হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (5201)


حَدَّثَنَا عَبَّاسٌ الْعَنْبَرِيُّ، حَدَّثَنَا أَسْوَدُ بْنُ عَامِرٍ، حَدَّثَنَا حَسَنُ بْنُ صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ كُهَيْلٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنْ عُمَرَ، أَنَّهُ أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ فِي مَشْرُبَةٍ لَهُ فَقَالَ السَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ السَّلاَمُ عَلَيْكُمْ أَيَدْخُلُ عُمَرُ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তিনি তখন তাঁর কাঠের মাচানে ছিলেন। ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আস্‌সালামু ‘আলাইকা ইয়া রাসূলুল্লাহ, আস্‌সালামু ‘আলাইকুম, ‘উমার কি প্রবেশ করবে?




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عباس العَنْبَري: هو ابن عبدِ العظيم بن إسماعيل. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (١٠٠٨٠) من طريق أسود بن عامر، و (١٠٠٨١) منْ طريق يحيى بن آدم، كلاهما عن حسن بن صالح، بهذا الإسناد. وأخرجه بأتم منه النسائي (٩١١٢) من طريق عبيد الله بن عبد الله بن أبي ثور، عن ابن عباس.









সুনান আবী দাউদ (5202)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ، - يَعْنِي ابْنَ الْمُغِيرَةِ - عَنْ ثَابِتٍ، قَالَ قَالَ أَنَسٌ أَتَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى غِلْمَانٍ يَلْعَبُونَ فَسَلَّمَ عَلَيْهِمْ ‏.‏




সাবিত (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেলাধূলারত একদল বালকের নিকট এসে তাদেরকে সালাম দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، رواہ البخاري (6247) ومسلم (2168)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسْلم البُنانيُّ. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (١٠٠٩٠) من طريق سليمان بن المغيرة، بهذا الاسناد. وأخرجه البخاري (٦٢٤٧)، ومسلم (٢١٦٨)، والترمذي (٢٨٩١)، والنسائي في "الكبرى" (١٠٠٨٩) من طريق سَيَّار بن أبو سَيَّار العَنَزي، والترمذي (٢٨٩٢)، والنسائي (٨٢٩١) و (١٠٠٨٨) من طريق جعفر بن سُليمان الضُّبَعي، كلاهما عن ثابت، به. وهو في "مسند أحمد" (١٢٧٢٤)، و "صحيح ابن حبان" (٤٥٩). وانظر ما بعده. قال ابن بطال: في السلام على الصبيان تدريبُهم على آدابِ الشريعة، وفيه طرحُ الأكابر رداءَ الكبر، وسلوك التواضع ولين الجانب.









সুনান আবী দাউদ (5203)


حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا خَالِدٌ، - يَعْنِي ابْنَ الْحَارِثِ - حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ، قَالَ قَالَ أَنَسٌ انْتَهَى إِلَيْنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَنَا غُلاَمٌ فِي الْغِلْمَانِ فَسَلَّمَ عَلَيْنَا ثُمَّ أَخَذَ بِيَدِي فَأَرْسَلَنِي بِرِسَالَةٍ وَقَعَدَ فِي ظِلِّ جِدَارٍ - أَوْ قَالَ إِلَى جِدَارٍ - حَتَّى رَجَعْتُ إِلَيْهِ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের শিশুদের নিকট এসে পৌঁছলেন। আমিও শিশু হিসেবে তাদের সঙ্গে ছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সালাম দিলেন। এরপর তিনি আমার হাত ধরে আমাকে একটি চিঠি দিয়ে পাঠালেন। তিনি একটি দেয়ালের পাশে ছায়ায় বসে থাকলেন, যতোক্ষণ না আমি তাঁর নিকট ফিরে আসি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح دون القعود في الظل




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، حمید عنعن لکنہ کان یدلس عن ثابت البناني عن أنس رضي اللہ عنہ وثابت البناني ثقۃ، وحدیث مسلم (2482) یغني عنہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن المثنى: هو محمَّد العَنَزي، وحُمَيد: هو ابن أبي حُمَيد الطويل. وأخرجه مختصراً ابن ماجه (٣٧٠٠) من طريق أبي خالد الأحمر، عن حميد، به. وأخرجه مسلم (٢٤٨٢) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت بن أسلم، عن أنس. وهو في "مسند أحمد" (١٢٠٦٠). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (5204)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ ابْنِ أَبِي حُسَيْنٍ، سَمِعَهُ مِنْ، شَهْرِ بْنِ حَوْشَبٍ يَقُولُ أَخْبَرَتْهُ أَسْمَاءُ بِنْتُ يَزِيدَ، مَرَّ عَلَيْنَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي نِسْوَةٍ فَسَلَّمَ عَلَيْنَا ‏.‏




আসমা বিনতু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের একদল মহিলার পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় আমাদের সালাম দিয়েছেন। [৫২০২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (4647، 4663) ، أخرجہ ابن ماجہ (3701 وسندہ حسن) ورواہ الترمذي (2697 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، شهر بن حوشب -وإن كان فيه ضعف- قد توبع، وبقية رجاله ثقات. ابن أبي حُسَيْن: هو عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين. وأخرجه ابن ماجه (٣٧٠١) عن أبي بكر بن أبي شيبة، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (٢٨٩٣) من طريق عبد الحميد بن بَهْرام، عن شَهْر بن حوشب، به. وفي روايته: أن النبي-ﷺ أشار بالتسليم-ولم يتابع شهراً عليها أحدٌ- وهي ضعيفة. وقال: حديث حسن. وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (١٠٤٨)، والطبراني في "الكبير" ٢٤/ (٤٦٤)، وفي "مسند الشاميين" (١٤٢٦)، وتمَّام في "فوائده" (٧٩١ - الروض البسام) من طريق محمَّد بن مهاجر، عن أبيه مهاجر مولى أسماء بنت يزيد، عن أسماء بنت يزيد. وهذا إسناد حسن. وهو في "مسند أحمد" (٢٧٥٦١). وله شاهد من حديث جرير بن عبد الله عند أحمد (١٩١٥٤). وإسناده ضعيف. وانظر حديث سهل بن سعد عند البخاري (٦٢٤٨). وقد بسط الحافظ أقوال الفقهاء في مسألة تسليم الرجال على النساء في "الفتح" ١١/ ٣٤ - ٣٥ فانظرها.









সুনান আবী দাউদ (5205)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سُهَيْلِ بْنِ أَبِي صَالِحٍ، قَالَ خَرَجْتُ مَعَ أَبِي إِلَى الشَّامِ فَجَعَلُوا يَمُرُّونَ بِصَوَامِعَ فِيهَا نَصَارَى فَيُسَلِّمُونَ عَلَيْهِمْ فَقَالَ أَبِي لاَ تَبْدَءُوهُمْ بِالسَّلاَمِ فَإِنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ حَدَّثَنَا عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَبْدَءُوهُمْ بِالسَّلاَمِ وَإِذَا لَقِيتُمُوهُمْ فِي الطَّرِيقِ فَاضْطَرُّوهُمْ إِلَى أَضْيَقِ الطَّرِيقِ ‏"‏ ‏.‏




সুহাইল ইবনু আবূ সালিহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতার সঙ্গে সিরিয়ার উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলাম। তারা গির্জাসমূহের পাশ দিয়ে অতিক্রমকালে তাতে অবস্থানরত খ্রিষ্টানদের সালাম দিলেন। আমার পিতা বললেন, তোমরা আগে তাদেরকে সালাম দিও না। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা আগে তাদেরকে (আহলে কিতাবকে) সালাম দিবে না। রাস্তায় তাদের সঙ্গে তোমাদের সাক্ষাত হলে তাদের রাস্তার সংকীর্ণ দিকে চলে যেতে বাধ্য করবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2167)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حَفْص بن عُمر: هو ابن الحارث الحَوضي، وأبو صالح: هو ذكوان الزيَّات. وأخرجه مسلم بإثر (٢١٦٧) من طريق شعبة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٢١٦٧)، والترمذي (١٦٩٤) و (٢٨٩٧) من طرق عن سهيل بن أبي صالح، به. وهو في "مسند أحمد" (٨٥٦١)، و "صحيح ابن حبان" (٥٠٠) و (٥٠١).









সুনান আবী দাউদ (5206)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ، - يَعْنِي ابْنَ مُسْلِمٍ - عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّهُ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ إِنَّ الْيَهُودَ إِذَا سَلَّمَ عَلَيْكُمْ أَحَدُهُمْ فَإِنَّمَا يَقُولُ السَّامُ عَلَيْكُمْ فَقُولُوا وَعَلَيْكُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رَوَاهُ مَالِكٌ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ وَرَوَاهُ الثَّوْرِيُّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ قَالَ فِيهِ ‏"‏ وَعَلَيْكُمْ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ইয়াহুদীদের কেউ তোমাদের সালাম দেয়ার সময় বলে যে “আস্‌সামু ‘আলাইকুম” (অর্থ : তোমাদের মৃত্যু হোক)। জবাবে তোমরা বলবে : ওয়া ‘আলাইকুম (অর্থ : তোমার উপরও তাই)। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আবদুল্লাহ ইবনু দীনার সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। সুফিয়ান সাওরীও ‘আবদুল্লাহ ইবনু দীনার সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তাতে তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ (জবাবে তোমরা বলবে), ওয়া ‘আলাইকুম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح، صحیح بخاری (6257) صحیح مسلم (2164)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٩٢٨)، والنسائي في "الكبرى" (١٠١٣٩) من طريق سفيان الثررى، ومسلم (٢١٦٤)، والترمذي (١٦٩٥)، والنسائي (١٠١٣٨) من طريق إسماعيل بن جعفر، كلاهما عن عبد الله بن دينار، به. وروايتهم دون النسائي في الموضع الأول بلفظ: "عليك". وهو في "مسند أحمد" (٤٥٦٣) و (٤٦٩٨).









সুনান আবী দাউদ (5207)


حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مَرْزُوقٍ، أَخْبَرَنَا شُعْبَةُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ أَصْحَابَ النَّبِيِّ، صلى الله عليه وسلم قَالُوا لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم إِنَّ أَهْلَ الْكِتَابِ يُسَلِّمُونَ عَلَيْنَا فَكَيْفَ نَرُدُّ عَلَيْهِمْ قَالَ ‏ "‏ قُولُوا وَعَلَيْكُمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رِوَايَةُ عَائِشَةَ وَأَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْجُهَنِيِّ وَأَبِي بَصْرَةَ يَعْنِي الْغِفَارِيَّ ‏.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন, আহলে কিতাবরা আমাদেরকে সালাম দেয়। আমরা তার জবাব কিভাবে দিবো? তিনি বললেনঃ তোমরা বলবে, ওয়া ‘আলাইকুম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6258، 6024) صحیح مسلم (2163، 2165)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. قتادة: هو ابن دعامة السدوسي. وأخرجه مسلم (٢١٦٣)، والنسائي في "الكبرى" (١٠١٤٦) و (١٠١٤٧) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (٣٦٩٧)، والترمذي بنحوه (٣٥٨٥) من طريقين عن قتادة، به. وأخرجه بمعناه البخاري (٦٢٥٨)، ومسلم (٢١٦٣) (٦) من طريق عبيد الله بن أبي بكر، والبخاري (٦٩٢٦)، والنسائي في "الكبرى" (١٠١٤٥) من طريق هشام بن زيد بن أنس، كلاهما عن أنس بن مالك. وهو في "مسند أحمد" (١٢٤١)، و "صحيح ابن حبان" (٥٠٣).









সুনান আবী দাউদ (5208)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَمُسَدَّدٌ، قَالاَ حَدَّثَنَا بِشْرٌ، - يَعْنِيَانِ ابْنَ الْمُفَضَّلِ - عَنِ ابْنِ عَجْلاَنَ، عَنِ الْمَقْبُرِيِّ، - قَالَ مُسَدَّدٌ سَعِيدُ بْنُ أَبِي سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيُّ - عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِذَا انْتَهَى أَحَدُكُمْ إِلَى الْمَجْلِسِ فَلْيُسَلِّمْ فَإِذَا أَرَادَ أَنْ يَقُومَ فَلْيُسَلِّمْ فَلَيْسَتِ الأُولَى بِأَحَقَّ مِنَ الآخِرَةِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ মাজলিসে উপস্থিত হলে যেন সালাম দেয় এবং মাজলিস হতে বিদায়ের সময়ও যেন সালাম দেয়। প্রথম সালাম শেষ সালামের চেয়ে জরুরী নয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4660) ، أخرجہ الترمذي (2706 وسندہ حسن) محمد بن عجلان صرح بالسماع عند البخاري فی الأدب المفرد (1008)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: - حديث صحيح. ابن عجلان -وهو محمَّد- وان كان ينحط عن رتبة الصحيح قد توبع، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه الترمذي (٢٩٠٣) من طريق الليث بن سعد، عن ابن عجلان، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن. وتابعه يعقوبُ بن زيد الأنصاري فيما أخرجه البخاري في" الأدب المفرد" (٩٨٦)، والنسائي في "الكبرى" (١٠١٢٨)، "وابن حبان" (٤٩٣) عن سعيد المقبرى، به. وهو في "مسند أحمد" (٧١٤٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٤ - ٤٩٦). وانظر تمام تخريجه والكلام عليه في "المسند". وقوله: " فليست الأولى بأحق من الآخرة، قال السندي في "حاشيته على "المسند" أي: هما جميعاً سُنَّةٌ حقيقةٌ بالعمل بها، فلا وجه لترك الثاني مع إثبات الاوَّل.









সুনান আবী দাউদ (5209)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو خَالِدٍ الأَحْمَرُ، عَنْ أَبِي غِفَارٍ، عَنْ أَبِي تَمِيمَةَ الْهُجَيْمِيِّ، عَنْ أَبِي جُرَىٍّ الْهُجَيْمِيِّ، قَالَ أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقُلْتُ عَلَيْكَ السَّلاَمُ يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ ‏ "‏ لاَ تَقُلْ عَلَيْكَ السَّلاَمُ فَإِنَّ عَلَيْكَ السَّلاَمُ تَحِيَّةُ الْمَوْتَى ‏"‏ ‏.




আবূ জুরায়্যি আল-হুজাইমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম, ‘আলাইকাস্‌ সালামু ইয়া রাসূলুল্লাহ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ ‘আলাইকাস্‌ সালাম বলো না। কারণ এটা হলো মুর্দার প্রতি সালাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4084)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوى من أجل أبي غِفار -واسمه المثنى بن سعيد أو سعْد الطائي- ومن أجل أبي خالد إلاحمر -وهو سليمان بن حيان- فهما صدوقان لا بأس بهما. لكنهما قد توبعا. أبو خالد الأحمر: هو سليمان بن حيان. وقد سلف تخريجه ضمن حديث مطول برقم (٤٠٨٤).









সুনান আবী দাউদ (5210)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ إِبْرَاهِيمَ الْجُدِّيُّ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ خَالِدٍ الْخُزَاعِيُّ، قَالَ حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُفَضَّلِ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، رضى الله عنه - قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَفَعَهُ الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ - قَالَ ‏ "‏ يُجْزِئُ عَنِ الْجَمَاعَةِ، إِذَا مَرُّوا أَنْ يُسَلِّمَ، أَحَدُهُمْ وَيُجْزِئُ عَنِ الْجُلُوسِ أَنْ يَرُدَّ أَحَدُهُمْ ‏"‏ ‏.‏




আলী ইবনু আবূ ত্বালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি মারফুভাবে বর্ণনা করেছেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: পথ অতিক্রমকালে দলের একজন যদি সালাম দেয়, তাহলে তা সকলের জন্য যথেষ্ট। এমনিভাবে উপবিষ্টদের একজন তার উত্তর দিলে তা সকলের জন্য যথেষ্ট।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (4648) ، وللحدیث شاھد عند الطبراني فی الکبیر (3/ 82، 83 ح 2730 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف سعيد بن خالد الخُزَاعي، فقد ضعفه أبو زرعة وأبو حاتم الرازيان، وسُئِلَ الدارقطني عنه فذكره، ثم قال: والحديث غير ثابت، تفرد به سعيد بن خالد المدني، عن عبد الله بن الفضل. وسعيد بن خالد ليس بالقوي. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٩/ ٤٨ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الضياء في "المختارة" (٦٢٠)، والمزي في ترجمة سعيد بن خالد الخزاعي المدني من " تهذيب الكمال" ١٥/ ٤١١ من طريق الحسن بن علي، به. وأخرجه البزار في "مسنده" (٥٣٤)، وأبو يعلى في "مسنده" (٤٤١)، وابن السنّى في "عمل اليوم والليلة" (٢٢٤) من طريق يعقوب بن إسحاق الحضرمي، عن سعيد بن خالد، به.









সুনান আবী দাউদ (5211)


حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عَوْنٍ، أَخْبَرَنَا هُشَيْمٌ، عَنْ أَبِي بَلْجٍ، عَنْ زَيْدٍ أَبِي الْحَكَمِ الْعَنَزِيِّ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِذَا الْتَقَى الْمُسْلِمَانِ فَتَصَافَحَا وَحَمِدَا اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ وَاسْتَغْفَرَاهُ غُفِرَ لَهُمَا ‏"‏ ‏.‏




আল-বারাআ ইবনু ‘আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুইজন মুসলিম পরস্পর মিলিত হয়ে মুসাফাহা করলে, আল্লাহর প্রশংসা করলে এবং ক্ষমা চাইলে আল্লাহ উভয়কে ক্ষমা করে দেন। [৫২০৯]



দুর্বল: যঈফাহ হা/২৩৪৪।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، زید بن أبی الشعثاء: مجہول (التحریر: 2141) ووثقہ ابن حبان وحدہ ، (انوار الصحیفہ ص 180)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره دون قوله: "وحمدا الله ﷿"، وهذا إسناد ضعيف لجهالة زيد أبي الحكم العَنَزي تفرد بالرواية عنه أبو بَلْج -وهو يحيى بن سُلَيم الفَزَارىُّ-، وقال الذهبي: لا يُعرف، وقد اختلف فيه على أبي بلج كما بسطناه في تعليقنا على الحديث في المسند" (١٨٥٩٤). هُشَيم: هو ابن بشير. وانظر ما بعده.









সুনান আবী দাউদ (5212)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو خَالِدٍ، وَابْنُ، نُمَيْرٍ عَنِ الأَجْلَحِ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الْبَرَاءِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَا مِنْ مُسْلِمَيْنِ يَلْتَقِيَانِ فَيَتَصَافَحَانِ إِلاَّ غُفِرَ لَهُمَا قَبْلَ أَنْ يَفْتَرِقَا ‏"‏ ‏.‏




আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুইজন মুসলিম পরস্পর মিলিত হয়ে মুসাফাহা করলে পরস্পর বিচ্ছিন্ন হওয়ার পূর্বেই তাদের ক্ষমা করে দেয়া হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (2727) ابن ماجہ (3703) ، أبو إسحاق مدلس وعنعن ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ ، و روی الإمام أحمد (3/ 142): قال نبي اللّٰہ ﷺ: ((ما من مسلمین التقیا فأخذ أحدھما بید صاحبہ إلا کان حقًا علی اللّٰہ أن یحضر دعاءھما و لا یفرّق بین أیدیھما حتی یغفر لھما)) وسندہ حسن وھو یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 180)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف. الأجلَح -وهو ابن عبد الله الكِنْدي- ضعيف يعتبر به، وذكر الذهبي في "الميزان" أن هذا الحديث من أفراده. أبو خالد: هو سليمان بن حيان، وابن نمير: هو عبد الله الهمداني الخارفي، وأبو إسحاق: هو عمرو ابن عبد الله السبيعي. وهو عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" ٨/ ٦١٩، وعنه أخرجه ابن ماجه (٣٧٠٣). وأخرجه الترمذي (٢٩٢٨) من طريق عبد الله بن نمير، به. وقال: هذا حديث غريب. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥٤٧). وانظر تمام كلامنا عليه فيه. ويشهد له حديث أنس بن مالك عند أحمد في "مسنده" (١٢٤٥١). وذكرنا بقية الشواهد فيه. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (5213)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ لَمَّا جَاءَ أَهْلُ الْيَمَنِ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ قَدْ جَاءَكُمْ أَهْلُ الْيَمَنِ وَهُمْ أَوَّلُ مَنْ جَاءَ بِالْمُصَافَحَةِ ‏"‏ ‏.‏




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা ইয়ামানবাসীরা এসে উপস্থিত হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমাদের নিকট ইয়ামানবাসীরা এসেছে। আর এরাই সর্বপ্রথম মুসাফাহা করেছে।



সহীহ। কিন্তু তার বক্তব্য: “এরাই সর্বপ্রথম মুসাফাহা করেছে”-এ কথাটি মুদরাজ, যা আনাসের উক্তি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح إلا أن قوله وهم أول مدرج فيه من قول أنس




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، حمید عنعن لکنہ کان یدلس عن ثابت البناني عن أنس رضي اللہ عنہ وثابت البناني ثقۃ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة البصري، وحميد: هو ابن أبي حميد الطويل. وأخرجه أحمد في "مسنده" (١٣٢١٢) و (١٣٦٢٤)، وفي "فضائل الصحابة" (١٦٥٧)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٩٦٧) من طرق عن حماد، بهذا الإسناد. وجاء في رواية عند أحمد (١٣٦٢٤) أن القائل: "هم أول من جاء بالمصافحة" هو أنس ﵁.









সুনান আবী দাউদ (5214)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ، - يَعْنِي خَالِدَ بْنَ ذَكْوَانَ - عَنْ أَيُّوبَ بْنِ بُشَيْرِ بْنِ كَعْبٍ الْعَدَوِيِّ، عَنْ رَجُلٍ، مِنْ عَنَزَةَ أَنَّهُ قَالَ لأَبِي ذَرٍّ حَيْثُ سُيِّرَ مِنَ الشَّامِ إِنِّي أُرِيدُ أَنْ أَسْأَلَكَ عَنْ حَدِيثٍ مِنْ حَدِيثِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ قَالَ إِذًا أُخْبِرَكَ بِهِ إِلاَّ أَنْ يَكُونَ سِرًّا ‏.‏ قُلْتُ إِنَّهُ لَيْسَ بِسِرٍّ هَلْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُصَافِحُكُمْ إِذَا لَقِيتُمُوهُ قَالَ مَا لَقِيتُهُ قَطُّ إِلاَّ صَافَحَنِي وَبَعَثَ إِلَىَّ ذَاتَ يَوْمٍ وَلَمْ أَكُنْ فِي أَهْلِي فَلَمَّا جِئْتُ أُخْبِرْتُ أَنَّهُ أَرْسَلَ إِلَىَّ فَأَتَيْتُهُ وَهُوَ عَلَى سَرِيرِهِ فَالْتَزَمَنِي فَكَانَتْ تِلْكَ أَجْوَدَ وَأَجْوَدَ ‏.‏




‘আনাযাহ গোত্রের এক ব্যক্তি হতে বর্ণিত, তিনি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সিরিয়া ত্যাগের সময় বললেন, আমি আপনার নিকট রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাদীসসমূহের মধ্যকার একটি হাদীস সম্পর্কে প্রশ্ন করতে আগ্রহী। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তা গোপন কোন বিষয় না হলে আমি আপনাকে বলবো। আমি বললাম, না, তা কোন গোপন বিষয় নয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে আপনাদের দেখা হলে তিনি কি আপনাদের সঙ্গে মুসাফাহা করতেন? তিনি বললেন, হাঁ যখনই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে আমার দেখা হতো তিনি আমার সঙ্গে মুসাফাহা করতেন। একদিন তিনি আমার নিকট লোক পাঠালেন। আমি তখন বাড়িতে ছিলাম না। আমি ফিরে এলে জানানো হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট লোক পাঠিয়েছিলেন। অত:পর আমি তাঁর নিকট আসলাম। তখন তিনি গদির উপর ছিলেন। তিনি আমাকে বুকে জড়িয়ে ধরলেন। তা ছিল খুবই উত্তম ও মনোরম। [৫২১২]



দুর্বল: যঈফাহ হা/৪৬৮৩।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أیوب بن بشیر بن کعب مستور (تق: 604) ورجل من عنزۃ مجہول کما قال المنذري (عون المعبود 522/4) ، (انوار الصحیفہ ص 180)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة العَنَزي. حماد: هو ابن سلمة البصري. وأخرجه أحمد في "مسنده" (٢١٤٤٤) و (٢١٤٧٦) من طريق حمّاد، و (٢١٤٤٣) من طريق بشر بن المفضل، كلاهما عن أبي الحسين خالد بن ذكوان، بهذا الإسناد. وأخرجه الطيالسي (٤٧٣) عن حماد بن سلمة، عن أبي الحسين، عن أيوب بن بُشير أو رجل آخر، عن قاضي أهل مصر، أو قاصّ -شكَّ أيوب بن بُشير- أنه قال لأبى ذر … فذكره. وثبتت مشروعية المصافحة في غير هذا الحديث، كحديث أنس السالف قبله.









সুনান আবী দাউদ (5215)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سَعْدِ بْنِ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ بْنِ سَهْلِ بْنِ حُنَيْفٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، أَنَّ أَهْلَ، قُرَيْظَةَ لَمَّا نَزَلُوا عَلَى حُكْمِ سَعْدٍ أَرْسَلَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَجَاءَ عَلَى حِمَارٍ أَقْمَرَ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ قُومُوا إِلَى سَيِّدِكُمْ ‏"‏ ‏.‏ أَوْ ‏"‏ إِلَى خَيْرِكُمْ ‏"‏ ‏.‏ فَجَاءَ حَتَّى قَعَدَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সিদ্ধান্ত অনুযায়ী বনু কুরাইযার লোকেরা আত্মসমর্পণ করলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিকট লোক পাঠালেন। সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি সাদা বর্ণের গাধায় চড়ে আসলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা তোমাদের নেতা বা তোমাদের মধ্যকার উত্তম ব্যক্তির আগমনে দাঁড়াও। অত:পর সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6262) صحیح مسلم (1768)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حَفْص بن عُمر: هو ابن الحارث الحوضي. وأخرجه البخاري (٣٠٤٣) و (٦٢٦٢)، والنسائي في "الكبرى" (٥٩٠٥) من طريق شعبة بن الحجاج، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١١١٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٧٠٢٦). وانظر ما بعده. وقوله: على حمار أقمر: هو الشديد البياض، والأنثى قمراء. قال الخطابي: فيه من العلم أن قول الرجل لصاحبه: يا سيدي غير محظور إذا كان صاحبه خيراً فاضلاً، وإنما جاءت الكراهة في تسويد الرجل الفاجر. وفيه أن قيام المرؤوس للرئيس الفاضل، وللوالي العادل، وقيام المتعلم للعالم، مستحب غير مكروه، وإنما جاءت الكراهة فيمن كان بخلاف أهل هذه الصفات، ومعنى ما روي من قوله: "من أحب أن يستجم له الرجال صفوفاً" هو أن يأمرهم بذلك، ويلزمهم إياه، على مذهب الكبْر والنخوة. ومعنى "يستجم" أي: يجتمعون له في التي م عنده، ويحبسون أنفسهم عليه. وقوله: "من أحب أن يستجم" حديث صحيح سيأتي عند المصنف برقم (٥٢٢٩). وقال الإِمام النووي في "الأذكار": وأما إكرام الداخل بالقيام فالذي نختاره أنه مستحب لمن كان فيه فضيلة ظاهرة من علم أو صلاح أو شرف أو ولاية ونحو ذلك، ويكون هذا القيم للبر والاكرام والاحترام، لا للرياء والأعظام، وعلى هذا استمر عمل السلف والخلف. وفي الحديث دليل على أن من حكَّم رجلاً في حكومة بينه وبين غيره، فرضيا بحكمه: كان ما حكم به ماضياً عليهما إذا وافق الحق.









সুনান আবী দাউদ (5216)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، عَنْ شُعْبَةَ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فَلَمَّا كَانَ قَرِيبًا مِنَ الْمَسْجِدِ قَالَ لِلأَنْصَارِ ‏ "‏ قُومُوا إِلَى سَيِّدِكُمْ ‏"‏ ‏.




শুবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, শুবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তিনি বলেন, যখন তিনি (সা’দ) মাসজিদের নিকটে আসলেন তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের বললেনঃ তোমরা তোমাদের নেতার আগমনে দাঁড়াও।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4121) صحیح مسلم (1768)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمَّد بن جعفر: هو الهُذَلي المعروف بغُندَر. وأخرجه البخاري (٤١٢١)، ومسلم (١٧٦٨) عن محمَّد بن بشار، بهذا الاسناد. وأخرجه مسلم (١٧٦٨)، والنسائي في "الكبرى" (٨١٦٥) من طرق عن محمَّد ابن جعفر، به. وأخرجه البخاري (٣٨٠٤)، ومسلم بإثر (١٧٦٨) (٦٤) من طريقين عن شعبة، به. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (5217)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، وَابْنُ، بَشَّارٍ قَالاَ حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ عُمَرَ، أَخْبَرَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ مَيْسَرَةَ بْنِ حَبِيبٍ، عَنِ الْمِنْهَالِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ عَائِشَةَ بِنْتِ طَلْحَةَ، عَنْ أُمِّ الْمُؤْمِنِينَ، عَائِشَةَ رضى الله عنها أَنَّهَا قَالَتْ مَا رَأَيْتُ أَحَدًا كَانَ أَشْبَهَ سَمْتًا وَهَدْيًا وَدَلاًّ - وَقَالَ الْحَسَنُ حَدِيثًا وَكَلاَمًا وَلَمْ يَذْكُرِ الْحَسَنُ السَّمْتَ وَالْهَدْىَ وَالدَّلَّ - بِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ فَاطِمَةَ كَرَّمَ اللَّهُ وَجْهَهَا كَانَتْ إِذَا دَخَلَتْ عَلَيْهِ قَامَ إِلَيْهَا فَأَخَذَ بِيَدِهَا وَقَبَّلَهَا وَأَجْلَسَهَا فِي مَجْلِسِهِ وَكَانَ إِذَا دَخَلَ عَلَيْهَا قَامَتْ إِلَيْهِ فَأَخَذَتْ بِيَدِهِ فَقَبَّلَتْهُ وَأَجْلَسَتْهُ فِي مَجْلِسِهَا ‏.‏




উম্মুল মুমিনীন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে শারীরিক গঠন, চাল-চলন, চরিত্র, (বর্ণনাকারী হাসানের মতে) আলাপচারিতা ও কথাবার্তায় ফাত্বিমাহ্‌র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চাইতে এতোখানি মিল আর কাউকে আমি দেখিনি। বর্ণনাকারী হাসান শারীরিক গঠন, চাল-চলন, চরিত্র বৈশিষ্ট্যের উল্লেখ করেননি। ফাত্বিমাহ্‌ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন, তিনি উঠে তার দিকে এগিয়ে যেতেন, তার হাত ধরে চুমু খেতেন এবং তাঁর আসনে তাকে বসাতেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ফাতিমার নিকট যেতেন, তথন তিনিও তাঁর জন্য উঠে আসতেন, তাঁর হাতে ধরে চুমু খেতেন এবং তার আসনে তাঁকে বসাতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4689)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح.: الحسن بن علىّ: هو ابن محمَّد الهُذَلىُّ الخَلاّل الحُلْوانيُّ، وابن بشار: هو محمَّد العَبدي، وعثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي، وإسرائيل: هو ابن يونس السَّبيعي. وأخرجه الترمذي (٤٢١٠)، والنسائي في "الكبرى" (٨٣١١) عن محمَّد بن بشار، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩١٩٣) من طريق عثمان بن عمر، و (٩١٩٢) من طريق النضر بن شُميل، كلاهما عن إسرائيل، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٦٩٥٣).









সুনান আবী দাউদ (5218)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ الأَقْرَعَ بْنَ حَابِسٍ، أَبْصَرَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ يُقَبِّلُ حُسَيْنًا فَقَالَ إِنَّ لِي عَشْرَةً مِنَ الْوَلَدِ مَا فَعَلْتُ هَذَا بِوَاحِدٍ مِنْهُمْ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ لاَ يَرْحَمُ لاَ يُرْحَمُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল-আক্বরা’ ইবনু হাবিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলেন যে, তিনি হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে চুমু দিচ্ছেন। আক্বরা’ বললেন, আমাদের দশটি সন্তান আছে, আমি তাদের একজনকেও চুমু দেইনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ যে অনুগ্রহ করে না, তাকেও অনুগ্রহ করা হয় না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5997) صحیح مسلم (2118)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مُسَدَّد: هو ابن مُسَرْهَد الأسدي، وسفيان: هو ابن عُيَيْنة الهلالي، والزهري: هو محمَّد بن مسلم بن عبيد الله، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن ابن عوف الزهري. وأخرجه مسلم (٢٣١٨)، والترمذي (٢٠٢٣) من طرق عن سفيان، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٥٩٩٧)، ومسلم (٢٣١٨) من طريقبن عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٧١٢١) و (٧٢٨٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٧). وقال السندي في "حاشيته على المسند": المعنى: أن تقبيلَ الصغير من باب الرحمة على من يستحِقُّها، فلا ينبغى تركه، فإن الذى لا يرحم المستحقَّ للرحمة، لا يرحمه الله تعالى. وقال الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٤٣٠: وفي جواب النبي-ﷺ-للأقرع إشارة إلى أن تقبيل الولد وغيره من الأهل المحارم وغيرهم من الأجانب إنما يكون للشفقة والرحمة، لا للذة والشهوة، وكذا الضم والشَّم والمعانقة.









সুনান আবী দাউদ (5219)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ عُرْوَةَ، أَنَّ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ ثُمَّ قَالَ تَعْنِي النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ أَبْشِرِي يَا عَائِشَةُ فَإِنَّ اللَّهَ قَدْ أَنْزَلَ عُذْرَكِ ‏"‏ ‏.‏ وَقَرَأَ عَلَيْهَا الْقُرْآنَ فَقَالَ أَبَوَاىَ قُومِي فَقَبِّلِي رَأْسَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ فَقَالَتْ أَحْمَدُ اللَّهَ لاَ إِيَّاكُمَا ‏.




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে আয়িশাহ! সুসংবাদ গ্রহণ করো। আল্লাহ তোমার নির্দোষ হওয়া সম্পর্কে আয়াত অবতীর্ণ করেছেন। তিনি কুরআনের আয়াতটি তাকে পড়ে শুনালেন। তখন আমার পিতা-মাতা (আবূ বাক্‌র ও উম্মু রুমান) বললেন, ওঠো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথায় চুমু দাও। আমি বললাম, শুকরিয়া আদায় করছি আমি সম্মানিত মহান আল্লাহর; আপনাদের নয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وھذا طرف من حدیث الإفک رواہ البخاري (2661، 4750) ومسلم (2770)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حمّاد: هو ابن سَلَمة البَصري. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠١ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه مطولاً أبو يعلى في "مسنده" (٤٩٣١)، والطبراني في "الكبير" ٢٣/ (١٤٩) من طريقين عن حماد، به. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٣/ (١٥١) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. وأخرجه مطولاً دون ذكر التقبيل البخاري (٢٦٦١)، ومسلم (٢٧٧٠)، والترمذي (٣٤٥٤)، والنسائي في "الكبرى" (١١٣٦٠) من طرق عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٣١٧). وقال صاحب "بذل المجهود" ٢٠/ ١٥٨: وهذا الحديث لا يُناسب الباب، لأن في الباب قبلة الرجل ولده، وليس في الحديث لذلك ذكر، بل فيه قبلة المرأة زوجها، وقبلة المرأة زوجها لا تكون للشفقة والمرحمة، وأما قبلة الرجل ولده فيكون شفقة ومرحمة، فهو نوع آخر وهذا نوع غيره، ولو وقع في القصة أن أبا بكر ﵁ قبل عائشة لكان للحديث مناسبة بالباب، فالحديث الثاني من الباب الثاني لو ذكر في هذا الباب لكانت المناصبة ظاهرة، والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (5220)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ أَجْلَحَ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم تَلَقَّى جَعْفَرَ بْنَ أَبِي طَالِبٍ فَالْتَزَمَهُ وَقَبَّلَ مَا بَيْنَ عَيْنَيْهِ ‏.‏




আশ-শা’বী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেখা হলো জাফার ইবনু আবূ ত্বালিবের সঙ্গে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জড়িয়ে ধরলেন এবং তার দু’চোখের মাঝখানে চুমু দিলেন। [৫২১৮]



দুর্বল: মিশকাত হা/৪৬৮৬




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، السند مرسل کما قال البیہقي (101/7) ، وللحدیث طرق ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 180)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات رجال الشيخين غير الأجْلَح -وهو ابن عبد الله الكِندي- مختلف فيه، روى له البخاري في "الأدب المفرد" وأصحاب السنن، وقال أبو حاتم: يُكتب حديثه ولا يحتج به، ثم هو مرسل. الشَّعْبي: هو عامر بن شَرَاحيل. وهو عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" ٨/ ٦٢١، ومن طريقه أخرجه المصنَّف في "مراسيله" (٤٩١). وأخرجه ابن سعد في "طبقاته " ٤/ ٣٤ و ٣٥ عن عبد الله بن نمير، وابن سعد ٤/ ٣٥ والبيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠١ من طريق سفيان، كلاهما عن الأجلح، به. وذكره البيهقى ٧/ ١٠١ مسنداً من حديث عبد الله بن جعفر. وقال: والمحفوظ هو الأول مرسلاً. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الإخوان" (١٢٣)، وأبو يعلى في "معجمه" (٢١)، وغيرهما، من حديث عائشة، لكن في سنده محمَّد بن عبد الله بن عُبيد بن عمير، وهو ضعيف. وفي الباب عن رجل من عنزة، سلف عند المصنف برقم (٥٢١٤)، قال: قلت لأبي ذر: هل كان رسول الله ﷺ يصافحكم إذا لقيتموه؟ قال: ما لقيته قط إلا صافحني، وبعث إلى ذات يوم، فلم أكلن في أهلي، فلما جئت، أُخبرت أنه أرسل إلى، فأتيته وهو على سريره، فالتزمني، فكانت تلك أجود وأجود. ورجاله ثقات إلا هذا الرجل المبهم. وآخر من حديث أنس عند الطبراني في "الأوسط" (٩٧) قال: كانوا إذا تلاقوا تصافحوا، واذا قدموا من سفر تعانقوا. قال المنذري ٢/ ٢٧٠، ثم الهيثمي ٨/ ٣٦: رجاله رجال الصحيح. وثالث من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد في "مسنده" (١٦٠٤٢)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٩٧٠) قال: بلغني حديث عن رجل سمعه من رسول الله ﷺ، فاشتريت بعيراً، ثم شددت إليه رحلي، فسرتُ إليه شهراً حتى قدمت عليه الشام، فإذا عبد الله بن أنيس، فقلت للبواب: قل له: جابر على الباب، قال: ابن عبد الله؟ قلت: نعم، فخرج يطأ ثوبه، فاعتنقني واعتنقته. وحسن إسناده الحافظ في "الفتح" ١/ ١٧٤. وروى ابن أبي شيبة ٨/ ٦١٩ - . ٦٢ من طريق وكيع، عن شعبة، عن غالب قال: قلت للشعبي: إن ابن سيرين كان يكرهُ المصافحة، قال: فقال الشعبي: كان أصحاب رسول الله ﷺ يتصافحون، وإذا قدم أحدهم من سفرعانق صاحبه.