সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ ثَابِتٍ، عَنْ أَنَسٍ، قَالَ ذَهَبْتُ بِعَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم حِينَ وُلِدَ وَالنَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي عَبَاءَةٍ يَهْنَأُ بَعِيرًا لَهُ قَالَ " هَلْ مَعَكَ تَمْرٌ " . قُلْتُ نَعَمْ - قَالَ - فَنَاوَلْتُهُ تَمَرَاتٍ فَأَلْقَاهُنَّ فِي فِيهِ فَلاَكَهُنَّ ثُمَّ فَغَرَ فَاهُ فَأَوْجَرَهُنَّ إِيَّاهُ فَجَعَلَ الصَّبِيُّ يَتَلَمَّظُ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " حِبُّ الأَنْصَارِ التَّمْرُ " . وَسَمَّاهُ عَبْدَ اللَّهِ .
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আবূ ত্বালহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পুত্র ‘আবদুল্লাহকে তার জন্মগ্রহণের পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট নিয়ে যাই। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি উলের আলখাল্লা পরা ছিলেন এবং তার উটের গায়ে তৈল মালিশ করছিলেন। তিনি প্রশ্ন করলেন, তোমার সঙ্গে কি খেজুর আছে? আমি বললাম, হ্যাঁ। বর্ণনাকারী বলেন, অত:পর আমি তাঁকে কয়েকটি খেজুর দিলাম। তিনি ঐ খেজুরগুলো তাঁর মুখে দিয়ে চিবালেন এং তার মুখ হতে শিশুর মুখ খুলে তাতে দিলেন। তখন শিশুটি তার মুখ নাড়তে শুরু করে এবং খাওয়ার জন্য চেষ্টা করতে থাকে। অত:পর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃআনসারদের পছন্দনীয় খাদ্য হলো খেজুর এবং শিশুটির নাম রাখলেন ‘আবদুল্লাহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (2144)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البناني. وأخرجه مسلم (٢١٤٤) عن عبد الأعلي بن حماد، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه وفيه قصة مسلم (٢١٤٤) (٢٣) من طريق محمَّد بن سيرين، عن أنس، به. وهو في "مسند أحمد" (١٢٧٩٥)، و "صحيح ابن حبان" (٤٥٣١). وقد سلف الحديث مختصراً برقم (٢٥٦٣) وانظر تمام تخريجه هناك. قال الخطابي في "معالم السنن" ٤/ ١٢٧، وقوله: "يهنأ": معناه: يطليه بالقطران ويعالجه به. والهناء: القطران. وجاء بهامش "مختصر المنذري" ما نصه: "حُبّ الأنصار التمر": بضم الحاء ونصب الباء، وحذف الفعل، وهو: انظروا للعلم به، ويكون: التمر: منصوباً بالحب، ويجوز أن تكون الحاء مكسورة، بمعنى: المحبوب، أي: محبوبهم التمرُ، و"التمر": مرفوع خبر المبتدأ. ومعنى: "فغر فاه" أي: فتحه، وفغر فوه، أي: انفتح، يتعدى ولا يتعدى. و"الوَجور": ما صب في وسط فم المريض. تقول منه: وَجَرْته، وأوجرتُه، بمعنى. و"يتلمظ " أي: يدير لسانه في فيه، ويحركه يتتبع أثر التمر. وكذلك إذا أخرج لسانه، فمسح به شفتيه. واللماظة -بالضم- ما بقي في الفم من الطعام.