সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبَّادٍ الأَزْدِيُّ، حَدَّثَنَا مَرْوَانُ، حَدَّثَتْنِي طَلْحَةُ أُمُّ غُرَابٍ، عَنْ عَقِيلَةَ، - امْرَأَةٌ مِنْ بَنِي فَزَارَةَ مَوْلاَةٌ لَهُمْ - عَنْ سَلاَمَةَ بِنْتِ الْحُرِّ، أُخْتِ خَرَشَةَ بْنِ الْحُرِّ الْفَزَارِيِّ قَالَتْ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِنَّ مِنْ أَشْرَاطِ السَّاعَةِ أَنْ يَتَدَافَعَ أَهْلُ الْمَسْجِدِ لاَ يَجِدُونَ إِمَامًا يُصَلِّي بِهِمْ " .
খারাশাহ ইবনুল হুর আল-ফাযারীর বোন সালামাহ বিনতুল হুর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ক্বিয়ামাতের একটি নিদর্শন এটাও যে, মাসজিদের বাসিন্দারা ইমামতির জন্য একে অপরের অনুরোধ প্রত্যাখ্যান করবে। পরিচ্ছিত এমন হবে যে, তাদের সলাত আদায় করাবার মত কোন (যোগ্য) ইমাম তারা পাবে না। [৫৮০]
দুর্বলঃ মিশকাত ১১২৪।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (982) ، أم غراب وعقیلۃ لا یعرف حالھما (تقریب 8631،8642) ، (انوار الصحیفہ ص 34)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف، طلحة أم غراب وعقيلة مجهولتا الحال. وأخرجه ابن ماجه (٩٨٢) من طريق وكيع، عن أم غراب، بهذا الإسناد، بلفظ: "يأتي على الناس زمان يقومون ساعة لا يجدون إماماً يُصلي بهم". وهو في "مسند أحمد" (٢٧١٣٧) و (٢٧١٣٨). ومعنى يتدافع أهل المسجد، أي: يدرأ كل من أهل المسجد الإمامةَ عن نفسه، ويقول: لستُ أهلاً ها لما ترك ما تصح به الإمامة. ذكره الطيبي. أو يدفع بعضهم بعضاً إلى المسجد أو المحراب ليؤم بالجماعة فيأبى عنها لعدم صلاحيته لها لعدم علمه بها. قاله ابن الملك.
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، أَخْبَرَنِي إِسْمَاعِيلُ بْنُ رَجَاءٍ، سَمِعْتُ أَوْسَ بْنَ ضَمْعَجٍ، يُحَدِّثُ عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ الْبَدْرِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " يَؤُمُّ الْقَوْمَ أَقْرَؤُهُمْ لِكِتَابِ اللَّهِ وَأَقْدَمُهُمْ قِرَاءَةً فَإِنْ كَانُوا فِي الْقِرَاءَةِ سَوَاءً فَلْيَؤُمَّهُمْ أَقْدَمُهُمْ هِجْرَةً فَإِنْ كَانُوا فِي الْهِجْرَةِ سَوَاءً فَلْيَؤُمَّهُمْ أَكْبَرُهُمْ سِنًّا وَلاَ يُؤَمُّ الرَّجُلُ فِي بَيْتِهِ وَلاَ فِي سُلْطَانِهِ وَلاَ يُجْلَسُ عَلَى تَكْرِمَتِهِ إِلاَّ بِإِذْنِهِ " . قَالَ شُعْبَةُ فَقُلْتُ لإِسْمَاعِيلَ مَا تَكْرِمَتُهُ قَالَ فِرَاشُهُ .
আবূ মাসউদ আল-বাদ্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আল্লাহর কিতাব সম্পর্কে সবচেয়ে অভিজ্ঞ ও কিরাআতে অধিক পারদর্শী ব্যক্তি লোকদের ইমামতি করবে। ক্বিরাআতের দিক থেকে সকলে সমান হলে ইমামতি করবে ঐ ব্যক্তি, যে সবার আগে হিজরাত করেছে। হিজরাতের দিক থেকে সবাই সমান হলে বয়োজ্যেষ্ঠ্য ব্যক্তি ইমামতি করবে। কেউ যেন অনুমতি ছাড়া কারো বাড়িতে, কারো প্রভাবাধীন এলাকায় ইমামতি না করে এবং অনুমতি ছাড়া কারো সংরক্ষিত আসনে না বসে।
সহীহঃ মুসলিম।
শু‘বাহ বলেন, আমি ইসমাঈলকে বললাম, ‘সংরক্ষিত আসন’ অর্থ কী? তিনি বললেন, ‘তার বিছানা’।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (673)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه مسلم (٦٧٣) (٢٩١)، وابن ماجه (٩٨٠) من طريق محمَّد بن جعفر، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٠) من طريق يحيى بن سعيد القطان، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد. ورواية النسائي مختصرة بقوله: "لا يؤم الرجل في سلطانه، ولا يجلس على تكرمته إلا بإذنه". وهو في "مسند أحمد" (١٧٠٦٣) و (١٧٠٩٩)، و"صحيح ابن حبان" (٢١٢٧) و (٢١٣٣). وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (٥٨٤).
حَدَّثَنَا ابْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فِيهِ " وَلاَ يَؤُمُّ الرَّجُلُ الرَّجُلَ فِي سُلْطَانِهِ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَذَا قَالَ يَحْيَى الْقَطَّانُ عَنْ شُعْبَةَ " أَقْدَمُهُمْ قِرَاءَةً " .
শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছেঃ কেউ কারোর প্রভাবাধীন এলাকায় (অনুমতি ছাড়া) ইমামতি করবে না।
সহীহ।
ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলৈন, ইয়াহ্ইয়াহ আল-কাত্তান শু‘বাহ থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন যে, সর্বাধিক অভিজ্ঞ ক্বারীই ইমামতির যোগ্য।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن معاذ: هو عُبيد الله بن معاذ بن معاذ العنبري. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ إِسْمَاعِيلَ بْنِ رَجَاءٍ، عَنْ أَوْسِ بْنِ ضَمْعَجٍ الْحَضْرَمِيِّ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا مَسْعُودٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ " فَإِنْ كَانُوا فِي الْقِرَاءَةِ سَوَاءً فَأَعْلَمُهُمْ بِالسُّنَّةِ فَإِنْ كَانُوا فِي السُّنَّةِ سَوَاءً فَأَقْدَمُهُمْ هِجْرَةً " . وَلَمْ يَقُلْ " فَأَقْدَمُهُمْ قِرَاءَةً " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ حَجَّاجُ بْنُ أَرْطَاةَ عَنْ إِسْمَاعِيلَ قَالَ " وَلاَ تَقْعُدْ عَلَى تَكْرِمَةِ أَحَدٍ إِلاَّ بِإِذْنِهِ " .
আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছেঃ কিরাআতে সবাই সমান হলে হাদীস সম্পর্কে বেশি অভিজ্ঞ লোক ইমামতি করবে। হাদীস সম্পর্কেও সকলে সমান হলে সর্বাগ্রে হিজরাতকারী (ইমামতি করবে)। আর এই বর্ণনাতে ‘সবচেয়ে অভিজ্ঞ ক্বারী’ কথাটি উল্লেখ নেই।
সহীহঃ মুসলিম।
ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, হাজ্জাজ ইবনু আরত্বাত (রাহিমাহুল্লাহ) ইসমাইলের সূত্রে বর্ণনা করেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ সে যেন অনুমতি ছাড়া কারো নির্দিষ্ট আসনে না বসে।
সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیثین السابقین (582، 583)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مهران. وأخرجه مسلم (٦٧٣) (٢٩٠)، والترمذي (٢٣٢) و (٢٩٧٧)، والنسائى في "الكبرى" (٨٥٧) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. ورواية الترمذي في الموضع الثاني مختصرة. وانظر ما سلف برقم (٥٨٢). تنبيه: زاد في الطبعة الشامية بتحقيق الأستاذ عزت عبيد الدعاس، وعادل السيد بعد هذا الحديث: "قال أبو داود: رواه حجاج بن أرطاة عن إسماعيل، قال: "ولا تقعد على تكرمة أحد إلا بإذنه". ورواية حجاج أخرجها الطبرانى ١٧/ (٦١٧)، والدارقطني (١٠٨٥)، والحاكم ٢٤٣/ ١ بلفظ الجماعة: "ولا يجلس على تكرمته إلا بإذنه"، أما باللفظ المذكور فلم نقف عليها.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا أَيُّوبُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ سَلِمَةَ، قَالَ كُنَّا بِحَاضِرٍ يَمُرُّ بِنَا النَّاسُ إِذَا أَتَوُا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَكَانُوا إِذَا رَجَعُوا مَرُّوا بِنَا فَأَخْبَرُونَا أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ كَذَا وَكَذَا وَكُنْتُ غُلاَمًا حَافِظًا فَحَفِظْتُ مِنْ ذَلِكَ قُرْآنًا كَثِيرًا فَانْطَلَقَ أَبِي وَافِدًا إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي نَفَرٍ مِنْ قَوْمِهِ فَعَلَّمَهُمُ الصَّلاَةَ فَقَالَ " يَؤُمُّكُمْ أَقْرَؤُكُمْ " . وَكُنْتُ أَقْرَأَهُمْ لِمَا كُنْتُ أَحْفَظُ فَقَدَّمُونِي فَكُنْتُ أَؤُمُّهُمْ وَعَلَىَّ بُرْدَةٌ لِي صَغِيرَةٌ صَفْرَاءُ فَكُنْتُ إِذَا سَجَدْتُ تَكَشَّفَتْ عَنِّي فَقَالَتِ امْرَأَةٌ مِنَ النِّسَاءِ وَارُوا عَنَّا عَوْرَةَ قَارِئِكُمْ . فَاشْتَرَوْا لِي قَمِيصًا عُمَانِيًّا فَمَا فَرِحْتُ بِشَىْءٍ بَعْدَ الإِسْلاَمِ فَرَحِي بِهِ فَكُنْتُ أَؤُمُّهُمْ وَأَنَا ابْنُ سَبْعِ سِنِينَ أَوْ ثَمَانِ سِنِينَ .
‘আমর ইবনু সালামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা এমন জায়গায় সমবেত ছিলাম যে, লোকেরা আমাদের পাশ দিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাতায়াত করত এবং প্রত্যাবর্তনের সময় তারা আমাদের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বর্ণনা করত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরূপ এরূপ বলেছেন। তখন আমি বালক ছিলাম, যা শুনতাম তাই মুখস্থ করে ফেলতাম। শুনে শুনে আমি কুরআনের কিছু অংশও মুখস্থ করে ফেলি। একবার আমার পিতা কিছু সংখ্যক লোকসহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন। তিনি তাদেরকে সলাতের নিয়ম-কানুন শিক্ষা দিলেন। তিনি আরো বললেনঃ তোমাদের মধ্যকার কুরআন সম্পর্কে সবচেয়ে অভিজ্ঞ ব্যক্তি ইমামতি করবে। আর আমিই ছিলাম কুরআন সম্পর্কে সর্বাধিক অভিজ্ঞ এবং সকলের চেয়ে আমারই কুরআন বেশী মুখস্থ ছিল। সেহেতু তারা আমাকে ইমাম নিযুক্ত করল। আমি তাদের ইমমতি করতাম। এ সময় আমার গায়ে ছোট একটি গেরুয়া রংয়ের চাদর ছিল। আমি যখন সাজদাহ্য় যেতাম তখন আমার লজ্জাস্থান অনাবৃত হয়ে যেত। এক মহিলা বলল, তোমাদের ক্বারীর লজ্জাস্থান ঢাকার ব্যবস্থা কর। তারা আমার জন্য একটি ওমানী চাদর খরিদ করল। এতে আমি এতই আনন্দিত হই যে, ইসলাম গ্রহণের পর আর কিছুতে আমি এতটা আনন্দিত হইনি। আমার বয়স যখন মাত্র সাত কি আট বছর তখন থেকেই আমি তাদের ইমামতি করতাম।
সহীহঃ অনুরূপ বুখারী।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (54)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني. وأخرجه البخاري (٤٣٠٢)، والنسائي في "الكبرى" (٨٦٦) و (١٦١٢) من طريقين عن أيوب، بهذا الإسناد. ورواية النسائي مختصرة. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣٣٣). وانظر ما بعده. وقوله: كنا بحاضر. الحاضر: القوم النزول على ما يقيمون به، لا يرحلون عنه، وربما جعلوه اسماً لمكان الحضور، يقال: نزلنا حاضر بني فلان، فهو فاعل بمعنى مفعول. وفي الحديث دليل لما قاله الحسن البصري والشافعي وإسحاق بن راهويه من أنه لا كراهة في إمامة المميز، وكرهها مالك والثوري، وعن أحمد وأبى حنيفة روايتان والمشهور عنهما الأخرى في النوافل دون الفرائض. وقال العيني فى "شرح الهداية" ٢/ ٣٤٤ تعليقاً على قول صاحب "الهداية": وأما الصبى فلأنه متنفل، أي: وأما عدم جواز الاقتداء بالصبى، فلأنه متنفل، والذي يقتدي به مفترض، فلا يجوز اقتداء المفترض بالمنتفل، لأن صلاة الإمام متضمنة صلاة المقتدي صحة وفساداً لقوله ﵇: "الإمام ضامن" ولا شك أن الشيء إنما يتضمن ما هو دونه لا ما هو فوقه، فلم يجز اقتداء البالغ بالصبي لهذا، وبه قال الأوزاعي والثوري ومالك وأحمد وإسحاق، وفي النفل روايتان، وقال ابن المنذر: وكرهها عطاء والشعبي ومجاهد، وقال الحسن والشافعى: تصح إمامته، وفي الجمعة له قولان قال في "الأم": لا تجوز، وقال في "الإملاء": تجوز، واستدل بهذا الحديث. وقال ابن قدامة في "المغني" ٣/ ٧٠: ولا يصح ائتمام البالغ بالصبي في الفرض نص عليه أحمد وهو قول ابن مسعود وابن عباس، وبه قال عطاء ومجاهد والشعبي ومالك والثوري والأوزاعى وأبو حنيفة، وأجازه الحسن والشافعى وإسحاق وابن المنذر.
حَدَّثَنَا النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا عَاصِمٌ الأَحْوَلُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ سَلِمَةَ، بِهَذَا الْخَبَرِ قَالَ فَكُنْتُ أَؤُمُّهُمْ فِي بُرْدَةٍ مُوصَلَةٍ فِيهَا فَتْقٌ فَكُنْتُ إِذَا سَجَدْتُ خَرَجَتِ اسْتِي .
‘আমর ইবনু সালামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ‘আমর ইবনু সালামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একই হাদীসে বর্ণিত আছে, আমি একটি তালিযুক্ত চাদর গায়ে দিয়ে তাদের ইমামতি করতাম। চাদরটি ছেঁড়া থাকায় সিজদায় গমনকালে আমার নিতম্ব উন্মুক্ত হয়ে যেত।
সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. النفيلى: هو عبد الله بن محمَّد، وزهير: هو ابن معاوية، وعاصم الأحول: هو ابن سليمان. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٨٤٥) من طريق يزيد بن هارون، عن عاصم الأحول، به. وانظر ما قبله وما بعده.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ مِسْعَرِ بْنِ حَبِيبٍ الْجَرْمِيِّ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ سَلِمَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّهُمْ وَفَدُوا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا أَرَادُوا أَنْ يَنْصَرِفُوا قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ مَنْ يَؤُمُّنَا قَالَ " أَكْثَرُكُمْ جَمْعًا لِلْقُرْآنِ " . أَوْ " أَخْذًا لِلْقُرْآنِ " . قَالَ فَلَمْ يَكُنْ أَحَدٌ مِنَ الْقَوْمِ جَمَعَ مَا جَمَعْتُهُ - قَالَ - فَقَدَّمُونِي وَأَنَا غُلاَمٌ وَعَلَىَّ شَمْلَةٌ لِي فَمَا شَهِدْتُ مَجْمَعًا مِنْ جَرْمٍ إِلاَّ كُنْتُ إِمَامَهُمْ وَكُنْتُ أُصَلِّي عَلَى جَنَائِزِهِمْ إِلَى يَوْمِي هَذَا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ عَنْ مِسْعَرِ بْنِ حَبِيبٍ الْجَرْمِيِّ عَنْ عَمْرِو بْنِ سَلِمَةَ قَالَ لَمَّا وَفَدَ قَوْمِي إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم لَمْ يَقُلْ عَنْ أَبِيهِ .
‘আমর ইবনু সালামাহ হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, তারা একটি প্রতিনিধি দল হিসেবে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যান এবং ফিরে আসার সময় জিজ্ঞেস করেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের (সলাতে) ইমামতি করবে কে? তিনি বললেন, তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি কুরআন বেশি জানে। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আমিই ছিলাম আমার ক্বওমের মধ্যে কুরআন সম্পর্কে অধিক জ্ঞাত। সেজন্য তারা আমাকে (ইমামতির জন্য) সম্মুখে এগিয়ে দিল। কিন্তু আমি অপ্রাপ্তবয়স্ক বালক ছিলাম। আমার পরনে ছোট একটি চাদর থাকত। জারাম গোত্রের যে কোন মাজলিসে উপস্থিত হলে আমিই তাদের ইমামতি করতাম এবং আজকের এদিন পর্যন্ত তাদের জানাযার সলাতও আমি পড়াতাম।
সহীহঃ কিন্তু তার (আরবী) কথাটি অংসরক্ষিত।
ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইয়াযীদ ইবনু হারূন সূত্রে ‘আমর ইবনু সালামাহ্র বর্ণনায় সানাদে ‘আন আবীহি’ উল্লেখ নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لكن قوله عن أبيه غير محفوظ
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. قتيبة: هو ابن سعيد، ووكيع: هو ابن الجراح. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣٣٢). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، حَدَّثَنَا أَنَسٌ يَعْنِي ابْنَ عِيَاضٍ، ح وَحَدَّثَنَا الْهَيْثَمُ بْنُ خَالِدٍ الْجُهَنِيُّ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا ابْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّهُ قَالَ لَمَّا قَدِمَ الْمُهَاجِرُونَ الأَوَّلُونَ نَزَلُوا الْعَصْبَةَ قَبْلَ مَقْدَمِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَكَانَ يَؤُمُّهُمْ سَالِمٌ مَوْلَى أَبِي حُذَيْفَةَ وَكَانَ أَكْثَرَهُمْ قُرْآنًا . زَادَ الْهَيْثَمُ وَفِيهِمْ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ وَأَبُو سَلَمَةَ بْنُ عَبْدِ الأَسَدِ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মাদীনাহতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আগমনের পূর্বেই মুহাজিরদের প্রথম দলটি মদিনায় ‘আল-উসবাহ্’ নামক স্থানে অবতরণ করলে আবূ হুযাইফাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুক্ত দাস সালিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ইমামতি করেন। তিনি ছিলেন তাদের মধ্যে কুরআনকে সর্বাধিক হিফ্যকারী।
সহীহঃ বুখারী।
হায়সাম বলেন, তাদের মধ্যে ‘উমার ইবনুল খাত্তাব ও আবূ সালামাহ্ ইবনু ‘আবদুল আসাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন।
সহীহঃ অনুরূপ বুখারী।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (692)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. القعنبي: هو عبد الله بن مسلمة، وابن نمير: هو عبد الله، وعبيد الله: هو ابن عمر العمري. وأخرجه البخاري (٦٩٢) من طريق أنس بن عياض، بهذا الإسناد. وأخرجه أيضاً (٧١٧٥) من طريق عبد الملك بن عبد العزيز بن جريج، أن نافعاً أخبره، أن ابن عمر أخبره قال: كان سالم مولى أبي حذيفة يؤم المهاجرين الأولين وأصحابَ النبي ﷺ في مسجد قباء، فيهم أبو بكر وعمر وأبو سلمة وزيد وعامر بن ربيعة. قوله" العُصبة" بضم العين وإسكان الصاد، وقيل: بفتح العين وإسكان الصاد، وقيل: بفتحهما، موضع بالمدينة قرب قباء. وسالم أبو حذيفة من السابقين الأولين البدريين المقربين العالمين، كان مولى امرأة من الأنصار، ثمَّ لما عتق، لازم أبا حذيفة وتبناه وعرف به، وفى صحيح مسلم (١٤٥٣) عن عائشة: أن سالماً مولى أبي حذيفة كان مع أبي حذيفة وأهله فى بيتهم، فأتت سهلة بنت سهيل زوجة أبي حذيفة النبي ﷺ فقالت: إن سالماً قد بلغ ما يبلغ الرجال، وعَقَلَ ما عقلوا، وإنه يدخل علينا، وإنى أظن أن فى نفس أبي حذيفة من ذلك شيئاً، فقال لها النبي ﷺ: "أرضعيه تحرمي عليه"، ويذهب الذي في نفس أبي حذيفة، فرجعت إليه فقالت: إني قد أرضعته، فذهب الذي فى نفس أبي حذيفة. استشهد سالم باليمامة في خلافة أبي بكر رضي الله تعالى عنه.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا مَسْلَمَةُ بْنُ مُحَمَّدٍ، - الْمَعْنَى وَاحِدٌ - عَنْ خَالِدٍ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ مَالِكِ بْنِ الْحُوَيْرِثِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لَهُ أَوْ لِصَاحِبٍ لَهُ " إِذَا حَضَرَتِ الصَّلاَةُ فَأَذِّنَا ثُمَّ أَقِيمَا ثُمَّ لْيَؤُمَّكُمَا أَكْبَرُكُمَا " . وَفِي حَدِيثِ مَسْلَمَةَ قَالَ وَكُنَّا يَوْمَئِذٍ مُتَقَارِبَيْنِ فِي الْعِلْمِ . وَقَالَ فِي حَدِيثِ إِسْمَاعِيلَ قَالَ خَالِدٌ قُلْتُ لأَبِي قِلاَبَةَ فَأَيْنَ الْقُرْآنُ قَالَ إِنَّهُمَا كَانَا مُتَقَارِبَيْنِ .
মালিক ইবনুল হুয়াইরিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তকে অথবা তার সাথীকে বললেনঃ সলাতের সময় হলে তোমরা আযান ও ইক্বামাত দিবে। তারপর তোমাদের মধ্যকার বয়োজ্যেষ্ঠ ব্যক্তি ইমামতি করবে।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।
মাসলামাহর হাদীসে রয়েছেঃ ঐ সময় আমরা ‘ইলমের দিক থেকে প্রায় সমান ছিলাম।
এটি মুদরাজ।
ইসমাঈলের হাদীসে রয়েছেঃ খালিদ বলেন, আমি আবূ ক্বিলাবাহ্কে জিজ্ঞেস করলাম, এখানে কুরআন সম্পর্কে অধিক জ্ঞাত হওয়ার কথা বলা হলো না কেন? তিনি বললেন, তারা উভয়েই এ দিক থেকে প্রায় সম মানের ছিলেন।
এটি মুরসাল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (630) صحیح مسلم (674)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. إسماعيل: هو ابن إبراهيم المعروف بابن عُلية، وخالد: هو ابن مهران الحذاء، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي. وأخرجه البخاري (٦٣٠) و (٦٥٨) و (٧٢٤٦)، ومسلم (٦٧٤) (٢٩٣)، والترمذي (٢٠٣)، والنسائى في "الكبرى" (٨٥٨) و (١٦١٠) و (١٦٤٥)، وابن ماجه (٩٧٩) من طريق خالد الحذاء، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٢٨) و (٦٣١) و (٦٠٠٨) و (٧٢٤٦)، ومسلم (٦٧٤) (٢٩٢)، والنسائى في "الكبرى" (١٦١١) من طريق أيوب السختيانى، عن أبي قلابة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٥٩٨) و (١٥٦٠١)، و" صحيح ابن حبان" (١٦٥٨) و (٢١٢٩) و (٢١٣٠).
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا حُسَيْنُ بْنُ عِيسَى الْحَنَفِيُّ، حَدَّثَنَا الْحَكَمُ بْنُ أَبَانَ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لِيُؤَذِّنْ لَكُمْ خِيَارُكُمْ وَلْيَؤُمَّكُمْ قُرَّاؤُكُمْ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের মধ্যকার উত্তম লোক যেন তোমাদের আযান দেয় এবং কিরাআতে অধিক অভিজ্ঞ ব্যক্তি যেন তোমাদের ইমামতি করে। [৫৮৯]
দুর্বলঃ মিশকাত ১১১৯।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (726) ، حسین بن عیسی الحنفي: ضعیف (تقریب:1341) وقال الھیثمي: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد 10/ 55) ، (انوار الصحیفہ ص 34)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف حسين بن عيسى الحنفي، وقال البخاري عن حديثه هذا: منكر، ذكره عنه المزي فى ترجمة الحسين بن عيسى من "تهذيب الكمال" ٦/ ٤٦٣. وأخرجه ابن ماجه (٧٢٦) عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعُ بْنُ الْجَرَّاحِ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ جُمَيْعٍ، قَالَ حَدَّثَتْنِي جَدَّتِي، وَعَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ خَلاَّدٍ الأَنْصَارِيُّ، عَنْ أُمِّ وَرَقَةَ بِنْتِ نَوْفَلٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمَّا غَزَا بَدْرًا قَالَتْ قُلْتُ لَهُ يَا رَسُولَ اللَّهِ ائْذَنْ لِي فِي الْغَزْوِ مَعَكَ أُمَرِّضُ مَرْضَاكُمْ لَعَلَّ اللَّهَ أَنْ يَرْزُقَنِي شَهَادَةً . قَالَ " قِرِّي فِي بَيْتِكِ فَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى يَرْزُقُكِ الشَّهَادَةَ " . قَالَ فَكَانَتْ تُسَمَّى الشَّهِيدَةَ . قَالَ وَكَانَتْ قَدْ قَرَأَتِ الْقُرْآنَ فَاسْتَأْذَنَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَنْ تَتَّخِذَ فِي دَارِهَا مُؤَذِّنًا فَأَذِنَ لَهَا قَالَ وَكَانَتْ دَبَّرَتْ غُلاَمًا لَهَا وَجَارِيَةً فَقَامَا إِلَيْهَا بِاللَّيْلِ فَغَمَّاهَا بِقَطِيفَةٍ لَهَا حَتَّى مَاتَتْ وَذَهَبَا فَأَصْبَحَ عُمَرُ فَقَامَ فِي النَّاسِ فَقَالَ مَنْ كَانَ عِنْدَهُ مِنْ هَذَيْنِ عِلْمٌ أَوْ مَنْ رَآهُمَا فَلْيَجِئْ بِهِمَا فَأَمَرَ بِهِمَا فَصُلِبَا فَكَانَا أَوَّلَ مَصْلُوبٍ بِالْمَدِينَةِ .
উম্মু ওয়ারক্বাহ বিনতু নাওফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বদরের যুদ্ধে গেলেন তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে আপনার সাথে জিহাদে যাওয়ার অনুমতি দিন। আমি পীড়িত-আহতদের সেবা করব। হয়তো মহান আল্লাহ আমাকেও শাহাদাতের মর্যাদা দিবেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি তোমার ঘরেই অবস্থান কর। মহান আল্লাহ তোমাকে শাহাদাতের মর্যাদা দান করবে। বর্ণনাকারী বলেন, ঐদিন থেকে উক্ত মহিলার নাম হয়ে গেল শাহীদাহ্। তিনি কুরআন মাজীদ ভাল পড়তেন। সেজন্য তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইলে তিনি তার ঘরে একজন মুয়াজ্জিন নিয়োগের অনুমতি দিলেন। তিনি একটি দাস ও একটি বোবা দাসীকে তার মৃত্যুর পর আযাদ করে দেয়ার চুক্তি করেছিলেন। তারা (দাস ও দাসী) দু’জন রাতে উঠে তার নিকট গিয়ে তাঁর চাদর দিয়ে তাকে চেপে ধরে হত্যা করে উভয়ে পালিয়ে যায়। প্রত্যুষে এটা ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানতে পেরে লোকদের জানিয়ে দিলেন, এ দু’টি গোলাম-বাঁদী সম্পর্কে কারো জানা থাকলে বা তাদেরকে কেউ দেখে থাকলে, তাদের যেন (ধরে) নিয়ে আসে। (তারা গ্রেফতার হলে) তাদেরকে নির্দেশ মোতাবেক শূলে চড়ানো হয়। মাদীনাহ্তে তাদের দু’জনকেই সর্বপ্রথম শূলে চড়ানো হয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، صححہ ابن خزیمۃ (1676 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة عبد الرحمن بن خلاد وجدة الوليد بن عبد الله بن جميع، واسمها ليلى بنت مالك. وأخرجه مطولاً ومختصراً ابن سعد في "الطبقات" ٤٥٧/ ٨، وابن أبي شيبة ١٢/ ٥٢٧ - ٥٢٨، وأحمد (٢٧٢٨٢)، وإبن أبي عاصم في "الآحاد والمثانى" (٣٣٦٦) و (٣٣٦٧)، والطبرانى ٢٥/ (٣٢٦) و (٣٢٧)، والحاكم ١/ ٢٠٣، والبيهقي في "السنن" ١/ ٤٠٦ و ٣/ ١٣٠، وفي "الدلائل" ٦/ ٣٨١ من طرق عن الوليد بن عبد الله بن جميع، بهذا الإسناد. وزاد بعضهم فيه ما سيأتى بعده. وانظر تمام الكلام عليه في التعليق على "المسند". قوله: "كانت قد دبّرت غلاماً لها وجارية" أي: علّقت عتقهما على موتها، من التدبير، وهو أن يقول السيد لعبده: أنت حر بعد موتى، أو: إذا متُّ فأنت حر. وقوله: "فغماها" أي: غطَّيا وجهها، والقطيفة: هي كل ثوب له خَمْل من أيِّ شيء كان.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ حَمَّادٍ الْحَضْرَمِيُّ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، عَنِ الْوَلِيدِ بْنِ جُمَيْعٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ خَلاَّدٍ، عَنْ أُمِّ وَرَقَةَ بِنْتِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْحَارِثِ، بِهَذَا الْحَدِيثِ وَالأَوَّلُ أَتَمُّ قَالَ وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَزُورُهَا فِي بَيْتِهَا وَجَعَلَ لَهَا مُؤَذِّنًا يُؤَذِّنُ لَهَا وَأَمَرَهَا أَنْ تَؤُمَّ أَهْلَ دَارِهَا . قَالَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ فَأَنَا رَأَيْتُ مُؤَذِّنَهَا شَيْخًا كَبِيرًا .
উম্মু ওয়ারক্বাহ বিনতু ‘আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, অনুরূপ হাদীস বর্ণিত হয়েছে। তবে প্রথম বর্ণনাটিই পূর্ণাঙ্গ। তাতে রয়েছেঃ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে সাক্ষাৎ করার জন্য তার বাড়িতে যেতেন। তিনি তার জন্য একজন মুয়াজ্জিনও নিযুক্ত করেন, যে তার জন্য (তার ঘরে) আযান দিত। তিনি তাকে (উম্মু ওয়ারাক্বাহকে) তার ঘরে মহিলাদের ইমামতি করার নির্দেশ দেন। ‘আবদুর রহমান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি তার নিযুক্ত বয়োবৃদ্ধ মুয়াজ্জিনকে দেখেছি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث السابق (591)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف كسابقه. وأخرجه أحمد (٢٧٢٨٣)، والدارقطني (١٥٠٦)، والبيهقى في "معرفة السنن" ٤/ ٢٣٠ من طريق الوليد بن جميع، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ غَانِمٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ زِيَادٍ، عَنْ عِمْرَانَ بْنِ عَبْدٍ الْمَعَافِرِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقُولُ " ثَلاَثَةٌ لاَ يَقْبَلُ اللَّهُ مِنْهُمْ صَلاَةً مَنْ تَقَدَّمَ قَوْمًا وَهُمْ لَهُ كَارِهُونَ وَرَجُلٌ أَتَى الصَّلاَةَ دِبَارًا " . وَالدِّبَارُ أَنْ يَأْتِيَهَا بَعْدَ أَنْ تَفُوتَهُ " وَرَجُلٌ اعْتَبَدَ مُحَرَّرَهُ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেনঃ তিন ব্যক্তির সলাত আল্লাহর ক্ববূল করেন না। (এক) যে ব্যক্তি নিজে আগে বেড়ে ইমামতি করে অথচ লোকেরা তাকে অপছন্দ করে। (দুই) যে ব্যক্তি ‘দিবারে’ সলাত আদায়ে অভ্যস্ত। ‘দিবার’ হচ্ছে ওয়াক্ত শেষ হবার মুহূর্তে সলাত আদায় করা। (তিন) যে ব্যক্তি কোন স্বাধীন লোককে দাসত্বের শৃঙ্খলে আবদ্ধ করে। [৫৯২]
দুর্বলঃ তবে প্রথম অংশটি সহীহ, মিশকাত ১১২৩।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف إلا الشطر الأول فصحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (970) ، عبد الرحمٰن بن زیاد الإفریقي ضعیف ، وعمران بن عبد ٍالمعافري: ضعیف (تقریب: 5160) ، (انوار الصحیفہ ص 34)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف، عبد الرحمن بن زياد -وهو الإفريقي- وعمران القطان ضعيفان، وباقي رجاله ثقات. القعنبى: هو عبد الله بن مسلمة. وأخرجه ابن ماجه (٩٧٠) من طريق عبد الرحمن بن زياد، بهذا الإسناد. وفي الباب عن ابن عباس عند ابن ماجه (٩٧١)، ولفظه: "ثلاثة لا ترتفع صلاتهم فوق رؤوسهم شبراً: رجل أمّ قوماً وهم له كارهون، وامرأة باتت وزوجها عيها ساخط، وأخوان متصارمان" وإسناده حسن، وصححه ابن حبان (١٧٥٧). وعن أبي أمامة عند الترمذي (٣٦٠)، وإسناده ضعيف. تنبيه: جاء هنا فى الطبعة الشامية تحقيق عزت الدعاس بعد هذا الحديث:
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي مُعَاوِيَةُ بْنُ صَالِحٍ، عَنِ الْعَلاَءِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ مَكْحُولٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " الصَّلاَةُ الْمَكْتُوبَةُ وَاجِبَةٌ خَلْفَ كُلِّ مُسْلِمٍ بَرًّا كَانَ أَوْ فَاجِرًا وَإِنْ عَمِلَ الْكَبَائِرَ " .
আবূ হুরাইরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে কোন মুসলমানের ইমামতিতে ফরয সলাত আদায় করা ওয়াজিব, সে নেককার হোক বা বদকার হোক, এমনকি কবীরাহ গুনাহের কাজে জড়িত থাকলেও। [৫৯৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مکحول لم یسمع من أبي ہریرۃ رضي اللّٰہ عنہ کما سیأتي(2533) ، (انوار الصحیفہ ص 34، 35)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: ولم يرد هذا الحديث إلا على هامش (ج). وسيأتي تاماً في كتاب الجهاد برقم (٢٥٣٣)، وعزاه المزي في "تحفة الأشراف" (١٤٦١٩)، والزيلعي في "نصب الراية" ٢/ ٢٧ إلى كتاب الجهاد فقط. وقال الشيخ عبد الغني النابلسي في حاشية نسخته بعد أن ذكر هذا الحديث: في عرض كتاب حميد بن ثوابة الراوي عن أبي عيسى الرملي. ولم نجده في نسخ أبي داود، ولهذا لم نلحقه بالأصل.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْعَنْبَرِيُّ أَبُو عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا ابْنُ مَهْدِيٍّ، حَدَّثَنَا عِمْرَانُ الْقَطَّانُ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اسْتَخْلَفَ ابْنَ أُمِّ مَكْتُومٍ يَؤُمُّ النَّاسَ وَهُوَ أَعْمَى .
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (তাবূক যুদ্ধে গমনকালে) ইবনু উম্মু মাকতূমকে (মাদীনাহ্র) শাসক নিয়োগ করেছিলেন। তিনি লোকদের ইমামতি করতেন, অথচ তিনি অন্ধ ছিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (1121) ، ولہ شاھد عند ابن حبان (موارد الظمان: 370 وسندہ صحیح، الاحسان: 5/ 506 ح 2134)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف. عمران -وهو ابن داور- القطان انفرد بروايته عن قتادة، عن أنس، وهو ضعيف يعتبر به، وقد خالفه همام -وهو ابن يحيي العوذي- وهو ثقة من رجال الشيخين، فرواه عن قتادة مرسلاً، وهو أشبه بالصواب وقد روي عن عائشة بإسناد صحيح كما سيأتي. وأخرجه البيهقي٣/ ٨٨من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (١٣٠٠٠) عن بهز بن أسد، عن عمران القطان، به. وأخرجه أحمد (١٢٣٤٤)، وابن الجارود (٣١٠)، وأبو يعلى (٣١١٠) و (٣١٣٨) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، به، بلفظ: أن النبيّ ﷺ استخلف ابن أم مكتوم مرتين على المدينة، ولقد رأيته يوم القادسية معه راية سوداء. وهذا أيضاً وهم فيه عمران القطان، حيث أدخل حديثا في حديث، فقد أخرج ابن سعد في "الطبقات" ٤/ ٢١٢، والطبري في "تفسيره" ٣٠/ ٥١ من طريق سعيد بن أبي عروبة، وابن سعد ٤/ ٢١٢، والطبري ٣٠/ ٥١، وأبو يعلى (٣١٢٣) من طريق معمر بن راشد، وابن سعد ٤/ ٢١٢ من طريق أبي هلال، ثلاثتهم عن قتادة عن أنس قصة القادسية وحسب، وأما قصة استخلاف ابن أم مكتوم يؤم الناس فأخرجها ابن سعد في "الطبقات" ٤/ ٢٠٥ عن عمرو بن عاصم الكلابي، عن همام بن يحيى العوذي، عن قتادة مرسلاً، وهمام ثقة حافظ فقوله أشبه بالصواب، وعمران القطان أدخل حديث قتادة عن أنس الذي ذكر فيه حضور ابن أم مكتوم القادسية، بحديث قتادة المرسل في استخلاف ابن أم مكتوم، والله تعالى أعلم. وانظر ما سيأتي برقم (٢٩٣١). وقد صح عن عائشة ﵂ عند ابن حبان (٢١٣٤) و (٢١٣٥) أن النبي ﷺ استخلف ابن أم مكتوم على المدينة، يصلي بالناس.
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ، عَنْ بُدَيْلٍ، حَدَّثَنِي أَبُو عَطِيَّةَ، مَوْلًى مِنَّا قَالَ كَانَ مَالِكُ بْنُ حُوَيْرِثٍ يَأْتِينَا إِلَى مُصَلاَّنَا هَذَا فَأُقِيمَتِ الصَّلاَةُ فَقُلْنَا لَهُ تَقَدَّمْ فَصَلِّهْ . فَقَالَ لَنَا قَدِّمُوا رَجُلاً مِنْكُمْ يُصَلِّي بِكُمْ وَسَأُحَدِّثُكُمْ لِمَ لاَ أُصَلِّي بِكُمْ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنْ زَارَ قَوْمًا فَلاَ يَؤُمَّهُمْ وَلْيَؤُمَّهُمْ رَجُلٌ مِنْهُمْ " .
বুদাইল হতে আবূ ‘আত্বিয়্যাহ হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মালিক ইবনুল হুয়াইরিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের এই সলাতের স্থানে (মাসজিদে) আসলেন। অতঃপর সলাতের ইক্বামাত হলে আমরা তাকে সামনে গিয়ে সলাত আদায় করাতে বললাম। তিনি বললেন, তোমরা নিজেদের মধ্য হতে একজনকে ইমামতি করতে বল। আমি তোমাদের ইমামতি না করার কারণ সম্পর্কে তোমাদের একটি হাদীস শোনাব। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ কেউ কোন ক্বওমের সাথে সাক্ষাৎ করতে গেলে সে যেন তাদের ইমামতি না করে। বরং তাদের মধ্য হতেই যেন কেউ ইমামতি করে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (1120) ، أبو عطیۃ: حسن الحدیث، وثقہ ابن خزیمۃ (1520) والترمذي (356)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: المرفوع منه حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي عطية مولى بني عقيل، قال أبو حاتم: لا يُعرف ولا يُسمى، وقال ابن المديني: لا يعرفونه، وباقي رجاله ثقات. أبان: هو ابن يزيد العطار، وبُديل: هو ابن ميسرة العقيلي. وأخرجه الترمذي (٣٥٦)، والنسائى في "الكبرى" (٨٦٤) من طريق أبان العطار، بهذا الإسناد. ورواية النسائى مختصرة بالمرفوع منه وقال الترمذي: حديث حسن. وهو في "مسند أحمد" (١٥٦٠٢) و (٢٠٥٣١). ويشهد لمتنه حديث أبي مسعود البدري السالف برقم (٥٨٢).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سِنَانٍ، وَأَحْمَدُ بْنُ الْفُرَاتِ أَبُو مَسْعُودٍ الرَّازِيُّ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا يَعْلَى، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ هَمَّامٍ، أَنَّ حُذَيْفَةَ أَمَّ النَّاسَ، بِالْمَدَائِنِ عَلَى دُكَّانٍ فَأَخَذَ أَبُو مَسْعُودٍ بِقَمِيصِهِ فَجَبَذَهُ فَلَمَّا فَرَغَ مِنْ صَلاَتِهِ قَالَ أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّهُمْ كَانُوا يُنْهَوْنَ عَنْ ذَلِكَ قَالَ بَلَى قَدْ ذَكَرْتُ حِينَ مَدَدْتَنِي .
হাম্মাম হতে বর্ণিত, হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাদায়িন নামক স্থানে একটি দোকানের উপর দাঁড়িয়ে লোকদের ইমামতি করলেন। এ সময় আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জামা ধরে তাকে টান দিলেন। তিনি সলাত শেষে বললেন, আপনার কি জানা নেই যে, লোকদেরকে এরূপ (উঁচু স্থানে দাঁড়িয়ে ইমামতি) করা হতে নিষেধ করা হত? তিনি বলেন, হ্যাঁ, আপনি যখন আমাকে টান দেন তখনই আমার তা স্মরণ হয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، الأ عمش عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 35)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يعلى: هو ابن عبيد، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وابراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وهمام: هو ابن الحارث النخعى. وأخرجه الطبراني ١٧/ (٧٠٢)، والحاكم ١/ ٢١٠، والبيهقي ٣/ ١٠٨ من طريق يعلى بن عبيد، والشافعي في "مسنده" ١/ ١٣٧ - ١٣٨ - ومن طريقه ابن خزيمة (١٥٢٣)، وابن حبان (٢١٤٣)، والبغوي في "شرح السنة" (٨٣١) - عن سفيان بن عيينة، وابن الجارود (٣١٣) من طريق عيسى بن أبي عيسى، والطبراني ١٧/ (٧٠٠) من طريق زائدة، و ١٧/ (٧٠١) من طريق أبي عوانة، والحاكم ١/ ٢١٠، والبيهقى ٣/ ١٠٩ من طريق زياد بن عبد الله، ستتهم عن الأعمش، بهذا الإسناد. وفي رواية زياد بن عبد الله البكائي التصريح برفع النهي إلى النبي ﷺ. وأخرجه ابن أبي شيبة ٢/ ٢٦٣ من طريق عبد الله بن عون، عن إبراهيم: صلى حذيفة … ، لم يذكر هماماً. وأخرجه ابن أبي شية ٢/ ٢٦٢ عن أبي معاوية الضرير، عن الأعمش، به، غير أنه ذكر أن الذي جذب حذيفة هو سلمان. وهكذا أخرجه أبو يوسف في "الآثار" (٣٢٦) عن الإمام أبي حنيفة، عن حماد بن أبي سليمان، عن إبراهيم، أن حذيفة … وأخرجه عبد الرزاق (٣٩٠٤) عن الثوري، عن حماد، عن مجاهد قال: رأى سلمان حذيفة يؤمهم … قلنا: والوجهان محفوظان، فقد أخرج عبد الرزاق (٣٩٠٥) عن معمر، عن الأعمش، عن مجاهد أو غيره -شك أبو بكر (يعني عبد الرزاق) -: أن أبا مسعود وسلمان وحذيفة صلى بهم أحدهم، فذهب يصلى على دكان، فجبذه صاحباه، وقالا: انزل عنه. وأخرج الخطيب في "تاريخ بغداد" ١/ ١٨٠، والبيهقي ٣/ ١٠٩ من طريقين عن الليث بن سعد، عن زيد بن جبيرة، عن أبي طوالة، عن أبي سعيد الخدري مثل هذه القصة، وفيها أن سلمان جذب حذيفة، وفيها التصريح برفع النهي إلى النبي ﷺ. وزيد بن جبيرة متروك. وأخرج الدارقطني (١٨٨٢/ ١) من طريق زياد بن عبد الله البكائي، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن همام، عن أبي مسعود قال: نهى رسول الله ﷺ أن يقوم الإمام فوق شيء والناس خلفه، يعني أسفل منه. قوله: "بالمدائن" هي على سبعة فراسخ (أي ٢١ ميلاً) من بغداد على حافتي دجلة، وهي دار مملكة الأكاسرة والفرس اختاروها من مدن العراق، افتتحها المسلمون بقيادة سعد بن أبي وقاص في زمن الخليفة عمر بن الخطاب سنة (١٦هـ) وفيها إيوان كسرى، الذي لا زالت أطلاله باقية إلى الآن. وقوله: "على دكان" هي الدَّكَّة، وهي المكان المرتفع يُجلس عليه. وقوله: "فجبذه" أي: جذبه وجرَّه إليه. وقوله: "مددتني" أي: مددت قميصي وجذبته إليك. قاله صاحب "عون المعبود".
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا حَجَّاجٌ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي أَبُو خَالِدٍ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ الأَنْصَارِيِّ، حَدَّثَنِي رَجُلٌ، أَنَّهُ كَانَ مَعَ عَمَّارِ بْنِ يَاسِرٍ بِالْمَدَائِنِ فَأُقِيمَتِ الصَّلاَةُ فَتَقَدَّمَ عَمَّارٌ وَقَامَ عَلَى دُكَّانٍ يُصَلِّي وَالنَّاسُ أَسْفَلَ مِنْهُ فَتَقَدَّمَ حُذَيْفَةُ فَأَخَذَ عَلَى يَدَيْهِ فَاتَّبَعَهُ عَمَّارٌ حَتَّى أَنْزَلَهُ حُذَيْفَةُ فَلَمَّا فَرَغَ عَمَّارٌ مِنْ صَلاَتِهِ قَالَ لَهُ حُذَيْفَةُ أَلَمْ تَسْمَعْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِذَا أَمَّ الرَّجُلُ الْقَوْمَ فَلاَ يَقُمْ فِي مَكَانٍ أَرْفَعَ مِنْ مَقَامِهِمْ " . أَوْ نَحْوَ ذَلِكَ قَالَ عَمَّارٌ لِذَلِكَ اتَّبَعْتُكَ حِينَ أَخَذْتَ عَلَى يَدَىَّ .
‘আদী ইবনু সাবিত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমার কাছে এমন এক ব্যক্তি হাদীস বর্ণনা করেছেন যিনি মাদায়েনে ‘আম্মার ইবনু ইয়াসীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সঙ্গে ছিলেন। তিনি বলেন, সলাতের ইক্বামাত দেয়া হলে ‘আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সামনে গেলেন এবং ইমামতি করার জন্য একটি দোকানের উপর দাঁড়ালেন। তখন লোকেরা তার থেকে নিঁচু স্থানে ছিল। হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সামনে এগিয়ে গিয়ে ‘আম্মারের দু’ হাত চেপে ধরলে ‘আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার অনুসরণ করেন এবং হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নিচে নামিয়ে আনেন। ‘আম্মার সলাত শেষ করলে হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শোননি, কেউ কোন ক্বওমের ইমামতি করলে সে যেন তাদের চেয়ে উঁচু স্থানে না দাঁড়ায়? অথবা অনুরূপই বলেছেন। ‘আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তাই তো আপনি আমার হাত ধরা মাত্রই আমি পেছনে সরে আসলাম। [৫৯৭]
হাসান পূর্বেরটির কারণে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو خالد والرجل الذي حدث عدي بن ثابت: مجہولان لا یعرفان أصلاً،انظر تقریب التہذیب (8075) ، (انوار الصحیفہ ص 35)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة أبي خالد شيخ ابن جريج، وباقي رجاله ثقات. حجاج: هو ابن محمَّد المصيصي، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز. وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" ١/ ١٥١، والبيهقي ٣/ ١٠٩، والبغوي في "شرح السنة" (٨٣٠) من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَجْلاَنَ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مِقْسَمٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ مُعَاذَ بْنَ جَبَلٍ، كَانَ يُصَلِّي مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْعِشَاءَ ثُمَّ يَأْتِي قَوْمَهُ فَيُصَلِّي بِهِمْ تِلْكَ الصَّلاَةَ .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মু’আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে ‘ইশার সলাত আদায়ের পর পুনরায় নিজ ক্বওমের নিকট গিয়ে ঐ সলাতেই তাদের ইমামতি করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل محمَّد بن عجلان، وباقي رجاله ثقات. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٤١)، و"صحيح ابن حبان" (٢٤٠٤) من طريق يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، سَمِعَ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، يَقُولُ إِنَّ مُعَاذًا كَانَ يُصَلِّي مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ يَرْجِعُ فَيَؤُمُّ قَوْمَهُ .
‘আমর ইবনু দীনার হতে বর্ণিত, তিনি জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বলতে শুনেছেন, মু’আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে সলাত আদায়ের পর সেখান থেকে ফিরে এসে তিনি পুনরায় নিজ ক্বওমের ইমামতি করতেন।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (700، 701) صحیح مسلم (465)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه مطولاً ومختصراً البخاري (٧٠٠) و (٧٠١)، ومسلم (٤٦٥)، والترمذي (٥٩٠)، والنسائى في "الكبرى" (٩١١) من طرق عن عمرو بن دينار، بهذا الإسناد. وعند الترمذي وحده: "المغرب" بدل "العشاء". وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٠٧). وسيأتي مطولاً برقم (٧٩٠). قال الإمام العيني في "عمدة القارئ" ٥/ ٢٣٩ استدل الشافعي بهذا الحديث على صحة اقتداء المفترض بالمتنفل بناء على أن معاذ كان ينوي بالأولى الفرض وبالثانية النفل، وبه قال أحمد فى رواية، واختاره ابن المنذر، وهو قول عطاء وطاووس وسليمان بن حرب وداود. وقال أصحابنا (أي الحنفية): لا يصلي المفترض خلف المتنفل، وبه قال مالك في رواية، وأحمد في رواية أبي الحارث وحنبل عنه، وقال ابن قدامة في "المغني" ٦٧/ ٣: واختارها أكثر أصحابنا، وهو قول الزُّهريّ والحسن البصري وسعيد بن المسيب والنخعي وأبي قلابة ويحيى بن سعيد الأنصاري لقول النبي ﷺ: "إنما جعل الإمام ليؤتم به فلا تختلفوا عليه" متفق عليه، ولأن صلاة المأموم لا تتأدى بنية الإمام، أشبه صلاة الجمعة خلف من يصلي الظهر …