সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، وَهَارُونُ بْنُ مَعْرُوفٍ، - الْمَعْنَى - قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبَانَ بْنِ تَغْلِبَ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ زُهَيْرٌ حَدَّثَنَا الْكُوفِيُّونَ، أَبَانُ وَغَيْرُهُ - عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنِ الْبَرَاءِ، قَالَ كُنَّا نُصَلِّي مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَلاَ يَحْنُو أَحَدٌ مِنَّا ظَهْرَهُ حَتَّى يَرَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَضَعُ .
আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে সলাত আদায় করতাম। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে যতক্ষণ না রুকু‘তে দেখতাম পেতাম, ততক্ষণ পর্যন্ত আমাদের কেউ রুকু‘তে যেতে পিঠ ঝুঁকাতো না।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (474)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة، والحكم: هو ابن عتيبة. وأخرجه مسلم (٤٧٤) (٢٠٠) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد، ولفظه: كنا مع النبي ﷺ لا يحنو أحدٌ منا ظهره حتَّى نراه قد سجد. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا الرَّبِيعُ بْنُ نَافِعٍ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، - يَعْنِي الْفَزَارِيَّ - عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ مُحَارِبِ بْنِ دِثَارٍ، قَالَ سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ يَزِيدَ، يَقُولُ عَلَى الْمِنْبَرِ حَدَّثَنِي الْبَرَاءُ، أَنَّهُمْ كَانُوا يُصَلُّونَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَإِذَا رَكَعَ رَكَعُوا وَإِذَا قَالَ " سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ " . لَمْ نَزَلْ قِيَامًا حَتَّى يَرَوْهُ قَدْ وَضَعَ جَبْهَتَهُ بِالأَرْضِ ثُمَّ يَتَّبِعُونَهُ صلى الله عليه وسلم .
মুহারিব ইবনু দিসার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ‘আবদুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদকে মিম্বারে দাঁড়িয়ে বলতে শুনলাম, তিনি বলেছেন, আমাদের নিকট আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে সলাত আদায় করতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রুকু‘ করতেন, তখন তারাও রুকু‘ করতেন। তিনি যখন “সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ” বলতেন, তখন তাঁরা দাঁড়িয়ে থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর প্রতি লক্ষ্য রাখতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (সাজদায়) জমিনে কপাল রাখতেন, তখন তাঁরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর অনুসরণ করতেন।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (474)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمَّد، وشيخه أبو إسحاق: هو سليمان بن أبي سليمان الشيبانى. وأخرجه مسلم (٤٧٤) (١٩٩) من طريق أبي إسحاق الفزاري، بهذا الإسناد. وانظر ما سلف برقم (٦٢٠).
حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ زِيَادٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَمَا يَخْشَى - أَوْ أَلاَ يَخْشَى - أَحَدُكُمْ إِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ وَالإِمَامُ سَاجِدٌ أَنْ يُحَوِّلَ اللَّهُ رَأْسَهُ رَأْسَ حِمَارٍ أَوْ صُورَتَهُ صُورَةَ حِمَارٍ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কি ভয় হয় না, ইমাম সাজদাহতে থাকাবস্থায় কেউ মাথা উঠালে আল্লাহ তার মাথাকে গাধার মাথা অথবা তার আকৃতিকে গাধার আকৃতিতে রূপান্তরিত করে দিতে পারেন।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (427)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٩١)، ومسلم (٤٢٧)، والترمذي (٥٨٩)، والنسائي في "الكبرى" (٩٠٤)، وابن ماجه (٩٦١) من طرق عن محمَّد بن زياد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٥٣٤)، و"صحيح ابن حبان" (٢٢٨٢). والحديث نص في المنع من تقدم المأموم على الإمام في الرفع من السجود، ويلتحق به الركوع، لكونه فى معناه، وأما التقدم على الإمام في الخفض للركوع والسجود، فقيل: يلتحق به من باب الأولى، لأن الاعتدال والجلوس بين السجدتين من الوسائل، والركوع والسجود من المقاصد، وإذا دلّ الدليلُ على وجوب الموافقة فيما هو وسيلة، فأولى أن يجب فيما هو مقصد. وظاهر الحديث يقتضي تحريم الرفع قبل الإمام لكونه توعد عليه بالمسخ، وهو أشد العقوبات، وبذلك جزم النووي في "شرح المهذب" ومع القول بالتحريم فالجمهور أن فاعله يأثم وتجزئ صلاته، وعن ابن عمر: تبطل وبه قال أحمد في رواية وأهل الظاهر بناء على أن النهي يقتضي الفساد. واختلفوا في الوعيد المذكور، فقيل: يحتمل أن يرجع ذلك لأمرٍ معنوي، فإن الحمار موصوف بالبلادة فاستعير هذا المعنى للجاهل بما يجب عليه من فرض الصلاة ومتابعة الإمام، ويرجح هذا أن التحويل لم يقع مع كثرة الفاعلين، وحمله آخرون على ظاهره، إذ لا مانع من جواز وقوع ذلك … أفاده الحافظ في"الفتح" ٢/ ١٨٣ - ١٨٤.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ بُغَيْلٍ الْمُرْهِبِيُّ، حَدَّثَنَا زَائِدَةُ، عَنِ الْمُخْتَارِ بْنِ فُلْفُلٍ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم حَضَّهُمْ عَلَى الصَّلاَةِ وَنَهَاهُمْ أَنْ يَنْصَرِفُوا قَبْلَ انْصِرَافِهِ مِنَ الصَّلاَةِ .
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে সলাত আদায়ে উৎসাহিত করেছেন এবং সলাতের পর তাঁর চলে যাওয়ার পূর্বে তাদের চলে যেতে নিষেধ করেছেন।
সহীহঃ মুসলিমের উৎসাহিত করণের কথাটি বাদে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح م دون الحض
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (954) ، ورواہ أحمد (3/240 وسندہ صحیح) والبیھقي (2/192)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، حفص بن بغيل روى عنه جمع، ولا يعرف بجرح ولا تعديل، وباقي رجاله ثقات. زائدة: هو ابن قدامة. وهو في "مسند أحمد" (١٢٢٧٦) من طريق زائدة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٤٢٦)، والنسائي في "الكبرى" (١٢٨٨) من طريقين عن المختار ابن فلفل، عن أنس قال: صلى بنا رسول الله ﷺ ذات يوم فلما قضى الصلاة أقبل علينا بوجهه، فقال: "أيها الناس، إني إمامكم، فلا تسبقوني بالركوع ولا بالسجود، ولا بالقيام ولا بالانصراف، فإني أراكم أمامي ومن خلفي … ". وهو في "مسند أحمد" (١١٩٩٧). وقوله: ونهاهم أن ينصرفوا قبل انصرافه من الصلاة. قال الطيبي: وعلة نهيه ﷺ أصحابه عن انصرافهم قبله أن يذهب النساء اللاتي يصلين خلفه، وكان النبي ﷺ يثبت في مكانه حتَّى ينصرف النساء ثمَّ يقوم ويقوم الرجال. وقد روى البخاري، عن أم سلمة: أن النساء في عهد رسول الله ﷺ كن إذا سَلّمن، قمن، وثبت رسول الله ﷺ ومن صلى من الرجال ما شاء الله، فإذا قام رسول الله ﷺ قام الرجال.
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم سُئِلَ عَنِ الصَّلاَةِ فِي ثَوْبٍ وَاحِدٍ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " أَوَلِكُلِّكُمْ ثَوْبَانِ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে এক কাপড়ে সলাত আদায় করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তোমাদের প্রত্যেকের কি দু’টি করে কাপড় আছে?
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (358) صحیح مسلم (515)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. القَعنبي: هو عبد الله بن مسلمة، وابن شهاب: هو الزُّهريّ. وهو في "موطأ مالك" ١/ ١٤٠، ومن طريقه أخرجه البخاري (٣٥٨)، ومسلم (٥١٥) (٢٧٥)، والنسائي في "الكبرى" (٨٤١). وأخرجه مسلم (٥١٥) (٢٧٥) من طريقي عقيل ويونس، عن الزُّهريّ، عن سعيد ابن المسيب وأبي سلمة، عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٢٥١)، و"صحيح ابن حبان" (٢٢٩٥). وأخرجه البخاري (٣٦٥)، ومسلم (٥١٥) (٢٧٦) من طريق محمَّد بن سيرين، عن أبي هريرة.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ يُصَلِّ أَحَدُكُمْ فِي الثَّوْبِ الْوَاحِدِ لَيْسَ عَلَى مَنْكِبَيْهِ مِنْهُ شَىْءٌ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কেউ যেন কাঁধ খোলা রেখে এক কাপড়ে সলাত আদায় না করে।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (516)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز. وأخرجه البخاري (٣٥٩)، ومسلم (٥١٦)، والنسائى في "الكبرى" (٨٤٧) من طريقين عن أبي الزناد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٠٧). قال الإمام النووي في "شرح مسلم" ٤/ ١٩٦ - ١٩٧: قال مالك وأبو حنيفة والشافعي ﵏ والجمهور: هذا النهي للتنزيه لا للتحريم، فلو صلى في ثوب واحد ساتر لعورته ليس على عاتقه منه شيء، صحت صلاته مع الكراهة، سواء قدر على شيء يجعله على عاتقه أم لا، وقال أحمد وبعض السلف ﵏: لا تصح صلاته إذا قدر على وضع شيء على عاتقه إلا بوضعه لظاهر الحديث، وعن أحمد بن حنبل رحمه الله تعالى رواية: أنه تصح صلاته، ولكن يأثم بتركه، وحجة الجمهور قوله ﷺ في حديث جابر ﵁: "فإن كان واسعاً فالتحف به، وإن كان ضيقاً فاتزر به" رواه البخاري (٣٦١).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، - الْمَعْنَى - عَنْ هِشَامِ بْنِ أَبِي عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِذَا صَلَّى أَحَدُكُمْ فِي ثَوْبٍ فَلْيُخَالِفْ بِطَرَفَيْهِ عَلَى عَاتِقَيْهِ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কেউ এক কাপড়ে সলাত আদায় করলে সে যেন কাপড়ের ডান পাশকে বাম কাঁধের উপর এবং বাম পাশকে ডান কাঁধের উপর ঝুলিয়ে রাখে।
সহীহঃ মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (360)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيي: هو ابن سعيد القطان، وإسماعيل: هو ابن إبراهيم المعروف بابن علية، وهشام بن أبي عبد الله: هو الدستُوائي. وأخرجه البخاري (٣٦٠) من طريق شيبان النحوي، عن يحيي بن أبي كثير، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٤٦٦)، و"صحيح ابن حبان" (٢٣٠٤).
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ بْنِ سَهْلٍ، عَنْ عُمَرَ بْنِ أَبِي سَلَمَةَ، قَالَ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي فِي ثَوْبٍ وَاحِدٍ مُلْتَحِفًا مُخَالِفًا بَيْنَ طَرَفَيْهِ عَلَى مَنْكِبَيْهِ .
‘উমার ইবনু আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে একটি কাপড়ে সলাত আদায় করতে দেখেছি। তিনি কাপড়টি গায়ে জড়িয়ে নিয়ে উভয় কাঁধের উপর বিপরীতমুখী করে ঝুলিয়ে রাখতেন।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (517)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الليث: هو ابن سعد، ويحيي بن سعيد: هو الأنصاري، وأبو أمامة بن سهل: هو أسعد بن سهل بن حنيف. وأخرجه مسلم (٥١٧) (٢٨٠) عن قتيبة بن سعيد وعيسى بن حماد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٣٥٤ - ٣٥٦)، ومسلم (٥١٧) (٢٧٨) و (٢٧٩)، والترمذي (٣٣٩)، والنسائي في "الكبرى" (٨٤٢)، وابن ماجه (١٠٤٩) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عمر بن أبي سلمة. وبعضهم يزيد على بعض. وهو في "مسند أحمد" (١٦٣٣٣)، و"صحيح ابن حبان" (٢٢٩١) و (٢٢٩٢).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا مُلاَزِمُ بْنُ عَمْرٍو الْحَنَفِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ بَدْرٍ، عَنْ قَيْسِ بْنِ طَلْقٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَدِمْنَا عَلَى نَبِيِّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجَاءَ رَجُلٌ فَقَالَ يَا نَبِيَّ اللَّهِ مَا تَرَى فِي الصَّلاَةِ فِي الثَّوْبِ الْوَاحِدِ قَالَ فَأَطْلَقَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِزَارَهُ طَارَقَ بِهِ رِدَاءَهُ فَاشْتَمَلَ بِهِمَا ثُمَّ قَامَ فَصَلَّى بِنَا نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا أَنْ قَضَى الصَّلاَةَ قَالَ " أَوَكُلُّكُمْ يَجِدُ ثَوْبَيْنِ " .
ক্বায়িস ইবনু ত্বালক হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট আসলাম। এমতাবস্থায় এক ব্যক্তি এসে বলল, হে আল্লাহর নাবী! একটি কাপড়ে সলাত আদায়ের ব্যাপারে আপনার মতামত কী? বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ইযারের উপর চাদর ছেড়ে দিয়ে উভয়টিকে একত্র করে গায়ে জড়িয়ে নিয়ে উঠে দাঁড়ালেন। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সলাত আদায় করালেন। সলাত শেষে তিনি বললেনঃ তোমাদের প্রত্যেকের দু’টি করে কাপড় আছে কি?
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل قيس بن طلق، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه الطيالسي (١٠٩٨)، وابن سعد في "الطبقات" ٥/ ٥٥٢ - ٥٥٣، وابن أبي شيبة ١/ ٣١١، وأحمد (١٦٢٨٥) و (١٦٢٨٧) و (٢٤٠٠٩/ ١٨) و (٢٤٠٠٩/ ٢٢)، والطحاوي ١/ ٣٧٩، وابن حبان (٢٢٩٧)، والطبراني (٨٢٤٥) و (٨٢٥٣) و (٨٢٥٥) ، وابن عدي في ترجمة أيوب بن عتبة من "الكامل" ١/ ٣٤٥، والبيهقي ٢/ ٢٤٠ من طرق عن قيس بن طلق، به. وقوله: طارق به رداءه. من طارقت الثوب على الثوب: إذا طبقته عليه.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ، قَالَ لَقَدْ رَأَيْتُ الرِّجَالَ عَاقِدِي أُزُرِهِمْ فِي أَعْنَاقِهِمْ مِنْ ضِيقِ الأُزُرِ خَلْفَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي الصَّلاَةِ كَأَمْثَالِ الصِّبْيَانِ فَقَالَ قَائِلٌ يَا مَعْشَرَ النِّسَاءِ لاَ تَرْفَعْنَ رُءُوسَكُنَّ حَتَّى يَرْفَعَ الرِّجَالُ .
সাহল ইবনু সা‘দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর পেছনে লোকদেরকে সংকীর্ণ ইযারের কারণে তা বালকদের ন্যায় ঘাড়ে বেঁধে সলাত আদায় করতে দেখেছি। এমতাবস্থায় একজন বলল, হে সমবেত নারী সমাজ! পুরুষরা মাথা না তোলা পর্যন্ত তোমরা মাথা তুল না।
সহীহঃ বুখারী ও মুসলিম
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (362) صحیح مسلم (441)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وأبو حازم: هو سلمة بن دينار الأعرج. وأخرجه البخاري (٣٦٢)، ومسلم (٤٤١)، والنسائي في "الكبرى" (٨٤٤) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٥٥٦٢)، و"صحيح ابن حبان" (٢٢١٦) و (٢٣٠١). قال الحافظ: وإنما نهى النساء عن ذلك لئلا يلمحن عند رفع رؤوسهن من السجود شيئاً من عورات الرجال بسبب ذلك عند نهوضهم، وعند أحمد (٢٦٩٤٨) وأبي داود (٨٥١) من حديث أسماء بنت أبي بكر، ولفظه: فلا ترفع رأسها حتَّى يرفع الرجال رؤوسهم كراهة أن يرين من عورات الرجال. ويؤخذ منه أنه لا يجب التستر من أسفل.
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا زَائِدَةُ، عَنْ أَبِي حَصِينٍ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم صَلَّى فِي ثَوْبٍ وَاحِدٍ بَعْضُهُ عَلَىَّ .
‘আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কাপড়ে সলাত আদায় করলেন। সেটির কিছু অংশ আমার গায়ে ছিল।
সহীহঃ মুসলিম। এটি গত হয়েছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. زائدة: هو ابن قدامة، وأبو حَصِين: هو عثمان بن عاصم ابن حُصين. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٤١٣). وانظر ما سلف برقم (٣٧٠).
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ، - يَعْنِي ابْنَ مُحَمَّدٍ - عَنْ مُوسَى بْنِ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ الأَكْوَعِ، قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي رَجُلٌ أَصِيدُ أَفَأُصَلِّي فِي الْقَمِيصِ الْوَاحِدِ قَالَ " نَعَمْ وَازْرُرْهُ وَلَوْ بِشَوْكَةٍ " .
সালামাহ ইবনুল আকওয়া‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি শিকার করে থাকি। আমি কি একটি জামা পরে সলাত আদায় করতে পারি? তিনি বলেন, হ্যাঁ। তবে একটি কাঁটা হলেও তা বেধেঁ নাও (যেন লজ্জাস্থান দেখা না যায়)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (760) ، صححہ ابن خزیمۃ (777، 778 وسندہ حسن) موسیٰ بن إبراھیم صرح بالسماع عند أحمد (4/49)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن، عبد العزيز بن محمَّد -وهو الدراوردي- صدوق قوي الحديث، وموسي بن إبراهيم -وهو ابن عبد الرحمن المخزومي- روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحح حديثه ابن خزيمة وابن حبان، ووثقه الذهبي في "الكاشف". وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٨٤٣) من طريق عطاف بن خالد، عن موسي بن إبراهيم، بهذا الإسناد. وعلقه البخاري في باب وجوب الصلاة في الثياب فقال: ويُذكر عن سلمة بن الأكوع، أن النبي ﷺ قال: "يَزُرُّه ولو بشوكة"، وفي إسناده نظر. وهو في "مسند أحمد" (١٦٥٢٠)، و"صحيح ابن حبان" (٢٢٩٤). وقوله: إني رجل أصيدُ. فعل مضارع من صاد يصيد بوزان أبيع، ولفظ أحمد إني أكون أحياناً فى الصيد. وقول بعضهم: هو أصيد على وزن أفعل كأحمر وهو مَن في رقبته علة لا يمكن الالتفات معها وَهمٌ.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حَاتِمِ بْنِ بَزِيعٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ أَبِي بُكَيْرٍ، عَنْ إِسْرَائِيلَ، عَنْ أَبِي حَوْمَلٍ الْعَامِرِيِّ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ كَذَا قَالَ وَالصَّوَابُ أَبُو حَرْمَلٍ عَنْ - مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ أَمَّنَا جَابِرُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ فِي قَمِيصٍ لَيْسَ عَلَيْهِ رِدَاءٌ فَلَمَّا انْصَرَفَ قَالَ إِنِّي رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي فِي قَمِيصٍ .
মুহাম্মদ ইবনু ‘আবদুর রহমান আবূ বাকর হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গায়ে কোন চাদর না জড়িয়েই একটি মাত্র জামা পরে আমাদের ইমামতি করলেন। অতঃপর সলাত শেষে তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে একটি জামা পরে সলাত আদায় করতে দেখেছি। [৬৩৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، العامري: مجہول (تقریب: 8068) ، و محمد بن عبد الرحمٰن بن أبي بکر و أبوہ ضعیفان ضعفھما الجمہور،انظر تقریب التہذیب (6065،3815 مجہول) وکتب المجروحین ، (انوار الصحیفہ ص 35، 36)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف مرفوعاً، أبو حومل -أو حرمل- العامري مجهول، وكذا محمَّد بن عبد الرحمن بن أبي بكر وأبوه. إسرائيل: هو ابن يونس السبيعي. وأخرجه عبد الرزاق (١٤٠٠) عن إسرائيل، عن رجل سماه وعن أبيه: أن جابر أمهم … فذكره. وأخرج ابن أبي شيبة ٢/ ٢٢٦ عن وكيع، عن عكرمة بن عمار، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر أنه أمهم في قميص واحد. وهذا إسناد صحيح، لكنه موقوف. وأخرج أبو نعيم في "مسند أبي حنيفة" ص ١٣٥ من طريق عبد الرحمن بن يزيد المقرئ، عن أبي حنيفة، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر: أنه رآه يصلي في قميص واحد خفيف ليس عليه إزار ولا رداء، ولا أظنه صلى فيه إلا ليرينا أنه لا بأس في الصلاة في الثوب الواحد. وقال أبو نعيم: ورواه أبو يوسف عنه فقال: عطاء بن يسار. قلنا: رواية أبي يوسف في "الآثار" (١٦٦)، وابن يسار وابن أبي رباح كلاهما ثقة.
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، وَسُلَيْمَانُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الدِّمَشْقِيُّ، وَيَحْيَى بْنُ الْفَضْلِ السِّجِسْتَانِيُّ، قَالُوا حَدَّثَنَا حَاتِمٌ، - يَعْنِي ابْنَ إِسْمَاعِيلَ - حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ مُجَاهِدٍ أَبُو حَزْرَةَ، عَنْ عُبَادَةَ بْنِ الْوَلِيدِ بْنِ عُبَادَةَ بْنِ الصَّامِتِ، قَالَ أَتَيْنَا جَابِرًا - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ اللَّهِ - قَالَ سِرْتُ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةٍ فَقَامَ يُصَلِّي وَكَانَتْ عَلَىَّ بُرْدَةٌ ذَهَبْتُ أُخَالِفُ بَيْنَ طَرَفَيْهَا فَلَمْ تَبْلُغْ لِي وَكَانَتْ لَهَا ذَبَاذِبُ فَنَكَسْتُهَا ثُمَّ خَالَفْتُ بَيْنَ طَرَفَيْهَا ثُمَّ تَوَاقَصْتُ عَلَيْهَا لاَ تَسْقُطُ ثُمَّ جِئْتُ حَتَّى قُمْتُ عَنْ يَسَارِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَخَذَ بِيَدِي فَأَدَارَنِي حَتَّى أَقَامَنِي عَنْ يَمِينِهِ فَجَاءَ ابْنُ صَخْرٍ حَتَّى قَامَ عَنْ يَسَارِهِ فَأَخَذَنَا بِيَدَيْهِ جَمِيعًا حَتَّى أَقَامَنَا خَلْفَهُ قَالَ وَجَعَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَرْمُقُنِي وَأَنَا لاَ أَشْعُرُ ثُمَّ فَطِنْتُ بِهِ فَأَشَارَ إِلَىَّ أَنْ أَتَّزِرَ بِهَا فَلَمَّا فَرَغَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " يَا جَابِرُ " . قَالَ قُلْتُ لَبَّيْكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ . قَالَ " إِذَا كَانَ وَاسِعًا فَخَالِفْ بَيْنَ طَرَفَيْهِ وَإِذَا كَانَ ضَيِّقًا فَاشْدُدْهُ عَلَى حِقْوِكَ " .
‘উবাদাহ ইবনুল ওয়ালীদ ইবনু ‘উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট উপস্থিত হলে তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে একটি যুদ্ধে যাই। তিনি সলাত আদায় করতে দাঁড়ালেন। তখন আমার গায়ে একটি চাদর ছিল। আমি সেটির দু’ প্রান্ত দু’ কাঁধের উপর রাখার চেষ্টা করছিলাম। (চাদরটি ছোট হওয়ায়) সেটি দিয়ে আমার শরীর (বা কাঁধ) ঢাকা যাচ্ছিল না। অবশ্য চাদরটিতে আঁচল লাগানো ছিল। আমি তা উল্টে নিয়ে দু’ বিপরীত দিকে দু’ কাঁধের উপর তার দু’ মাথা ফেলে দিলাম। তারপর আমি কিছুটা ঝুঁকে গিয়ে তা চিবুক দিয়ে চেপে ধরলাম, যেন পড়ে না যায়। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর বাম পাশে গিয়ে দাঁড়ালাম। তিনি আমার হাত ধরে আমাকে ঘুরিয়ে এনে তাঁর ডান পাশে দাঁড় করালেন। পরে ইবনু শাখরা এসে তাঁর পাশে দাঁড়ালো। তিনি তাঁর দু’হাতে আমাদের উভয় হাত ধরে তাঁর পেছনে দাঁড় করিয়ে দিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার প্রতি লক্ষ্য করছিলেন। অথচ আমি বুঝতেই পারিনি, অবশ্য পরে বুঝেছি। তিনি ইশারায় আমাকে বললেনঃ ওটাকে ‘তহবন্দ’ বানিয়ে নাও। সলাত আদায় শেষে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, হে জাবির! আমি বললামঃ আমি উপস্থিত, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি বললেন, চাদর প্রশস্ত হলে সেটির দু’ মাথা বিপরীতভাবে দু’ কাঁধের উপর দিবে। পক্ষান্তরে চাদর ছোট হলে সেটি কোমরে বেঁধে নিবে।
সহীহঃ মুসলিম, বুখারী সংক্ষেপে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (3008)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه مسلم ضمن حديث طويل (٣٠١٠) من طريقين عن حاتم بن إسماعيل، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٢١٩٧). وأخرجه مختصراً بنحوه مسلم (٧٦٦) من طريق محمَّد بن المنكدر، عن جابر. وأخرجه مختصراً بالصلاة في الثوب الواحد البخاري (٣٦١) من طريق سعيد بن الحارث، عن جابر. وأخرجه ابن ماجه (٩٧٤) من طريق شرحبيل بن سعد، عن جابر قال: كان رسول الله يصلي المغرب، فجئت فقمت عن يساره، فأقامني عن يمينه. قوله: "وكانت عليَّ بُردةٌ" هي الشملة المخططة، وقيل: كساء مربع فيه صِغَر تلبسُه الأعراب. والذباذب: الأهداب والأطراف، مفردها ذبذِب، سميت بذلك، لأنها تتذبذب على صاحبها إذا مشى، أي: تتحرك وتضطرب. وقوله: "فنكستها" بتخفيف الكاف وتشديدها، أي: قلبتها "ثمَّ تواقصتُ عليها" أي: أمسكت عليها بعنقي وحنيتُ عليها لئلا تسقط. والحِقْوُ: مَعقِدُ الإزار، والمراد هنا أن يبلغ السرة.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَوْ قَالَ قَالَ عُمَرُ رضى الله عنه " إِذَا كَانَ لأَحَدِكُمْ ثَوْبَانِ فَلْيُصَلِّ فِيهِمَا فَإِنْ لَمْ يَكُنْ إِلاَّ ثَوْبٌ وَاحِدٌ فَلْيَتَّزِرْ بِهِ وَلاَ يَشْتَمِلِ اشْتِمَالَ الْيَهُودِ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন অথবা ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, তোমাদের নিকট কারো দু’টি কাপড় থাকলে সে যেন ঐগুলো পরেই সলাত আদায় করে। আর একটি মাত্র কাপড় থাকলে সে যেন তা কোমরে বেঁধে নেয় এবং ইয়াহূদীদের ন্যায় দু’ কাঁধে ঝুলিয়ে না রাখে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (771)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، لكن شك نافع في رفعه إلى النبي ﷺ أو وقفه على عمر، ورجح الطحاوي وقفه كما سيأتي. أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني. وأخرجه الطحاوي ١/ ٣٧٧، والبيهقي ٢/ ٢٣٦، وابن عبد البر في "التمهيد" ٦/ ٣٧١ من طريقين عن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن خزيمة (٧٦٦)، والبيهقي ٢/ ٢٣٥ من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن أيوب، به مرفوعاً من غير شك. وأخرجه عبد الرزاق (١٣٩٠)، وأحمد (٦٣٥٦)، والطحاوي ١/ ٣٧٧ من طريق ابن جريج، والطحاوي ١/ ٣٧٧ من طريق جرير بن حازم، كلاهما عن نافع، به على الشك. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٧٠٦٢) من طريق عمر بن نافع، عن أبيه، عن ابن عمر -قال عمر بن نافع: لا أعلمه إلا قد رفعه- فذكره. وأخرجه الطحاوي ١/ ٣٧٨، والطبراني في "الأوسط" (٩٣٦٨)، والبيهقي ٢/ ٢٣٥ - ٢٣٦ من طريق موسى بن عقبة، والطحاوي ١/ ٣٧٨، وابن حبان (١٧١٣)، والبيهقي ٢/ ٢٣٥ من طريق توبة العنبري، والطبراني في "الأوسط" (٦٠٠٨) من طريق علي بن ثابت، ثلاثتهم عن نافع، به مرفوعاً من غير شك. ورواية توبة العنبري مختصرة. وأخرجه ابن أبي شيبة ١/ ٣١٤، والطحاوي ٣٧٨/ ١ من طريق الزُّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر: أن عمر رأى رجلاً يصلي ملتحفاً فقال: لا تشبهوا باليهود، من لم يجد منكم إلا ثوباً واحداً فليتزر به. قال الطحاوي: فهذا سالم -وهو أثبت من نافع وأحفظ- إنما روى ذلك عن ابن عمر، عن عمر، لا عن النبي ﷺ، فصار هذا الحديث عن عمر ﵁، لا عن النبي ﷺ. تنبيه: هذا الحديث والذي يليه جاء في (أ) و (ب) و (ج) و (د) بعد حديث ابن مسعود في الإسبال الآتى برقم (٦٣٧)، مبوَّباً عليهما: باب من قال: يتزر به إذا كان ضيقاً. والمثبت من (هـ) حيث أخَّر حديثي ابن مسعود وأبي هريرة في الإسبال، إلا أنه قدم حديث أبي هريرة وبوّب عليهما: باب الإسبال في الصلاة. وهو الأليق في ترتيب الأحاديث إن شاء الله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ الذُّهْلِيُّ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو تُمَيْلَةَ، يَحْيَى بْنُ وَاضِحٍ حَدَّثَنَا أَبُو الْمُنِيبِ، عُبَيْدُ اللَّهِ الْعَتَكِيُّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يُصَلَّى فِي لِحَافٍ لاَ يَتَوَشَّحُ بِهِ وَالآخَرُ أَنْ يُصَلَّى فِي سَرَاوِيلَ وَلَيْسَ عَلَيْكَ رِدَاءٌ .
‘আবদুল্লাহ ইবনু বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তার পিতার হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন একটি মাত্র চাদরে সলাত আদায় করতে, যা দেহ আবৃত করে না। তিনি আরো নিষেধ করেছেন, গায়ে চাদর না জড়িয়ে কেবল পাজামা পরে সলাত আদায় করতে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ البیھقي (2/236 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن في الشواهد من أجل أبي المنيب -وهو عبيد الله بن عبد الله العتكي-. أبو تُميلة: هو يحيي بن واضح. وأخرجه الرويانى في "مسنده" (٢٦)، وابن عدي في ترجمة أبي المنيب من "الكامل" ٤/ ١٣٦٦ - ١٣٦٧، والحاكم ١/ ٢٥٠ و ٤/ ٢٧٢، والبيهقي ٢/ ٢٣٦ من طريق أبي تميلة يحيي بن واضح، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن عدي في ترجمة سفيان بن هشام من "الكامل" ٣/ ١٢٥٢ من طريق هشام بن سفيان، عن أبي المنيب العتكي، به. قوله: "لا يتوشح به" قال في "عون المعبود" ٢٣٩/ ٢: قال في "المجمع": التوشيح: أن يأخذ طرف ثوب ألقاه على منكبه الأيمن من تحت يده اليسرى، ويأخذ طرفه الذي ألقاه على الأيسر تحت يده اليمنى، ثمَّ يعقدهما على صدره، والمخالفة بين طرفيه والاشتمال بالثوب بمعنى التوشح.
حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ أَخْزَمَ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، عَنْ أَبِي عَوَانَةَ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنْ أَبِي عُثْمَانَ، عَنِ ابْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنْ أَسْبَلَ إِزَارَهُ فِي صَلاَتِهِ خُيَلاَءَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي حِلٍّ وَلاَ حَرَامٍ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَى هَذَا جَمَاعَةٌ عَنْ عَاصِمٍ مَوْقُوفًا عَلَى ابْنِ مَسْعُودٍ مِنْهُمْ حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ وَحَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ وَأَبُو الأَحْوَصِ وَأَبُو مُعَاوِيَةَ .
ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে বলতে শুনেছিঃ যে ব্যক্তি অহংকারবশতঃ সলাতের মধ্যে স্বীয় বস্ত্র (পাজামা/লুঙ্গি/প্যান্ট ইত্যাদি পায়ের গিরার নিচে) ঝুলিয়ে রাখে, মহান আল্লাহ তার জন্য জান্নাত হালাল করবেন না এবং জাহান্নামও হারাম করবেন না।
সহীহ।
ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, একদল বর্ণনাকারী (যেমন হাম্মাদ ইবনু সালামাহ, হাম্মাদ ইবনু যায়িদ, আবূল আহওয়াস, আবূ মু‘আবিয়াহ প্রমুখ) ‘আসিম সূত্রে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্যরূপে মাওকুফভাবে বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، إلا أنه قد اختلف على عاصم -وهو ابن سليمان الأحول- في رفعه ووقفه كما قال المصنف، والوقف أصح، لكن قال الحافظ في "الفتح" ١٠/ ٢٥٧: مثل هذا لا يقُال بالرأي، يعني أن له حكمَ المرفوع. أبو داود: هو الطيالسي، وأبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري، وأبو عثمان: هو عبد الرحمن بن ملّ النهدي. وهو في "مسند الطيالسي" (٣٥١) عن أبي عوانة وثابت أبي زيد -وهو ابن يزيد الأحول-، عن أبي عثمان، عن ابن مسعود، رفعه أبو عرانة ولم يرفعه ثابت. وأخرجه النسائى في "الكبرى" (٩٦٠٠) من طريق أبي عوانة، به، ولم يقل: "في صلاته". وأخرجه هناد في "الزهد" (٨٤٦) عن أبي معاوية الضرير، عن عاصم، به موقوفاً. وأخرج ابن أبي شيبة ٣٧٨/ ٨ من طريقين عن القاسم بن حسان، عن عمه عبد الرحمن بن حرملة، عن ابن مسعود: أن النبي ﷺ نهى عن جر الإزار. وفي باب النهي عن إسبال الإزار بوجه عام عن غير واحد من الصحابة، ستأتي أحاديثهم برقم (٤٠٨٤) وما بعده.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ أَبِي جَعْفَرٍ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ بَيْنَمَا رَجُلٌ يُصَلِّي مُسْبِلاً إِزَارَهُ إِذْ قَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " اذْهَبْ فَتَوَضَّأْ " . فَذَهَبَ فَتَوَضَّأَ ثُمَّ جَاءَ ثُمَّ قَالَ " اذْهَبْ فَتَوَضَّأْ " . فَذَهَبَ فَتَوَضَّأَ ثُمَّ جَاءَ فَقَالَ لَهُ رَجُلٌ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا لَكَ أَمَرْتَهُ أَنَّ يَتَوَضَّأَ فَقَالَ " إِنَّهُ كَانَ يُصَلِّي وَهُوَ مُسْبِلٌ إِزَارَهُ وَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى لاَ يَقْبَلُ صَلاَةَ رَجُلٍ مُسْبِلٍ إِزَارَهُ " .
আবূ হুরাইরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি স্বীয় লুঙ্গি (পায়ের গিরার নিচে) ঝুলিয়ে সলাত আদায় করছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেনঃ যাও, উযু করে আস। সে উযু করে এলে তিনি আবার বললেনঃ যাও, উযু করে আস। সে পুনরায় উযু করে আসল। একজন বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তাকে (উযু থাকাবস্থায় পুনরায়) উযু করতে কেন বললেন? তিনি বললেন, সে তার লুঙ্গি ঝুলিয়ে সলাত আদায় করছিল। মহান আল্লাহ (পায়ের গিরার নিচে) লুঙ্গি ঝুলিয়ে সলাত আদায়কারীর সলাত ক্ববুল করেন না। [৬৩৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (761) ، أبو جعفر المدیني وثقہ الجمھور، وأخرجہ بیھقي (2/242 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة أبي جعفر -وهو الأنصاري المدني- كما صرح به البيهقي في "السنن" ٢/ ٢٤٢، وباقي رجاله ثقات. أبان: هو ابن يزيد العطار، ويحيى: هو ابن أبي كثير. وأخرجه مختصراً بالمرفوع منه دون القصة النسائى في "الكبرى" (٩٧٠٣) من طريق هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، بهذا الإسناد، إلا أنه أبهم أبا هريرة فقال: حدثنى رجل من أصحاب النبي ﷺ. وهو بتمامه في "مسند أحمد" (١١٦٢٨). وسيأتي مكرراً برقم (٤٠٨٦).
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ زَيْدِ بْنِ قُنْفُذٍ، عَنْ أُمِّهِ، أَنَّهَا سَأَلَتْ أُمَّ سَلَمَةَ مَاذَا تُصَلِّي فِيهِ الْمَرْأَةُ مِنَ الثِّيَابِ فَقَالَتْ تُصَلِّي فِي الْخِمَارِ وَالدِّرْعِ السَّابِغِ الَّذِي يُغَيِّبُ ظُهُورَ قَدَمَيْهَا .
মুহাম্মাদ ইবনু যায়িদ ইবনু কুনফুয হতে তার মাতার সূত্র হতে বর্ণিত, তার মাতা উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন, মহিলারা কয়টি কাপড় পরে সলাত আদায় করবে? তিনি বললেন, একটি ওড়না এবং একটি জামা পরেই সলাত আদায় করতে পারবে। তবে জামাটি এরূপ লম্বা হবে যা দিয়ে পায়ের উপরিভাগ ঢেকে যাবে। [৬৩৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف موقوف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أم محمد بن زید اختلف قول الذہبي فیھا ووثقھا الحاکم وحدہ فھي مجہولۃ الحال ، (انوار الصحیفہ ص 36)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات غيرَ أم حرام والدة محمَّد بن زيد بن قنفذ، فلم يرو عنها غير ابنها، وقال الذهبي في "الميزان": لا تُعرف. وهو في "موطأ مالك" ١/ ١٤٢، ومن طريقه أخرجه عبد الرزاق (٥٠٢٨)، والبيهقي ٢/ ٢٣٢، والبغوي في "شرح السنة" (٥٢٦). وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ٨/ ٤٧٦ من طريق عبد الرحمن بن إسحاق، وإبن أبي شيبة ٢/ ٢٢٥، والبيهقي ٢/ ٢٣٢ من طريق هشام بن سعد، وابن أبي شيبة ١/ ٢٢٥ عن حفص بن غياث، والبيهقي ٢/ ٢٣٢ من طريق ابن أبي ذئب، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" ٧٣٩/ ٢ من طريق إسماعيل بن جعفر، خمستهم عن محمَّد بن زيد، به. وفي باب صلاة النساء بدرع وخمار موقوفاً عن: عائشة عند عبد الرزاق (٥٠٢٩)، وابن أبي شيبة ٢/ ٢٢٤ و ٢٢٦. وميمونة عند مالك ١/ ١٤٢، وابن أبي شيبة ٢/ ٢٢٥. وابن عباس عند عبد الرزاق (٥٠٣٠)، وابن أبي شيبة ٢/ ٢٢٥. قال ابن عبد البر في "الاستذكار" ٤٤٣/ ٥: والذي عليه فقهاء الأمصار بالحجاز والعراق أن على المرأة الحرة أن تغطي جسمها كُلَّه بدرعٍ صفيق سابغ وتُخمِّرَ رأسها، فإنها كلها عورة إلا وجهها وكفيها، وأن عليها سترَ ما عدا وجهها وكفيها. وقال صاحب "المغني" ٢/ ٣٢٦ - ٣٢٩: أجمعوا على أن للمرأة كشف وجهها في الصلاة واختلفوا في الكفين، وقال أبو حنيفة: القدمان ليسا من العورة، وقال مالك والشافعي والجمهور: إنه لا يجوز لها إلا كشف الوجه والكفين. ونقل شيخ الإسلام ابن تيمية في "الفتاوى" ٢٢/ ١١٤ عن أبي حنيفة: أنه يجوز إبداء القدم، وقال: وهو الأقوى، فإن عائشة ﵂ جعلته من الزينة الظاهرة، قالت ﴿ولا يبدين زينتهن إلا ما ظهر منها﴾ قالت: الفتخ: حلق من فضة تكون في أصابع الرجلين رواه ابن أبي حاتم.
حَدَّثَنَا مُجَاهِدُ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، - يَعْنِي ابْنَ دِينَارٍ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ زَيْدٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ، أَنَّهَا سَأَلَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَتُصَلِّي الْمَرْأَةُ فِي دِرْعٍ وَخِمَارٍ لَيْسَ عَلَيْهَا إِزَارٌ قَالَ " إِذَا كَانَ الدِّرْعُ سَابِغًا يُغَطِّي ظُهُورَ قَدَمَيْهَا " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَى هَذَا الْحَدِيثَ مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ وَبَكْرُ بْنُ مُضَرَ وَحَفْصُ بْنُ غِيَاثٍ وَإِسْمَاعِيلُ بْنُ جَعْفَرٍ وَابْنُ أَبِي ذِئْبٍ وَابْنُ إِسْحَاقَ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ زَيْدٍ عَنْ أُمِّهِ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ لَمْ يَذْكُرْ أَحَدٌ مِنْهُمُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَصَرُوا بِهِ عَلَى أُمِّ سَلَمَةَ رضى الله عنها .
মুহাম্মাদ ইবনু যায়িদ উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্র হতে বর্ণিত, অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে জিজ্ঞেস করলেন, মহিলারা ইযার ছাড়া কেবল একটি জামা ও একটি ওড়না পরে সলাত আদায় করতে পারবে কি? তিনি বললেনঃ জামাটি যদি এরূপ লম্বা হয়, যা দিয়ে পায়ের পাতা ঢেকে যায় (তাহলে সেটা পরে সলাত আদায় করতে পারবে)।
দুর্বল : মিশকাত ৭৬৩
ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, হাদীসটি মালিক ইবনু আনাস, বাক্র ইবনু মুদার, হাফ্স ইবনু গিয়াস, ইসমাঈল ইবনু জা‘ফর, ইবনু আবূ যি’ব ও আবূ ইসহাক্ব- মুহাম্মদ ইবনু যায়িদ হতে তার মাতা থেকে উম্মু সালামাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তাদের কেউই নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নাম উল্লেখ করেননি। [৬৪০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أم محمد مجہولۃ الحال ، (انوار الصحیفہ ص 36)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف مرفوعاً، عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار ضعيف من جهة حفظه، وقد خالفه جماعة، فرووه عن محمَّد بن زيد موقوفاً كما قال المصنف، وقد سلف تخريجُ رواياتهم فيما قبله، وقال الدارقطني في "العلل" -كما في "نصب الراية" ١/ ٣٠٠ - عن الموقوف: إنه الصواب. وأخرجه الدارقطني في "السنن" (١٧٨٥)، والحاكم ١/ ٢٥٠، والبيهقي ٢/ ٢٣٣ من طريق عثمان بن عمر، بهذا الإسناد.