হাদীস বিএন


সুনান ইবনু মাজাহ





সুনান ইবনু মাজাহ (2462)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، أَنْبَأَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، قَالَ قُلْتُ لِطَاوُسٍ يَا أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ لَوْ تَرَكْتَ هَذِهِ الْمُخَابَرَةَ فَإِنَّهُمْ يَزْعُمُونَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْهُ ‏.‏ فَقَالَ أَىْ عَمْرُو إِنِّي أُعِينُهُمْ وَأُعْطِيهِمْ وَإِنَّ مُعَاذَ بْنَ جَبَلٍ أَخَذَ النَّاسَ عَلَيْهَا عِنْدَنَا وَإِنَّ أَعْلَمَهُمْ - يَعْنِي ابْنَ عَبَّاسٍ - أَخْبَرَنِي أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَمْ يَنْهَ عَنْهَا وَلَكِنْ قَالَ ‏ "‏ لأَنْ يَمْنَحَ أَحَدُكُمْ أَخَاهُ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَأْخُذَ عَلَيْهَا أَجْرًا مَعْلُومًا ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, (আমর বিন দীনার) বলেন, আমি তাঊস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বললাম, হে আবূ আবদুর রহমান! আপনি যদি জমি বর্গা দেয়া ত্যাগ করতেন! কারণ লোকেরা বলাবলি করে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাগচাষ নিষিদ্ধ করেছেন। তিনি বলেন, হে আমর! আমি লোকেদের সাহায্য করি এবং তাদের দান করি। মু আয বিন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের উপস্থিতিতে লোকেদের সাথে এরূপ লেনদেন করেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাগচাষ নিষেধ করেননি। বরং তিনি বলেছেনঃ তোমাদের কেউ যদি তার ভাইকে বিনা লাভে জমি দিতো তবে সেটা তার জন্য নির্দিষ্ট পরিমাণ বিনিময় গ্রহণ করে দেয়ার চেয়ে অধিক কল্যাণকর হতো। [২৪৬২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٢٣٣٠)، ومسلم (١٥٥٠) (١٢١) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد، دون قوله: "وإن معاذ بن جبل أخذ الناس عليها عندنا" قال الحافظ في "الفتح" ٥/ ١٥: وكأن البخاري حذف هذه الجملة لما فيها من الانقطاع بين طاووس ومعاذ. وقد سلف عند المصنف برقم (٢٤٥٧) مختصرًا، وانظر تمام تخريجه هناك، وسيأتي برقم (٢٤٦٤). وقوله: نهى عنه، أي: عن إعطاء الأرض بجزء مما يخرج منها.









সুনান ইবনু মাজাহ (2463)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ ثَابِتٍ الْجَحْدَرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ، عَنْ خَالِدٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ طَاوُسٍ، أَنَّ مُعَاذَ بْنَ جَبَلٍ، أَكْرَى الأَرْضَ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَبِي بَكْرٍ وَعُمَرَ وَعُثْمَانَ عَلَى الثُّلُثِ وَالرُّبُعِ فَهُوَ يَعْمَلُ بِهِ إِلَى يَوْمِكَ هَذَا ‏.‏




মুআয বিন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) , উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) – এর যুগে এক-তৃতীয়াংশ ও এক-চতুর্থাংশ ফসল প্রদানের শর্তে জমি বর্গা দিতেন এবং তোমার এই কালেও তিনি তাই করছেন। [২৪৬৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، طاوس لم یسمع من معاذ رضي اللّٰہ عنہ شیئًا (جامع التحصیل، للعلائي ص 201)، (انوار الصحیفہ ص 467)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لانقطاعه بين طاووس ومعاذ. عبد الوهَّاب: هو ابن عبد المجيد الثقفي، وخالد: هو ابن مهران الحذاء، ومجاهد: هو ابن جبر المكي. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٤٣٧٠) من طريق خالد الحذَّاء، بهذا الإسناد.









সুনান ইবনু মাজাহ (2464)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ خَلاَّدٍ الْبَاهِلِيُّ، وَمُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ طَاوُسٍ، قَالَ قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ إِنَّمَا قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لأَنْ يَمْنَحَ أَحَدُكُمْ أَخَاهُ الأَرْضَ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَأْخُذَ لَهَا خَرَاجًا مَعْلُومًا ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই বলেছেনঃ তোমাদের কেউ তার ভাইকে নিঃস্বার্থভাবে চাষাবাদের জন্য জমি দান করলে সেটা নির্দিষ্ট পরিমাণ উৎপাদিত ফসল প্রদানের শর্তে দেয়ার চেয়ে তার জন্য অধিক কল্যাণকর। [২৪৬৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو بكر بن خلاد: اسمه محمَّد، ووكيع: هو ابن الجراح، وسفيان: هو الثوري. وقد سلف برقم (٢٤٥٧) و (٦٤٦٢).









সুনান ইবনু মাজাহ (2465)


حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ مَسْعَدَةَ، حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ الْحَارِثِ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ أَبِي عَرُوبَةَ، عَنْ يَعْلَى بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ، قَالَ كُنَّا نُحَاقِلُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَزَعَمَ أَنَّ بَعْضَ عُمُومَتِهِ أَتَاهُمْ فَقَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ كَانَتْ لَهُ أَرْضٌ فَلاَ يُكْرِيهَا بِطَعَامٍ مُسَمًّى ‏"‏ ‏.‏




রাফি‘ বিন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে জমি বর্গাচাষে দিতাম। আমার কোন এক চাচা আমাদের নিকট এসে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যার জমি আছে, সে যেন তা নির্দিষ্ট পরিমাণ খাদ্যশস্য (উৎপন্ন ফসল) প্রদানের শর্তে চাষাবাদ করতে না দেয়। [২৪৬৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح.خالد بن الحارث روى عن سعيد قبل الاختلاط، ثم هو متابع. وأخرجه مسلم (١٥٤٨) (١١٤)، وأبو داود (٣٣٩٥)، والنسائي ٧/ ٤٢ من طريق سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٥٨٢٣) و (١٧٥٣٩). وانظر ما سلف برقم (٢٤٥٩).









সুনান ইবনু মাজাহ (2466)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَامِرِ بْنِ زُرَارَةَ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ زَرَعَ فِي أَرْضِ قَوْمٍ بِغَيْرِ إِذْنِهِمْ فَلَيْسَ لَهُ مِنَ الزَّرْعِ شَىْءٌ وَتُرَدُّ عَلَيْهِ نَفَقَتُهُ ‏"‏ ‏.‏




রাফি‘ বিন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, কোন ব্যক্তি অন্য সম্প্রদায়ের জমি তাদের অনুমতি ছাড়া চাষাবাদ করলে সে উৎপন্ন ফসলের কিছুই পাবে না, তবে সে তার চাষাবাদের খরচপত্র ফেরত পাবে। [২৪৬৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (3403) ترمذي (1366)، (انوار الصحیفہ ص 467)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. شريك -وهو ابن عبد الله النخعي، وإن كان سيئ الحفظ- متابع. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وعطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه أبو داود (٣٤٠٣)، والترمذي (١٤١٨) من طريق شريك، لهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٥٨٢١). وأخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (٢٩٦)، ومن طريقه البيهقي ٦/ ١٣٦ من طريق قيس بن الربيع، عن أبي إسحاق، به. وقيل -وإن كان ضعيفًا- يعتبر به في المتابعات. وأخرجه الترمذيُّ بإثر (١٤١٨) من طريق عقبة بن الأصم، عن عطاء، به. وعقبة ضعيف. وأخرجه بنحوه أبو داود (٣٣٩٩)، والنسائي في "الكبرى" (٣٨٨٩) من طريق سعيد بن المسيب، عن رافع بن خديج، وإسناده صحيح. وأخرجه بمعناه أبو داود (٢٤٠٢) من طريق عبد الرحمن بن أبي نُعم، عن رافع. وإسناده حسن في المتابعات.









সুনান ইবনু মাজাহ (2467)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، وَسَهْلُ بْنُ أَبِي سَهْلٍ، وَإِسْحَاقُ بْنُ مَنْصُورٍ، قَالُوا حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَامَلَ أَهْلَ خَيْبَرَ بِالشَّطْرِ مِمَّا يَخْرُجُ مِنْ ثَمَرٍ أَوْ زَرْعٍ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারবাসীদেরকে উৎপন্ন ফল বা ফসলের অর্ধেক প্রদানের শর্তে তথাকার বাগানের কাজে নিয়োজিত করেন। [২৪৬৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (٢٢٨٥)، ومسلم (١٥٥١)، وأبو داود (٣٠٠٨) و (٣٤٠٨) و (٣٤٠٩)، والترمذي (١٤٣٩)، والنسائي ٧/ ٥٣ من طرق عن نافع، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٦٣). وهذا الحديث كما قال صاحب "الفتح": هو عمدة من أجاز المزارعة والمخابرة لتقرير النبي ﷺ لذلك واستمراره على عهد أبي بكر إلى أن أجلاهم عمر ؓ إلى تيماء وأريحا كما في حديث ابن عمر عند البخاري (٢٣٣٨). واستدل به على جواز المساقاة في النخل والكرم وجميع الشجر الذي من شأنه أن يثمر بجزء معلوم يجعل للعامل من الثمرة، وبه قال الجمهور.









সুনান ইবনু মাজাহ (2468)


حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ تَوْبَةَ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، عَنِ ابْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنِ الْحَكَمِ بْنِ عُتَيْبَةَ، عَنْ مِقْسَمٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَعْطَى خَيْبَرَ أَهْلَهَا عَلَى النِّصْفِ نَخْلُهَا وَأَرْضُهَا ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার এর খেজুর বাগান ও জমি তথাকার বাসিন্দাদের (উৎপন্ন খেজুর ও শস্যের) অর্ধেক প্রদানের শর্তে চাষাবাদ করতে দেন। [২৪৬৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح لغيره




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد ضعيف من أجل ابن أبي ليلى -واسمه محمَّد ابن عبد الرحمن- فإنه سيئ الحفظ. هشيم: هو ابن يشير، ومقسم: هو ابن بُجرة، ويقال: نجدة. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٥٥) من طريق هشيم، بهذا الإسناد. وأخرجه مطولًا بنحوه أبو داود (٣٤١٠) و (٣٤١١) من طريق ميمون بن مهران، عن مقسم، به. وقد سلف عند المصنف برقم (١٨٢٠) من هذه الطريق.









সুনান ইবনু মাজাহ (2469)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ الْمُنْذِرِ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، عَنْ مُسْلِمٍ الأَعْوَرِ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ لَمَّا افْتَتَحَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَيْبَرَ أَعْطَاهَا عَلَى النِّصْفِ ‏.‏




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার এলাকা জয় করার পর তা উৎপন্ন শস্যের অর্ধেক প্রদানের শর্তে চাষাবাদ করতে দেন। [২৪৬৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح لغيره




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف مسلم الأعور، وهو ابن كيسان.









সুনান ইবনু মাজাহ (2470)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، عَنْ إِسْرَائِيلَ، عَنْ سِمَاكٍ، أَنَّهُ سَمِعَ مُوسَى بْنَ طَلْحَةَ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، يُحَدِّثُ عَنْ أَبِيهِ، قَالَ مَرَرْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي نَخْلٍ فَرَأَى قَوْمًا يُلَقِّحُونَ النَّخْلَ فَقَالَ ‏"‏ مَا يَصْنَعُ هَؤُلاَءِ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا يَأْخُذُونَ مِنَ الذَّكَرِ فَيَجْعَلُونَهُ فِي الأُنْثَى ‏.‏ قَالَ ‏"‏ مَا أَظُنُّ ذَاكَ يُغْنِي شَيْئًا ‏"‏ ‏.‏ فَبَلَغَهُمْ فَتَرَكُوهُ وَنَزَلُوا عَنْهَا فَبَلَغَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏"‏ إِنَّمَا هُوَ ظَنٌّ إِنْ كَانَ يُغْنِي شَيْئًا فَاصْنَعُوهُ فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ وَإِنَّ الظَّنَّ يُخْطِئُ وَيُصِيبُ وَلَكِنْ مَا قُلْتُ لَكُمْ قَالَ اللَّهُ فَلَنْ أَكْذِبَ عَلَى اللَّهِ ‏"‏ ‏.‏




তালহাহ বিন উবায়দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে একটি খেজুর বাগান অতিক্রম করছিলাম। তিনি লোকদেরকে দেখলেন যে, তারা নর খেজুর গাছের কেশর মাদী খেজুর গাছের কেশরের সাথে সংযোজন করছে। তিনি লোকদেরকে জিজ্ঞাসা করলেনঃ এরা কী করছে? তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তারা নর গাছের কেশর নিয়ে মাদী গাছের কেশরের সাথে সংযোজন করছে। তিনি বলেনঃ এটা কোন উপকারে আসবে বলে মনে হয় না। লোকজন তাঁর মন্তব্য অবহিত হয়ে উক্ত প্রক্রিয়া ত্যাগ করলো। ফলে খেজুরের উৎপাদন হ্রাস পেলো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিষয়টি অবহিত হয়ে বলেনঃ এটা তো ছিল একটা ধারণা মাত্র। ঐ প্রক্রিয়ায় কোন উপকার হলে তোমরা তা করো। আমি (এ বিষয়ে) তোমাদের মতই একজন মানুষ। ধারণা কখনো ভুলও হয়, কখনো ঠিকও হয়। কিন্তু আমি তোমাদের এভাবে যা বলি “আল্লাহ বলেছেন”, সেক্ষেত্রে আমি কখনো আল্লাহ্‌র উপর মিথ্যা আরোপ করবো না। [২৪৭০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن من أجل سماك، وهو ابن حرب. إسرائيل: هو ابن يونس السبيعي. وأخرجه مسلم (٢٣٦١) من طريق أبي عوانة، عن سماك، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٣٩٥) و (١٣٩٩). وله شاهد من حديث رافع بن خديج عند مسلم (٢٣٦٢)، ولفظ المرفوع منه: "إنما أنا بشر، إذا أمرتكم بشئ من دينكم، فخذوا به، وإذا أمرتكم بشئ من رأي، فإنما أنا بشر". وآخر من حديث أنس وعائشة، وهو الآتي بعده. قال الإمام النووي في "شرح مسلم" ١٥/ ١١٦: قال العلماء: قوله ﷺ:"من رأيي" أي: في أمر الدنيا ومعايشها لا على التشريع، فأما ما قاله باجتهاده ﷺ ورآه شرعًا فيجبُ العملُ به، وليس إبار النخل من هذا النوع، بل من النوع المذكور قبله، أي في قوله: "إنما ظننت ظنا فلا تؤاخذوني بالظن" مع أن لفظة الرأي إنما أتى بها عكرمة على المعنى، لقوله في آخر الحديث: قال عكرمة: أو نحو هذا. فلم يُخبر بلفظ النبي ﷺ محققًا، قال العلماء: ولم يكن هذا القول خبرأ وإنما كان ظنًا كما بينه في هذه الروايات، قال: ورأيه ﷺ في أمور المعايش وظنه كغيره، فلا يمتنع وقوع مثل هذا، ولا نقص في ذلك، وسببه تعلُّق همهم بالآخرة ومعارفها.









সুনান ইবনু মাজাহ (2471)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا عَفَّانُ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، حَدَّثَنَا ثَابِتٌ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، وَهِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم سَمِعَ أَصْوَاتًا ‏.‏ فَقَالَ ‏"‏ مَا هَذَا الصَّوْتُ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا النَّخْلُ يُؤَبِّرُونَهُ فَقَالَ ‏"‏ لَوْ لَمْ يَفْعَلُوا لَصَلَحَ ‏"‏ ‏.‏ فَلَمْ يُؤَبِّرُوا عَامَئِذٍ فَصَارَ شِيصًا فَذَكَرُوا لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏"‏ إِنْ كَانَ شَيْئًا مِنْ أَمْرِ دُنْيَاكُمْ فَشَأْنَكُمْ بِهِ وَإِنْ كَانَ شَيْئًا مِنْ أُمُورِ دِينِكُمْ فَإِلَىَّ ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু শোরগোল শুনতে পেয়ে জিজ্ঞেস করেন, এটা কিসের শোরগোল? সাহাবীগণ বলেন, লোকজন নর খেজুর গাছের কেশর মাদী খেজুর গাছের কেশরের সাথে সংযোগ করছে। তিনি বলেনঃ তারা এরূপ না করলেই ঠিক হতো। অতএব তারা সে বছর উক্ত প্রক্রিয়া ত্যাগ করলো। এতে খেজুরের ফলন হ্রাস পেলো। তারা বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে জানালে তিনি বলেনঃ তোমাদের একান্তই পার্থিব কোন বিষয় হলে সেটা তোমাদের নিজস্ব ব্যাপার এবং তোমাদের দ্বীনের কোন বিষয় হলে তা আমার কাছে রুজু করবে। [২৪৭১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عفان: هو ابن مسلم، وحماد: هو ابن سلمة، وثابت: هو ابن أسلم البناني. وأخرجه مسلم (٢٣٦٣) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٢٥٤٤) و (٢٤٩٢٠)، و "صحيح ابن حبان" (٢٢). قوله: "شيصًا" هو التمر الذي لا يشتد.









সুনান ইবনু মাজাহ (2472)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ خِرَاشِ بْنِ حَوْشَبٍ الشَّيْبَانِيُّ، عَنِ الْعَوَّامِ بْنِ حَوْشَبٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ الْمُسْلِمُونَ شُرَكَاءُ فِي ثَلاَثٍ فِي الْمَاءِ وَالْكَلإِ وَالنَّارِ وَثَمَنُهُ حَرَامٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو سَعِيدٍ يَعْنِي الْمَاءَ الْجَارِيَ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, মুসলমানগণ তিনটি বিষয়ে যৌথ অংশীদার- পানি, ঘাস ও আগুনে, এগুলোর মূল্য নেয়া হারাম। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অর্থাৎ প্রবাহমান পানি। [২৪৭২]

তাহকিক আলবানিঃ (আরবি) অর্থাৎ তার মূল্য নেয়া হারাম - কথাটি ব্যতীত সহীহ




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح دون وثمنه حرام




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف جدًا، عبد اللّٰہ بن خراش: ضعیف ، والحدیث صحیح دون قولہ’’ وثمنہ حرام ‘‘، (انوار الصحیفہ ص 468)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره دون قوله: "وثمنه حرام"، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله ابن خراش بن حوشب. عبد الله بن سعيد: هو الكندي، ومجاهد: هو ابن جبر المكي. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (١١١٠٥)، وابن عدي في "الكامل" ٤/ ١٥٢٥، والمزي في "تهذيب الكمال" ١٤/ ٤٥٥ من طريق عبد الله بن خراش، بهذا الإسناد. وله دون قوله: "وثمنه حرام" شاهد من حديث رجل من الصحابة عند أبي داود (٣٤٧٧)، وإسناده صحيح. وآخر من حديث أبي هريرة، وهو الآتي بعده. قال أبو عُبيد في "الأموال" ص ١٢٥: أباح رسول الله ﷺ للناس كافة الماء والكلأ والنار؟ وذلك أن ينزل القوم في أسفارهم وبواديهم بالأرض فيها النبات الذي أخرجه الله للأنعام مما لا ينصب فيه أحد بحرث ولا غرس ولا سقي، يقول: فهو لمن سبق إليه، وجعلهم فيه أسوة، ليس لأحد أن يحتظر منه شيئًا دون غيره، ولكن ترعاه أنعامهم ومواشيهم ودوابهم معًا، وترد الماء الذي فيه كذلك أيضًا.









সুনান ইবনু মাজাহ (2473)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَزِيدَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ ثَلاَثٌ لاَ يُمْنَعْنَ الْمَاءُ وَالْكَلأُ وَالنَّارُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তিনটি জিনিস সংগ্রহে (কাউকে) বাধা দেয়া যাবে না- পানি, ঘাস ও আগুন। [২৪৭৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح.سفيان: هو ابن عيينة، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز. وأخرجه أبو عبيد في "الأموال" (٧٣١) من طريق الليث بن سعد، عن أبي الزناد، بهذا الإسناد.









সুনান ইবনু মাজাহ (2474)


حَدَّثَنَا عَمَّارُ بْنُ خَالِدٍ الْوَاسِطِيُّ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ غُرَابٍ، عَنْ زُهَيْرِ بْنِ مَرْزُوقٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ زَيْدِ بْنِ جُدْعَانَ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّهَا قَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الشَّىْءُ الَّذِي لاَ يَحِلُّ مَنْعُهُ قَالَ الْمَاءُ وَالْمِلْحُ وَالنَّارُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَذَا الْمَاءُ قَدْ عَرَفْنَاهُ فَمَا بَالُ الْمِلْحِ وَالنَّارِ قَالَ ‏"‏ يَا حُمَيْرَاءُ مَنْ أَعْطَى نَارًا فَكَأَنَّمَا تَصَدَّقَ بِجَمِيعِ مَا أَنْضَجَتْ تِلْكَ النَّارُ وَمَنْ أَعْطَى مِلْحًا ‏.‏ فَكَأَنَّمَا تَصَدَّقَ بِجَمِيعِ مَا طَيَّبَ ذَلِكَ الْمِلْحُ وَمَنْ سَقَى مُسْلِمًا شَرْبَةً مِنْ مَاءٍ حَيْثُ يُوجَدُ الْمَاءُ فَكَأَنَّمَا أَعْتَقَ رَقَبَةً وَمَنْ سَقَى مُسْلِمًا شَرْبَةً مِنْ مَاءٍ حَيْثُ لاَ يُوجَدُ الْمَاءُ فَكَأَنَّمَا أَحْيَاهَا ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! এমন কী জিনিস আছে যা সংগ্রহে বাধা দেয়া হালাল নয়? তিনি বলেনঃ পানি, লবণ ও আগুন। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! এই পানি সম্পর্কে তো আমরা জানি কিন্তু লবণ ও আগুনের ব্যাপারে কেন বাধা দেয়া যাবে না? তিনি বলেনঃ হে হুমায়রা! যে ব্যক্তি আগুন দান করলো, সে যেন ঐ আগুন দিয়ে রান্না করা যাবতীয় খাদ্যই দান করলো। যে ব্যক্তি লবণ দান করলো, ঐ লবণে খাদ্য যতোটা সুস্বাদু হলো তা সবই যেন সে দান করলো। যে ব্যক্তি কোন মুসলমানকে এমন স্থানে পানি পান করালো, যেখানে তা সহজলভ্য, সে যেন একটি গোলামকে দাসত্বমুক্ত করলো এবং যে ব্যক্তি কোন মুসলমানকে এমন স্থানে পানি পান করালো, যেখানে তা দুষ্প্রাপ্য, সে যেন তাকে জীবন দান করলো। [২৪৭৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، ابن جدعان: ضعیف ، وتلمیذہ زہیر بن مرزوق: مجہول (تقریب: 2050) ، وعلي بن غراب عنعن (کان یدلس: تق 4783) ، وللحدیث شاہدان ضعیفان جدًا، (انوار الصحیفہ ص 468)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لتدليس علي بن غراب، وجهالة زهير بن مرزوق، وضعف علي بن زيد بن جدعان. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٦٥٩٢)، والمزي في ترجمة زهير من "تهذيب الكمال" ٩/ ٤١٩ من طريق علي بن غراب، بهذا الإسناد.









সুনান ইবনু মাজাহ (2475)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي عُمَرَ الْعَدَنِيُّ، حَدَّثَنَا فَرَجُ بْنُ سَعِيدِ بْنِ عَلْقَمَةَ بْنِ سَعِيدِ بْنِ أَبْيَضَ بْنِ حَمَّالٍ، حَدَّثَنِي عَمِّي، ثَابِتُ بْنُ سَعِيدِ بْنِ أَبْيَضَ بْنِ حَمَّالٍ عَنْ أَبِيهِ، سَعِيدٍ عَنْ أَبِيهِ، أَبْيَضَ بْنِ حَمَّالٍ ‏.‏ أَنَّهُ اسْتَقْطَعَ الْمِلْحَ الَّذِي يُقَالُ لَهُ مِلْحُ سَدِّ مَأْرِبٍ ‏.‏ فَأَقْطَعَهُ لَهُ ثُمَّ إِنَّ الأَقْرَعَ بْنَ حَابِسٍ التَّمِيمِيَّ أَتَى رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي قَدْ وَرَدْتُ الْمِلْحَ فِي الْجَاهِلِيَّةِ وَهُوَ بِأَرْضٍ لَيْسَ بِهَا مَاءٌ وَمَنْ وَرَدَهُ أَخَذَهُ وَهُوَ مِثْلُ الْمَاءِ الْعِدِّ ‏.‏ فَاسْتَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَبْيَضَ بْنَ حَمَّالٍ فِي قَطِيعَتِهِ فِي الْمِلْحِ ‏.‏ فَقَالَ قَدْ أَقَلْتُكَ مِنْهُ عَلَى أَنْ تَجْعَلَهُ مِنِّي صَدَقَةً ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ هُوَ مِنْكَ صَدَقَةٌ وَهُوَ مِثْلُ الْمَاءِ الْعِدِّ مَنْ وَرَدَهُ أَخَذَهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَرَجٌ وَهُوَ الْيَوْمَ عَلَى ذَلِكَ مَنْ وَرَدَهُ أَخَذَهُ ‏.‏ قَالَ فَقَطَعَ لَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَرْضًا وَنَخْلاً بِالْجُرْفِ جُرْفِ مُرَادٍ مَكَانَهُ حِينَ أَقَالَهُ مِنْهُ ‏.‏




আবয়াদ বিন হাম্মাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি সাদ্দ মা‘রিব নামক লবণ খনিটি জায়গিররূপে প্রার্থনা করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে সেটি জায়গিররূপে দান করলেন। অতঃপর আকরা বিন হাবিস আত-তামীমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বলেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! জাহিলী যুগে আমি লবণের খনিতে গিয়েছিলাম। ঐ এলাকায় কোন পানি নাই। যে ব্যক্তিই সেখানে যায় সে-ই কিছু লবণ সংগ্রহ করে নেয়। তা প্রবাহিত পানির মতই পর্যাপ্ত। (এ কথা শুনে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবয়াদ বিন হাম্মালের নিকট লবণের চুক্তির প্রত্যাহার চাইলেন। আব্‌য়াদ বিন হাম্মাল বলেন, আমি আপনার সাথে চুক্তি রদ করতে প্রস্তুত এই শর্তে যে, সেটিকে আপনি আমার পক্ষ থেকে দানরূপে গণ্য করবেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তা তোমার পক্ষ থেকে দান হিসেবেই গণ্য হবে। আর তা প্রবাহমান পানির ন্যায়, যে-ই সেখানে যাবে তা নিতে পারবে। অধস্তন রাবী ফারাজ ইবনুসাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সেটা বর্তমানেও সেভাবেই আছে। যে-ই সেখানে যায়, সে তা থেকে সংগ্রহ করে। তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে সেটি ফেরত নেয়ার বিনিময়ে তাকে জুরুফ মুরাদ নামক স্থানের এক খণ্ড কৃষিভূমি ও একটি খেজুর বাগান জায়গিররূপে দান করেন। [২৪৭৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (3066)، (انوار الصحیفہ ص 468)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن، وهذا إسناد ضعيف لجهالة ثابت بن سعيد بن أبيض وأبيه لكنهما متابعان كما سيأتي. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ٥/ ٥٢٣، والدارمي (٢٦٠٨)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٤٧٠)، والطبراني في "الكبير" (٨٠٨)، والدارقطني (٣٠٧٧) و (٤٥٢٠) من طريق فرج بن سعيد، بهذا الإسناد. وصححه الضياء (١٢٨٢). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٧٣٤) من طريق بقية، عن سفيان بن عيينة، عن ابن أبيض بن حمال، عن أبيه بنحوه. وبقية مدلس، وابن أبيض -وهو سعيد- مجهول، وهو منقطع بين سفيان وابن أبيض، بينهما ثابت بن سعيد فيما يظهر. وأخرجه أبو داود (٣٠٦٤)، والترمذي (١٤٣٥) و (١٤٣٦)، والنسائي في "الكبرى" (٥٧٣٦)، وابن حبان (٤٤٩٩) من طريق محمَّد بن يحيى بن قيس المأربي، عن أبيه، عن ثمامة ابن شراحيل، عن سمي بن قيس، عن شمير بن عبد المدان، عن أببض بن حمال بنحوه. وقال الترمذيُّ: حديث حسن غريب. مع أن سمي بن قيس وشيخه شمير مجهولان. وأخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (٣٤٦)، وابن أبي شببة ١٢/ ٣٥٦، والبيهقي ٦/ ١٤٩ من طريق ابن المبارك، عن معمر، عن يحيى بن قيس، عن رجل، عن أبيض بن حمال. وهذا سند معضل. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٧٣٢) و (٥٧٣٣) و (٥٧٣٥) من طريق يحيى ابن قيس، عن أبيض، به. وهذا إسناد منقطع بل معضل، بين يحيى وأبيض ثلاثة، هم ثمامة وسمي وشمير.









সুনান ইবনু মাজাহ (2476)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ أَبِي الْمِنْهَالِ، سَمِعْتُ إِيَاسَ بْنَ عَبْدٍ الْمُزَنِيَّ، وَرَأَى، أُنَاسًا يَبِيعُونَ الْمَاءَ فَقَالَ لاَ تَبِيعُوا الْمَاءَ فَإِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى أَنْ يُبَاعَ الْمَاءُ ‏.‏




ইয়াস বিন আবদুল মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি কিছু লোককে পানি বিক্রয় করতে দেখে বলেন, তোমরা পানি বিক্রয় করো না। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে পানি বিক্রয় করতে নিষেধ করতে শুনেছি। [২৪৭৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو المنهال: هو عبد الرحمن بن مطعم البناني. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ٦/ ٢٥٦. وأخرجه النسائي ٧/ ٣٠٧ من طريق سفمِان بن عيينة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٢٣٦)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٥٢). وأخرجه أبو داود (٣٤٧٨)، والترمذي (١٣١٧)، والنسائي ٧/ ٣٠٧ من طريق داود بن عبد الرحمن العطار، والنسائي ٧/ ٣٠٧ من طريق ابن جريج، كلاهما عن عمرو بن دينار، به، بلفظ: نهى أن يُباع فضلُ الماء. وهو في "مسند أحمد" (١٥٤٤٤).









সুনান ইবনু মাজাহ (2477)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَإِبْرَاهِيمُ بْنُ سَعِيدٍ الْجَوْهَرِيُّ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ بَيْعِ فَضْلِ الْمَاءِ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উদ্বৃত্ত পানি বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন। [২৪৭৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وكيع: هو ابن الجراح، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وأبو الزبير: هو محمَّد بن مسلم بن تدرس. وأخرجه مسلم (١٥٦٥)، والنسائي ٧/ ٣١٠ من طرق عن ابن جريج، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤٦٣٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٥٣). وأخرجه النسائي ٧/ ٣٠٦ - ٣٠٧ من طريق عطاء، عن جابر.









সুনান ইবনু মাজাহ (2478)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ يَمْنَعْ أَحَدُكُمْ فَضْلَ مَاءٍ لِيَمْنَعَ بِهِ الْكَلأَ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমাদের কেউ যেন (অপরকে উদ্বৃত্ত পানি ব্যবহারে বাধা না দেয়, যাতে চতুষ্পদ জন্তুর ঘাস খাওয়া বন্ধ হয়ে যায়। [২৪৭৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. هشام بن عمار متابع، وباقي رجاله ثقات. سفيان: هو ابن عيينة، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز. وأخرجه البخاري (٢٣٥٣)، ومسلم (١٥٦٦) (٣٦)، والترمذي (١٣١٨) من طريقين عن أبي الزناد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٢٤)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٥٤). وأخرجه البخاري (٢٣٥٤)، ومسلم (١٥٦٦) (٣٧) من طريق سعيد بن المسيب وأبي سلمة، وأبو داود (٣٤٧٣) من طريق أبي صالح، كلاهما عن أبي هريرة. قال الحافظ: والمراد بالفضل: ما زاد على الحاجة، ولأحمد [(١٠٥٧١)] من طريق عبيد الله بن عبد الله عن أبي هريرة: "لا يمنع فضل ماء بعد أن يستغني عنه" وهو محمول عند الجمهور على ماء البئر المحفورة في الأرض المملوكة، وكذلك في الأرض الموات إذا كان بقصد التملك، والصحيح عند الشافعية ونص عليه في القديم أن الحافر يملك ماءها، وأما البئر المحفورة في الموات لقصد الارتفاق، لا التملك، فإن الحافر لا يملك ماءها، بل يكون أحق بها إلى أن يرتحل، وفي الصورتين يجب عليه بذل ما يفضل عن حاجته لنفسه وعياله وزرعه وماشيته، هذا هو الصحيح عند الشافعية. وخَصَّ المالكية هذا الحكم بالموات، وقالوا في البئر التي في الملك: لا يجب عليه بذل فضلها. والمراد بالكلأ في هذا الحديث النابت في أرض الموات، فإن الناس فيه سواء.









সুনান ইবনু মাজাহ (2479)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ حَارِثَةَ، عَنْ عَمْرَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ يُمْنَعُ فَضْلُ الْمَاءِ وَلاَ يُمْنَعُ نَقْعُ الْبِئْرِ ‏"‏ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, উদ্বৃত্ত পানি ব্যবহারে বাধা দেয়া যাবে না এবং কূপের উদ্বৃত্ত পানি ব্যবহারেও বাধা দেয়া যাবে না। [২৪৭৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. حارثة -وهو ابن أبي الرجال محمَّد بن عبد الرحمن، وإن كان ضعيفًا- متابع، وباقي رجاله ثقات. وقد اختلف في وصله وإرساله على أبي الرجال، فصحح إرساله البيهقي في "السُّنن" ٦/ ١٥٢، وصحح وصله الدارقطني وابن عبد البر والحاكم والذهبي. وأخرجه ابن راهويه في "مسنده" (٩٩٨)، والخطيب في "تاريخه" ١٢/ ٤٣٥، والبيهقي ٦/ ١٥٢ - ١٥٣ من طريق حارثة بن أبي الرجال، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٢٤٧٤١)، وابن عدي في "الكامل" ٤/ ١٥٩٥، والحاكم ٢/ ٦١ - ٦٢، والبيهقي ٦/ ٥٢ من طريق عبد الرحمن بن أبي الرجال، وأحمد (٢٤٨١١) من طريق أبي أويس عبد الله بن عبد الله بن أويس، وابن أبي شيبة ٦/ ٢٥٧ - ٢٥٨، وأحمد (٢٥٠٨٧) و (٢٦٣١١)، وابن حبان (٤٩٥٥)، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٣/ ١٢٤ و١٢٥ من طريق محمَّد بن إسحاق، وأحمد (٢٦١٤٧)، وابن عبد البر ١٣/ ١٢٥ من طريق خارجة بن عبد الله، والطبراني في "الأوسط" (٢٦٦) من طريق صالح بن كيسان، خمستهم عن أبي الرجال، عن أمه عمرة، عن عائشة مرفوعًا. ورواه سفيان الثوري عن أبي الرجال، واختلف عليه: فرواه عبد الرزاق في "مصنفه" (١٤٤٩٣)، والفضل بن دكين عند البيهقي ٦/ ١٥٢، عنه، عن أبي الرجال، عن عمرة مرسلًا. ورواه عبد الرحمن بن مهدي عند الخطيب في "تاريخ بغداد"١٠/ ٣٤٩ - ٣٥٠، وأبو نباتة يونس بن يحيى عند أبي نعيم في "الحلية" ٧/ ٩٥، وعبد الرزاق عند البيهقي ٦/ ١٥٢، ثلاثتهم عنه، عن أبي الرجال، عن عمرة، عن عائشة. ورواه مالك عن أبي الرجال، واختلف عليه: فرواه جميع رواة "الموطأ" عنه، عن أبي الرجال، عن عمرة مرسلًا. وهو في "موطا يحيى" ٢/ ٧٤٥. ورواه أبو صالح كاتب الليث وأبو قرة موسى بن طارق كما في "التمهيد" ١٣/ ١٢٣ عنه، عن أبي الرجال، عن عمرة، عن عائشة. قوله: "نَقْعُ البئر" أي: فضل مائها، لأنه يُنقَع به العطشُ، أي: يُروى، وشرب حتى نَقَعَ، أي: رَويَ، وقيل: النقع: الماءُ الناقع، وهو المجتمعُ. "النهاية" (نقع).









সুনান ইবনু মাজাহ (2480)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الزُّبَيْرِ، أَنَّ رَجُلاً، مِنَ الأَنْصَارِ خَاصَمَ الزُّبَيْرَ عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي شِرَاجِ الْحَرَّةِ الَّتِي يَسْقُونَ بِهَا النَّخْلَ فَقَالَ الأَنْصَارِيُّ سَرِّحِ الْمَاءَ يَمُرَّ ‏.‏ فَأَبَى عَلَيْهِ فَاخْتَصَمَا عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ اسْقِ يَا زُبَيْرُ ثُمَّ أَرْسِلِ الْمَاءَ إِلَى جَارِكَ ‏"‏ ‏.‏ فَغَضِبَ الأَنْصَارِيُّ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنْ كَانَ ابْنَ عَمَّتِكَ فَتَلَوَّنَ وَجْهُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ قَالَ ‏"‏ يَا زُبَيْرُ اسْقِ ثُمَّ احْبِسِ الْمَاءَ حَتَّى يَرْجِعَ إِلَى الْجَدْرِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَقَالَ الزُّبَيْرُ وَاللَّهِ إِنِّي لأَحْسَبُ هَذِهِ الآيَةَ أُنْزِلَتْ فِي ذَلِكَ ‏{‏فَلاَ وَرَبِّكَ لاَ يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لاَ يَجِدُوا فِي أَنْفُسِهِمْ حَرَجًا مِمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا‏}‏‏.‏




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, হাররাহ থেকে প্রবাহিত নালার পানি বন্টনকে কেন্দ্র করে এক আনসারী ব্যক্তি যুবায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) - এর বিরুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট অভিযোগ দায়ের করে। এ নালা তার খেজুর বাগানে সিঞ্চন করতো। আনসারী বললো, পানি প্রবাহিত হতে দাও। কিন্তু যুবায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা অস্বীকার করেন। তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে এই বিবাদ পেশ করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন হে জুবায়র, তোমার জমিতে পানি সিঞ্চন কর, অতঃপর তো তোমার প্রতিবেশীর জন্য ছেড়ে দাও। তাতে আনসারী রাগান্বিত হল, এবং বলল হে আল্লাহর রাসূল সে আপনার ফুফুর ছেলে বলে (আপনি এরকম ফয়সালা করলেন) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর চেহারা রক্তিমাভ হয়ে গেলো। তিনি বলেনঃ হে যুবায়র ! তোমার ক্ষেতে পানি দাও, তারপর তা আটকে রাখো যাতে আইল পর্যন্ত উঠতে পারে। আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর শপথ ! আমার ধারণামতে এ সম্পর্কেই নিম্নোক্ত আয়াত নাযিল হয় (অনুবাদ) :

“হে মুহাম্মদ ! তোমার প্রতিপালকের শপথ ! এরা কিছুতেই মুমিন হতে পারে না, যতক্ষণ পর্যন্ত তাদের পারস্পরিক মতভেদের ব্যাপারসমূহে তোমাকে বিচারকরূপে মেনে না নিবে, অতঃপর তুমি যে ফয়সালা করবে, সেই সম্পর্কে তারা নিজেদের মনে কিছুমাত্র কুন্ঠাবোধ করবে না। বরং এর সামনে নিজেদেরকে পূর্ণরূপে সোপর্দ করে দিবে”। (সূরা নিসাঃ ৬৫)। [২৪৮০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم الزهري. وقد سلف برقم (١٥)، وخرَّجناه هناك.









সুনান ইবনু মাজাহ (2481)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ الْمُنْذِرِ الْحِزَامِيُّ، حَدَّثَنَا زَكَرِيَّا بْنُ مَنْظُورِ بْنِ ثَعْلَبَةَ بْنِ أَبِي مَالِكٍ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ عُقْبَةَ بْنِ أَبِي مَالِكٍ، عَنْ عَمِّهِ، ثَعْلَبَةَ بْنِ أَبِي مَالِكٍ قَالَ قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي سَيْلِ مَهْزُورٍ الأَعْلَى فَوْقَ الأَسْفَلِ يَسْقِي الأَعْلَى إِلَى الْكَعْبَيْنِ ثُمَّ يُرْسِلُ إِلَى مَنْ هُوَ أَسْفَلُ مِنْهُ ‏.‏




সা’লাবাহ বিন আবূ মালিক হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাহযূর নামক উপত্যকার পানি প্রবাহ সম্পর্কে ফয়সালা দেন যে, উঁচু ভূমি নিচু ভূমির উপর অগ্রাধিকার পাবে। উঁচু ভূমিতে পানি জমে তা পায়ের গোছা পর্যন্ত পৌঁছার পর তা নিচু ভূমির দিকে ছেড়ে দিতে হবে। [২৪৮১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، زكريا بن منظور ضعيف، وشيخه محمَّد بن عقبة مجهول الحال، وثعلبة بن أبي مالك مختلف في صحبته. وأخرجه أبو داود (٣٦٣٨) من طريق أبي مالك بن ثعلبة، عن أبيه. وأبو مالك -ويقال أيضًا: مالك، وهو الأشهر- مجهول الحال. ويشهد له حديث ابن الزبير السالف قبله، والحديثان الآتيان بعده. قوله: "مهزور" قال السندي: بتقديم المعجمة على المهملة: اسم وادٍ لبني قريظة بالحجاز، وأما بتقديم المهملة على المعجمة فموضع سوق بالمدينة، تصدق به رسولُ الله ﷺ على المسلمين.