সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُسَدَّدُ بْنُ مُسَرْهَدٍ، وَسَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، أَنَّ الْحَارِثَ بْنَ عُبَيْدٍ، حَدَّثَهُمْ عَنْ أَبِي عِمْرَانَ الْجَوْنِيِّ، عَنْ طَلْحَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ لِي جَارَيْنِ بِأَيِّهِمَا أَبْدَأُ قَالَ " بِأَدْنَاهُمَا بَابًا " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ شُعْبَةُ فِي هَذَا الْحَدِيثِ طَلْحَةُ رَجُلٌ مِنْ قُرَيْشٍ .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসুল! আমার দুই প্রতিবেশী পরিবার। তাদের মধ্যে কোন পরিবারকে আমি আগে (হাদিয়া) পাঠাবো? তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তাদের মধ্যে যে তোমার দরজার অতি নিকটে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6020)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، الحارث بن عبيد -وهو الإيادي، وإن كان فيه ضعف- تابعه شعبة عند البخاري. أبو عِمران الجوني: هو عبد الملك بن حَبيب، وطلحة: هو ابن عبد الله بن عثمان بن عُبيد الله بن معمر القرشي التيمي. وأخرجه البخاري (٢٢٥٩) و (٢٥٩٥) و (٦٠٢٠) من طريق شعبة، عن أبي عمران الجَوْني، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٤٢٣).
حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، وَعُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، قَالاَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْفُضَيْلِ، عَنْ مُغِيرَةَ، عَنْ أُمِّ مُوسَى، عَنْ عَلِيٍّ، عَلَيْهِ السَّلاَمُ قَالَ كَانَ آخِرُ كَلاَمِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " الصَّلاَةَ الصَّلاَةَ اتَّقُوا اللَّهَ فِيمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ " .
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর শেষ উপদেশ ছিলঃ সলাত, সলাত এবং দাস-দাসীদের সম্পর্কে আল্লাহকে ভয় করা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3357) ، روایۃ محمد بن فضیل عن مغیرہ بن مقسم محمولۃ علی السماع (مسند علي بن الجعد: 663) و أم موسیٰ وثقھا العجلي فالسند حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره. وهذا إسناد حسن في الشواهد من أجل أم موسى سُرِّية علي ابن أبي طالب، وجاء عند الطبري في تهذيب الآثار في قسم مسند علي بن أبى طالب ص ١٦٨ أنها أم ولد الحسن بن علي وأنها أم امرأة المغيرة بن مقسم. وثقها العجلي، وقال الدارقطني: يخرّج حديثها اعتباراً، وصحح حديثها الطبري في "تهذيب الآثار"، والضياء المقدسي في "المختارة " (٨٠٨). وأخرجه ابن ماجه (٢٦٩٨) عن سهل بن أبي سهل، عن محمَّد بن الفضيل، بهذا الاسناد. وهو في "مسند أحمد" (٥٨٥). وله شاهد من حديث أم سلمة عند ابن ماجه (١٦٢٥) بسند رجاله ثقات إلا أن فيه انقطاعا، وقد فاتنا التنبيه على هذا الانقطاع في تعليقنا على حديث علي في "المسند" (٥٨٥)، واستدركناه في "المسند" برقم (٢٦٤٨٣). ولفظه عند ابن ماجه: أن رسول الله ﷺ كان يقول في مرضه الذي توفي فيه: "الصلاةَ وما ملكت أيمانكم" فما زال يقولها حتى ما يقيصُ بها لسانه (أي: ما يقدر على الإفصاح بها). وآخر من حديث أنس عند ابن ماجه أيضاً (٢٦٩٧)، وإسناده صحيح. قوله: "وما ملكلت أيمانكم"، قال السندي في "حاشيته على المسند": قيل: الأظهر أن المراد: المماليك، وإنما قَرَنه بالصلاة ليعلم أن التي م بمقدار حاجتهم من النفقة والكسوة واجب على مَنْ ملكهم وجوبَ الصلاة التي لا سَعَةَ في تركها، قلت: إن هذا العنوان في الكتاب والسنة صار كالعَلَم للمماليك، وقيل: أراد به الزكاة، لأن القرآن والحديث إذا ذكر فيهما الصلاة فالغالب ذكر الزكاة بعدها.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنِ الْمَعْرُورِ بْنِ سُوَيْدٍ، قَالَ رَأَيْتُ أَبَا ذَرٍّ بِالرَّبَذَةِ وَعَلَيْهِ بُرْدٌ غَلِيظٌ وَعَلَى غُلاَمِهِ مِثْلُهُ قَالَ فَقَالَ الْقَوْمُ يَا أَبَا ذَرٍّ لَوْ كُنْتَ أَخَذْتَ الَّذِي عَلَى غُلاَمِكَ فَجَعَلْتَهُ مَعَ هَذَا فَكَانَتْ حُلَّةً وَكَسَوْتَ غُلاَمَكَ ثَوْبًا غَيْرَهُ . قَالَ فَقَالَ أَبُو ذَرٍّ إِنِّي كُنْتُ سَابَبْتُ رَجُلاً وَكَانَتْ أُمُّهُ أَعْجَمِيَّةً فَعَيَّرْتُهُ بِأُمِّهِ فَشَكَانِي إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " يَا أَبَا ذَرٍّ إِنَّكَ امْرُؤٌ فِيكَ جَاهِلِيَّةٌ " . قَالَ " إِنَّهُمْ إِخْوَانُكُمْ فَضَّلَكُمُ اللَّهُ عَلَيْهِمْ فَمَنْ لَمْ يُلاَئِمْكُمْ فَبِيعُوهُ وَلاَ تُعَذِّبُوا خَلْقَ اللَّهِ " .
আল-মা’রূর ইবনু সুয়াইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি আর-রাবাযাহ নামক স্হানে আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে দেখতে পেলাম। তখন তিনি একটি চাদর পরিহিত ছিলেন এবং তার দাসও অনুরূপ চাদর পরিহিত ছিল। আল-মা’রুর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, লোকেরা বললো, হে আবূ যার ! আপনি যদি আপনার দাস যে কাপড় পরেছে তা নিয়ে নিতেন তাহলে আপনার জোড়া পুরা হতো আর আপনার দাসকে অন্য পোশাক পরাতেন তাহলে ভাল হতো। বর্ণনাকারী বলেন, আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি এক লোককে, (যার মা অনারব ছিল) গালি দিয়াছিলাম এবং মন্দ ব্যবহার করেছিলাম। এতে সে আমার বিরুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট অভিযোগ করলে তিনি বললেনঃ হে আবূ যার! তুমি এমন ব্যক্তি যে, তোমার মধ্যে জাহিলিয়াত রয়েছে। তিনি আরো বললেনঃ এরা তোমাদের ভাই; আল্লাহ তাদের উপর তোমাদেরকে মর্যাদা দিয়াছেন। এদের মধ্যে যাকে তোমাদের ভাল না লাগে তাকে বিক্রি করে দাও। তোমরা আল্লাহর সৃষ্টিকে শাস্তি দিও না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6050) صحیح مسلم (1661) ، مشکوۃ المصابیح (3369)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد الضبي، والأعمش: هو سيمان ابن مهران. وأخرجه البخاري (٣٠)، ومسلم (١٦٦١)، والترمذي (٢٠٥٩) من طريق واصل الأحدب عن المعرور بن سويد، بمعناه. قال المنذري: وليس في حديث جميعهم: "فمن لم يلائمكم فبيعوه ولا تعذبوا خلق الله". وهذه الزيادة سترد عند المؤلف برقم (٥١٦١). وانظر ما بعده. الربذة، بفتح الراء والباء والذال: موضع بالبادية، بينه وبين المدينة ثلاث مراحل، قريب من ذات عرق. وفي الحديث النهي عن سب العبيد وتعييرهم بوالديهم، والحث على الإحسان إليهم، والرفق بهم، فلا يجوز لأحد تعيير أحد بشيء من المكروه يعرفه في آبائه وخاصة نفسُه، كما نهى عن الفخر بالآباء، ويلحق بالعبد من في معناه من أجير وخادم وضعيف، وكذا الدواب ينبغى أن يحسن إليها، ولا تكلف من العمل ما لا تطيق الدواب عليه، فإن كلفه ذلك، لزمه إعانته بنفسه أو بغيره. وفيه عدم الترفع على المسلم وإن كان عبداً ونحوه من الضعفة؛ لأن الله تعالى قال: ﴿إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِنْدَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ﴾ [الحجرات: ١٣]، وقد تظاهرت الأدلة على الأمر باللطف بالضعفة وخفض الجناح لهم، وعلى النهي عن احتقارهم والترفع عليهم. وفيه منع تكليفه من العمل ما لا يطيق أصلاً، أو لا يطيق الدوام عليه؛ لأن النهي للتحريم بلا خلاف، فإن كلفه ذلك أعانه بنفسه أو بغيره. قاله العيني في "عمدته " ١/ ٢٠٨.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنِ الْمَعْرُورِ بْنِ سُوَيْدٍ، قَالَ دَخَلْنَا عَلَى أَبِي ذَرٍّ بِالرَّبَذَةِ فَإِذَا عَلَيْهِ بُرْدٌ وَعَلَى غُلاَمِهِ مِثْلُهُ فَقُلْنَا يَا أَبَا ذَرٍّ لَوْ أَخَذْتَ بُرْدَ غُلاَمِكَ إِلَى بُرْدِكَ فَكَانَتْ حُلَّةً وَكَسَوْتَهُ ثَوْبًا غَيْرَهُ قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِخْوَانُكُمْ جَعَلَهُمُ اللَّهُ تَحْتَ أَيْدِيكُمْ فَمَنْ كَانَ أَخُوهُ تَحْتَ يَدَيْهِ فَلْيُطْعِمْهُ مِمَّا يَأْكُلُ وَلْيَكْسُهُ مِمَّا يَلْبَسُ وَلاَ يُكَلِّفْهُ مَا يَغْلِبُهُ فَإِنْ كَلَّفَهُ مَا يَغْلِبُهُ فَلْيُعِنْهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ ابْنُ نُمَيْرٍ عَنِ الأَعْمَشِ نَحْوَهُ .
আল-মা’রূর ইবনু সুয়াইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমরা আর-রাবাযাহ নামক স্হানে আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সঙ্গে সাক্ষাত করি। এ সময় তিনি ও তার দাস একই ধরনের চাদর পরিহিত ছিলেন। আমরা বললাম, আপনি যদি আপনার দাসের চাদরটি নিয়ে নিতেন তাহলে আপনার জোড়া পুরা হতো। আর তাকে অন্য পোশাক পরাতেন। তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ তোমাদের ভাইয়েরা, আল্লাহ এদেরকে তোমাদের অধীন করেছেন। সুতরাং যার অধীনে তার ভাই রয়েছে তার উচিৎ সে নিজে যা খায় তাকেও তাই খেতে দেয়া, নিজে যা পরিধান করে তাকেও তা—ই পরতে দেয়া এবং তার অসাধ্য কোন কাজ তার উপর না চাপানো। আর যদি এমন কোন কষ্টসাধ্য কাজের ভার তাকে দেয়া হয় তাহলে সে যেন তাকে সাহায্য করে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1661)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدد: هو ابن مسرهد الأسَدي. وأخرجه مسلم (١٦٦١) من طريق عيسى بن يونس، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٠٥٠)، ومسلم (١٦٦١)، وابن ماجه (٣٦٩٠) من طرق عن الأعمش، به. وأخرجه البخاري (٣٠) و (٢٥٤٥)، ومسلم (١٦٦١)، والترمذي (٢٠٥٩) من طريق واصل الأحدب، عن المعرور بن سويد، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٤٠٩). وانظر ما قبله وما سيأتي برقم (٥١٦١).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، ح وَحَدَّثَنَا ابْنُ الْمُثَنَّى، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ الأَنْصَارِيِّ، قَالَ كُنْتُ أَضْرِبُ غُلاَمًا لِي فَسَمِعْتُ مِنْ خَلْفِي صَوْتًا " اعْلَمْ أَبَا مَسْعُودٍ " . قَالَ ابْنُ الْمُثَنَّى مَرَّتَيْنِ " لَلَّهُ أَقْدَرُ عَلَيْكَ مِنْكَ عَلَيْهِ " . فَالْتَفَتُّ فَإِذَا هُوَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ هُوَ حُرٌّ لِوَجْهِ اللَّهِ . قَالَ " أَمَا إِنَّكَ لَوْ لَمْ تَفْعَلْ لَلَفَعَتْكَ النَّارُ أَوْ " لَمَسَّتْكَ النَّارُ " .
আবূ মাস’ঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমার এক ক্রীতদাসকে প্রহার করছিলাম। এ সময় আমার পিছন হতে একটি শব্দ শুনতে পেলাম, হে আবূ মা’সঊদ! জেনে রাখো, আল্লাহ তোমার উপর এর চেয়ে বেশী ক্ষমতাবান যতটুকু তুমি তার উপর ক্ষমতাবান। আমি পিছন হতে তার এরূপ ডাক দু’বার শুনতে পেলাম। আমি পিছনের দিকে তাকিয়ে দেখি, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আমি বললামঃ হে আল্লাহর রাসুল! সে আল্লাহর সন্তষ্টির জন্য স্বাধীন (আমি তাকে মুক্ত করে দিলাম)। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি যদি তাকে মুক্ত না করে দিতে তাহলে জাহান্নামের আগুন তোমাকে গ্রাস করতো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1659)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن المثنى: هو محمَّد العنزي، وأبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وإبراهيم التيمي: هو ابن يزيد بن شريك. وأخرجه مسلم (١٦٥٩) عن محمَّد بن العلاء، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم أيضاً (١٦٥٩) من طرق عن الأعمش به. وانظر ما بعده. وقوله: "للفعتك النار". قال الخطابي: معناه: شملتك من جميع نواحيك، ومنه قولهم: تلفع الرجل بالثوب: إذا اشتمل به.
حَدَّثَنَا أَبُو كَامِلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ، عَنِ الأَعْمَشِ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ نَحْوَهُ قَالَ كُنْتُ أَضْرِبُ غُلاَمًا لِي أَسْوَدَ بِالسَّوْطِ وَلَمْ يَذْكُرْ أَمْرَ الْعِتْقِ .
আল-আ’মাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আল-আ’মাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এ সানাদে পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরুপ বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি আমার এক গোলামকে চাবুক দিয়ে প্রহার করেছিলাম। এতে ‘দাসত্বমুক্ত’ করার কথা উল্লেখ নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1659)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو كامل: هو فضيل بن حسين الجحدري، وعبد الواحد: هو ابن زياد العبدي. وأخرجه مسلم (١٦٥٩) عن أبي كامل، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (٢٠٦٢) من طريق سفيان الثوري، عن الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٠٨٧) و (٢٢٣٥٤). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرٍو الرَّازِيُّ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ مُوَرِّقٍ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ لاَءَمَكُمْ مِنْ مَمْلُوكِيكُمْ فَأَطْعِمُوهُ مِمَّا تَأْكُلُونَ وَاكْسُوهُ مِمَّا تَكْتَسُونَ وَمَنْ لَمْ يُلاَئِمْكُمْ مِنْهُمْ فَبِيعُوهُ وَلاَ تُعَذِّبُوا خَلْقَ اللَّهِ " .
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের দাস-দাসীর মধ্যে যারা তোমাদেরকে খুশি করে তাদেরকে তোমরা যা খাও তা-ই খেতে দাও এবং তোমরা যা পরিধান করো তা-এই পরতে দাও। আর যেসব দাস তোমাদের খুশি করে না তাদেরকে বিক্রি করো। তোমরা আল্লাহর সৃষ্টিজীবকে শাস্তি দিও না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الشيخين إلا أن مُورِّقاً -وهو ابن مُشَمْرِج العِجْلي- لم يسمع من أبي ذر فيما قاله أبو زرعة الرازي والدارقطني. جرير: هو ابن عبد الحميد الضبي، ومنصور: هو ابن المعتمر، ومجاهد: هو ابن جبر. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٨/ ٧ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه البزار في "مسنده" (٣٩٢٣) عن يوسف بن موسى، عن جرير بن عبد الحميد، به. وأخرجه الخرائطي في "مساوئ الأخلاق" (٧٢٠)، وفي "مكارم الأخلاق" (٥١٨)، والبيهقي في "الشعب" (٨٥٦٠) من طريق سفيان الثوري، عن منصور، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٤٨٣). وقد سلفت أجزاء هذا الحديث بالرقمين (٥١٥٧) و (٥١٥٨) بإسناد صحيح. وله شاهد من حديث عبد الرحمن بن يزيد، عن أبيه عند أحمد (١٦٤٠٩) وسنده حسن في الشواهد وانظر تمام تخريجه فيه.
حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى، أَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ زُفَرَ، عَنْ بَعْضِ بَنِي رَافِعِ بْنِ مَكِيثٍ، عَنْ رَافِعِ بْنِ مَكِيثٍ، وَكَانَ، مِمَّنْ شَهِدَ الْحُدَيْبِيَةَ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " حُسْنُ الْمَلَكَةِ نَمَاءٌ وَسُوءُ الْخُلُقِ شُؤْمٌ " .
রাফি’ ইবনু মাকীস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি হুদায়বিয়ার সন্ধিতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে অংশগ্রহণকারীদের মধ্যে অন্যতম ছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ (দাস-দাসী বা চাকর–চাকরানীর সাথে) উত্তম ব্যবহার প্রাচূর্য বয়ে আনে এবং মন্দ আচরণ দুর্ভাগ্য টেনে আনে।[৫১৬০]
দুর্বলঃ যঈফাহ হা/৭৯৬।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عثمان بن زفر الدمشقي مجہول (تقریب التہذیب: 4469) لم یوثقہ غیر ابن حبان ، (انوار الصحیفہ ص 179)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لإبهام راويه عن رافع بن مَكِيث، ولجهالة عثمان بن زُفَر -وهو الجهني-. عبد الرزاق: هو ابن همام الصنعاني، ومعمر: هو ابن راشد البصري. وهو عند عبد الرزاق في "مصنفه" (٢٠١١٨)، ومن طريقه أخرجه أحمد في "مسنده" (١٦٠٧٩)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٥٦٢)، وأبو يعلى (١٥٤٤)، والطبراني في "الكبير" (٤٤٥١)، والقضاعي (٢٤٤) و (٢٤٥)، وابن الأثير في "أسد الغابة" ٢/ ٢٠٠. بعضهم بلفظ: "حسن الملكة نماء"، وبعضهم: "حسن الخلق نماء". وأورده الهيثمي في "مجمع الزوائد" ٨/ ٢٢، وقال: رواه أحمد من طريق بعض بني رافع، ولم يسمه، وبقية رجاله ثقات. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" ٣/ ٣٠٢ من طريق عبد الله -وهو ابن المبارك- عن معمر، به. وانظر ما بعده. حسن الملكة بضم الحاء، أي: حسن الصنيع إلى المماليك والخدم. وقال القاضي: إن حسن الملكة يوجب اليمن، إذ الغالب أنهم إذا رأوا السيد أحسن إليهم، كانوا أشفق عليه، وأطوع له، وأسعى في حقه، وكل ذلك يؤدي إلى اليمن والبركة، وسوء الخلق يورث البغض والنفرة ويثير اللجاج والعناد وقصد الأنفس والأموال. نقله صاحب "مرقاة المفاتيح".
حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُصَفَّى، حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ زُفَرَ، قَالَ حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ رَافِعِ بْنِ مَكِيثٍ، عَنْ عَمِّهِ الْحَارِثِ بْنِ رَافِعِ بْنِ مَكِيثٍ، وَكَانَ، رَافِعٌ مِنْ جُهَيْنَةَ قَدْ شَهِدَ الْحُدَيْبِيَةَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " حُسْنُ الْمَلَكَةِ نَمَاءٌ وَسُوءُ الْخُلُقِ شُؤْمٌ " .
আল-হারিস ইবনু রাফি’ ইবনু মাকীস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন জুহাইনাহ গোত্রভুক্ত, তিনি রাসূলুল্লাহ্র (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সঙ্গে হুদায়বিয়াতে উপস্থিত ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ উত্তম ব্যবহার সৌভাগ্য বয়ে আনে, আর মন্দ ব্যবহার দুর্ভাগ্য বয়ে আনে।[৫১৬১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (5162) ، (انوار الصحیفہ ص 179)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضيف لضعف بقية -وهو ابن الوليد الكلاعي-، ولجهالة عثمان بن زفر، والحارث بن رافع بن مكيث ذكره ابن حبان في التابعين من الثقات، وقال ابن القطان: لا يُعرف. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ الْهَمْدَانِيُّ، وَأَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، - وَهَذَا حَدِيثُ الْهَمْدَانِيِّ وَهُوَ أَتَمُّ - قَالاَ حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ قَالَ أَخْبَرَنِي أَبُو هَانِئٍ الْخَوْلاَنِيُّ عَنِ الْعَبَّاسِ بْنِ جُلَيْدٍ الْحَجْرِيِّ قَالَ سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَمْرٍو يَقُولُ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَمْ نَعْفُو عَنِ الْخَادِمِ فَصَمَتَ ثُمَّ أَعَادَ عَلَيْهِ الْكَلاَمَ فَصَمَتَ فَلَمَّا كَانَ فِي الثَّالِثَةِ قَالَ " اعْفُوا عَنْهُ فِي كُلِّ يَوْمٍ سَبْعِينَ مَرَّةً " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বললো, হে আল্লাহর রাসুল! আমরা কাজের লোককে প্রতিদিন কতবার মাফ করব? তিনি চুপ থাকলেন। লোকটি আবার একই প্রশ্ন করলে এবারও তিনি চুপ থাকলেন। তৃতীয় বার প্রশ্ন করলে তিনি বললেনঃ প্রতিদিন সত্তর বার।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3367)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله المصري، وأبو هانئ الخولاني: هو حُمَيد بن هانئ. وأخرجه الترمذي (٢٠٦٥) من طريق ابن وَهْب، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي أيضاً (٢٠٦٤) من طريق رِشْدين بن سعد، عن أبي هانئ الخولاني، به. وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب. وهو في "مسند أحمد" (٥٦٣٥) و (٥٨٩٩). وانظر تتمة كلامنا عليه فيه.
حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، قَالَ أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا مُؤَمَّلُ بْنُ الْفَضْلِ الْحَرَّانِيُّ، قَالَ أَخْبَرَنَا عِيسَى، حَدَّثَنَا فُضَيْلٌ، - يَعْنِي ابْنَ غَزْوَانَ - عَنِ ابْنِ أَبِي نُعْمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبُو الْقَاسِمِ، نَبِيُّ التَّوْبَةِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ قَذَفَ مَمْلُوكَهُ وَهُوَ بَرِيءٌ مِمَّا قَالَ جُلِدَ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حَدًّا " . قَالَ مُؤَمَّلٌ حَدَّثَنَا عِيسَى عَنِ الْفُضَيْلِ يَعْنِي ابْنَ غَزْوَانَ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তাওবাহ্র নবী আবুল ক্বাসিম (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি তার নির্দোষ গোলামের উপর মিথ্যা অপবাদ দিবে, ক্বিয়ামাতের দিন তাকে বেত্রাঘাত করা হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6858) صحیح مسلم (1660)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عيسى: هو ابن يونس السَّبيعي، وابن أبي نُعْم: هو عبد الرحمن البَجَليّ. وأخرجه البخاري (٦٨٥٨)، ومسلم (١٦٦٠)، والترمذي (٢٠٦١)، والنسائي في "الكبرى" (٧٣١٢) من طرق عن فقيل بن غزوان، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح، وقال النسائي: هذا حديث جيد. وهو في "مسند أحمد" (٩٥٦٧). قال النووي: فيه إشارة إلى أنه لا حد على قاذف العبد في الدنيا، وهذا مجمع عليه، لكن يعزر قاذفه؛ لأن العبد ليس بمحصن، وسواء في هذا كله من هو كامل الرق، وليس فيه سبب حرية والمدبر والمكاتب وأم الولد، ومَن بعضه حرٌّ، هذا في حكم الدنيا، أما في حكم الآخرة فيُستوفى له الحد من قاذفه، لاستواء الأحرار والعبيد في الآخرة.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا فُضَيْلُ بْنُ عِيَاضٍ، عَنْ حُصَيْنٍ، عَنْ هِلاَلِ بْنِ يِسَافٍ، قَالَ كُنَّا نُزُولاً فِي دَارِ سُوَيْدِ بْنِ مُقَرِّنٍ وَفِينَا شَيْخٌ فِيهِ حِدَّةٌ وَمَعَهُ جَارِيَةٌ فَلَطَمَ وَجْهَهَا فَمَا رَأَيْتُ سُوَيْدًا أَشَدَّ غَضَبًا مِنْهُ ذَاكَ الْيَوْمَ قَالَ عَجَزَ عَلَيْكَ إِلاَّ حُرُّ وَجْهِهَا لَقَدْ رَأَيْتُنَا سَابِعَ سَبْعَةٍ مِنْ وَلَدِ مُقَرِّنٍ وَمَا لَنَا إِلاَّ خَادِمٌ فَلَطَمَ أَصْغَرُنَا وَجْهَهَا فَأَمَرَنَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِعِتْقِهَا .
হিলাল ইবনু ইয়াসাফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা সুয়াইদ ইবনু মুক্বাররিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর বাড়ীতে থাকতাম। আমাদের সঙ্গে একজন মেজাজী বৃদ্ধ ছিলেন এবং তার সঙ্গে একটি দাসী ছিল। তিনি তার চেহারায় চড় মারলেন। এ কারনে, সুয়াইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এতোটা উত্তেজিত হয়েছিলেন যে, আমরা তাকে এমন উত্তেজিত হতে আর দেখিনি। তিনি বললেন, একে আযাদ করা ব্যতীত তোমার জন্য অন্য কোন পথ নেই। তুমি দেখছো যে, আমাদের মুক্বাররিনের সাতটি সন্তান। আমাদের মাত্র একজন খাদেম ছিল। আমাদের কনিষ্ঠজন তার মুখে চড় মেরেছিল বিধায় নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে তাকে আযাদ করার নির্দেশ দিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1658)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدد: هو ابن مسرهد الأسَدي، وحصين: هو ابن عبد الرحمن السلمي. وأخرجه مسلم (١٦٥٨)، والترمذي (١٦٢٣)، والنسائي في "الكبرى" (٤٩٩٤) من طريقين عن حصين، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه مسلم (١٦٥٨)، والنسائي (٤٩٩٣) من طريق أبي شعبة العراقي -وهو الكوفي مولى سويد بن مُقَرِّن-، عن سويد بن مُقَرّن. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٧٤١) و (٢٣٧٤٢). وانظر ما بعده. وقوله: إلا حُر وجهها. حُرُّ الوجه: صفحته وما رقَّ من بشرته، وحُرُّ كل شيءِ: أرفعه وأفضله قدراً. وقوله: ما لنا إلا خادم. قال النووي: معناه الخادم بلا هاء يطلق على الجارية كما يطلق على الرجل، ولا يقال: خادمة بالهاء إلا في لغة شاذة قليلة.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ سُفْيَانَ، قَالَ حَدَّثَنِي سَلَمَةُ بْنُ كُهَيْلٍ، قَالَ حَدَّثَنِي مُعَاوِيَةُ بْنُ سُوَيْدِ بْنِ مُقَرِّنٍ، قَالَ لَطَمْتُ مَوْلًى لَنَا فَدَعَاهُ أَبِي وَدَعَانِي فَقَالَ اقْتَصَّ مِنْهُ فَإِنَّا مَعْشَرَ بَنِي مُقَرِّنٍ كُنَّا سَبْعَةً عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَلَيْسَ لَنَا إِلاَّ خَادِمٌ . فَلَطَمَهَا رَجُلٌ مِنَّا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَعْتِقُوهَا " . قَالُوا إِنَّهُ لَيْسَ لَنَا خَادِمٌ غَيْرَهَا . قَالَ " فَلْتَخْدُمْهُمْ حَتَّى يَسْتَغْنُوا فَإِذَا اسْتَغْنَوْا فَلْيُعْتِقُوهَا " .
মু’আবিয়াহ ইবনু সুয়াইদ ইবনু মুক্বাররিন (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমাদের এক দাসকে চড় মারলাম। আমার পিতা তাকে ও আমাকে ডেকে বললেন, তুমি তার থেকে প্রতিশোধ নাও। আমার নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মুক্বাররিন গোত্রের সাত ভাই ছিলাম। আমাদের মাত্র একটি খাদেম ছিল। আমাদের মধ্যকার একজন তাকে চর মারলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ একে মুক্ত করে দাও। তারা বললো, এছাড়া আমাদের কোন খাদেম নেই। তিনি বললেনঃ এরা স্বাবলম্বী না হওয়া পর্যন্ত সে তাদের সেবা করবে। তারা স্বাবলম্বী হলে তাকে যেন মুক্ত করে দেয়া হয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1658)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطان، وسفيان: هو ابن سعيد الثوري. وأخرجه مسلم (١٦٥٨)، والنسائي في "الكبرى" (٤٩٩٢) من طريقين عن سفيان، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٩٩٠) و (٤٩٩١) من طريقين عن معاوية بن سويد، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٧٠٥) و (٢٣٧٤٠). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَأَبُو كَامِلٍ قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ فِرَاسٍ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، ذَكْوَانَ عَنْ زَاذَانَ، قَالَ أَتَيْتُ ابْنَ عُمَرَ وَقَدْ أَعْتَقَ مَمْلُوكًا لَهُ فَأَخَذَ مِنَ الأَرْضِ عُودًا أَوْ شَيْئًا فَقَالَ مَا لِي فِيهِ مِنَ الأَجْرِ مَا يَسْوَى هَذَا سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنْ لَطَمَ مَمْلُوكَهُ أَوْ ضَرَبَهُ فَكَفَّارَتُهُ أَنْ يُعْتِقَهُ " .
যাজান (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি ইবনু ‘উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। তিনি তার দাসকে মুক্ত করে দিলেন। অতঃপর তিনি মাটি হতে এক টুকরা কাঠ বা অন্য কিছু উঠিয়ে বললেন, একে মুক্ত করায় আমার এর সমানও নেকি নেই। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ যে ব্যক্তি তার ক্রীতদাসকে চড় মারবে বা মারধর করবে, এর কাফফারাহ হলো তাকে মুক্ত করে দেয়া।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1657)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو كامل: هوْ فضيل بن حسين الجحدري، وأبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري،، وفِراس: هو ابن يحيى الهَمْدانى الخَارفي، وزاذان: هو أبو عمر الكِنْدِىُّ البزاز. وأخرجه مسلم (١٦٥٧) من طرق عن فراس، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٤٧٨٤) و (٥٢٦٦). وقوله: ما يَسوى: قال النووي: في بعض النسخ -يعني من مسلم- يساوي، بالألف، وهذه هي اللغة الصحيحة المعروفة، والأولى عدّها أهل اللغة في لحسّن العوامّ، وأجاب بعض العلماء عن هذه اللفظة بأنها تغيير من بعض الرواة، لا أن ابن عمر نطق بها.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِنَّ الْعَبْدَ إِذَا نَصَحَ لِسَيِّدِهِ وَأَحْسَنَ عِبَادَةَ اللَّهِ فَلَهُ أَجْرُهُ مَرَّتَيْنِ " .
আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে দাস যথাযথভাবে তার মালিকের প্রতি কর্তব্য আদায় করে এবং সুন্দরভাবে আল্লাহর ‘ইবাদতও করে সে দ্বিগুণ সওয়াব পাবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2546) صحیح مسلم (1664)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مالك: هو ابن أنس، ونافع: هو مولى ابن عمر. وهو عند مالك في "الموطأ" ٢/ ٩٨١، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٥٤٦)، ومسلم (١٦٦٤). وأخرجه البخاري (٢٥٥٠)، ومسلم بإثر (١٦٦٤) من طريق عبيد الله بن عمر، ومسلم بإثر (١٦٦٤) من طريق أسامة بن زيد الليثي، كلاهما عن نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٧٣).
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ الْحُبَابِ، عَنْ عَمَّارِ بْنِ رُزَيْقٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عِيسَى، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ خَبَّبَ زَوْجَةَ امْرِئٍ أَوْ مَمْلُوكَهُ فَلَيْسَ مِنَّا " .
আবূ হুরাইয়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি অন্যের স্ত্রীকে তাঁর স্বামীর বিরুদ্ধে অথবা ক্রীতদাসকে তাঁর মনিবের বিরুদ্ধে উত্তেজিত করে সে আমাদের দলভুক্ত নয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (3262) ، انظر الحدیث السابق (2175)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد سلف برقم (٢١٧٥). وقوله: خبب: يريد أفسد وخدع، وأصلُه من الخَبّ، وهو الخَدَّاع، ورجل خَبٌ، ويقال: فلان خَبٌّ ضَبٌّ: إذا كان يسعى بين الناس بالفساد.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ رَجُلاً، اطَّلَعَ مِنْ بَعْضِ حُجَرِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَامَ إِلَيْهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِمِشْقَصٍ أَوْ مَشَاقِصَ - قَالَ - فَكَأَنِّي أَنْظُرُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَخْتِلُهُ لِيَطْعُنَهُ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক হুজরাতে উঁকি মারলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক বা একাধিক তীর-ফলক নিয়ে তার দিকে দাঁড়ালেন। বর্ণনাকারী বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকটির চোখ ফুঁড়ে দেয়ার জন্য যেভাবে তাকে খুঁজছিলেন সে দৃশ্য এখনো যেন আমার চোখের সামনে ভাসছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6242) صحیح مسلم (2157)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمَّد بن عبيد: هو ابن حِسَاب الغُبَري، وحمّاد: هو ابن زيد. وأخرجه البخاري (٦٢٤٢) و (٦٩٠٠)، ومسلم (٢١٥٧) من طرق عن حمّاد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٨٨٩)، والترمذى (٢٩٠٥) من طريق حميد الطويل، والنسائي في "الكبرى" (٧٠٣٤) بنحوه من طريق إسحاق بن عبد الله، كلاهما عن أنس. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٣٥٠٧). المِشقص كمِنْبَر: نصل عريض، وقوله: يختله، قال الخطابي معناه: يراوده ويطلبه من حيث لايشعر.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ سُهَيْلٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو هُرَيْرَةَ، أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنِ اطَّلَعَ فِي دَارِ قَوْمٍ بِغَيْرِ إِذْنِهِمْ فَفَقَأُوا عَيْنَهُ فَقَدْ هَدَرَتْ عَيْنُهُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: কোন ব্যক্তি যদি কোন গোত্রের ঘরে তাদের অনুমতি ছাড়া উঁকি মারে এবং তারা তার চোখ ফুঁড়ে দেয় তাহলে এর কোন ক্ষতিপূরণ নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2158)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة البصري، وسهيل: هو ابن أبي صالح السمان. وأخرجه مسلم (٢١٥٨) من طريق جرير، عن سُهيل، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه البخاري (٦٨٨٨) و (٦٩٠٢)، ومسلم (٢١٥٨)، والنسائي في "الكبرى" (٧٠٣٧) من طريق عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، والنسائي (٧٠٣٦) من طريق بشير بن نَهيك، كلاهما عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٩٣٦٠)، و "صحيح ابن حبان" (٦٠٠٢) و (٦٠٠٣) و (٦٠٠٤). وقال الخطابي تعليقاً على قوله: " فقد هدرت عينه": في هذا بيان إبطال القود، إسقاط الدية عنه، وقد روى عن عمر بن الخطاب ﵁ أنه أهدرها، وعن أبي هريرة مثل ذلك، إليه ذهب الشافعي، وقال أبو حنيفة: إذا فعل ذلك ضمن الجناية، وذلك لأنه قد كان يمكنه أن يدفعه عن النظر والاطلاع عليه بالاحتجاب عنه، وسدّ الخصاص، والتقدم إليه بالكلام ونحوه، فإذا لم يفعل ذلك، وعمد إلى فقء عينه كان ضامناً لها، وليس النظر بأكثر من الدخول عليه بنفسه وتأول الحديث على معنى التغليظ والوعيد.
حَدَّثَنَا الرَّبِيعُ بْنُ سُلَيْمَانَ الْمُؤَذِّنُ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ، - يَعْنِي ابْنَ بِلاَلٍ - عَنْ كَثِيرٍ، عَنْ وَلِيدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِذَا دَخَلَ الْبَصَرُ فَلاَ إِذْنَ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ চোখ প্রবেশ করলে এরপর অনুমতি নেয়ার দরকার থাকলো কই। [৫১৭১]
দুর্বল: যঈকাহ হা/২৫৮৬
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، أخرجہ أحمد (2/366) کثیر بن زید والولید بن رباح کلاھما حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. كثير -وهو ابن زيد الأسلمي- والوليد -وهو ابن رباح الدَّوسي- صدوقان. وحسنه الحافظ ابن حجر في "الفتح" ١١/ ٢٤. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٨/ ٣٣٩ من طريق الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٨٧٨٦)، والبخاري في "الأدب المفرد" (١٠٨٩) من طريقين عن سليمان بن بلال، والبخاري في "الأدب المفرد" (١٠٨٢) من طريق سفيان بن حمزة، والطبراني في "الأوسط" (١٣٧٢) من طريق الوليد بن أبي خيرة، ثلاثتهم عن كثير بن زيد، به. وفي الباب عن ثوبان رفعه: " لا يحل لامرىٍ من المسلمين أن ينظر في جوف بيت امرئِ حتى يستأذن، فإن نظر فقد دخل"، وقد سلف برقم (٩٥). وهو في "مسند أحمد" (٢٢٤١٥). وآخر عن سهل بن سعد قال: اطَّلع رجل من جُحر في حجرة النبي ﷺ ومعه مِدْرى (أي: مشط) يحكُّ به رأسه، فقال: "لو أعلمك تنظر، لطعنتُ به عينك، إنما جُعِلَ الاستئذان من أجل البصر وهو متفق عليه. وهو عند أحمد في "المسند" برقم (٢٢٨٠٢). قوله: "إذا دخل البصر"، قال السندي في "حاشيته على المسند": أي: إذا دخل بصر أحدٍ في بيت صاحبه، فكانه دخل فيه، فلا حاجة له إلى الإذن للدخول، والمراد تقبيح إدخال البصر في بيت آخَرَ، وأنه بمنزلةْ الدخول، لا أنه يجوز بعده الدخول بلا إذن.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، ح وَحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا حَفْصٌ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ طَلْحَةَ، عَنْ هُزَيْلٍ، قَالَ جَاءَ رَجُلٌ - قَالَ عُثْمَانُ سَعْدُ بْنُ أَبِي وَقَّاصٍ - فَوَقَفَ عَلَى بَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم يَسْتَأْذِنُ فَقَامَ عَلَى الْبَابِ - قَالَ عُثْمَانُ مُسْتَقْبِلَ الْبَابِ - فَقَالَ لَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " هَكَذَا عَنْكَ أَوْ هَكَذَا فَإِنَّمَا الاِسْتِئْذَانُ مِنَ النَّظَرِ " .
হুযাইল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, একদা এক ব্যক্তি অর্থাৎ সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরের দরজা বরাবর মুখ করে দাঁড়িয়ে ভেতরে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ দরজার ডান অথবা বাম দিকে সরে দাঁড়াও। কেননা চোখের দৃষ্টির কারণেই অনুমতি নেয়ার ব্যবস্থা রাখা হয়েছে।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، الأعمش مدلس وعنعن ، وفی الروایۃ الثالثۃ: الرجل ھو ھزیل بن شرحبیل والحدیث السابق (الأصل: 5173) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 179)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات. جرير: هو ابن عبد الحميد الضبي، وحفص: هو ابن غياث النخعي، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وطلحة: هو ابن مصرف اليامي، وهزيل: هو ابن شرحبيل الأودي، وهو ثقة مخضرم، وسعد هكذا جاء مبهماً، وأورده المزي في "تحفة الأشراف" ٣/ ٣٢٢ في مسند سعد بن أبي وقاص، وجاء عند بعض من خرّج الحديث سعد بن عبادة، وعند بعضهم سعد بن معاذ! وصحح أبو حاتم أنه سعد بن عبادة. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (٨٨٢٥)، والضياء في "المختارة" (١٠٧٤) من طريق أبي داود، بإسناده الأول. وأخرجه الضياء في "المختارة" (١٠٧٥) من طريق أبي داود بإسناده الثاني. وهو عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" ٨/ ٧٥٧. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" ٥/ ٢٤ من طريق قتية بن سعيد، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٨/ ٣٣٩ من طريق أبي الربيع الزَّهْرانىِّ، وفي "شعب الإيمان" (٨٨٢٦) من طريق وهب بن جرير، ثلاثتهم عن جرير، به. وأخرجه ابن أبي شيبة ٨/ ٧٥٧، والطبراني في "المعجم الكبير" (٥٣٨٦) والبيهقي في "الشعب" (٨٨٢٧) من طريق منصور بن المعتمر، عن طلحة بن مصرف، به. وعند الطبراني: سعد بن عبادة، وعند البيهقي: قيس بن سعد. وأبهمه ابن أبي شيبة. وانظر ما بعده. ويشهد له حديث سهل بن سعد عند البخاري (٦٢٤١) ومسلم (٢١٥٦) وأحمد في "المسند" (٢٢٨٠٣) وقد أوردنا نصه في التعليق على الحديث السالف قبله.