হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (4895)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَفْصٍ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي، حَدَّثَنِي إِبْرَاهِيمُ بْنُ طَهْمَانَ، عَنِ الْحَجَّاجِ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ عِيَاضِ بْنِ حِمَارٍ، أَنَّهُ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّ اللَّهَ أَوْحَى إِلَىَّ أَنْ تَوَاضَعُوا حَتَّى لاَ يَبْغِيَ أَحَدٌ عَلَى أَحَدٍ وَلاَ يَفْخَرَ أَحَدٌ عَلَى أَحَدٍ ‏"‏ ‏.‏




ইয়াদ ইবনু হিমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মহান আল্লাহ আমার নিকট (এ মর্মে) ওয়াহী পাঠিয়েছেন যে, তোমরা বিনয়ী হও, যতোক্ষণ না একে অপরের উপর যুলুম করে এবং অহংকার করে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، رواہ مسلم (2865)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. والد أحمد هو حفص بن عبد الله بن راشد، والحجاج: هو ابن الحجاج الباهلي، وقتادة: هو ابن دِعامة السدوسي. وأخرجه مسلم (٢٨٦٥) ضمن حديث، وابن ماجه (٤١٧٩) من طريق مطر بن طهمان الرزاق، عن قتادة، بهذا الإسناد، وهذا عند حسن في المتابعات.









সুনান আবী দাউদ (4896)


حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ حَمَّادٍ، أَخْبَرَنَا اللَّيْثُ، عَنْ سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيِّ، عَنْ بَشِيرِ بْنِ الْمُحَرَّرِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، أَنَّهُ قَالَ بَيْنَمَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم جَالِسٌ وَمَعَهُ أَصْحَابُهُ وَقَعَ رَجُلٌ بِأَبِي بَكْرٍ فَآذَاهُ فَصَمَتَ عنه أَبُو بَكْرٍ ثُمَّ آذَاهُ الثَّانِيَةَ فَصَمَتَ عَنْهُ أَبُو بَكْرٍ ثُمَّ آذَاهُ الثَّالِثَةَ فَانْتَصَرَ مِنْهُ أَبُو بَكْرٍ فَقَامَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ انْتَصَرَ أَبُو بَكْرٍ فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ أَوَجَدْتَ عَلَىَّ يَا رَسُولَ اللَّهِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ نَزَلَ مَلَكٌ مِنَ السَّمَاءِ يُكَذِّبُهُ بِمَا قَالَ لَكَ فَلَمَّا انْتَصَرْتَ وَقَعَ الشَّيْطَانُ فَلَمْ أَكُنْ لأَجْلِسَ إِذْ وَقَعَ الشَّيْطَانُ ‏"‏ ‏.




সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদেরকে নিয়ে বসা ছিলেন। এ সময় এক লোক আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে গালি দিলো এবং কষ্ট দিলো, কিন্তু আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কোন জবাব না দিয়ে চুপ করে রইলেন। অতঃপর পুনরায় সে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে গালি দিলো এবং কষ্ট দিলো, কিন্তু তিনি কোন জবাব না দিয়ে চুপ করে রইলেন। তৃতীয়বার সে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে গালি এবং কষ্ট দিলে এবার তিনি তার প্রতিশোধ নিলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন প্রতিশোধ নিলেন তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠে দাঁড়ালেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি আমার উপর রাগ করেছেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আসমান হতে একজন ফেরেশতা নেমে ছিলেন এবং তোমার পক্ষ হয়ে জবাব দিচ্ছিলেন। কিন্তু যখন তুমি তার প্রতিশোধ নিলে তখন শয়তান এখানে উপস্থিত হয়েছে। শয়তান এখানে উপস্থিত হওয়ায় আমি আর বসতে পারি না। [৪৮৯৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن لغيره




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، الحدیث الآتي (4897) شاھد لہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن لغيره وهذا إسناد ضعيف لجهالة حال بشير بن المحرر راويه عن سعيد بن المسيب، ثم إنه مرسل، وسيأتي عند المصنف من طريق آخر موصول بعد هذا. والليث: هو ابن سعد. وأخرجه البيهقي في "الشعب" (٦٦٦٩)، وفي الآداب" (١٥٠) من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرجه موصولاً بسند ضعيف الطبراني في "الأوسط" (٧٢٣٩) من طريق القاسم ابن دينار، حدَّثنا حسين بن علي الجعفي، قال: حدَّثنا سفيان بن عيينة، قال: حدَّثنا علي بن زيد بن جدعان، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن علي بن زيد إلا سفيان بن عيينة، ولا رواه عن سفيان إلا حسين الجعفي، تفرد به القاسم بن دينار، ورواه الناس عن سفيان بن عيينة، عن ابن عجلان، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة (وستأتي عند المصنف بعد هذا)، فإن كان حسين الجعفي حفظه، فهو غريب من حديث علي بن زيد، عن ابن المسيب. انتهى. وعلي بن زيد بن جدعان: ضعيف. وفي الباب عن النعمان بن مقرن، عند أحمد في "مسنده" (٢٣٧٤٥). بإسناده منقطع. ومع ذلك فقد حسن الحافظ ابن كثير إسناده في "تفسيره " ٦/ ١٣٢. وعن ابن عباس عند البخاري في "الأدب المفرد" (٤١٩)، وفي سنده ضعف. ولم يسم في روايتهما من وقع عليه السب. وعن زيد بن أثيع مرسلاً عند عبد الرزاق في مصنفه، (٢٠٢٥٥) ورجاله ثقات. وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (4897)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الأَعْلَى بْنُ حَمَّادٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ ابْنِ عَجْلاَنَ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَجُلاً، كَانَ يَسُبُّ أَبَا بَكْرٍ وَسَاقَ نَحْوَهُ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رَوَاهُ صَفْوَانُ بْنُ عِيسَى عَنِ ابْنِ عَجْلاَنَ، كَمَا قَالَ سُفْيَانُ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে গালি দিচ্ছিল... অতঃপর পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (5102) ، محمد بن عجلان صرح بالسماع عند أحمد (2/436)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وقد خولف ابن عجلان -وهو محمَّد- في إسناد الحديث، فقد رواه الليث بن سعد، عن سعيد المقبري، عن بشير بن المحرّر. عن سعيد بن المسيب مرسلاً كما في الرواية السالفة عند المصنف، وقد رجح البخاري في التاريخ ٢/ ١٠٢ والدارقطني في "العلل" ٨/ ١٥٣ هذه الرواية المرسلة، وإن الليث أصح الناس رواية عن المقبري، وأما ابن عجلان فيقع له في أحاديثه عن سعيد المقبري بعض الأوهام، لكن للحديث متابعات وشواهد تنهض به إلى التحين. وقد ذكرناها في الرواية السالفة. وسفيان: هو ابن عيينة. وهو عند البيهقي في "الشعب" بإثر (٦٦٦٩)، وفي الآداب" (١٥٠) من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرجه البغوي في "شرح السنة" (٣٥٨٦) من طريق علي بن المديني، عن سفيان بن عيينة، به. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٩٦٢٤)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (٨٢٠)، والبيهقي في "السنن" ١٠/ ٢٣٦، وفي "الآداب" (١٤٩) من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن ابن عجلان، به. وعند بعضهم زيادة. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (4898)


حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا أَبِي ح، وَحَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ مُعَاذٍ، - الْمَعْنَى وَاحِدٌ - قَالَ حَدَّثَنَا ابْنُ عَوْنٍ، قَالَ كُنْتُ أَسْأَلُ عَنْ الاِنْتِصَارِ، ‏{‏ وَلَمَنِ انْتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِ فَأُولَئِكَ مَا عَلَيْهِمْ مِنْ سَبِيلٍ ‏}‏ فَحَدَّثَنِي عَلِيُّ بْنُ زَيْدِ بْنِ جُدْعَانَ عَنْ أُمِّ مُحَمَّدٍ امْرَأَةِ أَبِيهِ قَالَ ابْنُ عَوْنٍ وَزَعَمُوا أَنَّهَا كَانَتْ تَدْخُلُ عَلَى أُمِّ الْمُؤْمِنِينَ قَالَتْ قَالَتْ أُمُّ الْمُؤْمِنِينَ دَخَلَ عَلَىَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَعِنْدَنَا زَيْنَبُ بِنْتُ جَحْشٍ فَجَعَلَ يَصْنَعُ شَيْئًا بِيَدِهِ فَقُلْتُ بِيَدِهِ حَتَّى فَطَنْتُهُ لَهَا فَأَمْسَكَ وَأَقْبَلَتْ زَيْنَبُ تَقْحَمُ لِعَائِشَةَ رضى الله عنها فَنَهَاهَا فَأَبَتْ أَنْ تَنْتَهِيَ فَقَالَ لِعَائِشَةَ ‏"‏ سُبِّيهَا ‏"‏ فَسَبَّتْهَا فَغَلَبَتْهَا فَانْطَلَقَتْ زَيْنَبُ إِلَى عَلِيٍّ رضى الله عنه فَقَالَتْ إِنَّ عَائِشَةَ رضى الله عنها وَقَعَتْ بِكُمْ وَفَعَلَتْ ‏.‏ فَجَاءَتْ فَاطِمَةُ فَقَالَ لَهَا ‏"‏ إِنَّهَا حِبَّةُ أَبِيكِ وَرَبِّ الْكَعْبَةِ ‏"‏ ‏.‏ فَانْصَرَفَتْ فَقَالَتْ لَهُمْ إِنِّي قُلْتُ لَهُ كَذَا وَكَذَا فَقَالَ لِي كَذَا وَكَذَا ‏.‏ قَالَ وَجَاءَ عَلِيٌّ رضى الله عنه إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَكَلَّمَهُ فِي ذَلِكَ ‏.




ইবনু ‘আওন (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি প্রতিশোধ গ্রহণ ও আল্লাহর বাণী সম্পর্কে প্রশ্ন করতাম, “তবে নির্যাতিত হওয়ার পর যারা প্রতিশোধ নেয় তাদের বিরুদ্ধে কোন ব্যবস্থা নেয়া হবে না” (সূরাহ শূরাঃ ৪১)। ‘আলী ইবনু যায়িদ ইবনু জুদ’আন তার বিমাতা উম্মু মুহাম্মাদ সূত্রে আমার নিকট বর্ণনা করেন, ইবনু ‘আওন বলেন, তাদের বর্ণনানুযায়ী তার বিমাতা উম্মুল মু‘মিনীন ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট যাতায়াত করতেন। মুহাম্মাদ বলেন, উম্মুল মু‘মিনীন বলেছেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট আসলেন, তখন আমার নিকট যাইনাব বিনতু জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত দিয়ে কিছু করতে (আমাকে স্পর্শ করতে) চাইলেন। আমি হাতের ইশারায় যাইনাবের উপস্থিতি সম্পর্কে তাঁকে জানালাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেমে গেলেন। এরপর যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অগ্রসর হয়ে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে গালি দিতে লাগলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে গালি দিতে বারণ করলেন কিন্তু তিনি বিরত হলেন না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বললেন, তুমিও তাকে গালি দাও। তারপর ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও তাকে গালি দিলেন এবং তাকে পরাভূত করলেন। অতঃপর যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট গিয়ে অভিযোগ করলেন যে, ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তোমাদের গালি দিয়েছে এবং এ কাজ করেছে। অতঃপর ফাত্বিমাহ ফিরে গিয়ে তাদেরকে বললেন, আমি তাঁকে (আব্বাকে) এই এই কথা বলেছি এবং এর উত্তরে তিনি এই এই কথা বলেছেন। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে এ বিষয়ে আলোচনা করলেন। [৪৮৯৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، علي بن زید ضعیف وأمہ مجہولۃ کما قال المنذري رحمہ اﷲ(عون المعبود 426/4) ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف ومتنه منكر. علي بن زيد بن جدعان: ضعيف، وأم محمَّد مجهولة وهي زوجة زيد بن جدعان. وابن عون: هو عبد الله. وأخرجه مختصراً أحمد في "مسنده" (٢٤٩٨٧) عن أزهر، عن ابن عون، بهذا الأسناد. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٢٤٩٨٦) من طريق سليم بن أخضر، عن ابن عون، به. وجعل فيها أن أم سلمة هي التي تساببت مع عائشة وليست زينب. وهو خطاً. قلنا: وأخرج البخاري (٢٥٨١)، وابن ماجه (١٩٨١)، والنسائي في "الكبرى" (٨٨٦٥) و (٨٨٦٦) و (١١٤١٢) من طريق عروة بن الزبير، ومسلم (٢٤٤٢) من طريق محمَّد بن عبد الرحمن بن الحارث، كلاهما عن عائشة. ولفظ البخاري ضمن حديث مطول: فأرسلن زينبَ بنت جحش، فأتته فأغْلَظَت، وقالت: إن نساءك ينشدنك الله العَدْلَ في بنت ابن أبي قحافة؟ فرفعت صوتها حتىِ تناولت عائشة وهي قاعدة فسبَتَّها، حتى إن رسولَ الله ﷺ لينظرُ إلى عائشة هل تكلْمُ، قال: فتكلمتْ عائشةُ ترُدُّ؟ على زينب حتى أسكتَتْها، قالت: فنظَرَ النبيَّ- ﷺ إلى عائشة؟ وقال: "إنّها بنت أبي بكر". ولفظ مسلم بنحوه ورواية ابن ماجه والنسائي مختصرة. وانظرا مسند" الإِمام أحمد حديث رقم (٢٤٥٧٥) و (٢٤٦٢٠). وقوله: "فجعل يصنع شيئاً بيده"، قال صاحب "عون المعبود": أي من المس ونحوه مما يجري بين الزوج والزوجة. حتى فَطَّنتُهُ لها: من التفطين، أي: أعلمته بوجود زينب. تَقَحَّم، قال الخطابي في "معالم السنن"، معناه: تعرض لشتمها وتتدخل عليها، ومنه قولهم، فلان يتقحم في الأمور إذا كان يقع فيها من غير تثبت ولا روية. وفيه من العلم: إباحة الانتصار بالقول ممن سبَّك من غير عدوان في الجواب.









সুনান আবী দাউদ (4899)


حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِذَا مَاتَ صَاحِبُكُمْ فَدَعُوهُ لاَ تَقَعُوا فِيهِ ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কোন সঙ্গী মারা গেলে তাঁকে ছেড়ে দাও এবং তার সম্পর্কে কটুক্তি করো না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وكيع: هو ابن الجراح. وأخرجه ابن حبان في "صحيحه" (٣٠١٩) من طريق يحيى بن معين، عن وكيع، بهذا الإسناد. دون قوله: "ولا تقعوا فيه". وأخرجه الطيالسي في "مسنده" (١٤٤٦) من طريق عبد الله بن عثمان، والدارمي في سننه" (٢٢٦٠)، والترمذي (٤٢٣٣)، وابن حبان (٣٠١٨) و (٤١٧٧) من طريق سفيان الثوري، وابن حبان (٣٠١٩) من طريق علي بن هاشم، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، به. وبعضهم زاد فيه وبعضهم اختصره. وجاء بلفظ: "لا تسبوا الأموات، فإنهم قد أفضوا إلى ما قَدَّموا"، أخرجه البخاري (١٣٩٣) و (٦٥١٦)، والنسائي في "الكبرى" (٢٠٧٤) من طريق مجاهد، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٤٧٠)، و "صحيح ابن حبان" (٣٠٢١). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٥٧٣) من طريق منصور بن عبد الرحمن، عن أمه، عن عائشة قالت ذكر عند النبي ﷺ هالكٌ بسوء، فقال: "لا تذكروا هلكاكم إلا بخير". وإسناده صحيح.









সুনান আবী দাউদ (4900)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، أَخْبَرَنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ هِشَامٍ، عَنْ عِمْرَانَ بْنِ أَنَسٍ الْمَكِّيِّ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ اذْكُرُوا مَحَاسِنَ مَوْتَاكُمْ وَكُفُّوا عَنْ مَسَاوِيهِمْ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা তোমাদের মৃত ব্যক্তিদের ভাল দিকগুলো আলোচনা করো এবং তাদের দোষচর্চা পরিহার করো। [৪৮৯৮]



দুর্বলঃ যঈফাহ হা/১৬৭৮।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1019) ، وقال البخاري:’’ عمران بن أنس المکي: منکر الحدیث ‘‘(سنن الترمذي: 1019) ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عمران بن أنس المكي، قال البخاري فيه: منكر الحديث. وأخرجه الترمذي (١٠٤٠)، وابن حبان في "صحيحه"، (٣٠٢٠) من طريق محمَّد ابن العلاء، بهذا الإسناد. ويشهد له حديث عائشة السالف قبله. وله شاهد آخر من حديث المغيرة بن شعبة، أخرجه أحمد في "مسنده" (١٨٢٠٩)، وابن حبان في "صحيحه" (٣٠٢٢). ولفظه: "لا تسبّوا الأموات، فتؤذوا الأحياء". وإسناده صحيح. وانظر تمام تخريجه فيهما. وثالث عند أحمد في "مسنده" (٢٧٣٤) من حديث ابن عباس، بلفظ: " … فلا تسبُّوا أمواتنا، فتؤذوا أحياءنا". وانظر تمام تخريجه والتعليق عليه فيه.









সুনান আবী দাউদ (4901)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ بْنِ سُفْيَانَ، أَخْبَرَنَا عَلِيُّ بْنُ ثَابِتٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ بْنِ عَمَّارٍ، قَالَ حَدَّثَنِي ضَمْضَمُ بْنُ جَوْسٍ، قَالَ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ كَانَ رَجُلاَنِ فِي بَنِي إِسْرَائِيلَ مُتَآخِيَيْنِ فَكَانَ أَحَدُهُمَا يُذْنِبُ وَالآخَرُ مُجْتَهِدٌ فِي الْعِبَادَةِ فَكَانَ لاَ يَزَالُ الْمُجْتَهِدُ يَرَى الآخَرَ عَلَى الذَّنْبِ فَيَقُولُ أَقْصِرْ ‏.‏ فَوَجَدَهُ يَوْمًا عَلَى ذَنْبٍ فَقَالَ لَهُ أَقْصِرْ فَقَالَ خَلِّنِي وَرَبِّي أَبُعِثْتَ عَلَىَّ رَقِيبًا فَقَالَ وَاللَّهِ لاَ يَغْفِرُ اللَّهُ لَكَ أَوْ لاَ يُدْخِلُكَ اللَّهُ الْجَنَّةَ ‏.‏ فَقُبِضَ أَرْوَاحُهُمَا فَاجْتَمَعَا عِنْدَ رَبِّ الْعَالَمِينَ فَقَالَ لِهَذَا الْمُجْتَهِدِ أَكُنْتَ بِي عَالِمًا أَوْ كُنْتَ عَلَى مَا فِي يَدِي قَادِرًا وَقَالَ لِلْمُذْنِبِ اذْهَبْ فَادْخُلِ الْجَنَّةَ بِرَحْمَتِي وَقَالَ لِلآخَرِ اذْهَبُوا بِهِ إِلَى النَّارِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَتَكَلَّمَ بِكَلِمَةٍ أَوْبَقَتْ دُنْيَاهُ وَآخِرَتَهُ ‏.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)কে বলতে শুনেছিঃ বনী ইসরাইলের মধ্যে দু’ব্যক্তি ছিল। তাদের একজন পাপ কাজ করতো এবং অন্যজন সর্বদা ‘ইবাদতে লিপ্ত থাকতো। যখনই ‘ইবাদতে রত ব্যক্তি অপর ব্যক্তিকে দেখতো তখনই তাকে খারাপ কাজ পরিহার করতে বলতো। একদিন সে তাকে পাপ কাজে লিপ্ত দেখে বললো, তুমি এমন কাজ হতে বিরত থাকো। সে বললো, আমাকে আমার রবের উপর ছেড়ে দাও। তোমাকে কি আমার উপর পাহারাদার করে পাঠানো হয়েছে? সে বললো, আল্লাহর কসম! আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করবেন না অথবা তোমাকে আল্লাহ জান্নাতে প্রবেশ করাবেন না। অতঃপর দু’জনকেই মৃত্যু দিয়ে আল্লাহর নিকট উপস্থিত করা হলে তিনি ‘ইবাদতগুজারী ব্যক্তিকে প্রশ্ন করলেন, তুমি কি আমার সম্পর্কে জানতে? অথবা তুমি কি আমার হাতে যা আছে তার উপর ক্ষমতাবান ছিলে? এবং পাপীকে বললেন, তুমি চলে যাও এবং আমার রহমতে জান্নাতে প্রবেশ করো। আর অপর ব্যক্তির ব্যাপারে তিনি বললেন, তোমরা একে জাহান্নামে নিয়ে যাও। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সেই মহান সত্তার কসম যার হাতে আমার জীবন! সে এমন উক্তি করেছে যার ফলে তার দুনিয়া ও আখিরাত উভয়ই বরবাদ হয়ে গেছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2347)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن، ومتنه غريب، تفرد به عكرمة بن عمار، وهو -وإن كان من رجال مسلم- فيه كلام ينزله عن رتبة الصحيح، وقد روى أحاديث غرائب لم يَشرَكه فيها أحدٌ. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٨٢٩٢) و (٨٧٤٩)، وابن أبي الدنيا في "حسن الظن بالله" (٤٥)، وابن حبان في "صحيحه" (٥٧١٢)، والبيهقي في "الشعب" (٦٦٨٩)، والمزي في "تهذيب الكمال" ١٣/ ٣٢٦ من طرق عن عكرمة بن عمار، بهذا الإسناد. وقول أبي هريرة في آخر الحديث: والذي نفسي بيده لتكلَّم بكلمة أوبقت دنياه وآخرته. جاء في رواية المزي منصوصاً عليه بأنه مرفرع. وفي السند عنده أبو جعفر موسى بن مسعود وفيه لين. والصواب أنه من قول أبي هريرة. وله شاهد من حديث أبي قتادة الأنصارى، أخرجه ابن أبو الدنيا في "حسن الظن" (٤٤)، والطبراني في "الشاميين" (٢٨١)، وأبو نعيم في "الحلية" ٨/ ٢٧٥، بإسناده ضعيف لجهالة الرجل من آل جبير بن مطعم راويه عن أبي قتادة. وفي الباب عن جندب بن عبد الله: أن رسول الله ﷺ حدَّث "أن رجلاً قال: والله لا يغفرُ الله لفلان. وإن الله تعالى قال: من ذا الذي يتألى عليَّ أن لا أغفر لفلانٍ، فإني قد غفرت لفلانٍ وأحبطتُ عمَلك". أو كما قال. أخرجه مسلم (٢٦٢١)، وهو عند ابن حبان في "صحيحه" (٥٧١١). وقوله: "مُتواخيين"، قال صاحب "عون المعبود"، أي: متقابلين في القصد والسعي، فهذا كان قاصداً وساعياً في الخير، وهذا كان قاصداً وساعياً في الشر. وقوله: "أقصر": من الاقصار، وهو الكف عن الشيء مع القدرة عليه. وقول أبي هريرة: "أوبقت ديناه وآخرته"، وأوبقت: أهلكت، وأراد أبو هريرة بالكلمة قوله: والله لا يغفر الله لك.









সুনান আবী দাউদ (4902)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ عُلَيَّةَ، عَنْ عُيَيْنَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي بَكْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَا مِنْ ذَنْبٍ أَجْدَرُ أَنْ يُعَجِّلَ اللَّهُ تَعَالَى لِصَاحِبِهِ الْعُقُوبَةَ فِي الدُّنْيَا - مَعَ مَا يَدَّخِرُ لَهُ فِي الآخِرَةِ - مِثْلُ الْبَغْىِ وَقَطِيعَةِ الرَّحِمِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মহান আল্লাহ বিদ্রোহী ও আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্নকারীর মত অন্য কাউকে দুনিয়াতে অতিদ্রুত আযাব দেয়ার পরও আখিরাতের আযাবও তার জন্য জমা করে রাখেননি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4932) ، أخرجہ الترمذي (2511 وسندہ صحیح) وابن ماجہ (4211 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن علية: هو إسماعيل بن إبراهيم بن مِقسَم، وعُلَية أمّه، ووالد عيينة: هو عبد الرحمن بن جوشن. وأخرجه ابن ماجه (٤٢١١) عن الحسين بن الحسن المروزي، والترمذي (٢٦٧٩) عن علي بن حجر، كلاهما عن ابن عُلية، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث صحيح. وأخرجه ابن ماجه (٤٢١١) من طريق عبد الله بن المبارك، عن عيينة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣٧٤) و (٢٠٣٩٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٥) و (٤٥٦). وانظر فيه حديث رقم (٤٤٠). أجدر: أولى وأحرى، والبغى: الظلم، وهو من الكبر، وقطيعة الرحم من الاقتطاع من الرحمة، والرحم: القرابة ولو غير محرم بنحو إيذاء أو صد أو هجر، أو يترك الإحسان إليهم، وفيه تنبيه على أن النبلاء بسبب القطيعة في الدنيا لا يدفع بلاء الآخرة.









সুনান আবী দাউদ (4903)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ صَالِحٍ الْبَغْدَادِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ، - يَعْنِي عَبْدَ الْمَلِكِ بْنَ عَمْرٍو - حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ بِلاَلٍ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ أَبِي أَسِيدٍ، عَنْ جَدِّهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏"‏ إِيَّاكُمْ وَالْحَسَدَ فَإِنَّ الْحَسَدَ يَأْكُلُ الْحَسَنَاتِ كَمَا تَأْكُلُ النَّارُ الْحَطَبَ ‏"‏ ‏.‏ أَوْ قَالَ ‏"‏ الْعُشْبَ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা অবশ্যই হিংসা পরিহার করবে। কারণ আগুন যেভাবে কাঠকে বা ঘাসকে খেয়ে ফেলে, তেমনি হিংসাও মানুষের নেক আমলকে খেয়ে ফেলে। [৪৯০১]



দুর্বলঃ যঈফাহ হা/১৯০২।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، جد إبراہیم بن أبي أسید لا یعرف (تق: 8503) ، وللحدیث شاہد ضعیف في سنن ابن ماجہ: 4210 ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة جد إبراهيم بن أبي أسيد، قال الحافظ في "التقريب": لا يعرف. وإبراهيم بن أبي أسيد: ضعيف يعتبر حديثه في المتابعات والشواهد. وذكر الحديث البخاري في "التاريخ الكبير" ١/ ٢٧٢ - ٢٧٣ وقال: لا يصح. وأخرجه عبد بن حميد في "مسنده" (١٤٣٠)، وابن عبد البر فى "التمهيد" ٦/ ١٢٤، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٦٦٠٨)، وفي (الآداب، (١٣٥) من طرق عن أبي عامر العقدي عبد الملك بن عمرو، بهذا الإسناد. وآخر عند المصنف وهو الحديث الآتي بعد هذا برقم (٤٩٠٤) عن أنس بن مالك. وإسناده محتمل للتحسين وله متابعات وشواهد. وانظر تخريجه فيه.









সুনান আবী দাউদ (4904)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي سَعِيدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي الْعَمْيَاءِ، أَنَّ سَهْلَ بْنَ أَبِي أُمَامَةَ، حَدَّثَهُ أَنَّهُ، دَخَلَ هُوَ وَأَبُوهُ عَلَى أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ بِالْمَدِينَةِ فِي زَمَانِ عُمَرَ بْنِ عَبْدِ الْعَزِيزِ وَهُوَ أَمِيرُ الْمَدِينَةِ فَإِذَا هُوَ يُصَلِّي صَلاَةً خَفِيفَةً دَقِيقَةً كَأَنَّهَا صَلاَةُ مُسَافِرٍ أَوْ قَرِيبًا مِنْهَا فَلَمَّا سَلَّمَ قَالَ أَبِي يَرْحَمُكَ اللَّهُ أَرَأَيْتَ هَذِهِ الصَّلاَةَ الْمَكْتُوبَةَ أَوْ شَىْءٌ تَنَفَّلْتَهُ قَالَ إِنَّهَا الْمَكْتُوبَةُ وَإِنَّهَا لَصَلاَةُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَا أَخْطَأْتُ إِلاَّ شَيْئًا سَهَوْتُ عَنْهُ - فَقَالَ - إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقُولُ ‏"‏ لاَ تُشَدِّدُوا عَلَى أَنْفُسِكُمْ فَيُشَدَّدَ عَلَيْكُمْ فَإِنَّ قَوْمًا شَدَّدُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ فَشَدَّدَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ فَتِلْكَ بَقَايَاهُمْ فِي الصَّوَامِعِ وَالدِّيَارِ ‏{‏ رَهْبَانِيَّةً ابْتَدَعُوهَا مَا كَتَبْنَاهَا عَلَيْهِمْ ‏}‏ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ غَدَا مِنَ الْغَدِ فَقَالَ أَلاَ تَرْكَبُ لِتَنْظُرَ وَلِتَعْتَبِرَ قَالَ نَعَمْ فَرَكِبُوا جَمِيعًا فَإِذَا هُمْ بِدِيَارٍ بَادَ أَهْلُهَا وَانْقَضَوْا وَفَنَوْا خَاوِيَةً عَلَى عُرُوشِهَا فَقَالَ ‏"‏ أَتَعْرِفُ هَذِهِ الدِّيَارَ ‏"‏ ‏.‏ فَقُلْتُ مَا أَعْرَفَنِي بِهَا وَبِأَهْلِهَا هَذِهِ دِيَارُ قَوْمٍ أَهْلَكَهُمُ الْبَغْىُ وَالْحَسَدُ إِنَّ الْحَسَدَ يُطْفِئُ نُورَ الْحَسَنَاتِ وَالْبَغْىُ يُصَدِّقُ ذَلِكَ أَوْ يُكَذِّبُهُ وَالْعَيْنُ تَزْنِي وَالْكَفُّ وَالْقَدَمُ وَالْجَسَدُ وَاللِّسَانُ وَالْفَرْجُ يُصَدِّقُ ذَلِكَ أَوْ يُكَذِّبُهُ ‏.‏




সাহল ইবনু আবূ উমামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি ও তার পিতা ‘উমার ইবনু ‘আবদুল ‘আযীযের সঙ্গে দেখা করেন। তিনি খুবই সংক্ষেপে সলাত আদায় করলেন, যেন তা মুসাফিরের সলাত বা প্রায় অনুরূপ। তিনি সালাম ফিরানোর পর আমার পিতা প্রশ্ন করলেন, আল্লাহ আপনার প্রতি সদয় হোন! আমাকে বলুন, এটা কি ফরয সলাত না নফল সলাত? তিনি বলেন, এটা ফরয সলাত এবং তা অবশ্যই রসুলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সলাত। আমি ভুল করিনি, তবে তার যতোটুকু বিস্মৃত হয়েছি। তিনি বলেন, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে বলতেনঃ তোমরা নিজেদের উপর কঠিন করো না; ফলে তোমাদের উপর কঠোরতা চাপিয়ে দেয়া হবে। অতীতে এক সম্প্রদায় নিজেদের জন্য কঠোরতা অবলম্বন করেছিল, ফলে আল্লাহও তাদের উপর কঠোর বিধান চাপিয়ে দেন। অতঃপর তাদের শেষ উত্তরসুরি দৃষ্টিগোচর হয় মাঠে ও নির্জন ঘরে। “কিন্তু সন্ন্যাসবাদ, তারা নিজেরাই তা আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য অবলম্বন করেছিল। আমি তাদেরকে এ বিধান দেইনি” (সূরাহ হাদীদঃ ২৭)। পরবর্তী দিন সকালে তিনি গিয়ে বল্লেন,উপদেশ গ্রহণ করতে পারো? অতএব তারা সদলবলে সফর করলেন এবং একটি এলাকায় পৌঁছালেন যার অধিবাসীরা ধবংসপ্রাপ্ত হয়েছে, অতীতের মধ্যে বিলীন হয়েছে এবং বাসস্থানের ছাদসহ ধবংসস্তূপে পরিণত হয়েছে। তিনি প্রশ্ন করলেন, তুমি কি এ জনপদ চিনতে পেরেছো? তিনি বলেন, এ হলো সেই জাতির জনপদ যাদের স্বৈরাচারীতা ও হিংসা-বিদ্বেষ তাদের ধবংস করেছে। নিশ্চয়ই হিংসা নেক কাজের নূরকে নিভিয়ে দেয় এবং স্বৈরাচার তাকে সত্যে বা মিথ্যায় পরিণত করে। চোখ যেনা করে এবং হাত-পা, শরীর, জবান ও লজ্জাস্থান তাকে বাস্তবায়িত করে অথবা ত্যাগ করে। [৪৯০২]



দুর্বলঃ যঈফাহ হা/৩৪৬৮।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سعید بن عبد الرحمٰن بن أبی العمیاء مقبول (تق: 2353) أي مجہول الحال،وثقہ ابن حبان وحدہ ولبعض الحدیث شاہد حسن عند البخاري فی التاریخ الکبیر (97/4) ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن لغيره، وهذا إسناد محتمل للتحسين، رجاله كلهم ثقات غير سعيد بن عبد الرحمن بن أبي العمياء، روى عن: سهل بن أبي أمامة والسائب بن مهجان المقدسي، وروى عنه: خالد بن حميد وعبد الله بن وهب، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال الحافظ في "التقريب": مقبول. قلنا: يعني عند المتابعة، إلا فلَين الحديث. كما نص عليه الحافظ في المقدمة "للتقريب". ولعظم الحديث شواهد متفرقة: فأخرجه أبو يعلى في "مسنده" (٣٦٩٤) عن أحمد بن عيسى المصري، عن عبد الله ابن وهب، بهذا الإسناد. وقال الهيثمي في "المجمع" ٦/ ٣٩٠: رواه أبو يعلى ورجاله رجال الصحيح غير سعيد بن عبد الرحمن بن أبي العمياء، وهو ثقة. وصحح إسناده البوصيري في "إتحاف الخيرة المهرة" ٥/ ٢٥٨. وأخرجه ابن ماجه (٤٢١٠)، وأبو يعلى (٣٦٥٦)، وابن عدى في "الكامل" ٥/ ١٨٨٧ والقضاعي في "مسند الشهاب" (١٠٤٩)، والخطيب في "الموضح" ١/ ١٤٦ من طريق ابن أبي فديك، عن عيسى بن أبي عيسى الحنَّاط، عن أبي الزناد، عن أنس. وعيسى: متروك. ولفظ ابن ماجه وأبي يعلى وابن عدي: "الحسد يأكل الحسنات كما تأكل النَّارُ الحطبَ، والصَّدَقة تُطفى الخطيئةَ كما يُطفئ الماءُ النار، والصلاة نورُ المؤمن، والصِّيامُ جُنَّةٌ من النار"، ولفظ القضاعي والخطيب: "إن الحسد يأكل الحسنات كما تأكل النار الحطب". وأخرجه الخطيب في "الموضح" أيضاً ١/ ١٤٧ بزيادة الشعبي في الإسناد بين أبي الزناد وأنس. وقال: لم يتابع يعقوب -وهو أحد رجال السند- أحد على هذا القول، والمحفوظ ما ذكرناه. والله أعلم. يعني: بإسقاط الشعبي بينهما. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ٩٣ ومن طريق ابن عبد البر فى "التمهيد" ٦/ ١٢٣ - ١٢٤ عن أبي معاوية، عن الأعمش، والبيهقي في "الشعب، (٦٦١٠) و (٦٦١١) من طريق واقد بن سلامة، كلاهما (الأعمش وواقد) عن يزيد بن أبان الرَّقاشي، عن أنس. ولفظ البيهقي بنحو لفظ أبي يعلى وابن ماجه، ولفظ ابن أبي شيبة اقتصر على قطعة الحسد. ويزيد الرقاشي ضعيف. وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" ٢/ ٢٢٧ مقتصراً فيه على الحسد من طريق محمَّد بن الحسين بن حريقا البزاز، عن الحسن بن موسى الأشيب، عن أبي هلال الراسي محمَّد بن سليم، عن قتادة، عن أنس. ومحمد بن الحسين هذا لم يذكر الخطيب في ترجمته ما يُبيِّن حاله. وأبو هلال الراسبي ضعيف يعتبر به. ومع هذا فقد حسن الحافظ العراقي إسناده في تخريج أحاديث "الاحياء" ١/ ٤٥. واقتصر فيه على تضعيف رواية ابن ماجه السالفة من طريق عيسى الحناط!!. ولقرله:" لا تشددوا على أنفسكم … " شاهد من حديث سهل بن أبي أمامة بن سهل بن حنيف، عن أبيه، عن جده عن النبي ﷺ قال: "لا تشددوا على أنفسكم، فإنما هلك من كان قبلكم بتشديدهم على أنفسهم، وستجدون بقاياهم في الصوامع والديارات". أخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" ٤/ ٩٧، والطبراني في "الكبير" (٥٥٥١)، وفي "الأوسط" (٣٠٧٨)، والبيهقي في "الشعب" (٣٨٨٤). وقال الهيثمي في "المجمع" ١/ ٦٢: رواه الطبراني في "الأوسط" و"الكبير"، وفيه عبد الله بن صالح كاتب الليث، وثقة جماعة وضعفه آخرون. ولقوله: "العين تزني … "، شاهد من حديث أبي هريرة، أخرجه البخاري (٦٢٤٣)، ومسلم (٢٦٥٧)، وهو في "المسند" (٧٧١٩). ولفظه: "إن الله ﷿ كتب على ابن آدم حظه من الزنى، أدرك ذلك لا محالة، وزنى العين النظر، وزنى اللسان النُّطق، والنَّفسُ تَمَنّى وتشتهى، والفرج يُصدق ذلك أو يكذَّبهُ" واللفظ لأحمد. وفي "الصحيحين" عن أنس بن مالك ﵁ أن النبي-ﷺ-قال: "لا تباغضوا، ولا تحاسدوا، ولا تدابروا، ولا تقاطعوا، وكونوا عباد الله إخوانا، ولا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث". البخاري (٦٠٦٥)، ومسلم (٢٥٥٩). وسيأتي عند المصنف برقم (٤٩١٠). قال الخطابي: الذفيفة: الخفيفة، يقال: رجل ذفيف خفيف. وأخرج أحمد (٨٨٩٤) من حديث عبد الله بن عَنَمَةَ قال: رأيت عمار بن ياسر دخل المسجد، فصلَّى، فأخفَّ الصلاة، قال: فلما خرج، قُمتُ إليه، فقلت: يا أبا اليقظان: لقد خففت، قال: فهل رأيتني انتقصت من حدودها شيئاً؟ قلت: لا، قال: فإني بادرت بها سهوة الشيطان، سمعتُ رسول الله ﷺ يقول: "إن العبد ليصلي الصلاة ما يكتب له منها إلا عشرها تسعها ثمنها سبعها سدسها خمسها ربعها ثلثها نصفها" وهو حديث صحيح.









সুনান আবী দাউদ (4905)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَسَّانَ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ رَبَاحٍ، قَالَ سَمِعْتُ نِمْرَانَ، يَذْكُرُ عَنْ أُمِّ الدَّرْدَاءِ، قَالَتْ سَمِعْتُ أَبَا الدَّرْدَاءِ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّ الْعَبْدَ إِذَا لَعَنَ شَيْئًا صَعِدَتِ اللَّعْنَةُ إِلَى السَّمَاءِ فَتُغْلَقُ أَبْوَابُ السَّمَاءِ دُونَهَا ثُمَّ تَهِبْطُ إِلَى الأَرْضِ فَتُغْلَقُ أَبْوَابُهَا دُونَهَا ثُمَّ تَأْخُذُ يَمِينًا وَشِمَالاً فَإِذَا لَمْ تَجِدْ مَسَاغًا رَجَعَتْ إِلَى الَّذِي لُعِنَ فَإِنْ كَانَ لِذَلِكَ أَهْلاً وَإِلاَّ رَجَعَتْ إِلَى قَائِلِهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ مَرْوَانُ بْنُ مُحَمَّدٍ هُوَ رَبَاحُ بْنُ الْوَلِيدِ سَمِعَ مِنْهُ وَذَكَرَ أَنَّ يَحْيَى بْنَ حَسَّانَ وَهِمَ فِيهِ ‏.‏




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যখন কোন বান্দা কোন বস্তুকে অভিশাপ দেয় তখন ঐ অভিশাপ আকাশের দিকে অগ্রসর হয়। অতঃপর সেই অভিশাপের আকাশে উঠার পথকে বন্ধ করে দেয়া হয়। তখন তা পুনরায় দুনিয়ায় প্রত্যাবর্তনের জন্য রওয়ানা হয়, কিন্তু দুনিয়াতে আসার পথও বন্ধ করে দেয়ায় সে ডানে বামে যাওয়ার চেষ্টা করে। অবশেষে অন্য কোন পথ না পেয়ে যাকে অভিশাপ করা হয়েছে তার নিকট ফিরে আসে। তখন সেই বস্ত যদি ঐ অভিশাপের যোগ্য হয়, তাহলে তার উপর ঐ অভিশাপ পতিত হয়, অন্যথায় অভিশাপকারীর উপরই তা পতিত হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نمران بن عتبۃ الذماري: مجہول (التحریر: 7188) ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده محتمل للتحسين. نمران: وهو ابن عتبة الذِّماري: ذكره ابن حبان في "الثقات"، وروى عنه عياش بن يونس أبو معاذ والوليد بن رباح ابن أخيه، وروى عن أم الدرداه. وقال الحافظ في"التقريب": مقبول. وجَوَّوإسناده في "الفتح" ١٠/ ٤٦٧. وذكره السيوطي في "الجامع الصغير" وعزاه لأبي داود ورمز له بحسنه. وأخرجه البيهقي في "الشعب" (٥١٦٢) من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الصمت" (٣٨٤) من طريق الحسن بن عبد العزيز، عن يحيى بن حسان، به. وله شاهد من حديث ابن مسعود أخرجه أحمد في "مسنده" (٣٨٧٦)، والبيهقي في "الشعب" (٥١٦٣) وفيه: "إن اللعنة إذا وُجِّهَت إلى من وُجِّهت إليه، فإن أصابت عليه سبيلاً، أو وَجَدَت فيه مَسْلَكاً، وإلا قالت: يا ربِّ، وُجِّهْتُ إلى فُلان، فلم أجد عليه سبيلاً، ولم أجد فيه مسلكاً، فيقال لها: ارجعي من حيثُ جئتِ"، فخشيتُ أن تكونَ الخادمُ معذورةً، فترجعُ اللعنةُ، فاكونَ سَبَبَها. واسناده محتمل للتحسين. ويشهد له حديث ابن عباس الآتي برقم (٤٩٠٨). وأخرج البخاري (٦٠٤٧) و (٦١٠٥)، ومسلم (١١٠) من حديث ثابت بن الضحاك وفيه:" ولعن المؤمن كقتله". وهو في "المسند" (١٦٣٨٥). وعن أبي هريرة بلفظ: "لا ينبغي لصدِّيق أن يكون لعاناً". أخرجه مسلم (٢٥٩٧)، وهو في "المسند" (٨٤٤٧). وانظر تمام تخريجه فيه. وعن عبد الله بن مسعود أخرجه أحمد في "مسنده" (٣٨٣٩)، والترمذي (٢٠٩٢) بلفظ: "ليس المؤمن بطعان، ولا بلعّان، ولا الفاحش البذي". وعن ابن عمر بلفظ: "لا ينبغي للمؤمن أن يكون لعاناً"، أخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (٣٠٩)، والترمذي (٢١٣٨). واللفظ للبخاري.









সুনান আবী দাউদ (4906)


حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، حَدَّثَنَا قَتَادَةُ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَلاَعَنُوا بِلَعْنَةِ اللَّهِ وَلاَ بِغَضَبِ اللَّهِ وَلاَ بِالنَّارِ ‏"‏ ‏.‏




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা আল্লাহর অভিশাপ, আল্লাহর গযব বা জাহান্নাম দ্বারা অভিশাপ দিও না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1976) ، قتادۃ عنعن ، ولحدیثہ شاہد مرسل عند عبد الرزاق (المصنف: 19531) ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن لغيره، رجاله ثقات رجال الصحيح، إلا أن فيه عنعنة الحسن البصري. هشام: هو ابن أبي عبد الله الدستوائي. وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (٣٢٠) عن مسلم، والترمذي (٢٥٩١) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، كلاهما عن هشام، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠١٧٥). وله شاهد مرسل بلفظه عند عبد الرزاق (١٩٥٣١)، ومن طريقه البغوي في "شرح السنة" (٣٥٥٧) من حديث حميد بن هلال مرفوعاً إلى النبي ﷺ. ورجاله ثقات. ويشهد له ما قبله، وقد ذكرنا فيه شواهد أخرى فانظرها هناك. قال علي القاري في "مرقاة المفاتيح" ٤/ ٦٣٦: قوله: "لا تلاعنوا بلعنة الله" أي: لا يلعن بعضكم بعضاً فلا يقل أحد لمسلم معيّن: عليك لعنة الله، مثلاً. "ولا بغضب الله" بأن يقول: غضب الله عليك. ولا "بالنار" بأن يقول: أدخلك الله النارَ، أو النار مثواك. وقال الطِّيبي: أي: لا تَدعوا على الناس لما يُبعدهم الله من رحمته، إمَّا صريحاً كما تقولون: لعنة الله عليه، أو كناية كما تقولون: عليه غضب الله، أو أدخله الله النارَ، فقوله: "لا تلاعنوا" من باب عموم المجاز، لأنه في بعض أفراده حقيقة، وفي بعضه مجاز، وهذا مختصٌّ بمعيَّن؛ لأنه يجوز اللعن بالوصف الأعم كقوله: لعنة الله على الكافرين، أو بالأخصِّ كقوله: لعنة الله على كافر معيَّن مات على الكفر كفرعون وأبي جهل.









সুনান আবী দাউদ (4907)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ زَيْدِ بْنِ أَبِي الزَّرْقَاءِ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، وَزَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، أَنَّ أُمَّ الدَّرْدَاءِ، قَالَتْ سَمِعْتُ أَبَا الدَّرْدَاءِ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ لاَ يَكُونُ اللَّعَّانُونَ شُفَعَاءَ وَلاَ شُهَدَاءَ ‏"‏ ‏.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ অভিশম্পাতকারীরা (কিয়ামতে) সুপারিশকারী হতে পারবে না এবং সাক্ষীদাতাও হতে পারবে না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2598)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل هشام بن سعد ففيه كلام ينزله عن رتبة الصحيح وإن كان من رجال مسلم وقد توبع. وباقي رجاله ثقات. أبو حازم: هو سلمة بن دينار. وأخرجه مسلم (٢٥٩٨) (٨٦) من طريق معاوية بن هشام، عن هشام بن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (٣١٦) من طريق محمَّد بن جعفر، ومسلم (٢٥٩٨) (٨٥) من طريق حفص بن ميسرة، ومسلم (٢٥٩٨) من طريق معمر، ثلاثتهم عن زيد بن أسلم وحده، به، وعند مسلم قصة في أوله. وهو في "مسند" أحمد (٧٥٢٩)، و"صحيح" ابن حبان (٥٧٤٦). قال البغوي في "شرح السنة" ١٣/ ١٣٥: قيل في قوله: " ولا شهداء" أي: لا يكونون في الجملة التي يُستشهدون يومَ القيامة على الأمم التي كذَّبت أنبياءهم ﵈، لأن من فضيلة هذه الأمة أنهم يشهدون للأنبياء ﵈ بالتبليغ إذا كذبهم قومُهم.









সুনান আবী দাউদ (4908)


حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ، ح وَحَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ أَخْزَمَ الطَّائِيُّ، حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ بْنُ يَزِيدَ الْعَطَّارُ، حَدَّثَنَا قَتَادَةُ، عَنْ أَبِي الْعَالِيَةِ، - قَالَ زَيْدٌ - عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَجُلاً، لَعَنَ الرِّيحَ - وَقَالَ مُسْلِمٌ إِنَّ رَجُلاً نَازَعَتْهُ الرِّيحُ رِدَاءَهُ عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَلَعَنَهَا - فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تَلْعَنْهَا فَإِنَّهَا مَأْمُورَةٌ وَإِنَّهُ مَنْ لَعَنَ شَيْئًا لَيْسَ لَهُ بِأَهْلٍ رَجَعَتِ اللَّعْنَةُ عَلَيْهِ ‏"‏ ‏.




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বাতাসকে অভিশাপ দিলো। মুসলিমের বর্ণনায় রয়েছেঃ নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে এক ব্যক্তির চাদর বাতাসে ওলটপালট হয়ে গেলে সে বাতাসকে অভিশাপ দিলো। নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি বাতাসকে লানত করো না, কেননা সে নির্দেশপ্রাপ্ত। যা অভিশাপযোগ্য নয় কেউ তাকে অভিশাপ দিলে তা অভিশাপকারীর ওপরই পতিত হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1978) ، قتادۃ مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الشيخين غير زيد بن أخزم، فقد أخرج له البخاري وهو ثفة. وطريق مسلم بن إبراهيم مرسلة. وأخرجه موصولاً الترمذي (٢٠٩٣) عن زيد بن أخزم، عن بشر بن عمر، بهذا الإسناد. وهو عند ابن حبان في "صحيحه" (٥٧٤٥). ويشهد له حديث أبي هريرة، عند أحمد في "مسنده" (٧٤١٣)، وهو صحيح في المتابعات والشواهد، ولفظه: "لا تسبُّوا الريح، فإنها تجيء بالرحمة والعذاب، ولكن سلوا الله خيرها، وتعوذوا بالله من شرها". وعن أبي بن كعب عند أحمد أيضاً في "مسنده" (٢١١٣٨)، ولفظه: "لا تسبوا الريح، فإذا رأيتم منها ما تكرهون، فقولوا: اللهم إنا نسألك من خير هذه الريح، ومن خير ما فيها، ومن خير ما أُرسلت به، ونعوذ بك من شرٌ هذه الريح، ومن شر ما فيها، ومن شر ما أُرسلت به". وهو حديث صحيح لغيره.









সুনান আবী দাউদ (4909)


حَدَّثَنَا ابْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ حَبِيبٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ سُرِقَ لَهَا شَىْءٌ فَجَعَلَتْ تَدْعُو عَلَيْهِ فَقَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تُسَبِّخِي عَنْهُ ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তার কিছু জিনিস চুরি হওয়ায় তিনি চোরকে লানত দিতে থাকলেন। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ তুমি চোরের আযাব কম করো না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، وانظر الحدیث السابق(1497) ، (انوار الصحیفہ ص 171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف، حبيب -وهو ابن أبي ثابت- روايته عن عطاء -وهو ابن أبي رباح- ليست بمحفوظة، فيما نقله العقيلي عن يحيى القطان، وقال في "الضعفاء" ١/ ٢٦٣: له عن عطاء أحاديث لا يتابع عليها، وذكر منها هذا الحديث. معاذ: هو ابنُ مُعاذٍ، وسفيان: هو الثوري. وقد سلف عند المصنف برقم (١٤٩٧). فانظر تخريجه هناك. وقوله: "لا تسبخي عنه". قال الخطابي: معناه لا تخففي عنه العقوبة بدعائك عليه، ومن هذا سبائخ القطن: وهي القطع المتطايرة عن الندف.









সুনান আবী দাউদ (4910)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَبَاغَضُوا وَلاَ تَحَاسَدُوا وَلاَ تَدَابَرُوا وَكُونُوا عِبَادَ اللَّهِ إِخْوَانًا وَلاَ يَحِلُّ لِمُسْلِمٍ أَنْ يَهْجُرَ أَخَاهُ فَوْقَ ثَلاَثِ لَيَالٍ ‏"‏ ‏.‏




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা পরস্পরকে ঘৃণা করো না, পরস্পর হিংসা করো না, একে অপরের গোয়েন্দাগিরি করো না, বরং আল্লাহ্‌র বান্দারা পরস্পর ভাই ভাই হয়ে যাও। যে কোন মুসলিমের জন্য তার কোন ভাইয়ের সঙ্গে তিন দিনের বেশি সম্পর্ক বিচ্ছেদ করা জায়িয নয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6075) صحیح مسلم (2559)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "الموطأ" ٢/ ٩٠٧، ومن طريقه أخرجه البخاري (٦٠٧٦)، ومسلم (٢٥٥٩) (٢٣). وأخرجه البخاري (٦٥٦٥)، ومسلم (٢٥٥٩) (٢٣)، والترمذي (٢٠٤٨) من طرق عن الزهري، به. وأخرجه مسلم (٢٥٥٩) من طريق قتادة، عن أنس. وهو في "مسند أحمد" (١٢٠٧٣)، و"صحيح ابن حبان" (٥٦٦٠). وقوله: "لا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث ليال"، قال ابن الأثير في "النهاية": يريد به الهجر ضدَّ الوصل، يعني فيما يكون بين المسلمين من عَتْبٍ ومَوْجِدَة أو تقصير يقع في حقوق العِشرة والصُّحبة دون ما كان من ذلك في جانب الدين، فإن هِجرة أهل الأهواءِ والبدع دائمة على مر الأوقات ما لم تظهر منهم التوبةُ والرجوع إلى الحق، فإنه ﷺ لما خاف على كعب بن مالك وأصحابه النفاق حين تخلفوا عن غزوة تبوك، أمر بهجرانهم خمسين يوماً، وقد هجر نساءَه شهراً. وقال ابن عبد البر في "الاستذكار" ٢٦/ ١٤٩: والذي عندي: أن من خشيَ من مجالستِه ومكالمته الضَّرَرُ في الدين أو في الدنيا، والزيادة في العداوة والبغضاء، فهجرانُه والبُعدُ عنه خيرٌ من قُرْبِهِ؛ لأنه يحفظُ عليك زلّاتِكَ، ويُمارِيكَ في صوابِك، ولا تَسلَمُ من سوء عاقِبةِ خُلْطتهِ، ورُبَّ صَرْمٍ جَميل خيرٌ من مُخالطة مُؤذية. وقال الخطابي: وأما الهجران أكثر من ذلك، فإنما جاء ذلك في هجران الرجل أخاه في عَتْبٍ، وموجدة، أو لنبوة تكون منه، فرخص له في مدة ثلاث لقلتها، وجعل ما وراءها تحت الحظر. فأما هجران الوالد الولد والزوج الزوجة، ومن كان في معناهما، فلا يضيق أكثر من ثلاث، وقد هجر رسول الله ﷺ نساءه شهراً.









সুনান আবী দাউদ (4911)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَزِيدَ اللَّيْثِيِّ، عَنْ أَبِي أَيُّوبَ الأَنْصَارِيِّ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ يَحِلُّ لِمُسْلِمٍ أَنْ يَهْجُرَ أَخَاهُ فَوْقَ ثَلاَثَةِ أَيَّامٍ يَلْتَقِيَانِ فَيُعْرِضُ هَذَا وَيُعْرِضُ هَذَا وَخَيْرُهُمَا الَّذِي يَبْدَأُ بِالسَّلاَمِ ‏"‏ ‏.




আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন; কোন মুসলিমের জন্য তার কোন ভাইয়ের সঙ্গে (ঝগড়া করে) তিন দিনের বেশি সম্পর্ক ছিন্ন করে থাকা বৈধ নয়। দু’জন পথিমধ্যে মুখোমুখি হলে একজন এদিকে এবং অপরজন অন্য দিকে মুখ ফিরিয়ে নেয়। এ দু’জনের মধ্যে যে প্রথমে সালাম দেয় সে-ই উত্তম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6077) صحیح مسلم (2560)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "الموطأ" ٢/ ٩٠٦ - ٩٠٧، ومن طريقه أخرجه البخاري (٦٠٧٧)، ومسلم (٢٥٦٠). وأخرجه البخاري (٦٢٣٧)، ومسلم (٢٥٦٠)، والترمذي (٢٠٤٥) من طرق عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٥٢٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥٦٦٩).









সুনান আবী দাউদ (4912)


حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ، وَأَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ السَّرْخَسِيُّ، أَنَّ أَبَا عَامِرٍ، أَخْبَرَهُمْ قَالَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ هِلاَلٍ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏"‏ لاَ يَحِلُّ لِمُؤْمِنٍ أَنْ يَهْجُرَ مُؤْمِنًا فَوْقَ ثَلاَثٍ فَإِنْ مَرَّتْ بِهِ ثَلاَثٌ فَلْيَلْقَهُ فَلْيُسَلِّمْ عَلَيْهِ فَإِنْ رَدَّ عَلَيْهِ السَّلاَمَ فَقَدِ اشْتَرَكَا فِي الأَجْرِ وَإِنْ لَمْ يَرُدَّ عَلَيْهِ فَقَدْ بَاءَ بِالإِثْمِ ‏"‏ ‏.‏ زَادَ أَحْمَدُ ‏"‏ وَخَرَجَ الْمُسَلِّمُ مِنَ الْهِجْرَةِ ‏"‏ ‏.




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ঈমানদারের জন্য বৈধ নয়, সে কোন ইমানদারের সঙ্গে তিন দিনের বেশি সম্পর্ক বিচ্ছিন্ন রাখবে। অতঃপর তিন দিন অতিবাহিত হওয়ার পর উভয়ের দেখা হলে একজন সালাম দিলে এবং দ্বিতীয় ব্যক্তি তার সালামের উত্তর দিলে উভয়ই সালামের সওয়াব পাবে। তার দ্বিতীয়জন সালামের উত্তর না দিলে গুনাহগার হবে। ইমাম আহ্‌মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) – এর বর্ণনায় রয়েছেঃ সালামদাতা সম্পর্কচ্ছেদের গুনাহ থেকে মুক্ত হবে।৪৯১০



দুর্বলঃ গায়াতুল মারাম হা/৪০৫, ইরওয়া হা/২০২৯।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ھلال مستور ، (انوار الصحیفہ ص 171، 172)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات إلا والد محمَّد بن هلال -وهو: هلال بن أبي هلال المدني- لم يرو عنه غير اثنين، وذكره ابن حبان في "الثقات" ومع ذلك فقد صحيح الحافظ ابن حجر إسناد هذا الحديث في "الفتح" ١٠/ ٤٩٥. وانظر ما سيأتي عند المصف برقم (٤٩١٤). وأبو عامر: هو عبد الملك بن عمرو. وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (٤١٤)، وفي "التاريخ" ١/ ٢٥٧ من طريق إسماعيل بن أبي أويس، والخرائطي في "مساوئ الأخلاق" (٥٥٥) من طريق عبد الله ابن مسلمة القعنبىُّ، والبيهقي في "الشعب" (٦١٩٥) من طريق خالد بن مخلد، ثلاثتهم عن محمَّد بن هلال، بهذا الإسناد. وأخرج مسلم (٢٥٦٢) من طريق العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة أن رسول الله ﷺ قال: "لا هجرة بعد ثلاث"، وهو في "المسند" لأحمد (٨٩١٩).









সুনান আবী দাউদ (4913)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ عَثْمَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُنِيبِ، - يَعْنِي الْمَدَنِيَّ - قَالَ أَخْبَرَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ يَكُونُ لِمُسْلِمٍ أَنْ يَهْجُرَ مُسْلِمًا فَوْقَ ثَلاَثَةٍ فَإِذَا لَقِيَهُ سَلَّمَ عَلَيْهِ ثَلاَثَ مِرَارٍ كُلُّ ذَلِكَ لاَ يَرُدُّ عَلَيْهِ فَقَدْ بَاءَ بِإِثْمِهِ ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন মুসলিমের জন্য অপর মুসলিমের তিন দিনের অধিক সম্পর্ক ছিন্ন করে থাকা উচিত নয়। অতঃপর সে তার দেখা পেয়ে তাকে তিনবার সালাম দিলে সে যদি একবারও উত্তর না দেয় তবে সে তার গুনাহসহ প্রত্যাবর্তন করলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (5034)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي. وأخرجه أبو يعلى (٤٥٨٣)، والمزي في "تهذيب الكمال" ١٦/ ١٧٧ - ١٧٨ من طريق أبي موسى محمَّد بن المثنى، بهذا الإسناد. وأخرجه مختصراً أبو يعلى (٤٥٦٨) عن محمَّد بن عبد الله بن نمير، عن محمَّد ابن خالد، به. وأخرج البخاري (٦٠٧٥)، وأحمد في "مسنده" (١٨٩٢١) من مسند المسور بن مخرمة قصة له ولعبد الرحمن بن الأسود في اسشفاعهما لعبد الله بن الزبير عند عائشة وفيها: وطفق المِسْوَرُ وعبدُ الرحمن يناشدانها إلاَّ ما كلمتْهُ، وقَبِلَت منه، ويقولان: إن النبي ﷺ نهى عما قد عَلِمتِ من الهجرة، فإنه "لا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث ليال" فلما أكثروا على عائشة من التذكرة والتحريج، طَفِقَت تُذَكِّرُهما وتبكي … إلخ. واللفظ للبخاري، وهو عند ابن حبان في "صحيحه" (٥٦٦٢). وانظر ما قبله من أحاديث الباب وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (4914)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ الْبَزَّازُ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ الثَّوْرِيُّ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ يَحِلُّ لِمُسْلِمٍ أَنْ يَهْجُرَ أَخَاهُ فَوْقَ ثَلاَثٍ فَمَنْ هَجَرَ فَوْقَ ثَلاَثٍ فَمَاتَ دَخَلَ النَّارَ ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন মুসলিমের জন্য অপর মুসলিমের তিন দিনের অধিক সম্পর্ক ছিন্ন করে থাকা হালাল নয়। অতঃপর যে ব্যক্তি তিন দিনের বেশি সময় সম্পর্ক ছিন্ন থাকা অবস্থায় মারা গেলো, সে জাহান্নামে প্রবেশ করলো।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (5035) ، أخرجہ أحمد (2/392) والنسائي فی الکبریٰ (9161)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، لكن رواه مسلم (٢٥٦٢) دون قوله: " فمن هجر فوق ثلاث فمات، دخل النار". وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩١١٦) من طريق شعبة، عن منصور، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٩٠٩٢). وانظر حديث أبي هريرة السالف برقم (٤٩١٢).