সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَنْبَأَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ، عَنْ عَمْرِو بْنِ عُثْمَانَ، عَنْ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ، قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَيْنَ تَنْزِلُ غَدًا وَذَلِكَ فِي حَجَّتِهِ قَالَ " وَهَلْ تَرَكَ لَنَا عَقِيلٌ مَنْزِلاً " . ثُمَّ قَالَ " نَحْنُ نَازِلُونَ غَدًا بِخَيْفِ بَنِي كِنَانَةَ - يَعْنِي الْمُحَصَّبَ - حَيْثُ قَاسَمَتْ قُرَيْشٌ عَلَى الْكُفْرِ " . وَذَلِكَ أَنَّ بَنِي كِنَانَةَ حَالَفَتْ قُرَيْشًا عَلَى بَنِي هَاشِمٍ أَنْ لاَ يُنَاكِحُوهُمْ وَلاَ يُبَايِعُوهُمْ . قَالَ مَعْمَرٌ قَالَ الزُّهْرِيُّ وَالْخَيْفُ الْوَادِي .
উসামাহ বিন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি বললাম, ইয়া রাসূ্লাল্লাহ ! আমরা আগামীকাল কোথায় অবতরণ করবো? এটা তাঁর (বিদায়) হজ্জের সময়কার কথা। তিনি বলেন,আকীল কি আমাদের জন্য একটি বাড়িও অবশিষ্ট রেখেছে? তিনি পুনরায় বলেনঃ আমরা আগামীকাল বনূ কিনানার ঘাঁটিতে (অর্থাৎ মুহাসসাবে) অবতরণ করবো যেখানে কুরায়াশগণ কুফরীর উপর অবিচল থাকার শপথ করেছিলো। অর্থাৎ বনূ কিনানাহ কুরায়াশদের নিকট থেকে বনু হাশিমের বিরুদ্ধে এই মর্মে প্রতিশ্রুতি আদায় করে যে, তারা শেষোক্ত গোত্রের সাথে বৈবাহিক সম্পর্ক স্থাপন করবে না এবং ব্যবসায়িক লেনদেনও করবে না। মা’মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যুহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন,আল- খায়ফ অর্থ উপত্যকা। [২৯৪২]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٣٠٥٨)، ومسلم (١٣٥١)، وأبو داود (٢٠١٠) و (٢٩١٠) من طريق الزهري، بهذا الإسناد. وسلف بعض الحديث برقم (٢٧٣٠). قوله: "قاسمت قريش" قال السندي: أي: توافقوا على القسم على ثبوتهم على مقتضيات الكفر "أن لا يناكحوهم" أي: حتى يُسلموا النبي ﷺ إليهم ليفعلوا ما شاؤوا. وفي "الفتح" ٨/ ١٥: وقيل: إنما اختار النبي ﷺ النزول في ذلك الموضع ليتذكر ما كانوا فيه، فيشكر الله تعالى على ما أنعم به عليه من الفتح العظيم، وتَمكُنهم من دخول مكة ظاهرًا على رغم أنف من سعى في إخراجه منها، ومبالغة في الصفح عن الذين أساؤوا، ومقابلتهم بالمَنً والأحسان، ذلك فضل الله يؤتيه من يشاء
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، حَدَّثَنَا عَاصِمٌ الأَحْوَلُ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سَرْجِسَ، قَالَ رَأَيْتُ الأُصَيْلِعَ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ يُقَبِّلُ الْحَجَرَ وَيَقُولُ إِنِّي لأُقَبِّلُكَ وَإِنِّي لأَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لاَ تَضُرُّ وَلاَ تَنْفَعُ وَلَوْلاَ أَنِّي رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يُقَبِّلُكَ مَا قَبَّلْتُكَ .
আবদুল্লাহ বিন সারজিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি আল-উসায়লিহ্ অর্থাৎ উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে দেখলাম যে, তিনি হাজরে আসওয়াদে চুমা দিচ্ছেন আর বলছেন, আমি অবশ্যই তোমাকে চুম্বন করছি। আমি নিশ্চিত জানি যে, তুমি একটি পাথর মাত্র, তুমি ক্ষতিও করতে পারো না এবং উপকারও করতে পার না। আমি যদি রাসূ্লুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে তোমায় চুমা দিতে না দেখতাম , তাহলে আমিও তোমায় চুমা দিতাম না। [২৯৪৩]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (١٢٧٠) (٢٥٠)، والنسائي في "الكبرى" (٣٩٠٤) من طريق عاصم الأحول، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه البخاري (١٥٩٧) و (١٦٠٥) و (١٦١٠)، ومسلم (١٢٧٠)، وأبو داود (١٨٧٣)، والترمذي (٨٧٦)، والنسائي ٥/ ٢٢٦ - ٢٢٧ و ٢٢٧ من طرق عن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٩)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٢١)
حَدَّثَنَا سُوَيْدُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحِيمِ الرَّازِيُّ، عَنِ ابْنِ خُثَيْمٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، قَالَ سَمِعْتُ ابْنَ عَبَّاسٍ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " لَيَأْتِيَنَّ هَذَا الْحَجَرُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَهُ عَيْنَانِ يُبْصِرُ بِهِمَا وَلِسَانٌ يَنْطِقُ بِهِ يَشْهَدُ عَلَى مَنْ يَسْتَلِمُهُ بِحَقٍّ " .
সাঈদ বিন জুবায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বলতে শুনেছি রাসূ্লুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ক্বিয়া্মতের দিন এই পাথরকে উপস্থিত করা হবে। তার দুটি চোখ থাকবে, তা দিয়ে সে দেখবে, যবান থাকবে তা দিয়ে সে কথা বলবে এবং সে এমন লোকের অনুকূলে সাক্ষ্য দিবে যে তাকে সত্যতার সাথে চুমা দিয়েছে। [২৯৪৪]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، سويد بن سعيد متابع. ابن خثيم: هو عبد الله بن عثمان. وأخرجه الترمذي (٩٨٢) من طريق ابن خثيم، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٢١٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٧١١). قوله: "بحق" أي: ملتبسًا بحق، وهو دين الإسلام، واستلامه بحق هو طاعة الله واتباع سنة نبيه ﷺ، لا تعظيم الحجر نفسه، والشهادة عليه هي الشهادة على أدائه حق الله المتعلق به. قاله السندي
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا خَالِي، يَعْلَى عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَوْنٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ اسْتَقْبَلَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ الْحَجَرَ ثُمَّ وَضَعَ شَفَتَيْهِ عَلَيْهِ يَبْكِي طَوِيلاً ثُمَّ الْتَفَتَ فَإِذَا هُوَ بِعُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ يَبْكِي فَقَالَ " يَا عُمَرُ هَاهُنَا تُسْكَبُ الْعَبَرَاتُ " .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূ্লুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাথরের দিকে মুখ করলেন, অতঃপর তার উপর নিজের দুই ঠোঁট স্থাপন করে দীর্ঘক্ষণ কাঁদলেন। অতঃপর তিনি অন্য দিকে মুখ ফিরিয়ে দেখলেন যে, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও কাঁদলেন। তিনি বলেন,হে উমার ! এটাই অশ্রু প্রবাহিত করার উপযুক্ত স্থান। [২৯৪৫]
তাহকীক আলবানীঃ খুবই দুর্বল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف جدا
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف جدًا ، محمد بن عون: متروک (تقریب: 6203) ، والسند ضعفہ البوصیري، (انوار الصحیفہ ص 483، 484)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، محمَّد بن عون -وهو الخراساني- متروك، قال أبو حاتم: روى عن نافع حديثًا ليس له أصل، قال المزي بعد أن روى الحديث المذكور أعلاه: وكأنه الحديث الذي أشار إليه أبو حاتم. يعلى: هو ابن عبيد الطنافسي. وأخرجه عبد بن حميد (٧٦٠)، والفاكلهي في "أخبار مكة" ١/ ١١٥، وابن خزيمة (٢٧١٢)، والعقيلي في "الضعفاء" ٤/ ١١٢، وابن حبان في "المجروحين"، وابن عدي في "الكامل" ثلاثتهم في ترجمة محمَّد بن عوف الخراساني، والحاكم ١/ ٤٥٤، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٤٠٥٦) من طريق يعلى بن عبيد، بهذا الإسناد. وقال الحاكم: صحيح الإسناد ولم يخرجاه!! قو له: "العبرات" أي: الدموع
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ الْمِصْرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ لَمْ يَكُنْ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَسْتَلِمُ مِنْ أَرْكَانِ الْبَيْتِ إِلاَّ الرُّكْنَ الأَسْوَدَ وَالَّذِي يَلِيهِ مِنْ نَحْوِ دُورِ الْجُمَحِيِّينَ .
আবদুল্লাহ বিন উমার) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর কোন রুকনে চুমা খেতেন না, কেবলমাত্র রুকনুল আসওয়াদ (কালো পাথর) এবং এর নিকটের জুমাহ গোত্রের দিককার কোণে (রুকনে ইয়ামানিতে) চুমা খেতেন। [২৯৪৬]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي. وأخرجه البخاري (١٦٠٩)، ومسلم (١٢٦٧)، وأبو داود (١٨٧٤)، والنسائي ٥/ ٢٣٢ من طريق الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٠١٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٢٧). وأخرجه مسلم (١٢٦٧) (٢٤٤)، والنسائي ٥/ ٢٣١ من طريق نافع، عن عمر. ْوأخرجه ضمن حديث طويل: البخاري (١٦٦)، ومسلم (١١٨٧)، وأبو داود (١٧٧٢)، والنسائي ٥/ ٢٣٢ من طريق عبيد بن جريج، عن ابن عمر. قوله: "والذي يليه" أي: الركن اليماني، وجاء صريحًا في بعض مصادر التخريج
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ بُكَيْرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ جَعْفَرِ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي ثَوْرٍ، عَنْ صَفِيَّةَ بِنْتِ شَيْبَةَ، قَالَتْ لَمَّا اطْمَأَنَّ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ عَامَ الْفَتْحِ طَافَ عَلَى بَعِيرِهِ يَسْتَلِمُ الرُّكْنَ بِمِحْجَنٍ بِيَدِهِ ثُمَّ دَخَلَ الْكَعْبَةَ فَوَجَدَ فِيهَا حَمَامَةَ عَيْدَانٍ فَكَسَرَهَا ثُمَّ قَامَ عَلَى بَابِ الْكَعْبَةِ فَرَمَى بِهَا وَأَنَا أَنْظُرُهُ .
শায়বাহ’র কন্যা সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর যখন নিশ্চিত (নিরাপদ) হলেন তখন তিনি স্বীয় উটে আরোহণ করে (বাইতুল্লাহ) তাওয়াফ করেন এবং নিজের হাতের লাঠির সাহাস্যে রুকন (হাজরে আসওয়াদ) কে চুম্বন করেন। অতঃপর তিনি কাবার অভ্যন্তরে প্রবেশ করেন এবং তথায় কাঠের তৈরী একটি কবুতর দেখতে পান। তিনি তা ভেঙ্গে ফেলেন এবং অতঃপর তা কাবার দরজায় দাঁড়িয়ে বাইরে নিক্ষেপ করেন। আমি তা দেখেছিলাম। [২৯৪৭]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن. محمَّد بن إسحاق حسن الحديث، وقد صرح بالتحديث عند أبي داود وغيره، فانتفت شبهة تدليسه. وأخرجه أبو داود (١٨٧٨) من طريق يونس بن بكير، بهذا الإسناد. قوله: "بمحجن" بكسر الميم وسكون الحاء المهملة: هو عصا معوجة الرأس. "حمامة عَيدان" بالإضافة وفتح عين "عيدان"، والمراد بالحمامة صورة كصورة الحمامة، وكانت من عيدان، وهي الطويل من النخل، الواحدة: عَيدانة. قاله السندي
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، أَنْبَأَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ طَافَ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ عَلَى بَعِيرٍ يَسْتَلِمُ الرُّكْنَ بِمِحْجَنٍ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জে একটি উটে আরোহণ করে তাওয়াফ করেন এবং একটি লাঠির সাহায্যে (ইশারায়) রুকনকে চুম্বন করেন। [২৯৪৮]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي. وأخرجه البخاري (١٦٠٧)، ومسلم (١٢٧٢)، وأبو داود (١٨٧٧)، والنسائي ٥/ ٢٣٣ من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٣٨٢٩). والنسائي (٣٩١١) من طريق مجاهد، كلاهما عن ابن عباس. وأخرجه أحمد (١٨٤١)، والبخاري (١٦١٢) و (١٦١٣) و (٥٢٩٣)، والترمذي (٨٨١)، والنسائي ٥/ ٢٣٣ من طريق عكرمة عن ابن عباس، قال: طاف النبي ﷺ بالبيت على بعير، كلما أتى على الركن أشار إليه. وهو عند أبي داود (١٨٨١) من طريق ضعيف عن عكرمة بلفظ: قدم مكة وهو يشتكي فطاف على راحلته كلما أتى على الركن استلم الركن بمحجن، فلما فرغ من طوافه أناخ فصلى ركعتين. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٩١١) من طريق مجاهد عن ابن عباس: أن رسول الله ﷺ كان يستلم الركن بمحجنه، ويُقبِّل المحجن. وانظر ما بعده
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، ح وَحَدَّثَنَا هَدِيَّةُ بْنُ عَبْدِ الْوَهَّابِ، حَدَّثَنَا الْفَضْلُ بْنُ مُوسَى، قَالاَ حَدَّثَنَا مَعْرُوفُ بْنُ خَرَّبُوذَ الْمَكِّيُّ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا الطُّفَيْلِ، عَامِرَ بْنَ وَاثِلَةَ قَالَ رَأَيْتُ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَطُوفُ بِالْبَيْتِ عَلَى رَاحِلَتِهِ يَسْتَلِمُ الرُّكْنَ بِمِحْجَنِهِ وَيُقَبِّلُ الْمِحْجَنَ .
আবূ তোফায়েল আমর বিন ওয়াসেলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে দেখেছি তিনি তাঁর সওয়ারীতে আরোহণ করে বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করেন, নিজ লাঠির সাহায্যে রুকন স্পর্শ করেন এবং লাঠিতে চুমা দেন। [২৯৪৯]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل معروف بن خرَّبوذ. وأخرجه مسلم (١٢٧٥)، وأبو داود (١٨٧٩) من طريق معروف بن خربوذ، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ بَشِيرٍ، ح وَحَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ إِذَا طَافَ بِالْبَيْتِ الطَّوَافَ الأَوَّلَ رَمَلَ ثَلاَثَةً وَمَشَى أَرْبَعَةً مِنَ الْحَجَرِ إِلَى الْحَجَرِ وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يَفْعَلُهُ .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাইতুল্লাহ তাওয়াফ শুরু করতেন তখন প্রথম তিন চক্করে (তাওয়াফে) রামল করতেন (বাহু দুলিয়ে বীরদর্পে প্রদক্ষিণ করতেন) এবং চার চক্করে সাধারণভাবে হেঁটে তাওয়াফ করতেন- হাজরে আসওয়াদ থেকে তাওয়াফ (প্রদক্ষিণ) শুরু করে হাজরে আসওয়াদ পর্যন্ত। ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তাই করতেন। [২৯৫০]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح، صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٦١٧)، ومسلم (١٢٦١) (٢٣٠) و (١٢٦٢)، وأبو داود (١٨٩١)، والنسائي ٥/ ٢٢٩ من طريق عبيد الله بن عمر، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه البخاري (١٦٠٤) من طريق فليح بن سليمان، والبخاري (١٦١٦)، ومسلم (١٢٦١) (٢٣١)، وأبو داود (١٨٩٣)، والنسائي ٥/ ٢٢٩ من طريق موسى بن عقبة، والنسائي ٥/ ٢٣٠ من طريق كثير بن فرقد، ثلاثتهم عن نافع، به. وأخرجه البخاري (١٦٠٣)، ومسلم (١٢٦١) (٢٣٢)، والنسائي ٥/ ٢٢٩ - ٢٣٠ من طريق الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، قال: رأيت رسول الله حين يقدم مكة إذا استلم الركن الأسود أولَ ما يطوف: يَخُب ثلاثة أطواف من السبع. وهو في "مسند أحمد" (٤٨٤٤). وانظر ما بعده. قوله: "رَمَل" بفتحتين: الهرولة، والمصدر: رَمَلٌ ورَمَلان
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ الْعُكْلِيُّ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَنَسٍ، عَنْ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَمَلَ مِنَ الْحَجَرِ إِلَى الْحَجَرِ ثَلاَثًا وَمَشَى أَرْبَعًا .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজরে আসওয়াদ থেকে শুরু করে হাজরে আসওয়াদ পর্যন্ত তিনবার রামল করতেন এবং চারবার সাধারণ গতিতে তাওয়াফ করতেন। [২৯৫১]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو الحسين العكلي: زيد بن الحباب. وأخرجه مسلم (١٢٦٣)، والترمذي (٨٧٣)، والنسائي ٥/ ٢٣٠ من طريق مالك، بهذا الإسناد. وقرن مسلمٌ بمالك ابنَ جريج في إحدى روايتيه. وهو في "مسند أحمد" (١٤٦٦١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨١٠). وانظر حديث جابر الطويل الآتي برقم (٣٠٧٤)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ عَوْنٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ سَمِعْتُ عُمَرَ، يَقُولُ فِيمَ الرَّمَلاَنُ الآنَ وَقَدْ أَطَّأَ اللَّهُ الإِسْلاَمَ وَنَفَى الْكُفْرَ وَأَهْلَهُ وَايْمُ اللَّهِ مَا نَدَعُ شَيْئًا كُنَّا نَفْعَلُهُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ .
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এখন এই দু’ রামলের মধ্যে কী ফায়দা আছে? এখন তো আল্লাহ তাআলা ইসলামকে শক্তিশালী করেছেন এবং কুফর ও তার অনুসারীদের নিশ্চিহ্ন করেছেন। আল্লাহর শপথ! আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে যেসব আমল করেছি তার কিছুই ত্যাগ করব না। [২৯৫২]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * أثر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل هشام بن سعد، وقد توبع. وأخرجه أبو داود (١٨٨٧) من طريق عبد الملك بن عمرو عن هشام بن سعد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٣١٧). وأخرجه البخاري (١٦٠٥) من طريق محمَّد بن جعفر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه: أن عمر بن الخطاب قال للركن: أما والله إني لأعلم أنك حجر لا تضر ولا تنفع، ولولا أني رأيت رسول الله ﷺ استلمك ما استلمتك فاستلمه، ثم قال: ما لنا وللرمل إنما كنا راءَينا به المشركين، وقد أهلكهم الله، ثم قال: شيء صنعه النبي ﷺ فلا نحب أن نتركه. ومعنى راءَينا: أي: أرينا المشركين بذلك أنا أقوياء. والرمل والاضطباع مستحب عند الجمهور سوى مالك. قاله ابن المنذر. وقوله: "أطأ الله الإسلام" أي: مكَّنَ له
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَنْبَأَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ ابْنِ خُثَيْمٍ، عَنْ أَبِي الطُّفَيْلِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ لأَصْحَابِهِ حِينَ أَرَادُوا دُخُولَ مَكَّةَ فِي عُمْرَتِهِ بَعْدَ الْحُدَيْبِيَةِ " إِنَّ قَوْمَكُمْ غَدًا سَيَرَوْنَكُمْ فَلَيَرَوُنَّكُمْ جُلْدًا " . فَلَمَّا دَخَلُوا الْمَسْجِدَ اسْتَلَمُوا الرُّكْنَ وَرَمَلُوا وَالنَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ مَعَهُمْ حَتَّى إِذَا بَلَغُوا الرُّكْنَ الْيَمَانِيَّ مَشَوْا إِلَى الرُّكْنِ الأَسْوَدِ ثُمَّ رَمَلُوا حَتَّى بَلَغُوا الرُّكْنَ الْيَمَانِيَّ ثُمَّ مَشَوْا إِلَى الرُّكْنِ الأَسْوَدِ فَفَعَلَ ذَلِكَ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ ثُمَّ مَشَى الأَرْبَعَ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার ঘটনার পরবর্তী বছরে উমরা পালনকালে মক্কায় প্রবেশের প্রাক্কালে তাঁর সাহাবীগণকে বলেনঃ অচিরেই তোমাদের সম্প্রদায় আগামীকাল তোমাদের দেখতে পাবে। অতএব তারা যেন তোমাদের সতেজ ও চালাক চতুর দেখতে পায়। তারা মসজিদে প্রবেশ করে রুকন (পাথর) চুম্বন করেন এবং রামল করেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সাথে ছিলেন। তারা রুকনে ইয়ামানীতে পৌঁছে হাজরে আসওয়াদ পর্যন্ত স্বাভাবিক গতিতে অগ্রসর হন। তারা পুনরায় রামল করে রুকনে ইয়ামানীতে পৌঁছান; অতঃপর রুকনুল আসওয়াদ পর্যন্ত স্বাভাবিক গতিতে চলেন। তারা তিনবার রামল করেন ও চারবার স্বাভাবিক গতিতে হাঁটেন। [২৯৫৩]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل ابن خثيم -وهو عبد الله بن عثمان بن خثيم، وقد توبع. وأخرجه أبو داود (١٨٨٩) و (١٨٩٠) مختصرًا من طريقين عن عبد الله بن خثيم، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه مسلم (١٢٦٤) (٢٣٧) و (٢٣٨)، وأبو داود (١٨٨٥) من طريق أبي الطفيل، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٨٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨١٤). وأخرجه البخاري (١٦٠٢) و (٤٢٥٦)، ومسلم (١٢٦٦) (٢٤٠)، وأبو داود (١٨٨٦) من طريق سعيد بن جبير، والبخاري (١٦٤٩) و (٤٢٥٧)، ومسلم (١٢٦٦) (٢٤١)، والنسائي ٥/ ٢٤٢ من طريق عطاء، والترمذي (٨٧٩) من طريق طاووس، ثلاثتهم عن ابن عباس بنحوه، وعند بعضهم مختصر. قوله: "الجُلد" بالضم جمع جَلد بالفتح، والاسم منه الجَلَد بفتحتين، ومعناه: القوة والصبر والتحمل. قال النووي في "شرح مسلم" حديث ابن عباس منسوخ بالحديث الأول (يعني حديث ابن عمر السالف برقم ٢٩٥٠)، لأن حديث ابن عباس كان في عمرة القضاء سنة سبع قبل فتح مكة، وكان في المسلمين ضعف في أبدانهم، وإنما رَمَلوا إظهارًا للقوة واحتاجوا إلى ذلك في غير ما بين الركنين اليمانيين، لأن المشركين كانوا جلوسا في الحجر وكانوا لا يرونهم بين هذين الركنين، ويرونهم فيما سوى ذلك، فلما حج النبي ﷺ حجة الوداع سنة عشر، رَمَلَ من الحَجَر إلى الحَجَر، فرجب الأخذ بهذا المتأخر
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يُوسُفَ، وَقَبِيصَةُ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ عَبْدِ الْحَمِيدِ، عَنِ ابْنِ يَعْلَى بْنِ أُمَيَّةَ، عَنْ أَبِيهِ، يَعْلَى أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ طَافَ مُضْطَبِعًا . قَالَ قَبِيصَةُ وَعَلَيْهِ بُرْدٌ .
ইয়া’লা বিন উমায়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান কাঁধ খোলা রেখে এবং বাম কাঁধের উপর চাদরের উভয় কোণ একত্রে লটকিয়ে তাওয়াফ করেন। কাবীসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তাঁর পরিধানে ছিল একটি চাদর। [২৯৫৪]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (1883) ترمذي (859)، (انوار الصحیفہ ص 484)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن يعلى: ذكره المزي فيمن اشتهر بالنسبة إلى أبيه، وقال: إن لم يكن صفوانَ بن يعلى فلا أدري من هو، قلنا: وصفوان ثقة من رجال الشيخين. عبد الحميد: هو ابن جبير. وأخرجه الترمذي (٨٧٥) من طريق قبيصة بن عقبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٩٥٢). وأخرجه أبو داود (١٨٨٣) عن محمَّد بن كثير، عن سفيان، عن ابن جريج، عن ابن يعلى، به، لم يذكر في سنده عبد الحميد بن جبير
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا شَيْبَانُ، عَنْ أَشْعَثَ بْنِ أَبِي الشَّعْثَاءِ، عَنِ الأَسْوَدِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ سَأَلْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ عَنِ الْحِجْرِ . فَقَالَ " هُوَ مِنَ الْبَيْتِ " . قُلْتُ مَا مَنَعَهُمْ أَنْ يُدْخِلُوهُ فِيهِ قَالَ " عَجَزَتْ بِهِمُ النَّفَقَةُ " . قُلْتُ فَمَا شَأْنُ بَابِهِ مُرْتَفِعًا لاَ يُصْعَدُ إِلَيْهِ إِلاَّ بِسُلَّمٍ قَالَ " ذَلِكَ فِعْلُ قَوْمِكِ لِيُدْخِلُوهُ مَنْ شَاءُوا وَيَمْنَعُوهُ مَنْ شَاءُوا وَلَوْلاَ أَنَّ قَوْمَكِ حَدِيثُ عَهْدٍ بِكُفْرٍ مَخَافَةَ أَنْ تَنْفِرَ قُلُوبُهُمْ لَنَظَرْتُ هَلْ أُغَيِّرُهُ فَأُدْخِلَ فِيهِ مَا انْتَقَصَ مِنْهُ وَجَعَلْتُ بَابَهُ بِالأَرْضِ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট হিজর (হাতীম) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বলেনঃ তা বাইতুল্লার অন্তর্ভূক্ত। আমি বললাম, তাকে কা’বার অন্তর্ভূক্ত করতে কোন জিনিস তাদের বাধা দিলো? তিনি বলেনঃ অর্থাভাব তাদের অপারগ করে দিয়েছিল। আমি বললাম, তার দরজা এতো উঁচুতে স্থাপিত হওয়ার কারণ কী যে, তাতে সিঁড়ি ব্যতীত উঠা যায় না? তিনি বলেনঃ তা তোমার সম্প্রদায়ের কান্ড। তাদের মর্জি হলে কেউ তাতে প্রবেশ করতে পারতো, আর যাদেরকে ইচ্ছা তাতে প্রবেশে বাধা দিতো। তোমার সম্প্রদায়ের কুফরী ত্যাগের যুগ যদি অতি নিকট না হতো এবং (কাবা ঘর ভাঙার কারণে) তাদের মধ্যে বিতৃষ্ণার উদ্রেক হওয়ার আশঙ্কা না থাকতো, তাহলে তুমি দেখতে পেতে আমি কিভাবে তা পরিবর্তন করতাম! তা থেকে যা বাদ দেওয়া হয়েছিল আমি পুনরায় তা এর অন্তর্ভূক্ত করতাম আবং তার দরজা ভূমি বরাবর স্থাপন করতাম। [২৯৫৫]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. شيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي. وأخرجه البخاري (١٥٨٤) و (٧٢٤٣)، ومسلم (١٣٣٣) (٤٠٥) و (٤٠٦) من طريق الأشعث، بهذا الإسناد. وأخرجه مطولًا ومختصرًا: البخاري (١٢٦)، والترمذي (٨٩٠)، والنسائي ٥/ ٢١٥ من طريق أبي إسحاق السبيعي عن الأسود، به. وأخرجه مطولًا ومختصرًا: البخاري (١٥٨٣) و (١٥٨٥) و (١٥٨٦) و (٣٣٦٨) و (٤٤٨٤)، ومسلم (١٣٣٣)، وأبو داود (٢٠٢٨)، والترمذي (٨٩١)، والنسائي ٥/ ٢١٤ - ٢١٦ و ٢١٨ و ٢١٩ من طرق عن عائشة. وقوله: عجزت بهم النفقة، يعني النفقة الطيبة التي أخرجوها لذلك كما جزم به الأزرقي وغيره، يوضحه ما ذكره ابن إسحاق في "السيرة" عن عبد الله بن أبي نجيح أنه أخبر عن عبد الله بن صفوان بن أمية: أن أبا وهب بن عابد بن عمران بن مخزوم -وهو جد جعدة بن هبيرة بن أبي وهب المخزومي- قال لقريش: لا تُدخِلوا فيه من كسبكم إلا الطيب، ولا تُدخِلوا فيه مهرَ بغي، ولا بيعَ ربا ولا مَظلِمةَ أحدٍ من الناس. قاله الحافظ في "الفتح" ٣/ ٤٤٤. قال الحافظ في "الفتح" ١/ ٢٤٩ وفي الحديث معنى ما ترجم له البخاري (١٢٦) - تحت باب: من ترك بعض الاختيار مخافةَ أن يَقصُر فَهمُ بعض الناس عنه، فيقعوا في أشدَّ منه -لأن قريشًا كانت تعظم أمر الكعبة جدًا، فخشي- ﷺ أن يظنوا لأجل قرب عهدهم بالإسلام أنه غير بناءها لينفرد بالفخر عليهم في ذلك. ويستفاد منه ترك المصلحة لاْمن الوقوع في المفسدة. ومنه ترك إنكار المنكر خشية الوقوع في أنكر منه. وأن الإمام يسوس رعيته بما فيه إصلاحهم ولو كان مفضولًا ما لم يكن محرمًا
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْفُضَيْلِ، عَنِ الْعَلاَءِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ " مَنْ طَافَ بِالْبَيْتِ وَصَلَّى رَكْعَتَيْنِ كَانَ كَعِتْقِ رَقَبَةٍ " .
আবদুল্লাহ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ যে ব্যক্তি বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করলো এবং দু’ রাকাআত নামায পড়লো, তা একটি ক্রীতদাসকে দাসত্বমুক্ত করার সমতুল্য। [২৯৫৬]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أن عطاء -وهو ابن أبي رباح- لم يسمع من ابن عمر، لكن قد جاء الحديث من طريق آخر موصول. وأخرجه ابن أبي شيبة ص ٧٨ (نشر العمروي) عن أبي معاوية، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عمر موقوفًا. وأخرجه الترمذي (٩٨٠) من طريق جرير بن عبد الحميد، والنسائي ٥/ ٢٢١ من طريق حماد بن زيد، كلاهما عن عطاء بن السائب، عن عبد الله بن عُبيد بن عمير، عن أبيه، عن ابن عمر. ورواية النسائي: عن عبد الله بن عُبيد أن رجلًا قال: يا أبا عبد الرحمن (يعني لابن عمر) فذكره. قلنا: الرجل السائل المبهم في رواية النسائي هو أبوه: عبيد بن عمير المذكور في رواية الترمذي، وجاء ذلك صريحًا في رواية هثيم عند أحمد (٤٤٦٢). ورواية النسائي سندها جيد، لأن حماد بن زيد ممن روى عن عطاء بن السائب قبل اختلاطه، لا سيما وقد تابعه أيضًا الثوري عند أحمد (٥٦٢١) وهو ممن روى عن عطاء قبل اختلاطه أيضًا
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ عَيَّاشٍ، حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ أَبِي سَوِيَّةَ، قَالَ سَمِعْتُ ابْنَ هِشَامٍ، يَسْأَلُ عَطَاءَ بْنَ أَبِي رَبَاحٍ عَنِ الرُّكْنِ الْيَمَانِيِّ، وَهُوَ يَطُوفُ بِالْبَيْتِ فَقَالَ عَطَاءٌ حَدَّثَنِي أَبُو هُرَيْرَةَ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " وُكِلَ بِهِ سَبْعُونَ مَلَكًا فَمَنْ قَالَ اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ - قَالُوا آمِينَ " . فَلَمَّا بَلَغَ الرُّكْنَ الأَسْوَدَ قَالَ يَا أَبَا مُحَمَّدٍ مَا بَلَغَكَ فِي هَذَا الرُّكْنِ الأَسْوَدِ فَقَالَ عَطَاءٌ حَدَّثَنِي أَبُو هُرَيْرَةَ أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ " مَنْ فَاوَضَهُ فَإِنَّمَا يُفَاوِضُ يَدَ الرَّحْمَنِ " . قَالَ لَهُ ابْنُ هِشَامٍ يَا أَبَا مُحَمَّدٍ فَالطَّوَافُ قَالَ عَطَاءٌ حَدَّثَنِي أَبُو هُرَيْرَةَ أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ " مَنْ طَافَ بِالْبَيْتِ سَبْعًا وَلاَ يَتَكَلَّمُ إِلاَّ بِسُبْحَانَ اللَّهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ وَلاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ وَلاَ حَوْلَ وَلاَقُوَّةَ إِلاَّ بِاللَّهِ مُحِيَتْ عَنْهُ عَشْرُ سِيِّئَاتٍ وَكُتِبَتْ لَهُ عَشْرُ حَسَنَاتٍ وَرُفِعَ لَهُ بِهَا عَشْرُ دَرَجَاتٍ وَمَنْ طَافَ فَتَكَلَّمَ وَهُوَ فِي تِلْكَ الْحَالِ خَاضَ فِي الرَّحْمَةِ بِرِجْلَيْهِ كَخَائِضِ الْمَاءِ بِرِجْلَيْهِ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি ইবনে হিশামকে রকনে ইয়ামানী সম্পর্কে আ’তা বিন আবূ রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট জিজ্ঞেস করতে শুনেছি। তিনি তখন বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করছিলেন। আতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ (রুকনে ইয়ামানীতে) সত্তরজন ফেরেশতা মোতায়েন আছেন। অতএব যে ব্যক্তি বলে, “আল্লাহুম্মা ইন্নী আসয়ালুকাল আফওয়া, ওয়াল-আফিয়াতা ফিদ-দুনয়া ওয়াল-আখিরাতে রব্বানা আতিনা ফিদ-দুনয়া হাসানাতান ওয়াফিল-আখিরাতে হাসানাতান ওয়াকিনা আযাবান-নার,” তখন ফেরেশতাগণ বলেন, আমীন। (“হে আল্লাহ আমি আপনার নিকট ক্ষমা ও নিরাপত্তা প্রার্থনা করি দুনিয়া ও আখিরাতের। হে আমাদের প্রতিপালক! আমাদের দুনিয়ার কল্যাণ দান করুন, আখেরাতেরও কল্যাণ দান করুন এবং আমাদেরকে জাহান্নামের শাস্তি থেকে রক্ষা করুন”)।
আতা’ বিন আবূ রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রুকনুল-আসওয়াদ (হাজরে আসওয়াদ) পৌঁছালে ইবনু হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, হে আবূ মুহাম্মদ! এই রুকনল আসওয়াদ সম্পর্কে আপনি কী জানতে পেরেছেন? আতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছেনঃ “যে কেউ তার সামনা-সামনি হলো, সে যেন দয়াময় আল্লাহর হাতের সামনাসামনি হলো। ইবনু হিশাম পুনরায় তাকে জিজ্ঞেস করেন, হে আবূ মুহাম্মদ! তাওয়াফ সম্পর্কে কী এসেছে? আতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছেনঃ “যে ব্যক্তি সাতবার বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করে এবং কোন কথা না বলে নিম্নোক্ত দোয়া পড়ে, ‘সুবহানাল্লাহ ওয়াল-হামদুলিল্লাহ ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াল্লাহু আকবার ওয়া লা হাওলা ওয়ালা কুওয়্যাতা ইল্লা বিল্লাহ’, তার দশটি গুনাহ মুছে যাবে, তার জন্য দশটি নেকি লেখা হবে এবং তার মর্যাদা দশগুণ বৃদ্ধি করা হবে। আর যে ব্যক্তি তাওয়াফরত অবস্থায় কথা বলে, সে তার পদদ্বয় কেবল রহমাতের মধ্যে ডুবিয়ে রাখে, যেমন কারো পদদ্বয় পানিতে ডুবে থাকে।” [২৯৫৭]
তাহকীক আলবানীঃ দূর্বল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، قال البوصیري: ’’ ھذا إسناد ضعیف،حمید (بن أبي سویۃ) قال، فیہ ابن عدي: أحادیثہ غیر محفوظۃ وقال الذہبي: مجہول ‘‘، (انوار الصحیفہ ص 484)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، حميد بن أبي سوية- وصوابه ابن أبي سويد- له مناكير كما قال البيهقي في "الشعب" (١٧٤٩) والذهبي في "الكاشف"، وقال ابن عدي: أحاديثه غير محفوظات. وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" ١/ ٨٨ - ٨٩ و ٢٨١، والطبراني في "الأوسط" (٨٤٠٠)، وابن عدي في ترجمة حميد من "الكامل" من طريق إسماعيل بن عياش، عن حميد بن أبي سويد -على الصواب-، بهذا الإسناد
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ كَثِيرِ بْنِ كَثِيرِ بْنِ الْمُطَّلِبِ بْنِ أَبِي وَدَاعَةَ السَّهْمِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ الْمُطَّلِبِ، قَالَ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ إِذَا فَرَغَ مِنْ سَبْعِهِ جَاءَ حَتَّى يُحَاذِيَ بِالرُّكْنِ فَصَلَّى رَكْعَتَيْنِ فى حَاشِيَةِ الْمَطَافِ وَلَيْسَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ الطُّوَّافِ أَحَدٌ . قَالَ ابْنُ مَاجَهْ هَذَا بِمَكَّةَ خَاصَّةً .
আল-মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে দেখেছি যে, তিনি সাত চক্কর তাওয়াফ শেষ করে হাজরে আসওয়াদ বরাবর এলেন এবং মাতাফের প্রান্তে দু’ রাক’আত সালাত আদায় করলেন। তাঁর ও তাওয়াফের মাঝে আর কেউ ছিল না। ইবনু মাজাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এটা (সুতরাবিহীন অবস্থায় সলাত আদায় করা) কেবল মক্কার জন্য নির্দিষ্ট। [২৯৫৮]
তাহকীক আলবানীঃ দূর্বল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (2016) نسائي (759،2962)، (انوار الصحیفہ ص 484)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث ضعيف مضطرب كما بيناه في "مسند أحمد" عند الحديث (٢٧٢٤١). وهذا سند فيه انقطاع كثير بن كثير لم يسمع من أبيه، وأبوه لم يوثقه غير ابن حبان. وأخرجه النسائي ١/ ٦٧ و٥/ ٢٣٥ من طريق ابن جريج، عن كثير بن كثير، عن أبيه، عن جده المطلب. وأخرجه أبو داود (٢٥١٦) من طريق سفيان بن عيينة، عن كثير بن كثير، عن بعض أهله، عن جده. وهو في "المسند" (٢٧٢٤٤)
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَمْرُو بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ ثَابِتٍ الْعَبْدِيِّ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَدِمَ فَطَافَ بِالْبَيْتِ سَبْعًا ثُمَّ صَلَّى رَكْعَتَيْنِ - قَالَ وَكِيعٌ يَعْنِي عِنْدَ الْمَقَامِ - ثُمَّ خَرَجَ إِلَى الصَّفَا .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মক্কায়) পৌঁছে সাতবার বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করেন, অতঃপর দু’ রাক’আত সালাত আদায় করেন। (ওয়াকী’ বলেন, অর্থাৎ মাকামে ইবরাহীমের নিকটে) , অতঃপর সাফা পর্বতের দিকে রওয়ানা হন। [২৯৫৯]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، محمَّد بن ثابت العبدي- وإن كان لينًا- قد توبع. وأخرجه البخاري (٣٩٥) و (١٦٢٧) و (١٦٤٧)، ومسلم (١٢٣٤)، والنسائي ٥/ ٢٢٥ و٢٣٥ و ٢٣٧ من طرق عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٤١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨١٠)
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ عُثْمَانَ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَنَسٍ، عَنْ جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّهُ قَالَ لَمَّا فَرَغَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ مِنْ طَوَافِ الْبَيْتِ أَتَى مَقَامَ إِبْرَاهِيمَ فَقَالَ عُمَرُ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَذَا مَقَامُ أَبِينَا إِبْرَاهِيمَ الَّذِي قَالَ اللَّهُ سُبْحَانَهُ {وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى} . قَالَ الْوَلِيدُ فَقُلْتُ لِمَالِكٍ هَكَذَا قَرَأَهَا {وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى} قَالَ نَعَمْ .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহ তাওয়াফ শেষে মাকামে ইবরাহীমে এলেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! এট আমাদের পিতা (পূর্ব পুরুষ) ইবরাহীম (আঃ) এর স্থান, যে সম্পর্কে মহামহিম আল্লাহ বলেনঃ “তোমরা ইবরাহীমের দাঁড়াবার স্থানকে সালাতের স্থানরুপে গ্রহণ করো।” (সুরা বাকারাঃ ১২৫)। ওয়ালীদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) কে জিজ্ঞেস করলাম, তিনি কি এভাবে পাঠ করেছেনঃ “ওয়াত্তাখিযু মিম-মাকামি ইবরাহীমা মুসাল্লা”? তিনি বলেন, হাঁ। [২৯৬০]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح بغير هذا السياق كما سلف بيانه عند الحديث (١٠٠٨)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُعَلَّى بْنُ مَنْصُورٍ، ح وَحَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ مَنْصُورٍ، وَأَحْمَدُ بْنُ سِنَانٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، قَالاَ حَدَّثَنَا مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ نَوْفَلٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ زَيْنَبَ، عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ، أَنَّهَا مَرِضَتْ فَأَمَرَهَا رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَنْ تَطُوفَ مِنْ وَرَاءِ النَّاسِ وَهِيَ رَاكِبَةٌ . قَالَتْ فَرَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يُصَلِّي إِلَى الْبَيْتِ وَهُوَ يَقْرَأُ {وَالطُّورِ * وَكِتَابٍ مَسْطُورٍ} . قَالَ ابْنُ مَاجَهْ هَذَا حَدِيثُ أَبِي بَكْرٍ .
উম্মু সালমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রোগগ্রস্ত হয়ে পড়লে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে লোকদের পেছনে পেছনে জন্তুযানে আরোহিত অবস্থায় তাওয়াফ করার নির্দেশ দিলেন। উম্মু সালমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বাইতুল্লাহর দিকে ফিরে নামায পরতে দেখেছি এবং তাতে তিনি “ওয়াত-তূর ওয়া কিতাবিম-মাসতূর” সূরা তিলাওয়াত করেন। ইবনু মাজাহ (রঃ) বলেন, এটা আবূ বকর বর্ণিত হাদীস। [২৯৬১]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٤٦٤) و (١٦١٩) و (١٦٢٦)، ومسلم (١٢٧٦)، وأبو داود (١٨٨٢)، والنسائي ٥/ ٢٢٣ و ٢٢٣ - ٢٢٤ من طريق مالك بن أنس، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٨٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٣٠). وأخرجه بنحوه البخاري عقب (١٦٢٦)، والنسائي ٥/ ٢٢٣ من طريق هشام ابن عروة، عن أبيه، عن أم سلمة. وسمَّى الطواف في رواية النسائي طواف الخروج. تنبيه: هكذا جاء الإسناد في "صحيح البخاري" المطبوع، وأشار المزي في "التحفة" (١٨٢٦٢) إلى أنه هكذا في بعض النسخ، والذي بوب عليه المزي: عروة عن زينب، عن أم سلمة. وقال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٤٨٦: قوله: عن عروة عن أم سلمة، كذا للأكثر، ووقع للأصيلي: عن عروة عن زينب عن أم سلمة