر الحديث السالف برقم (٢٦٨٣).
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ جَرِيرٍ، قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِذَا أَبَقَ الْعَبْدُ إِلَى الشِّرْكِ فَقَدْ حَلَّ دَمُهُ " .
জাবীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ ক্রীতদাস পলায়ন করে যদি মুশরিক হয়ে যায়, তবে তাকে হত্যা করা বৈধ। [৪৩৫৯]
দুর্বল, আর সহীহ হলো এ শব্দেঃ (আরবী) নাসায়ী।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف وصح بلفظ فقد برئت منه الذمة م
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (40574061) ، أبو إسحاق عنعن ، و حدیث مسلم (70) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 154، 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف في وقفه ورفعه على أبي إسحاق -وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي- لكن لا يضر وقف من وقفه، لأنه ثبت مرفوعاً من غير طريق أبي إسحاق السبيعي، ولأنه في حكم المرفوع. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٠١) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٣٥٠٢) من طريق القاسم بن يزيد، عن إسرائيل بن يونس السبيعي، عن جده، به. وخالف القاسمَ خالدُ بنُ عبد الرحمن وأحمد بن خالد الوهبي عند النسائي (٣٥٠٣) و (٣٥٠٤) فروياه عن إسرائيل، عن جده. موقوفاً. وأخرجه مرفوعاً مسلم (٦٩) من طريق داود بن أبي هند والنسائي (٣٤٩٨) من طريق منصور بن المعتمر، ومسلم (٧٠)، والنسائي (٣٤٩٩) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن مغيرة بن مِقسَم، ثلاثتهم (داود ومنصور بن المعتمر ومغيرة)، عن الشعبي، به. ولفظ داود: "أيما عبد أبق فقد برئت منه الذمة" ولفظ منصور: "إذا أبق العبد لم تقبل له صلاة حتى يرجع إلى مواليه" وكذلك لفظ مغيرة غير أنه قال: "وإن مات مات كافراً" بدل: "حتى يرجع … ". وخالف جريرَ بنَ عبد الحميد إسرائيلُ عند النسائي (٣٥٠٠) فرواه عن مغيرة بن مقسم، عن الشعبي، به موقوفاً. وأخرجه مسلم (٦٨) من طريق منصور بن عبد الرحمن، عن الشعبي، عن جرير أنه سمعه يقول: "أيما عبد أبق من مواليه، فقد كفر، حتى يرجع إليهم" قال منصور: قد واللهِ روي عن النبي ﷺ ولكني أكره أن يروى عني ها هنا بالبصرة. قلنا: وهذا يعني أن رواية منصور مرفوعة. وهو في "مسند أحمد" (١٩١٥٥) و (١٩٢٤٠) و (١٩٢٤٢) و (١٩٢٤٣). وانظر تمام الكلام عليه وتفصيل تخريجه هناك.
حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ مُوسَى الْخُتَّلِيُّ، أَخْبَرَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ جَعْفَرٍ الْمَدَنِيُّ، عَنْ إِسْرَائِيلَ، عَنْ عُثْمَانَ الشَّحَّامِ، عَنْ عِكْرِمَةَ، قَالَ حَدَّثَنَا ابْنُ عَبَّاسٍ، أَنَّ أَعْمَى، كَانَتْ لَهُ أُمُّ وَلَدٍ تَشْتُمُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَتَقَعُ فِيهِ فَيَنْهَاهَا فَلاَ تَنْتَهِي وَيَزْجُرُهَا فَلاَ تَنْزَجِرُ - قَالَ - فَلَمَّا كَانَتْ ذَاتَ لَيْلَةٍ جَعَلَتْ تَقَعُ فِي النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَتَشْتِمُهُ فَأَخَذَ الْمِغْوَلَ فَوَضَعَهُ فِي بَطْنِهَا وَاتَّكَأَ عَلَيْهَا فَقَتَلَهَا فَوَقَعَ بَيْنَ رِجْلَيْهَا طِفْلٌ فَلَطَخَتْ مَا هُنَاكَ بِالدَّمِ فَلَمَّا أَصْبَحَ ذُكِرَ ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجَمَعَ النَّاسَ فَقَالَ " أَنْشُدُ اللَّهَ رَجُلاً فَعَلَ مَا فَعَلَ لِي عَلَيْهِ حَقٌّ إِلاَّ قَامَ " . فَقَامَ الأَعْمَى يَتَخَطَّى النَّاسَ وَهُوَ يَتَزَلْزَلُ حَتَّى قَعَدَ بَيْنَ يَدَىِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنَا صَاحِبُهَا كَانَتْ تَشْتِمُكَ وَتَقَعُ فِيكَ فَأَنْهَاهَا فَلاَ تَنْتَهِي وَأَزْجُرُهَا فَلاَ تَنْزَجِرُ وَلِي مِنْهَا ابْنَانِ مِثْلُ اللُّؤْلُؤَتَيْنِ وَكَانَتْ بِي رَفِيقَةً فَلَمَّا كَانَتِ الْبَارِحَةَ جَعَلَتْ تَشْتِمُكَ وَتَقَعُ فِيكَ فَأَخَذْتُ الْمِغْوَلَ فَوَضَعْتُهُ فِي بَطْنِهَا وَاتَّكَأْتُ عَلَيْهَا حَتَّى قَتَلْتُهَا . فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " أَلاَ اشْهَدُوا أَنَّ دَمَهَا هَدَرٌ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জনৈক অন্ধ লোকের একটি ‘উম্মু ওয়ালাদ’ ক্রীতদাসী ছিল। সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে গালি দিত এবং তার সম্পর্কে মন্দ কথা বলতো। অন্ধ লোকটি তাকে নিষেধ করা সত্ত্বেও সে বিরত হতোনা। সে তাকে ভর্ত্সনা করতো; কিন্তু তাতেও সে বিরত হতো না। একরাতে সে যখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে গালি দিতে শুরু করলো এবং তার সম্পর্কে মন্দ কথা বলতে লাগলো, সে একটি ধারালো ছোরা নিয়ে তার পেটে ঢুকিয়ে তাতে চাপ দিয়ে তাকে হত্যা করলো। তার দু’পায়ের মাঝখানে একটি শিশু পতিত হয়ে রক্তে রঞ্জিত হলো। ভোরবেলা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘটনাটি অবহিত হয়ে লোকজনকে সমবেত করে বললেনঃ আমি আল্লাহর কসম করে বলছিঃ যে ব্যক্তি একাজ করেছে, সে যদি না দাঁড়ায়, তবে তার উপর আমার অধিকার আছে। একথা শুনে অন্ধ লোকটি মানুশের ভিড় ঠেলে কাঁপতে কাঁপতে সামনে অগ্রসর হয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি সেই নিহত দাসীর মনিব। সে আপনাকে গালাগালি করতো এবং আপনার সম্পর্কে অপমানজনক কথা বলতো। আমি নিষেধ করতাম কিন্তু সে বিরত হতোনা। আমি তাকে ধমক দিতাম; কিন্তু সে তাতেও বিরত হতোনা। তার গর্ভজাত মুক্তার মত আমার দুতি ছেলে আছে, আর সে আমার খুব প্রিয়পাত্রী ছিল। গতরাতে সে আপনাকে গালাগালি শুরু করে এবং আপনার সম্পর্কে অপমানজনক কথা বললে আমি তখন একটি ধারালো ছুরি নিয়ে তার পেটে স্থাপন করে তাতে চাপ দিয়ে তাকে হত্যা করে ফেলি। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা সাক্ষী থাকো, তার রক্ত বৃথা গেলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4075 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل عثمان الشحام، فهو صدوق لا بأس به وباقي رجاله ثقات. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق الشيعي. وأخرجه بنحوه النسائي في "الكبرى" (٣٥١٩) من طريق عباد بن موسى الخُتلي، بهذا الإسناد. المِغوَل: شبه سيف قصير، يشتمل به الرجل تحت ثيابه فيغطيه، وقيل: هو حديدة دقيقة لها حد ماضٍ وقَفَا، وقيل: هو سوط في جوفه سيف دقيق يشده الفاتك على وسطه ليغتال به الناس. قال الخطابي: وفيه بيان أن ساب النبي ﷺ مهدر الدم، وذلك أن السبّ منها لرسول الله ﷺ ارتداد عن الدين، ولا أعلم أحداً من المسلمين اختلف في وجوب قتله، ولكن إذا كان السابّ ذمياً فقد اختلفوا فيه: فقال مالك بن أنس: من شتم النبي ﷺ من اليهود والنصارى قتل إلا أن يسلم، وكذلك قال أحمد بن حنبل. وقال الشافعي: يقتل الذِّمِّي إذا سبَّ النبي ﷺ وتبرأ منه الذمة، واحتج في ذلك بخبر كعب بن الأشرف. وحكي عن أبي حنيفة أنه قال: لا يقُتل الذمي بشتم النبي ﷺ، ما هم عليه من الشرك أعظم.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْجَرَّاحِ، عَنْ جَرِيرٍ، عَنْ مُغِيرَةَ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ عَلِيٍّ، رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ يَهُودِيَّةً، كَانَتْ تَشْتِمُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَتَقَعُ فِيهِ فَخَنَقَهَا رَجُلٌ حَتَّى مَاتَتْ فَأَبْطَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم دَمَهَا .
‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ইয়াহুদী মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে গালাগালি করতো এবং তাঁর সম্পর্কে মন্দ কথা বলতো। একদা জনৈক ব্যক্তি তাকে গলা টিপে হত্যা করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার রক্ত বাতিল বলে ঘোষণা করেন। [৪৩৬১]
সানাদ দুর্বলঃ ইরওয়া হা/১২৫১।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مغیرۃ عنعن و جریر ھو ابن عبدالحمید الضبي ، (انوار الصحیفہ ص 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن قال المنذري في "اختصار السنن" ٦/ ٢٠٠: ذكر بعضهم أن الشعبي سمع من علي بن أبي طالب، وقال غيره: إنه رآه. والشعبي: هو عامر بن شَرَاحيل، ومُغيرة: هو ابن مِقْسَم، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه البيهقي ٧/ ٦٠ و ٩/ ٢٠٠، والضياء المقدسي في المختارة" (٥٤٧) من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبى شيبة ١٤/ ٢١٣ عن جرير بن عبد الحميد، عن مغيرة بن مقِسم، عن الشعبي قال: كان رجل من المسلمين أعمى، فكان يأوي إلى امرأة يهودية … فذكر القصة مرسلة، ولم يذكر علي بن أبي طالب. وقد أخرج هذه القصة نفسَها ابنُ سعد في "الطبقات الكبرى" ٤/ ٢١٠ عن قبيصة ابن عُقبة، عن يونس بن أبي إسحاق السبعي، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن مَعقِل مرسلاً قال: نزل ابن أم مكتوم على يهودية بالمدينة … فذكرها إلا أنه قال: تؤذيه في الله ورسوله. وسمى الرجل ابنَ أم مكتوم. وهذه الرواية -وإن كانت مرسلة- رجالها ثقات، وتؤيد رواية المصنف، فباجتماع الروايتين يتقوى الحديث. على أن مراسيل الشعبي وحدها حجة عند عدد من أهل العلم كابن المديني والعجلي انظر "شرح العلل" لابن رجب ١/ ٢٩٦، و"الصارم المسلول" لابن تيمية ص ٦٥ - ٦٦.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ يُونُسَ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ هِلاَلٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ح وَحَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، وَنُصَيْرُ بْنُ الْفَرَجِ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ زُرَيْعٍ، عَنْ يُونُسَ بْنِ عُبَيْدٍ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ هِلاَلٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُطَرِّفٍ، عَنْ أَبِي بَرْزَةَ، قَالَ كُنْتُ عِنْدَ أَبِي بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ فَتَغَيَّظَ عَلَى رَجُلٍ فَاشْتَدَّ عَلَيْهِ فَقُلْتُ تَأْذَنُ لِي يَا خَلِيفَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَضْرِبُ عُنُقَهُ قَالَ فَأَذْهَبَتْ كَلِمَتِي غَضَبَهُ فَقَامَ فَدَخَلَ فَأَرْسَلَ إِلَىَّ فَقَالَ مَا الَّذِي قُلْتَ آنِفًا قُلْتُ ائْذَنْ لِي أَضْرِبْ عُنُقَهُ . قَالَ أَكُنْتَ فَاعِلاً لَوْ أَمَرْتُكَ قُلْتُ نَعَمْ . قَالَ لاَ وَاللَّهِ مَا كَانَتْ لِبَشَرٍ بَعْدَ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم . قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا لَفْظُ يَزِيدَ قَالَ أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ أَىْ لَمْ يَكُنْ لأَبِي بَكْرٍ أَنْ يَقْتُلَ رَجُلاً إِلاَّ بِإِحْدَى الثَّلاَثِ الَّتِي قَالَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كُفْرٌ بَعْدَ إِيمَانٍ أَوْ زِنًا بَعْدَ إِحْصَانٍ أَوْ قَتْلُ نَفْسٍ بِغَيْرِ نَفْسٍ وَكَانَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَقْتُلَ .
আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তখন তিনি একটি লোকের প্রতি খুবই ক্রোধান্বিত হলেন। আমি তাকে বললাম, হে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর খালিফাহ! আমাকে অনুমতি দিন, তাকে হত্যা করি। তিনি বলেন, আমার একথায় তার ক্রোধ দূর হলো। তিনি উঠে বাড়ির ভেতরে চলে গেলেন। অতঃপর তিনি লোক পাঠিয়ে আমাকে (ডেকে নিয়ে) প্রশ্ন করেন, তুমি এইমাত্র কি বলেছ? আমি বললাম, আমাকে অনুমতি দিন, আমি তাকে হত্যা করি। তিনি প্রশ্ন করেন, আমি যদি তোমাকে আদেশ করতাম, তুমি কি তাই করতে? আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, না, আল্লাহর কসম! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পরে অন্য কোন মানবের এ অধিকার নেই।
ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এই মুল পাঠ বর্ণনাকারী ইয়াযীদ। আহ্মাদ ইবনু হাম্বল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অর্থাৎ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে তিনটি অপরাধের কোনটিতে লিপ্ত ব্যক্তিকে হত্যা করার কথা বলেছেন, তাদের ছাড়া অন্য কাউকে হত্যা করা আবূ বাক্রের জন্য বৈধ নয়ঃ কেউ ধর্ম ত্যাগ করলে, বিবাহিত ব্যাক্তি যেনা করলে এবং নিরপরাধ ব্যাক্তির হত্যাকারী। তবে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর হত্যা করার কর্তৃত্ব ছিল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شاھد عند النسائي (4076 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناد الموصول قوي. عبدُ الله بن مُطرِّف -وهو ابن عبد الله بن الشِّخِّير- روى عنه حميد بن هلال وعطية السراج وقتادة بن دعامة وغيرهم، وذكره ابن حبان وابن خلفون في "الثقات" وقال: كان رجلاً صالحاً، وقد صحح إسناده شيخ الإِسلام ابن تيمية في "الصارم المسلول" ص٩٩. وهو متابع كما سيأتي. يونس: هو ابن عُبيد، وحماد: هو ابن سلمة، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٢٦) من طريق يزيد بن زريع، بهذا الإسناد. وقال بعد أن ساقه من وجوه هذا آخرها: هذا أحسن هذه الأحاديث وأجودها. وهو في "مسند أحمد" (٦١). وأخرجه النسائي (٣٥٢٠) من طريق شعبة، عن توبة العنبري، عن أبي سوار عبد الله بن قدامة العنبري، عن أبي برزة الأسلمي قال: أغلظ رجل لأبي بكر الصديق، فقلت: أقتُله؟ فانتهرني، وقال: ليس هذا لأحد بعد رسول الله ﷺ. وهو في "مسند أحمد" (٥٤). وقد فَسَّر الإمامُ أحمد كلام أبي بكر الصديق هذا كما ذكر المصنف بإثره. وقال ابن حزم في المحلى" ١١/ ٤١٠: وأراد أيضاً معنى آخر كما رويناه مبيناً بلا إشكال ثم ساق بسنده إلى أبي السوار القاضي عن أبي برزة قال: أغلظ رجل لأبي بكر الصديق، قلت: ألا أقتله؟ فقال أبو بكر: ليس هذا إلا لمن شتم النبي ﷺ، فبين أبو بكر الصديق ﵁ أنه لا يُقتل من شتمه، لكن يقتل من شتم النبي ﷺ.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ قَوْمًا، مِنْ عُكْلٍ - أَوْ قَالَ مِنْ عُرَيْنَةَ - قَدِمُوا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَاجْتَوَوُا الْمَدِينَةَ فَأَمَرَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِلِقَاحٍ وَأَمَرَهُمْ أَنْ يَشْرَبُوا مِنْ أَبْوَالِهَا وَأَلْبَانِهَا فَانْطَلَقُوا فَلَمَّا صَحُّوا قَتَلُوا رَاعِيَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَاسْتَاقُوا النَّعَمَ فَبَلَغَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم خَبَرُهُمْ مِنْ أَوَّلِ النَّهَارِ فَأَرْسَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي آثَارِهِمْ فَمَا ارْتَفَعَ النَّهَارُ حَتَّى جِيءَ بِهِمْ فَأَمَرَ بِهِمْ فَقُطِعَتْ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ وَسُمِّرَ أَعْيُنُهُمْ وَأُلْقُوا فِي الْحَرَّةِ يَسْتَسْقُونَ فَلاَ يُسْقَوْنَ . قَالَ أَبُو قِلاَبَةَ فَهَؤُلاَءِ قَوْمٌ سَرَقُوا وَقَتَلُوا وَكَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ وَحَارَبُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, উকল অথবা উরাইনাহ গোত্রের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আসলো। মদিনায় বসবাস তাদের পক্ষে অনুপযোগী হওয়ায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে উতের পালের নিকট গিয়ে এগুলর পেশাব ও দুধ পান করতে আদেশ দেন। অতএব তারা সেখানে চলে গেলো। পরে তারা সুস্থ হয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর রাখালকে হত্যা করে এবং উট পাল্কে তাড়িয়ে নিয়ে যায়। দিনের প্রথমভাগে এ খবর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট পৌঁছে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের পিছনে লোক পাঠান। উঠন্ত বেলায় তাদের ধরে নিয়ে আসা হয়। তাঁর আদেশে তাদের হাত পা কাতা হয় এবং লৌহ শলাকা তাদের চোখে বিদ্ধ করে উত্তপ্ত রদে ফেলে রাখা হয়। তারা পানি চাইলেও তা দেয়া হয়নি। আবূ ক্বিলাবাহ বলেন, এরা এমন একটি গোত্রের, যারা চুরি করেছে, ঈমান আনার পর কুফরী করেছে এবং সর্বোপরি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করেছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (233) صحیح مسلم (1671)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي، وأيوب: هو ابن أبي تيمية السختياني، وحماد: هو ابن زيد. وأخرجه البخاري (٢٣٣) و (٦٨٠٥) من طريق حماد بن زيد، والنسائي في "الكبرى" (٣٤٧٦) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن أيوب السختياني، به. وأخرجه البخاري (٤٦١٠) و (٦٨٩٩)، ومسلم (١٦٧١)، والنسائي (٣٤٧٣) من طريق سلمان أبي رجاء مولى أبي قلابة، عن أبي قلابة، به. وأخرجه مسلم (١٦٧١)، والنسائي (٧٥٢٦) من طريق عبد العزيز بن صهيب، ومسلم (١٦٧١) من طريق معاوية بن قرة، والنسائي (٢٩١) و (٣٤٨٤) من طريق يحيى بن سيد، ثلاثتهم عن أنس. لكن قال النسائي عن رواية يحيى بن سيد: لا نعلم أحداً قال: عن يحيى بن سعيد، عن أنس بن مالك في هذا الحديث غير طلحة بن مُصرَّف، والصواب عندنا -والله أعلم-: عن يحيى بن سعيد عن سيد بن المسيب. مرسل. قلنا: وقد أخرج هذه الطريق المرسلة برقم (٣٤٨٥). وأخرج مسلم (١٦٧١)، والترمذي (٧٣)، والنسائي (٣٤٩٢) من طريق سليمان التيمي، عن أنس قال: إنما سمل رسولُ الله ﷺ أعيُن أولئك؛ لأنهم سملُوا أعيُن الرعاء. وهو في "مسند أحمد" (١٢٠٤٢) و (١٢٦٣٩)، و"صحيح ابن حبان" (١٣٨٦) و (٤٤٦٧) و (٤٤٧٤). وانظر ما سيأتي بالأرقام (٤٣٦٥ - ٤٣٦٨). قال الخطابي: قوله: فاجتووا: معناه: عافُوا المقام بالمدينة وأصابهم بها الجوى في بطونهم، يقال: اجتويتُ المكان: إذا كرهتَ الإقامة به لضرر يلحقك فيه. واللقاح: ذوات الدَّرِّ من الإبل، واحدتُها لِقحة. قوله: سَمَر أعينهم، يريد: أنه كحلهم بمسامير محماة، والمشهور من هذا في أكثر الروايات: سمل -باللام- أي: فقأ أعينهم، قال أبو ذؤيب: فالعين بعدهم كأن حِداقها … سمِلت بشوك فهي عُور تدمع قال الخطابي: وفي الحديث من الفقه أن إبل الصدقة قد يجوز لأبناء السبيل شرب ألبانها، وذلك أن هذه اللقاح كانت من إبل الصدقة، روي ذلك في هذا الحديث من غير هذا الطريق. قال: وفيه إباحة التداوي بالمحرم عند الضرورة؛ لأن الأبوالَ كلها نجسة من مأكول اللحم وغير مأكوله. وقال الخطابي أيضاً: وقد اختلف الناس في تأويل هذا الصنيع من رسول الله ﷺ، وقد روي عن ابن سيرين أن هذا إنما كان منه قبل أن تنزل الحدود، فوعظه ونهاه عن المُثلة فلم يَعُد. قال: وروى سليمان التيمي عن أنس: أن النبي ﷺ إنما سَمَل أولئك لأنهم سَمَلوا أعيُن الرعاة. يريد أنه إنما اقتص منهم على أمثال فعلهم. قلنا: وقد ذكر الحافظ في "الفتح" ١/ ٢٤١ أن النسخ هو الأصح على وفق ما قال ابن سيرين لما رواه أبو هريرة عند البخاري من النهي عن التعذيب بالنار بعد الإذن فيه، وأن قصة العرنيين كانت قبل إسلام أبي هريرة، وقد حضر الإذن ثم النهي. وذكر أنه مال إلى هذا القول البخاري. وحكاه إمام الحرمين في "النهاية" عن الشافعي. وانظر لزاماً تمام الكلام على فقهه عند الحديث الآتي برقم (٤٣٦٦).
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا وُهَيْبٌ، عَنْ أَيُّوبَ، بِإِسْنَادِهِ بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فِيهِ فَأَمَرَ بِمَسَامِيرَ فَأُحْمِيَتْ فَكَحَلَهُمْ وَقَطَّعَ أَيْدِيَهُمْ وَأَرْجُلَهُمْ وَمَا حَسَمَهُمْ .
আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। বর্ণনাকারী বলেন, তাঁর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আদেশে লৌহ শলাকা উত্তপ্ত করা হয়, তাদের চোখে ফুঁড়ে দেয়া হয়, হাত-পা কেটে দেয়া হয়, এবং তাদের রক্তপ্রবাহ বন্ধ করেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4364)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وُهَيب: هو ابن خالد. وأخرجه البخاري (٣٠١٨) و (٦٨٠٤) من طريق وهيب بن خالد، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. والحسم: كيُّ العرق بالنار ليقطع الدم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ بْنِ سُفْيَانَ، قَالَ أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنْ يَحْيَى، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي كَثِيرٍ - عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فِيهِ فَبَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي طَلَبِهِمْ قَافَةً فَأُتِيَ بِهِمْ . قَالَ فَأَنْزَلَ اللَّهُ تَبَارَكَ وَتَعَالَى فِي ذَلِكَ { إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الأَرْضِ فَسَادًا } الآيَةَ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তিনি তাতে বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের অনুসন্ধানে পদচিহ্ন বিশারদ একদল লোক পাঠালেন। পরে তাদেরকে ধরে নিয়ে আসা হোল। এ সম্পর্কে মহান আল্লাহ এ আয়াত নাযিল করেনঃ “যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করে আর পৃথিবীতে অশান্তি সৃষ্টি করে বেরায়, তাদের শাস্তি হোল, তাদের হত্যা করা হবে অথবা শূলে চড়ানো হবে অথবা তাদের একদিকের হাত এবং অপরদিকের পা কেটে ফেলা হবে অথবা ভূপৃষ্ঠ হতে নির্বাসিত (কারাগারে আবদ্ধ) করা হবে। এতাই তাদের ইহকালের অপমান, আর পরকালে তাদের কঠোর শাস্তি ভোগ করতে হবে” (সূরাহ আল্-মায়িদাহঃ ৩৩)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4364)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الوليد -وهو ابن مسلم الدمشقي- قد صرح بالتحديث في جميع طبقات الإسناد عند البخاري فانتفت شبهة تدليسه للتسوية. ثم هو متابع. وأخرجه البخاري (٦٨٠٢) و (٦٨٠٣)، والنسائي في "الكبرى" (٣٤٧٤) و (١١٠٧٨) من طريق الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٦٧١)، والنسائي (٣٤٧٥) من طريق محمَّد بن يوسف الفريابي، ومسلم (١٦٧١) من طريق مسكين بن بكير الحراني، كلاهما عن الأوزاعي، به. وهو في "مسند أحمد" (١٣٠٤٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٦٧). وانظر سابقيه. قال الخطابي: القافة: جمع قائف، وهو الذي يتبع الأثر، ويطلب الضالَة والهارب. قلت [القائل الخطابي]: وقد اختلف الناسُ فيمن نزلت فيه هذه الآية، فروي مُدرجاً في هذا الخبر أنها نزلت في هؤلاء، وقد ذكر أبو قِلابة أن هؤلاء قوم سرقوا وقتلوا وكفروا بعد إيمانهم وحاربوا الله ورسوله. وذهب الحسن البصري أيضاً إلى أن هذه الآية إنما نزلت في الكفار دون المسلمين، وذلك أن المسلم لا يُحارب الله ورسولَه [قلنا: ونقل الحافظ في "الفتح" ١٢/ ١٠٩ عن ابن بطال أن البخاري ذهب إلى ذلك، وأنه ذهب إلى ذلك أيضاً عطاء والضحَّاك والزهري] قلنا: وسيأتي بسند حسن عن ابن عباس أن هذه الآية نزلت في المشركين برقم (٤٣٧٢)، قال الخطابي: وقال أكثر العلماء: نزلت الآية في أهل الإِسلام، والدليل على ذلك قوله تعالى: ﴿إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ قَبْلِ أَنْ تَقْدِرُوا عَلَيْهِمْ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ﴾ [المائدة: ٣٤] والإسلام يحقِن الدم قبل القدرة وبعدها، فعُلِمَ أن المراد به المسلمون. فأما قوله: ﴿يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ﴾ فمعناه: يحاربون المسلمين الذين هم حزبُ الله وحزبُ رسوله، فأضيف ذلك إلى اللهِ وإلى الرسولِ إذ كان هذا الفعلُ في الخلاف لأمرهما راجعاً إلى مخالفتهما، وهذا كقوله ﷺ: "من آذى لي ولياً فقد بادرني بالمحاربة". وانظر "المغني" ١٢/ ٤٧٣ لابن قدامة المقدسي.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا ثَابِتٌ، وَقَتَادَةُ، وَحُمَيْدٌ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، ذَكَرَ هَذَا الْحَدِيثَ قَالَ أَنَسٌ فَلَقَدْ رَأَيْتُ أَحَدَهُمْ يَكْدِمُ الأَرْضَ بِفِيهِ عَطَشًا حَتَّى مَاتُوا .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি এ হাদীস প্রসঙ্গে বলেন, বিপরীত দিক হতে তাদের হাত-পা কর্তন করা হয়। হাদীসের প্রথমাংশে তিনি বলেন, তারা উট ছিনতাই করে এবং ইসলাম ধর্ম ত্যাগ করে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাদের একজনকে পিপাসার যন্ত্রণায় মুখ দিয়ে মাটি কামড়াতে দেখেছি। অবশেষে তারা মারা যায়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ الترمذي (72 وسندہ حسن) والنسائي (4039 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حميد: هو ابن أبي حميد الطويل، وقتادة: هو ابن دِعامة السَّدُوسِيُّ، وثابت: هو ابن أسلم البُناني، وحماد: هو ابن سلمة. وأخرجه مختصراً الترمذي (٧٢) و (١٩٥١) و (٢١٦٤) من طريق حماد بن سلمة، به وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٨٣) من طريق حماد بن سلمة، عن قتادة وثابت، به. وأخرجه البخارىٍ (٥٦٨٥) من طريق سلام بن مسكين، عن ثابت وحده، به. وأخرجه البخاري (٤١٩٢) و (٥٧٢٧)، ومسلم (١٦٧١)، والنسائي (٢٩٠) و (٣٤٨١) و (٣٤٨٢) من طريق سعيد بن أبي عروبة، والبخاري (٥٦٨٦)، ومسلم (١٦٧١) من طريق همام بن يحيى، والبخاري (١٥٠١) من طريق شعبة بن الحجاج، ثلاثتهم عن قتادة وحده، به. وأخرجه مسلم (١٦٧١)، والنسائي (٧٥٢٧) من طريق هُشَيم بن بشير، وابن ماجه (٢٥٧٨) و (٣٥٠٣) من طريق عبد الوهَّاب الثقنى، والنسائي (٣٤٧٧) من طريق عَبد الله بن عُمر وغيره، و (٣٤٧٨) و (٧٥٢٤) من طريق إسماعيل بن جعفر المدني، و (٣٤٧٩) و (٧٥٢٥) من طريق خالد بن الحارث و (٣٤٨٠) من طريق ابن أبي عدي، كلهم عن حميد الطويل وحده، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٠٦١). وانظر ما سلف برقم (٤٣٦٤). قال الخطابي: قوله: يكدم الأرض، أي: يتناولها بفمه وبَعَضُّ عليها بأسنانه، وأصل الكدم: العَضُّ، والعرب تقول في قلة المرعى: ما بقيت عندنا إلا كُدامة ترعاها الإبل، أي: مقدار ما تتناوله بمقاديم أسنانها.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عَدِيٍّ، عَنْ هِشَامٍ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ نَحْوَهُ زَادَ ثُمَّ نَهَى عَنِ الْمُثْلَةِ وَلَمْ يَذْكُرْ مِنْ خِلاَفٍ . وَرَوَاهُ شُعْبَةُ عَنْ قَتَادَةَ وَسَلاَّمِ بْنِ مِسْكِينٍ عَنْ ثَابِتٍ جَمِيعًا عَنْ أَنَسٍ لَمْ يَذْكُرَا مِنْ خِلاَفٍ . وَلَمْ أَجِدْ فِي حَدِيثِ أَحَدٍ قَطَعَ أَيْدِيَهُمْ وَأَرْجُلَهُمْ مِنْ خِلاَفٍ . إِلاَّ فِي حَدِيثِ حَمَّادِ بْنِ سَلَمَةَ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। এতে আরো আছেঃ অতঃপর তিনি অঙ্গহানি নিষিদ্ধ করেন। এ বর্ণনায় ‘বিপরীত দিক হতে’ কথাটুকুর উল্লেখ নেই। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অন্যান্য বর্ণনাকারীও এ অংশটুকু উল্লেখ করেননি। আমি হাম্মাদ ইবনু সালামাহর হাদীস ব্যতীত আর কারোর বর্ণনায় ‘বিপরীত দিক হতে তাদের হাত-পা কাটার’ কথা পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1501، 5685)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّسْتُوائي، وابن أبي عدي: هو محمَّد بن إبراهيم. وانظر ما قبله، وما سلف برقم (٤٣٦٤).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرٌو، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي هِلاَلٍ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، - قَالَ أَحْمَدُ هُوَ يَعْنِي عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ - عَنِ ابْنِ عُمَرَ أَنَّ نَاسًا أَغَارُوا عَلَى إِبِلِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَاسْتَاقُوهَا وَارْتَدُّوا عَنِ الإِسْلاَمِ وَقَتَلُوا رَاعِيَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مُؤْمِنًا فَبَعَثَ فِي آثَارِهِمْ فَأُخِذُوا فَقَطَعَ أَيْدِيَهُمْ وَأَرْجُلَهُمْ وَسَمَلَ أَعْيُنَهُمْ . قَالَ وَنَزَلَتْ فِيهِمْ آيَةُ الْمُحَارَبَةِ وَهُمُ الَّذِينَ أَخْبَرَ عَنْهُمْ أَنَسُ بْنُ مَالِكٍ الْحَجَّاجَ حِينَ سَأَلَهُ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদল লোক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উট লুট করে নিয়ে যায়, ইসলাম ধর্মত্যাগ করে মুরতাদ হয়ে যায় এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর একজন ঈমানদার রাখালকে হত্যা করে। অতঃপর তিনি তাদের পিছনে লোক পাঠান! তাদের ধরে নিয়ে আসা হলে তিনি তাদের হাত-পা কেটে দেন এবং চোখ উপড়ে ফেলেন। ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এদের সম্পর্কে ‘মুহারাবার’ আয়াত (৫:৩৩) নাযিল হয়। হাজ্জাজ যখন আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে এদের সম্পর্কে প্রশ্ন করেন, তখন তিনি এদের সম্পর্কিত হাদীসটি বর্ণনা করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، أخرجہ النسائي (4046)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عَبد الله بن عُبيد الله بن عمر بن الخطاب، وقد اختُلف عن أبي الزناد -وهو عبد الله بن ذكوان- في وصله وإرساله، وصله عنه سعيد بن أبي هلال، وأرسله محمَّد بن عجلان كما في الطريق الآتية بعده. عمرو: هو ابن الحارث. وأخرجه مختصراً النسائي في "الكبرى" (٣٤٩٠) من طريق ابن وهب، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ الْعَجْلاَنِ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَمَّا قَطَعَ الَّذِينَ سَرَقُوا لِقَاحَهُ وَسَمَلَ أَعْيُنَهُمْ بِالنَّارِ عَاتَبَهُ اللَّهُ تَعَالَى فِي ذَلِكَ فَأَنْزَلَ اللَّهُ تَعَالَى { إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الأَرْضِ فَسَادًا أَنْ يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا } الآيَةَ .
আবূয-যিনাদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উট চুরি করেছিল তিনি তাদের হাত-পা কাটলে এবং আগুন দিয়ে তাদের চোখ উৎপাটন করলে আল্লাহ তাঁর প্রতি অসন্তুষ্ট প্রকাশ করেন এবং আয়াত নাযিল করেনঃ “ যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরূদ্ধে যুদ্ধ করে এবং পৃথিবীতে ধবংসাত্মক কাজ করে বেড়ায় তাদের শাস্তি এই যে, তাদের হত্যা করা হবে অথবা শূলীবিদ্ধ করা হবে....” (সূরাহ আল-মায়িদাহঃ ৩৩)। [৪৩৬৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4047) ، السند مرسل وابن عجلان عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكنه مرسل. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٩١) عن أحمد بن عمر وبن السرح، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ سِيرِينَ، قَالَ كَانَ هَذَا قَبْلَ أَنْ تَنْزِلَ الْحُدُودُ يَعْنِي حَدِيثَ أَنَسٍ .
মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণিত হাদীসের ঘটনাটি ঘটেছিল আয়াত নাযিল হওয়ার পূর্বে। [৪৩৭০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5686)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: أثر صحيح الإسناد. قتادة: هو ابن دعامة السدوسي، وهمام: هو ابن يحيى العَوْذي. وأخرجه البخاري بإثر الحديث (٥٦٨٦) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ ثَابِتٍ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ يَزِيدَ النَّحْوِيِّ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ { إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الأَرْضِ فَسَادًا أَنْ يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا أَوْ تُقَطَّعَ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ مِنْ خِلاَفٍ أَوْ يُنْفَوْا مِنَ الأَرْضِ } إِلَى قَوْلِهِ { غَفُورٌ رَحِيمٌ } نَزَلَتْ هَذِهِ الآيَةُ فِي الْمُشْرِكِينَ فَمَنْ تَابَ مِنْهُمْ قَبْلَ أَنْ يُقْدَرَ عَلَيْهِ لَمْ يَمْنَعْهُ ذَلِكَ أَنْ يُقَامَ فِيهِ الْحَدُّ الَّذِي أَصَابَهُ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, “যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করে আর যমীনে অশান্তি সৃষ্টি করে বেড়ায়, তাদের শাস্তি হলোঃ তাদের হত্যা করা হবে অথবা শূলে চড়ানো হবে অথবা তাদের একদিকের হাত ও অপরদিকের পা কেটে ফেলা হবে অথবা যমীন হতে নির্বাসিত করা হবে, .....নিশ্চয়ই আল্লাহ ক্ষমাশীল ও করুণাময়” (সূরাহ আল-মায়িদাহঃ ৩৩-৩৪) আয়াত দু’টি মুশরিকদের সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। তবে তাদের মধ্যে কেউ যদি তাওবাহ করে ফিরে আসে তাকে নিয়ন্ত্রনে আনার পূর্বে তার উপর নির্ধারিত শাস্তি বাস্তবায়নে কোন বাধা থাকবে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (4051 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل علي بن حُسين -وهو ابن واقد المروزي- فهو صدوق حسن الحديث. وقد حسَّن إسناد. الحافظ في "التلخيص" ٤/ ٧٢. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٩٥) من طريق علي بن الحسين بن واقد، بهذا الإسناد. وقد سلف ذكر اختلاف أهل العلم فيمن نزلت فيه هذه الآيات برقم (٤٣٦٦).
حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَوْهَبٍ الْهَمْدَانِيُّ، قَالَ حَدَّثَنِي ح، وَحَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ الثَّقَفِيُّ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ قُرَيْشًا، أَهَمَّهُمْ شَأْنُ الْمَرْأَةِ الْمَخْزُومِيَّةِ الَّتِي سَرَقَتْ فَقَالُوا مَنْ يُكَلِّمُ فِيهَا تَعْنِي رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم . قَالُوا وَمَنْ يَجْتَرِئُ إِلاَّ أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ حِبُّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَكَلَّمَهُ أُسَامَةُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " يَا أُسَامَةُ أَتَشْفَعُ فِي حَدٍّ مِنْ حُدُودِ اللَّهِ " . ثُمَّ قَامَ فَاخْتَطَبَ فَقَالَ " إِنَّمَا هَلَكَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ أَنَّهُمْ كَانُوا إِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الشَّرِيفُ تَرَكُوهُ وَإِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الضَّعِيفُ أَقَامُوا عَلَيْهِ الْحَدَّ وَايْمُ اللَّهِ لَوْ أَنَّ فَاطِمَةَ بِنْتَ مُحَمَّدٍ سَرَقَتْ لَقَطَعْتُ يَدَهَا " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জনৈকা মাখযূমী মহিলার চুরি সংক্রান্ত অপরাধ কুরাইশদের দুশ্চিন্তাগ্রস্ত করে তুললে তারা বললো, এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে কে আলোচনা করবে? তারা বললো, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর প্রিয়পাত্র উসামাহ ইবনু যায়িদ-ই এ প্রসঙ্গে কথা বলতে সাহস করতে পারে। অতঃপর উসামাহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট একথা বলাতে তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ হে উসামাহ! তুমি কি মহান আল্লাহর নির্ধারিত শাস্তি মওকুফের সুপারিশ করছো? অতঃপর তিনি ভাষণ দিতে দাঁড়িয়ে বলেনঃ তোমাদের পূর্ববর্তী জাতিরা এজন্য ধবংস হয়েছে যে, তাদের মধ্যকার মর্যাদাশীল কেউ চুরি করলে তারা তাকে ছেড়ে দিতো, আর তাদের দুর্বল কেউ চুরি করলে তার উপর শাস্তি বাস্তবায়িত করতো। আমি আল্লাহর কসম করে বলছি! মুহাম্মাদের কন্যা ফাত্বিমাহও যদি চুরি করতো, তাহলে অবশ্যই আমি তার হাত কাটতাম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3732) صحیح مسلم (1688)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُروة: هو ابن الزبير بن العوَّام، وابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم ابن شهاب الزهري، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه البخاري (٣٤٧٥) و (٣٧٣٢) و (٣٧٣٣) و (٤٣٠٤) و (٦٧٨٧) و (٦٧٨٨)، ومسلم (١٦٨٨)، وابن ماجه (٢٥٤٧)، والترمذي (١٤٩٣)، والنسائي في "الكبرى" (٧٣٤١ - ٧٣٤٩) من طرق عن الزهري، به. إلا أن النسائي في الموضع الثاني قال: أتي النبيُّ ﷺ بسَارق، وهو مخالف لرواية الجماعة عن الزهري. وهو في "مسند أحمد" (٢٤١٣٨) و (٢٥٢٩٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٠٢). وانظر ما بعده. قال الخطابي: إنما أنكر عليه الشفاعة في الحد، لأنه إنما تشفع إليه بعد أن بلغ ذلك رسولَ الله ﷺ، وارتفعوا إليه فيه، فأما قبل أن يبلغ الإِمام فإن الشفاعة جائزة والستر على المذنبين مندوب إليه. وقد روي ذلك عن الزبير بن العوام وابن عباس، وهو مذهب الأوزاعي. وقال أحمد بن حنبل: تشفع في الحد ما لم يبلغ السلطان، وقال مالك بن أنس: من لم يُعرف بأذى الناس وإنما كانت تلك منه زلة، فلا بأس أن يُشفع له ما لم يبلغ الإِمام. وفيه دليل على أن القطع لا يزول عن السارق بأن يُوهب له المتاع، ولو كان ذلك مسقطاً عنه الحد لأشبه أن يطلب أسامة إلى المسروق منه أن يهبه منها، فيكون ذلك أعود عليها من الشفاعة.
حَدَّثَنَا عَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ، وَمُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ كَانَتِ امْرَأَةٌ مَخْزُومِيَّةٌ تَسْتَعِيرُ الْمَتَاعَ وَتَجْحَدُهُ فَأَمَرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِقَطْعِ يَدِهَا وَقَصَّ نَحْوَ حَدِيثِ اللَّيْثِ قَالَ فَقَطَعَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَدَهَا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَى ابْنُ وَهْبٍ هَذَا الْحَدِيثَ عَنْ يُونُسَ عَنِ الزُّهْرِيِّ وَقَالَ فِيهِ كَمَا قَالَ اللَّيْثُ إِنَّ امْرَأَةً سَرَقَتْ فِي عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةِ الْفَتْحِ . وَرَوَاهُ اللَّيْثُ عَنْ يُونُسَ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ بِإِسْنَادِهِ فَقَالَ اسْتَعَارَتِ امْرَأَةٌ . وَرَوَى مَسْعُودُ بْنُ الأَسْوَدِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نَحْوَ هَذَا الْخَبَرِ قَالَ سُرِقَتْ قَطِيفَةٌ مِنْ بَيْتِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ أَبُو الزُّبَيْرِ عَنْ جَابِرٍ أَنَّ امْرَأَةً سَرَقَتْ فَعَاذَتْ بِزَيْنَبَ بِنْتِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, জনৈক মাখযুমী মহিলা জিনিসপত্র ধার নিয়ে পরে তা অস্বীকার করতো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কাটার আদেশ দিলেন। অতঃপর লাইস বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কেটে দেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু ওয়াহব এ হাদীস ইউনুসের সূত্রে যুহরী হতে বর্ণনা করে বলেনঃ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর মাক্কাহ বিজয়কালে জনৈক মহিলা চুরি করে। লাইস ইউনুসের সূত্রে এবং ইবনু শিহাব সূত্রে এ হাদীস বর্ণনা করে বলেন, জনৈক মহিলা ধার নিতো। মাস‘উদ ইবনুল আস্ওয়াদ নিজস্ব সানাদে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে এর সমার্থক হাদীস বর্ণনা করে বলেনঃ মহিলাটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ঘর হতে একটি মখমলের চাদর চুরি করে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেন যে, জনৈক নারী চুরি করে। অতঃপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কন্যা যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মাধ্যমে মুক্তি চায়। হাদীসের বাকি অংশে ধার নেয়া অথবা চুরি করার কথা উল্লেখ আছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3475، 3732) صحیح مسلم (1688)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٨٨٣٠)، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٦٨٨). وأخرجه بهذا اللفظ أيضاً النسائي في "الكبرى" (٧٣٤٠) من طريق سفيان بن عيينة، عن أيوب بن موسى، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٢٩٧). وسيتكرر برقم (٤٣٩٧). وانظر ما قبله وما سيأتي برقم (٤٣٩٦). قال النووي في "شرح مسلم" ١١/ ١٥٦ تعليقاً على قوله: كانت تستعير المتاع وتجحده: وقد ذكر مسلم هذا الحديث في سائر الطرق المصرحة بأنها سرقت، وقطعت بسبب السرقة، فيتعين حمل هذه الرواية على ذلك جمعاً بين الروايات، فإنها قضية واحدة مع أن جماعة من الأئمة قالوا: هذه الرواية شاذة، فإنها مخالفة لجماهير الرواة، والشاذة لا يعمل بها، قال العلماء: وإنما لم يذكر السرقة في هذه الرواية، لأن المقصود عند الراوي ذكر منع الشفاعة في الحدود لا للإخبار عن السرقة، قال جماهير العلماء وفقهاء الأمصار: لا قطع على من جحد العارية، وتأولوا هذا الحديث بنحو ما ذكرته، وقال أحمد وإسحاق: يجب القطع في ذلك. وجاء في "المغني" ١٢/ ٤١٦ لابن قدامة: واختلفت الرواية عن أحمد في جحد العارية، فعنه عليه القطع وهو قول إسحاق لما روي عن عائشة أن امرأة كانت تستعير المتاع وتجحده … وعنه: لا قطع عليه، وهو قول الخرقي وأبي إسحاق بن شاقلا وأبي الخطاب وسائر الفقهاء وهو الصحيح إن شاء الله تعالى، لقول رسول الله ﷺ: "لا قطع على خائن".