হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (4761)


حَدَّثَنَا ابْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ هِشَامٍ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ قَتَادَةَ، قَالَ حَدَّثَنَا الْحَسَنُ، عَنْ ضَبَّةَ بْنِ مِحْصَنٍ الْعَنَزِيِّ، عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِمَعْنَاهُ قَالَ ‏:‏ ‏ "‏ فَمَنْ كَرِهَ فَقَدْ بَرِئَ، وَمَنْ أَنْكَرَ فَقَدْ سَلِمَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ قَتَادَةُ ‏:‏ يَعْنِي مَنْ أَنْكَرَ بِقَلْبِهِ، وَمَنْ كَرِهَ بِقَلْبِهِ ‏.‏




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নাবী (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্র হতে বর্ণিত, পূর্বোক্ত হাদীসের অর্থানুরূপ বর্ণিত। তিনি বলেনঃ যে ব্যক্তি তা ঘৃণা করলো সে দায়িত্বমুক্ত হলো। যে ব্যক্তি তা অপছন্দ করলো সে মুক্ত হলো। ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অর্থাৎ যে ব্যক্তি আন্তরিকভাবে ঘৃণা করলো এবং যে ব্যক্তি তার অন্তর দিয়ে অপছন্দ করলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4760)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. والد معاذ: هو هشام بن أبي عبد الله سنبر. والحسن: هو البصري. وأخرجه مسلم (١٨٥٤) عن أبي غسان المسمعي ومحمد بن بشار، كلاهما عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٨٥٤) من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، به. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (4762)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ شُعْبَةَ، عَنْ زِيَادِ بْنِ عَلاَقَةَ، عَنْ عَرْفَجَةَ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏:‏ ‏ "‏ سَتَكُونُ فِي أُمَّتِي هَنَاتٌ وَهَنَاتٌ وَهَنَاتٌ، فَمَنْ أَرَادَ أَنْ يُفَرِّقَ أَمْرَ الْمُسْلِمِينَ وَهُمْ جَمِيعٌ فَاضْرِبُوهُ بِالسَّيْفِ كَائِنًا مَنْ كَانَ ‏"‏ ‏.‏




আরফাজাহ্‌ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ অচিরেই আমার উম্মাতের মধ্যে বিচিত্রমুখী দুর্নীতি ব্যাপকভাবে পরিলক্ষিত হবে। মুসলিমগণ ঐক্যবদ্ধ থাকা অবস্থায় যে ব্যক্তি তাদের কাজে বাধা দিবে সে যে-ই হোক, তোমরা তাকে তরবারি দিয়ে হত্যা করো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1852)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، مسدد: هو ابن مسرهد، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، وشعبة: هو ابن الحجاج. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٧١) عن عمرو بن علي، عن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٨٥٢) (٥٩) من طريق محمَّد بن جعفر، عن شعبة، به. وأخرجه مسلم (١٨٥٢) (٥٩)، والنسائي في "الكبرى" (٣٤٦٩) و (٣٤٧٠) من طرق عن زياد بن علاقة، به. وزاد النسائي في روايته الأولى: "فإن يد الله على الجماعة، وإن الشيطان مع من فارق الجماعة يركض". وأخرجه بنحوه مسلم (١٨٥٢) من طريق وقدان العبدي، عن عرفجة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٨٢٩٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٧٧). وقوله:"وهنات": جمع هنة، والمراد بها هنا الفتك والأمور الحادثة. و" جميع"، قال السندي: أي: مجتمعون على إمام واحد. قال الإِمام النووي في "شرح مسلم" ١٢/ ٢٤١: فيه الأمر بقتال من خرج على الإِمام، أو أراد تفريق كلمة المسلمين ونحو ذلك، ويُنهى عن ذلك، فإن لم ينته قوتِل، وإن لم يندفع شَرُّه إلا بقتله، فقُتِلَ كان هدراً.









সুনান আবী দাউদ (4763)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ مُحَمَّدٍ، عَنْ عَبِيدَةَ، ‏:‏ أَنَّ عَلِيًّا، ذَكَرَ أَهْلَ النَّهْرَوَانِ فَقَالَ ‏:‏ فِيهِمْ رَجُلٌ مُودَنُ الْيَدِ أَوْ مُخْدَجُ الْيَدِ، أَوْ مَثْدُونُ الْيَدِ لَوْلاَ أَنْ تَبْطَرُوا لَنَبَّأْتُكُمْ مَا وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ يَقْتُلُونَهُمْ عَلَى لِسَانِ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ قَالَ قُلْتُ ‏:‏ أَنْتَ سَمِعْتَ هَذَا مِنْهُ قَالَ ‏:‏ إِي وَرَبِّ الْكَعْبَةِ ‏.‏




উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাহরাওয়ানের অধিবাসীদের সম্পর্কে বলেন, তাদের মধ্যে ত্রুটিপূর্ণ বা খাটো হাতবিশিষ্ট এক ব্যক্তি রয়েছে, যদি তোমরা আনন্দে আত্মহারা না হও তাহলে আমি তোমাদেরকে মহান আল্লাহর সেই অঙ্গীকার সম্বন্ধে জানাবো যা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখ নিঃসৃত ভাষায় তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধকারীদের জন্য প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন। ‘উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম, আপনি কি একথা তাঁর কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন, হাঁ, কা‘বার রবের কসম!




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1066)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، وعبيدة: هو ابن عمرو السلماني. وأخرجه مسلم (١٠٦٦) عن محمَّد بن أبي بكر المقدسي، عن حماد بن زيد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٠٦٦)، وابن ماجه (١٦٧) من طريق إسماعيل ابن علية، عن أيوب، به. وأخرجه مسلم (١٠٦٦)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥١٩) من طريق عبد الله بن عون، والنسائي (٨٥٢٠) من طريق عوف، كلاهما عن محمَّد بن سيرين، به. وهو في "مسند أحمد" (٦٢٦)، و "صحيح ابن حبان" (٦٩٣٨). وانظر حديث علي الآتي (٤٧٦٧) و (٤٧٦٨). قوله: "مُخدج اليد"، قال السندي على "حاشية المسند": بخاء معجمة ثم دال مهملة ثم جيم: اسم مفعول من أخدج، أي: ناقص اليد، أي: قصيرها. وكذا "مودن اليد" بالدال المهملة لفظا ومعنى. و"مثدون": كمفعول، بثاء مثلثة ودال مهملة، أي: صغير اليد مجتمعها، والمثدون: الناقص الخلق. وقوله: "لولا أن تبطروا" كتفرحوا لفظاً ومعنى، والمراد: لولا خشيةُ أن تفرحوا فرحاً يؤدي إلى ترك الأعمال وكثرة الطغيان … والنهروان: كورة واسعة بين بغداد وواسط من الجانب الشرقي حدها الأعلى متصل ببغداد، وكان بها وقعة لأمير المؤمنين علي بن أبي طالب ﵁ مع الخوارج مشهورة.









সুনান আবী দাউদ (4764)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ أَبِي نُعْمٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ ‏:‏ بَعَثَ عَلِيٌّ عَلَيْهِ السَّلاَمُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِذُهَيْبَةٍ فِي تُرْبَتِهَا، فَقَسَّمَهَا بَيْنَ أَرْبَعَةٍ بَيْنَ ‏:‏ الأَقْرَعِ بْنِ حَابِسٍ الْحَنْظَلِيِّ ثُمَّ الْمُجَاشِعِيِّ، وَبَيْنَ عُيَيْنَةَ بْنِ بَدْرٍ الْفَزَارِيِّ وَبَيْنَ زَيْدِ الْخَيْلِ الطَّائِيِّ ثُمَّ أَحَدِ بَنِي نَبْهَانَ وَبَيْنَ عَلْقَمَةَ بْنِ عُلاَثَةَ الْعَامِرِيِّ ثُمَّ أَحَدِ بَنِي كِلاَبٍ قَالَ فَغَضِبَتْ قُرَيْشٌ وَالأَنْصَارُ وَقَالَتْ ‏:‏ يُعْطِي صَنَادِيدَ أَهْلِ نَجْدٍ وَيَدَعُنَا ‏.‏ فَقَالَ ‏:‏ ‏"‏ إِنَّمَا أَتَأَلَّفُهُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ فَأَقْبَلَ رَجُلٌ غَائِرُ الْعَيْنَيْنِ مُشْرِفُ الْوَجْنَتَيْنِ نَاتِئُ الْجَبِينِ كَثُّ اللِّحْيَةِ مَحْلُوقٌ قَالَ ‏:‏ اتَّقِ اللَّهَ يَا مُحَمَّدُ ‏.‏ فَقَالَ ‏:‏ ‏"‏ مَنْ يُطِعِ اللَّهَ إِذَا عَصَيْتُهُ أَيَأْمَنُنِي اللَّهُ عَلَى أَهْلِ الأَرْضِ وَلاَ تَأْمَنُونِي ‏"‏ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ فَسَأَلَ رَجُلٌ قَتْلَهُ أَحْسِبُهُ خَالِدَ بْنَ الْوَلِيدِ - قَالَ - فَمَنَعَهُ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ فَلَمَّا وَلَّى قَالَ ‏:‏ ‏"‏ إِنَّ مِنْ ضِئْضِئِ هَذَا أَوْ فِي عَقِبِ هَذَا قَوْمًا يَقْرَءُونَ الْقُرْآنَ لاَ يُجَاوِزُ حَنَاجِرَهُمْ يَمْرُقُونَ مِنَ الإِسْلاَمِ مُرُوقَ السَّهْمِ مِنَ الرَّمِيَّةِ، يَقْتُلُونَ أَهْلَ الإِسْلاَمِ وَيَدَعُونَ أَهْلَ الأَوْثَانِ لَئِنْ أَنَا أَدْرَكْتُهُمْ قَتَلْتُهُمْ قَتْلَ عَادٍ ‏"‏ ‏.‏




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু অপরিশোধিত স্বর্ণ পাঠালে তিনি তার চারজন ব্যক্তি, যথা আকরা ‘ইবনু হাবিস আল-হানযলী আল-মুজাশিঈ, ‘উয়াইনাহ ইবনু বাদর আল-ফাযারী, যায়িদ আল-খাইল আত-তাঈ, অতঃপর নাবহান গোত্রের এক ব্যক্তি, এছাড়া ‘আলক্বামাহ ইবনু উলাসাহ আল-‘আমিরী এবং বনী কিলাবের এক ব্যক্তির মধ্যে ভাগ করে দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এতে কুরাইশ ও আনসারগণ অসন্তুষ্ট হয়ে বললেন, নাজদের অধিবাসীদের নেতৃস্থানীয় লোকদেরকে দেয়া হয়েছে এবং আমাদেরকে দেয়া হলো না। তিনি (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, আমি তাদেরকে (ইসলামের) অনুরাগী করার জন্য দিয়েছি। বর্ণনাকারী বলেন, তারপর কোটরাগত চোখ, উদ্যত চিবুক, ঘন দাড়ি ও নেড়া মাথাবিশিষ্ট এক ব্যক্তি এসে বললো, হে মুহাম্মাদ! আল্লাহ্‌কে ভয় করো। তিনি (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, আমিই যদি অবাধ্য হই তাহলে কে আর আল্লাহর আনুগত্য করবে? আল্লাহ আমাকে পৃথিবীবাসীর জন্য বিশ্বস্ত লোক হিসেবে নিয়োগ করেছেন; আর তোমরা আমাকে বিশ্বাস করছো না! আবূ সাঈস আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর এক ব্যক্তি তাকে হত্যা করার অনুমতি চাইলেন, আমার মতে, তিনি খালিদ ইবনু ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি বলেন, তিনি (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বারণ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, লোকটি চলে গেলে তিনি (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তার বংশধর হতে এমন এক গোত্রের আবির্ভাব হবে, যারা কুরআন পাঠ করবে কিন্তু তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তীর যে গতিতে শিকারের দিকে ছুটে যায় তারাও ঠিক সেইভাবে ইসলাম হতে বেরিয়ে যাবে, তারা ইসলামের অনুসারীদেরকে হত্যা করবে এবং পৌত্তলিকদেরকে নিরাপদ রাখবে। যদি আমি তাদের সময় পর্যন্ত জীবিত থাকি তাহলে তাদেরকে হত্যা করবো যেভাবে হত্যা করা হয়েছে ‘আদ জাতিকে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3344) صحیح مسلم (1064)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن سعيد بن مسروق الثوري، وابن أبي نعم: هو عبد الرحمن. وعلقه البخاري (٣٣٤٤) وقال، قال ابن كثير (وهو محمَّد شيخ أبي داود) عن سفيان، بهذا الإسناد، ووصله عنه في تفسير سورة براءة برقم (٤٦٦٧) ولم يسقه بتمامه. وأخرجه البخاري (٧٤٣٢)، والنسائي في "الكبرى" (٣٥٥٠) من طريق عبد الرزاق، والبخاري (٧٤٣٢) عن قبيصة، كلاهما عن سفيان الثوري، به. وأخرجه مسلم (١٠٦٤) (١٤٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٣٧٠) و (١١١٥٧) من طريق أبي الأحوص سلام بن سليم، عن سعيد بن مسروق والد سفيان، به. وأخرجه البخاري (٤٣٥١)، ومسلم (١٠٦٤) من طريق عمارة بن القعقاع، عن عبد الرحمن بن أبي نعم، به. وهو في "مسند أحمد" (١١٠٠٨)، و"صحيح ابن حبان" (٢٥). قوله: زيد الخيل: وسماه رسول الله ﷺ زيد الخير، وهو زيد بن مهلهل، قَدِمَ على رسول الله ﷺ في وفد طيّئ سنة تسع فأسلم. والصناديد: واحده صنديد، وهو السيد الشجاع، وكل عظيم غالب صنديد. وقوله: "من ضِئضى هذا"، قال ابن الأثير في "النهاية": الضِئضئ: الأصل. يقال: ضِئضِى صِدق، وضُؤضُو صِدق. وحكى بعضهم ضِئضيءٌ، بوزن قِنديل، يريد أنه يخرج من نَسلِه وعَقِبه. ورواه بعضهم بالضاد المهملة. وهو بمعناه. وقال الخطابي: الضئضى: الأصل يريد أنه يخرج من نسله الذي هو أصلهم، أو يخرج من أصحابه وأتباعه الذين يقتدون به، ويبنون رأيهم ومذهبهم على أصل قوله. والمروق: الخروج من الشيء والنفوذ إلى الطرف الأقصى منه. والرمية: هي الطريدة التي يرميها الرامي.









সুনান আবী দাউদ (4765)


حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَاصِمٍ الأَنْطَاكِيُّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، وَمُبَشِّرٌ، - يَعْنِي ابْنَ إِسْمَاعِيلَ الْحَلَبِيَّ عَنْ أَبِي عَمْرٍو، قَالَ - يَعْنِي الْوَلِيدَ - حَدَّثَنَا أَبُو عَمْرٍو، قَالَ حَدَّثَنِي قَتَادَةُ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، وَأَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏:‏ ‏"‏ سَيَكُونُ فِي أُمَّتِي اخْتِلاَفٌ وَفُرْقَةٌ، قَوْمٌ يُحْسِنُونَ الْقِيلَ وَيُسِيئُونَ الْفِعْلَ وَيَقْرَءُونَ الْقُرْآنَ لاَ يُجَاوِزُ تَرَاقِيَهُمْ، يَمْرُقُونَ مِنَ الدِّينِ مُرُوقَ السَّهْمِ مِنَ الرَّمِيَّةِ لاَ يَرْجِعُونَ حَتَّى يَرْتَدَّ عَلَى فُوقِهِ هُمْ شَرُّ الْخَلْقِ وَالْخَلِيقَةِ طُوبَى لِمَنْ قَتَلَهُمْ وَقَتَلُوهُ، يَدْعُونَ إِلَى كِتَابِ اللَّهِ وَلَيْسُوا مِنْهُ فِي شَىْءٍ، مَنْ قَاتَلَهُمْ كَانَ أَوْلَى بِاللَّهِ مِنْهُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا ‏:‏ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا سِيمَاهُمْ قَالَ ‏:‏ ‏"‏ التَّحْلِيقُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ সাঈদ আল-খুদরী ও আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহ ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ অচিরেই আমার উম্মাতের মধ্যে মতভেদ সৃষ্টি হবে। তারা উত্তম কথা বলবে, আর নিকৃষ্ট কাজ করবে। তারা কুরআন পাঠ করবে কিন্তু তা তাদের গলার হাড় অতিক্রম করবে না। তারা দ্বীন হতে এমনভাবে খারিজ হবে যেমন তীর ধনুক হতে ছুটে যায়, তারা আর ফিরে আসবে না। তারা সৃষ্টি জগতে নিকৃষ্টতম। ঐ ব্যক্তি ভাগ্যবান যে তাদেরকে হত্যা করলো এবং তারা তাকে হত্যা করলো। তারা আল্লাহর কিতাবের দিকে ডাকে কিন্তু নিজেরা তার অনুসরণ করে না। যে ব্যক্তি তাদেরকে হত্যা করবে সে-ই হবে আল্লাহর কাছে সর্বোত্তম। সাহাবীগণ বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! তাদের আলামত কি? তিনি বললেন, নেড়া মাথা ওয়ালা গোষ্ঠী।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قتادۃ مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 166)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده عن أنس صحيح، بإسناده عن قتادة فيه انقطاع، فإنه لم يسمع من أبي سعيد الخدري، انما سمع هذا الحديث عن أبي المتوكل الناجي عن أبي سعيد، أخرجه الحاكم في "مستدركه" ٢/ ١٤٨. الوليد: هو ابن مسلم، وأبو عمرو: هو عبد الرحمن ابن عمرو الأوزاعي. وأخرجه أبو يعلى (٣١١٧) في "مسنده" عن أحمد بن إبراهيم الدورقي، عن مبشر بن إسماعيل وحده، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد في "مسنده" (١٣٣٣٨)، والبيهقي في "السنن" ٨/ ١٧١ من طريق أبي المغيرة، والبيهقي ٨/ ١٧١ من طريق الولبد بن مزيد، والحاكم في "المستدرك" ٢/ ١٤٨ من طريق بشر بن بكر، ثلاثتهم عن الأوزاعي، به. وأخرجه أبو يعلى (٢٩٦٣) عن سويد بن سعيد، عن الوليد بن مسلم، به. ولم يذكر فيه أبا سعيد الخدري. وأخرجه كذلك الحاكم في "المستدرك" ٢/ ١٤٧ - ١٤٨، والبيهقي في "الدلائل" ٦/ ٤٣٠ من طريق محمَّد بن كثير المصيصي، والآجري في "الشريعة" ص ٢٥ من طريق يزيد بن يوسف، كلاهما عن الأوزاعي، به. وأخرجه مختصراً أبو يعلى (٣٩٠٨) من طريق مبارك بن سحيم، عن عبد العزيز ابن صهيب، عن أنس. ومبارك متروك. وانظر حديث أبي سعيد السالف قبله. وحديث أنس الآتي بعده. وقوله: "سيماهم"، قال النووي في "شرح مسلم" ٧/ ١٤٨: السيما: العلامة وفيها ثلاث لغات: القصر وهو الأفصح، وبه جاء القرآن، والمد، والثالثة السيمياء بزيادة ياء مع المد لا غير. والمراد بالتحليق: حلق الرؤوس، واستدل به بعض الناس على كراهة حلق الرأس ولا دلالة فيه، وإنما هو علامة لهم، والعلامة قد تكون بحرام وقد تكون بمباح كما قال النبي-ﷺ: "آيتهم رجل أسود إحدى عضديه مثل ثدي المرأة" ومعلوم أن هذا ليس بحرام وقد ثبت في "سنن أبي داود" بإسناد على شرط البخاري ومسلم أن رسول الله ﷺ رأى صبيا قد حلق بعض رأسه، فقال: "احلقوه كله أو اتركوه كله" وهذا صريح في إباحة حلق الرأس لا يحتمل تأويلاً. قال أصحابنا: حلق الرأس جائز بكل حال لكن إن شق عليه تعهده بالدهن والتسريح استحب حلقه، وإن لم يشق استحب تركه.









সুনান আবী দাউদ (4766)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَحْوَهُ قَالَ ‏:‏ ‏ "‏ سِيمَاهُمُ التَّحْلِيقُ وَالتَّسْبِيدُ، فَإِذَا رَأَيْتُمُوهُمْ فَأَنِيمُوهُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ ‏:‏ التَّسْبِيدُ اسْتِئْصَالُ الشَّعْرِ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তিনি বলেন, তাদের আলামত হচ্ছে, তারা মাথা মুড়ানো ও টাকপড়া হবে। অতঃপর তোমরা তাদেরকে দেখলে হত্যা করবে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আত-তাসবীদ অর্থ হলো চুল উপড়ে ফেলা।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (175) ، قتادۃ مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 166)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن ماجه (١٧٥) عن الحسن بن علي، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٣٠٣٦). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (4767)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ خَيْثَمَةَ، عَنْ سُوَيْدِ بْنِ غَفَلَةَ، قَالَ قَالَ عَلِيٌّ ‏:‏ إِذَا حَدَّثْتُكُمْ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَدِيثًا فَلأَنْ أَخِرَّ مِنَ السَّمَاءِ أَحَبُّ إِلَىَّ مِنْ أَنْ أَكْذِبَ عَلَيْهِ وَإِذَا حَدَّثْتُكُمْ فِيمَا بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ فَإِنَّمَا الْحَرْبُ خُدْعَةٌ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏:‏ ‏ "‏ يَأْتِي فِي آخِرِ الزَّمَانِ قَوْمٌ حُدَثَاءُ الأَسْنَانِ سُفَهَاءُ الأَحْلاَمِ، يَقُولُونَ مِنْ قَوْلِ خَيْرِ الْبَرِيَّةِ يَمْرُقُونَ مِنَ الإِسْلاَمِ كَمَا يَمْرُقُ السَّهْمُ مِنَ الرَّمِيَّةِ، لاَ يُجَاوِزُ إِيمَانُهُمْ حَنَاجِرَهُمْ، فَأَيْنَمَا لَقِيتُمُوهُمْ فَاقْتُلُوهُمْ، فَإِنَّ قَتْلَهُمْ أَجْرٌ لِمَنْ قَتَلَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ‏"‏ ‏.




সুওয়াইদ ইবনু গাফালা্হ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, 'আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যখন আমি তোমাদের নিকট রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে হাদীস বর্ণনা করি, তখন তাঁর উপর মিথ্যা আরোপ করার চেয়ে আমার আকাশ থেকে পড়ে যাওয়া অধিক পছন্দনীয়। আর যখন আমি আমার ও তোমাদের মধ্যকার বিষয়ে আলাপ করি তখন “যুদ্ধ হলো কৌশল”। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-কে বলেতে শুনেছিঃ শেষ যুগে এমন লোকদের আত্নপ্রকাশ ঘটবে যারা হবে বয়সে নবীন এবং প্রতিজ্ঞাহীন বোকা। তারা সমগ্র সৃষ্টিকুলের মধ্যে সর্বোত্তম কথা বলবে, তীর যেভাবে ধনুক হতে বেরিয়ে যায় তারাও সেভাবে দ্বীন হতে বেরিয়ে যাবে। তাদের ঈমান কন্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তোমরা যেখানেই এই ধরনের লোকের দেখা পাবে সেখানেই তাদেরকে হত্যা করবে। কারন, যারা এদেরকে হত্যা করবে ক্বিয়ামতের দিন তারা সওয়াব লাভ করবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3611) صحیح مسلم (1066)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، والأعمش: هو سيمان بن مهران، وخيثمة: هو ابن عبد الرحمن بن أبي سبرة. وأخرجه البخاري (٣٦١١) و (٥٠٥٧) عن محمَّد بن كثير، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٠٦٦)، والنسائي في "الكبرى" (٣٥٥١) من طريق عبد الرحمن ابن مهدي، ومسلم (١٠٦٦) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن سفيان الثوري، به. وأخرجه البخاري (٦٩٣٠)، ومسلم (١٠٦٦) (١٥٤)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥١٠) من طرق عن الأعمش، به. وأخرجه بنحوه النسائي (٨٥١١) من طريق أبي إسحاق، و (٨٥١٢) من طريق أبي قيس الأودي، كلاهما عن سويد بن غفلة، به. وهو في "مسند أحمد" (٦١٦)، و"صحيح ابن حبان" (٦٧٣٩). وانظر ما بعده. وقوله: "حدثاء الأسنان"، قال السندي في "حاشيته على المسند"، أي: صغار الأسنان (وهو كناية عن الشباب وأول العمر) فإن حداثة السنّ محل للفساد عادة. وقوله: "سفهاء الأحلام"، أي: ضعاف العقول.









সুনান আবী দাউদ (4768)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ أَبِي سُلَيْمَانَ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ كُهَيْلٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي زَيْدُ بْنُ وَهْبٍ الْجُهَنِيُّ، ‏:‏ أَنَّهُ كَانَ فِي الْجَيْشِ الَّذِينَ كَانُوا مَعَ عَلِيٍّ عَلَيْهِ السَّلاَمُ الَّذِينَ سَارُوا إِلَى الْخَوَارِجِ فَقَالَ عَلِيٌّ عَلَيْهِ السَّلاَمُ ‏:‏ أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏:‏ ‏ "‏ يَخْرُجُ قَوْمٌ مِنْ أُمَّتِي يَقْرَءُونَ الْقُرْآنَ لَيْسَتْ قِرَاءَتُكُمْ إِلَى قِرَاءَتِهِمْ شَيْئًا وَلاَ صَلاَتُكُمْ إِلَى صَلاَتِهِمْ شَيْئًا وَلاَ صِيَامُكُمْ إِلَى صِيَامِهِمْ شَيْئًا، يَقْرَءُونَ الْقُرْآنَ يَحْسَبُونَ أَنَّهُ لَهُمْ وَهُوَ عَلَيْهِمْ، لاَ تُجَاوِزُ صَلاَتُهُمْ تَرَاقِيَهُمْ يَمْرُقُونَ مِنَ الإِسْلاَمِ كَمَا يَمْرُقُ السَّهْمُ مِنَ الرَّمِيَّةِ، لَوْ يَعْلَمُ الْجَيْشُ الَّذِينَ يُصِيبُونَهُمْ مَا قُضِيَ لَهُمْ عَلَى لِسَانِ نَبِيِّهِمْ صلى الله عليه وسلم لَنَكَلُوا عَلَى الْعَمَلِ، وَآيَةُ ذَلِكَ أَنَّ فِيهِمْ رَجُلاً لَهُ عَضُدٌ وَلَيْسَتْ لَهُ ذِرَاعٌ، عَلَى عَضُدِهِ مِثْلُ حَلَمَةِ الثَّدْىِ عَلَيْهِ شَعَرَاتٌ بِيضٌ ‏"‏ ‏.‏ أَفَتَذْهَبُونَ إِلَى مُعَاوِيَةَ وَأَهْلِ الشَّامِ وَتَتْرُكُونَ هَؤُلاَءِ يَخْلُفُونَكُمْ فِي ذَرَارِيِّكُمْ وَأَمْوَالِكُمْ وَاللَّهِ إِنِّي لأَرْجُو أَنْ يَكُونُوا هَؤُلاَءِ الْقَوْمَ، فَإِنَّهُمْ قَدْ سَفَكُوا الدَّمَ الْحَرَامَ، وَأَغَارُوا فِي سَرْحِ النَّاسِ فَسِيرُوا عَلَى اسْمِ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ سَلَمَةُ بْنُ كُهَيْلٍ ‏:‏ فَنَزَّلَنِي زَيْدُ بْنُ وَهْبٍ مَنْزِلاً مَنْزِلاً حَتَّى مَرَّ بِنَا عَلَى قَنْطَرَةٍ قَالَ فَلَمَّا الْتَقَيْنَا وَعَلَى الْخَوَارِجِ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ الرَّاسِبِيُّ فَقَالَ لَهُمْ ‏:‏ أَلْقُوا الرِّمَاحَ وَسُلُّوا السُّيُوفَ مِنْ جُفُونِهَا، فَإِنِّي أَخَافُ أَنْ يُنَاشِدُوكُمْ كَمَا نَاشَدُوكُمْ يَوْمَ حَرُورَاءَ قَالَ ‏:‏ فَوَحَّشُوا بِرِمَاحِهِمْ وَاسْتَلُّوا السُّيُوفَ وَشَجَرَهُمُ النَّاسُ بِرِمَاحِهِمْ - قَالَ - وَقَتَلُوا بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضِهِمْ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ وَمَا أُصِيبَ مِنَ النَّاسِ يَوْمَئِذٍ إِلاَّ رَجُلاَنِ فَقَالَ عَلِيٌّ عَلَيْهِ السَّلاَمُ ‏:‏ الْتَمِسُوا فِيهِمُ الْمُخْدَجَ فَلَمْ يَجِدُوا قَالَ ‏:‏ فَقَامَ عَلِيٌّ رضى الله عنه بِنَفْسِهِ حَتَّى أَتَى نَاسًا قَدْ قُتِلَ بَعْضُهُمْ عَلَى بَعْضٍ فَقَالَ ‏:‏ أَخْرِجُوهُمْ فَوَجَدُوهُ مِمَّا يَلِي الأَرْضَ فَكَبَّرَ وَقَالَ ‏:‏ صَدَقَ اللَّهُ وَبَلَّغَ رَسُولُهُ ‏.‏ فَقَامَ إِلَيْهِ عَبِيدَةُ السَّلْمَانِيُّ فَقَالَ ‏:‏ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ وَاللَّهِ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ لَقَدْ سَمِعْتَ هَذَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏:‏ إِي وَاللَّهِ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ حَتَّى اسْتَحْلَفَهُ ثَلاَثًا وَهُوَ يَحْلِفُ ‏.




সালামাহ ইবনু কুহাইল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, যায়িদ ইবনু ওয়াহ্‌ব আল্‌-জুহানী (রাহিমাহুল্লাহ) জানিয়েছেন যে, তিনি ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর সঙ্গে সেই সৈন্যদলের সঙ্গে ছিলেন যারা খারিজীদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে গিয়েছিলেন। 'আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, হে জনতা! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ আমার উম্মাতের মধ্য হতে এমন একটি গোত্রের আত্নপ্রকাশ ঘটবে যাদের কুরআন পাঠের সামনে তোমাদের তিলওয়াত কিছুই নয়, তোমাদের সলাত তাদের সলাতের তুলনায় কিছুই নয় এবং তোমাদের সিয়াম তাদের সিয়ামের তুলনায় কিছুই নয়। তারা কুরআন পড়বে নেকী লাভের আশায়, কিন্তু পরিণতি হবে তার বিপরীত। তাদের সলাত তাদের কন্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তীর যেভাবে ধনুক হতে বেরিয়ে যায়, তারাও ঠিক সেভাবে ইসলাম হতে দূরে সরে যাবে। যেসব সৈন্য তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবে তারা যদি সেই সওয়াবের কথা জানতে পারে যা তাদের নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ মুখে তাদের জন্য বলেছেন, তাহলে তারা অন্যান্য আমল করা ছেড়ে দিবে এবং এরই উপর নির্ভর করে বসে থাকবে। এই দলের নিদর্শন হলো, তাদের মধ্যে এমন এক ব্যক্তি থাকবে যার বাহু থাকেব কিন্তু হাত থাকবে না এবং তার বাহুর উপর স্তনের বোঁটার ন্যায় একটি বোঁটা থাকবে এবং তার উপর সাদা লোম থাকবে। তোমরা কি তোমাদের ছেলেমেয়ে ও ধন-সম্পদ এদের আয়ত্তে রেখে মু’আরিযাহ ও সিরিয়াবাসীর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে যেতে চাও? আল্লাহর কসম! আমার ধারনা যে, এরাই সেই গোত্রের। কেননা, এরা হারামভাবে রক্ত প্রবাহিত করছে এবং চারনভূমি হতে মানুষের পশু লুট করছে। অতএব, তোমরা আল্লাহর নাম নিয়ে বের হও।

সালামাহ ইবনু কুহাইল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমার কাছে যায়িদ ইবনু ওয়াহ্‌ব খারিজীদের নিকট গমনের ঘটনা পর্যায়ক্রমে বর্ণনা করে বলেন, অবশেষে আমরা একটি পুল অতিক্রম করে যখন দুই দল মুখোমুখি হলাম, আর খারিজীদের সেনাপ্রধান ছিলো ‘আবদুল্লাহ ইবনু ওয়াহ্‌ব আর-রাসিবী। সে তাদেরকে বললো, তোমরা বল্লম ছুঁড়ো এবং খাপ থেকে তরবারি বের করো। এমন যেনো না হয় যে, তারা তোমাদেরকে ওয়াদা দিয়ে বলবে যেমন হারুরার দিবসে তারা ওয়াদা দিয়েছিলো। তিনি বলেন, অতঃপর তারা বল্লম নিক্ষেপ করতে লাগলো ও খাপ থেকে তরবারি বের করলো এবং মুসলিমরা বল্লম ছুঁড়ে তাদেরকে প্রতিরোধ করলো এবং একের পর এক তারা নিহত হতে থাকলো। তিনি বলেন, ঐদিন ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষের দুই ব্যক্তি শহীদ হলো। ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তোমরা নিহতদের মধ্যে ছোট হাতবিশিস্ট ব্যক্তিকে খোজঁ করো ; কিন্তু তারা তাকে পেলো না। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর 'আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজে উঠে পরস্পরের উপর পরে থাকা লাশের নিকট এসে বললেন, এদেরকে বের করো। তারা তাকে ভুলুন্ঠিত অবস্হায় পেয়ে গেলে তিনি আল্লাহু আকবার উচ্চারণ করে বললেন, আল্লাহ সত্য বলেছেন এবং তাঁর রাসুলও। এরপর ‘উবাইদাহ আস্‌-সালমানী তার নিকট দাঁড়িয়ে বললেন, হে আমীরুল মু’মিনীন! সেই আল্লাহর কসম যিনি ছাড়া অন্য কোনো ইলাহ নেই! আপনি কি একথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট শুনেছেন? তিনি বললেন, হাঁ, সেই আল্লাহর কসম! যিনি ছাড়া অন্য কোনো ইলাহ নেই। ‘উবাইদাহ তিনবার কসম করে তার নিকট প্রশ্ন করলে তিনিও তিনবার কসম করে একই জবাব দেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1066)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (١٠٦٦) عن عبد بن حميد، والنسائي في "الكبرى" (٨٥١٨) عن العباس بن عبد العظيم، كلاهما عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وأخرجه مختصراً وبنحوه النسائي في "الكبرى" (٨٥١٧) من طريق موسى بن قيس، عن سلمة بن كهيل، به. وأخرجه مختصراً النسائي في "الكبرى" (٨٥١٦) من طريق الأعمش، عن زيد بن وهب، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٠٦). وأخرجه بنحوه مسلم (١٠٦٦)، والنسائي في "الكبرى" (٨٥٥٩) من طريق بسر ابن سعيد، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي. وهو عند ابن حبان في "صحيحه" (٦٩٣٩). وأخرجه النسائي (٨٥١٣) من طريق إبراهيم بن عبد الأعلى، عن طارق بن زياد، عن علي. وهو بنحوه. وهو في "مسند أحمد" (٨٤٨). وأخرجه بنحوه النسائي (٨٥١٥) من طريق عاصم بن كليب، عن أبيه كليب، عن علي. وهو في "مسند أحمد" (١٣٧٨) و (١٣٧٩). وانظر حديث علي السالف أيضاً (٤٧٦٣) من طريق عَبيدة السلماني عنه. وانظر ما بعده. وقوله: " فوحَّشُوا"، قال الخطابي في" معالم السنن" ٤/ ٣٣٥: فوحشوا برماحهم معناه: رَموْا بها على بُعدٍ، يقال للإنسان إذاكان في يده شيءٌ ، فرمى به على بعد قد وحش به، ومنه قول الشاعر: إن أنتم لم تطلبوا بأخيكم … فضعوا السلاحَ ووحُشُوا بالأبرَق وقوله:"وشجرهم الناس برماحهم"، يريد: أنهم دافعوهم بالرماح وكفوهم عن أنفسهم بها، يقال: شجرت الدابة بلجامها، إذا كلففتها به، وقد يكون أيضاً معناه: أنهم شبكوهم بالرماح، فقتلوهم من الاشتجار، وهو الاختلاط والاشتباك.









সুনান আবী দাউদ (4769)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ جَمِيلِ بْنِ مُرَّةَ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو الْوَضِيءِ، قَالَ قَالَ عَلِيٌّ عَلَيْهِ السَّلاَمُ ‏:‏ اطْلُبُوا الْمُخْدَجَ ‏.‏ فَذَكَرَ الْحَدِيثَ فَاسْتَخْرَجُوهُ مِنْ تَحْتِ الْقَتْلَى فِي طِينٍ، قَالَ أَبُو الْوَضِيءِ ‏:‏ فَكَأَنِّي أَنْظُرُ إِلَيْهِ حَبَشِيٌّ عَلَيْهِ قُرَيْطَقٌ لَهُ إِحْدَى يَدَيْنِ مِثْلُ ثَدْىِ الْمَرْأَةِ عَلَيْهَا شُعَيْرَاتٌ مِثْلُ شُعَيْرَاتِ الَّتِي تَكُونُ عَلَى ذَنَبِ الْيَرْبُوعِ ‏.‏




আবুল ওয়াদী’ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তোমরা মুখদাজকে (ছোট হাতবিশিস্ট ব্যক্তিকে) খুঁজে বের করো। অতঃপর পূর্বের হাদীসের অনুরূপ। এরপর তারা তাকে ভূলুন্ঠিত লাশগুলোর নীঁচ হতে খুজে বের করলো। আবুল ওয়াদী’ আরো বলেন, তাকে দেখে আমার মনে হলো সে যেন হাবসী লোক, তার পরিধানে জুব্বা ছিলো। আর এক হাতের উপর মেয়েলোকের স্তনের বোঁটার মত একটি বোঁটা ছিল এবং তাতে ইয়ারবু’র লেজের লোমের ন্যায় লোম ছিলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الوضيء: هو عباد بن نُسيب. وأخرجه الطيالسي (١٦٩) عن حماد بن زيد، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد في "مسنده" (١١٧٩) و (١١٨٨)، وأبو يعلى (٤٨٠) و (٥٥٥) من طرق عن حماد بن زيد، به. وأخرجه أحمد في "مسنده" (١١٨٩) و (١١٩٧)، والحاكم في "المستدرك" ٤/ ٥٣١ - ٥٣٣ من طريق يزيد بن أبي صالح، عن أبي الوضيء، به. ورواية الحاكم مطولة. وانظر ما قبله، وما بعده. وقوله: عليه قُريطق، قال ابن الأثير في "النهاية": هو تصغير قُرْطَق، أي: قَبَاء، وهو تعريب: كُرْتَه، وقد تُضَم طاؤه. وإبدال القاف من الهاء في الأسماء المُعَرَّبة كثير، كالبَرَق، والباشَق، والمُنشُق. واليربوع: هو حيوان صغير على هيئة الجُرذ الصغير، وله ذنب طويل ينتهي بخصلة من الشعر، وهو قصير اليدين طويل الرجلين، لونه كلون الغزال.









সুনান আবী দাউদ (4770)


حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا شَبَابَةُ بْنُ سَوَّارٍ، عَنْ نُعَيْمِ بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ أَبِي مَرْيَمَ، قَالَ ‏:‏ إِنْ كَانَ ذَلِكَ الْمُخْدَجَ لَمَعَنَا يَوْمَئِذٍ فِي الْمَسْجِدِ نُجَالِسُهُ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ، وَكَانَ فَقِيرًا وَرَأَيْتُهُ مَعَ الْمَسَاكِينِ يَشْهَدُ طَعَامَ عَلِيٍّ عَلَيْهِ السَّلاَمُ مَعَ النَّاسِ وَقَدْ كَسَوْتُهُ بُرْنُسًا لِي ‏.‏ قَالَ أَبُو مَرْيَمَ ‏:‏ وَكَانَ الْمُخْدَجُ يُسَمَّى نَافِعًا ذَا الثُّدَيَّةِ، وَكَانَ فِي يَدِهِ مِثْلُ ثَدْىِ الْمَرْأَةِ عَلَى رَأْسِهِ حَلَمَةٌ مِثْلُ حَلَمَةِ الثَّدْىِ عَلَيْهِ شُعَيْرَاتٌ مِثْلُ سِبَالَةِ السِّنَّوْرِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ ‏:‏ وَهُوَ عِنْدَ النَّاسِ اسْمُهُ حَرْقُوسُ ‏.‏




আবু মারইয়াম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ঐ (মুখদাজ) খোড়াঁ হাতবিশিষ্ট সে সময় আমাদের সঙ্গে মাসজিদে দিনরাত উঠা-বসা করতো। এবং সে ছিলো ফকির। আমি তাকে লোকদের সঙ্গে 'আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর আহারে অংশগ্রহন করতে দেখেছি। আমি তাকে আমার একটি আলখাল্লা দান করেছিলাম। আবূ মারইয়াম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, মুখদাজকে নাফি’ বোঁটাধারী নামে ডাকা হতো। আর তার হাতে নারীর স্তনের বোঁটার মত একটি বোঁটা ছিল এবং বিড়ালের লোমের ন্যায় লোম ছিলো। [৪৭৬৯]



সানাদ দূর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أبو مریم الثقفي ثقۃ ونعیم بن حکیم حسن الحدیث علی الراجح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: قول أبي مريم -وهو الثقفي، واسمه: قيس- إسناده حسن. ونعيم بن حكيم: صدوق حسن الحديث. وباقى رجاله ثقات.









সুনান আবী দাউদ (4771)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ سُفْيَانَ، قَالَ حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ حَسَنٍ، قَالَ حَدَّثَنِي عَمِّي، إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ طَلْحَةَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏:‏ ‏ "‏ مَنْ أُرِيدَ مَالُهُ بِغَيْرِ حَقٍّ فَقَاتَلَ فَقُتِلَ فَهُوَ شَهِيدٌ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কারো সম্পদ অন্যায়ভাবে গ্রাস করার উপক্রম হলে এবং সে তা প্রতিরোধ করতে গিয়ে হত্যা হলে সে শহীদ বলে গন্য হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4093 وسندہ صحیح) والترمذي (1419، 1420 وسندھما صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطان، وسفيان: هو الثوري. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٣٧) عن عمرو بن علي، عن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (١٤٧٩) من طريق محمَّد بن عبد الوهاب، و (١٤٨٠) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، كلاهما عن سفيان الثورى، به. وأخرجه الترمذي (١٤٧٨) من طريق عبد العزيز بن المطلب، عن عبد الله بن الحسن، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٣٨) من طريق معاوية بن هشام، عن سفيان الثوري، عن عبد الله بن الحسن، عن محمَّد بن إبراهيم بن طلحة، عن عبد الله بن عمرو، به. قال النسائي: هذا خطأ، والصواب الذي قبله. (يعني الصواب: عبد الله ابن الحسن، عن إبراهيم بن محمَّد بن طلحة كما هو في إسناد أبي داود). وأخرجه البخاري (٢٤٨٠)، والنسائي في "الكبرى" (٣٥٣٥) من طريق أبي الأسود محمَّد بن عبد الرحمن، والنسائي (٣٥٣٦) من طريق عبد الله بن الحسن كلاهما عن عكرمة، والنسائي (٣٥٣٣) من طريق عمرو بن دينار، و (٣٥٣٤) من طريق عبد الله بن صفوان (ثلاثتهم عكرمة وعمرو وعبد الله بن صفوان) عن عبد الله بن عمرو بن العاص، به. وأخرجه مسلم (١٤١) من طريق ابن جريج، قال: أخبرني سليمان الأحول أن ثابتاً مولى عمر بن عبد الرحمن أخبره أنه لما كان بين عبد الله بن عمرو وبين عنبسة بن أبي سفيان ما كان، تيسروا للقتال، فركب خالد بن العاص إلى عبد الله بن عمرو، فوعظه خالد، فقال عبد الله بن عمرو أما علمت أن رسول الله ﷺ قال … فذكره. وهو في "مسند أحمد" (٦٥٢٢) و (٦٨١٦). قال الإِمام الخطابي: قد ندب الله سبحانه في غير آية من كتابه إلى التعرض للشهادة، وإذا سمى رسول الله ﷺ شهيداً، فقد دلَّ ذلك على أن من دافع عن ماله أو عن أهله، أو عن دينه -إذا أريد على شيء منها- فأتى القتل عليه، كان مأجوراً فيه، نائلاً به منازل الشهداء. وقد كره ذلك قوم، زعموا أن الواجب عليه أن يستسلم، ولا يقاتل عن نفسه، وذهبوا في ذلك إلى أحاديث رُويت في ترك القتال في الفتن، وفي الخروج على الأئمة. وليس هذا من ذاك في شيء، إنما جاء هذا في قتال اللصوص وقطاع الطرق وأهل البغي، والساعين في الأرض بالفساد، ومن دخل في معناهم من أهل العبث والإفساد.









সুনান আবী দাউদ (4772)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ الطَّيَالِسِيُّ، وَسُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ، - يَعْنِي أَبَا أَيُّوبَ الْهَاشِمِيَّ - عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي عُبَيْدَةَ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَمَّارِ بْنِ يَاسِرٍ، عَنْ طَلْحَةَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَوْفٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ زَيْدٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏:‏ ‏ "‏ مَنْ قُتِلَ دُونَ مَالِهِ فَهُوَ شَهِيدٌ، وَمَنْ قُتِلَ دُونَ أَهْلِهِ أَوْ دُونَ دَمِهِ أَوْ دُونَ دِينِهِ فَهُوَ شَهِيدٌ ‏"‏ ‏.




সাঈদ ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তি তার সম্পদ রক্ষা করতে গিয়ে নিহত হলে সে শহীদ। একইভাবে কেউ তার পরিবার-পরিজন ও জীবন অথবা ধর্ম রক্ষা করতে গিয়ে নিহত হলে সেও শহীদ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3529) ، أخرجہ النسائي (4099، 4100 وسندھما صحیح) ورواہ الترمذي (1421 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٤٤) عن محمَّد بن رافع ومحمد بن إسماعيل، كلاهما عن سليمان بن داود وحده، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (١٤٨١) من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، والنسائي (٣٥٤٣) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، كلاهما عن إبراهيم بن سعد، به. وأخرجه مختصراً ابن ماجه (٢٥٨٠)، والنسائي في "الكبرى" (٣٥٣٩) من طريق سفيان، والنسائي (٣٥٤٠) من طريق محمَّد بن إسحاق، كلاهما عن الزهري، عن طلحة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٦٢٨) و (١٦٥٢)، و"صحيح ابن حبان" (٣١٩٤). وأخرجه الترمذي (١٤٧٧) من طريق معمر، عن الزهري، عن طلحة بن عبد الله، عن عبد الرحمن بن عمرو بن سهل، عن سعيد بن زيد. مختصراً. فزاد في الإسناد بين طلحة وسعيد بن زيد عبد الرحمن بن عمرو، قال الحافظ في "فتح الباري " ٥/ ١٠٤: ويمكن الجمع بين الروايتين بأن يكون طلحة سمع هذا الحديث من سعيد بن زيد، وثبته فيه عبد الرحمن بن عمرو بن سهل، فلذلك كان ربما أدخله في السند. والله أعلم. وهو عند ابن حبان في صحيحها (٣١٩٥) بالزيادة نفسها في السند. قال أبو حاتم: روى هذا الخبر أصحابُ الزهري الثقات المتقنون، فاتفقوا كلهم على روايتهم هذا الخبر عن الزهري، عن طلحة بن عبد الله بن عوف، عن سعيد بن زيد خلا معمر وحده، فإنه أدخل بين طلحة بن عبد الله، وبين سعيد بن زيد عبد الرحمن بن سهل، وأخاف أن يكون ذلك وهماً. وقد قال معمر في هذا الخبر (يعني رواية ابن حبان هذه): بلغني عن الزهري، فيُشبه أن يكون سمعه من بعض أصحابه عن الزهري، فالقلبُ إلى رواية أولئك أميل. قلنا: وأخرجه أحمد في "المسند" (١٦٤٢) من طريق محمَّد بن إسحاق، عن الزهري، عن طلحة بن عبد الله بن عوف، قال: أتتني أروى بنت أويس في نفر من قريش، فيهم عبد الرحمين بن عمرو بن سهل، فقالت … وساقت حديثاً وفي آخره: "ومن قتل دون ماله فهو شهيد". وإسناده حسن. محمَّد بن إسحاق روى له أصحاب السنن" وعلق له البخاري، وروى له مسلم متابعة، وهو صدوق حسن الحديث، وقد صرَّح بالتحديث عند أبي يعلى (٩٥٠) فانتفت شبهة تدليسه، وباقي رجاله ثقات رجال الشيخين. * * *









সুনান আবী দাউদ (4773)


حَدَّثَنَا مَخْلَدُ بْنُ خَالِدٍ الشَّعِيرِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا عِكْرِمَةُ، - يَعْنِي ابْنَ عَمَّارٍ - قَالَ حَدَّثَنِي إِسْحَاقُ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ - قَالَ قَالَ أَنَسٌ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ أَحْسَنِ النَّاسِ خُلُقًا فَأَرْسَلَنِي يَوْمًا لِحَاجَةٍ فَقُلْتُ وَاللَّهِ لاَ أَذْهَبُ ‏.‏ وَفِي نَفْسِي أَنْ أَذْهَبَ لِمَا أَمَرَنِي بِهِ نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ قَالَ فَخَرَجْتُ حَتَّى أَمُرَّ عَلَى صِبْيَانٍ وَهُمْ يَلْعَبُونَ فِي السُّوقِ فَإِذَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَابِضٌ بِقَفَاىَ مِنْ وَرَائِي فَنَظَرْتُ إِلَيْهِ وَهُوَ يَضْحَكُ فَقَالَ ‏ "‏ يَا أُنَيْسُ اذْهَبْ حَيْثُ أَمَرْتُكَ ‏"‏ ‏.‏ قُلْتُ نَعَمْ أَنَا أَذْهَبُ يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ أَنَسٌ وَاللَّهِ لَقَدْ خَدَمْتُهُ سَبْعَ سِنِينَ أَوْ تِسْعَ سِنِينَ مَا عَلِمْتُ قَالَ لِشَىْءٍ صَنَعْتُ لِمَ فَعَلْتَ كَذَا وَكَذَا ‏.‏ وَلاَ لِشَىْءٍ تَرَكْتُ هَلاَّ فَعَلْتَ كَذَا وَكَذَا ‏.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চরিত্রের দিক হতে সর্বোত্তম ব্যক্তি ছিলেন। একদিন তিনি আমাকে কোনো দরকারে পাঠালেন। আমি বললাম, আল্লাহর কসম ! আমি যাবো না। কিন্তু আমার অন্তরে ছিলো যে, নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যে প্রয়োজনে যাওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন সেখানে যাবো। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমি রওয়ানা হয়ে বাজারে খেলাধুলারত বালকদের কাছ দিয়ে যেতে খেলায় লিপ্ত হলাম। হঠাৎ পিছন দিক হতে রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে আমার ঘাড় ধরলেন। পিছন দিকে ফিরে দেখি তিনি হাসছেন। তিনি বললেন, হে উনাইস ! আমি তোমাকে যেখানে যেতে বলেছি তুমি সেখানে যাও। আমি বললাম , হে আল্লাহর রাসুল ! হ্যাঁ , এইতো যাচ্ছি। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর কসম ! আমি সাত বছর অথবা নয় বছর তাঁর খেদমত করেছি ; কিন্তু আমার মনে পড়ছে না যে , তিনি আমার কোনো কাজের জন্য আমাকে বলেছেনঃ তুমি এটা কেনো করলে? অথবা কোনো কাজ না করলে তিনি আমার কৈফিয়ত তালাশ করেননি, এ কাজ কেনো করলে না। [৪৭৭২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2310)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (٢٣٠٩) عن أبي معن الرقاشي زيد بن يزيد، عن عمر بن يونس، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢٧٦٨) و (٦٩١١)، ومسلم (٢٣٠٩) و (٥٢) و (٥٣) و (٥٥) من طرق عن أنس، به وجاءت روايتهم بنحو حديثنا، وفي بعضها اختصار وزيادة. وهو في "مسند أحمد" (١١٩٧٤) و (١٣٠٢١)، و "صحيح ابن حبان" (٢٨٩٣). وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (4774)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ، - يَعْنِي ابْنَ الْمُغِيرَةِ - عَنْ ثَابِتٍ، عَنْ أَنَسٍ، قَالَ خَدَمْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عَشْرَ سِنِينَ بِالْمَدِينَةِ وَأَنَا غُلاَمٌ لَيْسَ كُلُّ أَمْرِي كَمَا يَشْتَهِي صَاحِبِي أَنْ أَكُونَ عَلَيْهِ مَا قَالَ لِي فِيهَا أُفٍّ قَطُّ وَمَا قَالَ لِي لِمَ فَعَلْتَ هَذَا أَوْ أَلاَ فَعَلْتَ هَذَا ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মাদীনাহয় আমি দশ বছর যাবৎ নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর খেদমত করেছি। তখন আমি বালক ছিলাম। সব কাজ আমার মালিক যেভাবে চেয়েছেন সেভাবে করতে পারিনি। সেজন্য তিনি আমার প্রতি কখনো মনক্ষুন্নতা প্রকাশ করেননি এবং কখনো আমাকে বলেননি, তুমি এটা কেন করলে অথবা এটা কেন করলে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وأصلہ عند البخاري (6038) ومسلم (2309)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه بنحوه البخاري (٦٠٣٨) من طريق سلام بن مسكين، ومسلم (٢٣٠٩) من طريق حماد بن زيد، والترمذي -وفيه زيادة- (٢١٣٤) من طريق جعفر بن سليمان، ثلاثتهم، عن ثابت، عن أنس. وهو في "مسند أحمد" (١٣٠٢١) و (١٣٥٣٤)، و"صحيح ابن حبان" (٢٨٩٣) و (٢٨٩٤). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (4775)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ هِلاَلٍ، سَمِعَ أَبَاهُ، يُحَدِّثُ قَالَ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ وَهُوَ يُحَدِّثُنَا كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَجْلِسُ مَعَنَا فِي الْمَجْلِسِ يُحَدِّثُنَا فَإِذَا قَامَ قُمْنَا قِيَامًا حَتَّى نَرَاهُ قَدْ دَخَلَ بَعْضَ بُيُوتِ أَزْوَاجِهِ فَحَدَّثَنَا يَوْمًا فَقُمْنَا حِينَ قَامَ فَنَظَرْنَا إِلَى أَعْرَابِيٍّ قَدْ أَدْرَكَهُ فَجَبَذَهُ بِرِدَائِهِ فَحَمَّرَ رَقَبَتَهُ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ وَكَانَ رِدَاءً خَشِنًا فَالْتَفَتَ فَقَالَ لَهُ الأَعْرَابِيُّ احْمِلْ لِي عَلَى بَعِيرَىَّ هَذَيْنِ فَإِنَّكَ لاَ تَحْمِلُ لِي مِنْ مَالِكَ وَلاَ مِنْ مَالِ أَبِيكَ ‏.‏ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لاَ وَأَسْتَغْفِرُ اللَّهَ لاَ وَأَسْتَغْفِرُ اللَّهَ لاَ وَأَسْتَغْفِرُ اللَّهَ لاَ أَحْمِلُ لَكَ حَتَّى تُقِيدَنِي مِنْ جَبْذَتِكَ الَّتِي جَبَذْتَنِي ‏"‏ ‏.‏ فَكُلُّ ذَلِكَ يَقُولُ لَهُ الأَعْرَابِيُّ وَاللَّهِ لاَ أَقِيدُكَهَا ‏.‏ فَذَكَرَ الْحَدِيثَ قَالَ ثُمَّ دَعَا رَجُلاً فَقَالَ لَهُ ‏"‏ احْمِلْ لَهُ عَلَى بَعِيرَيْهِ هَذَيْنِ عَلَى بَعِيرٍ شَعِيرًا وَعَلَى الآخَرِ تَمْرًا ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ الْتَفَتَ إِلَيْنَا فَقَالَ ‏"‏ انْصَرِفُوا عَلَى بَرَكَةِ اللَّهِ تَعَالَى ‏"‏ ‏.




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সঙ্গে মাসজিদে বসে কথাবার্তা বলতেন। অতঃপর তিনি উঠে গেলে আমরাও দাড়াঁতাম এবং তিনি তাঁর কোন স্ত্রীর ঘরে প্রবেশ না করা পর্যন্ত দাঁড়িয়ে থাকতাম। একদিন তিনি আমাদের সঙ্গে কথাবার্তা বলছিলেন এবং তিনি দাঁড়ালে আমরাও তার সঙ্গে দাঁড়ালাম। দেখলাম যে, জনৈক বেদুঈন তাকে নাগালে পেয়ে তাঁর চাদরটা ধরে এমন টান দিলো যে, তাঁর ঘাড় লাল হয়ে গেলো। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন তার চাদরটা ছিলো খসখসে। তিনি ফিরে তাকালেন। বেদুঈন তাকে বললো, এ দুই উটের বোঝা পরিমান খাদ্য আমাকে দাও। কারন তুমি তো তোমার নিজের সম্পদ হতেও দিচ্ছো না আর তোমার বাবার সম্পদ হতেও দিচ্ছো না। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেনঃ না, আমি আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাচ্ছি ; না, আমি আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাচ্ছি ; না, আমি আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাচ্ছি। তুমি আমাকে যে জোরে টান দিয়েছো, তুমি তোমার উপর আমাকে তার প্রতিশোধ নেয়ার সুযোগ না দেয়া পর্যন্ত আমি তোমাকে কিছুই দিবো না। বেদুঈন বারবার বলছিলো, আল্লাহর কসম ! আমি আপনাকে তার প্রতিশোধ নেবার সুযোগ দিবো না। অতঃপর বর্ণনাকারী এ হাদীস বর্ণনা করেন। অতঃপর তিনি একটি লোককে ডেকে এনে বললেনঃ তার এ দুই উটের একটিতে যব এবং ওপরটিতে খেজুর বোঝাই করে দিয়ে দাও। অতঃপর তিনি বললেন, তোমরা আল্লাহর কল্যান নিয়ে প্রত্যাবর্তন করো। [৪৭৭৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4780) ، ھلال مستور (مجہول الحال) ، (انوار الصحیفہ ص 166)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: هلال والد محمَّد -وهو هلال بن أبي هلال المدني- روى عن أبي هريرة وأبيه أبي هلال المدني وميمونة بنت سعد خادم النبي-ﷺ، وروى عنه ابنه محمَّد بن هلال المدني وخالد بن سعيد بن أبي مريم وذكره ابن حبان في الثقات وباقي رجاله ثقات. أبو عامر: هو مالك بن عمرو. ولقصة الأعرابي شاهد صحيح من حديث أنس عند أحمد (١٢٥٤٨)، والبخاري (٣١٤٩)، ومسلم (١٠٥٧) ولفظه عن أنس قال: كنت أمشي مع رسول الله ﷺ وعليه رداء نجراني غليظ الحاشية، فأدركه أعرابي فجبذه بردائه جبذة شديدة نظرتُ إلى صفحة عنق رسول الله ﷺ، وقد أثرت بها حاشية الرداء من شدة جبذته، ثم قال: يا محمَّد مُرْ لي من مال الله الذي عندك، فالتفت إليه رسول الله ﷺ، فضحك، ثم أمر له بعطاء. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٧٨٦٩) عن زيد بن الحباب، والنسائي في "الكبرى" (٦٩٥٢) من طريق عبد الله بن مسلمة، كلاهما عن محمَّد بن هلال، بهذا الإسناد. وقوله: فذكر الحديث: تمامه عند النسائي في روايته: فلما سمعنا قول الأعرابي، أقبلنا إليه سراعا، فالتفت إلينا رسول الله ﷺ، فقال: "عزَمْتُ على من سمع كلأمي أن لا يبرَحَ مقامه حتى آذن له". وقوله: " فجبذه بردائه"، قال ابن الأثير في "النهاية"، الجبْذُ: لغة في الجذْبِ، وقيل: هو مقلوب.









সুনান আবী দাউদ (4776)


حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا قَابُوسُ بْنُ أَبِي ظَبْيَانَ، أَنَّ أَبَاهُ، حَدَّثَهُ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبَّاسٍ، أَنَّ نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِنَّ الْهَدْىَ الصَّالِحَ وَالسَّمْتَ الصَّالِحَ وَالاِقْتِصَادَ جُزْءٌ مِنْ خَمْسَةٍ وَعِشْرِينَ جُزْءًا مِنَ النُّبُوَّةِ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ উত্তম পথ , গাম্ভীর্যপূর্ণ উত্তম আচরণ এবং পরিমিতিবোধ নবুওয়্যাতের পচিশঁ ভাগের এক ভাগ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (5059، 5060) ، ولہ شاھد عند الترمذي (2010 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، قابوس بن أبي ظبيان ليِّن، وباقي رجاله ثقات. زهير: هو ابن معاوية. والنفيلي: هو عبد الله بن محمَّد بن نفيل. وعند البيهقي في "الآداب" (١٧٤) من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٢٦٩٨) عن الحسن، والبخاري في "الأدب المفرد" (٤٦٨)، وبإثر (٧٩١)، والطبرآني في "الكبير" (١٢٦٠٨)، والبيهقي في "السنن" ١٠/ ١٩٤، وفي "الشعب" (٦٥٥٥) و (٨٠١٠) من طريق أحمد بن يونس، كلاهما (الحسن وأحمد بن يونس) عن زهير بن معاوية، به. وأخرجه البخاري في "الأدب" (٧٩١) من طريق عبيدة بن حميد، والطبراني (١٢٦٠٩)، والبيهقي في الشعب، (٨٤٢٠) من طريق سفيان الثوري، وأبو نعيم في "الحلية" ٧/ ٢٦٣ من طريق مسعر، ثلاثتهم عن قابوس، به. وأخرجه القضاعي في "مسند الشهاب" (٣٠٦) من طريق سالم بن أبي الجعد، عن غريب، عن ابن عباس قال: قال رسول الله ﷺ: "التؤدة والاقتصاد والتثبتُ والصمتُ جُزءٌ من ستة وعشرين جزءاً من النبوة". وأورده مالك في "الموطأ" بلاغاً ٢/ ٩٥٤ - ٩٥٥ عن ابن عباس أنه كان يقول: القصد والتؤدة وحسن السمت، جزء من خمسة وعشرين جزءاً من النبوة، فجعله موقوفاً على ابن عباس. وله شاهد بإسناد حسن من حديث عبد الله بن سرجس، أخرجه الترمذي في "سننه" (٢١٢٨) بلفظ: "السمتُ الحسنُ والتُؤَدَةُ والاقتصادُ جزءُ من أربعةٍ وعشرين جُزءاً من النبوّة". وقال الخطابي في" معالم السنن" ٤/ ١٠٦: هدي الرجل: حاله ومذهبه، وكذلك سمتُه. وأصل السمت: الطريق المنقاد. والاقتصاد: سلوك القصد في الأمر والدخول فيه برفق وعلى سبيل يمكن الدوامُ عليه كما روي أنه قال: "خير الأعمال أدومها وإن قل". يريد أن هذه الخلال من شمائل الأنبياء صلوات الله عليهم، ومن الخصال المعدودة من خصالهم، وأنها جزء من أجزاء فضائلهم، فاقتدوا بهم وتابعوهم عليها. وليس معنى الحديث أن النبوة تتجزأ ولا أن من جمع هذه الخلال كان فيه جزء من النبوة مكتسبة ولا مجتلبة بالاسباب، وإنما هي كرامة ملأ الله سبحانه وخصوصية لمن أراد إكرامه بها من عباده: ﴿اللَّهُ أَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِسَالَتَهُ﴾ [الأنعام: ١٢٤] وقد انقطعت النبوة بموت النبي ﷺ. وفيه وجه آخر وهو أن يكون معنى النبوة هاهنا: ما جاءت به النبوة ودعت إليه الأنبياء صلوات الله عليهم. يريد أن هذه الخلال جزء من خمسة وعشرين جزءاً مما جاءت به النبوات ودعا إليه الأنبياء صلوات الله عليهم. وقد أمرنا باتباعهم في قوله ﷿: ﴿فَبِهُدَاهُمُ اقْتَدِهْ﴾ [الأنعام:٩٠]. وقد يحتمل وجهاً آخر، وهو أن من اجتمعت له هذه الخلال لقيه الناس بالتعظيم والتوقير وألبسه الله لباس التقوى الذي يلبسه أنبياءه، فكأنها جزء من النبوة. والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (4777)


حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ سَعِيدٍ، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي أَيُّوبَ - عَنْ أَبِي مَرْحُومٍ، عَنْ سَهْلِ بْنِ مُعَاذٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ كَظَمَ غَيْظًا - وَهُوَ قَادِرٌ عَلَى أَنْ يُنْفِذَهُ - دَعَاهُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ عَلَى رُءُوسِ الْخَلاَئِقِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حَتَّى يُخَيِّرَهُ اللَّهُ مِنَ الْحُورِ مَا شَاءَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ اسْمُ أَبِي مَرْحُومٍ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَيْمُونٍ ‏.‏




সাহল ইবনু মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তাঁর পিতা হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যাক্তি তাঁর রাগ প্রয়োগের ক্ষমতা থাকা সত্বেও সংযত থাকে, ক্বিয়ামাদের দিন আল্লাহ তাকে সকল সৃষ্টিকুলের মধ্য হতে ডেকে নিবেন এবং তাকে হুরদের মধ্য হতে তাঁর পছন্দমত যে কোন একজনকে বেছে নেয়ার স্বাধীনতা দিবেন। [৪৭৭৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (5088) ، أخرجہ ابن ماجہ (4186 وسندہ حسن، عبد اللہ بن وھب صرح بالسماع عندہ)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل أبي مرحوم -واسمه عبد الرحيم بن ميمون- وسهل ابن معاذ بن أنس، وباقي رجاله ثقات. وابن السّرْح: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله ابن عمرو بن السرح. وأخرجه ابن ماجه (٤١٨٦) عن حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (٢١٤٠) و (٢٦٦١) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، عن سيد بن أبي أيوب، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٦١٩) و (١٥٦٣٧). وانظر الحديث الآتي بعد هذا. وقوله: "من كظم غيظه"، قال السندي؛ أي: حبس نفسه عن إجراء مقتضاه. "وهو قادر على أن ينفذه"، قال السندي، أي: وهو قادر على أن يأتي بمقتضاه. وفيه أنه إنما يحمدُ القادر على إجراء مقتضاه، وغيره يكظم جبراً، لكن إن ترك الانتقام لميل طبعه إلى المسامحة والتحمل حتى لو قدر لترك أيضاً -لا لعدم القدرة- فهو ممن يرجى له ذلك.









সুনান আবী দাউদ (4778)


حَدَّثَنَا عُقْبَةُ بْنُ مُكْرَمٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، - يَعْنِي ابْنَ مَهْدِيٍّ - عَنْ بِشْرٍ، - يَعْنِي ابْنَ مَنْصُورٍ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَجْلاَنَ، عَنْ سُوَيْدِ بْنِ وَهْبٍ، عَنْ رَجُلٍ، مِنْ أَبْنَاءِ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم عَنْ أَبِيهِ قَالَ - قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَحْوَهُ قَالَ ‏"‏ مَلأَهُ اللَّهُ أَمْنًا وَإِيمَانًا ‏"‏ ‏.‏ لَمْ يَذْكُرْ قِصَّةَ ‏"‏ دَعَاهُ اللَّهُ ‏"‏ ‏.‏ زَادَ ‏"‏ وَمَنْ تَرَكَ لُبْسَ ثَوْبِ جَمَالٍ وَهُوَ يَقْدِرُ عَلَيْهِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ بِشْرٌ أَحْسِبُهُ قَالَ ‏"‏ تَوَاضُعًا كَسَاهُ اللَّهُ حُلَّةَ الْكَرَامَةِ وَمَنْ زَوَّجَ لِلَّهِ تَعَالَى تَوَّجَهُ اللَّهُ تَاجَ الْمُلْكِ ‏"‏ ‏.‏




নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর জনৈক সাহাবীর পুত্র হতে তার পিতার সুত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন ---পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরুপ। তারপর আখিরাতে আল্লাহ তাকে ডাকবেন, এর স্হানে বলেন, আল্লাহ তাকে শাস্তি ও ঈমানের দ্বারা পরিপূর্ণ করবেন। তারপর বলেন যে ব্যক্তি সামর্থ্য থাকা সত্ত্বেও সৌন্দর্যবর্ধক পোশাক পরা হতে বিরত থাকে এবং বর্ণনাকারী বিশর বলেন, আমার ধারনা তিনি নম্রতা পরিত্যাগের কথা বলেছেন , আল্লাহ তাকে সন্মানের পোশাক পরিধান করাবেন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর জন্য বিবাহ করবে আল্লাহর তাকে রাজমুকুট পরিধান করাবেন। ৪৭৭৭



দূর্বল। মিশকাত হা / ৫০৮৯।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن عجلان عنعن وشیخہ سوید بن وھب مجہول (تق: 2701) ، (انوار الصحیفہ ص 166)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة الرجل من أبناء الصحابة. وهو عند البيهقي في "الشعب" (٨٣٥٤) من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه القضاعي في" مسند الشهاب" (٤٣٧) من طريق عبد الرحمن بن محمَّد ابن منصور، عن عبد الرحمن بن مهدي، به. وللقسم الأول شاهد من حديث معاذ بن أنس وهو الحديث السالف برقم (٤٧٧٧). وسنده حسن. وللقسم الثاني شاهد عند أحمد (١٥٦٣١)، والترمذي (٢٦٤٨) من طريق سعيد ابن أبي أيوب، عن أبي مرحوم عبد الرحيم بن ميمون، عن سهل بن معاذ بن أنس، عن أبيه معاذ قال: قال رسول الله ﷺ: "من ترك اللباس وهو يقدر عليه تواضعا لله ﵎، دعاه الله ﵎ يوم القيامة على رؤوس الخلائق حتى يخيره من أيِّ حلل الإيمان شاء". وسنده حسن. وانظر تمام تخريجه في "المسند". وأخرجه بطوله أحمد في "مسنده" (١٥٦١٩) من طريق عبد الله بن لهيعة، عن زبان بن فائد، عن سهل بن معاذ، عن أبيه معاذ، عن رسول الله ﷺ أنه قال: "من كظم غيظه … ، إلى أن قال: " ومن ترك أن يلبس صالح الثياب، وهو يقدر عليه، تواضعاً له ﵎، دعاه الله ﵎ على رؤوس الخلائق حتى يُخيِّره في حُلَلِ الإيمان أيتهن شاء". وهو حديث حسن في الشواهد والمتابعات. وانظر تمام تخريجه فيه.









সুনান আবী দাউদ (4779)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيِّ، عَنِ الْحَارِثِ بْنِ سُوَيْدٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ مَا تَعُدُّونَ الصُّرَعَةَ فِيكُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا الَّذِي لاَ يَصْرَعُهُ الرِّجَالُ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ لاَ وَلَكِنَّهُ الَّذِي يَمْلِكُ نَفْسَهُ عِنْدَ الْغَضَبِ ‏"‏ ‏.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন একদা রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তোমাদের মধ্যকার কোনো ব্যক্তিকে তোমরা বড় বীর মনে করো? সাহাবীগন বললেন, যাকে কেউ যুদ্ধে হারাতে পারে না। রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ না , বরং প্রকৃত বীর হলো সেই ব্যক্তি যে রাগের সময় নিজেকে সংযত রাখতে পারে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2608)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم، والأعمش: هو سليمان ابن مهران، وإبراهيم التيمي: هو ابن يزيد. وأخرجه مسلم (٢٦٠٨) عن أبي بكر بن أبي شيبة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٢٦٠٨) عن أبي غريب، عن أبي معاوية، به. وأخرجه مسلم (٢٦٠٨) من طريق جرير، و (٢٦٥٨) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن الأعمش، به. وعند مسلم في أوله زيادة. وهو في "مسند أحمد" (٣٦٢٦)، و"صحيح ابن جان" (٢٩٥٠) و (٥٦٩١). وقوله:"الصُّرَعة"، قال ابن الأثير في "النهاية"، بضم الصاد وفتح الرَّاء: المبالغُ في الصِّرَاع الذي لا يُغلَب، فنقلَه إلى الذي يَغلِبُ نفسَه عند الغضب ويقهرُها، فإنه إذا مَلَكها كان قد قَهَرَ أقوى أعدائه وشر خُصومه، ولذلك قال: "أعدى عَدُوّ لك نفسك التي بين جنبيك". وهذا من الألفاظ التي نُقِلَت عن وضعِها اللغويّ، لضَرب من التَّوسُّع والمجاز، وهو من فصيح الكلام؛ لأنه لما كان الغضبان بحالة شديدة من الغيظ، وقد ثارت عليه شهوةُ الغضب، فقَهَرها بحِلْمِه، وصَرَعها بثَباته، كان كالصُّرعة الذي يصرع الرجالَ ولا يَصرعونه.









সুনান আবী দাউদ (4780)


حَدَّثَنَا يُوسُفُ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا جَرِيرُ بْنُ عَبْدِ الْحَمِيدِ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ عُمَيْرٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنْ مُعَاذِ بْنِ جَبَلٍ، قَالَ اسْتَبَّ رَجُلاَنِ عِنْدَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَغَضِبَ أَحَدُهُمَا غَضَبًا شَدِيدًا حَتَّى خُيِّلَ إِلَىَّ أَنَّ أَنْفَهُ يَتَمَزَّعُ مِنْ شِدَّةِ غَضَبِهِ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنِّي لأَعْلَمُ كَلِمَةً لَوْ قَالَهَا لَذَهَبَ عَنْهُ مَا يَجِدُهُ مِنَ الْغَضَبِ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ مَا هِيَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ ‏"‏ يَقُولُ اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَجَعَلَ مُعَاذٌ يَأْمُرُهُ فَأَبَى وَمَحِكَ وَجَعَلَ يَزْدَادُ غَضَبًا ‏.




মু’আয ইবনু জালাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন , দুই ব্যক্তি রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে পরস্পরকে গালি দিতে লাগলো। তাদের একজন এতটা রাগাম্বিত হলো যে, মনে হচ্ছিল, রাগের প্রচন্ডতায় তার নাক ফেটে যাবে। রাসুলাল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেনঃ আমি এমন একটি বাক্য জানি যা বললে রাগের প্রতিক্রিয়া চলে যাবে। তখন মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন , হে আল্লাহর রাসুল ! তা কি? তিনি বললেন, “ সে বলবে : হে আল্লাহ ! আমি আপনার নিকট অভিশপ্ত শয়তান হতে আশ্রয় চাইছি।“ আবদুর রহমান বলেন, তখন মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে তা পরার তাকিদ দিতে থাকলেন। কিন্তু সে তা পরতে সম্মত হলো না এবং ঝগড়া করতে থাকলো এবং তার রাগ আরো বৃদ্ধি পেলো।৪৭৭৯



দূর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * سندہ ضعیف ، ترمذی (3452) ، عبد الرحمٰن بن أبي لیلی لم یدرک سیدنا معاذ بن جبل رضي اللّٰہ عنہ ، و للحدیث شاھد ضعیف عند النسائي فی الکبری (10223) فیہ عبد الملک بن عمیر مدلس و عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 166)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أن فيه انقطاعاً بين عبد الرحمن ابن أبي ليلى ومعاذ بن جبل. وقد اخلف فيه على عبد الملك بن عمير، فرواه مرة من حديث معاذ بن جبل، ومرة من حديث أبي بن كعب كما سيأتي في التخريج. وأخرجه الترمذي (٣٧٥٤) و (٣٧٥٥)، والنسائي في "الكبرى" من كتاب عمل اليوم والليلة (١٠١٤٩) من طريق سفيان، والنسائي كذلك (١٠١٥٠) من طريق زائدة، كلاهما عن عبد الملك بن عمير، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٠٨٦). وأخرجه النسائي في "الكبرى" من كتاب عمل اليوم والليلة (١٠١٥١) عن يوسف ابن عيسى، عن الفضل بن موسى، عن يزيد بن زياد، عن عبد الملك بن عمير، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبي بن كعب. فجعل أُبياً مكان معاذ. وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الشيخين غير يزيد بن زياد، وهو ابن أبي الجعد، فقد روى له البخاري في "خلق أفعال العباد" والنسائي وابن ماجه، وهو صدوق حسن الحديث، وقال المنذري: والحديث من طريق عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبي بن كعب متصل. ويشهد له حديث سليمان بن صرد الآتي بعده. وهو متفق عليه. وقوله: " أنفه يتمزّع"، قال ابن الأثير في "النهاية"، أي: يتقَطَّعُ ويتشقّق غضباً. وقوله:" فأبى ومَحِك"، قال في "اللسان"، المَحكُ: المُشارّة والمنازعة في الكلام. والمَحْك: التمادي في اللجاجَة عند المُساومة والغضب ونحو ذلك. والمُماحَكة: المُلاجَّة. وفيه أن الغضب في غير ذات الله من نزغ الشيطان، وأن من استعاذ من الشيطان كُفَيَهُ، وسكن غضبه.