হাদীস বিএন


সুনান ইবনু মাজাহ





সুনান ইবনু মাজাহ (2542)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ أَنْبَأَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ عُمَيْرٍ قَالَ سَمِعْتُ عَطِيَّةَ الْقُرَظِيَّ يَقُولُ فَهَا أَنَا ذَا بَيْنَ أَظْهُرِكُمْ




আতিয়্যাহ আল-কুরাযী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তখন থেকেই আমি তোমাদের সামনে আছি। [২৫৪২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه النسائي ٦/ ١٥٥ من طريق سفيان بن عية، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٩٤٢٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٧٨٢).









সুনান ইবনু মাজাহ (2543)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، وَأَبُو مُعَاوِيَةَ وَأَبُو أُسَامَةَ قَالُوا حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ عُرِضْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ أُحُدٍ وَأَنَا ابْنُ أَرْبَعَ عَشْرَةَ سَنَةً فَلَمْ يُجِزْنِي وَعُرِضْتُ عَلَيْهِ يَوْمَ الْخَنْدَقِ وَأَنَا ابْنُ خَمْسَ عَشْرَةَ سَنَةً فَأَجَازَنِي ‏.‏ قَالَ نَافِعٌ فَحَدَّثْتُ بِهِ عُمَرَ بْنَ عَبْدِ الْعَزِيزِ فِي خِلاَفَتِهِ فَقَالَ هَذَا فَصْلُ مَا بَيْنَ الصَّغِيرِ وَالْكَبِيرِ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমাকে উহুদের যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে উপস্থিত করা হলো, তখন আমি চৌদ্দ বছরের তরুণ। তিনি আমাকে (জিহাদে শরীক হতে) অনুমতি দেননি। পরে খন্দকের যুদ্ধের দিন আমাকে তাঁর সামনে পেশ করা হয়। তখন আমি পনের বছরের তরুন। তিনি আমাকে (যুদ্ধে যোগদানের) অনুমতি দেন। নাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি এ হাদীস উমার বিন আব্দুল আযিয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর খেলাফত আমলে তার নিকট বর্ণনা করলে তিনি বলেন, এটাই নাবালেগ ও বালেগের মধ্যে পার্থক্যবিন্দু। [২৫৪৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه البخاري (٤٠٧)، ومسلم (١٨٦٨)، وأبو داود (٢٩٥٧) و (٤٤٠٦) و (٤٤٠٧)، والترمذي (١٤١١) و (١٨٠٧)، والنسائي ٦/ ١٥٥ من طرق عن عُبيد الله، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٦١)، و "صحيح ابن حبان" (٤٧٢٧) و (٤٧٢٨).









সুনান ইবনু মাজাহ (2544)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ سَتَرَ مُسْلِمًا سَتَرَهُ اللَّهُ فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ ‏"‏ ‏.‏




আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি কোন মুসলমানের দোষ গোপন রাখবে, আল্লাহ দুনিয়া ও আখেরাতে তার দোষ গোপন রাখবেন। [২৫৪৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو صالح: هو ذكوان السمان. وهو قطعة من حديث طويل سلف عند المصنف برقم (٢٢٥)، وخرَّجناه هناك.









সুনান ইবনু মাজাহ (2545)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْجَرَّاحِ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ الْفَضْلِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ ادْفَعُوا الْحُدُودَ مَا وَجَدْتُمْ لَهُ مَدْفَعًا ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা হদ্দ প্রতিরোধ করবে, যাবত তা প্রতিরোধের কোন অজুহাত পাও। [২৫৪৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، إبراہیم بن الفضل:متروک ، ولہ شواہد ضعیفۃ عند الترمذي (1424) وغیرہ، (انوار الصحیفہ ص 471)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، إبراهيم بن الفضل متروك. وكيع: هو ابن الجراح. وأخرجه أبو يعلى (٦٦١٨) من طريق وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد. وفي الباب عن عائشة عند الترمذيُّ (١٤٨٥)، وفي إسناده يزيد بن زياد الشامي وهو متروك. وقال الترمذيُّ: ورواه وكيع عن يزيد بن زياد نحوه ولم يرفعه، ورواية وكيع أصح. وعن علي عند الدارقطني (٣٠٩٨)، والبيهقي ٨/ ٢٣٨، وفي إسناده مختار التمار وهو متروك أيضًا. وفي الباب موقوفًا عن معاذ وعقبة بن عامر عند الدارقطني (٣٠٩٩)، والبيهقي ٨/ ٢٣٨ وأسانيدها ضعيفة. وعن ابن مسعود عند ابن أبي شيبة ٩/ ٥٦٧، والبيهقي ٨/ ٢٣٨، وإسناده جيد. وعن عمر عند ابن أبي شيبة ٩/ ٥٦٧ ولفظه: لأن أُعطِّل الحدودَ بالشبهات أحبُّ إلي من أن أقيمها بالشبهات. ورجاله ثقات إلا أن فيه عنعنة هشيم بن بشير، وقد توبع.









সুনান ইবনু মাজাহ (2546)


حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ حُمَيْدِ بْنِ كَاسِبٍ، أَنْبَأَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُثْمَانَ الْجُمَحِيُّ، حَدَّثَنَا الْحَكَمُ بْنُ أَبَانَ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ سَتَرَ عَوْرَةَ أَخِيهِ الْمُسْلِمِ سَتَرَ اللَّهُ عَوْرَتَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَمَنْ كَشَفَ عَوْرَةَ أَخِيهِ الْمُسْلِمِ كَشَفَ اللَّهُ عَوْرَتَهُ حَتَّى يَفْضَحَهُ بِهَا فِي بَيْتِهِ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি তার মুসলিম ভাইয়ের গোপন (অপরাধের) বিষয় গোপন রাখবে, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তার গুপ্ত (অপরাধের) বিষয় গোপন রাখবেন। আর যে ব্যক্তি তার মুসলিম ভাইয়ের গোপন বিষয় ফাঁস করে দিবে, আল্লাহ তার গোপন বিষয় ফাঁস করে দিবেন, এমনকি এই কারণে তাকে তার ঘরে পর্যন্ত অপদস্থ করবেন। [২৫৪৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، محمد بن عثمان بن صفوان الجمحي: ضعیف (تقریب: 6130) ، والحدیث السابق (الأصل: 2544) یُغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 471)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف محمَّد بن عثمان، وهو الجمحي. وفي الباب عن أبي هريرة، وهو السالف برقم (٢٥٤٤). وعن ابن عمر عند البخاري (٢٤٤٢)، ومسلم (٢٥٨٠). وعن عقبة بن عامر عند أبي داود (٤٨٩١) و (٤٨٩٢). وعن هزال عند أبي داود (٤٣٧٧).









সুনান ইবনু মাজাহ (2547)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ الْمِصْرِيُّ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ قُرَيْشًا، أَهَمَّهُمْ شَأْنُ الْمَرْأَةِ الْمَخْزُومِيَّةِ الَّتِي سَرَقَتْ فَقَالُوا مَنْ يُكَلِّمُ فِيهَا رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالُوا وَمَنْ يَجْتَرِئُ عَلَيْهِ إِلاَّ أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ حِبُّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَكَلَّمَهُ أُسَامَةُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ أَتَشْفَعُ فِي حَدٍّ مِنْ حُدُودِ اللَّهِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَامَ فَاخْتَطَبَ فَقَالَ ‏"‏ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّمَا هَلَكَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ أَنَّهُمْ كَانُوا إِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الشَّرِيفُ تَرَكُوهُ وَإِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الضَّعِيفُ أَقَامُوا عَلَيْهِ الْحَدَّ وَايْمُ اللَّهِ لَوْ أَنَّ فَاطِمَةَ بِنْتَ مُحَمَّدٍ سَرَقَتْ لَقَطَعْتُ يَدَهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ سَمِعْتُ اللَّيْثَ بْنَ سَعْدٍ يَقُولُ قَدْ أَعَاذَهَا اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ أَنْ تَسْرِقَ قَدْ أَعَاذَهَا اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ أَنْ تَسْرِقَ وَكُلُّ مُسْلِمٍ يَنْبَغِي لَهُ أَنْ يَقُولَ هَذَا ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মাখযূম গোত্রের এক নারী চুরি করে ধরা পড়লে তার বিষয়টি কুরায়শদেরকে অত্যন্ত বিচলিত করে তোলে। তারা বলাবলি করলো, বিষয়টি নিয়ে কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে কথা বলতে পারে? তারা বলাবলি করলো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর প্রিয়পাত্র উসামা বিন যায়েদ ছাড়া আর কেউ এমন দুঃসাহস করতে পারবে না। অতঃপর উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সঙ্গে বিষয়টি বিয়ে আলাপ করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তুমি কি আল্লাহ নির্ধারিত হদ্দের ব্যাপারে সুপারিশ করছো? অতঃপর তিনি দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বলেনঃ হে জনগণ! তোমাদের পূর্ববর্তীরা এ কারণে ধ্বংস হয়েছে যে, তাদের মধ্যকার কোন সম্ভ্রান্ত ব্যক্তি চুরি করলে তারা তাকে ছেড়ে দিতো এবং কোন দুর্বল অসহায় ব্যক্তি চুরি করলে তাকে শাস্তি দিতো। আল্লাহর শপথ! মুহাম্মাদের কন্যা ফাতেমাও যদি চুরি করতো, তাহলে অবশ্যই আমি তার হাতও কেটে দিতাম। রাবী মুহাম্মাদ বিন রুম্‌হ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি লায়স ইবনু সা‘দকে বলতে শুনেছি, আল্লাহ তাআলা তাকে (ফাতিমাকে) চুরি করা থেকে হেফাযত করেছেন। প্রত্যেক মুসলমানেরই এরূপ বলা উচিত। [২৫৪৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن شهاب: هو الزهري، وعروة: هو ابن الزبير. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (٢٦٤٨)، ومسلم (١٦٨٨)، وأبو داود (٤٣٧٣) و (٤٣٩٦)، والترمذي (١٤٩٣)، والنسائن ٨/ ٧٢ - ٧٥ من طرق عن الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤١٣٨) و (٢٥٢٩٧)، و"شرح مشكل الآثار" (٢٣٠٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٠٢). وألفاظهم متقاربة إلا أن لفظ النسائي ٨/ ٧٢: أُتي النبي ﷺ بسارق. وسائر الروايات أنها امرأة. ولفظ أبي داود (٤٣٩٦)، والنسائي ٨/ ٧٣ أنها كانت تستعير المتاع وتجحده، وسائر الروايات أنها سرقت، قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" ١٢/ ٩٠: والذي اتضح لي أن الحديثين محفوظان عن الزهري، وأنه كان يحدِّث تارة بهذا، وتارة بهذا، فحدَّث يونس عنه بالحديثين، واقتصرت كل طائفة من أصحاب الزهري غير يونس على أحد الحديثين … وقد اختلف نظر العلماء في ذلك (يعني القطع بالجحد)، فأخذ بظاهره أحمد في أشهر الروايتين عنه وإسحاق، وانتصر له ابن حزم من الظاهرية. وذهب الجمهور إلى أنه لا يقطع في جحد العارية، وهي رواية عن أحمد أيضًا، وأجابوا عن الحديث بأن رواية مَن روى "سرقت" أرجح، وبالجمع بين الروايتين بضرب من التأويل. فأما الترجيح … وعلى هذا يتعادل الطريقان ويتعين الجمع، فهو أولى من اطراح أحد الطريقين، فقال بعضهم: هما قصتان لامرأتين، وهو ضعيف، وحكى ابن المنذر عن بعض العلماء أن القصة لامرأة واحدة استعارت وجحدت وسرقت، فقُطعت للسرقة لا العارية، قال: وبذلك نقول. وقال الخطابي: إن ذكر العارية والجحد في هذه القصة للتعريف بالمرأة تعريفًا خاصا كما عُرفت بأنها مخزومية، وتبعه جماعة كالبيهقي والمنذري والمازري والنووي. انتهى كلام الحافظ باختصار، وقد نقل بعد هذا عن القرطبي أدلة القول بأنها قطعت للسرقة فانظره. وثبت عند البخاري ومسلم أن المرأة تابت وحَسُنت توبتها وتزوجت، وكانت تأتي بعد ذلك إلى عائشة، فترفع حاجتها إلى رسول الله ﷺ.









সুনান ইবনু মাজাহ (2548)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ طَلْحَةَ بْنِ رُكَانَةَ، عَنْ أُمِّهِ، عَائِشَةَ بِنْتِ مَسْعُودِ بْنِ الأَسْوَدِ عَنْ أَبِيهَا، قَالَ لَمَّا سَرَقَتِ الْمَرْأَةُ تِلْكَ الْقَطِيفَةَ مِنْ بَيْتِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَعْظَمْنَا ذَلِكَ وَكَانَتِ امْرَأَةً مِنْ قُرَيْشٍ فَجِئْنَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نُكَلِّمُهُ وَقُلْنَا نَحْنُ نَفْدِيهَا بِأَرْبَعِينَ أُوقِيَّةً ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ تُطَهَّرَ خَيْرٌ لَهَا ‏"‏ ‏.‏ فَلَمَّا سَمِعْنَا لِينَ قَوْلِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَتَيْنَا أُسَامَةَ فَقُلْنَا كَلِّمْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ فَلَمَّا رَأَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ذَلِكَ قَامَ خَطِيبًا فَقَالَ ‏"‏ مَا إِكْثَارُكُمْ عَلَىَّ فِي حَدٍّ مِنْ حُدُودِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ وَقَعَ عَلَى أَمَةٍ مِنْ إِمَاءِ اللَّهِ وَالَّذِي نَفْسُ مُحَمَّدٍ بِيَدِهِ لَوْ كَانَتْ فَاطِمَةُ ابْنَةُ رَسُولِ اللَّهِ نَزَلَتْ بِالَّذِي نَزَلَتْ بِهِ لَقَطَعَ مُحَمَّدٌ يَدَهَا ‏"‏ ‏.‏




মাসঊদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, সেই নারী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ঘর থেকে সেই চাদরটি চুরি করলে তা আমাদেরকে বিব্রতকর অবস্থায় ফেলে। সে ছিল কুরায়শ বংশীয়া। অতঃপর আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে ব্যাপারটি নিয়ে আলোচনা করতে এলাম। আমরা বললাম, আমরা তার পক্ষ থেকে চল্লিশ উকিয়া ফিদ্‌য়া দিচ্ছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ সে পবিত্র হোক, এটাই তার জন্য উত্তম। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নরম সুর শুনে উসামার কাছে এসে বললাম, তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে আলোচনা করো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরিস্থিতি আঁচ করে খুতবা দিতে দাঁড়িয়ে গেলেন। তিনি বলেনঃ তোমাদের কী হয়েছে যে, তোমরা আমার কাছে আল্লাহ নির্ধারিত হদ্দের ব্যাপারে সুপারিশ করছো, যা তাঁর কোন এক বান্দীর উপর প্রযোজ্য হচ্ছে। সেই সত্তার শপথ, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! যদি আল্লাহর রাসূলের কন্যা ফাতিমাও ঐ নারীর স্তরে উপনীত হতো, তবে অবশ্যই মুহাম্মাদ তার হাত কেটে দিতো। [২৫৪৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، ابن إسحاق عنعن ، والحدیث السابق (الأصل: 2547) شاہد لبعضہ ولعلہ من أجلہ حسنہ، الحافظ فی الإصابۃ (409/3) !، (انوار الصحیفہ ص 471)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، محمَّد بن إسحاق مدلس ورواه بالعنعنة، وقول الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٨٩: إنه صرح بالتحديث عند الحاكم، وهم منه ﵀. ثم إن جَعلَ الحديث عن مسعود بن الأسود -أو ابن العجماء كما في بعض الروايات، والعجماء هي أمه- خطأ، فإن مسعودًا استشهد في مؤتة كما ذكر ابن إسحاق نفسه في "مغازيه"، وقصة المخزومية إنما كانت في فتح مكة، ولم يتنبه الحافظ ابن حجر إلى هذا فحسن إسناده في "الإصابة" ٦/ ٩٤، وفي "الفتح" ١٢/ ٨٩. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ٩/ ٤٦٦. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٠/ (٧٩٢) و (٧٩٣)، والحاكم ٤/ ٣٧٩ - ٣٨٠، والبيهقي في "السُّنن" ٨/ ٢٨١، وفي "معرفة السُّنن والآثار" (١٧٢٦١) من طريق محمَّد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٢٣٤٧٩) عن يونس بن محمَّد المؤدب، عن الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن ابن إسحاق، عن محمَّد بن طلحة أن خالته أخت مسعود ابن العجماء أن أباها … كذا قال: "أخت مسعود"، وخالفه كامل بن طلحة الجحدري عند الطبراني ١٧/ (٧٩١) فقال: "عن محمَّد بن طلحة أن خالته بنت مسعود ابن العجماء" وهو الصواب.









সুনান ইবনু মাজাহ (2549)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَهِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، قَالُوا حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، وَزَيْدِ بْنِ خَالِدٍ، وَشِبْلٍ، قَالُوا كُنَّا عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَتَاهُ رَجُلٌ فَقَالَ أَنْشُدُكَ اللَّهَ إِلاَّ قَضَيْتَ بَيْنَنَا بِكِتَابِ اللَّهِ ‏.‏ فَقَالَ خَصْمُهُ وَكَانَ أَفْقَهَ مِنْهُ اقْضِ بَيْنَنَا بِكِتَابِ اللَّهِ وَائْذَنْ لِي حَتَّى أَقُولَ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ قُلْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ إِنَّ ابْنِي كَانَ عَسِيفًا عَلَى هَذَا وَإِنَّهُ زَنَى بِامْرَأَتِهِ فَافْتَدَيْتُ مِنْهُ بِمِائَةِ شَاةٍ وَخَادِمٍ فَسَأَلْتُ رَجُلاً مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ فَأُخْبِرْتُ أَنَّ عَلَى ابْنِي جَلْدَ مِائَةٍ وَتَغْرِيبَ عَامٍ وَأَنَّ عَلَى امْرَأَةِ هَذَا الرَّجْمَ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لأَقْضِيَنَّ بَيْنَكُمَا بِكِتَابِ اللَّهِ الْمِائَةُ الشَّاةُ وَالْخَادِمُ رَدٌّ عَلَيْكَ وَعَلَى ابْنِكَ جَلْدُ مِائَةٍ وَتَغْرِيبُ عَامٍ وَاغْدُ يَا أُنَيْسُ عَلَى امْرَأَةِ هَذَا فَإِنِ اعْتَرَفَتْ فَارْجُمْهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ هِشَامٌ فَغَدَا عَلَيْهَا فَاعْتَرَفَتْ فَرَجَمَهَا ‏.‏




আবদুল্লাহ শিবলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তখন তাঁর কাছে এক ব্যক্তি এসে বললো, আমি আপনাকে আল্লাহর শপথ করে বলেছি যে, আমাদের মধ্যে কিতাবুল্লাহর বিধান অনুযায়ী মীমাংসা করে দিন। তার তুলনায় অধিক বিচক্ষণ তার প্রতিপক্ষ বললো, হাঁ আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুসারে ফায়সালা করে দিন এবং আমাকে বক্তব্য পেশের অনুমতি দিন। তিনি বলেনঃ বলো। লোকটি বললো, আমার পুত্র এই ব্যক্তির শ্রমিক ছিল, সে তার স্ত্রীর সাথে যেনা করেছে। আমি তার পক্ষ থেকে এক শত বকরী এবং একটি গোলাম পরিশোধ করেছি। অতঃপর আমি কতক বিজ্ঞ লোককে এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলে আমাকে বলা হয় যে, আমার পুত্রকে এক শত বেত্রাঘাত করতে হবে এবং এক বছরের নির্বাসন দিতে হবে, আর এই ব্যক্তির স্ত্রীকে রজম (প্রস্তরাঘাতে হত্যা) করতে হবে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ সেই সত্তার শপথ, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! আমি অবশ্যই তোমাদের দু’জনের মধ্যে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করবো। তুমি তোমার এক শত বকরী ও গোলাম ফেরত লও এবং তোমার পুত্রকে এক বছরের নির্বাচনসহ এক শত বেত্রাঘাত করা হবে। আর হে উনাইস! তুমি আগামী কাল সকালে তার স্ত্রীর নিকট যাবে। সে যদি স্বীকারোক্তি করে তবে তাকে রজম করবে। অধস্তন রাবী হিশাম বলেন, উনায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরদিন সকালে তার নিকট গেলো এবং সে স্বীকারোক্তি করলে তিনি তাকে রজম করেন। [২৫৪৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح.إلا أن سفيان بن عيينة وهم في قوله: "وشبل"، فقد خالفه فيه جماعة من أصحاب الزهري كما قال الترمذيُّ في "جامعه" بإثر الحديث (١٤٩٨). وهو في "مصنف ابن أبي شِيبة" ١٠/ ٧٩ - ٨٠ و ١٥٩. وأخرجه الترمذيُّ (١٤٩٦)، والنسائي ٨/ ٢٤١ من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٨٢٧) من طريق ابن عيينة أيضًا، به بإسفاط شبل. وأخرجه البخاري (٢٣١٤)، ومسلم (١٦٩٧)، وأبو داود (٤٤٤٥)، والترمذي (١٤٩٧) و (١٤٩٨)، والنسائي ٨/ ٢٤٠ - ٢٤١ من طرق عن الزهري، به دون ذكر شبل. وهو في "مسند أحمد" (١٧٠٣٨) و (١٧٠٤٢)، و "شرح مشكل الآثار" (٩٤)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٣٧).









সুনান ইবনু মাজাহ (2550)


حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ أَبُو بِشْرٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي عَرُوبَةَ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ يُونُسَ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنْ حِطَّانَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ عُبَادَةَ بْنِ الصَّامِتِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ خُذُوا عَنِّي خُذُوا عَنِّي قَدْ جَعَلَ اللَّهُ لَهُنَّ سَبِيلاً الْبِكْرُ بِالْبِكْرِ جَلْدُ مِائَةٍ وَتَغْرِيبُ سَنَةٍ وَالثَّيِّبُ بِالثَّيِّبِ جَلْدُ مِائَةٍ وَالرَّجْمُ ‏"‏ ‏.‏




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তোমরা আমার কাছ থেকে (দ্বীনের বিধান) শিখে নাও। আল্লাহ তাদের (মহিলাদের জন্য একটি পথ করে দিয়েছেন। যদি অবিবাহিত পুরুষ অবিবাহিত নারীর সাথে যেনা করে তবে তাদের প্রত্যেককে এক বছরের নির্বাসনসহ এক শত বেত্রাঘাত করতে হবে। আর যদি বিবাহিত পুরুষ বিবাহিত নারীর সাথে যেনা করে তবে তাদের প্রত্যেককে একশত বেত্রাঘাত এবং রজম করতে হবে। [২৫৫০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. إلا أن بكر بن خلف وهم في قوله: "عن يونس بن جبير" في رواية ابن ماجه هذه، والصواب: "عن الحسن البصري"، نبه عليه المزي في "تحفة الأشراف" (٥٠٨٣)، وقد جاء على الصواب عند أبي داود (٤٤١٥) عن مسدد، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد، عن قتادة، عن الحسن، عن حطان، به. وأخرجه مسلم (١٦٩٠)، وأبو داود (٤٤١٦)، والترمذي (١٤٩٩)، والنسائي في "الكبرى" (٧١٠٤) و (٧١٠٥) و (٧١٥٦) و (٧٩٢٦) و (١١٠٢٧) من طرق عن الحسن، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٦٦٦)، و"شرح مشكل الآثار" (٢٤٠) و (٤٥٤٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٢٥).









সুনান ইবনু মাজাহ (2551)


حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ مَسْعَدَةَ، حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ الْحَارِثِ، أَنْبَأَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ حَبِيبِ بْنِ سَالِمٍ، قَالَ أُتِيَ النُّعْمَانُ بْنُ بَشِيرٍ بِرَجُلٍ غَشَى جَارِيَةَ امْرَأَتِهِ فَقَالَ لاَ أَقْضِي فِيهَا إِلاَّ بِقَضَاءِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ قَالَ إِنْ كَانَتْ أَحَلَّتْهَا لَهُ جَلَدْتُهُ مِائَةً وَإِنْ لَمْ تَكُنْ أَذِنَتْ لَهُ رَجَمْتُهُ ‏.‏




নু‘মান বিন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, (হাবীব বিন সালিম) বলেন, নু‘মান বিন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট এক ব্যক্তিকে হাযির করা হলো, যে তার স্ত্রীর ক্রীতদাসীর সাথে যেনা করেছিল। তিনি বলেন, আমি এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ফয়সালার অনুরূপ ফয়সালাই করবো। তিনি বলেন, যদি তার স্ত্রীর ক্রীতদাসীকে তার জন্য হালাল করে দিয়ে থাকে, তবে এ যেনাকারীকে একশত বেত্রাঘাত করবো। আর যদি তার স্ত্রী তাকে অনুমতি না দিয়ে থাকে, তবে তাকে আমি রজম করবো। [২৫৫১]

তাহকীক আলবানীঃ দঈফ তা‘লীক ইবনু মাজাহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * رجاله ثقات غيرَ حبيب بن سالم -وهو مولى النعمان وكاتبه- فلا بأسَ به، لكن أعله الترمذيُّ والنسائي وغيرهما بالاضطراب. وأخرجه الترمذيُّ (١٥١٧)، والنسائي ٦/ ١٢٤ من طريقين عن قتادة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٣٩٧). وقال الترمذيُّ: حديث النعمان في إسناده اضطراب، سمعت محمدًا -يعني البخاري- يقول: لم يسمع قتادة من حبيب بن سالم هذا الحديث، إنما رواه عن خالد بن عرفطة. وأخرجه أبو داود (٤٤٥٨)، والنسائي ٦/ ١٢٤ من طريق أبان بن يزيد العطار، عن قتادة، عن خالد بن عرفطة، عن حبيب بن سالم، به. وخالد بن عرفطة مجهول، لكن قال أبان بعده: وأخبرنا قتادة أنه كتب فيه إلى حبيب بن سالم وكتب إليه بهذا. يعني أن قتادة يرويه عن خالد بن عرفطة عن حبيب سماعًا، وعن حبيب مكاتبة دون واسطة. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٧١٩١)، والبيهقي ٨/ ٢٣٩ من طريق همام، عن قتادة، عن حبيب بن سالم، عن حبيب بن يساف، عن النعمان. وأخرجه الطحاوي ٣/ ١٤٥، والبيهقي ٨/ ٢٣٩ من طريق همام أيضًا، عن قتادة، عن حبيب بن يساف، عن حبيب بن سالم، عن النعمان. وحبيب بن يساف هذا مجهول لا يُعرف إلا في هذا الحديث فيما ذكره أبو حاتم الرازي، كما في "الجرح والتعديل" ٣/ ١١. وأخرجه أحمد (١٨٤٤٤)، وأبو داود (٤٤٥٩)، والترمذي (١٥١٨)، والنسائي ٦/ ١٢٣ من طريق شعبة، عن أبي بشر جعفر بن أبي وحشية، عن خالد بن عرفطة، عن حبيب بن سالم، عن النعمان. وأخرجه أحمد (١٨٤٤٦) عن هشيم، عن أبي بشر، عن حبيب بن سالم، عن النعمان. فأسقط خالد بن عرفطة. قال النسائي فيما ذكر المزي في "تحفة الأشراف": أحاديث النعمان هذه مضطربة. قوله: "جلدته مئة" قال أبو بكر ابن العربي في "عارضة الأحوذي": يعني: أدَّبتُه تعزيرًا، وأبلغ به عدد الحد تنيكيلًا، لا أنه رأى حدَّه بالجلد حدًا له. قال السندي: لأن المحصن حده الرجم لا الجلد، ولعل سبب ذلك أن المرأة إذا أحلَّت جاريتها لزوجها فهو إعارة الفروج فلا يصح. لكن العارية تصير شبهة تُسقط الحد إلا أنها شبهة ضعيفة جدًا، فيعزر صاحبها.









সুনান ইবনু মাজাহ (2552)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ السَّلاَمِ بْنُ حَرْبٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ حَسَّانَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ الْمُحَبِّقِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم رُفِعَ إِلَيْهِ رَجُلٌ وَطِئَ جَارِيَةَ امْرَأَتِهِ فَلَمْ يَحُدَّهُ ‏.‏




সালামাহ ইবনুল মুহাব্বিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এক ব্যক্তিকে উপস্থিত করা হলো যে তার স্ত্রীর ক্রীতদাসীর সাথে যেনা করেছিল। তিনি তার উপর হদ্দ কার্যকর করেননি। [২৫৫২]

তাহকীক আলবানীঃ দঈফ তা’লীক ইবনু মাজাহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لانقطاعه، الحسن -وهو البصري- لم يسمع من سلمة بن المحبق كما في "علل الحديث" لابن أبي حاتم ١/ ٤٤٧، و"نصب الراية" ١/ ٩١، بينهما قبيصةُ بنُ حُريث كما سيأتي. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ١٠/ ١٧. وأخرجه أبو داود (٤٤٦١)، والنسائي ٦/ ١٢٥ من طريق قتادة، بهذا الإسناد، ولفظه: أن رسول الله ﷺ قضى في رجل وقع على جارية امرأته: إن كان استكرهها، فهي حرة، وعليه لسيدتها مثلُها، فإن كانت طاوعته، فهي له، وعليه لسيدتها مثلها. وهو في "مسند أحمد" (١٥٩١١) و (٢٠٠٦٣). وأخرجه أبو داود (٤٤٦٠)، والنسائي ٦/ ١٢٤ - ١٢٥ من طريق قتادة، عن الحسن، عن قبيصة بن حريث، عن سلمة. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٠٦٩). وقبيصة هذا مجهول. قال الخطابي في "معالم السُّنن" ٣/ ٣٣١: هذا حديث منكر، وقبيصة بن حريث غير معروف، والحجة لا تقومُ بمثله، وكان الحسن لا يُبالي أن يروي ممن سمع. ثم قال: ولا أعلم أحدًا من الفقهاء يقول به، وفيه أمور تخالف الأصول: منها إيجاب المثل في الحيوان، ومنها استجلاب الملك بالزنى، ومنها إسقاط الحد عن البدن، وإيجاب العقوبة في المال. وهذه كلها أمور منكرة لا تخرج على مذهب أحد من الفقهاء، وخليق أن يكون الحديث منسوخًا إن كان له أصل في الرواية. والله أعلم. قلنا: وممن قال بنسخه الإمام الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ١٤٥. ونقل الترمذيُّ في "العلل الكبير" ٢/ ٦١٦ عن البخاري ترك العمل بهذا الحديث. وكذا قال البيهقي في "السُّنن" ٨/ ٢٤٠.









সুনান ইবনু মাজাহ (2553)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُتْبَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ لَقَدْ خَشِيتُ أَنْ يَطُولَ، بِالنَّاسِ زَمَانٌ حَتَّى يَقُولَ قَائِلٌ مَا أَجِدُ الرَّجْمَ فِي كِتَابِ اللَّهِ فَيَضِلُّوا بِتَرْكِ فَرِيضَةٍ مِنْ فَرَائِضِ اللَّهِ أَلاَ وَإِنَّ الرَّجْمَ حَقٌّ إِذَا أُحْصِنَ الرَّجُلُ وَقَامَتِ الْبَيِّنَةُ أَوْ كَانَ حَمْلٌ أَوِ اعْتِرَافٌ وَقَدْ قَرَأْتُهَا الشَّيْخُ وَالشَّيْخَةُ إِذَا زَنَيَا فَارْجُمُوهُمَا الْبَتَّةَ ‏.‏ رَجَمَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَرَجَمْنَا بَعْدَهُ ‏.‏




উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি আশঙ্কা করছি যে, দীর্ঘকাল অতিবাহিত হওয়ার পর কেউ বলে বসবে, আমি আল্লাহর কিতাবে রজমের কথা পাচ্ছি না। ফলে সে আল্লাহর ফরযসমূহের মধ্যকার একটি ফরয ত্যাগ করার কারণে পথভ্রষ্ট হবে। সাবধান! রজম (প্রস্তরাঘাতে হত্যা) করা বাধ্যতামূলক- অপরাধী বিবাহিত হলে এবং সাক্ষ্য-প্রমাণ পাওয়া গেলে অথবা গর্ভসঞ্চার হলে অথবা স্বীকারোক্তি করলে। অতঃপর আমি রজমের এ আয়াত পাঠ করিঃ “বৃদ্ধ ও বৃদ্ধা যেনায় লিপ্ত হলে তোমরা তাদের উভয়কে রজম করো”। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রজম করেছেন এবং তাঁর পরে আমরাও রজম করেছি। [২৫৫৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح.إلا أن قوله: "الشيخ والشيخة … " وهم من سفيان بن عيينة، فقد رواه سائر أصحاب الزهري عنه فلم يذكروها، فهي غير محفوظة في حديث الزهري، قال النسائي: لا أعلم أن أحدًا ذكر في هذا الحديث: "الشيخ والشيخة فارجموها البتة" غير سفيان، وينبغي أن يكون وهم في ذلك. والله أعلم. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ١٠/ ٧٥ - ٧٦. وأخرجه البخاري (٦٨٢٩)، ومسلم (١٦٩١) (١٥)، والنسائي في "الكبرى" (٧١١٨) من طريق سفيان، بهذا الإسناد. وليس في رواية البخاري ومسلم قوله: "وقرأ … البتة"، قال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ١٤٣: ولعل البخاري هو الذي حذف ذلك عمدًا، أما مسلم فلم يذكر لفظ سفيان مطلقًا، وأما النسائي فوهَّم سفيان كما سلف. وأخرجه البخاري (٦٨٣٠)، ومسلم (١٦٩١) (١٥) وأبو داود (٤٤١٨)، والترمذي (١٤٩٤)، والنسائي في "الكبرى" (٧١١٦) و (٧١١٧) و (٧١١٩ - ٧١٢٢) من طرق عن عبيد الله، به - دون القطعة المذكورة. وعند بعضهم زيادة عبد الرحمن ابن عوف بين ابن عباس وعمر. وهو في "مسند أحمد" (١٩٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤١٣). وانظر لزامًا تعليقنا على حديث زيد بن ثابت في "المسند" (٢١٥٩٦).









সুনান ইবনু মাজাহ (2554)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ الْعَوَّامِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ جَاءَ مَاعِزُ بْنُ مَالِكٍ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ فَقَالَ إِنِّي قَدْ زَنَيْتُ ‏.‏ فَأَعْرَضَ عَنْهُ ثُمَّ قَالَ إِنِّي قَدْ زَنَيْتُ فَأَعْرَضَ عَنْهُ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ إِنِّي زَنَيْتُ ‏.‏ فَأَعْرَضَ عَنْهُ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ قَدْ زَنَيْتُ ‏.‏ فَأَعْرَضَ عَنْهُ حَتَّى أَقَرَّ أَرْبَعَ مَرَّاتٍ فَأَمَرَ بِهِ أَنْ يُرْجَمَ ‏.‏ فَلَمَّا أَصَابَتْهُ الْحِجَارَةُ أَدْبَرَ يَشْتَدُّ فَلَقِيَهُ رَجُلٌ بِيَدِهِ لَحْىُ جَمَلٍ فَضَرَبَهُ فَصَرَعَهُ فَذُكِرَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِرَارُهُ حِينَ مَسَّتْهُ الْحِجَارَةُ قَالَ ‏ "‏ فَهَلاَّ تَرَكْتُمُوهُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মাইয বিন মালিক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বললোঃ আমি যেনা করেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। আবার সে বললো, আমি যেনা করেছি। তিনি এবারও তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। সে আবার বললো, আমি যেনা করেছি। এবারও তিনি তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। সে আবার বললো, আমি যেনা করেছি। তিনি তার থেকে আবারও মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এমনিভাবে সে চারবার স্বীকারোক্তি করলো। অতঃপর তিনি তাকে রজম করার নির্দেশ দিলেন। তার দেহে পাথর নিক্ষিপ্ত হতে থাকলে সে দ্রুত পালাতে তৎপর হলো। এক ব্যক্তি তার নাগাল পেয়ে গেলো। তার হাতে ছিল উটের চোয়ালের হাড়। সে তাকে আঘাত করে ভূপাতিত করলো। তার গায়ে পাথর নিক্ষিপ্ত হওয়ায় তার পলায়নের কথা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট উল্লেখ করা হলে তিনি বলেনঃ তোমরা কেন তাকে ছেড়ে দিলে না। [২৫৫৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد حسن من أجل محمَّد بن عمرو، وهو ابن علقمة الليثي. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ١٠/ ٧٢. وأخرجه الترمذيُّ (١٤٩١) من طريق محمَّد بن عمرو، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث حسن. وأخرجه البخاري (٥٢٧١)، ومسلم (١٦٩١) (١٦)، والنسائي في "الكبرى" (٧١٣٩) و (٧١٤٠) من طريق الزهري، عن أبي سلمة وسعيد بن المسيب، عن أبي هريرة. دون قوله: "فهلا تركتموه". وأخرجه أبو داود (٤٤٢٨) و (٤٤٢٩)، والنسائي (٧١٢٦ - ٧١٢٨) و (٧١٦٢) من طريق عبد الرحمن بن الصامت ابن عم أبي هريرة، عن أبي هريرة، بنحوه. وهو في "مسند أحمد" (٩٨٠٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٣٩). وله شاهد حسن من حديث يزيد بن نعيم بن هزال، عن أبيه، عند أبي داود (٤٤١٩)، وفيه "هلا تركتموه لعله أن يتوب الله عليه". وآخر عن طاووس مرسلًا عند عبد الرزاق بإثر الحديث (١٣٣٧). قوله: "هلا تركتموه" قال الخطابي في "معالم السُّنن" ٣/ ٣١٩: فيه دليل على أن الرجل إذا أقلا بالزنى ثم رجع عنه، دفع عنه الحدُّ، سواء وقع به الحد أو لم يقع، وإلى هذا ذهب عطاء بن أبي رباح والزهري وحماد بن أبي سليمان وأبو حنيفة وأصحابه، وكذلك قال الشافعي وأحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه. وقال مالك بن أنس وابن أبي ليلى وأبو ثور: لا يقبل رجوعه، ولا يدفع عنه الحد، وكذلك قال أهل الظاهر، روى ذلك عن الحسن البصري وسعيد بن جبير، وروي معنى ذلك عن جابر بن عبد الله، وتأولوا قوله "هلا تركتموه" أي لينُظَر في أمره، ويستثبت المعنى الذي هرب من أجله.









সুনান ইবনু মাজাহ (2555)


حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ عُثْمَانَ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَمْرٍو، حَدَّثَنِي يَحْيَى بْنُ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَبِي الْمُهَاجِرِ، عَنْ عِمْرَانَ بْنِ الْحُصَيْنِ، أَنَّ امْرَأَةً، أَتَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَاعْتَرَفَتْ بِالزِّنَا فَأَمَرَ بِهَا فَشُكَّتْ عَلَيْهَا ثِيَابُهَا ثُمَّ رَجَمَهَا ثُمَّ صَلَّى عَلَيْهَا ‏.‏




ইমরান ইবনুল হুসায়ন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক নারী নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে যেনার স্বীকারোক্তি করলো। তিনি তার দেহে তার পরিধেয় বস্ত্র শক্ত করে পেঁচিয়ে তাকে রজম করার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তিনি তার জানাযার নামায পড়লেন। [২৫৫৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد وهم فيه أبو عمرو -وهو عبد الرحمن بن عمرو الأوزاعي- في قوله: "عن أبي المهاجر"، والصواب: "عن أبي المهلب" كما رواه سائر أصحاب يحيى بن أبي كثير. أبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي، وأبو المهلب: هو الجرمي عم أبي قلابة. وأخرجه أبو داود (٤٤٤٠)، والنسائي في "الكبرى" (٧١٥٠) و (٧١٥٧) من طريق الأوزاعي، بهذا الإسناد. وقال النسائي: أبو المهاجر خطأ، والصواب: أبو المهلب. وأخرجه مسلم (١٦٩٦)، وأبو داود (٤٤٤٠)، والترمذي (١٥٠٠)، والنسائي ٤/ ٦٣ - ٦٤ من طرق عن يحيى بن أبي كثير، به. وقالوا جميعًا: عن أبي المهلب. وهو في "مسند أحمد" (١٩٨٦١)، و"شرح مشكل الآثار" (٣٥٣٧)، و"صحيح ابن حبان" (٥٧٤١). قوله: "فشُكت عليها ثيابها" أي: جُمعت عليها، ولُفَّت لئلا تنكشف، كأنها نُظمت وزُرَّت عليها بشوكة أو خِلال. "النهاية".









সুনান ইবনু মাজাহ (2556)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم رَجَمَ يَهُودِيَّيْنِ أَنَا فِيمَنْ رَجَمَهُمَا فَلَقَدْ رَأَيْتُهُ وَإِنَّهُ يَسْتُرُهَا مِنَ الْحِجَارَةِ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’ইয়াহূদীকে রজম করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। আমিও রজমকারীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম। আমি পুরুষ লোকটিকে দেখেছি যে, সে নারীটিকে পাথর থেকে আড়াল করছে। [২৫৫৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (١٣٢٩)، ومسلم (١٦٩٩)، وأبو داود (٤٤٤٦)، والترمذي (١٥٠١)، والنسائي في "الكبرى" (٧١٧٥ - ٧١٧٨) من طرق عن نافع، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٨١٩)، وأبو داود (٤٤٤٩)، والنسائي (٧١٧٩) من طرق عن ابن عمر. قال ابن الجوزي في "زاد المسير" ٢/ ٣٦١ - ٣٦٢ في تفسير قوله تعالى: ﴿فَإِنْ جَاءُوكَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ﴾ [المائدة: ٤٢]: اختلف علماء التفسير في هذه الآية على قولين: أحدهما: أنها منسوخة، وذلك أن أهل الكتاب كانوا إذا ترافعوا إلى النبي ﷺ كان مخيرًا، إن شاء حكم بينهم، وإن شاء أعرض عنهم، ثم نسخ ذلك بقوله: ﴿وَأَنِ احْكُمْ بَيْنَهُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ﴾ [المائدة: ٤٩] فلزمه الحكم وزال عنه التخيير. وهذا مروي عن ابن عباس وعطاء ومجاهد وعكرمة والسدي. والثاني: أنها محكمة غير منسوخة، وأن الإمام ونوابه في الحكم مخيَّرون إذا ترافعوا إليهم، إن شاؤوا حكموا بينهم، وإن شاؤوا أعرضوا عنهم. وهذا مروي عن الحسن والشعبي والنخعي والزهري، وبه قال أحمد، وهو الصحيح، لأنه لا تنافي بين الآيتين، لأن إحداهما خيرت بين الحكم وتركه، والثانية بينت كيفية الحكم إذا كان. قلنا: وقد أفتى بهذا القول عطاء بن أبي رباح ومالك بن أنس ذكر ذلك عنهما النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص ١٢٩، وإليه ذهب قتادة كما في "تفسير الطبري" ١٠/ ٣٣٠، وسعيد بن جبير كلما ذكره عنه ابن الجوزي في "نواسخ القرآن" ص ٣١٤، واختاره أبو جعفر الطبري لعدم التعارض بين الآيتين، ولأنه لم يصح به خبر عن رسول الله ﷺ، ولم يجمع عليه علماء المسلمين.









সুনান ইবনু মাজাহ (2557)


حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ سِمَاكِ بْنِ حَرْبٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم رَجَمَ يَهُودِيًّا وَيَهُودِيَّةً ‏.‏




জাবীর বিন সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজোড়া ইহূদী নারী-পুরুষকে রজম করেছিলেন। [২৫৫৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح لغيره




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد، شريك -وهو ابن عبد الله النخعي، وإن كان سيئ الحفظ- متابع. وأخرجه الترمذيُّ (١٠٥٢) من طريق شريك، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٨٥٦). وأخرجه الطيالسي في "مسنده" (٧٧٥) من طريق حماد بن سلمة، عن سماك، به. ويشهد له ما قبله.









সুনান ইবনু মাজাহ (2558)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُرَّةَ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، قَالَ مَرَّ النَّبِيُّ بِيَهُودِيٍّ مُحَمَّمٍ مَجْلُودٍ فَدَعَاهُمْ فَقَالَ ‏"‏ هَكَذَا تَجِدُونَ فِي كِتَابِكُمْ حَدَّ الزَّانِي ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا نَعَمْ ‏.‏ فَدَعَا رَجُلاً مِنْ عُلَمَائِهِمْ فَقَالَ ‏"‏ أَنْشُدُكَ بِاللَّهِ الَّذِي أَنْزَلَ التَّوْرَاةَ عَلَى مُوسَى أَهَكَذَا تَجِدُونَ حَدَّ الزَّانِي قَالَ لاَ وَلَوْلاَ أَنَّكَ نَشَدْتَنِي لَمْ أُخْبِرْكَ نَجِدُ حَدَّ الزَّانِي فِي كِتَابِنَا الرَّجْمَ وَلَكِنَّهُ كَثُرَ فِي أَشْرَافِنَا فَكُنَّا إِذَا أَخَذْنَا الشَّرِيفَ تَرَكْنَاهُ وَكُنَّا إِذَا أَخَذْنَا الضَّعِيفَ أَقَمْنَا عَلَيْهِ الْحَدَّ ‏.‏ فَقُلْنَا تَعَالَوْا فَلْنَجْتَمِعْ عَلَى شَىْءٍ نُقِيمُهُ عَلَى الشَّرِيفِ وَالْوَضِيعِ فَاجْتَمَعْنَا عَلَى التَّحْمِيمِ وَالْجَلْدِ مَكَانَ الرَّجْمِ ‏.‏ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم اللَّهُمَّ إِنِّي أَوَّلُ مَنْ أَحْيَا أَمْرَكَ إِذْ أَمَاتُوهُ ‏"‏ ‏.‏ وَأَمَرَ بِهِ فَرُجِمَ ‏.‏




বারা’ বিন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক ইহূদীকে অতিক্রম করে যাচ্ছিলেন, যার মুখে কালি মাখিয়ে বেত্রাঘাত করা হয়েছিল। তিনি তাদেরকে ডেকে জিজ্ঞেস করলেনঃ তোমরা কি তোমাদের কিতাবে যেনাকারীর এরূপ শাস্তি পেয়েছো? তারা বললো, হাঁ। তিনি তাদের আলেমদের মধ্যকার একজনকে ডেকে বলেনঃ আমি তোমাকে সেই সত্তার শপথ দিয়ে বলছি যিনি মূসা (আঃ)-এর উপর তাওরাত কিতাব নাযিল করেছেন! তোমরা কি যেনাকারীর এরূপ শাস্তিই পেয়েছো? সে বললো, না। আপনি যদি আমাকে শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস না করতেন তবে আমি আপনাকে এ কথা বলতাম না। আমরা আমাদের কিতাবে যেনাকারীর শাস্তি পেয়েছি রজম করা। কিন্তু আমাদের সম্ভ্রান্ত লোকদের মধ্যে রজমের (যেনার) অপরাধ বেড়ে গেলো। এমতাবস্থায় আমরা সম্ভ্রান্ত লোককে (এ অপরাধে) গ্রেপ্তার করলে তাকে ছেড়ে দিতাম এবং আমাদের দুর্বল ও অসহায় লোককে (একইরূপ অপরাধে) গ্রেপ্তার করলে তার উপর হদ্দ কার্যকর করতাম। (এক পর্যায়ে) আমরা বললাম এসো আমরা একটা বিষয়ে একমত হই, যা আমরা সম্ভ্রান্ত ও দুর্বল সকলের উপর কার্যকর করতে পারি। তখন থেকে আমরা (শাস্তি লাঘব করে) রজমের পরিবর্তে মুখমন্ডলে কালি মেখে বেত্রাঘাতের শাস্তি কার্যকর করতে একমত হই। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ ইয়া আল্লাহ! আমিই প্রথম ব্যক্তি যে তাদের ধ্বংস করা তোমার হুকুমকে জীবিত করেছে। অতঃপর তাঁর নির্দেশে ঐ ইহূদীকে রজম করা হয়। [২৫৫৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مهران. وقد سلف مختصرًا برقم (٢٣٢٧)، ومضى تخريجه هناك.









সুনান ইবনু মাজাহ (2559)


حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ الْوَلِيدِ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي جَعْفَرٍ، عَنْ أَبِي الأَسْوَدِ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لَوْ كُنْتُ رَاجِمًا أَحَدًا بِغَيْرِ بَيِّنَةٍ لَرَجَمْتُ فُلاَنَةَ فَقَدْ ظَهَرَ فِيهَا الرِّيبَةُ فِي مَنْطِقِهَا وَهَيْئَتِهَا وَمَنْ يَدْخُلُ عَلَيْهَا ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি যদি কাউকে সাক্ষ্য প্রমাণ ছাড়া রজম করতাম, তবে অবশ্যই অমুক নারীকে রজম করতাম। কেননা তার কথাবার্তায় ও দৈহিক বেশভূষায় এবং যারা তার কাছে যাতায়াত করে তাদের থেকে অশ্লীলতা প্রকাশ পেয়েছে। [২৫৫৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح وشطره الأول متفق عليه




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن من أجل العباس بن الوليد الدمشقي، وباقي رجاله ثقات. أبو الأسود: هو محمَّد بن عبد الرحمن بن نوفل، وعروة: هو ابن الزبير. وانظر ما بعده.









সুনান ইবনু মাজাহ (2560)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ خَلاَّدٍ الْبَاهِلِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدٍ، قَالَ ذَكَرَ ابْنُ عَبَّاسٍ الْمُتَلاَعِنَيْنِ ‏.‏ فَقَالَ لَهُ ابْنُ شَدَّادٍ هِيَ الَّتِي قَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لَوْ كُنْتُ رَاجِمًا أَحَدًا بِغَيْرِ بَيِّنَةٍ لَرَجَمْتُهَا ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ تِلْكَ امْرَأَةٌ أَعْلَنَتْ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, দু’ লিআনকারীর কথা উল্লেখ করলেন। ইবনু শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন, এই সেই নারী যার সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেনঃ আমি যদি কাউকে সাক্ষ্য-প্রমাণ ছাড়াই রজম করতাম, তবে অবশ্যই তাকে রজম করতাম। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সেই নারী তো প্রকাশ্যে অশ্লীল কাজ করেছে। [২৫৬০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو بكر بن خلاد: اسمه محمَّد، وسفيان: هو ابن عيينة، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (٦٨٥٥)، ومسلم (١٤٩٧)، والنسائي ٦/ ١٧٣ و ١٧٤ من طريقين عن القاسم بن محمَّد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٣١٠٦). قوله: "أعلنت" أي: كانت تعلن بالفاحشة، ولكن لم يثبت ذلك ببينة ولا اعتراف.









সুনান ইবনু মাজাহ (2561)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، وَأَبُو بَكْرِ بْنُ خَلاَّدٍ قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُحَمَّدٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ أَبِي عَمْرٍو، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ وَجَدْتُمُوهُ يَعْمَلُ عَمَلَ قَوْمِ لُوطٍ فَاقْتُلُوا الْفَاعِلَ وَالْمَفْعُولَ بِهِ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা কাউকে লূত জাতির অনুরূপ অপকর্মে লিপ্ত পেলে তাকে এবং যার সাথে তা করা হয় তাকে হত্যা করো। [২৫৬১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، عمرو بن أبي عمرو صدوق حسن الحديث إلا في روايته عن عكرمة، فيروي عنه مناكير، وقد عدَّ ابنُ معين هذا الحديث من منكراته. وأخرجه أبو داود (٤٤٦٢)، والترمذي (١٥٢٣) من طريق عبد العزيز بن محمَّد، بهذا الإسناد. وقال الترمذيُّ: إنما يعرف هذا الحديث عن ابن عباس عن النبي ﷺ من هذا الوجه. وروى محمَّد بن إسحاق هذا الحديث عن عمرو بن أبي عمرو فقال: ملعون من عَمِلَ عملَ قوم لوط. ولم يذكر فيه القتل. قلنا: وقد رواه عبد العزيز بن محمَّد أيضًا دون ذكر القتل، فقد أخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٢٩٧) من طريقه بإسناده بلفظ: "لعن اللهُ مَن عَمِلَ قوم لوط" ثلاثًا. وهو في "مسند أحمد" (١٨٧٥) بنحوه. وهو في "مسند أحمد" (٢٧٢٧) من طريق داود بن الحصين، عن عكرمة، به. وداود بن الحصين ثقة إلا في روايته عن عكرمة، والسند إليه ضعيف أيضًا. وانظر "شرح مشكل الآثار" للإمام الطحاوي (٣٨٣٤). قال الإمام الترمذيُّ: واختلف أهل العلم في حد اللوطي، فرأى بعضهم أن عليه الرجم أحصن أو لم يحصن، وهذا قول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق، وقال بعض أهل العلم من فقهاء التابعين، منهم الحسن البصري وإبراهيم النخعي وعطاء بن أبي رباح وغيرهم، قالوا: حدُّ اللوطي حدُّ الزاني، وهو قول الثوري وأهل الكوفة.