হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (4575)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ زِيَادٍ، حَدَّثَنَا مُجَالِدٌ، قَالَ حَدَّثَنَا الشَّعْبِيُّ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ امْرَأَتَيْنِ، مِنْ هُذَيْلٍ قَتَلَتْ إِحْدَاهُمَا الأُخْرَى وَلِكُلِّ وَاحِدَةٍ مِنْهُمَا زَوْجٌ وَوَلَدٌ فَجَعَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم دِيَةَ الْمَقْتُولَةِ عَلَى عَاقِلَةِ الْقَاتِلَةِ وَبَرَّأَ زَوْجَهَا وَوَلَدَهَا ‏.‏ قَالَ فَقَالَ عَاقِلَةُ الْمَقْتُولَةِ مِيرَاثُهَا لَنَا قَالَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ مِيرَاثُهَا لِزَوْجِهَا وَوَلَدِهَا ‏"‏ ‏.




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ্‌ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, হুযাইল গোত্রের দুই নারীর একজন অপরজনকে হত্যা করে, আর উভয়েরই স্বামী-সন্তান ছিল। বর্ণনাকারী বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিহত মহিলার দিয়াত হত্যাকারিনীর পিতৃপক্ষীয় আত্নীয়দের উপর সোপর্দ করেন এবং তার স্বামী ও সন্তানদেরকে দায়মুক্ত করেন। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর (কিসাসে) নিহত মহিলার আত্নীয়রা বললো, আমরা তার উত্তরাধিকার হবো। বর্ণনাকারী বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ না, তার উত্তরাধিকারের অংশীদার হবে তার স্বামী ও সন্তান।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2648) ، مجالد ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف مجالد -وهو ابن سعيد-. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٤٨) من طريق عبد الواحد. بن زياد، بهذا الإسناد. ويشهد له حديث أبي هريرة الآتي بعده. وإسناده صحيح. وجاء ذكر توريث الزوج مع الولد في إحدى رواياته عند البخاري (٦٧٤٠)، ومسلم (١٦٨١). ويشهد لتوريث الزوج أيضاً من دية زوجته المقتولة حديث أبي المليح الهذلي، عن أبيه عند ابن أبي عاصم في "الديات" ص ٧٥، وفي "الآحاد والمثاني" (١٠٦٧)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٥٢٧)، والطبراني (٥١٣) وإسناده صحيح.









সুনান আবী দাউদ (4576)


حَدَّثَنَا وَهْبُ بْنُ بَيَانٍ، وَابْنُ السَّرْحِ، قَالاَ حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، وَأَبِي، سَلَمَةَ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ اقْتَتَلَتِ امْرَأَتَانِ مِنْ هُذَيْلٍ فَرَمَتْ إِحْدَاهُمَا الأُخْرَى بِحَجَرٍ فَقَتَلَتْهَا فَاخْتَصَمُوا إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم دِيَةَ جَنِينِهَا غُرَّةٌ عَبْدٌ أَوْ وَلِيدَةٌ وَقَضَى بِدِيَةِ الْمَرْأَةِ عَلَى عَاقِلَتِهَا وَوَرَّثَهَا وَلَدَهَا وَمَنْ مَعَهُمْ فَقَالَ حَمَلُ بْنُ مَالِكِ بْنِ النَّابِغَةِ الْهُذَلِيُّ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَيْفَ أَغْرَمُ دِيَةَ مَنْ لاَ شَرِبَ وَلاَ أَكَلَ وَلاَ نَطَقَ وَلاَ اسْتَهَلَّ فَمِثْلُ ذَلِكَ يُطَلُّ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّمَا هَذَا مِنْ إِخْوَانِ الْكُهَّانِ ‏"‏ ‏.‏ مِنْ أَجْلِ سَجْعِهِ الَّذِي سَجَعَ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুযাইল গোত্রের দু‘জন মহিলা পরস্পরে মারামারি কালে একজন অপরজনকে পাথর ছুঁড়ে মেরে হত্যা করে। অতঃপর উভয়ের অভিভাবক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট বিচার প্রার্থনা করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার গর্ভস্থ শিশুর দিয়াত হিসেবে একটি মূল্যবান দাস বা দাসী প্রদানের নির্দেশ দিলেন এবং নিহত মহিলার দিয়াত হত্যাকারিনীর গোত্রের লোকজনের উপড় ধার্য করে দেন এবং দিয়াতের উত্তরাধিকারী বানান নিহতের সন্তান ও তার সঙ্গের অন্যান্য অংশীদারকে। ফলে হুযাইল গোত্রের হামাল ইবনু মালিক ইবনু নাবিগাহ বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! পানাহার করেনি, কথাও বলেনি, চিৎকারও দেয়নি, এমন শিশুর দিয়াত কিভাবে আমরা পরিশোধ করবো। এরূপ ক্ষেত্রে জরিমানা বৃথা। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ সে যেভাবে ছন্দোবদ্ধ বক্তব্য রেখে যাচ্ছে মনে হচ্ছে সে গণকের ভাই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6910) صحیح مسلم (1681) ، مشکوۃ المصابیح (3509)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف، وابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم الزهري، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن وهب: هو عبد الله، وابن السرح: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله المصري. وأخرجه مطولاً ومختصراً البخاري (٦٩١٠)، ومسلم (١٦٨١)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٩٣) من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٥٧٥٨) من طريق عبد الرحمن بن خالد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة وحده، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٢١٧) و (١٠٩١٦)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠٢٠). وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (٤٥٧٩). قال الخطابي: قوله: وورَّثها ولدها ومن معهم، يريد: الدية. وفيه بيان أن الدية مرروثة كسائر مالها الذي كانت تملكه أيام حياتها. وفيه دليل على أن الجنين يورث وتكون ديته على سهام الميراث، وذلك أن كل نفس تضمن بالدية، فإنه يورث، كما لو خرج حياً، ثم مات. وقوله: ولا استهل: الاستهلال: رفع الصوت، يريد: أنه لم تُعلَم حياته بصوت نطقٍ أو بكاء، أو نحو ذلك. وقوله: ذلك يُطَلّ: يروى هذا الحرف على وجهين: أحدهما: "بطل" على معنى الفعل الماضي من البطلان. والآخر: "يُطَلّ" على مذهب الفعل الغائب، من قولهم: طُلّ دمه إذا: أهدر، يُطَلُّ. وقوله ﷺ: "هذا من إخوان الكهان" من أجل سجعه الذي سجع، فإنه لم يَعبْه بمجرد السجع، دون ما تضمنه سجعه من الباطل. وإنما ضرب المثل بالكهان؛ لأنهم كانوا يروّجون أقاويلهم الباطلة بأسجاع تروق السامعين، فيستميلون بها القلوب، ويشصغُون الأسماع إليها. فأما إذا وضع السجع في موضع حق، فإنه ليس بمكروه. وقد تكلم رسول الله ﷺ بالسجع في مواضع من كلامه، كقول للانصار: "أما إنكم تقِلُّون عند الطمع، وتكثرون عند الفزع". وروي عنه أنه قال: "خير المال سِكّة مأبورة، أو مُهرة مأمورة". وقال: "يا أبا عُمير، ما فعل النُّغَير". وقال في دعائه: "اللهم إني أعوذ بك من علم لا ينفع، وقول لا يُسمع، وقلب لا يخشع، ونفس لا تشبع، أعوذ بك من هؤلاء الأربع". ومثل ذلك في الكلام كثير. وفي الخبر دليل على أن الدية في شبه الخطأ على العاقلة. قلت [القائل الخطابي]: الغرة إنما تجب في الجنين إذا سقط ميتاً، فإن سقط حياً ثم مات ففيه الدية كاملة. وفيه بيان أن الأجنة وإن كثرت، ففي كل واحدٍ منها غرة. واختلفوا في سن الغُرّة التي يجب قبولها ومبلغ قيمتها: فقال أبو حنيفة وأصحابه: عبد أو أمة: تعدل خمس مئة درهم. وقال مالك: ست مئة درهم. وقصد كل واحد من الفريقين نصف عشر الدية؛ لأن الدية عند العراقي: عشرة آلاف درهم، وعند المدني: اثنا عشر ألفاً. وقيل: خمسون ديناراً، وهي أيضاً نصف العشر من دية الحر. لأنهم لم يخلفوا أن الدية من الذهب ألف دينار. وقد استدل بعض الفقهاء من قوله: "قضى رسولُ الله ﷺ في جنينها بغرّة على أن دية الأجنة سواء: ذكراناً أو إناثاً" لأنه أرسل الكلام ولم يقَيّده بصفة. قال: ولو كانت يختلف الأمر في ذلك بالأنوثة والذكورة لبيّنه كما بين الدية في الذكر والأنثى من الأحرار البالغين. قلت [القائل الخطابي]: وهذه القضية صادقة في الحكم. إلا أن الاستدلال بهذا اللفظ من هذا الحديث لا يصح؛ لأنه حكاية فعل، ولا عُموم لحكاية الفعل. وإنما يصح هذا الاستدلال من رواية من روى: أن النبي ﷺ قضى في الجنين بغرة. من غير تفصيل. والله أعلم. ومذهب الشافعي في دية الجنين قريب من مذهب من تقدّم ذكرهم إلا أنه قوّمها من الإبل فقال: خمس من الإبل، خمساها وهو بعيران، قيمة خَلِفَتين، وثلاثة أخماسها قيمة ثلاث جذاع وحقاق. وذلك: لأن دية شبه العمد عنده مغلّظة، منها أربعون خَلِفَةً وثلاثون حقة، وثلاثون جذعة، فإن أعطى الغرة دون القيمة لم يقبل حتى يكون ابن سبع سنين، أو ثمان. ويقبل عند أبي حنيفة الطفل، وما دون السبع، كالرقبة المستحقة في الكفارات.









সুনান আবী দাউদ (4577)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنِ ابْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، فِي هَذِهِ الْقِصَّةِ قَالَ ثُمَّ إِنَّ الْمَرْأَةَ الَّتِي قَضَى عَلَيْهَا بِالْغُرَّةِ تُوُفِّيَتْ فَقَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِأَنَّ مِيرَاثَهَا لِبَنِيهَا وَأَنَّ الْعَقْلَ عَلَى عَصَبَتِهَا ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, অনুরূপ ঘটনা বর্ণিত। তিনি বলেন, ঐ দন্ডিত মহিলা, যার বিরুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি দাস দিয়াত প্রদানের নির্দেশ দিয়েছিলেন। সে মারা গেলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিলেন, দন্ডিতার সন্তানরা তার পরিত্যক্ত সম্পত্তির মালিক হবে এবং তার দিয়াত আদায় করবে তার আত্মীয়রা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6740) صحیح مسلم (1681)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن المسيّب: هو سيد، وابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم الزهري، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه البخاري (٦٧٤٠) و (٦٩٠٩)، ومسلم (١٦٨١)، والترمذي (٢٢٤٤)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٩٢) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٠٩٥٣)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠١٨). وانظر ما قبله. وما سيأتي برقم (٤٥٧٩).









সুনান আবী দাউদ (4578)


حَدَّثَنَا عَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا يُوسُفُ بْنُ صُهَيْبٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ امْرَأَةً، حَذَفَتِ امْرَأَةً فَأَسْقَطَتْ فَرُفِعَ ذَلِكَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجَعَلَ فِي وَلَدِهَا خَمْسَمِائَةِ شَاةٍ وَنَهَى يَوْمَئِذٍ عَنِ الْحَذْفِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَذَا الْحَدِيثُ خَمْسَمِائَةِ شَاةٍ ‏.‏ وَالصَّوَابُ مِائَةُ شَاةٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَكَذَا قَالَ عَبَّاسٌ وَهُوَ وَهَمٌ ‏.




আবদুল্লাহ ইবনু বুরাইদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, একদা জনৈক মহিলা অপর এক মহিলার উপর পাথর ছুঁড়ে মারলে তার গর্ভপাত হয়ে যায়। ঘটনাটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট পেশ করা হলে তিনি সন্তানের দিয়াত ধার্য করেন পাঁচশো ছাগল এবং ঐ দিনই পাথর নিক্ষেপ করেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, হাদীসটিতে পাঁচশো ছাগলের উল্লেখ আছে, কিন্তু সঠিক হলো একশো ছাগল। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আব্বাস এরুপই বলেছেন এবং এটা ভুল ধারনা মাত্র। [৪৫৭৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4817 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكنه اختُلف في وصله وإرساله، كما سيأتي بيانه، ووقع في متنه وهم في ذكر الخَمس مئة شاة، والصحيح: مئة شاة، كما قال أبو داود والنسائي. وقد نسب أبو داود في رواية ابن العبد الوهم فيه إلى عباس بن عبد العظيم، لكن رواه إبراهيم بن يعقوب الجوزجاني وإبراهيم بن يونس البغدادي عن عبيد الله بن موسى كما رواه عباس، فبرئ عُبيد من عهدته. وكذلك رواه أبو نعيم الفضل بن دكين عن يوسف بن صهيب، فبرئ عُبيد الله من عهدته. فيفي أن يكون الوهم فيه من يوسف بن صهيب، والله تعالى أعلم. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٩٨٨) عن إبراهيم بن يعقوب الجوزجاني وإبراهيم بن يونس البغدادي، كلاهما عن عُبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي أيضاً (٦٩٨٩) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، عن يوسف ابن صهيب، عن عبد الله بن بريدة، عن النبي ﷺ مرسلاً. وقال النسائي: هذا وهم، وينبغي أن يكون أراد مئة من الغنم. قال: وقد روي النهي عن الخذف عن عبد الله بن بريدة، عن عبد الله بن مغفل. ثم أسنده (٦٩٩٠). قلنا: وفي هذا تعليل من النسائي أيضاً لهذا الخبر بعلة أخرى، وهي دخول حديث في حديث، ويكون الوهم فيه إما من عبد الله بن بريدة أو من يوسف بن صهيب، والله أعلم. ومما يقوّي ما ذهب إليه أبو داود والنسائي من أن الصواب مئة شاة ما أخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٥٢٦)، والطبراني في "الكبير" (٣٤٨٥) من حديث حمل بن مالك وفيه: قضى رسول الله ﷺ في الجنين غرة عبد أو أمة، أو مئة من الشاء، … وإسناد الطبراني صحيح. وقوله: حذَفَتها، بالحاء المهملة، أي: رمتها.









সুনান আবী দাউদ (4579)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، حَدَّثَنَا عِيسَى، عَنْ مُحَمَّدٍ، - يَعْنِي ابْنَ عَمْرٍو - عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي الْجَنِينِ بِغُرَّةٍ عَبْدٍ أَوْ أَمَةٍ أَوْ فَرَسٍ أَوْ بَغْلٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَى هَذَا الْحَدِيثَ حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ وَخَالِدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو لَمْ يَذْكُرَا أَوْ فَرَسٍ أَوْ بَغْلٍ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গর্ভস্থ ভ্রুণের ক্ষতিসাধনের জরিমানা ধার্য করেন একটি উত্তম দাস বা দাসী অথবা একটি ঘোড়া বা একটি খচ্চর। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীস মুহাম্মাদ ইবনু আমর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে হাম্মাদ ইবনু সালামাহ ও খালিদ ইবনু আবদুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-ও বর্ণনা করেছেন। তবে তারা ঘোড়া ও খচ্চরের কথা উল্লেখ করেননি। [৪৫৭৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: شاذ




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3503) ، أخرجہ ابن ماجہ (2639 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح دون ذكر الفرس والبغل، فلم ترد في شيء من روايات هذا الحديث إلا في رواية عيسى -وهو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي- عن محمَّد بن عمرو بن علقمة الليثي كما أشار إليه الدارقطني في "العلل"، ٩/ ٢٩٤، فقد روى هذا الحديث جماعة عن محمَّد بن عمرو منهم حماد بن سلمة وخالد بن عبد الله الواسطي كما أشار إليه المصنف فلم يذكروا فيه الفرس والبغل، ورواه الزهري عن أبي سلمة كذلك فحصل أن ذكر الفرس والبغل وهم من عيسى بن يونس كما أشار إليه الخطابي، وجزم به الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٢٥٠. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٣٩) من طريق محمَّد بن بشر، والترمذي (١٤٦٩) من طريق ابن أبي زائدة، كلاهما عن محمَّد بن عمرو، به ولم يذكرا الفرس والبغل. وهو في "مسند أحمد" (٩٦٥٥) عن يحيى بن سعيد القطان، و (١٠٤٦٧) عن يزيد بن هارون كلاهما عن محمَّد بن عمرو. وليس في روايتهما ذكر الفرس والبغل. وأخرجه البخاري (٥٧٥٨) و (٥٧٥٩) و (٦٩٠٤)، ومسلم (١٦٨١)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٩٤) من طريق ابن شهاب الزهري، عن أبي سلمة عن عبد الرحمن، به ولم يذكر الفرس والبغل. وقد سلف من طريق ابن شهاب الزهري، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة برقم (٤٥٧٦)، ومن طريق ابن شهاب عن ابن المسيب برقم (٤٥٧٧) وليس فيه ذكر الفرس والبغل. قال الخطابي: يقال: إن عيسى بن يونس قد وهم فيه، وهو يغلظ أحياناً فيما يرويه، إلا أنه قد روي عن طاووس ومجاهد وعروة بن الزبير أنهم قالوا: الغرة عبد أو أمة أو فرس. ويشبه أن يكون الأصل عندهم فيما ذهبوا إليه حديث أبي هريرة هذا، والله أعلم. وأما البغل فأمره أعجب، ويحتمل أن تكون هذه الزيادة إنما جاءت من قبل بعض الرواة على سبيل القيمة، إذا عدمت الغرة من الرقاب، والله أعلم. قلنا: أثر طاووس أخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٩٩١). وأثر مجاهد أخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ٢٥٢، وأثر عروة عنده أيضاً ٩/ ٢٥١. وجاء ذكر البغل في أثر عن عطاء بن أبي رباح عند ابن أبي شيبة ٩/ ٢٥١.









সুনান আবী দাউদ (4580)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سِنَانٍ الْعَوَقِيُّ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ مُغِيرَةَ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، وَجَابِرٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، قَالَ الْغُرَّةُ خَمْسُمِائَةِ دِرْهَمٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ رَبِيعَةُ الْغُرَّةُ خَمْسُونَ دِينَارًا ‏.‏




আশ-শাবী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্-গুররাহ হলো পাঁচশো দিরহাম। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, রবী’আহ বলেছেন, গুররাহ হলো পঞ্চাশ দীনার।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، شریک ومغیرۃ عنعنا و جابر الجعفي ضعیف مدلس وقال الحافظ ابن حجر: ضعفہ الجمھور (طبقات المدلسین 5/133) وقال العراقي: ضعفہ الجمھور (تخریج احیاء علوم الدین 285/4) ، (انوار الصحیفہ ص 161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: أثر حسن، شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- متابع. الشعبي: هو عامر بن شَراحيل، وجابر: هو ابن يزيد الجُعفي، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، ومغيرة: هو ابن مِقسَم. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ٢٥٣، وإبراهيم الحربي في "الغريب" كما في "نصب الراية" ٤/ ٤٣٩ من طريق وكيع، عن سفيان الثوري، عن طارق بن عبد الرحمن البجلي، عن الشعبي قال: الغرة خمس مئة. وأثر ربيعة -وهو ابن أبي عبد الرحمن- الذي أشار إليه المصنف أخرجه مالك في "موطئه" ٢/ ٨٥٥، ومن طريقه البيهقي ٨/ ١٠٩ و ١١٦. وزاد: أو ستَّ مئة درهم.









সুনান আবী দাউদ (4581)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، وَحَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، عَنْ هِشَامٍ، وَحَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَعْلَى بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا حَجَّاجٌ الصَّوَّافُ، جَمِيعًا عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي دِيَةِ الْمُكَاتَبِ يُقْتَلُ يُودَى مَا أَدَّى مِنْ مُكَاتَبَتِهِ دِيَةَ الْحُرِّ وَمَا بَقِيَ دِيَةَ الْمَمْلُوكِ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিহত মুকাতাব গোলামের দিয়াত সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিদ্ধান্ত দিয়েছেন যে, মুকাতাব তার নির্ধারিত মুক্তিপণ হতে যে পরিমাণ অর্থ আদায় করেছে সে পরিমাণ স্বাধীন ব্যক্তির সমান দিয়াত হিসেবে আদায় করবে এবং বাকি অংশ গোলামের দিয়াতের পরিমাণে হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4814) ، یحیی بن أبي کثیر مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، وهذا إسناد اختُلف فيه عن عكرمة في وصله وإرساله، وفي رفعه ووقفه، وهو والحديث الذي يليه جزءان لحديث واحد، مؤداهما: أن المكاتب يُعتق منه بقدر ما أدى، وقد رواهما جميعاً الترمذي (١٣٠٥)، وقال: حديث حسن. وصححه الحاكم وابن القطان في "أحكام النظر" كما نقله عنه ابن الملقن في "البدر المنير" ٩/ ٧٤٦، وابن حزم في "المحلى"، وابن التركماني في "الجوهر النقي" ١٠/ ٣٢٦، وسكت عنه عبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى" ٤/ ٢١ مصححاً له. وضعفه النسائي في "الكبرى" بإثر (٧٢٢٦)، والبيهقي في "الكبرى" ١٠/ ٣٢٦، وقال ابن العربي في "العارضة" ٦/ ١٨: ليس في هذه المسألة حديث صحيح مع نباهة هؤلاء الرواة، وقال ابن عبد الهادي في "التنقيح" ٣/ ١٣٧: في إسناد هذا الحديث تعليلات. وقد أشارالبخاريُّ فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" ١/ ٥٠٢ إلى علة هذا الحديث حين سأله فقال: روى بعضهم هذا الحديث عن عكرمة عن علي. وذكر البيهقي لهذا الحديث علة أخرى تقضي بنكارة في متنة كذلك، سيأتي ذكرها عند الحديث الآتي بعده. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٠٠٠) و (٥٠٠١) و (٦٩٨٣ - ٦٩٨٥) و (٦٩٨٧) من وطرق عن يحيى بن أبي كثير، به. وأخرجه عبد الرزاق (١٥٧١٨) عن عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، به موقوفاً. وأخرجه الترمذي (١٣٠٥) من طريق حماد بن سلمة، عن أيوب، عن عكرمة، به. مرفوعاً. واختُلف عن أيوب في هذا الحديث: فرواه وهيب بن خالد عند البيهقي ١٠/ ٣٢٥ - ٣٢٦ عن أيوب، عن عكرمة، عن علي بن أبي طالب. وقال البيهقي: رواية عكرمة عن علي مرسلة. ورواه حماد بن زيد عند النسائي (٦٩٨٧)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ١١٠ عن أيوب، عن عكرمة مرسلاً دون ذكر ابن عباس. ورواه معمر عند عبد الرزاق (١٥٧٤٠) عن أيوب، عن عكرمة عن علي قوله. فذكر علياً مكان ابن عباس، وجعله من قوله. ولفظه: المكاتب يَعتق منه بقدر ما أدى. وقال البيهقي: رواية عكرمة عن علي مرسلة. قال الخطابي: أجمع عامة الفقهاء على أن المكاتب عبد ما بقي عليه درهم في جنايته، والجناية عليه. ولم يذهب إلى هذا الحديث من العلماء فيما بلغنا إلا إبراهيم النخعي. وقد روي في ذلك شيء عن علي بن أبي طالب كرم الله وجهه، وإذا صح الحديث وجب القول به إذا لم يكن منسوخاً، أو معارضاً بما هو أولى منه، والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (4582)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِذَا أَصَابَ الْمُكَاتَبُ حَدًّا أَوْ وَرِثَ مِيرَاثًا يَرِثُ عَلَى قَدْرِ مَا عَتَقَ مِنْهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ وُهَيْبٌ عَنْ أَيُّوبَ عَنْ عِكْرِمَةَ عَنْ عَلِيٍّ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَأَرْسَلَهُ حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ وَإِسْمَاعِيلُ عَنْ أَيُّوبَ عَنْ عِكْرِمَةَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَجَعَلَهُ إِسْمَاعِيلُ ابْنُ عُلَيَّةَ قَوْلَ عِكْرِمَةَ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: মুকাতাব গোলাম হাদ্দ- এর অপরাধে অভিযুক্ত হলে বা মৃতের ওয়ারিস হলে সে তার মুক্ত হওয়ার অংশের অংশীদার হবে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীস উহাইব (রাহিমাহুল্লাহ) আইয়ূব হতে, তিনি ইকরিমা হতে, তিনি আলী হতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে বর্ণনা করেছেন। অন্যদিকে হাম্মাদ ইবনু যায়িদ ও ইসমাঈল (রাহিমাহুল্লাহ) আইয়ূব হতে, তিনি ‘ইকরিমা হতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে মুরসালভাবে বর্ণনা করেছেন। ইসমাঈল ইবনু উলাইয়্যাহ একটিকে ইকরিমার (রাহিমাহুল্লাহ) বক্তব্য গন্য করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3402) ، أخرجہ الترمذي (1259 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، وهو والحديث الذي قبله جزءان لحديث واحد. لكنه اختلف في وصله وإرساله كما قال الحافظ في "الفتح" ٥/ ١٩٥، وقد أشار إلى ذلك أبو داود والبيهقي ١٠/ ٣٢٦، وقال النسائي في "الكبرى" بعد إيراده برقم (٧٢٢٦): هذا لايصح، وهو مختلف فيه. وقال ابن العربي في "عارضة الأحوذي" ٦/ ١٨: ليس في هذه المسألة حديث صحيح مع نباهة هؤلاء الرواة، وقال ابن عبد اللهادي في "التنقيح " ٣/ ١٣٧: في إسناد هذا الحديث تعليلات. قلنا: وفيه أيضاً علة أخرى في متنه، وهي أنه روى يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس قوله: يقام على المكاتب حد المملوك، وهذا يخالف رواية ابن عباس المرفوعة، ولهذا قال البيهقي ١٠/ ٣٢٦ عن الرواية الموقوفة على ابن عباس: هذا يخالف الحديث المرفوع في القياس، ويخالف ما رواه حماد بن سلمة في النص. قلنا: هاذا خالف الصحابي بفتواه روايته كان في ذلك إعلالٌ لروايته، وما كان ابنُ عباس ليُخالف قضاء رسول الله ﷺ. قلنا: ومع ذلك صححه الحاكم، وابن حزم في "المحلى"، وابن القطان في "أحكام النظر" كما نقله عنه ابن الملقن في "البدر المنير" ٩/ ٧٤٦، وصححه كذلك ابن التركماني في "الجوهر النقي" ١٠/ ٣٢٦، وسكت عنه عبد الحق في "أحكامه الوسطى" ٤/ ٢١، وحسنه الترمذي!! وأخرجه الترمذي (١٣٠٥)، والنسائي في "الكبرى" (٥٠٠٢) و (٦٣٥٧) و (٦٩٨٦) و (٧٢٢٦) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وأخرج ابن أبي عاصم في "الديات" ص ٩٩، وابن الجارود (٩٨٢)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ١١١، والبيهقي ١٠/ ٣٢٦ من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: يقام عليه حد المملوك. قلنا: يعني المكاتب.









সুনান আবী দাউদ (4583)


حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ مَوْهَبٍ الرَّمْلِيُّ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ دِيَةُ الْمُعَاهِدِ نِصْفُ دِيَةِ الْحُرِّ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ اللَّيْثِيُّ وَعَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ الْحَارِثِ عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ مِثْلَهُ ‏.‏




আমর ইবনু শু’আইব (রাহিমাহুল্লাহ)হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা এবং তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: জিম্মির দিয়াত স্বাধীন ব্যক্তির দিয়াতের অর্ধেক।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (3496) ، وأخرجہ الترمذي (1413 وسندہ حسن) والنسائي (4810، 4811 وسندھما حسن) وابن ماجہ (2644 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف. محمَّد بن إسحاق -وإن كان مدلساً، وقد عنعن- متابع. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٤٤) من طريق عبد الرحمن بن عياش، والترمذي (١٤٧٢)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٨٢) من طريق أسامة بن زيد الليثي، والنسائي (٦٩٨١) من طريق سليمان بن موسى، ثلاثتهم عن عمرو بن شعيب، به. وهو في "مسند أحمد" (٦٦٩٢) و (٦٧١٦). وقد سلف ضمن الحديث (٤٥٤٢) من طريق حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب. قال الخطابي: ليس في دية أهل الكتاب شيء أبين من هذا، وإليه ذهب عمر بن عبد العزيز، وعروة بن الزبير، وهو قول مالك وابن شبرمة وأحمد بن حنبل. غير أن أحمد قال: إذا كان القتل خطأ، فإن كان عمداً لم يُقَد به، ويضاعف عليه باثني عشر ألفاً. وقال أبو حنيفة وأصحابه وسفيان الثوري: ديته دية المسلم، وهو قول الشعبي والنخعي ومجاهد، وروي ذلك عن عمر وابن مسعود ﵄. وقال الشافعي وإسحاق بن راهويه: ديته الثلث من دية المسلم، وهو قول ابن المسيب والحسن وعكرمة. وروي ذلك أيضاً عن عمر ﵁ خلاف الرواية الأولى، وكذلك عن عثمان بن عفان ﵁. قلت [القائل الخطابي]: وقول رسول الله ﷺ أولى، ولا بأس بإسناده، وقد قال به أحمد. ويعضده حديث آخر، وقد رويناه فيما تقدم من طريق حسين المعلّم عن عمرو ابن شعيب، عن أبيه عن جده. قال: كانت قيمة الدية على عهد رسول الله ﷺ ثمان مئة دينار وثمانية آلاف درهم، ودية أهل الكتاب يومئذٍ النصف.









সুনান আবী দাউদ (4584)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي عَطَاءٌ، عَنْ صَفْوَانَ بْنِ يَعْلَى، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَاتَلَ أَجِيرٌ لِي رَجُلاً فَعَضَّ يَدَهُ فَانْتَزَعَهَا فَنَدَرَتْ ثَنِيَّتُهُ فَأَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَهْدَرَهَا وَقَالَ ‏ "‏ أَتُرِيدُ أَنْ يَضَعَ يَدَهُ فِي فِيكَ تَقْضَمُهَا كَالْفَحْلِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ وَأَخْبَرَنِي ابْنُ أَبِي مُلَيْكَةَ عَنْ جَدِّهِ أَنَّ أَبَا بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَهْدَرَهَا وَقَالَ بَعُدَتْ سِنُّهُ ‏.




সাফওয়ান ইবনু ইয়া’লা (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার এক কর্মচারী এক লোকের সঙ্গে বিবাদে লিপ্ত হলে লোকটি তার হাত কামড়িয়ে ধরে এবং সে টান দিয়ে তার হাত ছাড়িয়ে আনলে তার সামনের পাটির দাঁত পড়ে যায়। সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট অভিযোগ নিয়ে এলে তিনি তার মামলা খারিজ করে দেন এবং বলেন: তুমি কি চাও যে, সে তার হাত তোমার মুখে পুড়ে রাখুক আর তুমি তা উটের মতো চিবোতে থাকো? বর্ণনাকারী বলেন, ইবনু আবূ মুলাইকাহ (রাহিমাহুল্লাহ) তার দাদার সূত্রে আমাকে জানিয়েছেন, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ ঘটনার দিয়াতের দাবি বাতিল করেছেন এবং বলেন, তার দাঁত পড়ে গেল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6893) صحیح مسلم (1674)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (١٨٤٨) و (٢٢٦٥)، ومسلم (١٦٧٤)، وابن ماجه (٢٦٥٦)، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٤١ - ٦٩٤٦) من طريق عطاء بن أبي رباح، به. وقرن ابن ماجه والنسائي في الموضع الأول بيعلى أخاه سلمة. وأخرجه النسائي (٦٩٤٧) من طريق بُديل بن ميسرة، عن عطاء، عن صفوان بن يعلى: أن أجيراً ليعلى بن مُنية عض آخرُ ذراعه … رواه هكذا مرسلاً. وأخرجه أيضاً (٦٩٤٨) من طريق محمَّد بن مسلم الزهري، عن صفوان بن يعلى: أن أباه غزا مع رسول الله … مرسلاً أيضاً. وأخرجه النسائي (٦٩٣٩) و (٦٩٤٠) من طريق مجاهد عن يعلي بن مُنية. قال أحمد بن حنبل: لم يسمع منه. وهو في "مسند أحمد" (١٧٩٤٩)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٩٧). قال الخطابي: فيه بيان أن دفع الرجل عن نفسه مباح، وأن ذلك إذا أتى على نفس العادي عليه كان دمه هدراً إذا لم يكن له سبيل إلى الخلاص منه إلا بقتله. واستدل به الشافعي في صَوْل الفحل، قال: إذا دفعه فأتى عليه لم تلزمه قيمتُه. وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (4585)


حَدَّثَنَا زِيَادُ بْنُ أَيُّوبَ، أَخْبَرَنَا هُشَيْمٌ، حَدَّثَنَا حَجَّاجٌ، وَعَبْدُ الْمَلِكِ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ يَعْلَى بْنِ أُمَيَّةَ، بِهَذَا زَادَ ثُمَّ قَالَ يَعْنِي النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لِلْعَاضِّ ‏ "‏ إِنْ شِئْتَ أَنْ تُمَكِّنَهُ مِنْ يَدِكَ فَيَعَضَّهَا ثُمَّ تَنْزِعَهَا مِنْ فِيهِ ‏"‏ ‏.‏ وَأَبْطَلَ دِيَةَ أَسْنَانِهِ ‏.




ইয়া’লা ইবনু উমাইয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, অনুরূপ বর্ণিত। এতে আরো আছে: অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তোমার ইচ্ছা হলে তুমিও তার মুখে হাত দাও আর সে চিবাতে থাকুক। তারপর তুমি তার মুখ হতে তা বের করে আনো। অতঃপর তিনি তার দাঁতের দিয়াতের দাবি বাতিল করেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4584)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن قال المزي: الصحيح أن بين عطاء -وهو ابن أبي رباح- وبين يعلي بن أمية: صفوان بن يعلي بن أمية، قلنا: يعني كالرواية السالفة.









সুনান আবী দাউদ (4586)


حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَاصِمٍ الأَنْطَاكِيُّ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ بْنِ سُفْيَانَ، أَنَّ الْوَلِيدَ بْنَ مُسْلِمٍ، أَخْبَرَهُمْ عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ تَطَبَّبَ وَلاَ يُعْلَمُ مِنْهُ طِبٌّ فَهُوَ ضَامِنٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ نَصْرٌ قَالَ حَدَّثَنِي ابْنُ جُرَيْجٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا لَمْ يَرْوِهِ إِلاَّ الْوَلِيدُ لاَ نَدْرِي هُوَ صَحِيحٌ أَمْ لاَ ‏.‏




আমর ইবনু শু’আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা এবং তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: চিকিৎসা বিদ্যাহীন ব্যক্তি চিকিৎসা করলে তাতে সে দায়ী হবে। নাদর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু জুরাইজ (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীসটি আমার নিকট বর্ণনা করেছেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, হাদীসটি ওয়ালীদ একাই বর্ণনা করেছেন। হাদীসটি সহীহ কিনা তা আমরা জানি না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4834) ابن ماجہ (3466) ، ابن جریج مدلس وعنعن ، وللحدیث شاھد ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 162)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- لم يسمع من عمرو بن شعيب فيما قاله البخاري والبيهقي، ثم إن الدارقطني ذكر له علة أخرى، فقال: لم يُسنده عن ابن جريج غير الوليد بن مسلم، وغيره يرويه عن ابن جريج عن عمرو بن شعيب مرسلاً، عن النبي ﷺ. ومع ذلك فقد جود هذا الإسنادَ الحافظ ابن كثير في "تخريج أحاديث التنبيه" ٢/ ٢٦٦!! وأخرجه ابن ماجه (٣٤٦٦)، والنسائي في "الكبرى" (٧٠٠٥) و (٧٠٣٩) من طريق الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٧٠٠٦) من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن جريج، عن عمرو ابن شعيب عن جده. فلم يذكُر شعيبًا والد عمرو. ويشهد له ما بعده. وهو وإن كان مرسَلاً، يحصُل بانضمامه إلى هذا الحديث قوة إن شاء الله، مع حكاية إجماع الأئمة على مضمونه، كما ذكره الخطابي وابن عبد البر في "الاستذكار" (٣٦٨٥٨)، وابن رشد في "بداية المجتهد" وغيرهم. قال الخطابي: لا أعلم خلافاً في المعالج إذا تعدّى فتلف المريض كان ضامناً، والمتعاطي علماً أو عملاً لا يعرفه مُتَعَدِّي، فإذا تولد من فعله التلفُ ضمن الدية، وسقط عنه القودُ، لأنه لا يستبدُّ بذلك دون إذن المريض، وجناية الطبيب في قول عامة الفقهاء على عاقلته.









সুনান আবী দাউদ (4587)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، حَدَّثَنَا حَفْصٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ عُمَرَ بْنِ عَبْدِ الْعَزِيزِ، حَدَّثَنِي بَعْضُ الْوَفْدِ الَّذِينَ، قَدِمُوا عَلَى أَبِي قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ أَيُّمَا طَبِيبٍ تَطَبَّبَ عَلَى قَوْمٍ لاَ يُعْرَفُ لَهُ تَطَبُّبٌ قَبْلَ ذَلِكَ فَأَعْنَتَ فَهُوَ ضَامِنٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ عَبْدُ الْعَزِيزِ أَمَا إِنَّهُ لَيْسَ بِالنَّعْتِ إِنَّمَا هُوَ قَطْعُ الْعُرُوقِ وَالْبَطُّ وَالْكَىُّ ‏.‏




আবদুল আযীয ইবনু উমার ইবনু আবদুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আমার পিতার নিকট যেসব প্রতিনিধি দল এসেছিল তাদের কেউ কেউ আমার নিকট বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যেসব ডাক্তার চিকিৎসা শাস্ত্র সর্ম্পকে জ্ঞান রাখে না, তারা যদি কোন গোত্রের চিকিৎসা করে এবং এর ফলে রোগীর ক্ষতি হয় তাহলে সে এজন্য দায়ী হবে। আবদুল আযীয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তবে সাধারনভাবে ডাক্তার দায়ী হবে না, বরং শিরা উন্মুক্ত করা, অস্ত্রপচার করা ও উত্তপ্ত লোহার সেঁক দেয়া ইত্যাদি বুঝানো হয়েছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، بعض الوفد مجہول ، (انوار الصحیفہ ص 162)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسل. قال المنذري في "اختصار السنن": بعض الوفد مجهول، ولا يُعلم له صحبة أم لا؟ قلنا: لكنه بانضمامه إلى الحديث الذي قبله، مع ما حكاه غير واحد من الإجماع على مضمونه كما سلف بيانه، يتقوى أمره إن شاء الله. حفص: هو ابن غياث. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ٣٢١ عن حفص بن غياث، به. وأخرجه عبد الرزاق (١٨٠٤٤) عن ابن جريج، قال: أخبرني عبد العزيز بن عمر عن كتاب لعمر بن عبد العزيز فيه: بلغنا أن رسول الله ﷺ قال: … فذكر الحديث بنحوه. قوله: "أعنت" قال ابن الأثير: أي: أضر المريض وأفسده. والبَطُّ: قال ابن الأثير أيضاً: شقٌ الدُّمَّل والخُراج ونحوهما. قال أبو الطيب العظيم آبادي: ومراد عبد العزيز -والله أعلم بمراده- أن لفظ الطبيب الواقع في الحديث ليس المقصود منه معناه الوصفي العام الشامل لكل من يعالج، بل المقصود منه قاطع العروق والباطُّ والكاوي، ولكن أنت تعلم أن لفظ الطبيب في اللغة عام لكل من يعالج الجسم، فلا بد للتخصيص ببعض الأنواع من دليل.









সুনান আবী দাউদ (4588)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، وَمُسَدَّدٌ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ خَالِدٍ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ رَبِيعَةَ، عَنْ عُقْبَةَ بْنِ أَوْسٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم - قَالَ مُسَدَّدٌ - خَطَبَ يَوْمَ الْفَتْحِ - ثُمَّ اتَّفَقَا - فَقَالَ ‏"‏ أَلاَ إِنَّ كُلَّ مَأْثُرَةٍ كَانَتْ فِي الْجَاهِلِيَّةِ مِنْ دَمٍ أَوْ مَالٍ تُذْكَرُ وَتُدْعَى تَحْتَ قَدَمَىَّ إِلاَّ مَا كَانَ مِنْ سِقَايَةِ الْحَاجِّ وَسِدَانَةِ الْبَيْتِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ أَلاَ إِنَّ دِيَةَ الْخَطَإِ شِبْهِ الْعَمْدِ مَا كَانَ بِالسَّوْطِ وَالْعَصَا مِائَةٌ مِنَ الإِبِلِ مِنْهَا أَرْبَعُونَ فِي بُطُونِهَا أَوْلاَدُهَا ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাক্কাহ বিজয়ের দিন ভাষণ দেয়ার সময় তিনবার “আল্লাহ আকবার” বলার পর বলেন, “আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহা নেই, তিনি এক, তিনি তাঁর ওয়াদাকে বাস্তবায়িত করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং তিনি একাই (কাফিরদের) দলগুলোকে পরাজিত করেছেন।” আমি এ পর্যন্ত মুসাদ্দাদ হতে মুখস্ত করেছি। অতঃপর উভয়ের বর্ণনা মিলে গেছে। “জেনে রাখো! অন্ধকার যুগে কিসাসের ব্যাপারে যেসব বংশীয় মর্যাদার দাবি করা হতো তা আমার দুই পদতলে প্রোথিত। কিন্তু হাজ্জীদের পানি পান করানো ও কা’বা ঘরের খেদমতের প্রথা আগের মতো বহাল থাকবে। অতঃপর তিনি বলেন, জেনে রাখো! ইচ্ছাকৃত হত্যা সদৃশ হলো ভুলবশত নরহত্যা যা চাবুক বা লাঠির আঘাতে হয়ে থাকে, এজন্য একশো উট দিয়াত দিতে হবে যার মধ্যে চল্লিশটি উষ্ট্রী হবে গর্ভবতী।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4547)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، وهو مكرر الحديث السالف برقم (٤٥٤٧).









সুনান আবী দাউদ (4589)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا وُهَيْبٌ، عَنْ خَالِدٍ، بِهَذَا الإِسْنَادِ نَحْوَ مَعْنَاهُ ‏.




খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, এ সানাদে পূর্বোক্ত হাদীসের অর্থানুরুপ হাদীস বর্ণিত। [৪৫৮৮]



আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4548)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، وهو مكرر الحديث السالف برقم (٤٥٤٨).









সুনান আবী দাউদ (4590)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ هِشَامٍ، حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، عَنْ عِمْرَانَ بْنِ حُصَيْنٍ، أَنَّ غُلاَمًا، لأُنَاسٍ فُقَرَاءَ قَطَعَ أُذُنَ غُلاَمٍ لأُنَاسٍ أَغْنِيَاءَ فَأَتَى أَهْلُهُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّا أُنَاسٌ فُقَرَاءُ ‏.‏ فَلَمْ يَجْعَلْ عَلَيْهِ شَيْئًا ‏.‏




ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা এক দরিদ্র ব্যক্তির গোলাম অপর এক ধনী লোকের গোলামের কান কেটে ফেললো। অতঃপর তার পরিবারের লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তো গরীব। অতএব তিনি তার উপর কোন কিছুই ধার্য করেননি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4755) ، قتادۃ عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 162)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو نضرة: هو المنذر بن مالك بن قِطعة العَبْدي، وقتادة: هو ابن دِعامة السدوسي، وهشام: هو ابن أبي عبد الله سَنْبَر الدَّستُوائي. وهو في "مسند أحمد" (١٩٩٣١). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٩٢٧) من طريق معاذ بن هشام، بهذا الإسناد. قال الخطابي: معنى هذا أن الغلام الجاني كان حراً، وكانت جنايته خطأ، وكانت عاقلته فقراء، وإنما تُواسي العاقلة عن وُجْدٍ وَسَعة، ولا شيء على الفقير منهم. ويشبه أن يكون الغلام المجني عليه أيضاً حراً؛ لأنه لو كان عبداً لم يكن لاعتذار أهله بالفقر معنى. لأن العاقلة لا تحمل عبداً، كما لا تحتمل عمداً ولا اعترافاً. وذلك في قول أكثر أهل العلم. قلنا: كذا قال الخطابي. والذي ذهب إليه النسائي أن الغلامين كانا مملوكين، فقد ترجم للحديث بقوله: سقوط القَوَد بين المماليك فيما دون النفس. تنبيه: هذا الباب مع حديثه جاء في (أ) و (هـ) متأخِّراً بعد حديث (٤٥٩٤).









সুনান আবী দাউদ (4591)


قَالَ أَبُو دَاوُدَ حُدِّثْتُ عَنْ سَعِيدِ بْنِ سُلَيْمَانَ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ، عَنْ طَاوُسٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ قُتِلَ فِي عِمَّيَّا أَوْ رَمْيًا يَكُونُ بَيْنَهُمْ بِحَجَرٍ أَوْ بِسَوْطٍ فَعَقْلُهُ عَقْلُ خَطَإٍ وَمَنْ قُتِلَ عَمْدًا فَقَوْدُ يَدَيْهِ فَمَنْ حَالَ بَيْنَهُ وَبَيْنَهُ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلاَئِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোন ব্যক্তি অজ্ঞাতভাবে নিহত হলে বা লোকজনের পাথর নিক্ষেপের সময় তার আঘাতে বা চাবুকের আঘাতে নিহত হলে ভূলক্রমে হত্যার দিয়াত প্রযোজ্য। আর যাকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করা হয়, তার হত্যার কিসাস কার্যকর হবে। কেউ এতে বাধা দিলে তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতাকুল ও সকল মানুষের অভিশাপ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4540)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وقد سلف عند المصنف برقم (٤٥٤٠). وهناك وصله. وانظر ما سلف برقم (٤٥٣٩).









সুনান আবী দাউদ (4592)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَزِيدَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ حُسَيْنٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الرِّجْلُ جُبَارٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ الدَّابَّةُ تَضْرِبُ بِرِجْلِهَا وَهُوَ رَاكِبٌ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জীবজন্তুর আঘাত ক্ষমাযোগ্য। খনির দুর্ঘটনা বৃথা। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, পশুর পিঠে আরোহী অবস্থায় তা কাউকে পদাঘাত করলে (তা মাফ)। [৪৫৯১]



দুর্বল: ইরওয়া হা/১৫২৬।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سفیان بن حسین ضعیف عن الزھري وصحیح الحدیث عن غیرہ ، (انوار الصحیفہ ص 162)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. سفيان بن حسين ضعيف في الزهري، وقد انفرد عنه بأشياء وهذا منها، قال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٢٥٦: وقد اتفق الحفاظ على تغليط سفيان ابن حسين حيث روى عن الزهري: "الرجل جبار" بكسر الراء وسكون الجيم، وما ذاك إلا أن الزهري مكثر من الحديث والأصحاب، فتفرد سفيان عنه بهذا اللفظ فعُدَّ منكراً، وقال الشافعي: لا يصح هذا. قلنا: وممن أعل هذا الحديث الدارقطني في "السنن" (٣٣٠٦)، والبيهقي ٨/ ٣٤٣، وابن عبد البر في "التمهيد" ٧/ ٢٤. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٧٥٦) من طريق سفيان بن حسين، بهذا الإسناد. قال ابن الأثير: "الرّجل جُبار"، أي: ما أصابت الدابة برجلها فلا قود على صاحبها. وقال الخطابي: "الجُبار": الهَدْر. تنبيه: هذا الباب جاء في (أ) متقدماً بعد الحديث (٤٥٨٩)، وفي (ب) متأخراً إلى ما بعد الحديث (٤٥٩٥).









সুনান আবী দাউদ (4593)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، وَأَبِي، سَلَمَةَ سَمِعَا أَبَا هُرَيْرَةَ، يُحَدِّثُ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الْعَجْمَاءُ جَرْحُهَا جُبَارٌ وَالْمَعْدِنُ جُبَارٌ وَالْبِئْرُ جُبَارٌ وَفِي الرِّكَازِ الْخُمُسُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ الْعَجْمَاءُ الْمُنْفَلِتَةُ الَّتِي لاَ يَكُونُ مَعَهَا أَحَدٌ وَتَكُونُ بِالنَّهَارِ وَلاَ تَكُونُ بِاللَّيْلِ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: চতুষ্পদ জন্তু আহত করলে তা কিসাসযোগ্য নয়, খনিতে চাপা পড়ে ও কূপের মধ্যে পড়ে মারা গেলে নিহত ব্যক্তির রক্তমূল্য ক্ষমা এবং মাটির নীচে প্রাপ্ত সম্পদের এক-পঞ্চমাংশ (সরকারকে) দিতে হবে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, জন্তু যদি দিবাভাগে মাঠে চরাকালে আহত করে এবং সঙ্গে রাখাল না থাকে তাহলে মাফ, কিন্তু এরূপ রাতেরবেলা সংঘটিত হলে এ হুকুম প্রযোজ্য নয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1499) صحیح مسلم (1710)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه البخاري (١٤٩٩) و (٦٩١٢)، وسلم (١٧١٠)، وابن ماجه (٢٦٧٣)، والترمذي (٦٤٧) و (١٤٣١) و (١٤٣٢)، والنسائي في "الكبرى" (٢٢٨٦) و (٢٢٨٧) و (٢٢٨٨) و (٥٨٠٣) من طريق ابن شهاب الزهري، به وقد جاء عند بعضهم عن سعيد ابن المسيب وحده. وأخرجه مسلم (١٧١٠) من طريق الأسود بن العلاء عن أبي سلمة وحده، به. وأخرجه البخاري (٢٣٥٥) من طريق أبي صالح السمان، والبخاري (٦٩١٣)، ومسلم (١٧١٠) من طريق محمَّد بن زياد، ومسلم (١٧١٠)، والنسائي في "الكبرى" (٢٢٨٧) من طريق عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، والنسائي (٢٢٨٩) و (٥٨٠٤) من طريق محمَّد بن سيرين، و (٥٨٠٥) من طريق الأعرج، خمستهم عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧١٢٠)، و "صحيح ابن حبان" (٦٠٠٥). وقد سلف ذكر الركاز وحده عند المصنف برقم (٣٠٨٥). قال الخطابي: "العجماء جرحها جبار" العجماء: البهيمة، وسميت عجماء لعُجمتها، وكل من لم يقدر على الكلام فهو أعجم. ومعنى الجبار: الهدر، وإنما يكون جرحها هدراً إذا كانت منفلتة ذاهبة على وجهها، ليس لها قائد ولا سائق. وأما البئر فهو أن يحفر بئراً في ملك نفسه فيتردى فيها إنسان، فإنه هدر، لا ضمان عليه فيه. وقد يتأول أيضاً على البئر أن تكون بالبوادي يحفرها الإنسان فيحييها بالحفر والإنباط، فيتردى فيها إنسان فيكون هدراً. والمعدن: ما يستخرجه الإنسان من معادن الذهب والفضة ونحوها، فيستأجر قوما يعملون فيها فربما انهارت على بعضهم يقول: فدماؤهم هدر، لأنهم أعانوا على أنفسهم، فزال العتب عمن استأجرهم. قلنا: الركاز عند أهل الحجاز كنوز الجاهلية المدفونة في الأرض، وعند أهل العراق المعادن، والقولان تحتملهما اللغة. قاله في "النهاية".









সুনান আবী দাউদ (4594)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُتَوَكِّلِ الْعَسْقَلاَنِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، ح وَحَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ التِّنِّيسِيُّ، حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ الْمُبَارَكِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ الصَّنْعَانِيُّ، كِلاَهُمَا عَنْ مَعْمَرٍ، عَنْ هَمَّامِ بْنِ مُنَبِّهٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ النَّارُ جُبَارٌ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হূরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আগুনে ক্ষতিপূরন নেই (দূর্ঘটনাক্রমে আগুন ছড়িয়ে পড়লে)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2952) ، أخرجہ ابن ماجہ (2676 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، ومتنه شاذ. قال الإِمام أحمد فيما نقله عنه الدارقطني في "سننه" (٣٣٠٨): حديث أبي هريرة "النار جبار" ليس بشيء، لم يكن في الكتب، باطل، ليس هو بصحيح. وبين ابن معين فيما نقله عنه ابن عبد البر في "التمهيد" ٧/ ٢٦ أنها تصحيف من "البير"، وقد نقل ابنُ العربي وجه التصحيف فيما حكاه عنه الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٢٥٥ فقال: قال بعضهم: صحَّفها بعضهم؛ لأن أهل اليمن يكتبون النار بالياء لا بالألف، فظن بعضهم "البئر" بالموحدة "النار"، فرواها كذلك قلنا: ونحو ذلك ما قاله الخطابي في "معالم السنن"، ثم قال الحافظ: ويؤيد ما قال ابن معين اتفاق الحفاظ من أصحاب أبي هريرة على ذكر البئر دون النار. وأخرجه ابن ماجه (٢٦٧٦)،والنسائي في "الكبرى" (٥٧٥٧) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. قال الخطابي: إن صح الحديث على ما روي فإنه متأول على النار التي يوقدها الرجل في ملكه، لأرب له فيها، فتطير بها الريح، فتشعلها في بناء أو متاع لغيره من حيث لا يملك ردّها، فيكون هدراً غير مضمون عليه، والله أعلم.