হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (4995)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ طَهْمَانَ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ عَبْدِ الأَعْلَى، عَنْ أَبِي النُّعْمَانِ، عَنْ أَبِي وَقَّاصٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَرْقَمَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِذَا وَعَدَ الرَّجُلُ أَخَاهُ - وَمِنْ نِيَّتِهِ أَنْ يَفِيَ لَهُ - فَلَمْ يَفِ وَلَمْ يَجِئْ لِلْمِيعَادِ فَلاَ إِثْمَ عَلَيْهِ ‏"‏ ‏.‏




যায়িদ ইবনু আরক্বাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যখন কোন ব্যক্তি তার কোন ভাইয়ের সাথে ওয়াদা পূর্ণ করার নিয়্যাতে অঙ্গীকার করে এবং কোন কারণে উক্ত অঙ্গীকার পূরণ করতে না পারে এবং ওয়াদা পূরণের নির্দিষ্ট সময়ও না আসে তাহলে তার পাপ হবে না।৪৯৯৩




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف/ ت ، ترمذی (2633) ، وقال الترمذي:’’ لیس إسنادہ بالقوي …… وأبو نعمان مجہول و أبو وقاص مجہول ‘‘ ، (انوار الصحیفہ ص 173)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة أبو النعمان وأبي وقاص. أبو عامر: هو عبد الملك ابن عمرو العقدي. وأخرجه الترمذي (٢٨٢٣) عن محمَّد بن بشار، عن أبو عامر، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث غريب، وليس إسناده بالقوي، علي بن عبد الأعلى: ثقة، ولا يعرف أبو النعمان ولا أبو وقاص وهما مجهولان.









সুনান আবী দাউদ (4996)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ النَّيْسَابُورِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سِنَانٍ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ طَهْمَانَ، عَنْ بُدَيْلٍ، عَنْ عَبْدِ الْكَرِيمِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ شَقِيقٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي الْحَمْسَاءِ، قَالَ بَايَعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بِبَيْعٍ قَبْلَ أَنْ يُبْعَثَ وَبَقِيَتْ لَهُ بَقِيَّةٌ فَوَعَدْتُهُ أَنْ آتِيَهُ بِهَا فِي مَكَانِهِ فَنَسِيتُ ثُمَّ ذَكَرْتُ بَعْدَ ثَلاَثٍ فَجِئْتُ فَإِذَا هُوَ فِي مَكَانِهِ فَقَالَ ‏ "‏ يَا فَتَى لَقَدْ شَقَقْتَ عَلَىَّ أَنَا هَا هُنَا مُنْذُ ثَلاَثٍ أَنْتَظِرُكَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى هَذَا عِنْدَنَا عَبْدُ الْكَرِيمِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ شَقِيقٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَكَذَا بَلَغَنِي عَنْ عَلِيِّ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ بَلَغَنِي أَنَّ بِشْرَ بْنَ السَّرِيِّ رَوَاهُ عَنْ عَبْدِ الْكَرِيمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ شَقِيقٍ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু আবূ হাম্‌সাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নবুওয়্যাত লাভের আগের ঘটনা। আমি তাঁর নিকট হতে একটা জিনিস কিনে কিছু দাম বাকি রেখে এই বলে চলে গেলাম যে, আমি অবশিষ্ট মূল্য নিয়ে এখানে এসে পৌছিয়ে দিব। পরে আমি অঙ্গীকার ভুলে গেলাম। তিনদিন পর আমার এ ওয়াদার কথা মনে পড়লো। আমি অবশিষ্ট মূল্য নিয়ে সেখানে উপস্থিত হয়ে দেখতে পেলাম, তিনি সেখানেই আছেন। তিনি বললেন, ওহে যুবক! তুমি আমাকে কষ্ট দিয়েছ। আমি তিনদিন যাবত এখানে তোমার জন্য অপেক্ষা করছি।৪৯৯৪




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبدالکریم بن عبد اللّٰہ بن شقیق مجہول (تق: 4152) ، (انوار الصحیفہ ص 173)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة عبد الكريم وهو ابن عبد الله بن شقيق، وقوله في الإسناد: عبد الكريم عن عبد الله بن شقيق وهم كما أشار راوي الحديث محمَّد بن يحيى بإثر هذه الرواية، وقد نبه على توهيم هذه الرواية غير واحد من أهل العلم. وأخرجه البيهقي في "السنن"١٠/ ١٩٨ من طريق المصنف بهذا الإسناد. وأخرجه الحربي في "غريب الحديث" ٣/ ٩٤٤، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (١٩٣)، والبيهقي ١٠/ ١٩٨، وابن الأثير في "أسد الغابة" ٣/ ٢١٧ من طرق عن محمَّد ابن سنان، به. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ٧/ ٥٩، والخرائطي في مكارم الأخلاق، (١٩٣) من طريق معاذ بن هانئ، عن إبراهيم بن طهمان، به.









সুনান আবী দাউদ (4997)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ فَاطِمَةَ بِنْتِ الْمُنْذِرِ، عَنْ أَسْمَاءَ بِنْتِ أَبِي بَكْرٍ، أَنَّ امْرَأَةً، قَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ لِي جَارَةً - تَعْنِي ضَرَّةً - هَلْ عَلَىَّ جُنَاحٌ إِنْ تَشَبَّعْتُ لَهَا بِمَا لَمْ يُعْطِ زَوْجِي قَالَ ‏ "‏ الْمُتَشَبِّعُ بِمَا لَمْ يُعْطَ كَلاَبِسِ ثَوْبَىْ زُورٍ ‏"‏ ‏.‏




আসমা বিনতু আবূ বাক্‌র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা এক মহিলা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমার একজন সতীন আছে। আমি কি তাকে এরূপ বলতে পারি যে, আমার স্বামী আমাকে এই বস্তু দিয়েছে, অথচ বাস্তবে তা দেয়নি? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ না পেয়ে পাওয়ার ভানকারী মিথ্যাচারের দু’টি পোশাক পরিধানকারীর মতই।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5219) صحیح مسلم (2130)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٥٢١٩) عن سليمان بن حرب، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٥٢١٩)، ومسلم (٢١٣٠) (١٢٧)، والنسائي في "الكبرى" (٨٨٧٢) و (٨٨٧٣) من طرق عن هشام بن عروة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٩٢١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٧٣٨). قال الخطابي في "معالم السنن" ٤/ ١٣٤ - ١٣٥: العرب تسمى امرأة الرجل جارته، وتدعو الزوجتين الضرتين جارتين، وذلك لقرب أشخاصهما كالجارتين المتصاقبتين في الدارين تسكنانهما، ومن هذا قول الأعشى لامرأته: أجارتَنا بيني فإنَّك طالقه ومن هذا النحو قول امرئ القيس: أجارتَنا إنّا غريبان ها هنا … وكل غريب للغريب نسيب قال البغوي في "شرح السنة" ٩/ ١٦١ - ١٦٢: المتشبع: المتكثر بأكثر مما عنده يتصلَّف به، وهو الرجلُ يُرى أنه شبعان، وليس كذلك "كلابس ثوبي زور"، قال أبو عبيد: هو المرائي يلبس ثياب الزهاد، يُرى أنه زاهد، قال غيره: هو أن يلبس قميصاً يصل بكُمَّيه كُمَّين آخرين، يُرى أنه لابس قميصين، فكأنه يسخر من نفسه، وُيروى عن بعضهم أنه كان يكون في الحي الرجلُ له هيئة ونبل، فإذا احتيج إلى شهادة زور، شهد بها ، فلا تُرد من أجل نبله وحسن ثوبيه، وقيل: أراد بالثوب نفسه، فهو كناية عن حاله ومذهبه، والعرب تكني بالثوب عن حال لابسه ، تقول: فلان نقيُّ الثياب ، إذا كان بريئاً من الدنس، وفلان دَنِسُ الثياب، إذا كان بخلافه، ومعناه: المتشبع بما لم يُعْط بمنزلة الكاذب القائل ما لم يكن. وانظر "الفتح" ٩/ ٣١٧ - ٣١٨.









সুনান আবী দাউদ (4998)


حَدَّثَنَا وَهْبُ بْنُ بَقِيَّةَ، أَخْبَرَنَا خَالِدٌ، عَنْ حُمَيْدٍ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ رَجُلاً، أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ احْمِلْنِي ‏.‏ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنَّا حَامِلُوكَ عَلَى وَلَدِ نَاقَةٍ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ وَمَا أَصْنَعُ بِوَلَدِ النَّاقَةِ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ وَهَلْ تَلِدُ الإِبِلَ إِلاَّ النُّوقُ ‏"‏ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা এক লোক নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে একটি আরোহীর ব্যবস্থা করে দিন। নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি তোমাকে আরোহণের জন্য একটি উষ্ট্রীর বাচ্চা দিবো। লোকটি বললো, উষ্ট্রীর বাচ্চা দিয়ে আমি কি করবো? নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ উটকে তো উষ্ট্রীই জন্ম দেয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4886) ، حمید عنعن لکنہ کان یدلس عن ثابت البناني عن أنس رضي اللہ عنہ وثابت البناني ثقۃ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. خالد: هو ابن عبد الله الواسطي، وحميد: هو ابن أبي حميد الطويل. وأخرجه الترمذي (٢٠١١) عن قتيبة بن سعيد، عن خالد الواسطي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٣٨١٧).









সুনান আবী দাউদ (4999)


حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الْعَيْزَارِ بْنِ حُرَيْثٍ، عَنِ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ، قَالَ اسْتَأْذَنَ أَبُو بَكْرٍ رَحْمَةُ اللَّهِ عَلَيْهِ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَسَمِعَ صَوْتَ عَائِشَةَ عَالِيًا فَلَمَّا دَخَلَ تَنَاوَلَهَا لِيَلْطِمَهَا وَقَالَ لاَ أَرَاكِ تَرْفَعِينَ صَوْتَكِ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجَعَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَحْجُزُهُ وَخَرَجَ أَبُو بَكْرٍ مُغْضَبًا فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم حِينَ خَرَجَ أَبُو بَكْرٍ ‏"‏ كَيْفَ رَأَيْتِنِي أَنْقَذْتُكِ مِنَ الرَّجُلِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَمَكَثَ أَبُو بَكْرٍ أَيَّامًا ثُمَّ اسْتَأْذَنَ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَوَجَدَهُمَا قَدِ اصْطَلَحَا فَقَالَ لَهُمَا أَدْخِلاَنِي فِي سِلْمِكُمَا كَمَا أَدْخَلْتُمَانِي فِي حَرْبِكُمَا ‏.‏ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ قَدْ فَعَلْنَا قَدْ فَعَلْنَا ‏"‏ ‏.




নু’মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। তখন তিনি ‘আয়িশার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উচ্চ কন্ঠস্বর শুনতে পেলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভেতরে ঢুকে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দুর্বল করার জন্য চড় মারতে প্রস্তুত হলেন এবং বললেন, আমি কি লক্ষ্য করিনি যে, তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে উচ্চস্বরে কথা বলছো? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বারণ করলেন। আবূ বকর রাগান্বিত অবস্থায় বেরিয়ে গেলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চলে যাওয়ার পর নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (কৌতুকের ছলে) বললেন, দেখলে তো আমি তোমাকে কিভাবে ঐ লোকটার হাত হতে বাঁচালাম! বর্ণনাকারী বলেন, এরপর কয়েক দিন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকট আসলেন না। অতঃপর একদিন এসে ভেতরে আসার অনুমতি চাইলেন এবং ভিতরে ঢুকে উভয়কে সন্তুষ্ট অবস্থায় দেখতে পেয়ে বললেন, আমাকেও তোমাদের শান্তির অংশীদার বানাও যেমনটি তোমরা আমাকে অংশীদার বানিয়েছিলে তোমাদের কলহে। নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমরা তাই করলাম।৪৯৯৭




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو إسحاق عنعن وسقط ذکرہ من السنن الکبری للنسائي (8495) ! وانظر (ص 185) ، و حدیث أحمد (4/ 275 ح 18421) سندہ صحیح و ھو مختصر و یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 174)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن يونس بن أبو إسحاق صدوق حسن الحديث، وقد توبع، وهذا الإسناد من المزيد في متصل الأسانيد. فإن يونس بن أبي إسحاق سمعه من أبو إسحاق وسمعه من العيزار بن حُريث. وأخرجه أحمد في "مسنده" (١٨٣٩٤) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، بهذا الإسناد. وهذا إسناد صحيح. وأخرجه أحمد في "مسنده" (١٨٤٢١)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٥٣٠٩) من طريق أبي نعيم، والنسائي في "الكبرى" (٨٤٤١) و (٩١١٠) عن طريق عمرو بن محمَّد، كلاهما عن يونس بن أبي إسحاق، عن العيزار بن حريث، عن النعمان بن بشير. وفيه زيادة. وقوله: "ليلطمها": بكسر الطاء من باب ضرب، من اللطم، وهو ضرب الخد وصفحة الجسد بالكف مفتوحة. قال عبد الحق الدهلوي: اللطم ضرب الخد بالكف وهو منهي عنه، ولعل هذا كان قبل النهي، أو وقع ذلك منه لغلبة الغضب أو أراد أن يلطم. انتهى. وقوله: "انقذتك من الرجل": أي خلصتك من ضربه ولطمه. والظاهر أن يمُال من أبيك، فعدل إلى الرجل، أي: من الرجل "الكامل" في الرجولية حين غضِبَ لله ولرسوله، قاله الطيبي، قلت: قوله: "أنقذتك من الرجل" ولم يقل من أبيك وابعاده ﷺ أبا بكر عن عائشة تطيباً وممازحة كل ذلك داخل في المزاحٍ، ولذا أورده المؤلف في باب المزاح. في "سلمكما": بكسر السين ويفتح، أي: في صلحكما. في "حربكما" أي: في شقاقكما.









সুনান আবী দাউদ (5000)


حَدَّثَنَا مُؤَمَّلُ بْنُ الْفَضْلِ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْعَلاَءِ، عَنْ بُسْرِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِي إِدْرِيسَ الْخَوْلاَنِيِّ، عَنْ عَوْفِ بْنِ مَالِكٍ الأَشْجَعِيِّ، قَالَ أَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةِ تَبُوكَ وَهُوَ فِي قُبَّةٍ مِنْ أَدَمٍ فَسَلَّمْتُ فَرَدَّ وَقَالَ ‏"‏ ادْخُلْ ‏"‏ ‏.‏ فَقُلْتُ أَكُلِّي يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ ‏"‏ كُلُّكَ ‏"‏ ‏.‏ فَدَخَلْتُ ‏.‏




আওফ ইবনু মালিক আল-আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তাবূক যুদ্ধের সময় আমি রাসূলুল্লাহ্‌র (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট গেলাম। তখন তিনি চামড়ার তৈরী তাঁবুতে অবস্থান করছিলেন। আমি তাঁকে সালাম দিলে তিনি সালামের জবাব দিয়ে ভেতরে ঢুকতে বললেন। আমি (কৌতুকের ছলে) বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার পুরো শরীরসহ? তিনি বললেন, হাঁ, পুরো শরীরসহ এসো। অতঃপর আমি ঢুকলাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3176) ، مشکوۃ المصابیح (4890)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، الوليد بن مسلم قد صرح بالتحديث في جميع طبقات السند عند ابن ماجه وابن حبان، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه بأطول مما هنا ابن ماجه (٤٠٤٢) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، وابن حبان (٦٦٧٥) من طريق هشام بن عمار، كلاهما عن الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد مطولاً (٢٣٩٧١) و (٢٣٩٧٩) و (٢٣٩٨٥) و (٢٣٩٩٦) من طرق عن عوف بن مالك الأشجعي.









সুনান আবী দাউদ (5001)


حَدَّثَنَا صَفْوَانُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي الْعَاتِكَةِ، قَالَ إِنَّمَا قَالَ أَدْخُلُ كُلِّي ‏.‏ مِنْ صِغَرِ الْقُبَّةِ ‏.‏




‘উসমান ইবনু আবুল আতিকাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তাঁবুর পরিধি সংকীর্ণ হওয়ায় ‘আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কৌতুক করে বলেছিলেন, আমার পুরো শরীরসহ প্রবেশ করবো? [৪৯৯৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، سندہ صحیح إلٰی عثمان بن أبي العاتکۃ وعثمان ضعیف بنفسہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: عثمان بن أبي العاتكة ضعيف. وأخرجه البيهقي في "السنن" ١٠/ ٢٤٨ من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (5002)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مَهْدِيٍّ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنْ أَنَسٍ، قَالَ قَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ يَا ذَا الأُذُنَيْنِ ‏"‏ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (কৌতুক করে) আমাকে বললেন, ওহে দুই কানওয়ালা!




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، ولہ شاھد عند الطبراني (1/240 ح 662 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف، شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- سيى الحفظ. عاصم: هو ابن سليمان الاحول. وأخرجه الترمذي (٢١٠٩) و (٤١٦٤) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن شريك، بهذا الإسناد. وفي آخر الرواية: قال أبو أسامة: إنما يعني به أنه يُمازحه. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٦٦٢) من طريق حرب بن ميمون، عن النضر بن أنس، عن أنس. وهذا سند حسن يتقوى الحديث به. ولشريك متابعات أخرى أوردناها في "المسند" عند الحديث (١٢١٦٤). فانظرها قال الخطابي في "معالم السنن": كان مزح النبي-ﷺ مزحا لا يدخُله الكذبُ والتزيد، وكل إنسان له أذنان، فهو صادق في وصفه إياه بذلك. وقد يحتمل وجهاً آخر وهو أن لا يكون قصد بهذا القول المزاح، وإنما معناه: الحض والتنبيه على حسن الاستماع والتلقف لما يقوله، ويعلمه إياه، وسماه ذا الأذنين إذ كان الاستماع إنما يكون بحاسة الأذن، وقد خلق الله تعالى له أذنين يسمع بكل واحدة منهما وجعلهما حجة عليه، فلا يعذر معهما إن أغفل الاستماعَ له ولم يُحسن الوعى له. والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (5003)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنِ ابْنِ أَبِي ذِئْبٍ، ح وَحَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا شُعَيْبُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنِ ابْنِ أَبِي ذِئْبٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ السَّائِبِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏"‏ لاَ يَأْخُذَنَّ أَحَدُكُمْ مَتَاعَ أَخِيهِ لاَعِبًا وَلاَ جَادًّا ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ سُلَيْمَانُ ‏"‏ لَعِبًا وَلاَ جِدًّا ‏"‏ ‏.‏ ‏"‏ وَمَنْ أَخَذَ عَصَا أَخِيهِ فَلْيَرُدَّهَا ‏"‏ ‏.‏ لَمْ يَقُلِ ابْنُ بَشَّارٍ ابْنِ يَزِيدَ وَقَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




‘আবদুল্লাহ ইবনুস সায়িব ইবনু ইয়াযীদ (রাহিমাহুল্লাহ) তার পিতা হতে তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেনঃ তোমাদের কেউ যেন তার ভাইয়ের কোন জিনিস না নেয়, খেলাচ্ছলেই হোক কিংবা বাস্তবিকই হোক। আর কেউ তার কোন ভাইয়ের লাঠি নিয়ে থাকলে তা যেন ফিরিয়ে দেয়। [৫০০১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2948) ، أخرجہ الترمذي (2160 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين غير عبد الله بن السائب وجده، فقد روى لهما البخاري في "الأدب المفرد" وأبو داود والترمذي، وعبد الله وثقه النسائي وابن سعد وذكره ابن حبان في الثقات. يحيى: هو ابن سعيد القطان، ابن أبي ذئب: هو محمَّد بن عبد الرحمن بن المغيرة بن أبي ذئب، وجد عبد الله بن السائب الصحابي: هو يزيد أبي السائب بن يزيد. وأخرجه الترمذي (٢٢٩٩) عن بندار محمَّد بن بشار، بهذا الإسناد، وقال: حديث حسن غريب. وهو في "مسنده" أحمد، (١٧٩٤٠)، و "شرح مشكل الآثار" للطحاوي (١٦٢٤). وانظره فيهما. قال: الخطابي في "معالم السنن": معناه: أن يأخذه على وجه الهزل وسبيل المزح، ثم يحبسه عنه ولا يرده، فيصير ذلك جداً. وقال ابن الأثير في "النهاية" تعليقاً على رواية الترمذي "لاعباً جاداً"، أي: يأخذه ولا يريد سرقته، لكن: يريد إدخال الهم والغيظ عليه، فهو لاعب في السرقة، جاد في الأذية.









সুনান আবী দাউদ (5004)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ نُمَيْرٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، قَالَ حَدَّثَنَا أَصْحَابُ، مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُمْ كَانُوا يَسِيرُونَ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَنَامَ رَجُلٌ مِنْهُمْ فَانْطَلَقَ بَعْضُهُمْ إِلَى حَبْلٍ مَعَهُ فَأَخَذَهُ فَفَزِعَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ يَحِلُّ لِمُسْلِمٍ أَنْ يُرَوِّعَ مُسْلِمًا ‏"‏ ‏.‏




আবদুর রহমান ইবনু আবূ লাইলাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাকে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, একদা তারা নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে সফরে ছিলেন। তাদের এক ব্যক্তি ঘুমিয়ে পড়লে তাদের মধ্যকার কেউ গিয়ে (মজার ছলে) তার সঙ্গের রশি নিয়ে আসলো। তাতে সে ভয় পেয়ে গেলো। নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কোন মুসলিমের জন্য অন্য মুসলিমকে ভয় দেখানো বৈধ নয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (3545) ، أخرجہ أحمد (5/362) وللحدیث شواھد عند الطحاوي (تحفۃ الأخیار 7/104 ح4995) والطبراني (مجمع البحرین 435) وغیرھما




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن نمير: هو عبد الله، والأعمش: هو سليمان بن مهران. وهو عند القضاعي في "مسند الشهاب" (٨٧٨)، والبيهقي في "السنن" ١٠/ ٢٤٩، وفي "الآداب" (٤١١) من طريق المصنف بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٢٣٠٦٤) عن عبد الله بن نمير، به. ووقع عنده: نبل بدل حبل. وأخرجه مقتصراً على المرفوع منه هناد في "الزهد" (١٣٤٥) عن أبي معاوية، عن الأعمش، به. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكلل الآثار" (١٦٢٥) من طريق فطر بن خليفة، عن عبد الله بن يسار، عن أبي ليلى الأنصاري، عن النبي-ﷺ! فوهم فيه فطر. ووقع فيه: كنانة رجل بدل: حبل.









সুনান আবী দাউদ (5005)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سِنَانٍ الْبَاهِلِيُّ، - وَكَانَ يَنْزِلُ الْعَوَقَةَ - حَدَّثَنَا نَافِعُ بْنُ عُمَرَ، عَنْ بِشْرِ بْنِ عَاصِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهُوَ ابْنُ عَمْرٍو - قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ يُبْغِضُ الْبَلِيغَ مِنَ الرِّجَالِ الَّذِي يَتَخَلَّلُ بِلِسَانِهِ تَخَلُّلَ الْبَاقِرَةِ بِلِسَانِهَا ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ নিশ্চয়ই আল্লাহ সেসব লোককে ঘৃণা করে যারা বাকপটুত্ব প্রদর্শনের জন্য জিহবাকে দাঁতের সঙ্গে লাগিয়ে বিকট শব্দ করে, গরু তার জিহবা নেড়ে যেমন করে থাকে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4800) ، أخرجہ الترمذي (2853 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. والد بشر: هو عاصم بن سفيان الثقفي: روى عن جمع، وروى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وحديثه عند أصحاب السنن، وبقية رجاله ثقات. والعَوَقة: محلة من محال البصرة، تُنسَبُ إلى القبيلة، وهي بطن من عبد القيس. وأخرجه الترمذي (٣٠٦٧) من طريق عمر بن علي المقدمي، عن نافع، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٥٤٣). وفي الباب عن سعد بن أبي وقاص، أخرجه أحمد في "مسنده" (١٥١٧) بلفظ: "سيكون قوم يأكلون بألسنتهم كما تأكل البقرة من الأرض" وإسناده ضعيف. وعن عبد الله بن عمر، أخرجه الطبراني في "الأوسط" (٩٠٣٥)، وأورده الهيثمي في "مجمع الزوائد" ٨/ ١١٦ وقال: رواه الطبراني في "الأوسط" عن شيخه مقدام بن داود، وهو ضعيف. وقوله: "يبغض البليغ من الرجال"، قال السندي في "حاشيته على المسند" أي: المبالغ في الكلام وأداءِ الحروف، أو المتكلم بالكلام البليغ بالتكلف دون الطبع والسليقة. وقوله: "يتخلل": أي: يتشدَّق في الكلام، ويفخم لسانه، ويلفه كما تلفُّ البقرةُ الكلأَ بلسانها، والمراد: يُدير لسانه حولَ أسنانه مبالغة في إظهار بلاغته. قاله السندي. والباقرة: هي البقرة بلغة أهل اليمن.









সুনান আবী দাউদ (5006)


حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا وَهْبٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنِ الضَّحَّاكِ بْنِ شُرَحْبِيلَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ تَعَلَّمَ صَرْفَ الْكَلاَمِ لِيَسْبِيَ بِهِ قُلُوبَ الرِّجَالِ أَوِ النَّاسِ لَمْ يَقْبَلِ اللَّهُ مِنْهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ صَرْفًا وَلاَ عَدْلاً ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি মানুষের অন্তরকে আকৃষ্ট করার জন্য চিত্তাকর্ষক কথাবার্তা শিখে, আল্লাহ ক্বিয়ামাতের দিন তার কোন তাওবাহ ও ফিদইয়া (অথবা ফরয ও নফল ইবাদত) গ্রহণ করবেন না।৫০০৪



দুর্বলঃ মিশকাত হা/৪৮০২




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، في سماع الضحاک بن شرحبیل من الصحابۃ نظر کما أشار المنذري رحمہ اﷲ (انظر عون المعبود 459/4) ، (انوار الصحیفہ ص 174)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. الضحاك بن شرحبيل ضعفه أحمد، وقال غيره: صدوق، يعني أنه لا يحتج به لكن يصلح حديثه للمتابعة، وقال المنذري: الضحاك بن شرحبيل - هذا- مصري، ذكره ابن يونس في "تاريخ المصريين"، وذكره البخاري وابن أبي حاتم، ولم يذكر له رواية عن أحد من الصحابة، وإنما روايته عن التابعين. ويشبه أن يكون الحديث منقطعا، والله ﷿ أعلم. وأخرجه البيهقي في" الشعب" (٤٩٧٤)، وفي "الأداب" (٣٩١) من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرج أحمد في "الزهد" ص ٣٨٠ عن أبي إدريس الخولاني قال: من تعلم صرف الحديث ليستكفىء به قلوب الناس لم يَرَحْ رائحة الجنة. قال الخطابي في "معالم السنن": صرف الكلام فضله، وما يتكلفه الإنسان من الزيادة فيه من وراء الحاجة، ومن هذا سُمِّيَ الفضلُ بينَ النقدين صرفاً. وإنما كره رسولُ الله ﷺ ذلك لما يدخله من الرياء والتصنع، ولما يخالطه من الكذب والتزيد، وأمر ﷺ أن يكون الكلامُ قصداً تِلوَ الحاجَةِ غيرَ زائد عليها، يُوافق ظاهرَه باطنُه، وسرَّه علنُه. قوله: "صرفا ولا عَدْلاً"، قال ابن الأثير في "النهاية": قد تكررت هاتان اللفظتان في الحديث، فالصرف: التوبةُ، وقيل: النافلةُ. والعدل: الفِدية، وقيل الفريضة.









সুনান আবী দাউদ (5007)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّهُ قَالَ قَدِمَ رَجُلاَنِ مِنَ الْمَشْرِقِ فَخَطَبَا فَعَجِبَ النَّاسُ - يَعْنِي لِبَيَانِهِمَا - فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنَّ مِنَ الْبَيَانِ لَسِحْرًا ‏"‏ ‏.‏ أَوْ ‏"‏ إِنَّ بَعْضَ الْبَيَانِ لَسِحْرٌ ‏"‏ ‏.




আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা প্রাচ্য হতে দু’ব্যক্তি এসে বক্তৃতা করলো এবং উভয়ের বক্তৃতা শুনে লোকেরা বিস্মিত হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কোন কোন বক্তৃতায় যাদুর প্রভাব আছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5767) ، مشکوۃ المصابیح (4887) ، و للحدیث شاھد حسن عند الطبراني فی الکبیر (1/ 240 ح 662)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح متصل. وهو كذلك في "الموطأ" برواية أبي مصعب الزهري (٢٥٧٤). وهو أيضاً في "الموطأ" ٢/ ٩٨٦ برواية يحيى الليثي مرسلاً، وكذلك هو عند ابن عبد البر في "التمهيد" ٥/ ١٦٩، وفي "التجريد" ص ٥١، وابن حجر في "الاتحاف" ٨/ ٣٢٣، والزرقاني في "شرح الموطا" ٤/ ٤٠٣. لم يذكر فيه عبد الله بن عمر. وقد وقع في المطبوع منه مسنداً وهو خطاً. قال ابن عبد البر تعليقاً على الرواية المرسلة: هكذا رواه يحيى، عن مالك، عن زيد بن أسلم مرسلاً، وما أظن أرسله عن مالك غيره، وقد وصله جماعة عن مالك، منهم القعنبىُّ (كما في رواية أبي داود هنا)، وابن وهب، وابن القاسم، وابن بكير، وابن نافع ، ومطرف، والتتيسي، رووه كلهم عن مالك، عن زيد بن أسلم، عن عبد الله بن عمر، عن النبي ﷺ. وهو الصواب، وسماع زيد بن أسلم من ابن عمر صحيح. وأخرجه من طريق مالك البخاري (٥٧٦٧). وأخرجه البخاري (٥١٤٦) من طريق سفيان، والترمذي (٢١٤٧) من طريق عبد العزيز بن محمَّد، كلاهما عن زيد بن أسلم، عن عبد الله بن عمر. وهو موصول في "مسند أحمد" (٤٦٥١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٧١٨) قال ابن عبد البر فى "التمهيد" ٥/ ١٧٠ - ١٧١: وقد روي عن النبي-ﷺ في قوله: "إن من البيان لسحراً"، من وجوه غير هذا من حديث عمار وغيره. واختلف في المعنى المقصود إليه بهذا الخبر، فقيل: قصد به إلى ذمِّ البلاغة، إذ شبهت بالسحر، والسحر محرم مذموم، وذلك لما فيها من تصوير الباطل في صورة الحق، والتفيهق والتشدق، وقد جاء في الثرثارين المتفيهقين ما جاء من الذم، وإلى هذا المعنى ذهب طائفة من أصحاب مالك، واستدلوا على ذلك بدخال مالك له في "موطئه" في باب ما يكره من الكلام. وأبى جمهور أهل الأدب والعلم بلسان العرب إلا أن يجعلوا قوله ﷺ: "إن من البيان لسحراً" مدحاً وثناء وتفضيلاً للبيان وإطراء، وهو الذي تدل عليه سياقة الخبر ولفظه.









সুনান আবী দাউদ (5008)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ عَبْدِ الْحَمِيدِ الْبَهْرَانِيُّ، أَنَّهُ قَرَأَ فِي أَصْلِ إِسْمَاعِيلَ بْنِ عَيَّاشٍ وَحَدَّثَهُ مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ ابْنُهُ قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي قَالَ حَدَّثَنِي ضَمْضَمٌ عَنْ شُرَيْحِ بْنِ عُبَيْدٍ قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو ظَبْيَةَ أَنَّ عَمْرَو بْنَ الْعَاصِ قَالَ يَوْمًا وَقَامَ رَجُلٌ فَأَكْثَرَ الْقَوْلَ فَقَالَ عَمْرٌو لَوْ قَصَدَ فِي قَوْلِهِ لَكَانَ خَيْرًا لَهُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ لَقَدْ رَأَيْتُ أَوْ أُمِرْتُ أَنْ أَتَجَوَّزَ فِي الْقَوْلِ فَإِنَّ الْجَوَازَ هُوَ خَيْرٌ ‏"‏ ‏.




‘আমর ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ‘আমর ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদিন বলেন, এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে সুদীর্ঘ বক্তৃতা দিল। ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, যদি সে সংক্ষিপ্ত আলোচনা করতো তবে তার জন্য ভালো হতো। কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ আমার নিকট উপযুক্ত মনে হয়েছে অথবা আমাকে আদেশ দেয়া হয়েছে ভাষণ সংক্ষিপ্ত করতে। কেননা সংক্ষিপ্ত আলোচনা উত্তম। [৫০০৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4803)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف محمَّد بن إسماعيل بن عياش. قال أبو حاتم: لم يسمع من أبيه شيئاً حملوه على أن يحدث فحدث، وسئل أبو داود عنه، فقال: لم يكن بذاك، وقال ابن حجر في "التقريب": عابوا عليه أنه حدث عن أبيه بغير سماع. ضمضم: هو ابن زرعة، وأبو ظبية: هو السُّلفي الحمصي الكلاعي. وأخرجه البيهقى في "شعب الإيمان" (٤٩٧٥) من طريق المصنف، بهذا الإسناد.









সুনান আবী দাউদ (5009)


حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لأَنْ يَمْتَلِئَ جَوْفُ أَحَدِكُمْ قَيْحًا خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَمْتَلِئَ شِعْرًا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو عَلِيٍّ بَلَغَنِي عَنْ أَبِي عُبَيْدٍ أَنَّهُ قَالَ وَجْهُهُ أَنْ يَمْتَلِئَ قَلْبُهُ حَتَّى يَشْغَلَهُ عَنِ الْقُرْآنِ وَذِكْرِ اللَّهِ فَإِذَا كَانَ الْقُرْآنُ وَالْعِلْمُ الْغَالِبُ فَلَيْسَ جَوْفُ هَذَا عِنْدَنَا مُمْتَلِئًا مِنَ الشِّعْرِ وَإِنَّ مِنَ الْبَيَانِ لَسِحْرًا ‏.‏ قَالَ كَأَنَّ الْمَعْنَى أَنْ يَبْلُغَ مِنْ بَيَانِهِ أَنْ يَمْدَحَ الإِنْسَانَ فَيَصْدُقَ فِيهِ حَتَّى يَصْرِفَ الْقُلُوبَ إِلَى قَوْلِهِ ثُمَّ يَذُمَّهُ فَيَصْدُقَ فِيهِ حَتَّى يَصْرِفَ الْقُلُوبَ إِلَى قَوْلِهِ الآخَرِ فَكَأَنَّهُ سَحَرَ السَّامِعِينَ بِذَلِكَ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কবিতা দিয়ে পেট ভরার চেয়ে তোমাদের জন্য পুঁজ দিয়ে পেট ভর্তি করা উত্তম। আবূ ‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ ‘উবাইদ সম্পর্কে আমি জানতে পেরেছি যে, তিনি এ হাদীসের তাৎপর্য সম্পর্কে বলেন, কবিতায় তার কলব ভর্তি হয়ে যাওয়ায় সে কুরআন তিলাওয়াত এবং আল্লাহর যিকির হতে বঞ্চিত হবে। কিন্তু কুরআন ও ইলম চর্চার প্রাধান্য থাকলে আমরা বলবো না যে, তার পেট কবিতায় ভরা। কোন কোন ভাষণে অবশ্যই যাদুর প্রভাব রয়েছে অর্থাৎ সে কোন মানুষের প্রশংসায় সীমালঙ্ঘন করবে এবং এতো উত্তেজক বক্তব্য রাখবে যে, মানুষের মন তার ভাষণের প্রতি আকৃষ্ট হয়ে পড়বে। আবার সে তার কুৎসা করলে এমনভাবে করবে যে, মানুষ তা বিশ্বাস করবে। ফলে তাদের অন্তর তার ভাষণের প্রতি আকৃষ্ট হয়ে পড়বে। মনে হবে, সে যেন তার ভাষণের দ্বারা শ্রোতাদের উপর যাদু করেছে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، رواہ البخاري (6155) مسلم (2257)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك، وأبو صالح: هو ذكوان السمان. وأخرجه البخاري (٦١٥٥)، ومسلم (٢٢٥٧) (٧)، وابن ماجه (٣٧٥٩)، والترمذي (٣٠٦٥) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٨٧٤)، و "صحيح ابن حبان" (٥٧٧٧) و (٥٧٧٩).









সুনান আবী দাউদ (5010)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْحَارِثِ بْنِ هِشَامٍ، عَنْ مَرْوَانَ بْنِ الْحَكَمِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الأَسْوَدِ بْنِ عَبْدِ يَغُوثَ، عَنْ أُبَىِّ بْنِ كَعْبٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِنَّ مِنَ الشِّعْرِ حِكْمَةً ‏"‏ ‏.‏




উবাই ইবনু কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন কোন কবিতা প্রজ্ঞাপূর্ণ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6145)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي، ومروان بن الحكم: هو ابن أبي العاص بن أمية ابن عم عثمان بن عفان، وقد ولي الخلافة. وأخرجه ابن ماجه (٣٧٥٥) من طريق أبي أسامة، عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦١٤٥) من طريق شعيب بن أبي حمزة، عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١١٥٤) و (٢١١٥٨) وقوله: "إن من الشعر حكمة": من تبعيضية، يريد أن الشعر لا دخل له في الحُسن والقُبح، والمدار إنما هو على المعاني لا على كون الكلام نثراً أو نظماً، فإنهما كيفيتان لأداه المعنى، وطريقان إليه، ولكن المعنى إن كان حسناً وحكمة فذلك الشِّعر حكمة، واذا كان قبيحاً فذلك الشِّعر كذلك، وإنما يُذَمُّ الشِّعر شرعاً بناء على أنه غالباً يكون مدحاً لمن لا يستحقُّه وغير ذلك، ولذلك لما قال تعالى: ﴿وَالشُّعَرَاءُ يَتَّبِعُهُمُ الْغَاوُونَ﴾ [الشعراء: ٢٢٤]، أثنى على ذلك بقوله: ﴿إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ﴾، الآية [الشعراء: ٢٢٧]. قاله السندي في "حاشيته على سنن ابن ماجه".









সুনান আবী দাউদ (5011)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ جَاءَ أَعْرَابِيٌّ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَجَعَلَ يَتَكَلَّمُ بِكَلاَمٍ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّ مِنَ الْبَيَانِ سِحْرًا وَإِنَّ مِنَ الشِّعْرِ حُكْمًا ‏"‏ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা এক বেদুঈন এসে কথা বলা শুরু করলে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কোন কোন আলোচনা যাদুর মত হৃদয়গ্রাহী; আর কোন কোন কবিতা হিকমাতপূর্ণ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شواھد انظر الحدیثین السابقین (5009، 5010)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح بما قبله، وبما سلف عند المصنف من حديث ابن عمر (٥٠٠٧)، وهذا إسناد فيه سماك -وهو ابن حرب -وهو وإن كان صدوقا حسن الحديث إلا أن في روايته عن عكرمة -وهو مولى ابن عباس- اضطراباً وباقي رجاله ثقات. أبو عوانة: هو وضاح بن عبد الله اليشكري. وأخرجه الترمذي (٣٠٥٨) عن قتيبة بن سعيد، عن أبي عوانة، بهذا الإسناد، وقال: هذا حديث حسن صحيح. وأخرجه ابن ماجه (٣٧٥٦) من طريق زائدة بن قدامة، عن سماك، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥٧٧٨) و (٥٧٨٠)، وقد ذكرنا تتمة أحاديث الباب في "المسند". وقوله: " إن من الشعرحُكماً": بضم فسكون، أي: حِكْمة، وضبطه بعضهم بكسر الحاء وفتح الكاف على أنه جمع حِكمة. وقال ابن الأثير في "النهاية": أي: إن من الشعر كلاماً نافعاً يمنع من الجهل والسَّفَه، وينهى عنهما، قيل: أراد بها المواعظَ والأمثال التي ينتفع بها الناس، والحُكْمُ: العلمُ والفقه والقضاء بالعدل، وهو مصدر: حَكَم يَحْكُم، ويروى: "إن من الشعر لحِكمة" وهي بمعنى الحكم.









সুনান আবী দাউদ (5012)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو تُمَيْلَةَ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبُو جَعْفَرٍ النَّحْوِيُّ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ ثَابِتٍ، قَالَ حَدَّثَنِي صَخْرُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏"‏ إِنَّ مِنَ الْبَيَانِ سِحْرًا وَإِنَّ مِنَ الْعِلْمِ جَهْلاً وَإِنَّ مِنَ الشِّعْرِ حُكْمًا وَإِنَّ مِنَ الْقَوْلِ عِيَالاً ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ صَعْصَعَةُ بْنُ صُوحَانَ صَدَقَ نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَّا قَوْلُهُ ‏"‏ إِنَّ مِنَ الْبَيَانِ سِحْرًا ‏"‏ ‏.‏ فَالرَّجُلُ يَكُونُ عَلَيْهِ الْحَقُّ وَهُوَ أَلْحَنُ بِالْحُجَجِ مِنْ صَاحِبِ الْحَقِّ فَيَسْحَرُ الْقَوْمَ بِبَيَانِهِ فَيَذْهَبُ بِالْحَقِّ وَأَمَّا قَوْلُهُ ‏"‏ إِنَّ مِنَ الْعِلْمِ جَهْلاً ‏"‏ ‏.‏ فَيَتَكَلَّفُ الْعَالِمُ إِلَى عِلْمِهِ مَا لاَ يَعْلَمُ فَيُجَهِّلُهُ ذَلِكَ وَأَمَّا قَوْلُهُ ‏"‏ إِنَّ مِنَ الشِّعْرِ حُكْمًا ‏"‏ ‏.‏ فَهِيَ هَذِهِ الْمَوَاعِظُ وَالأَمْثَالُ الَّتِي يَتَّعِظُ بِهَا النَّاسُ وَأَمَّا قَوْلُهُ ‏"‏ إِنَّ مِنَ الْقَوْلِ عِيَالاً ‏"‏ ‏.‏ فَعَرْضُكَ كَلاَمَكَ وَحَدِيثَكَ عَلَى مَنْ لَيْسَ مِنْ شَأْنِهِ وَلاَ يُرِيدُهُ ‏.‏




সাখর ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু বুরাইদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ কোন কোন বর্ণনা যাদুর মত হৃদয়গ্রাহী হয়, কোন কোন ইলম অজ্ঞতাপূর্ণ হয়, কোন কোন কবিতা হিকমাতপূর্ণ হয় এবং কোন কোন কথা বোঝা হয়ে দাঁড়ায়। সা‘সাআহ ইবনু সুহান বলেন, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সঠিক বলেছেন। প্রথমত, রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর বাণী “কোন কোন বর্ণনা যাদুর মত হৃদয়গ্রাহী হয়”- প্রায় দেখা যায়, কোন ব্যক্তির নিকট অপরের হক থাকে কিন্তু সে হকদারের সঙ্গে এমন সুন্দরভাবে যুক্তিপূর্ণ কথা বলে যাতে পাওনাদারের দেনা পরিশোধ করতে হয় না। আর ‘ইলম অজ্ঞতা হয়ে থাকে’, এর অর্থ হলো, ‘আলিম ব্যক্তি না জেনেও জানার ভান করে, ফলে এটাই অজ্ঞতার কারণ হয়ে দাঁড়ায়। আর কবিতাকে হিকমাত বলার কারণ হচ্ছে, কোন কোন কবিতায় এমন নসিহতপূর্ণ থাকে যা মানুষ গ্রহণ করে থাকে। আর কোন কোন কথা বোঝাস্বরূপ হওয়ার অর্থ হলো, অনুপযুক্ত ব্যক্তির কাছে গুরুত্বপূর্ণ কথা বলা, যা সে তা শুনতে চায় না। [৫০১০]



দুর্বলঃ মিশকাত হা/৪৮০৪।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبداﷲ بن ثابت النحوي: مجہول(تق: 3241) وشیخہ صخر بن عبداﷲ مقبول (تقریب التہذیب: 2906) أي مجہول الحال ، (انوار الصحیفہ ص 174)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره دون قوله: "وإن من العلم جهلاً" وقوله: "وإن من القول عيالاً"، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي جعفر عبد الله بن ثابت وصخر بن عبد الله. أبو تميلة: هو يحيى بن واضح الأنصاري. وسعيد بن محمَّد: هو ابن سعيد الجرمي. وأخرجه أبي أبي شيبة ٨/ ٦٩٢، والبزار (٢١٠٠ - كشف الأستار) من طريق حسام بن المِصكّ، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، عن النبي ﷺ ولفظه: "إن من الشعر حكماً". وأخرج القضاعي في "مسند الشهاب" (٩٦١) من طريق عمارة بن أبي حفصة، عن عبد الله بن بريدة، عن صعصعة بن صوحان، عن علي. فذكره. وفي إسناده من قدتكلم فيه. ويشهد لقوله: "إن من البيان لسحراً وإن من الشعر لحكماً" حديث ابن عمر السالف عند المصنف برقم (٥٠٠٧)، وحديث أبى بن كعب السالف (٥٠١٠)، وما قبله من حديث ابن عباس.









সুনান আবী দাউদ (5013)


حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي خَلَفٍ، وَأَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَعِيدٍ، قَالَ مَرَّ عُمَرُ بِحَسَّانَ وَهُوَ يُنْشِدُ فِي الْمَسْجِدِ فَلَحَظَ إِلَيْهِ فَقَالَ قَدْ كُنْتُ أُنْشِدُ وَفِيهِ مَنْ هُوَ خَيْرٌ مِنْكَ ‏.‏




সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা হাসসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাসজিদে কবিতা পাঠ করছিলেন এবং ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন সেখান দিয়ে যাচ্ছিলেন। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার দিকে বক্র দৃষ্টিতে তাকালেন। তিনি বললেন, আমি মাসজিদে তখনও কবিতা পড়েছি যখন সেখানে তোমার চেয়ে উত্তম ব্যক্তিটি হাজির ছিলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث الآتي (5014)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سعيد -وهو ابن المسيب-، قال أحمد في رواية أبي طالب: هو عندنا حجة قد رأى عمر وسمع منه، إذا لم يقبل سعيد عن عمر فمن يقبل. وقال أبو حاتم: حديثه عن عمر مرسل يدخل في المسند على المجاز. وأخرجه البخاري (٣٢١٢) عن علي بن عبد الله، والنسائي في "الكبرى" (٧٩٧) و (٩٩٢٧) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وزادا فيه: ثم التفت (أى حسان) إلى أبى هريرة، فقال: أنشدك بالله أسمعتَ رسولَ الله ﷺ يقول: "أجب عني، اللهم أيده بروح القدس" قال: نعم. وانظر ما بعده. وهو في "مسند أحمد" (٢١٩٣٩)، و"صحيح ابن حبان" (٧١٤٨).









সুনান আবী দাউদ (5014)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، بِمَعْنَاهُ زَادَ فَخَشِيَ أَنْ يَرْمِيَهُ، بِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَجَازَهُ ‏.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তবে এতে রয়েছেঃ ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আশঙ্কা করলেন, তিনি যদি হাসসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বারণ করেন তবে তিনি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহি ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চুপ থাকাকে দলীল বানাবেন। তাই তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। [৫০১২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3212) صحیح مسلم (2485)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في"مصنف عبد الرزاق" (٢٠٥٠٩)، ومن طريقه أخرجه مسلم (٢٤٨٥) (١٥١) بهذا الإسناد. لكن دون الزيادة التي أشار إليها المصنف. وأخرجه مسلم (٢٤٨٥) (١٥١) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن الزهري، به. وأخرجه البخاري (٤٥٣) و (٦١٥٢)، ومسلم (٢٤٨٥) (١٥٢)، والنسائي في "الكبرى" (٩٩٢٨) من طريق شعيب، والبخاري (٦١٥٢) من طريق محمَّد بن أبي عتيق، كلاهما عن ابن شهاب الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سمع حسان ابن ثابت الأنصاري يستشهد أبا هريرة. فساقه بنحو الزيادة التي أشرنا إليها في الحديث السالف عند المصنف من طريق سعيد عن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٧٦٤٤) و (٢١٩٣٦)، و"صحيح ابن حبان" (١٦٥٣). والزيادة التي أشار إليها أبو داود: أخرجها عبد الرزاق في "مصنفه" (١٧١٦) و (٢٠٥١٠)، والطبراني في "الكبير" (٣٥٨٥) و (٣٥٨٦) لكن لم يذكرا في الحديث أبا هريرة. وانظر ما قبله. وقوله: فخشي، قال في "عون المعبود": أي: عمر ﵁. برسول الله ﷺ، أي: بإجازته ﷺ. فأجازه، أي: أجاز عمرُ حسانَ أن ينشد في المسجد.