সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللهِ بْنُ عَبْدِ الْكَرِيمِ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أُمَيَّةَ حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ مُوسَى الْبُخَارِيُّ عَنْ عُبَيْدَةَ الْعَمِّيِّ عَنْ فَرْقَدٍ السَّبَخِيِّ عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ فِي الْمُعْتَكِفِ هُوَ يَعْكِفُ الذُّنُوبَ وَيُجْرَى لَهُ مِنْ الْحَسَنَاتِ كَعَامِلِ الْحَسَنَاتِ كُلِّهَا
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ই‘তিকাফকারী সম্পর্কে বলেন, সে নিজেকে গুনাহ থেকে বিরত রাখে এবং নেককারদের সকল নেকী তার জন্য লেখা হয়। [১৭৮১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، عبیدۃ بن بلال: مجہول الحال (تقریب: 4407) ، وفرقد ضعیف، والحدیث ضعفہ البوصیري لضعف فرقد السبخي، (انوار الصحیفہ ص 443)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف فَرقد -وهو ابن يعقوب السَّبَخي- وجهالة حال عَبيدة العمي -وهو ابن بلال-. عيسى بن موسى: هو المعروف بغُنجار صاحب كتاب "تاريخ بخارى". وأخرجه أبو يعلى الخيلي في "الإرشاد" (٢٤٧)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٣٩٦٤) من طريق عيسى بن موسى، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ الْمَرَّارُ بْنُ حَمُّويَةَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُصَفَّى حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ بْنُ الْوَلِيدِ عَنْ ثَوْرِ بْنِ يَزِيدَ عَنْ خَالِدِ بْنِ مَعْدَانَ عَنْ أَبِي أُمَامَةَ عَنْ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ مَنْ قَامَ لَيْلَتَيْ الْعِيدَيْنِ مُحْتَسِبًا لِلهِ لَمْ يَمُتْ قَلْبُهُ يَوْمَ تَمُوتُ الْقُلُوبُ
আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি দু’ ঈদের রাতে আল্লাহ্র সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে ইবাদাত করবে তার অন্তর ঐ দিন মরবে না, যে দিন অন্তরসমূহ মরে যাবে। [১৭৮২]
তাহকীক আলবানীঃ বানোয়াট।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * موضوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، بقیۃ مدلس وعنعن ، والسند ضعفہ البوصیري، (انوار الصحیفہ ص 443)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف بقية بن الوليد، وقد اختُلف فيه على ثور بن يزيد، قال الدارلَطني في "العلل" فيما نقله عنه ابن الملقن في "البدر المنير" ٥/ ٣٧: يرويه ثور بن يزيد واختُلف عنه، فرواه جرير بن عبد الحميد، عن ثور، عن مكحول، عن أبي أمامة، قاله ابن قدامة وغيره عن جرير، ورواه عمرو بن هارون، عن جرير، عن ثور، عن مكحول، قال: وأسنده معاذ بن جبل، عن النبي ﷺ، والمحفوظ أنه موقوف عن مكحول. قلنا: ورواه بقية بن الوليد، عن ثور، عن خالد بن معدان، عن أبي أمامة كما عند المصنف هنا، ورواه إبراهيم بن محمَّد بن أبي يحيى الأسلمي، عن ثور، عن خالد، عن أبي الدرداء من قوله كما سيأتي، وإبراهيم الأسلمي متروك الحديث، ورواه الحسن بن سفيان كما قال الحافظ في "التلخيص" ٢/ ٨٠ من طريق بشر بن رافع، عن ثور، عن خالد، عن عُبادة، وبشر متهم بالوضع. وأخرجه الشافعيُّ في "الأم" ١/ ٢٣١، ومن طريقه البيهقي في "السُّنن الكبرى" ٣/ ٣١٩، وفي "شعب الإيمان" (٣٧١١)، وفي "فضائل الأوقات" (١٥٠) عن إبراهيم بن محمَّد الأسلمي، عن ثور، عن خالد، عن أبي الدرداء موقوفًا. وإبراهيم كما أسلفنا متروك الحديث. وحديث معاذ بن جبل الذي أشار إليه الدارقطني أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" ١٢/ ورقة ٤٧٧ في ترجمة علي بن عساكر المقدسي من طريق سويد بن سعيد، عن عبد الرحيم بن زيد العمي، عن أبيه، عن وهب بن منبه، عن معاذ بن جبل، عن النبي ﷺ قال: "من أحيا الليالي الأربع … " وهذا إسناد مسلسل بالضعفاء. وفي الباب عن كُردوس بن عمرو عند ابن الأعرابي في "معجمه" (٢٢٥٢)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (٩٢٤)، وعلي بن سعيد العسكري في "الصحابة" كما في "التلخيص الحبير" ٢/ ٨٠، والحسن بن سفيان وأبي نُعيم وابن منده وأبي مرسى المديني كلهم في "الصحابة" كما في "أسد الغابة" ٤/ ٤٦٥ - ٤٦٦، وفي إسناده مروان بن سالم وهو متروك الحديث، وسلمة بن سليمان الجزري وعيسى بن إبراهيم القرشي وهما ضعيفان
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا وَكِيعُ بْنُ الْجَرَّاحِ حَدَّثَنَا زَكَرِيَّا بْنُ إِسْحَقَ الْمَكِّيُّ عَنْ يَحْيَى بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ صَيْفِيٍّ عَنْ أَبِي مَعْبَدٍ مَوْلَى ابْنِ عَبَّاسٍ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعَثَ مُعَاذًا إِلَى الْيَمَنِ فَقَالَ إِنَّكَ تَأْتِي قَوْمًا أَهْلَ كِتَابٍ فَادْعُهُمْ إِلَى شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَأَنِّي رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَإِنْ هُمْ أَطَاعُوا لِذَلِكَ فَأَعْلِمْهُمْ أَنَّ اللهَ افْتَرَضَ عَلَيْهِمْ خَمْسَ صَلَوَاتٍ فِي كُلِّ يَوْمٍ وَلَيْلَةٍ فَإِنْ هُمْ أَطَاعُوا لِذَلِكَ فَأَعْلِمْهُمْ أَنَّ اللهَ افْتَرَضَ عَلَيْهِمْ صَدَقَةً فِي أَمْوَالِهِمْ تُؤْخَذُ مِنْ أَغْنِيَائِهِمْ فَتُرَدُّ فِي فُقَرَائِهِمْ فَإِنْ هُمْ أَطَاعُوا لِذَلِكَ فَإِيَّاكَ وَكَرَائِمَ أَمْوَالِهِمْ وَاتَّقِ دَعْوَةَ الْمَظْلُومِ فَإِنَّهَا لَيْسَ بَيْنَهَا وَبَيْنَ اللهِ حِجَابٌ
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম), মুআয বিন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইয়ামানে পাঠাবার প্রাক্কালে বলেন, নিশ্চয়ই তুমি এমন একটি সম্প্রদায়ের কাছে যাচ্ছো যারা আহলে কিতাব। তুমি সর্বপ্রথম তাদেরকে "আল্লাহ্ ব্যতীত কোন ইলাহ নাই এবং আমি আল্লাহ্র রসূল" এ কথার সাক্ষ্য দেয়ার আহ্বান জানাবে। তারা তা মেনে নিলে তুমি তাদের জানিয়ে দিবে যে, আল্লাহ্ তাদের উপর দৈনিক পাঁচ ওয়াক্ত সলাত ফরয করেছেন। তারা যদি এ কথাও মেনে নেয়, তবে তাদের আরও জানিয়ে দিবে যে, আল্লাহ্ তাদের সম্পদের উপর যাকাত ফরয করেছেন, যা তাদের ধনীদের নিকট থেকে আদায় করা হবে এবং তাদের গরীবদের মধ্যে বিতরণ করা হবে। তারা যদিও এটিও মেনে নেয় তবে তাদের উত্তম সম্পদ (গ্রহণ) থেকে নিজেদের বিরত রাখবে। তুমি মযলুমের বদদোয়াকে ভয় করো। কেননা মযলুমের আহাজারি ও আল্লাহ্র মাঝে কোন পর্দা (প্রতিবন্ধক) নেই। [১৭৮৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٣٩٥)، ومسلم (١٩) (٢٩) و (٣٠) و (٣١)، وأبو داود (١٥٨٤)، والترمذي (٦٣٠) و (٢١٣٣)، والنسائي ٥/ ٢ - ٤ و٥٥ من طريق يحيى ابن عبد الله بن صيفي، به. ورواية مسلم الأولى عن ابن عباس عن معاذ بن جبل. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٧١)، و"صحيح ابن حبان" (١٥٦).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي عُمَرَ الْعَدَنِيُّ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ أَعْيَنَ وَجَامِعِ بْنِ أَبِي رَاشِدٍ سَمِعَا شَقِيقَ بْنَ سَلَمَةَ يُخْبِرُ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ مَسْعُودٍ عَنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ مَا مِنْ أَحَدٍ لَا يُؤَدِّي زَكَاةَ مَالِهِ إِلَّا مُثِّلَ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ شُجَاعًا أَقْرَعَ حَتَّى يُطَوِّقَ عُنُقَهُ ثُمَّ قَرَأَ عَلَيْنَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مِصْدَاقَهُ مِنْ كِتَابِ اللهِ تَعَالَى {وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَا آتَاهُمْ اللهُ مِنْ فَضْلِهِ} الْآيَةَ
আবদুল্লাহ্ বিন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি তার মালের যাকাত আদায় করে না, তার মালকে কিয়ামাতের দিন বিষধর সাপে পরিণত করা হবে, এমনকি তা তার গলায় পেঁচিয়ে দেয়া হবে। এরপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সমর্থনে আল্লাহ্র কিতাবের নিম্নোক্ত আয়াত আমাদের তিলাওয়াত করে শুনান (অনুবাদ): "আর আল্লাহ্ নিজ অনুগ্রহে যা তোমাদের দিয়েছেন, এতে যারা কৃপণতা করে, তাদের জন্য তা মঙ্গলজনক একথা যেন তারা মনে না করে...” (৩: ১৮০)। [১৭৮৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح من جهة جامع بن أبي راشد -وهو الكاهلي الصيرفي الكوفي، وشقيق بن سَلمة: هو أبو وائل، مشهور بكنيته. وأخرجه الترمذي (٣٢٥٩)، والنسائي ٥/ ١١ من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. غير أن رواية النسائي عن جامع من أبي راشد وحده. وهو في "مسند أحمد" (٣٥٧٧).
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ الْمَعْرُورِ بْنِ سُوَيْدٍ عَنْ أَبِي ذَرٍّ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَا مِنْ صَاحِبِ إِبِلٍ وَلَا غَنَمٍ وَلَا بَقَرٍ لَا يُؤَدِّي زَكَاتَهَا إِلَّا جَاءَتْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْظَمَ مَا كَانَتْ وَأَسْمَنَهُ تَنْطَحُهُ بِقُرُونِهَا وَتَطَؤُهُ بِأَخْفَافِهَا كُلَّمَا نَفِدَتْ أُخْرَاهَا عَادَتْ عَلَيْهِ أُولَاهَا حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ النَّاسِ
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন উট, ছাগল ও গরুর মালিক যদি এর যাকাত আদায় না করে, তবে এগুলো কিয়ামাতের দিন বিরাটকায় ও মোটাতাজা হয়ে উপস্থিত হবে এবং মালিককে এদের শিং ও ক্ষুর দিয়ে আঘাত করতে থাকবে। শেষটির পালা শেষ হলে আবার প্রথমটি থেকে শুরু হবে এবং এভাবেই চলতে থাকবে, যে পর্যন্ত না বিচারকার্য শেষ হয়। [১৭৮৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح.من فوق علي بن محمَّد ثقات من رجال الشيخين. الأعمش: هو سُليمان بن مهران الكاهلي. وأخرجه البخاري (١٤٦٠)، ومسلم (٩٩٠)، والترمذي (٦٢١)، والنسائي ٥/ ١٠ - ١١ و ٢٩ من طريق الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٣٥١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٥٦).
حَدَّثَنَا أَبُو مَرْوَانَ مُحَمَّدُ بْنُ عُثْمَانَ الْعُثْمَانِيُّ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ أَبِي حَازِمٍ عَنْ الْعَلَاءِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِيهِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ تَأْتِي الْإِبِلُ الَّتِي لَمْ تُعْطِ الْحَقَّ مِنْهَا تَطَأُ صَاحِبَهَا بِأَخْفَافِهَا وَتَأْتِي الْبَقَرُ وَالْغَنَمُ تَطَأُ صَاحِبَهَا بِأَظْلَافِهَا وَتَنْطَحُهُ بِقُرُونِهَا وَيَأْتِي الْكَنْزُ شُجَاعًا أَقْرَعَ فَيَلْقَى صَاحِبَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَيَفِرُّ مِنْهُ صَاحِبُهُ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ يَسْتَقْبِلُهُ فَيَفِرُّ فَيَقُولُ مَا لِي وَلَكَ فَيَقُولُ أَنَا كَنْزُكَ أَنَا كَنْزُكَ فَيَتَقِيهِ بِيَدِهِ فَيَلْقَمُهَا
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে উটের যাকাত দেয়া হয়নি, তা কিয়ামাতের দিন তার মালিককে তার ক্ষুর দিয়ে মাড়াতে থাকবে। তদ্রূপ গরু ও ছাগল এসে এদের ক্ষুর ও শিং দিয়ে এদের মালিককে আঘাত করতে থাকবে। তার সঞ্চিত সম্পদও বিষধর সাপে পরিণত হয়ে তার মালিকের সামনে হাজির হবে। মালিক দু’বার তা দেখে পালাবে, কিন্তু সে আবার মালিকের সামনে এসে দাঁড়াবে। তখন মালিক পালাতে চেষ্টা করবে এবং বলবে, তোমার সাথে আমার কি সম্পর্ক? সে বলবে, আমি তোমার গচ্ছিত সম্পদ, আমি তোমার রক্ষিত ধন। মালিক তার হাত দিয়ে সাপ থেকে আত্মরক্ষার চেষ্টা করলে সে তার হাতটি গিলে ফেলবে। [১৭৮৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. العلاء بن عبد الرحمن: هو ابن يعقوب مولى الحُرَقة. وأخرجه البخاري (١٤٠٣)، ومسلم (٩٨٧)، وأبو داود (١٦٥٨) و (١٦٥٩) من طريق أبي صالح السمان، وأخرجه البخاري (١٤٠٢) و (٤٦٥٩)، والنسائي ٥/ ٢٣ - ٢٤ من طريق الأعرج، وأبو داود (١٦٦٠)، والنسائي ٥/ ١٢ - ١٣ من طريق أبي عمر الغُدَاني، ثلاثتهم عن أبي هريرة. وبعضهم يذكر الكىَّ بصفائح الذهب والفضة بدل الشجاع الأقرع يوم القيامة، وبعضهم يرويه مختصرًا. وهو في "مسند أحمد" (٧٥٦٣) و (٧٧٥٦) و (٨١٨٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٥٤).
حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ سَوَّادٍ الْمِصْرِيُّ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ وَهْبٍ عَنْ ابْنِ لَهِيعَةَ عَنْ عُقَيْلٍ عَنْ ابْنِ شِهَابٍ حَدَّثَنِي خَالِدُ بْنُ أَسْلَمَ مَوْلَى عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ قَالَ خَرَجْتُ مَعَ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ فَلَحِقَهُ أَعْرَابِيٌّ فَقَالَ لَهُ قَوْلُ اللهِ عَزَّ وَجَلَّ {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنْفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللهِ}.
قَالَ لَهُ ابْنُ عُمَرَ مَنْ كَنَزَهَا فَلَمْ يُؤَدِّ زَكَاتَهَا فَوَيْلٌ لَهُ إِنَّمَا كَانَ هَذَا قَبْلَ أَنْ تُنْزَلَ الزَّكَاةُ فَلَمَّا أُنْزِلَتْ جَعَلَهَا اللهُ طَهُورًا لِلْأَمْوَالِ ثُمَّ الْتَفَتَ فَقَالَ مَا أُبَالِي لَوْ كَانَ لِي أُحُدٌ ذَهَبًا أَعْلَمُ عَدَدَهُ وَأُزَكِّيهِ وَأَعْمَلُ فِيهِ بِطَاعَةِ اللهِ عَزَّ وَجَلَّ.
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মুক্ত দাস খালিদ বিন আসলাম হতে বর্ণিত, আমি আবদুল্লাহ্ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সাথে বের হলাম। এক বেদুঈন এসে তাঁকে আল্লাহ্র বাণী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলোঃ “যারা সোনা-রূপা পুঞ্জীভূত করে এবং তা আল্লাহ্র পথে ব্যয় করে না...”(সূরা তওবাঃ ৩৪)।
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বলেন, যে ব্যক্তি সোনা-রূপা পুঞ্জীভূত করে রাখে, অথচ এর যাকাত আদায় করে না, তার জন্য ধ্বংস অনিবার্য। এ অবস্থা ছিল যাকাতের বিধান নাযিল হওয়ার আগের। পরবর্তীতে যাকাতের বিধান নাযিল হলে যাকাতকেই আল্লাহ্ মালের পবিত্রতাকারী সাব্যস্ত করেন। অতঃপর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকটির দিকে তাকিয়ে বলেন, এ ব্যাপারে আমার পরোয়া নেই যে, উহুদ পাহাড় পরিমাণ সোনাও যদি আমার হাতে আসে, তবে আমি তার পরিমাণ নিরূপণ করে এর যাকাত পরিশোধ করবো এবং মহান আল্লাহ্র হুকুম পালনে তা ব্যয় করবো। [১৭৮৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد حسن، ابنُ لهيعة -وهو عبد الله، وان كان سيئ الحفظ- رواه عنه هنا عبدُ الله بن وهب، وهو أحد العبادلة الذين تقرر عند أهل العلم أن سماعهم منه صحيح، ومع هذا فقد توبع. وأخرجه البخاري تعليقًا بصيغة الجزم (١٤٠٤) قال: قال أحمد بن شبيب بن سعيد: حدثنا أبي، عن يونس، عن ابن شهاب، به. قال الحافظ في "تغليق التعليق" ٣/ ٥: هكذا وقع في أكثر الروايات، ووقع في روايتنا من طريق أبي ذر: حدثنا أحمد بن شبيب فذكره. وأورده الحافظ موصولًا بأطول مما هنا من طريق محمَّد بن يحيى الذهلي في "جزئه" حدثنا أحمد بن شبيب … ووصله أيضًا أبو داود في كتاب "الناسخ والمنسوخ" عن محمَّد بن يحيى الذهلي …
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ أَعْيَنَ حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ الْحَارِثِ عَنْ دَرَّاجٍ أَبِي السَّمْحِ عَنْ ابْنِ حُجَيْرَةَ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ إِذَا أَدَّيْتَ زَكَاةَ مَالِكَ فَقَدْ قَضَيْتَ مَا عَلَيْكَ
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যখন তুমি তোমার মালের যাকাত আদায় করলে, তখন তুমি তোমার দায়িত্ব সম্পন্ন করে ফেললে। [১৭৮৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن كما قال الترمذي، وهذا إسناد ضعيف لضعف درَّاج أبي السَّمح. ابن حُجَيرة: هو عبد الرحمن. = ٍ= وأخرجه الترمذي (٦٢٣) وحسنه من طريق عمرو بن الحارث، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٣٢١٦). وله شاهد من حديث أم سلمة عند أبي داود (١٥٦٤) وغيره، ولفظه: "ما بلغ أن تؤدَّى زكاتُه، فزكي فليس بكنز". ويشهد له حديث ابن عمر السالف عند المصنف (١٧٨٧) فهو حسن به. وآخر من حديث جابر عند ابن خزيمة (٢٢٥٨) و (٢٤٧٠) والحاكم ١/ ٣٩٠ بلفظ "إذا أديت زكاة مالك، فقد أذهبت عنك شره" وصحح وقفه أبو زرعة كما في "علل ابن آبي حاتم". وثالث من حديث ابن عمر مرفوعًا عند البيهقي ٤/ ٨٢ - ٨٣، وموقوفًا عند ابن أبي شيبة ٣/ ١٩٠ والبيهقي ٤/ ٨٢، ولفظه: "ليس بكنز ما أُدّي زكاته" وصحح البيهقي الموقوف. وروى مالك في "الموطأ" ١/ ٢٥٦ عن عبد الله بن دينار أنه قال: سمعت عبد الله بن عمر، وهو يُسال عن الكنز ما هو؟ فقال: هو المال الذي لا تؤدَّى منه الزكاة. ويشدُّ هذه الآثار حديثُ طلحة بن عبيد الله المتفق عليه، وفيه: وذكر له رسول الله ﷺ الزكاة، قال: هل علي غيرها؟ قال: "لا إلا أن تَطَوع".
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ عَنْ شَرِيكٍ عَنْ أَبِي حَمْزَةَ عَنْ الشَّعْبِيِّ عَنْ فَاطِمَةَ بِنْتِ قَيْسٍ أَنْهَا سَمِعَتْهُ تَعْنِي النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ لَيْسَ فِي الْمَالِ حَقٌّ سِوَى الزَّكَاةِ
ফাতিমাহ বিনতু কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেনঃ যাকাত ব্যতীত সম্পদের উপর অন্য কোন দাবী নেই। [১৭৮৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف منكر
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، ترمذي (659،660)، (انوار الصحیفہ ص 443)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- سيئ الحفظ، وشيخه أبو حمزة -وهو ميمون الأعور- ضعيف. وقد اضطرب في متنه. الشعبي: هو عامر بن شَراحيل. فأخرجه الترمذي (٦٦٥) و (٦٦٦) من طريقين عن شريك بن عبد الله النخعي، بهذا الإسناد، بلفظ: "إن في المال لحقًا سوى الزكاة"- هكذا على الإثبات وقد صحَّ عن الشعبي من قوله عند الطبري في "تفسيره" (٢٥٢٥) من طريق إسماعيل بن سالم عنه، سمعتُه يُسأل: هل على الرجل حق في ماله سوى الزكاة؟ قال: نعم، وتلا هذه الآية: ﴿وَآتَى الْمَالَ عَلَى حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ﴾ [البقرة: ١٧٧]. وصح عن ابن عمر فيما أخرجه ابن أبي شيبة ٣/ ١٩١ أنه قال لقزعة بن يحيى: … ولكن في مالك حق سوى ذلك يا قزعة. وذكر الطبري في "جامع البيان" ٣/ ٣٤٨ عن بعضهم أن في المال حقوقًا تجب سوى الزكاة، واعتلّوا لقولهم ذلك بهذه الآية: ﴿لَيْسَ الْبِرَّ … ﴾ [البقرة: ١٧٧] وقالوا: لما قال الله ﵎: ﴿وَآتَى الْمَالَ عَلَى حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَى﴾ ومن سمى الله معهم، ثم قال بعد: ﴿وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ﴾ علمنا أن المال الذي وصف المؤمنين به أنهم يؤتونه ذوي القربى ومن سمى معهم غير الزكاة التي ذكر أنهم يؤتونها، لأن ذلك لو كان مالًا واحدًا لم يكن لتكريره معنى مفهوم. وانظر كلاما نفيسًا لابن حزم في كتابه "المحلى" في وجوب غير الزكاة في المال ٦/ ١٥٦ - ١٥٩.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ أَبِي إِسْحَقَ عَنْ الْحَارِثِ عَنْ عَلِيٍّ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِنِّي قَدْ عَفَوْتُ لَكُمْ عَنْ صَدَقَةِ الْخَيْلِ وَالرَّقِيقِ وَلَكِنْ هَاتُوا رُبُعَ الْعُشْرِ مِنْ كُلِّ أَرْبَعِينَ دِرْهَمًا دِرْهَمًا
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আমি ঘোড়া ও গোলামের যাকাত থেকে তোমাদের নিষ্কৃত দিলাম। তবে তোমরা প্রতি চল্লিশ দিরহামে এক দিরহাম (যাকাত) দিবে। [১৭৯০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (1574) ترمذي (620)، (انوار الصحیفہ ص 443)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحارث -وهو ابن عبد الله الأعور- ولكنه متابع. أبو إسحاق: هو عَمرو بن عبد الله السبيعي، وسفيان: هو ابن سعيد بن مَسروق الثوري. وأخرجه أحمد (٩٨٤) من طريق حجاج بن أرطأة، و (١٠٩٧) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن أبي إسحاق، به. وأخرجه أبو داود (١٥٧٤)، والترمذي (٦٢٥)، والنسائي ٥/ ٣٧ من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، عن عاصم بن ضمرة، عن علي بن أبي طالب، وهذا إسناد حسن. وهو في "مسند أحمد" (٧١١). وأخرجه أبو داود (١٥٧٢) و (١٥٧٣) من طريقين عن أبي إسحاق السبيعي، عن عاصم بن ضمرة والحارث الأعور، عن علي رفعه، ولفظه في الموضع الأول: "هاتوا ربع العشور، من كل أربعين درهما درهم، وليس عليكم شيء حتى تتم مئتي درهم، فإذا كانت مئتي درهم، ففيها خمسة دراهم … ". ولفظه في الموضع الثاني: "فإذا كانت لك مئتا درهم وحال عليها الحول، ففيها خمسة دراهم … ". وسيأتي بذكر صدقة الخيل والرقيق برقم (١٨١٣).
حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ وَمُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى قَالَا حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللهِ بْنُ مُوسَى أَنْبَأَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ إِسْمَعِيلَ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ وَاقِدٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَ وَعَائِشَةَ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَأْخُذُ مِنْ كُلِّ عِشْرِينَ دِينَارًا فَصَاعِدًا نِصْفَ دِينَارٍ وَمِنْ الْأَرْبَعِينَ دِينَارًا دِينَارًا
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি বিশ দিনার বা তার চেয়ে কিছু বেশি হলে অর্ধ দিনার এবং চল্লিশ দিনারে এক দিনার (যাকাত) গ্রহণ করতেন। [১৭৯১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، إبراہیم بن إسماعیل بن مجمع ضعیف ، و للحدیث شواھد ضعیفۃ عند أبي داود (1573) وغیرہ ، (انوار الصحیفہ ص 443)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف إبراهيم بن إسماعيل، وهو ابن مجمِّع الأنصاري. وأخرجه الدارقطي (١٨٩٦) من طرق عن عُبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد. وفي الباب عن علي بن أبي طالب عند أبي عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (١١٠٧) عن أبي بكر بن عياش، وابن أبي شيبة ٣/ ١١٩ عن وكيع، عن سفيان الثوري، وأبي داود (١٥٧٣) من طريق جرير بن حازم، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السبيعي، عن عاصم بن ضمرة، عن علي عن النبي ﷺ قال: "في كل عشرين دينارًا نصف دينار، وفي كل أربعين دينارًا دينارٌ … " وهذا إسناد حسن. والحديث عند أبي عبيد وابن أبي شيبة موقوف من قول علي بن أبي طالب. وعن محمَّد بن عبد الرحمن الأنصاري: أن في كتاب رسول الله ﷺ وفي كتاب عمر في الصدقة: أن الذهب لا يؤخذ منه شيء حتى يبلغ عشرين دينارًا، فإذا بلغ عشرين دينارًا ففيه نصف دينار … أخرجه أبو عبيد القاسم بن سلام (١١٠٦) وهذا إسناد صحيح، وقد كان كتاب النبي ﷺ وكتاب عمر عند محمَّد بن عبد الرحمن الأنصاري كما جاء موضحًا في كتاب "الأموال" لأبي عبيد عند الحديث (٩٣٤).
َدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْجَهْضَمِيُّ حَدَّثَنَا شُجَاعُ بْنُ الْوَلِيدِ حَدَّثَنَا حَارِثَةُ بْنُ مُحَمَّدٍ عَنْ عَمْرَةَ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ لَا زَكَاةَ فِي مَالٍ حَتَّى يَحُولَ عَلَيْهِ الْحَوْلُ
আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ বছর পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত কোন মালের যাকাত নেই। [১৭৯২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، حارثۃ بن محمد ھو ابن أبی الرجال: ضعیف ، و للحدیث شواھد ضعیفۃ،انظر سنن أبي داود (1573) ، (انوار الصحیفہ ص 444)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسنادٌ ضعيف لضعف حارثة بن محمَّد، وهو ابن أبي الرجال. عمرة: هي بنت عبد الرحمن. وأخرجه الدارقطني (١٨٩٣)، والبيهقي ٤/ ٩٥ و ١٠٣ من طريق شُجاع بن الوليد أبي بدر، بهذا الإسناد. وفي الباب عن علي بن أبي طالب عند أبي داود (١٥٧٢) و (١٥٧٣). ولفظهُ في الموضع الأول: "الصدقةُ في كل عام"، ولفظه في الموضع الثاني: "ليس في مال زكاةٌ حتى يحُول عليه الحول" وهذا إسناد حسن. وقال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحببر" ٢/ ١٥٦: حديث علي لا بأس بإسناده، والآثار تعضُده فيصلحُ للحُجَّة، وحَسنه الحافظ الزيلعي في "نصْب الراية" ٢/ ٣٢٨، ونقل عن النووي قوله في "خلاصة الأحكام": وهو حديث صحيح أو حسن. وعن ابن عمر موقوفًا عند الترمذي (٦٣٧) وغيره، وإسناده صحيح. وقد روي مرفوعًا عنه ولا يصح.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ حَدَّثَنِي الْوَلِيدُ بْنُ كَثِيرٍ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي صَعْصَعَةَ عَنْ يَحْيَى بْنِ عُمَارَةَ وَعَبَّادِ بْنِ تَمِيمٍ عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ لَا صَدَقَةَ فِيمَا دُونَ خَمْسَةِ أَوْسَاقٍ مِنْ التَّمْرِ وَلَا فِيمَا دُونَ خَمْسِ أَوَاقٍ وَلَا فِيمَا دُونَ خَمْسٍ مِنْ الْإِبِلِ
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেনঃ পাঁচ ‘ওয়াসাক’ –এর কম পরিমাণ খেজুরে, পাঁচ উকিয়া’ -এর কম পরিমাণ মুদ্রায় এবং পাঁচের কম সংখ্যক উটে যাকাত নেই। [১৭৯৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه النسائي ٥/ ٣٦ - ٣٧ و ٣٧ من طريق محمَّد بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، به. وقرن به في الموضع الثاني محمَّد بن يحيى بن حَبَّان. وأخرجه البخاري (١٤٠٥)، ومسلم (٩٧٩) (١)، وأبو داود (١٥٥٨)، والترمذي (٦٣١) و (٦٣٢)، والنسائي ٥/ ١٧ و ١٨ و ٣٦ من طريق عمرو بن يحيى بن عمارة، ومسلم (٩٧٩) (٣) من طريق عمارة بن غزية و (٩٧٩) (٤) من طريق محمَّد بن يحيى بن حبان، ثلاثتهم عن يحيى بن عمارة وحده، به. وأخرجه البخاري (١٤٥٩) و (١٤٨٤)، والنسائي ٥/ ٣٦ من طريق محمَّد بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، عن أبيه، وأبو داود (١٥٥٩) من طريق أبي البختري، كلاهما عن أبي سعبد الخدري. واقتصر أبو داود على ذكر الأوساق. وهو في "مسند أحمد" (١١٥٣٠) و (١١٨١٣)، و "صحيح ابن حبان" (٣٢٦٨) و (٣٢٧٦) و (٣٢٨١). والأوسق الخمسة: تساوي (٦٥٢) كيلًا.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ مُسْلِمٍ عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللهِ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَيْسَ فِيمَا دُونَ خَمْسِ ذَوْدٍ صَدَقَةٌ وَلَيْسَ فِيمَا دُونَ خَمْسِ أَوَاقٍ صَدَقَةٌ وَلَيْسَ فِيمَا دُونَ خَمْسَةِ أَوْسَاقٍ صَدَقَةٌ
জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ উটের সংখ্যা পাঁচ এর কম হলে তাতে যাকাত নেই, পাঁচ উকিয়া’-এর কম মুদ্রায় যাকাত নেই এবং পাঁচ ওয়াসাক -এর কম ফসলে যাকাত নেই। [১৭৯৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإن عمرو بن دينار لم يسمعه من جابر كما قال ابن خزيمة، ومحمد بن مسلم -وهو الطائفي- سيئ الحفظ، وقد أسقط الواسطة بين عمرو وبين جابر، ورواه ابن جريج عن عمرو، عن غير واحد، عن جابر، وهو الصواب. وأخرجه عبد الرزاق (٧٢٥١)، وأحمد (١٤١٦٢)، وعبد بن حميد (١١٠٣)، وابن خزيمة (٢٣٠٤) و (٢٣٠٥)، وأبو عوانة (٢٦٦١) و (٢٦٦٢)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ٣٥، وفي "شرح مشكل الآثار" (١٤٨٣)، والطبراني في "الأوسط" (٨٤٧٨)، والدارقطني (١٩٠٦)، والحاكم ١/ ٤٠٠ و ٤٠١ - ٤٠٢، والبيهقي ٤/ ١٢٨ من طريق محمَّد بن مسلم الطائفي، به. وأخرجه عبد الرزاق (٧٢٥٠)، ومن طريقه ابن خزيمة (٢٣٠٦) عن ابن جريج، قال: أخبرني عمرو بن دينار، قال: سمعتُ عن غير واحد، عن جابر بن عبد الله أنه قال: … وأخرجه مسلم (٩٨٠)، وابن خزيمة (٢٢٩٨) و (٢٢٩٩)، والطحاوي في "شرح المعاني" ٢/ ٣٥، والدارقطني (١٩٠١)، والبيهقي ٤/ ١٢٠ من طريق أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله. وأخرجه عبد الرزاق (٧٢٥٦)، والبيهقي ٤/ ١٢٠ - ١٢١ من طريق ابن أبي نجيح وأيوب وقتادة ويحيى بن أبي كثير، عن ابني جابر، عن جابر. قال في "النهاية": الذود من الإبل: ما بين الثنتينِ إلى التسع، وقيل: ما بين الثلاث إلى العشر، واللفظة مؤنثة، ولا واحد لها من لفظها كالنعَم، وقال أبو عُبيد: الذود من الإناث دون الذكور، والحديث عام فيهما، لأن من ملك خمسة من الإبل، وجبت عليه فيها الزكاة ذكورًا كانت أو إناثًا.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ حَدَّثَنَا إِسْمَعِيلُ بْنُ زَكَرِيَّا عَنْ حَجَّاجِ بْنِ دِينَارٍ عَنْ الْحَكَمِ عَنْ حُجَيَّةَ بْنِ عَدِيٍّ عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ أَنَّ الْعَبَّاسَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فِي تَعْجِيلِ صَدَقَتِهِ قَبْلَ أَنْ تَحِلَّ فَرَخَّصَ لَهُ فِي ذَلِكَ
আলী বিন আবূ তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার মালের বর্ষপূর্তির পূর্বে যাকাত প্রদানের ব্যাপারে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করেন। তিনি তাকে এ ব্যাপারে অনুমতি দেন। [১৭৯৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن حَدَّثَنَا
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (1624) ترمذي (678)، (انوار الصحیفہ ص 444)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن بطريقيه وشاهده. وهذا إسناد ضعيف لضعف حُجية بن عدي. الحكم: هو ابن عُتيبة. وأخرجه أبو داود (١٦٢٤)، والترمذي (٦٨٥) من طريق سعيد بن منصور، بهذا الإسناد. وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" ١/ ٥٠٠ - ٥٠١، ومن طريقه البيهقي ٤/ ١١١ عن عيسى بن محمَّد، عن وهب بن جرير، عن أبيه، عن الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي البَخْتَري، عن علي ؓ فذكر قصةَ في بعْثِ رسول الله ﷺ عمرَ ؓ ساعيًا ومَنع العباس صدقتَه، وأنه ذُكر للنبي، ما صنَع العباسُ فقال: "أما علمت يا عمر أن عمَّ الرجلِ صِنْوُ أبيه، إنا كنا احتجنا فاستلفنا العباسَ صدقةَ عامين". هذا وان كان منقطعًا بين أبي البَختري -واسمُه سعيدُ بن فيروز- وبين عليٍّ كما نص على ذلك غيرُ واحد من أهل العلم، متابعةٌ لحُجية بن عدي يحسُن بها الحديثُ. ويشهد له حديثُ أبي هُريرة عند مسلم (٩٨٣) قال: بعثَ رسولُ الله ﷺ عمرَ على الصدقة، فقبل: مَنَع ابنُ جميل وخالدُ بن الوليد والعباسُ عمُ رسول الله ﷺ فقال رسول الله ﷺ: "ما ينقِمُ ابنُ جميل إلا أنه كان فقيرًا فأغناهُ اللهُ، وأما خالدٌ فإنكم تظلمون خالدًا، قد احْتَبَسَ أدْراعَه وأعْتادَه في سبيل الله، وأما العباس فهي علَي، ومثلُها معها"، ثم قال: "يا عمرُ، أما شعرتَ أن عمَّ الرجلِ صِنوُ أبيه؟ ". وقوله: "هي علي ومثلها معها" قال النووي في "شرح مسلم" ٧/ ٥٧: معناه: أني تسلفت منه زكاة عامين.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ شُعْبَةَ عَنْ عَمْرِو بْنِ مُرَّةَ قَالَ سَمِعْتُ عَبْدَ اللهِ بْنَ أَبِي أَوْفَى يَقُولُ كَانَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أَتَاهُ الرَّجُلُ بِصَدَقَةِ مَالِهِ صَلَّى عَلَيْهِ فَأَتَيْتُهُ بِصَدَقَةِ مَالِي فَقَالَ اللّٰهُمَّ صَلِّ عَلَى آلِ أَبِي أَوْفَى
আবদুল্লাহ্ বিন আবূ আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, কোন ব্যক্তি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার মালের যাকাত নিয়ে উপস্থিত হলে তিনি তার জন্য দুআ’ করলেনঃ “হে আল্লাহ্! আপনি আবূ আওফার পরিবারের প্রতি দয়া করুন”। [১৭৯৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عليُّ بن محمَّد: هو الطَّنافسي. وأخرجه البخاري (١٤٩٧)، ومسلم (١٠٧٨)، وأبو داود (١٥٩٠)، والنسائي ٥/ ٣١ من طريق شعبة بن الحجاج، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩١١١)، و"صحيح ابن حبان" (٩١٧) و (٣٢٧٤).
حَدَّثَنَا سُوَيْدُ بْنُ سَعِيدٍ حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ عَنْ الْبَخْتَرِيِّ بْنِ عُبَيْدٍ عَنْ أَبِيهِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أَعْطَيْتُمْ الزَّكَاةَ فَلَا تَنْسَوْا ثَوَابَهَا أَنْ تَقُولُوا اللّٰهُمَّ اجْعَلْهَا مَغْنَمًا وَلَا تَجْعَلْهَا مَغْرَمًا
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা যখন যাকাত দিবে তখন তার সওয়াবের কথা ভুলে যেও না এবং এ দুআ’ করোঃ “হে আল্লাহ্! আপনি এই যাকাতকে তওবা কবুলের উসীলা বানিয়ে দিন এবং একে ঋণ পরিশোধের (বা জরিমানার) পর্যায়ভুক্ত না করুন”। [১৭৯৭]
তাহকীক আলবানীঃ বানোয়াট।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * موضوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ موضوع، البختري بن عبید: ضعیف متروک ، وقال الحاکم: ’’ روی عن أبیہ عن أبي ہریرۃ أحادیث موضوعۃ ‘‘، (المدخل إلی الصحیح ص 124)، (انوار الصحیفہ ص 444)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، البَخْتَري بن عبيد متروك الحديث. وسويد بن سعيد ضعيف. وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" ٧/ ٤٥٢ من طريق سَلَمة بن بشر الدمشقي عن البختري بن عبيد، به.
حَدَّثَنَا أَبُو بِشْرٍ بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ كَثِيرٍ حَدَّثَنَا ابْنُ شِهَابٍ عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللهِ عَنْ أَبِيهِ عَنْ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ أَقْرَأَنِي سَالِمٌ كِتَابًا كَتَبَهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِي الصَّدَقَاتِ قَبْلَ أَنْ يَتَوَفَّاهُ اللهُ عَزَّ وَجَلَّ فَوَجَدْتُ فِيهِ فِي خَمْسٍ مِنْ الْإِبِلِ شَاةٌ وَفِي عَشْرٍ شَاتَانِ وَفِي خَمْسَ عَشْرَةَ ثَلَاثُ شِيَاهٍ وَفِي عِشْرِينَ أَرْبَعُ شِيَاهٍ وَفِي خَمْسٍ وَعِشْرِينَ بِنْتُ مَخَاضٍ إِلَى خَمْسٍ وَثَلَاثِينَ فَإِنْ لَمْ تُوجَدْ بِنْتُ مَخَاضٍ فَابْنُ لَبُونٍ ذَكَرٌ فَإِنْ زَادَتْ عَلَى خَمْسٍ وَثَلَاثِينَ وَاحِدَةً فَفِيهَا بِنْتُ لَبُونٍ إِلَى خَمْسَةٍ وَأَرْبَعِينَ فَإِنْ زَادَتْ عَلَى خَمْسٍ وَأَرْبَعِينَ وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّةٌ إِلَى سِتِّينَ فَإِنْ زَادَتْ عَلَى سِتِّينَ وَاحِدَةً فَفِيهَا جَذَعَةٌ إِلَى خَمْسٍ وَسَبْعِينَ فَإِنْ زَادَتْ عَلَى خَمْسٍ وَسَبْعِينَ وَاحِدَةً فَفِيهَا ابْنَتَا لَبُونٍ إِلَى تِسْعِينَ فَإِنْ زَادَتْ عَلَى تِسْعِينَ وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّتَانِ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ فَإِذَا كَثُرَتْ فَفِي كُلِّ خَمْسِينَ حِقَّةٌ وَفِي كُلِّ أَرْبَعِينَ بِنْتُ لَبُونٍ
আবদুল্লাহ্ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সালেম (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে একটি পত্র পড়ে শোনান, যা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার ইনতিকালের পূর্বে যাকাত সম্পর্কে লিখেছিলেন। আমি তাতে যে তথ্য পাই তা হলোঃ পাঁচ উটের যাকাত একটি বকরী, দশ উটে দু’টি বকরী, পনের উটে তিনটি বকরী, বিশ উটে চারটি বকরী এবং পচিশ থেকে পঁয়ত্রিশ উটে একটি “বিনতু মাখাদ” (পূর্ণ এক বছর বয়সের উষ্ট্রী), আর “বিনতু মাখাদ” না পাওয়া গেলে একটি “বিন লাবূন” (পূর্ণ দু’ বছর বয়সের উট)। উটের সংখ্যা পঁয়ত্রিশ থেকে একটি বেশি হলে পঁয়তাল্লিশ সংখ্যক পর্যন্ত একটি “বিনতু লাবূন”। উটের সংখ্যা পঁয়তাল্লিশ-এর একটি বেশি হলে ষাট সংখ্যক পর্যন্ত একটি “হিক্কাহ” (পূর্ণ তিন বছর বয়সের উষ্ট্রী)। উটের সংখ্যা ষাট-এর একটি বেশি হলে পঁচাত্তর সংখ্যক পর্যন্ত একটি “জাযাআহ” (পূর্ণ চার বছর বয়সের উষ্ট্রী)। উটের সংখ্যা পঁচাত্তরের চেয়ে একটি বেশি হলে, নব্বই সংখ্যক পর্যন্ত দু’টি “বিনতু লাবূন”। উটের সংখ্যা নব্বই থেকে একটি বেশি হলে এক শত বিশ সংখ্যক পর্যন্ত দু’টি হিক্কাহ্ যাকাত স্বরূপ দিতে হবে। এক শত বিশের অধিক প্রতি পঞ্চাশ উটে একটি হিক্কাহ এবং প্রতি চল্লিশ উটে একটি “বিনতু লাবূন”। [১৭৯৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. سليمانُ بن كثير -وإن كان في روايته عن الزُّهري كلامٌ- متابَع. وأخرجه أبو داود (١٥٦٨) و (١٥٦٩)، والترمذي (٦٢٦) من طريق سفيان بن حسين الواسطي، عن ابن شهاب الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٣٢) و (٤٦٣٤). وأخرجه أبو داود (١٥٧٠) من طريق يونُس بن يزيد الأيلي، عن ابن شهاب، قال: هذه نسخةُ كتابِ رسول الله ﷺ الذي كتبه في الصدقة وهي عند آل عمر بن الخطاب، قال ابن شهاب: أقرأنيها سالمُ بن عبد الله بن عمر فوعَيتُها على وجهها … قلنا: وهذه وجادة والإسناد صحيح، والوجادة عند أهل العلم معتبرة، وهي متابعة لسليمان بن كثير فيصح الحديث، والله أعلم. وأخرجه البيهقي في "السُّنن الكبرى" ٤/ ٨٨ من طريق سفيان بن حسين، عن الزهري، وقال بإثره: قال أبو عيسى في كتاب"العلل": سألت محمَّد ابن إسماعيل البخاري عن هذا الحديث، فقال: أرجو أن يكون محفوظا، وسفيان بن حسين صدوق. وانظر ما شاتي برقم (١٨٠٥).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَقِيلِ بْنِ خُوَيْلِدٍ النَّيْسَابُورِيُّ حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عَبْدِ اللهِ السُّلَمِيُّ حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ طَهْمَانَ عَنْ عَمْرِو بْنِ يَحْيَى بْنِ عُمَارَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَيْسَ فِيمَا دُونَ خَمْسٍ مِنْ الْإِبِلِ صَدَقَةٌ وَلَا فِي الْأَرْبَعِ شَيْءٌ فَإِذَا بَلَغَتْ خَمْسًا فَفِيهَا شَاةٌ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ تِسْعًا فَإِذَا بَلَغَتْ عَشْرًا فَفِيهَا شَاتَانِ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ أَرْبَعَ عَشْرَةَ فَإِذَا بَلَغَتْ خَمْسَ عَشْرَةَ فَفِيهَا ثَلَاثُ شِيَاهٍ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ تِسْعَ عَشْرَةَ فَإِذَا بَلَغَتْ عِشْرِينَ فَفِيهَا أَرْبَعُ شِيَاهٍ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ أَرْبَعًا وَعِشْرِينَ فَإِذَا بَلَغَتْ خَمْسًا وَعِشْرِينَ فَفِيهَا بِنْتُ مَخَاضٍ إِلَى خَمْسٍ وَثَلَاثِينَ فَإِذَا لَمْ تَكُنْ بِنْتُ مَخَاضٍ فَابْنُ لَبُونٍ ذَكَرٌ فَإِنْ زَادَتْ بَعِيرًا فَفِيهَا بِنْت لَبُونٍ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ خَمْسًا وَأَرْبَعِينَ فَإِنْ زَادَتْ بَعِيرًا فَفِيهَا حِقَّةٌ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ سِتِّينَ فَإِنْ زَادَتْ بَعِيرًا فَفِيهَا جَذَعَةٌ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ خَمْسًا وَسَبْعِينَ فَإِنْ زَادَتْ بَعِيرًا فَفِيهَا بِنْتَا لَبُونٍ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ تِسْعِينَ فَإِنْ زَادَتْ بَعِيرًا فَفِيهَا حِقَّتَانِ إِلَى أَنْ تَبْلُغَ عِشْرِينَ وَمِائَةً ثُمَّ فِي كُلِّ خَمْسِينَ حِقَّةٌ وَفِي كُلِّ أَرْبَعِينَ بِنْتُ لَبُونٍ
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ উটের সংখ্যা পাঁচ-এর কম হলে কোন যাকাত নাই। পাঁচ থেকে নয় পর্যন্ত উটে একটি বকরী, দশ থেকে চৌদ্দ পর্যন্ত উটে দু’টি বকরী, পনের থেকে উনিশ পর্যন্ত উটে তিনটি বকরী, বিশ থেকে চব্বিশ পর্যন্ত উটে চারটি বকরী, পঁচিশ থেকে পঁয়ত্রিশ পর্যন্ত উটে একটি বিনতু মাখাদ। যদি বিনতু মাখাদ না পাওয়া যায়, তবে একটি বিন লাবূন আদায় করতে হবে। উটের সংখ্যা বেড়ে পঁয়তাল্লিশ পর্যন্ত পৌঁছলে এতে একটি বিনতু লাবূন। উটের সংখ্যা বেড়ে পঁচাত্তর পৌঁছলে এতে দু’টি বিনতু লাবূন। উটের সংখ্যা বেড়ে এক শত বিশ পর্যন্ত পৌঁছলে এতে দু’টি হিক্কাহ। উটের সংখ্যা বেড়ে একশত বিশের অধিক হলে প্রতি পঞ্চাশ উটে একটি হিক্কাহ এবং প্রতি চল্লিশ উটে একটি বিনতু লাবূন আদায় করতে হবে। [১৭৯৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده قوي، حفص بن عبد الله السُّلَمي ثبت في إبراهيم بن طَهمان لملازمته له، كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" ٩/ ٤٨٥، وقد توبع. وأخرجه البخاري (١٤٠٥)، ومسلم (٩٧٩) (١)، وأبو داود (١٥٥٨) والترمذي (٦٣١) و (٦٣٢)، والنسائي ٥/ ١٧ و ١٨ و ٣٦ من طريق عمرو بن يحيى، ومسلم (٩٧٩) (٣) من طريق عمارة بن غزية، و (٩٧٩) (٤) من طريق محمَّد بن يحيى بن حبان، ثلاثتهم عن يحيى بن عمارة، به. واقتصروا جميعًا في زكاة الإبل على قوله ﷺ: "ليس فيما دون خمس ذود صدقة". وأخرجه البخاري (١٤٥٩) و (١٤٨٤)، والنسائي ٥/ ٣٦ من طريق محمَّد بن ْعبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، عن أبيه، عن أبي سعيد. واقتصر على القطعة التي سبقت الإشارة إليها. وهو في "مسند أحمد" (١١٠٣٠)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٦٨) و (٣٢٧٥). ويشهد للحديث بطوله حديث ابن عمر السالف قبله. وحديث أنس بن مالك عن أبي بكر الصديق عند البخاري (١٤٥٤)، وأحمد (٧٢).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ وَمُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى وَمُحَمَّدُ بْنُ مَرْزُوقٍ قَالُوا حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللهِ بْنِ الْمُثَنَّى حَدَّثَنِي أَبِي عَنْ ثُمَامَةَ حَدَّثَنِي أَنَسُ بْنُ مَالِكٍ «أَنَّ أَبَا بَكْرٍ الصِّدِّيقَ كَتَبَ لَهُ بِسْمِ اللهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ هَذِهِ فَرِيضَةُ الصَّدَقَةِ الَّتِي فَرَضَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى الْمُسْلِمِينَ الَّتِي أَمَرَ اللهُ عَزَّ وَجَلَّ بِهَا رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَإِنَّ مِنْ أَسْنَانِ الْإِبِلِ فِي فَرَائِضِ الْغَنَمِ مَنْ بَلَغَتْ عِنْدَهُ مِنْ الْإِبِلِ صَدَقَةُ الْجَذَعَةِ وَلَيْسَ عِنْدَهُ جَذَعَةٌ وَعِنْدَهُ حِقَّةٌ فَإِنَّهَا تُقْبَلُ مِنْهُ الْحِقَّةُ وَيَجْعَلُ مَكَانَهَا شَاتَيْنِ إِنْ اسْتَيْسَرَتَا أَوْ عِشْرِينَ دِرْهَمًا وَمَنْ بَلَغَتْ عِنْدَهُ صَدَقَةُ الْحِقَّةِ وَلَيْسَتْ عِنْدَهُ إِلَّا بِنْتُ لَبُونٍ فَإِنَّهَا تُقْبَلُ مِنْهُ بِنْتُ لَبُونٍ وَيُعْطِي مَعَهَا شَاتَيْنِ أَوْ عِشْرِينَ دِرْهَمًا وَمَنْ بَلَغَتْ صَدَقَتُهُ بِنْتَ لَبُونٍ وَلَيْسَتْ عِنْدَهُ وَعِنْدَهُ حِقَّةٌ فَإِنَّهَا تُقْبَلُ مِنْهُ الْحِقَّةُ وَيُعْطِيهِ الْمُصَدِّقُ عِشْرِينَ دِرْهَمًا أَوْ شَاتَيْنِ وَمَنْ بَلَغَتْ صَدَقَتُهُ بِنْتَ لَبُونٍ وَلَيْسَتْ عِنْدَهُ وَعِنْدَهُ بِنْتُ مَخَاضٍ فَإِنَّهَا تُقْبَلُ مِنْهُ ابْنَةُ مَخَاضٍ وَيُعْطِي مَعَهَا عِشْرِينَ دِرْهَمًا أَوْ شَاتَيْنِ وَمَنْ بَلَغَتْ صَدَقَتُهُ بِنْتَ مَخَاضٍ وَلَيْسَتْ عِنْدَهُ وَعِنْدَهُ ابْنَةُ لَبُونٍ فَإِنَّهَا تُقْبَلُ مِنْهُ بِنْتُ لَبُونٍ وَيُعْطِيهِ الْمُصَدِّقُ عِشْرِينَ دِرْهَمًا أَوْ شَاتَيْنِ فَمَنْ لَمْ يَكُنْ عِنْدَهُ ابْنَةُ مَخَاضٍ عَلَى وَجْهِهَا وَعِنْدَهُ ابْنُ لَبُونٍ ذَكَرٌ فَإِنَّهُ يُقْبَلُ مِنْهُ وَلَيْسَ مَعَهُ شَيْءٌ».
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে লিখে পাঠানঃ বিসমিল্লাহির রহ্মানির রাহীম। এটি যাকাতের বিধান, যা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহ্র নির্দেশে মুসলমানদের জন্য ফরয করেছেন। উটের যত সংখ্যকে (যাকাত বাবদ) বকরী প্রদান করতে হয়, তারপর থেকে তার নিকট একটি জাযাআহ যাকাত বাবদ প্রদানের সম-সংখ্যক উট আছে, কিন্তু জাযাআহ নাই, তবে হিক্কাহ্ আছে, তার নিকট থেকে হিক্কাহ্ গ্রহণ করা হবে, উপরন্তু সহজলভ্য্ হলে তার থেকে দু’টি বকরী অথবা বিশ দিরহাম নেয়া হবে। যার উটের সংখ্যা একটি হিক্কাহ্ প্রদানের পর্যায়ে পৌঁছেছে, কিন্তু তার নিকট হিক্কাহ্ নাই, তবে বিনতু লাবূন আছে, তার নিকট থেকে (যাকাত স্বরূপ) বিনতু লাবূন গ্রহণ করা হবে, উপরন্তু তার থেকে সহজলভ্য হলে দু’টি বকরী অথবা বিশ দিরহাম আদায় করা হবে। যার উটের সংখ্যা একটি বিনতু লাবূন প্রদানের পর্যায়ে পৌঁছেছে, কিন্তু তার নিকট বিনতু লাবূন নাই, তবে হিক্কাহ্ আছে, তার নিকট থেকে হিক্কাহ্ গ্রহণ করা হবে এবং যাকাত উসূলকারী তাকে দু’টি বকরী অথবা বিশ দিরহাম প্রদান করবে। যার যাকাত বিনতু লাবূন প্রদানের পর্যায়ে পৌঁছেছে কিন্তু তার নিকট বিনতু লাবূন নাই, তবে বিনতু মাখাদ আছে, তার থেকে বিনতু মাখাদ গ্রহণ করা হবে, উপরন্তু তার থেকে দু’টি বকরী অথবা বিশ দিরহাম উসূল করা হবে। যার যাকাত বিনতু মাখাদ প্রদানের পর্যায়ে পৌঁছেছে, কিন্তু তার নিকট বিনতু মাখাদ নাই, তবে বিনতু লাবূন আছে, তার থেকে বিনতু লাবূন গ্রহণ করা হবে এবং যাকাত উসূলকারী তাকে দু’টি বকরী অথবা বিশ দিরহাম ফেরত দিবে। বিনতু মাখাদ ফরয হওয়ার ক্ষেত্রে তা না থাকলে এবং বিনতু লাবূন থাকলে তাই গ্রহণ করা হবে এবং যাকাতদাতাকে অতিরিক্ত কিছু দিতে হবে না। [১৮০০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٤٤٨) و (١٤٥٣) عن محمَّد بن عبد الله بن المثنى، بهذا الإسناد. وزاد: ومن بلغت عنده صدقة الحقة، وليست عنده الحقة، وعنده الجذعة، فإنها تقبل منه الجذعة ويعطيه المصدق عشرين درهما أو شاتين. وأخرجه أبو داود (١٥٦٧)، والنسائي ٥/ ١٨ - ٢٣ و ٢٧ - ٢٩ من طريق حماد ابن سلمة، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، به. ولم يذكر حماد في روايته: من بلغت صدقته ابنة مخاض وليست عنده، وعنده ابنة لبون. وهو في "مسند أحمد" (٧٢)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٦٦).