হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (4535)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ جَارِيَةً، وُجِدَتْ، قَدْ رُضَّ رَأْسُهَا بَيْنَ حَجَرَيْنِ فَقِيلَ لَهَا مَنْ فَعَلَ بِكِ هَذَا أَفُلاَنٌ أَفُلاَنٌ حَتَّى سُمِّيَ الْيَهُودِيُّ فَأَوْمَتْ بِرَأْسِهَا فَأُخِذَ الْيَهُودِيُّ فَاعْتَرَفَ فَأَمَرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَنْ يُرَضَّ رَأْسُهُ بِالْحِجَارَةِ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা একটি বালিকাকে তার মাথা দু’টি পাথরের মাঝে রেখে থেতলানো অবস্থায় পাওয়া গেলো। তাকে প্রশ্ন করা হলো, তোমার সঙ্গে এরূপ ব্যবহার কে করেছে? অমুক ব্যক্তি করেছে? অমুক ব্যক্তি করেছে? অবশেষে এক ইয়াহুদীর নাম বলা হলে সে তার মাথার ইঙ্গিতে বললো, হাঁ। অতঃপর সেই ইয়াহুদীকে গ্রেপ্তার করে আনা হলে সে তা স্বীকার করলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার মাথা পাথরে থেতলিয়ে দেয়ার নির্দেশ দেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2746) صحیح مسلم (1672) ، وانظر الحدیث السابق (4527)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو مكرر الحديث السالف برقم (٤٥٢٧). تنبيه: هذا الحديث لم يرد في أصولنا الخطية، لكنه موجود في نسختي العظيم آبادي والسهارنفوري، وقال العظيم آبادي: قد وجد هذا الباب مع حديثه في نسخة واحدة.









সুনান আবী দাউদ (4536)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ عَمْرٍو، - يَعْنِي ابْنَ الْحَارِثِ - عَنْ بُكَيْرِ بْنِ الأَشَجِّ، عَنْ عُبَيْدَةَ بْنِ مُسَافِعٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ بَيْنَمَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقْسِمُ قَسْمًا أَقْبَلَ رَجُلٌ فَأَكَبَّ عَلَيْهِ فَطَعَنَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِعُرْجُونٍ كَانَ مَعَهُ فَجُرِحَ بِوَجْهِهِ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ تَعَالَ فَاسْتَقِدْ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ بَلْ عَفَوْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু সম্পদ বন্টনের কাজে ব্যস্ত ছিলেন। তখন এক ব্যক্তি এসে তাঁর উপর ঝুঁকে পড়লো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুরের লাঠি দিয়ে তাকে আঘাত করলেন এবং এতে তার চেহারার দাগ পড়ে গেলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, তুমি এসে আমার থেকে কিসাস নাও। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! বরং আমি ক্ষমা করে দিলাম। [৪৫৩৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4777) ، عبیدۃ بن مسافح،لم یوثقہ غیر ابن حبان فھو مجہول الحال ، (انوار الصحیفہ ص 159)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبيدة بن مُسافع. ابن وهب: هو عبد الله، وبكير ابن الأشج: هو ابن عبد الله، معروف بالنسبة لجده. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٩٤٩) و (٦٩٥٠) من طريق بكير بن الأشج، به. وهو في "مسند أحمد" (١١٢٢٩)، و"صحيح ابن حبان" (٦٤٣٤). وفي الباب عن عمر بن الخطاب سيأتي عند المصنف بعده. وعن أسيد بن حُضير، سيأتي عند المصنف برقم (٥٢٢٤) ولفظه: أنه بينما هو يحدّث القوم وكان فيه مُزاح، بينا يُضحكهم، فطعنه النبي ﷺ في خاصرته بعُودٍ، فقال: أَصبِرني، قال: "اصْطَبِر"، قال: إن عليك قميصاً، وليس علي قميص، فرفع النبي ﷺ عن قميصه فاحتضنه وجعل يقبّل كَشْحه، قال: إنما أردتُ هذا يا رسول الله. وإسناده صحيح.









সুনান আবী দাউদ (4537)


حَدَّثَنَا أَبُو صَالِحٍ، أَخْبَرَنَا أَبُو إِسْحَاقَ الْفَزَارِيُّ، عَنِ الْجُرَيْرِيِّ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، عَنْ أَبِي فِرَاسٍ، قَالَ خَطَبَنَا عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ رضى الله عنه فَقَالَ إِنِّي لَمْ أَبْعَثْ عُمَّالِي لِيَضْرِبُوا أَبْشَارَكُمْ وَلاَ لِيَأْخُذُوا أَمْوَالَكُمْ فَمَنْ فُعِلَ بِهِ ذَلِكَ فَلْيَرْفَعْهُ إِلَىَّ أَقُصُّهُ مِنْهُ قَالَ عَمْرُو بْنُ الْعَاصِ لَوْ أَنَّ رَجُلاً أَدَّبَ بَعْضَ رَعِيَّتِهِ أَتَقُصُّهُ مِنْهُ قَالَ إِي وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ أَقُصُّهُ وَقَدْ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَقَصَّ مِنْ نَفْسِهِ ‏.‏




আবুল ফিরাস (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের সম্মুখে ভাষণ দেয়ার সময় বলেন, আমি আমার কর্মচারীদেরকে এজন্য প্রেরণ করি না যে, তারা আপনাদের উপর শারীরিক নির্‍্যাতন চালাবে এবং আপনাদের সম্পদ ছিনিয়ে নিবে। যদি কারো উপর এ ধরনের কোন কিছু করা হয়ে থাকে তাহলে সে যেন আমার নিকট অভিযোগ করে। আমি তার প্রতিশোধ নিবো। ‘আমর ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, যদি কোন ব্যক্তি তার কোন নাগরিককে আদব শিখানোর জন্য শাস্তি দেয় তাহলে কি তার কিসাস নেয়া হবে? তিনি বললেন, হাঁ। সেই পবিত্র সত্তার কসম যাঁর হাতে আমার জীবন! জেনে রাখো! আমি তার কিসাস গ্রহণ করবো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে তাঁর নিজের বিরুদ্ধে কিসাস কার্যকর করতে দেখেছি। [৪৫৩৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (4781) مختصرًا وسندہ حسن، أبو فراس النھدي: وثقہ ابن حبان و ابن خزیمۃ وابن الجارود والحاکم وغیرہم فھو صدوق حسن الحدیث




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. أبو فراس -وهو النَّهْدي- مخضرم وقد ذكره ابن حبان في "الثقات" وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين. الجُريري: هو سعيد بن إياس، وأبو نضرة: هو المنذر بن مالك بن قطعة، وأبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمَّد بن الحارث، وأبو صالح: هو محبوب بن موسى. وأخرجه الطيالسي (٥٤)، ومسدد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (٥٨٠٨)، وابن أبي شيبة ١٢/ ٣٢٧ - ٣٢٨، وأحمد (٢٨٦)، وابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص ١٦٧، وأبو يعلى (١٩٦)، وابن الجارود (٨٤٤)، والحاكم ٤/ ٤٣٩، والبيهقي ٨/ ٤٨ و ٩/ ٢٩ و ٤٢، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة أبي فراس ٣٤/ ١٨٤ من طرق عن سعيد الجُريري، بهذا الإسناد. وصححه الحاكم وسكت عنه الذهبي. وأخرجه إسحاق بن راهويه كما في إتحاف الخيرة (٥٨٠٩) عن جرير، عن عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء بن أبي رباح، عن عمر بن الخطاب ورجاله ثقات إلا أن عطاء لم يدرك عمر. وانظر الحديث السالف قبله. قوله: أبشاركم: جمع بَشَرة، وهو ظاهر الجلد. قال ابن القيم في "تهذيب السنن". وقد اختلف الناس في هذه المسألة -وهي القصاص في اللطمة والضربة ونحوها- مما لا يمكن المقتص أن يفعل بخصمه مثل ما فعله به من كل وجه: هل يسوغ القصاص في ذلك أو يعدل إلى عقوبته بجنس آخر وهو التعزير؟ على قولين: أصحهما أنه شرع فيه القصاص، وهو مذهب الخلفاء الراشدين ثبت ذلك عنهم، حكاه عنهم أحمد وأبو إسحاق الجوزجاني، ونص عليه أحمد في رواية الشالنجي وغيره، قال شيخنا ﵀: وهو قول جمهور السلف. والقول الثاني: أنه لا يشرع فيه القصاص، وهو المنقول عن الشافعي ومالك وأبي حنيفة وقول المتأخرين من أصحاب أحمد …









সুনান আবী দাউদ (4538)


حَدَّثَنَا دَاوُدُ بْنُ رُشَيْدٍ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، أَنَّهُ سَمِعَ حِصْنًا، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا سَلَمَةَ، يُخْبِرُ عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ قَالَ ‏"‏ عَلَى الْمُقْتَتِلِينَ أَنْ يَنْحَجِزُوا الأَوَّلَ فَالأَوَّلَ وَإِنْ كَانَتِ امْرَأَةً ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ بَلَغَنِي أَنَّ عَفْوَ النِّسَاءِ فِي الْقَتْلِ جَائِزٌ إِذَا كَانَتْ إِحْدَى الأَوْلِيَاءِ وَبَلَغَنِي عَنْ أَبِي عُبَيْدٍ فِي قَوْلِهِ ‏"‏ يَنْحَجِزُوا ‏"‏ ‏.‏ يَكُفُّوا عَنِ الْقَوَدِ ‏.




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ বিবাদমান পক্ষবৃন্দ যেন কিসাস গ্রহণ হতে বিরত থাকে। ঘনিষ্ঠতর ব্যক্তি কিসাস ক্ষমা করবে, অতঃপর পরবর্তী ঘনিষ্ঠতর ব্যক্তি, যদিও সে মহিলা হয়। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘ইয়ানহাজি্যু’ শব্দের অর্থ হলো, তার কিসাস গ্রহণ হতে বিরত থাকবে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, মহিলাদের জন্যও হত্যাকারীকে ক্ষমা করা বৈধ, যদি তিনি নিহতের ওয়ারিস হন। [৪৫৩৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4792) ، حصن مقبول (تق: 1364) أي: مجہول الحال ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. حِصْن: هو ابن عبد الرحمن -أو ابن مِحصَن- التَّراغِمي أبو حذيفة الدمشقي، لم يرو عنه غير الأوزاعي، وقال الدارقطني: يعتبر به. قلنا: يعني في المتابعات والشواهد، ولم يتابع في هذا الحديث. والوليد -وهو ابن مسلم الدمشقي- وإن صرح في جميع طبقات الإسناد عند النسائي، يبقى الشأن في حِصْن. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٩٦٤) من طريق الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. قال الخطابي: قوله: "ينحجزوا" معناه: يكفّوا عن القتل، وتفسيره أن يقتل رجل وله ورثة رجال ونساء، فأيهم عفا وإن كانت امرأة سقط القود وصار دية. وقوله: "الأول" يريد الأقرب فالأقرب. قلت: [القائل الخطابي] يشبه أن يكون معنى المقتتلين ها هنا: أن يطلب أولياء القتيل القود، فيمتنع القتلة، فينشأ بينهم الحرب والقتال من أجل ذلك، فجعلهم مقتَتَلين بنصب التاءين - يقال: اقتتل فهو مقتتل، غير أن هذا إنما يُستعمل أكثره فيمن قتله الحب. وقد اختلف الناسُ في عفو النساء، فقال أكثر أهل العلم: عفو النساء عن الدم جائز كعفو الرجال. وقال الأوزاعي وابن شبرمة: ليس للنساء عفو، وعن الحسن وإبراهيم النخعي، ليس للزوج وللمرأة عفو في الدم.









সুনান আবী দাউদ (4539)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، ح وَحَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، - وَهَذَا حَدِيثُهُ - عَنْ عَمْرٍو، عَنْ طَاوُسٍ، قَالَ مَنْ قُتِلَ ‏.‏ وَقَالَ ابْنُ عُبَيْدٍ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ مَنْ قُتِلَ فِي عِمِّيَّا فِي رَمْىٍ يَكُونُ بَيْنَهُمْ بِحِجَارَةٍ أَوْ ضَرْبٍ بِالسِّيَاطِ أَوْ ضَرْبٍ بِعَصًا فَهُوَ خَطَأٌ وَعَقْلُهُ عَقْلُ الْخَطَإِ وَمَنْ قُتِلَ عَمْدًا فَهُوَ قَوَدٌ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ ابْنُ عُبَيْدٍ ‏"‏ قَوَدُ يَدٍ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ اتَّفَقَا ‏"‏ وَمَنْ حَالَ دُونَهُ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَغَضَبُهُ لاَ يُقْبَلُ مِنْهُ صَرْفٌ وَلاَ عَدْلٌ ‏"‏ ‏.‏ وَحَدِيثُ سُفْيَانَ أَتَمُّ ‏.‏




ইবনু ‘উবাইদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি অদৃশ্যভাবে নিহত হলো পাথর নিক্ষেপে, চাবুক কিংবা লাঠির আঘাতে নিহত হলে তা ভুলবশত হত্যা হিসেবে গণ্য হবে এবং এজন্য দিয়াত দিবে। আর যাকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করা হয়েছে তার কিসাস কার্‍্যকর হবে। অতঃপর উভয় বর্ণনাকারী সম্মিলিতভাবে বর্ণনা করেন, যে ব্যক্তি কিসাস কার্যকর করতে বাধা দিবে তার উপর আল্লাহর অভিশাপ ও ক্রোধ পতিত হবে এবং তার কোন ফরয বা নফল ‘ইবাদত কবুল করা হবে না।



সহীহ, পরবর্তী হাদীস দ্বারা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لغيره




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3478) ، انظر الحدیث الآتي (4540)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وقد اختلف في وصل هذا الحديث وإرساله، فقد أرسله حماد -وهو ابن زيد- في هذه الرواية، وسفيان -وهو ابن عيينة- كما في هذه الرواية أيضاً، وابن جريج ما سيأتي، ووصله سليمان بن كثير -وهو العبدي- كما في الرواية التالية، وقد تابعه عليه إسماعيل بن مسلم المكي وهو ضعيف، وحماد بن زيد في رواية عمرو بن عون عنه عند الدارقطني (٣١٣٢) وسندها إليه قوي. وقال الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" ١٢/ ٤١٦: كان سفيان [يعني ابن عيينة] يحدث به هكذا بأخرة، وقد كان يحدث به قبل ذلك ما حدث به سليمان بن كثير. وجوَّد إسناد الموصول الحافظ ابن عبد اللهادي في "التنقيح" كما نقله عنه العظيم آبادي في "تعليقه" على "سنن الدارقطني"، وقوى إسناده الحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام". وأخرجه الشافعي في "مسنده" ٢/ ١٠٠، ومن طريقه البيهقي ٨/ ٤٥ عن سفيان ابن عيينة، والدارقطني (٣١٤١) من طريق ابن جريج، و (٣١٣١) من طريق خالد بن يوسف، عن حماد بن زيد، ثلاثتهم (ابن عيينة وابن جريج وحماد) عن عمرو بن دينار، عن طاووس مرسلاً. وأخرجه بنحوه الدارقطني (٣١٤٢) من طريق ابن جريج، أخبرني ابن طاووس، عن أبيه مرسلاً. وسيأتي في الإسناد التالي موصولاً، وانظر تخريجه هناك. قال الخطابي: قوله: "عميّا" وزنه فِعِّيلا، من العمى، كما يقال: بينهم رِمِّيَّا، أي: رمي ومعناه: أن يترامى القومُ، فيوجد بينهم قتيل لا يُدرى مَن قاتله، ويُعمَّى أمرُه فلا يتبين، ففيه الدية. واختلف العلماء فيمن تلزمه دية هذا القتيل: فقال مالك بن أنس: ديته على الذين نازعوهم. وقال أحمد بن حنبل: ديته على عواقل الآخرين، إلا أن يدعوا على رجل بعينه، فيكون قسامة وكذلك قال إسحاق. وقال ابن أبي ليلى وأبو يوسف: ديته على عاقلة الفريقين اللذين اقتتلوا معاً. وقال الأوزاعي: عقله على الفريقين جميعاً، إلا أن تقوم بينة من غير الفريقين أن فلاناً قتله، فعليه القود والقصاص. وقال الشافعي: هو قسامة إن ادّعوه على رجل بعينه، أو طائفة بعينها، وإلا فلا عقل ولا قود. وقال أبو حنيفة: هو على عاقلة القبيلة التي وجد فيهم إذا لم يدّع أولياء القتيل على غيرهم. وقوله: "لا يُقبل منه صرف ولا عدل" فسَّروا العدل: الفريضة، والصرف: التطوُّع. وقوله: ومن قتل عمداً، قال القاري: بصيغة الفاعل، وعمداً مفعول مطلق أو حال، أي: قتل عمداً، أو متعمداً.









সুনান আবী দাউদ (4540)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي غَالِبٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ، عَنْ طَاوُسٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَ مَعْنَى حَدِيثِ سُفْيَانَ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, অতঃপর সুফিয়ান বর্ণিত হাদীসের অর্থানুরূপ হাদীস বর্ণিত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4793 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح كما سلف بيانه في الطريق السالف قبله. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٣٥)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٦٥) و (٦٩٦٦) من طريق سليمان بن كثير، بهذا الإسناد. وهو في "شرح مشكل الآثار" (٤٩٠٠). وقد تابع سليمان بن كثير، حمادُ بن زيد في رواية عمرو بن ميمون عنه عند الدارقطني (٣١٣٢) وإسناده قوي. وتابعه أيضاً إسماعيل بن مسلم المكي، عند الطبراني في "الكبير" (١٠٨٥٠)، والدارقطني (٣١٣٦). وإسماعيل ضعيف الحديث. وتابعه كذلك الحسن بن عمارة عند عبد الرزاق (١٧٢٠٣) والحسن بن عمارة ضعيف. وسيتكرر هذا الحديث برقم (٤٥٩١).









সুনান আবী দাউদ (4541)


حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رَاشِدٍ، ح وَحَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ زَيْدِ بْنِ أَبِي الزَّرْقَاءِ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رَاشِدٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ مُوسَى، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَضَى أَنَّ مَنْ قُتِلَ خَطَأً فَدِيَتُهُ مِائَةٌ مِنَ الإِبِلِ ثَلاَثُونَ بِنْتَ مَخَاضٍ وَثَلاَثُونَ بِنْتَ لَبُونٍ وَثَلاَثُونَ حِقَّةً وَعَشْرَةٌ بَنِي لَبُونٍ ذَكَرٍ ‏.




‘আমর ইবনু শু’আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা এবং দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিদ্ধান্ত দিয়েছেন, ভুলবশত হত্যার দিয়াত হবে একশো উট। এর মধ্যে ত্রিশটি হবে দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, ত্রিশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, ত্রিশটি চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী এবং দশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উট।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (4805 وسندہ حسن) وابن ماجہ (2630 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: ضعيف. سليمان بن موسى -وهو القرشي الأموي مولاهم الدمشقي الأشدق- قال البخاري: عنده مناكير، وقال أبو أحمد بن عدي: روى أحاديث ينفرد بها، لا يرويها غيره. وقال النسائي عن هذا الحديث: حديث منكر، وسليمان بن موسى ليس بالقوي في الحديث، ولا محمَّد بن راشد. وقال الخطابي: لا أعرف أحداً قال به من الفقهاء، وقال البيهقي في معرفة السنن والآثار" (١٦٠٤٤): لم يُضَم إليه ما يؤكِّده. قلنا: وقد تابعه محمَّد بن إسحاق عند أحمد (٧٠٣٣) لكنه مدلس وقال فيه: وذكر عمرو بن شعيب، وقد قال الإِمام أحمد فيما نقله عنه العلائي في "جامع التحصيل": إذا قال ابن إسحاق: وذكر، فلم يسمعه. قلنا: ولا يبعد أن يكون ابن إسحاق إنما أخذه عن سليمان بن موسى من طريق رجل عنه، فإن لابن إسحاق رواية عن عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش المخزومي، عن سليمان بن موسى. وقد أعله النسائي أيضاً بمحمد بن راشد وكذلك أعله به الدارقطني في "السنن" (٣٣٦٩) والبيهقي في معرفة السنن والآثار (١٦٠٤٥). ومحمد بن راشد هذا هو المكحولي، والصحيح أنه ثقة، وإنما تكلموا فيه لموضع القدر لا غير كما قال الساجي. فتبقى العلة فيه تفرد سليمان بن موسى به. وهذا الحديث جزء من حديث مطوَّل سيأتي بتمامه عند المصنف برقم (٤٥٦٤). وأخرجه ابن ماجه (٢٦٣٠)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٧٦) من طريق محمَّد ابن راشد، بهذا الإسناد. وعندهما زيادة في بيان الدية من غير الإبل. وستأتي منفصلة برقم (٤٥٦٤). وهو في "مسند أحمد" (٦٦٦٣). وكلنا قد حسّنا الحديث فيه، فيستدرك من هنا. قال الخطابي: هذا الحديث لا أعرف أحداً قال به من الفقهاء، وإنما قال أكثر العلماء: إن دية الخطأ أخماس، كذلك قال أبو حنيفة وأصحابه والثوري، وكذلك قال مالك وأصحابه وأحمد بن حنبل: خمس بنو مخاض، وخمس بنات مخاض، وخمس بنات لبون، وخمس حقاق، وخمس جذاع. وروي هذا القول عن عبد الله بن مسعود ﵁. وقال مالك والشافعي: خمس جذاع، وخمس حقاق، وخمس بنات لبون وخمس بنات مخاض وخمس بنو لبون. وحكلي هذا القول عن عمر بن عبد العزيز وسلِمان بن يسار والزهري وربيعة بن عبد الرحمن والليث بن سعد. ولأبي حنيفة وأصحابه فيه أثر، إلا أن راويَه عن عبد الله خشفُ بن مالك، وهو مجهول لا يعرف إلا بهذا الحديث. وعدل الشافعي عن القول به لما ذكرنا من العلة في راويه، ولأن فيه: بني مخاض، ولا مدخل لبني مخاض في شيء من أسنان الصدقات. وقد روي عن النبي ﷺ في قصة القسامة أنه ودى قتيل خيبر بمئة من إبل الصدقة. وليس في أسنان إبل الصدقة ابن مخاض. وقد روي عن نفر من العلماء أنهم قالوا: دية الخطأ أرباع، وهم الشعبي والنخعي والحسن البصري، وإليه ذهب إسحاق بن راهريه إلا أنهم قالوا: خمس وعشرون جذعة، وخمس وعشرون حقة، وخمس وعشرون بنات لبون، وخمس وعشرون بنات مخاض، وقد روي ذلك عن علي بن أبي طالب ﵁.









সুনান আবী দাউদ (4542)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَكِيمٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عُثْمَانَ، حَدَّثَنَا حُسَيْنٌ الْمُعَلِّمُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ كَانَتْ قِيمَةُ الدِّيَةِ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثَمَانَمِائَةِ دِينَارٍ أَوْ ثَمَانِيَةَ آلاَفِ دِرْهَمٍ وَدِيَةُ أَهْلِ الْكِتَابِ يَوْمَئِذٍ النِّصْفُ مِنْ دِيَةِ الْمُسْلِمِينَ قَالَ فَكَانَ ذَلِكَ كَذَلِكَ حَتَّى اسْتُخْلِفَ عُمَرُ رَحِمَهُ اللَّهُ فَقَامَ خَطِيبًا فَقَالَ أَلاَ إِنَّ الإِبِلَ قَدْ غَلَتْ ‏.‏ قَالَ فَفَرَضَهَا عُمَرُ عَلَى أَهْلِ الذَّهَبِ أَلْفَ دِينَارٍ وَعَلَى أَهْلِ الْوَرِقِ اثْنَىْ عَشَرَ أَلْفًا وَعَلَى أَهْلِ الْبَقَرِ مِائَتَىْ بَقَرَةٍ وَعَلَى أَهْلِ الشَّاءِ أَلْفَىْ شَاةٍ وَعَلَى أَهْلِ الْحُلَلِ مِائَتَىْ حُلَّةٍ ‏.‏ قَالَ وَتَرَكَ دِيَةَ أَهْلِ الذِّمَّةِ لَمْ يَرْفَعْهَا فِيمَا رَفَعَ مِنَ الدِّيَةِ ‏.‏




আমর ইবনু শু’আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা এবং তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর যুগে মুদ্রায় দিয়াত ছিল আটশো দীনার অথবা আট হাজার দিরহাম। সে সময় আহলে কিতাবদের জন্য ছিলো মুসলিমদের জন্য নির্ধারিত দিয়াতের অর্ধেক। বর্ণনাকারী বলেন, দিয়াতের এ পরিমাণ ‘উমার(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খলীফাহ নির্বাচিত হওয়ার পূর্ব পর্যন্ত কার্যকর ছিলো। খলীফাহ হয়ে তিনি ভাষণদানকালে বলেন, উটের দাম বেড়েছে। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিয়াতের পরিমাণ স্বর্ণের মালিকদের জন্য এক হাজার দীনার, রৌপ্যের মালিকদের জন্য বারো হাজার দিরহাম, গাভীর মালিকদের জন্য দুইশো গাভী, ছাগলের মালিকদের জন্য দুই হাজার ছাগল ও কাপড়ের মালিক বা ব্যবসায়ীদের জন্য দুইশো জোড়া কাপড় ধার্য করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি জিম্মিদের দিয়াত বাদ রাখলেন অর্থাৎ দিয়াতের পরিমাণ বৃদ্ধিকালে তাদের জন্য নির্ধারিত পূর্বের পরিমাণে বৃদ্ধি করেন নি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3498)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف عبد الرحمن بن عثمان -وهو أبو بحر البكراوي-، وقد تابعه على بعض الحديث قتادة بن دعامة عند الدارقطني (٣٢٤٢) لكن في الإسناد إليه العباس بن الفضل ضعيف الحديث جداً، وعمر بن عامر السُّلمي البصري ضعيف أيضاً. فلا يعتد بهذه المتابعة. وقد روي هذا الحديث باختلاف في تقويم الدية على عهد رسول الله ﷺ من طريق سليمان بن موسى الدمشقي كما سيأتي عند المصنف برقم (٤٥٦٤)، إلا أنه جعله له مرفوعاً إلى النبي ﷺ. وسليمان هذا تكلمنا عنه في الحديث الذي قبله، وأن النسائي قال عن حديثه هذا: حديث منكر. وقد تابعه محمَّد بن إسحاق عن عطاء بن أبي رباح مرسلاً كما في الحديث التالي. ولا يعتد بهذه التابعة، للاختلاف في وصل الحديث وإرساله، ثم لتدليس ابن إسحاق. وأخرجه البيهقي ٨/ ٧٧ و ١٠١ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الدارقطني (٣٢٤٢) دون ذكر اجتهاد عمر في دية أهل الذهب والبقر والشاء والحلل، من طريق العباس بن الفضل، عن عمر بن عامر السلمي، عن قتادة، عن عمرو بن شعيب، به. وأخرجه عبد الرزاق (١٧٢٧٠) من طريق ابن جريج، عن عمرو بن شعيب مرسلاً، فساق أوله في تقويم الدية على عهد رسول الله ﷺ بنحو رواية سليمان بن موسى الآتية عند المصنف برقم (٤٥٦٤) لكنه جعل الدية على أهل الورق والبقر والشاء من اجتهاد عمر كما رواه أبو بحر البكراوي هنا عند المصنف. وأخرج منه اجتهاد عمر دون ذكر دية أهل الذمة عبد الرزاق (١٧٨٥٩) عن الثوري، عن أيوب بن موسى، عن مكحول. وعن محمَّد بن راشد، أنه سمع مكحولاً يحدث به عن عمر: أن عمر قال: … فذكره مرسلاً. وهو عند ابن أبي شيبة ٩/ ١٢٦ - ١٢٧ من طريق سفيان الثوري بذكر الورق والذهب فقط. وأخرج منه اجتهاد عمر أيضاً عبد الرزاق (١٧٢٦٣)، وابن أبي شيبة ٩/ ١٢٧ من طريق الشعبي، عن عَبِيدَةَ السلماني إلا أنه جعل الدية على أهل الورق عشرة آلاف. وفي إسناده محمَّد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى وهو سيئ الحفظ. ولم يجاوز به عبد الرزاق الشعبي. وستأتي قطعة فرض الدية اثني عشر ألف درهم مرفوعة من حديث ابن عباس عند المصنف برقم (٤٥٤٦) وفي إسناده اختلاف ما سيأتي بيانه. وسيأتي ذكر دية أهل الكتاب عند المصنف برقم (٤٥٨٣). وانظر الكلام عليه وشواهده هناك. قال الخطابي: قوله: كانت قيمة الدية، يريد: قيمة الإبل التي هي الأصل في الدية، وإنما قوَّمها رسول الله ﷺ على أهل القرى لعزة الإبل عندهم، فبلغت القيمة في زمانه من الذهب ثمان مئة دينار، ومن الورق ثمانية آلاف درهم، فجرى الأمر كذلك إلى أن كان عمر ﵁ وعزّت الإبل في زمانه فبلغ بقيمتها من الذهب ألف دينار، أو من الورق اثني عشر ألفاً. وعلى هذا بني الشافعي أصل قوله في دية العمد، فأوجب فيها الإبل، وأن لا يصار إلى النقود إلا عند إعواز الإبل، فإذا أعوزت كان فيها قيمتها بالغة ما بلغت. ولم يعتبر قيمة عمر ﵁ التي قومها في زمانه؛ لأنها كانت قيمة تعديل في ذلك الوقت، والقيم تختلف، فتزيد وتنقص باختلاف الأزمنة، وعلى هذا قوله الجديد. وقال في القديم بقيمة عمر، وهي اثنا عشر ألفا أو ألف دينار. وقد روي مثل ذلك عن النبي ﷺ في الورق.









সুনান আবী দাউদ (4543)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ أَبِي رَبَاحٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَضَى فِي الدِّيَةِ عَلَى أَهْلِ الإِبِلِ مِائَةً مِنَ الإِبِلِ وَعَلَى أَهْلِ الْبَقَرِ مِائَتَىْ بَقَرَةٍ وَعَلَى أَهْلِ الشَّاءِ أَلْفَىْ شَاةٍ وَعَلَى أَهْلِ الْحُلَلِ مِائَتَىْ حُلَّةٍ وَعَلَى أَهْلِ الْقَمْحِ شَيْئًا لَمْ يَحْفَظْهُ مُحَمَّدٌ ‏.‏




‘আত্বা ইবনু আবূ রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিয়াত সম্পর্কে সিদ্ধান্ত দিয়েছেন যে, উটের মালিকরা একশো উট, গরুর মালিকরা দুইশো গরু, ছাগলের মালিকরা দুই হাজার ছাগল ও কাপড়ের মালিকরা দুইশো জোড়া কাপড় দিয়াত হিসেবে প্রদান করবে। আর গমের মালিককে যা দিতে হবে তার পরিমান বর্ণনাকারী স্মরণ রাখতে পারেন নি। [৪৫৪২]



দুর্বলঃ ইরওয়া হা/২২৪৪।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن والسند مرسل ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. محمَّد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ثم إنه اختلف عنه في وصله وإرساله، فقد أرسله عنه حماد -وهو ابن سلمة- كما في رواية المصنف هذه وعبد الرحيم بن سليمان، ووصله عنه أبو تميلة -وهو يحيى بن واضح- كما في الرواية التالية، فجعله من مسند جابر. واختلف عن محمَّد بن إسحاق أيضاً في إسناده، فرواه حماد بن سلمة وعبد الرحيم ابن سليمان وأبو تميلة، عنه، عن عطاء بن أبي رباح كما عند المصنف هنا. ورواه إبراهيم بن سعد، عنه، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عند أحمد (٧٠٣٣). وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" ٩/ ١٢٧ - ١٢٨ عن عبد الرحيم بن سليمان، والبيهقي ٨/ ٧٨ من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن محمَّد بن إسحاق، به. وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (4544)


قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَرَأْتُ عَلَى سَعِيدِ بْنِ يَعْقُوبَ الطَّالْقَانِيِّ قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو تُمَيْلَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، قَالَ ذَكَرَ عَطَاءٌ عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَ مِثْلَ حَدِيثِ مُوسَى ‏.‏ قَالَ وَعَلَى أَهْلِ الطَّعَامِ شَيْئًا لاَ أَحْفَظُهُ ‏.




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফরয করেছেনঃ এর বাকী অংশ মূসা বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ। অতঃপর তিনি বলেন, খাদ্যদ্রব্যের মালিকদের জন্য যা (ফরয) করেছেন তা আমি স্মরণ রাখিনি। [৪৫৪৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. محمَّد بن إسحاق مدلس وقد عنعن. وقد اختُلف عنه في إسناد هذا الحديث كما بيناه عند الحديث السالف قبله.









সুনান আবী দাউদ (4545)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ، حَدَّثَنَا الْحَجَّاجُ، عَنْ زَيْدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنْ خِشْفِ بْنِ مَالِكٍ الطَّائِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ فِي دِيَةِ الْخَطَإِ عِشْرُونَ حِقَّةً وَعِشْرُونَ جَذَعَةً وَعِشْرُونَ بِنْتَ مَخَاضٍ وَعِشْرُونَ بِنْتَ لَبُونٍ وَعِشْرُونَ بَنِي مَخَاضٍ ذُكُرٌ ‏"‏ ‏.‏ وَهُوَ قَوْلُ عَبْدِ اللَّهِ ‏.




‘আবদুল্লাহ ইবনু মাস’ঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ভুলবশত হত্যার দিয়াত হলো বিশটি চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, বিশটি পঞ্চম বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, বিশটি দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, বিশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী এবং বিশটি দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী। এটি ‘আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব বক্তব্য। [৪৫৪৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1386) نسائی (4806) ابن ماجہ (2631) ، حجاج بن أرطاۃ ضعیف مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف حجاج بن أرطأة. وخشف بن مالك وثقه النسائي وابن حبان، وجهَّله الدارقطني والبيهقي والبغوي وابن عبد البر وضعفه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" ٣/ ٥٦٣، وقال: وقد تولى الدارقطني تضعيف هذا الحديث ببيان شافٍ. وقد اختلف في رفع الحديث ووقفه كما بيّناه في "مسند أحمد" (٣٦٣٥). وقد أعله الدارقطني في "سننه" (٣٣٦٤) أيضاً بمخالفته لرواية أبي عبيدة بن عبد الله ابن مسعود وعلقمة وإبراهيم النخعي، كلهم عن ابن مسعود. حيث ذكروا بني اللبون مكان بني المخاض. قال وأبو عبيدة أعلم بحديث أبيه وبمذهبه وفتياه من خشف بن مالك ونظرائه … وإبراهيم النخعي هو أعلم الناس بعبد الله وبرأيه وفتياه، قد أخذ ذلك عن أخواله علقمة والأسود وعبد الرحمن بن يزيد وغيرهم، من كبراء أصحاب عبد الله. وهو القائل: إذا قلت لكم: قال عبد الله بن مسعود، فهو عن جماعة من أصحابه عنه، وإذا سمعته من رجل واحد سميتُه لكم. وأعله أيضاً بأن يحيى بن سعيد الأموي قد رواه عن حجاج بن أرطأة فذكر فيه بني اللبون مكان الحقاق، وأن إسماعيل بن عياش قد رواه عن الحجاج فذكر فيه بني اللبون مكان بني المخاض كرواية أبي عبيدة وأصحابه. وأن جماعة رووه عن حجاج فلم يفسروا الأخماس. وأخرجه الترمذي (١٤٤٢) و (١٤٤٣)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٧٧) من طريق حجاج بن أرطأة، بهذا الإسناد. وقال النسائي: حجاج بن أرطأة ضعيف لا يحتج به. وهو في "مسند أحمد" (٣٦٣٥) و (٤٣٠٣). وأخرجه موقوفاً عبد الرزاق (١٧٢٣٨)، وابن أبي شيبة ٩/ ١٣٤، والطبراني في "الكبير" (٩٧٣٠)، والدارقطني (٣٣٦٥) من طريق سفيان الثوري، عن منصور، عن إبراهيم النخعي، عن ابن مسعود. وذكر بني اللبون مكان بني المخاض. وإسناده صحيح. لأن إبراهيم وإن لم يدرك عبد الله بن مسعود قد صرح هو نفسه بأنه إذا قال: عن عبد الله بن مسعود، يكون قد سمعه من جماعة عنه، كما قال الدارقطني وغيره، ولهذا عدّ بعضُ أهل العلم مرسلاته عن ابن مسعود أقوى من موصولاته. وأخرجه موقوفاً كذلك ابن أبي شيبة ٩/ ١٣٣، والدارقطني (٣٣٦٣)، والبيهقي ٨/ ٧٤ و ٧٤ - ٧٥ من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود. وذكر بني اللبون مكان بني المخاض. وأبو إسحاق رأى علقمة لكنه لم يسمع منه إلا أن روايته تؤيد رواية إبراهيم النخعي. وأخرجه موقوفاً أيضاً الدارقطني (٣٣٦١) و (٣٣٦٢)، وابن العربي في "عارضة الأحوذي" ٦/ ١٥٧ من طريق أبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه. وذكر بني اللبون مكان بني المخاض. وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه، لكن روايته تؤيد رواية إبراهيم النخعي. لكن الطبري أخرجه في "تفسيره" ٥/ ٢١١ من طريق أبي عبيدة عن أبيه أيضاً بما يوافق رواية خشف بن مالك. إلا أنه موقوف على عبد الله بن مسعود.









সুনান আবী দাউদ (4546)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ الْحُبَابِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ مُسْلِمٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَجُلاً، مِنْ بَنِي عَدِيٍّ قُتِلَ فَجَعَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم دِيَتَهُ اثْنَىْ عَشَرَ أَلْفًا ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ ابْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ عَمْرٍو عَنْ عِكْرِمَةَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم لَمْ يَذْكُرِ ابْنَ عَبَّاسٍ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, বনী ‘আদীর এক ব্যক্তি নিহত হলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিয়াত নির্ধারণ করেন বারো হাজার দিরহাম। [৪৫৪৫]



দুর্বলঃ ইরওয়া হা/২২৪৫।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3499) ، أخرجہ الترمذي (1388 وسندہ حسن) والنسائي (4807 وسندہ حسن) وابن ماجہ (2629 وسندہ حسن) وأعلہ النسائي والصواب أنہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح مرسلاً، وهذا إسناد فيه محمَّد بن مسلم -وهو الطائفي- وهو صدوق حسن الحديث، إلا أنه يخطى أحياناً، وقد انفرد بوصله، وخالفه من هو أوثق منه فرواه مرسلاً كما سيأتي. وقال أبو حاتم كما في "علل الحديث" لابنه ١/ ٤٦٣: المرسل أصح. وكذلك قال النسائي في "السنن الكبرى" بإثر الحديث (٦٩٧٩): والصواب مرسل. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٢٩) و (٢٦٣٢)، والترمذي (١٤٤٥)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٧٨) من طريق محمَّد بن مسلم الطائفي، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (١٤٤٦) عن سعيد بن عبد الرحمن المخزومي، عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة مرسلاً. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٩٧٩) عن محمَّد بن ميمون المكي الخياط، عن سفيان بن عيينه عن عكرمة -سمعناه مرة يقول: عن ابن عباس. ومحمد بن سيمون يُضعَّف في الحديث. وقال المنذري في "اختصار السنن": ما أُبْعِد أن يكون وضع للشيخ، فإنه كان أُمِّياً. قلنا: يعني وضع له ابن عباس في إسناد الحديث. قال الخطابي: وقد اختلف الناس فيما يجب في دية العمد: فقال الشافعي: يجب فيها مئة من الإبل، ثلاثون حقة، وثلاثون جَذَعة، وأربعون خَلِفة في بطونها أولادها. وروى ذلك عن زيد بن ثابت. وقال مالك وأحمد بن حنبل: تجب الدية أرباعاً، خمس وعشرون ابنة مخاض، وخس وعشرون ابنة لبون، وخم وعشرون حِقّة، وخمس وعشرون جَذَعة. وهو قول سليمان بن يسار والزهري وربيعة بن أبي عبد الرحمن. وقد روي عن ابن مسعود ﵁ أنه جعل في شبه العمد مئة من الإبل أرباعاً. وعدد هذه الأصناف. قلت [القائل الخطابي]: ودية شبه العمد مغلَّظة كدية العمد. فيشبه أن يكون أحمد إنما ذهب إليه؛ لأنه لم يجد فيها سنة. فصار إلى أثر في نظيرها، وقاسها عليه. وعند أبي حنيفة: دية العمد من الذهب ألف دينار، ومن الدراهم عشرة آلاف، ولم يذكر فيها الإبل. وكذلك قال سفيان الثوري، وحكي ذلك عن ابن شبرمة. وقال مالك وأحمد وإسحاق في الدية إذا كانت نقداً: هي من الذهب ألف دينار، ومن الورِق اثنا عشر ألفاً. وروي ذلك عن الحسن البصري وعروة والزبير. وقال مالك: لا أعرف البقر والغنم والحُلل. وقال أبو يوسف يعقوب ومحمد بن الحسن: على أهل البقر مئتا بقرة، وعلى أهل الغم ألفا شاة، وعلى أهل الحلل مئتا حُلة. وكذلك قال أحمد وإسحاق في البقر والغنم.









সুনান আবী দাউদ (4547)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، وَمُسَدَّدٌ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ خَالِدٍ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ رَبِيعَةَ، عَنْ عُقْبَةَ بْنِ أَوْسٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَطَبَ يَوْمَ الْفَتْحِ بِمَكَّةَ فَكَبَّرَ ثَلاَثًا ثُمَّ قَالَ ‏"‏ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ صَدَقَ وَعْدَهُ وَنَصَرَ عَبْدَهُ وَهَزَمَ الأَحْزَابَ وَحْدَهُ ‏"‏ ‏.‏ إِلَى هَا هُنَا حَفِظْتُهُ عَنْ مُسَدَّدٍ ثُمَّ اتَّفَقَا ‏"‏ أَلاَ إِنَّ كُلَّ مَأْثُرَةٍ كَانَتْ فِي الْجَاهِلِيَّةِ تُذْكَرُ وَتُدْعَى مِنْ دَمٍ أَوْ مَالٍ تَحْتَ قَدَمَىَّ إِلاَّ مَا كَانَ مِنْ سِقَايَةِ الْحَاجِّ وَسِدَانَةِ الْبَيْتِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ أَلاَ إِنَّ دِيَةَ الْخَطَإِ شِبْهِ الْعَمْدِ مَا كَانَ بِالسَّوْطِ وَالْعَصَا مِائَةٌ مِنَ الإِبِلِ مِنْهَا أَرْبَعُونَ فِي بُطُونِهَا أَوْلاَدُهَا ‏"‏ ‏.‏ وَحَدِيثُ مُسَدَّدٍ أَتَمُّ ‏.




‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাক্কাহ বিজয়ের দিন ভাষণ দেয়ার সময় তিনবার আল্লাহু আকবার বলে তাকবীর দিলেন অতঃপর বললেন, “আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহ নেই, তিনি এক, তিনি তাঁর অঙ্গীকার বাস্তবায়িত করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং তিনি একাই কাফিরদের পরাজিত করেছেন”। আমি এ পর্যন্ত মুসাদ্দাদ হতে মুখস্ত করেছি। অতঃপর উভয়ের বর্ণনা একই। “জেনে রাখো! জাহিলী যুগে কিসাসের ব্যাপারে যেসব বংশীয় মর্যাদার দাবি করা হতো তা আমার দুই পদতলে প্রোথিত। কিন্তু হাজ্জীদের পানি পান করানো ও কা’বা ঘরের খেদমতের নিয়ম আগের মত বহাল থাকবে।” অতঃপর তিনি বললেন, জেনে রাখো! ইচ্ছাকৃত হত্যার মতই ভুলবশত হত্যা যা চাবুক বা লাঠির আঘাতে হয়ে থাকে, এজন্য দিয়াত হিসেবে একশো উট দিবে, যার মধ্যে চল্লিশটি উট হবে গর্ভবতী।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3490) ، أخرجہ ابن ماجہ (2627) ورواہ النسائي (4797)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. خالد: هو ابن مهران الحذاء، وحماد: هو ابن زيد. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٢٧/ م)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٦٩) من طريق حماد ابن زيد، بهذا الإسناد. وهو في صحح ابن حبان، (٦٠١١). وأخرجه النسائي (٦٩٧٠) من طريق هُشيم بن بَشير، و (٦٩٧٢) من طريق بشر بن المُفضَّل، و (٦٩٧٣) من طريق يزيد بن زُريع، ثلاثتهم عن خالد الحذاء، عن القاسم ابن ربيعة، عن عقبة بن أوس (وقال بشر: ابن أوس، لم يُسَمَّه، وقال يزيد: يعقوب ابن أوس، وهو وجه قيل في اسمه، وهذا اختلاف لا يضر) عن رجل من أصحاب النبي ﷺ. فلم يُسمِّه. وأخرجه أحمد (٦٥٣٣)، وابن ماجه (٢٦٢٧) من طريق أيوب السختياني، عن القاسم بن ربيعة، عن عبد الله بن عمرو. فلم يذكر في إسناده عقبة بن أوس. قال عبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى" ٤/ ٥٤: لا يصح للقاسم سماع من عبد الله بن عمرو. وقال ابنُ القطان في "بيان الوهم والإيهام" ٥/ ٤١٠: الحديث صحيح من رواية عبد الله بن عمرو بن العاص، ولا يضره الاختلاف. وسيتكرر عند المصنف برقم (٤٥٨٨). وانظر ما بعده. قال الخطابي: "المأثرة" كل ما يُؤثر ويُذكر من مكارم أهل الجاهلية ومَفَاخرهم. وقوله: "تحت قدمي" معناه: إبطالها وإسقاطها. وأما "سَدانة البيت": فهي خدمته والقيام بأمره. وكانت الحجابةُ في الجاهلية في بني عبد الدار، والسقاية في بني هاشم. فأقرَّهما رسول الله ﷺ. فصار بنو شيبة يحجبون البيت، وبنو العباس يسقون الحجيج. وفي الحديث من الفقه: إثبات قتل شبه العمد. وقد زعم بعض أهل العلم: أن ليس القتل إلا العمد المحضُ أو الخطأ المحض. وفيه بيان أن دية شبه العمد مغلّظة على العاقلة. وقد يُستدلّ بهذا الحديث على جواز السَّلَم في الحيوان إلى مدة معلومة، وذلك لأن الإبل على العاقلة مضمونة في ثلاث سنين. وفيه دلالة على أن الحمل في الحيوان صفة تُضبط وتُحصر. وقد اختلف الناس في دية شبه العمد: فقال بظاهر الحديث عطاء والشافعي. وإليه ذهب محمَّد بن الحسن. وقال أبو حنيفة وأبو يوسف وأحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه: هي أرباع. وقال أبو ثور: دية شبه العمد أخماس. وقال مالك بن أنس: ليس في كتاب الله ﷿ إلا الخطأ المحض والعمد. فأما شبه العمد فلا نعرفه. قلت [القائل الخطابي]: يشبه أن يكون الشافعي إنما جعل الدية في العمد أثلاثاً بهذا الحديث. وذلك أنه ليس في العمد حديث مفسّر، والدية في العمد مغلّظة، وهي في شبه العمد كذلك، فحمل إحداهما على الأخرى. وهذه الدية تلزم العاقلة عند الشافعي لما فيه من شبه الخطأ كدية الجنين.









সুনান আবী দাউদ (4548)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا وُهَيْبٌ، عَنْ خَالِدٍ، بِهَذَا الإِسْنَادِ نَحْوَ مَعْنَاهُ ‏.




খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, এ সানাদে পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ অর্থবোধক হাদীস বর্ণিত। [৪৫৪৭]



আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3490) ، انظر الحدیث السابق (4547)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه. وُهَيب: هو ابن خالد بن عَجلان الباهلي مولاهم البصري. وهو في "صحيح ابن حبان" (٦٠١١). وسيتكرر برقم (٤٥٨٩). وانظر ما قبله. تنبيه: هذا الطريق لم يرد في أصولنا الخطية. وهو في النسخة التي شرح عليها أبو الطيب العظيم آبادي، وكلام المزي في "تحفة الأشراف" (٨٨٨٩) مُشعِرٌ بأنه ثابت هنا في "سنن أبي داود"، إذ أشار إلى قول أبي داود أثناء الخبر: إلى هنا حفظتُه عن مسدّد، وقال المزي بإثر طريق موسى هذا: ثم أخرجه (يعني الحديث) عَقِبه من حديث عبد الوارث عن علي بن زيد … فذكر الطريق الآتي بعده.









সুনান আবী দাউদ (4549)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ زَيْدٍ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ رَبِيعَةَ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِمَعْنَاهُ قَالَ خَطَبَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ الْفَتْحِ أَوْ فَتْحِ مَكَّةَ عَلَى دَرَجَةِ الْبَيْتِ أَوِ الْكَعْبَةِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَذَا رَوَاهُ ابْنُ عُيَيْنَةَ أَيْضًا عَنْ عَلِيِّ بْنِ زَيْدٍ عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ رَبِيعَةَ عَنِ ابْنِ عُمَرَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَرَوَاهُ أَيُّوبُ السَّخْتِيَانِيُّ عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ رَبِيعَةَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو مِثْلَ حَدِيثِ خَالِدٍ وَرَوَاهُ حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ عَنْ عَلِيِّ بْنِ زَيْدٍ عَنْ يَعْقُوبَ السَّدُوسِيِّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَقَوْلُ زَيْدٍ وَأَبِي مُوسَى مِثْلُ حَدِيثِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَحَدِيثِ عُمَرَ رضى الله عنه ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্র হতে বর্ণিত, অনুরূপ অর্থের হাদীস বর্ণিত। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিজয়ের দিন বা মাক্কাহ বিজয়ের সময় কা’বার দরজায় বা কা’বার চত্বরে ভাষণ দিলেন। [৪৫৪৮]



দুর্বল : ইরওয়া হা/৭/২৫৭।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4803) ابن ماجہ (2628) ، علي بن زید بن جدعان ضعیف ، و حدیث أبي داود (4547) و البخاري (6895) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص كما في الروايتين السالفتين قبله. وهذا إسناد ضعيف لضعف علي بن زيد -وهو ابن جُدعان- كما قال البيهقي في "السنن" ٨/ ٦٨، وابن القطان في "بيان الوهم والأيهام" ٥/ ٤١٠. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٢٨)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٧٥) من طريق علي بن زيد بن جدعان، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٥٨٣).









সুনান আবী দাউদ (4550)


حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ ابْنِ أَبِي نَجِيحٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، قَالَ قَضَى عُمَرُ فِي شِبْهِ الْعَمْدِ ثَلاَثِينَ حِقَّةً وَثَلاَثِينَ جَذَعَةً وَأَرْبَعِينَ خَلِفَةً مَا بَيْنَ ثَنِيَّةٍ إِلَى بَازِلِ عَامِهَا ‏.‏




মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, ইচ্ছাকৃত হত্যার সদৃশ-এর দিয়াত সম্পর্কে ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিদ্ধান্ত দিয়েছেন, ত্রিশটি চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, ত্রিশটি পঞ্চম বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী এবং চল্লিশটি এমন গর্ভবতী উষ্ট্রী যার বয়স ছয় হতে নয় এর মধ্যে রয়েছে। [৪৫৪৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد موقوف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن أبي نجیح عنعن و مجاہد لم یسمع من عمر رضي اللّٰہ عنہ ، فالسند منقطع ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن. وهذا إسناد رجاله ثقات، إلا أن مجاهداً -وهو ابن جَبْر المكي- لم يسمع من عمر، لكن جاء نحوه من وجه آخر مرسل يعضده إن شاء الله. ابن أبي نَجيح: هو عبد الله، وسفيان: هو ابن عيينة، والنُّفَيلي: هو عبد الله بن محمَّد بن علي بن نُفَيل الحراني. وأخرجه عبد الرزاق (١٧٢١٧)، وابن أبي شيبة ٩/ ١٣٦ من طريق سفيان الثوري، والبيهقي ٨/ ٦٩ من طريق سفيان بن عيينة، وعبد الرزاق (١٧٢١٧) عن معمر، ثلاثتهم عن ابن أبي نجيح، به. وأخرجه مالك في "الموطأ" ٢/ ٨٦٧ ومن طريقه الشافعي في "مسنده" " ٢/ ١٠٨ - ١٠٩، وعبد الرزاق (١٧٧٨٢)، والبيهقي ٨/ ٣٨ و ٧٢ عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عمرو بن شعيب: أن رجلاً من بني مُدلِج يُقال له: قتادة، حذف ابنه بالسيف فأصاب ساقه، فنُزي في جُرحه فمات، فقدم سراقة بن جُعشم على عمر بن الخطاب، فذكر ذلك له، فقال له عمر: اعدد على ماء قديد عشرين ومئة بعير حتى أقدم عليك، فلما قدم عمر بن الخطاب أخذ من تلك الإبل ثلاثين حقة وثلاثين جذعة وأربعين خلفة … ورجاله ثقات. وروي مرفوعاً عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده عند البيهقي ٨/ ٧٢ لكن في إسناده حجاج بن أرطأة وهو ضعيف. وقال ابن عبدٍ البر في "التمهيد" ٢٣/ ٤٣٧ بعد أن ساق هذا الحديث المرسل: هذا حديث مشهور عند أهل العلم بالحجاز والعراق مستفيض عندهم، يستغني بشهرته وقبوله والعمل به عن الإسناد فيه، حتى يكاد أن يكون الإسناد في مثله لشهرته تكلفاً. الخلفة: بفتح الخاء وكسر اللام: هي الناقة الحامل إلى نصف أجل الحمل، ثم هي بعد ذلك عُشرَاءُ وجمعها عِشار. وبزل البعير بزولاً من باب قعد: فطر نابه بدخوله في السنة التاسعة، فهو بازل يستوي فيه المذكر والمؤنث. والثنية: هي الناقة التي دخلت في السنة السادسة.









সুনান আবী দাউদ (4551)


حَدَّثَنَا هَنَّادٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ ضَمْرَةَ، عَنْ عَلِيٍّ، رضى الله عنه أَنَّهُ قَالَ فِي شِبْهِ الْعَمْدِ أَثَلاَثٌ ثَلاَثٌ وَثَلاَثُونَ حِقَّةً وَثَلاَثٌ وَثَلاَثُونَ جَذَعَةً وَأَرْبَعٌ وَثَلاَثُونَ ثَنِيَّةً إِلَى بَازِلِ عَامِهَا كُلُّهَا خَلِفَةٌ ‏.




‘আসিম ইবনু দমরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, ভুলবশত হত্যার দিয়াত তিন ধরনের: তেত্রিশটি চার বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, তেত্রিশটি পাঁচ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী এবং চৌত্রিশটি তিন বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী যা ছয় হতে নয় বছর বয়সী, দিয়াত হিসেবে ধার্য। [৪৫৫০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 160)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو الأحوص: هو سلام بن سُليم الحنفي مولاهم، وهنّاد: هو ابن السَّريّ. وأخرجه ابن أبي سنة ٩/ ١٣٦، والطبري في "تفسيره" ٥/ ٢١١، والبيهقي ٨/ ٦٩ من طريق إسحاق السبيعي، به. وأخرجه عبد الرزاق (١٧٢٢٢)، والطبري في: تفسيره، ٥/ ٢١١ من طريق إبراهيم النخعي، عن علي. وإبراهيم النخعي لم يدرك علي بن أبي طالب. وأخرجه الطبري ٥/ ٢١١ من طريق الشعبي، عن علي بن أبي طالب. وفي سماع الشعبي من علي اختلاف. والصحيح أنه لم يسمع منه إلا حديث شُراحة الهَمدانية.









সুনান আবী দাউদ (4552)


وَبِهِ عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَلْقَمَةَ، وَالأَسْوَدِ، قَالَ عَبْدُ اللَّهِ فِي شِبْهِ الْعَمْدِ خَمْسٌ وَعِشْرُونَ حِقَّةً وَخَمْسٌ وَعِشْرُونَ جَذَعَةً وَخَمْسٌ وَعِشْرُونَ بَنَاتِ لَبُونٍ وَخَمْسٌ وَعِشْرُونَ بَنَاتِ مَخَاضٍ ‏.‏




‘আসিম ইবনু দামরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, ভুলবশত হত্যার দিয়াত চার ধরনের: চার বছরে পদার্পণকারী পঁচিশটি উষ্ট্রী, পাঁচ বছরে পদার্পণকারী পঁচিশটি উষ্ট্রী, তিন বছরে পদার্পণকারী পঁচিশটি উষ্ট্রী এবং দুই বছরে পদার্পণকারী পঁচিশটি উষ্ট্রী। [৪৫৫১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (4551) ، (انوار الصحیفہ ص 160، 161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات. لكن أبا إسحاق -وهو عمرو بن عبد الله السبيعي- لم يسمع من علقمة -وهو ابن قيس- واختلف في سماعه أيضاً من الأسود -وهو ابن يزيد- فقال قوم: سمع منه؟ وهو عنه صحيح، وربما حدَّث عن عبد الرحمن ابن يزيد عن أخيه الأسود. وقد روي من طريق عامر الشعبي عن ابن مسعود ولم يسمع منه أيضاً. وروي من طريق إبراهيم النخعي عن ابن مسعود، وهذا إسناد صحيح، لما ذكره إبراهيم النخعي نفسه أنه إذا قال: قال ابن مسعود. فإنه يكون قد سمعه من جماعة عنه. ولهذا عدّ بعض أهل العلم مرسلاته عن ابن مسعود أقوى من مَوصُولاته. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ١٣٥، والبيهقي ٨/ ٦٩ من طريق أبي الأحوص، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق (١٧٢٢٣)، ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (٩٧٢٩) من طريق إبراهيم النخعي، وابن أبي شيبة ٩/ ١٣٥ - ١٣٦ من طريق عامر الشعبي، كلاهما عن ابن مسعود.









সুনান আবী দাউদ (4553)


حَدَّثَنَا هَنَّادٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ ضَمْرَةَ، قَالَ قَالَ عَلِيٌّ رضى الله عنه فِي الْخَطَإِ أَرْبَاعًا خَمْسٌ وَعِشْرُونَ حِقَّةً وَخَمْسٌ وَعِشْرُونَ جَذَعَةً وَخَمْسٌ وَعِشْرُونَ بَنَاتِ لَبُونٍ وَخَمْسٌ وَعِشْرُونَ بَنَاتِ مَخَاضٍ ‏.




‘আবদুল্লাহ ইবনু মাস’উদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ইচ্ছাকৃত হত্যার সদৃশ (কত্লে শিব্হে আম্দ)-এর দিয়াত হলো : পঁচিশটি চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, পঁচিশটি পঞ্চম বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, পঁচিশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী ও পঁচিশটি দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী। [৪৫৫২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیثین السابقین (4551،4552) ، (انوار الصحیفہ ص 161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وسفيان: هو الثوري. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ١٣٤، والطبري في "تفسيره" ٥/ ٢١١، والدارقطني (٣٣٧٤)، والبيهقي ٨/ ٧٤ من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق (١٧٢٣٦)، وابن أبي شيبة ٩/ ١٣٤، والطبري ٥/ ٢١٠ من طريق إبراهيم النخعي، والطبري ٥/ ٢١٠ من طريق عامر الشعبي، كلاهما عن علي بن أبي طالب. وإبراهيم النخعي لم يدرك علياً، والشعبي لم يسمع من علي إلا قصة شُراحة الهمْدانية.









সুনান আবী দাউদ (4554)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ عَبْدِ رَبِّهِ، عَنْ أَبِي عِيَاضٍ، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ، وَزَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ، فِي الْمُغَلَّظَةِ أَرْبَعُونَ جَذَعَةً خَلِفَةً وَثَلاَثُونَ حِقَّةً وَثَلاَثُونَ بَنَاتِ لَبُونٍ وَفِي الْخَطَإِ ثَلاَثُونَ حِقَّةً وَثَلاَثُونَ بَنَاتِ لَبُونٍ وَعِشْرُونَ بَنُو لَبُونٍ ذُكُورٍ وَعِشْرُونَ بَنَاتِ مَخَاضٍ ‏.‏




উসমান ইবনু ‘আফফান ও যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তাদের মতে, কঠোর দিয়াত হচ্ছে: চল্লিশটি পঞ্চম বছরে পদার্পণকারী গর্ভবতী উষ্ট্রী, ত্রিশটি চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী এবং ত্রিশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী। আর ভুলবশত হত্যার দিয়াত হলো: ত্রিশটি চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, ত্রিশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী, বিশটি তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উট এবং বিশটি দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উষ্ট্রী।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قتادۃ عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح. وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد ربه -وهو ابن أبي يزيد- فقد انفرد بالرواية عنه قتادة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال علي ابن المديني: مجهول. وقد تابعه سعيد بن المسيب كما في الطريق الآتى بعده. أبو عياض: هو عمرو بن الأسود العَنْسي، ويقال: في بن ثعلبة، وكنيته أبو عبد الرحمن عنسي حمصي أدرك الجاهلية، وسمع غير واحد من الصحابة، وهو ثقة احتج به البخاري في "صحيحه" سكن داريا من قرى دمشق. وقتادة: هو ابن دعامة، وسعيد: هو ابن أبي عروبة، ومحمد بن عبد الله: هو ابن المثنى بن عبد الله بن أنس بن مالك. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ١٣٥ أو ١٣٧، والطبري في "تفسيره" ٥/ ٢١١ و ٢١٢، والدارقطني (٣٣٧٠)، والبيهقي ٨/ ٦٩ و ٧٤ من طريق قتادة، به. لكن جاء عند الطبري في الدية المغلظة: وثلاثون بنت مخاض، بدل ثلاثون بنات لبون. ويغلب على الظن أنه خطأ من النساخ واقتصر الدارقطني على ذكر دية الخطأ. ورواية الطبري الثانية بذكر عثمان وحده. وأخرجه الدارقطني (٣٣٧١) من طريق حجاج بن أرطأة عن الشعبي، عن زيد بن ثابت وحده. لكن حجاجاً وهم هنا حيث رواه كلفظ رواية أبي عياض، وإنما رواه الشعبي عن زيد بن ثابت بلفظ: المغلظة ثلاثون حقة، وثلاثون جذعة وأربعون ثنية خلفة إلى بازل عامها. كذا رواه عنه إسماعيل بن أبي خالد الثقة عند البيهقي ٨/ ٦٩ وإسناده صحيح إلى الشعبي. وعليه يكون لزيد في ذلك روايتان إن صح سماع الشعبي من زيد بن ثابت. وانظر ما بعده.