হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (5215)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سَعْدِ بْنِ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ بْنِ سَهْلِ بْنِ حُنَيْفٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، أَنَّ أَهْلَ، قُرَيْظَةَ لَمَّا نَزَلُوا عَلَى حُكْمِ سَعْدٍ أَرْسَلَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَجَاءَ عَلَى حِمَارٍ أَقْمَرَ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ قُومُوا إِلَى سَيِّدِكُمْ ‏"‏ ‏.‏ أَوْ ‏"‏ إِلَى خَيْرِكُمْ ‏"‏ ‏.‏ فَجَاءَ حَتَّى قَعَدَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সিদ্ধান্ত অনুযায়ী বনু কুরাইযার লোকেরা আত্মসমর্পণ করলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিকট লোক পাঠালেন। সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি সাদা বর্ণের গাধায় চড়ে আসলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা তোমাদের নেতা বা তোমাদের মধ্যকার উত্তম ব্যক্তির আগমনে দাঁড়াও। অত:পর সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6262) صحیح مسلم (1768)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حَفْص بن عُمر: هو ابن الحارث الحوضي. وأخرجه البخاري (٣٠٤٣) و (٦٢٦٢)، والنسائي في "الكبرى" (٥٩٠٥) من طريق شعبة بن الحجاج، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١١١٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٧٠٢٦). وانظر ما بعده. وقوله: على حمار أقمر: هو الشديد البياض، والأنثى قمراء. قال الخطابي: فيه من العلم أن قول الرجل لصاحبه: يا سيدي غير محظور إذا كان صاحبه خيراً فاضلاً، وإنما جاءت الكراهة في تسويد الرجل الفاجر. وفيه أن قيام المرؤوس للرئيس الفاضل، وللوالي العادل، وقيام المتعلم للعالم، مستحب غير مكروه، وإنما جاءت الكراهة فيمن كان بخلاف أهل هذه الصفات، ومعنى ما روي من قوله: "من أحب أن يستجم له الرجال صفوفاً" هو أن يأمرهم بذلك، ويلزمهم إياه، على مذهب الكبْر والنخوة. ومعنى "يستجم" أي: يجتمعون له في التي م عنده، ويحبسون أنفسهم عليه. وقوله: "من أحب أن يستجم" حديث صحيح سيأتي عند المصنف برقم (٥٢٢٩). وقال الإِمام النووي في "الأذكار": وأما إكرام الداخل بالقيام فالذي نختاره أنه مستحب لمن كان فيه فضيلة ظاهرة من علم أو صلاح أو شرف أو ولاية ونحو ذلك، ويكون هذا القيم للبر والاكرام والاحترام، لا للرياء والأعظام، وعلى هذا استمر عمل السلف والخلف. وفي الحديث دليل على أن من حكَّم رجلاً في حكومة بينه وبين غيره، فرضيا بحكمه: كان ما حكم به ماضياً عليهما إذا وافق الحق.









সুনান আবী দাউদ (5216)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، عَنْ شُعْبَةَ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فَلَمَّا كَانَ قَرِيبًا مِنَ الْمَسْجِدِ قَالَ لِلأَنْصَارِ ‏ "‏ قُومُوا إِلَى سَيِّدِكُمْ ‏"‏ ‏.




শুবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, শুবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তিনি বলেন, যখন তিনি (সা’দ) মাসজিদের নিকটে আসলেন তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের বললেনঃ তোমরা তোমাদের নেতার আগমনে দাঁড়াও।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4121) صحیح مسلم (1768)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمَّد بن جعفر: هو الهُذَلي المعروف بغُندَر. وأخرجه البخاري (٤١٢١)، ومسلم (١٧٦٨) عن محمَّد بن بشار، بهذا الاسناد. وأخرجه مسلم (١٧٦٨)، والنسائي في "الكبرى" (٨١٦٥) من طرق عن محمَّد ابن جعفر، به. وأخرجه البخاري (٣٨٠٤)، ومسلم بإثر (١٧٦٨) (٦٤) من طريقين عن شعبة، به. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (5217)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، وَابْنُ، بَشَّارٍ قَالاَ حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ عُمَرَ، أَخْبَرَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ مَيْسَرَةَ بْنِ حَبِيبٍ، عَنِ الْمِنْهَالِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ عَائِشَةَ بِنْتِ طَلْحَةَ، عَنْ أُمِّ الْمُؤْمِنِينَ، عَائِشَةَ رضى الله عنها أَنَّهَا قَالَتْ مَا رَأَيْتُ أَحَدًا كَانَ أَشْبَهَ سَمْتًا وَهَدْيًا وَدَلاًّ - وَقَالَ الْحَسَنُ حَدِيثًا وَكَلاَمًا وَلَمْ يَذْكُرِ الْحَسَنُ السَّمْتَ وَالْهَدْىَ وَالدَّلَّ - بِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ فَاطِمَةَ كَرَّمَ اللَّهُ وَجْهَهَا كَانَتْ إِذَا دَخَلَتْ عَلَيْهِ قَامَ إِلَيْهَا فَأَخَذَ بِيَدِهَا وَقَبَّلَهَا وَأَجْلَسَهَا فِي مَجْلِسِهِ وَكَانَ إِذَا دَخَلَ عَلَيْهَا قَامَتْ إِلَيْهِ فَأَخَذَتْ بِيَدِهِ فَقَبَّلَتْهُ وَأَجْلَسَتْهُ فِي مَجْلِسِهَا ‏.‏




উম্মুল মুমিনীন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে শারীরিক গঠন, চাল-চলন, চরিত্র, (বর্ণনাকারী হাসানের মতে) আলাপচারিতা ও কথাবার্তায় ফাত্বিমাহ্‌র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চাইতে এতোখানি মিল আর কাউকে আমি দেখিনি। বর্ণনাকারী হাসান শারীরিক গঠন, চাল-চলন, চরিত্র বৈশিষ্ট্যের উল্লেখ করেননি। ফাত্বিমাহ্‌ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন, তিনি উঠে তার দিকে এগিয়ে যেতেন, তার হাত ধরে চুমু খেতেন এবং তাঁর আসনে তাকে বসাতেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ফাতিমার নিকট যেতেন, তথন তিনিও তাঁর জন্য উঠে আসতেন, তাঁর হাতে ধরে চুমু খেতেন এবং তার আসনে তাঁকে বসাতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (4689)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح.: الحسن بن علىّ: هو ابن محمَّد الهُذَلىُّ الخَلاّل الحُلْوانيُّ، وابن بشار: هو محمَّد العَبدي، وعثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي، وإسرائيل: هو ابن يونس السَّبيعي. وأخرجه الترمذي (٤٢١٠)، والنسائي في "الكبرى" (٨٣١١) عن محمَّد بن بشار، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩١٩٣) من طريق عثمان بن عمر، و (٩١٩٢) من طريق النضر بن شُميل، كلاهما عن إسرائيل، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٦٩٥٣).









সুনান আবী দাউদ (5218)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ الأَقْرَعَ بْنَ حَابِسٍ، أَبْصَرَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ يُقَبِّلُ حُسَيْنًا فَقَالَ إِنَّ لِي عَشْرَةً مِنَ الْوَلَدِ مَا فَعَلْتُ هَذَا بِوَاحِدٍ مِنْهُمْ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ لاَ يَرْحَمُ لاَ يُرْحَمُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল-আক্বরা’ ইবনু হাবিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলেন যে, তিনি হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে চুমু দিচ্ছেন। আক্বরা’ বললেন, আমাদের দশটি সন্তান আছে, আমি তাদের একজনকেও চুমু দেইনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ যে অনুগ্রহ করে না, তাকেও অনুগ্রহ করা হয় না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5997) صحیح مسلم (2118)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مُسَدَّد: هو ابن مُسَرْهَد الأسدي، وسفيان: هو ابن عُيَيْنة الهلالي، والزهري: هو محمَّد بن مسلم بن عبيد الله، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن ابن عوف الزهري. وأخرجه مسلم (٢٣١٨)، والترمذي (٢٠٢٣) من طرق عن سفيان، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٥٩٩٧)، ومسلم (٢٣١٨) من طريقبن عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٧١٢١) و (٧٢٨٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٧). وقال السندي في "حاشيته على المسند": المعنى: أن تقبيلَ الصغير من باب الرحمة على من يستحِقُّها، فلا ينبغى تركه، فإن الذى لا يرحم المستحقَّ للرحمة، لا يرحمه الله تعالى. وقال الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٤٣٠: وفي جواب النبي-ﷺ-للأقرع إشارة إلى أن تقبيل الولد وغيره من الأهل المحارم وغيرهم من الأجانب إنما يكون للشفقة والرحمة، لا للذة والشهوة، وكذا الضم والشَّم والمعانقة.









সুনান আবী দাউদ (5219)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ عُرْوَةَ، أَنَّ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ ثُمَّ قَالَ تَعْنِي النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ أَبْشِرِي يَا عَائِشَةُ فَإِنَّ اللَّهَ قَدْ أَنْزَلَ عُذْرَكِ ‏"‏ ‏.‏ وَقَرَأَ عَلَيْهَا الْقُرْآنَ فَقَالَ أَبَوَاىَ قُومِي فَقَبِّلِي رَأْسَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ فَقَالَتْ أَحْمَدُ اللَّهَ لاَ إِيَّاكُمَا ‏.




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে আয়িশাহ! সুসংবাদ গ্রহণ করো। আল্লাহ তোমার নির্দোষ হওয়া সম্পর্কে আয়াত অবতীর্ণ করেছেন। তিনি কুরআনের আয়াতটি তাকে পড়ে শুনালেন। তখন আমার পিতা-মাতা (আবূ বাক্‌র ও উম্মু রুমান) বললেন, ওঠো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথায় চুমু দাও। আমি বললাম, শুকরিয়া আদায় করছি আমি সম্মানিত মহান আল্লাহর; আপনাদের নয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وھذا طرف من حدیث الإفک رواہ البخاري (2661، 4750) ومسلم (2770)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حمّاد: هو ابن سَلَمة البَصري. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠١ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه مطولاً أبو يعلى في "مسنده" (٤٩٣١)، والطبراني في "الكبير" ٢٣/ (١٤٩) من طريقين عن حماد، به. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٣/ (١٥١) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. وأخرجه مطولاً دون ذكر التقبيل البخاري (٢٦٦١)، ومسلم (٢٧٧٠)، والترمذي (٣٤٥٤)، والنسائي في "الكبرى" (١١٣٦٠) من طرق عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٣١٧). وقال صاحب "بذل المجهود" ٢٠/ ١٥٨: وهذا الحديث لا يُناسب الباب، لأن في الباب قبلة الرجل ولده، وليس في الحديث لذلك ذكر، بل فيه قبلة المرأة زوجها، وقبلة المرأة زوجها لا تكون للشفقة والمرحمة، وأما قبلة الرجل ولده فيكون شفقة ومرحمة، فهو نوع آخر وهذا نوع غيره، ولو وقع في القصة أن أبا بكر ﵁ قبل عائشة لكان للحديث مناسبة بالباب، فالحديث الثاني من الباب الثاني لو ذكر في هذا الباب لكانت المناصبة ظاهرة، والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (5220)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ أَجْلَحَ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم تَلَقَّى جَعْفَرَ بْنَ أَبِي طَالِبٍ فَالْتَزَمَهُ وَقَبَّلَ مَا بَيْنَ عَيْنَيْهِ ‏.‏




আশ-শা’বী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেখা হলো জাফার ইবনু আবূ ত্বালিবের সঙ্গে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জড়িয়ে ধরলেন এবং তার দু’চোখের মাঝখানে চুমু দিলেন। [৫২১৮]



দুর্বল: মিশকাত হা/৪৬৮৬




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، السند مرسل کما قال البیہقي (101/7) ، وللحدیث طرق ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 180)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات رجال الشيخين غير الأجْلَح -وهو ابن عبد الله الكِندي- مختلف فيه، روى له البخاري في "الأدب المفرد" وأصحاب السنن، وقال أبو حاتم: يُكتب حديثه ولا يحتج به، ثم هو مرسل. الشَّعْبي: هو عامر بن شَرَاحيل. وهو عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" ٨/ ٦٢١، ومن طريقه أخرجه المصنَّف في "مراسيله" (٤٩١). وأخرجه ابن سعد في "طبقاته " ٤/ ٣٤ و ٣٥ عن عبد الله بن نمير، وابن سعد ٤/ ٣٥ والبيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠١ من طريق سفيان، كلاهما عن الأجلح، به. وذكره البيهقى ٧/ ١٠١ مسنداً من حديث عبد الله بن جعفر. وقال: والمحفوظ هو الأول مرسلاً. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الإخوان" (١٢٣)، وأبو يعلى في "معجمه" (٢١)، وغيرهما، من حديث عائشة، لكن في سنده محمَّد بن عبد الله بن عُبيد بن عمير، وهو ضعيف. وفي الباب عن رجل من عنزة، سلف عند المصنف برقم (٥٢١٤)، قال: قلت لأبي ذر: هل كان رسول الله ﷺ يصافحكم إذا لقيتموه؟ قال: ما لقيته قط إلا صافحني، وبعث إلى ذات يوم، فلم أكلن في أهلي، فلما جئت، أُخبرت أنه أرسل إلى، فأتيته وهو على سريره، فالتزمني، فكانت تلك أجود وأجود. ورجاله ثقات إلا هذا الرجل المبهم. وآخر من حديث أنس عند الطبراني في "الأوسط" (٩٧) قال: كانوا إذا تلاقوا تصافحوا، واذا قدموا من سفر تعانقوا. قال المنذري ٢/ ٢٧٠، ثم الهيثمي ٨/ ٣٦: رجاله رجال الصحيح. وثالث من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد في "مسنده" (١٦٠٤٢)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٩٧٠) قال: بلغني حديث عن رجل سمعه من رسول الله ﷺ، فاشتريت بعيراً، ثم شددت إليه رحلي، فسرتُ إليه شهراً حتى قدمت عليه الشام، فإذا عبد الله بن أنيس، فقلت للبواب: قل له: جابر على الباب، قال: ابن عبد الله؟ قلت: نعم، فخرج يطأ ثوبه، فاعتنقني واعتنقته. وحسن إسناده الحافظ في "الفتح" ١/ ١٧٤. وروى ابن أبي شيبة ٨/ ٦١٩ - . ٦٢ من طريق وكيع، عن شعبة، عن غالب قال: قلت للشعبي: إن ابن سيرين كان يكرهُ المصافحة، قال: فقال الشعبي: كان أصحاب رسول الله ﷺ يتصافحون، وإذا قدم أحدهم من سفرعانق صاحبه.









সুনান আবী দাউদ (5221)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا الْمُعْتَمِرُ، عَنْ إِيَاسِ بْنِ دَغْفَلٍ، قَالَ رَأَيْتُ أَبَا نَضْرَةَ قَبَّلَ خَدَّ الْحَسَنِ بْنِ عَلِيٍّ عَلَيْهِمَا السَّلاَمُ ‏.‏




ইয়াস ইবনু দাগফাল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আবূ নাদরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর গালে চুমু দিতে দেখেছি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، وانظر کتاب التقبیل والمعانقہ والمصافحۃ بتحقیق ابی رحمہ اللہ (17) الحسن ھو البصری التابعی / معاذ علی زئی




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات لكنه مرسل. أبو نَضْرَة: هو المنذر بن مالك بن قِطعَة العَبْدي العَوَقي، والحسن: في الأصول الخطية المعتمدة جاء هكذا غير منسوب، وهو ابن أبي الحسن البصري وكان معاصراً لأبي نضرة، وأبو نضرة مات قبله وأوصى أن يصلي عليه الحسن، وقد صرح بأن الحسن هنا هو البصري البيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠١، والمنذري في "مختصره" ٨٧/ ٨، وما وقع في المطبوع من أنه الحسن بن علي فهو خطأ من النساخ. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠١ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وهو عند ابن أبى شيبة في "مصنفه" ٨/ ٦٢٢.









সুনান আবী দাউদ (5222)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَالِمٍ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ يُوسُفَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الْبَرَاءِ، قَالَ دَخَلْتُ مَعَ أَبِي بَكْرٍ أَوَّلَ مَا قَدِمَ الْمَدِينَةَ فَإِذَا عَائِشَةُ ابْنَتُهُ مُضْطَجِعَةٌ قَدْ أَصَابَتْهَا حُمَّى فَأَتَاهَا أَبُو بَكْرٍ فَقَالَ لَهَا كَيْفَ أَنْتِ يَا بُنَيَّةُ وَقَبَّلَ خَدَّهَا ‏.‏




আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সর্বপ্রথম মদিনায় আগমনকারী আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সঙ্গে আসলাম। এ সময় তার কন্যা ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিছানায় শোয়া দেখলাম। তিনি জ্বরে আক্রান্ত হয়েছিলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখতে এসে বললেন, হে প্রিয় কন্যা! তুমি কেমন আছো? এবং তিনি তার গালে চুমু দিলেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3918) ، مشکوۃ المصابیح (4690)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. إبراهيم بن يوسف -وهو ابن إسحاق بن أبي إسحاق السبيعي- قال أبو حاتم: حسن الحديث يكتب حديثه، وقال ابن عدي: ليس هو بمنكر الحديث، ووثقه الدارقطني في رواية ابن بكير، وقال ابن المديني: ليس هو كأقوى ما يكون، وضغَفه يحيى بن معين وأبو داود وغيرهما، وقال النسائي: ليس بالقوي، قال الحافظ في "المقدمة": وقد احتج به البخاري ومسلم في أحاديث يسيرة، وروى له الباقون، وجاء في "تحرير تقريب التهذيب": أن عامة ما انتقاه البخاري من حديثه إنما هو في المغازي ما عدا حديثاً واحداً في العُمرة، وله شاهد عنده من حديث أنس (١٧٧٨). وأخرجه البخاري (٣٩١٨) من طريق شُرَيح بن مَسْلَمة، عن إبراهيم بن يوسف، بهذا الإسناد. قال الإِمام الذهبي في "الموقظة": إن الإِمام البخاري يترخَّص في الرواية عمّن في حديثه ضعفٌ في غير الأحكام، كالمغازي والشمائل والتفسير والرقاق. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.









সুনান আবী দাউদ (5223)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ أَبِي زِيَادٍ، أَنَّ عَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ أَبِي لَيْلَى، حَدَّثَهُ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ وَذَكَرَ، قِصَّةً قَالَ فَدَنَوْنَا - يَعْنِي - مِنَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَبَّلْنَا يَدَهُ ‏.




আবদুর রহমান ইবনু আবূ লাইলাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন। অত:পর পুরো ঘটনা বর্ণনা করে বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটবর্তী হয়ে তাঁর হাতে চুমু দিলাম। [৫২২১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (3704) و تقدم (2647) ، (انوار الصحیفہ ص 180، 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف يزيد بن أبي زياد -وهو مولى الهاشميين-. زُهَير: هو ابن معاوية بن حُدَيج الجُعفي. وأخرجه ابن ماجه (٣٧٠٤) من طريق محمَّد بن فُضيل، عن يزيد بن أبي زياد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٥٣٨٤). وقد سلف مطولاً برقم (٢٦٤٧). قال الحافظ في "الفتح": وقد جمع الحافظ أبو بكر بن المقرئ جزءاً في تقبيل اليد سمعناه أورد فيه أحاديث كثيرة وآثاراً فمن جيدها حديث الزارع العبدي (وذكر حديث المصنف الآتي بعده). ومن حديث مَزِيدَةَ العَصَري مثله. ومن حديث أسامة بن شريك قال: قمنا إلى النبي ﷺ فقبلنا يده. وسنده قوي. ومن حديث جابر أن عمر قام إلى النبي ﷺ-فقبل يده. وأخرج البخاري فى "الأدب المفرد" (٩٧٣) من رواية عبد الرحمن بن رَزين قال: أخرج لنا سلمة بن الأكوع كفاً له ضخمة كأنه كف بعير فقمنا إليها فقبلناها. وأخرج أيضاً (٩٤٨) عن ثابت أنه قبل يد أنس. وقد طبع جزء ابن المقرئ هذا في تقبيل اليد، في دار العاصمة بالرياض، فانظر هذه الأحاديث فيه. قال النووي: تقبيل يد الرجل لزهده وصلاحه أو علمه أو شرفه أو صيانته أو نحو ذلك من الأمور الدينية لا يكره بل يستحب، فإن كان لغناه أو شوكته أو جاهه عند أهل الدنيا فمكروه شديد الكراهة.









সুনান আবী দাউদ (5224)


حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عَوْنٍ، أَخْبَرَنَا خَالِدٌ، عَنْ حُصَيْنٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنْ أُسَيْدِ بْنِ حُضَيْرٍ، - رَجُلٍ مِنَ الأَنْصَارِ - قَالَ بَيْنَمَا هُوَ يُحَدِّثُ الْقَوْمَ وَكَانَ فِيهِ مِزَاحٌ بَيْنَا يُضْحِكُهُمْ فَطَعَنَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي خَاصِرَتِهِ بِعُودٍ فَقَالَ أَصْبِرْنِي ‏.‏ فَقَالَ ‏ "‏ اصْطَبِرْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ إِنَّ عَلَيْكَ قَمِيصًا وَلَيْسَ عَلَىَّ قَمِيصٌ ‏.‏ فَرَفَعَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَنْ قَمِيصِهِ فَاحْتَضَنَهُ وَجَعَلَ يُقَبِّلُ كَشْحَهُ قَالَ إِنَّمَا أَرَدْتُ هَذَا يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏




উসাইদ ইবনু হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নামক এক আনসারী হতে বর্ণিত, তিনি লোকদের সঙ্গে কথাবার্তা বলছিলেন এবং মাঝে মধ্যে রসিকতা করে লোকদের হাসাচ্ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কাঠের টুকরা দিয়ে তার পেটে খোঁচা দিলেন। উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আপনি আমাকে এর বদলা নিতে দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমার থেকে বদলা নাও। উসাইদ বললেন, আপনার গায়ে তো জামা আছে, অথচ আমার গায়ে জামা ছিল না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর গায়ের জামা খুললেন। তখন উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জড়িয়ে ধরে তাঁর এক পাশে চুমু দিতে লাগলেন, আর বললেনঃ আমার এটাই ইচ্ছা ছিল হে আল্লাহর রাসূল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (4685) ، ولہ لون الآخر عند الحاکم (3/288 ح5262 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، إلا أن عبد الرحمن بن أبي ليلى لم يدرك أسَيد بن حُضَير. خالد: هو ابن عبد الله بن عبد الرحمن الطحَّان، وحُصَين: هو ابن عبد الرحمن السُلَميُّ. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠٢ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "المعجم "الكبير" (٥٥٦) - ومن طريقه الضياء في "المختارة" (١٤٧١) - من طريق عمرو بن عون، به. وأخرجه أيضاً الطبراني (٥٥٧) من طريق أبي جعفر الرازي، عن حصين، به. وأخرجه الحاكم في "المستدرك" ٣/ ٢٨٨ - وعنه البيهقي في "الكبرى" ٨/ ٤٩ - من طريقين عن جرير -وهو ابن عبد الحميد الضبي-، عن حصين بن عبد الرحمن، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبيه. وقال: صحيح الإسناد ولم يخرجاه، ووافقه الذهبي. وقوله: "أصْبِرْني" معناه: مَكِّنِّي من نفسك لأستوفي حقي للقصاص منك. والكشح، بفتح الكاف وسكون الشين: هو ما بين الخاصرة إلى الضلع الخلفي. قال الخطابي: وفيه حجة لمن رأى القصاص في الضربة بالسوط، واللطمة بالكف ونحو ذلك مما لا يوقف له على حد معلوم يُنتهى إليه، وقد روي ذلك عن أبي بكر وعمر وعثمان وعلي بن أبي طالب كرم الله وجوههم ورضي عنهم، وممن ذهب إليه شريح والثعبي رحمهما الله، وبه قال ابن شبرمة. وقال الحسن وقتادة رحمهما الله: لا قصاص في اللطمة ونحوها، وإليه ذهب أصحاب الرأى، وهو قول مالك والشافعي رحمهما الله.









সুনান আবী দাউদ (5225)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى بْنِ الطَّبَّاعِ، حَدَّثَنَا مَطَرُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الأَعْنَقُ، حَدَّثَتْنِي أُمُّ أَبَانَ بِنْتُ الْوَازِعِ بْنِ زَارِعٍ، عَنْ جَدِّهَا، زَارِعٍ وَكَانَ فِي وَفْدِ عَبْدِ الْقَيْسِ قَالَ لَمَّا قَدِمْنَا الْمَدِينَةَ فَجَعَلْنَا نَتَبَادَرُ مِنْ رَوَاحِلِنَا فَنُقَبِّلُ يَدَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَرِجْلَهُ - قَالَ - وَانْتَظَرَ الْمُنْذِرُ الأَشَجُّ حَتَّى أَتَى عَيْبَتَهُ فَلَبِسَ ثَوْبَيْهِ ثُمَّ أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لَهُ ‏"‏ إِنَّ فِيكَ خَلَّتَيْنِ يُحِبُّهُمَا اللَّهُ الْحِلْمُ وَالأَنَاةُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنَا أَتَخَلَّقُ بِهِمَا أَمِ اللَّهُ جَبَلَنِي عَلَيْهِمَا قَالَ ‏"‏ بَلِ اللَّهُ جَبَلَكَ عَلَيْهِمَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي جَبَلَنِي عَلَى خَلَّتَيْنِ يُحِبُّهُمَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ ‏.‏




উম্তু আবান বিনতু ওয়াযি’ ইবনু যারি’ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার দাদার হতে বর্ণিত, তিনি (দাদা) ‘আবদুল ক্বাইসের প্রতিনিধি দলের একজন ছিলেন। তিনি বলেন, আমরা মদিনায় এসে আমাদের আরোহী হতে দ্রুত নেমে এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে ও পায়ে চুমু দিলাম।



হাসান, তবে পায়ে চুমু খাওয়ার কথাটি বাদে।



অন্যদিকে আল-মুন্‌যির আল-আশাজ্জ তার কাপড়ের বান্ডিল হতে কাপড় বের করে তা পরা পর্যন্ত অপেক্ষা করলেন, তারপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আসলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ তোমার মধ্যে দুটি উত্তম স্বভাব রয়েছে যা আল্লাহ পছন্দ করেন: ধৈর্য ও ধীর-স্থিরতা। তিনি বললেনঃ হে আল্লাহর রাসূল! আমিই কি এ অভ্যাস গড়ে তুলেছি, না আল্লাহ আমাকে এ দুটি অভ্যাসের উপর সৃ্ষ্টি করেছেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আল্লাহই তোমাকে এ দুটি স্বভাবের উপর সৃষ্টি করেছেন। তখন তিনি বললেন, কৃতজ্ঞতা আদায় করছি সেই আল্লাহর যিনি আমাকে এমন দু’টি স্বভাবের উপর সৃষ্টি করেছেন, যাকে স্বয়ং আল্লাহ ও তাঁর রাসূল পছন্দ করেন।



সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن دون ذكر الرجلين




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أم أبان لم أجد من وثقھا فھي: مجہولۃ کما فی التحریر(8700) وللہیثمي کلام مشوش فی المجمع (390/9) ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وقصة الأشج صحيحة. أم أبان بنت الوازع تفرد عنها مطر بن عبد الرحمن الأعنق، ولم يوثقها أحد. محمَّد بن عيسى: هو ابن الطبّاع. وأخرجه البيهقي في "الكبرى" ٧/ ١٠٢، وفيا "دلائل النبوة" ٥/ ٣٢٧ - ٣٢٨ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراش في "المعجم الكبير"، (٥٣١٣) من طريق محمَّد بن عيسى، به. وأخرجه مطولاً ومختصراً البخارى في "الأدب المفرد" (٩٧٥)، وفي" التاريخ "الكبير"، ٣/ ٤٤٧، والبزار (٢٧٤٦ - زوائد)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٨٩٦٦) من طرق عن مطر بن عبد الرحمن الأعتق، به. وتقبيل اليد والرجل جاء فيه حديث عن صفوان بن عسال عند الترمذي (٢٩٣١)، والنسائي في "الكبرى" (٣٥٢٧)، وابن ماجه (٣٧٠٥)، وهو حسن في الشواهد، وعن علي عند البخاري في "الأدب المفرد" (٩٧٦) عن صهيب، قال: رأيت علياً ﵁ يقبل يد العباس ورجليه. ورجاله ثقات. ومن حديث بردة عند الحاكم في "المستدرك" ٤/ ١٧٢ - ١٧٣ في قصة الأعرابي والشجرة، فقال: يا رسول الله ﷺ إئذن لي أن أقبل رأسك ورجليك فأذن له. وفي سنده صالح بن حيان وهو ضعيف. وأما قصة الأشج فقد رواها النسانيُّ في "الكبرى" (٧٦٩٩) و (٨٢٤٨) من حديث أشجّ بني عَصَرٍ. وهي في "مسند أحمد" (١٧٨٢٨)، و"صحيح ابن حبان" (٧٢٠٣). وإسناده صحيح. ورواها مسلم (١٨) (٢٦) من حديث أبي سعيد الخدري. وهي في "مسند أحمد" (١١١٧٥). وانظر تمام تخريجها فيه. ورواها مسلم (١٧) (٢٥) من حديث عبد الله بن عباس. وهي في "صحيح ابن حبان" (٧٢٠٤) وانظر تمام تخريجها فيه. وانظر حديث ابن عمر السالف برقم (٥٢٢٣). والعيبة بفتح العين: مستودَعُ الثياب. والأناة: التثبت وترك العجلة، قال القاضي: الأناة: تربُّصه حتى نظر في مصالحه ولم يعجل. والحِلْم: هذا القول الدالُّ على صحة عقله، وجودة نظره للعواقب.









সুনান আবী দাউদ (5226)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، ح وَحَدَّثَنَا مُسْلِمٌ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ حَمَّادٍ، - يَعْنِيَانِ ابْنَ أَبِي سُلَيْمَانَ - عَنْ زَيْدِ بْنِ وَهْبٍ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ يَا أَبَا ذَرٍّ ‏"‏ ‏.‏ فَقُلْتُ لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَأَنَا فِدَاؤُكَ ‏.‏




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে আবূ যার! আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি উপস্থিত, আমি আপনার জন্য উৎসর্গিত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، حماد بن أبي سلیمان عنعن ، وحدیث البخاري (6268) و مسلم (94 بعد 921) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، حماد بن أبي سليمان احتج به مسلم، وقال الذهبي: ثقة إمام مجتهد. حماد: هو ابن سلمة، ومسلم: هو ابن إبراهيم الفراهيدي، وهشام: هو ابن أبي عبد الله الدستوائي. وأخرجه مطولاً البخاري (٦٢٦٨)، ومسلم بإثر (٩٩١) من طريق الأعمش، عن زيد بن وهب، به. دون قوله: وأنا فداك. وأخرجه أيضاً البخاري (٦٤٤٣)، ومسلم بإثر (٩٩١) من طريق عبد العزيز بن رفيع، عن زيد بن وهب، به. وأخرجه مسلم (٩٩٠)، والترمذي (٦٢١)، والنسائي في "الكبرى" (٢٢٣٢) من طريق المعرور بن سويد، عن أبي ذرّ. ولفظه: فداك أبي وأمي. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٢٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (١٧٠) و (١٩٥).









সুনান আবী দাউদ (5227)


حَدَّثَنَا سَلَمَةُ بْنُ شَبِيبٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ قَتَادَةَ، أَوْ غَيْرِهِ أَنَّ عِمْرَانَ بْنَ حُصَيْنٍ، قَالَ كُنَّا نَقُولُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ أَنْعَمَ اللَّهُ بِكَ عَيْنًا وَأَنْعِمْ صَبَاحًا فَلَمَّا كَانَ الإِسْلاَمُ نُهِينَا عَنْ ذَلِكَ ‏.‏ قَالَ عَبْدُ الرَّزَّاقِ قَالَ مَعْمَرٌ يُكْرَهُ أَنْ يَقُولَ الرَّجُلُ أَنْعَمَ اللَّهُ بِكَ عَيْنًا وَلاَ بَأْسَ أَنْ يَقُولَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَيْنَكَ ‏.‏




ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বা অন্য কারো হতে বর্ণিত, ‘ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, জাহিলী যুগে আমরা বলতাম, “আল্লাহ তোমাদের চক্ষু শীতল করুন অথবা প্রত্যুষে তুমি আনন্দিত হও। ইসলামের আবির্ভাবের পর আমাদের এসব বলতে বাধা দেওয়া হয়। ‘আবদুর রায্‌যাক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, মা’মার বলেন, আল্লাহ তোমার জন্য তোমার চক্ষু শীতল করুন, এরুপ বলা অপছন্দনীয়। তবে ‘আল্লাহ তোমার চক্ষু শীতল করুন’ – এরুপ বলা দোষনীয় নয়। [৫২২৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قتادۃ لم یسمع من عمران بن حصین رضي اللّٰہ عنہ (انظر تحفۃ الأشراف 186/8) ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات إلا أنه منقطع. قتاده -وهو ابن دعامة السدوسي- لم يسمع مِن عِمران بن حصين. عبد الرزاق: هو الصنعاني، وسر: هو ابن راشد. وهو عند عبد الرزاق في "مصنفه" (١٩٤٣٧)، ومن طريقه أخرجه البيهقي في " شعب الإيمان" (٨٥٠٢).









সুনান আবী দাউদ (5228)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ ثَابِتٍ الْبُنَانِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ رَبَاحٍ الأَنْصَارِيِّ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو قَتَادَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ فِي سَفَرٍ لَهُ فَعَطِشُوا فَانْطَلَقَ سَرَعَانُ النَّاسِ فَلَزِمْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم تِلْكَ اللَّيْلَةَ فَقَالَ ‏ "‏ حَفِظَكَ اللَّهُ بِمَا حَفِظْتَ بِهِ نَبِيَّهُ ‏"‏ ‏.




আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সফরে ছিলেন। পথিমধ্যে লোকেরা পিপাসার্ত হওয়ায় দ্রুত অগ্রসর হয়। আমি ঐ রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)- এর সঙ্গেই ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আল্লাহ তোমাকে হেফাযাত করুন; যেমন তুমি তাঁর নাবীকে হিফাযাত করেছো (পাহাড়া দিয়ে)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (681)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة، وثابت: هو ابن أسلم. وأخرجه مطولاً مسلم (٦٨١) من طريق سليمان بن المغيرة، عن ثابت، بهذا الاسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٥٤٦) و (٢٢٥٧٥). والسرعان: قال في "النهاية": هو بفتح السين والراء: أوائل الناس الذين يتسارعون إلى الشيء، ويقبلون عليه بسرعة، ويجوز تسكين الراء. وفي الحديث أنه يستحب لمن صنع إليه معروف أن يدعو لفاعله.









সুনান আবী দাউদ (5229)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ حَبِيبِ بْنِ الشَّهِيدِ، عَنْ أَبِي مِجْلَزٍ، قَالَ خَرَجَ مُعَاوِيَةُ عَلَى ابْنِ الزُّبَيْرِ وَابْنِ عَامِرٍ فَقَامَ ابْنُ عَامِرٍ وَجَلَسَ ابْنُ الزُّبَيْرِ فَقَالَ مُعَاوِيَةُ لاِبْنِ عَامِرٍ اجْلِسْ فَإِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ مَنْ أَحَبَّ أَنْ يَمْثُلَ لَهُ الرِّجَالُ قِيَامًا فَلْيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ মিজলায (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইবনুয যুবাইর ও ইবনু ‘আমিরের নিকট আসলেন। ইবনু ‘আমির দাঁড়িয়ে গেলেন, কিন্তু ইবনুয যুবাইর বসে রইলেন। মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইবনু ‘আমিরকে বললেন, বসো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ যে লোক নিজের জন্য অন্য লোকের অপেক্ষা করাকে পছন্দ করে, সে যেন জাহান্নামে তার আসন নির্ধারন করে নেয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (4699) ، وللحدیث شاھد قوي عند الطبراني (19/362) قال معاذ: واخرجہ وابن سعد فی الطبقات (متمم الصحابۃ: 517، طبع مکتبۃ الخانجي: 6/ 477) وسندہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة البصري، وأبو مِجْلَز: هو لاحق بن حميد السدوسي. وأخرجه الترمذي (٢٩٥٨) و (٢٩٥٩) من طريقين عن حبيب بن الشهيد، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن. وهو في "مسند أحمد" (١٦٨٣٠). وانظر تمام كلامنا عليه فيه. وقوله يمثل معناه: يقوم وينتصب بين يديه، ولفظ الترمذي: يتمثل. قال الزمخشري: أمر بمعنى الخبر، كأنه قال: من أحب ذلك، وجب له أن ينزل منزلته من النار وحُق له ذلك. قال المناوي: وذلك لأن ذلك إنما ينشأ عن تعظيم المرء بنفسه، واعتقاد الكمال، وذلك عجب وتكبر، وجهل وغرور، ولا يناقضه خبر "قوموا إلى سيدكم" لأن سعداً لم يحب ذلك، والوعيد إنما هو لمن أحبه. وقال النووي: ومعنى الحديث زجر المكلف أن يحب قيام الناس له، ولا تعرض فيه للقيام بنص ولا بغيره، والمنهي عنه محبة القيام له فلو لم يخطر بباله، فقاموا له أو لم يقوموا فلا لوم عليه، وإن أحبه أثم، قاموا أو لا، فلا يصح الاحتجاج به لترك القيام، ولا يناقضه ندب القيام لأهل الكمال ونحوهم. وانظر لزاماً "شرح مشكل الآثار" ٣/ ١٥٠ - ١٥٧.









সুনান আবী দাউদ (5230)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ مِسْعَرٍ، عَنْ أَبِي الْعَنْبَسِ، عَنْ أَبِي الْعَدَبَّسِ، عَنْ أَبِي مَرْزُوقٍ، عَنْ أَبِي غَالِبٍ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ، قَالَ خَرَجَ عَلَيْنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مُتَوَكِّئًا عَلَى عَصًا فَقُمْنَا إِلَيْهِ فَقَالَ ‏ "‏ لاَ تَقُومُوا كَمَا تَقُومُ الأَعَاجِمُ يُعَظِّمُ بَعْضُهَا بَعْضًا ‏"‏ ‏.‏




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লাঠিতে ভর দিয়ে আমাদের নিকট আসলেন। আমরা তাঁর সম্মানে উঠে দাঁড়ালে তিনি বললেনঃ তোমরা দাঁড়াবে না, যেরুপ অনারবরা একে অপরের সম্মান দেখানোর জন্য দাঁড়ায়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف لكن النهي عن فعل فارس في م




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (3836) ، أبو مرزوق لین (تق: 8353) و أبو العدبس: مجہول (تق: 8248) ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. أبو مرزوق، قال ابن حبان في "المجروحين": لا يجوز الاحتجاج به لانفراده عن الأثبات بما خالف حديث الثقات، وأبو غالب -وهو الحَزَوَّر البصري- ضعيف. وقد اختلف في إسناده عن مِسْعَر -وهو ابن كِدَام الهلالي- فتارة روي عنه عن أبي مرزوق عن أبي العدبَّس عن أبي أمامة كما في رواية ابن ماجه، وتارة روي عنه عن أبي العَنبس، عن أبي العدبَّس، عن أبي مرزوق، عن أبي غالب، عن أبي أمامة كما في رواية المصنف، وتارة روي عنه عن أبي العدبَّس عن رجل يظنة أبا خلف، عن أبي مرزوق، عن أبي أمامة، وتارة عنه عن أبي العدبَّس، عن أبى مرزوق، عن رجلٍ، عن أبي أمامة. وانظر بسط ذلك في "مسند أحمد" (٢٢١٨١). وأخرجه ابن ماجه (٣٨٣٦) عن علي بن محمَّد، حدَّثنا وكيع، عن مِسْعَر، عن أبي مرزوق، عن أبى العدبَّس، عن أبي أمامة الباهلي.









সুনান আবী দাউদ (5231)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، عَنْ غَالِبٍ، قَالَ إِنَّا لَجُلُوسٌ بِبَابِ الْحَسَنِ إِذْ جَاءَ رَجُلٌ فَقَالَ حَدَّثَنِي أَبِي عَنْ جَدِّي قَالَ بَعَثَنِي أَبِي إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ائْتِهِ فَأَقْرِئْهُ السَّلاَمَ ‏.‏ قَالَ فَأَتَيْتُهُ فَقُلْتُ إِنَّ أَبِي يُقْرِئُكَ السَّلاَمَ ‏.‏ فَقَالَ ‏ "‏ عَلَيْكَ وَعَلَى أَبِيكَ السَّلاَمُ ‏"‏ ‏.‏




গালিব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–এর বাড়ির দরজায় বসে ছিলাম। এ সময় এক লোক এসে বলল, আমার পিতা আমার দাদার সূত্রে আমার নিকট বর্ণনা করেছেন যে, আমাকে আমার পিতা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) – এর নিকট পাঠালেন। তিনি বললেন, তাঁর নিকট গিয়ে তাঁকে সালাম জানাবে। তিনি বলেন, আমি তাঁর নিকট পৌঁছে বললাম, আমার পিতা আপনাকে সালাম দিয়েছেন। তিনি বললেনঃ ‘আলাইকা ওয়া ‘আলা আবীকাস্‌ সালাম (তোমার এবং তোমার পিতার উপর শান্তি বর্ষিত হোক)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قال المنذري:’’ ھذا الإسنادفیہ مجاہیل ‘‘ (عون المعبود 528/4) ، وانظرالحدیث السابق (2934) ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة الرجل وأبيه، وقد قال المنذري في "مختصر السنن" ٨/ ٩٤ - ٩٥: وهذا الإسناد فيه مجاهيل. إسماعيل: هو ابن إبراهيم، المعروف بابن عُلية، وغالب: هو ابن خطَّاف القطان. وهو عند ابن أبي شبة في" مصنفه " ٨/ ٦١٢ - ٦١٣. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ١٢٢، وأحمد في "مسنده" (٢٣١٠٤)، والنسائي في "الكبرى" (١٠١٣٣) - ومن طريقه ابن السني في "عمل اليوم والليلة" (٢٣٨) - من طريق شعبة، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" ٢٥٨/ ٧ من طريق مسْعَر، كلاهما عن غالب، به. وقد سلف مطولاً برقم (٢٩٣٤).









সুনান আবী দাউদ (5232)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحِيمِ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ زَكَرِيَّا، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، أَنَّ عَائِشَةَ، رضى الله عنها حَدَّثَتْهُ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لَهَا ‏ "‏ إِنَّ جِبْرِيلَ يَقْرَأُ عَلَيْكِ السَّلاَمَ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَتْ وَعَلَيْهِ السَّلاَمُ وَرَحْمَةُ اللَّهِ ‏.




আবূ সালামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলেছেন: জিবরাঈল (আ) তোমাকে সালাম জানিয়েছে। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেনঃ “ওয়া ‘আলাইহিস সালাম ওয়া রহমাতুল্লাহ” (অর্থ: তার উপরেও শান্তি ও রহমত বর্ষিত হোক!)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6253) صحیح مسلم (2447)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناد. صحيح. زكريا: هو ابن أي زائدة، والشعبي: هو عامر بن شَرَاحيل، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف الزهري. وهو عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" ١٣/ ٦٨، و ١٢/ ١٣٢ - ١٣٣، وعنه أخرجه مسلم (٢٤٤٧) (٩٠)، وابن ماجه (٣٦٩٦). وأخرجه البخاري (٦٢٥٣)، ومسلم (٢٤٤٧) (٩٠) وبإثره، والترمذي (٢٨٨٨) و (٤٢٢٠) من طرق، عن زكريا، به. وأخرجه البخاري (٣٢١٧) و (٣٧٦٨) و (٦٢٠١) و (٦٢٤٩)، ومسلم (٢٤٤٧) (٩١)، والترمذى (٤٢١٩)، والنسائي في "الكبرى" (٨٨٥٠) و (٨٨٥١) و (١٠١٣٦) و (١٠١٣٧) من طريق ابن شهاب الزهري، عن أبي سلمة، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٨٣٢٤) و (٨٨٤٩) من طريق صالح بن ربيعةَ بن هُدَير، و (٨٨٥٠) و (١٠١٣٥) من طريق عروة، كلاهما عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٨١)، و"صحيح ابن حبان" (٧٠٩٨).









সুনান আবী দাউদ (5233)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا يَعْلَى بْنُ عَطَاءٍ، عَنْ أَبِي هَمَّامٍ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَسَارٍ، أَنَّ أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْفِهْرِيَّ، قَالَ شَهِدْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حُنَيْنًا فَسِرْنَا فِي يَوْمٍ قَائِظٍ شَدِيدِ الْحَرِّ فَنَزَلْنَا تَحْتَ ظِلِّ الشَّجَرَةِ فَلَمَّا زَالَتِ الشَّمْسُ لَبِسْتُ لأْمَتِي وَرَكِبْتُ فَرَسِي فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ فِي فُسْطَاطِهِ فَقُلْتُ السَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ قَدْ حَانَ الرَّوَاحُ فَقَالَ ‏"‏ أَجَلْ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ يَا بِلاَلُ قُمْ ‏"‏ ‏.‏ فَثَارَ مِنْ تَحْتِ سَمُرَةٍ كَأَنَّ ظِلَّهُ ظِلُّ طَائِرٍ فَقَالَ لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ وَأَنَا فِدَاؤُكَ ‏.‏ فَقَالَ ‏"‏ أَسْرِجْ لِي الْفَرَسَ ‏"‏ ‏.‏ فَأَخْرَجَ سَرْجًا دَفَّتَاهُ مِنْ لِيفٍ لَيْسَ فِيهِ أَشَرٌ وَلاَ بَطَرٌ فَرَكِبَ وَرَكِبْنَا ‏.‏ وَسَاقَ الْحَدِيثَ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ أَبُو عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْفِهْرِيُّ لَيْسَ لَهُ إِلاَّ هَذَا الْحَدِيثُ وَهُوَ حَدِيثٌ نَبِيلٌ جَاءَ بِهِ حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ ‏.‏




আবূ হাম্মাম ‘আবদুল্লাহ ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আবূ ‘আবদূর রহমান আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে হুনাইনে উপস্থিত ছিলাম। আমরা প্রচণ্ড গরমের দিনে সফর করলাম। সূর্য ঢলে পড়লে আমি আমার সামরিক পোশাক পরিধান করে আমার ঘোড়ায় চড়লাম, তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আসলাম। তিনি তখন তাঁর তাঁবুতে অবস্থান করছিলেন। আমি বললাম, আস্‌সালামু ‘আলাইকা ইয়া রাসূলুল্লাহি ওয়া রহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু। যাত্রার সময় হয়েছে। তিনি বললেনঃ ঠিক আছে। তারপর বললেনঃ হে বিলাল! উঠো। বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি বাবলা গাছের নীচ হতে হন্তদন্ত হয়ে আসলেন। তার ছায়া পাখীর ছায়ার মত ছোট ছিল। বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি আপনার ডাকে সাড়া দিলাম, আমি উপস্থিত আছি, আমি আপনার জন্য উৎসর্গীত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, আমার ঘোড়ার গদি আঁটো। তিনি একটি গদি বের করলেন যার উভয় পাশ খেজুর গাছের পাতা ভর্তি ছিল। তাতে আত্মগর্বের কিছুই ছিল না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাতে আরোহন করলেন এবং আমরাও সওয়ার হলাম। অতঃপর বর্ণনাকারী পুরো হাদীস বর্ণনা করেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو ھمام عبداﷲ بن یسار: مجہول (تق: 3718) وثقہ ابن حبان وحدہ ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي همام عبدُ الله بن يَسار. حمّاد: هو ابن سلمة البصري. وأخرجه ابن أبى عاصم في "الآحاد والمثاني" (٨٦٣)، وابن الأثير في "أسد الغابة" ٦/ ٢٠٠ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه الطيالسي في "مسند" (١٣٧١)، والدارمي في "سننه" (٢٤٥٢)، وابن سعد في "طبقاته" ٢/ ١٥٦، وابن أبى شيبة في "مصنفه" ١٤/ ٥٢٩ - ٥٣٠، وأحمد في "مسنده" (٢٢٤٦٧) و (٢٢٤٦٨)، والطبري في "تفسيره" ١٠/ ١٠٢، والطبراني في "المعجم الكبير" ٢٢/ (٧٤١)، والمزي في ترجمة عبد الله بن يسار من "تهذيب الكمال" ١٦/ ٣٢٨ - ٣٢٩ من طرق عن حمّاد، به. وتمامه: فصاففناهم عشيتنا وليلتنا فتشامَّتِ الخَيلان، فولَّى المسلمون مدبرين كما قال الله ﷿، فقال رسول الله ﷺ: "يا عباد الله أنا عبد الله ورسوله" ثم قال: "يا معشر المهاجرين أنا عبد الله ورسوله" قال: ثم اقتحم رسول الله ﷺ عن فرسه فأخذ كفاً من تراب، فأخبرني الذي كان أدنى إليه مني: ضرب به وجوههم، وقال: "شاهت الوجوه" فهزمهم الله ﷿. لفظ "المسند". وأورده الهيثمي في" مجمع الزوائد" ٦/ ١٨١ - ١٨٢، وْقال: رواه البزار والطبراني، ورجالهما ثقات! وفي الباب ما يقويه عن العباس بن عبد المطلب عند مسلم (١٧٧٥). وهو في "مسند أحمد" (١٧٧٥). لكن ليس فيه قول بلال: لبيك وسعديك، وأنا فداؤك. وآخر عن سلمة بن الاكوع عند مسلم أيضاً برقم (١٧٧٧). وليس فيه قول بلال أيضاً. ويشهد لقول بلال حديث أبى ذرَّ السالف برقم (٥٢٢٦).









সুনান আবী দাউদ (5234)


حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ إِبْرَاهِيمَ الْبِرَكِيُّ، وَسَمِعْتُهُ مِنْ أَبِي الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيِّ، وَأَنَا لِحَدِيثِ، عِيسَى أَضْبَطُ قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْقَاهِرِ بْنُ السَّرِيِّ، - يَعْنِي السُّلَمِيَّ - حَدَّثَنَا ابْنُ كِنَانَةَ بْنِ عَبَّاسِ بْنِ مِرْدَاسٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ ضَحِكَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لَهُ أَبُو بَكْرٍ أَوْ عُمَرُ أَضْحَكَ اللَّهُ سِنَّكَ ‏.‏ وَسَاقَ الْحَدِيثَ ‏.‏




ইবনু কিনানাহ ইবনু ‘আব্বাস ইবনু মিরদাস (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা ও তার দাদা হতে বর্ণিত, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন। তখন আবূ বাকর বা ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, আল্লাহ আপনার মুখে হাঁসি ফুটিয়ে রাখুন। [৫২৩২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (3013) ، عبداﷲ بن کنانۃ وأبوہ:مجہولان (تق: 3556،5667) ، (انوار الصحیفہ ص 181)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف عبد القاهر بن إلسَّري السُّلَمي، وجهالة ابن كنانة -واسمه عبد الله- وأبيه. وأخرجه مطولاً ابن ماجه (٣٠١٣) عن أيوب بن محمَّد الهاشمي، عن عبد القاهر ابن السرى، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٢٠٧) من زيادات عبد الله بن أحمد على أبيه من طريق عبد القاهر بن السرى، به. وانظر تمام تخريجه وبسط الكلام على علله هناك.