হাদীস বিএন


সুনান ইবনু মাজাহ





সুনান ইবনু মাজাহ (2982)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ عَيَّاشٍ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، قَالَ خَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَأَصْحَابُهُ فَأَحْرَمْنَا بِالْحَجِّ فَلَمَّا قَدِمْنَا مَكَّةَ قَالَ ‏"‏ اجْعَلُوا حَجَّكُمْ عُمْرَةً ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ النَّاسُ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَدْ أَحْرَمْنَا بِالْحَجِّ فَكَيْفَ نَجْعَلُهَا عُمْرَةً قَالَ ‏"‏ انْظُرُوا مَا آمُرُكُمْ بِهِ فَافْعَلُوا ‏"‏ ‏.‏ فَرَدُّوا عَلَيْهِ الْقَوْلَ فَغَضِبَ فَانْطَلَقَ حَتَّى دَخَلَ عَلَى عَائِشَةَ غَضْبَانَ فَرَأَتِ الْغَضَبَ فِي وَجْهِهِ فَقَالَتْ مَنْ أَغْضَبَكَ أَغْضَبَهُ اللَّهُ قَالَ ‏"‏ وَمَالِي لاَ أَغْضَبُ وَأَنَا آمُرُ أَمْرًا فَلاَ أُتْبَعُ ‏"‏ ‏.‏




আল-বারা বিন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তার সাহাবীগণ রওনা হলেন। আমরা হজ্জের ইহরাম বাঁধলাম। আমরা মক্কায় পৌঁছলে তিনি বলেনঃ তোমাদের হজ্জকে উমরায় পরিণত করো। লোকেরা বললো, ইয়া রাসূলুল্লাহ ! আমরা তো হজ্জের নিয়তে ইহরাম বেঁধেছি, তা কিরুপে উমরায় পরিনত করবো? তিনি বলেনঃ লক্ষ্য কর, আমি তোমাদের যা নির্দেশ করি তা করো। তারা তাদের কথার পুনরাবৃত্তি করলে তিনি অসন্তুষ্ট হয়ে স্থান ত্যাগ করেন এবং এই অবস্থায় আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -র নিকট যান। তিনি তাঁর চেহারায় অসন্তোষের ভাব লক্ষ্য করে বলেন, আপনাকে কে অসন্তুষ্ট করেছে, আল্লাহ তাকে অসন্তুষ্ট করুন? তিনি বলেনঃ আমি কীভাবে অসন্তুষ্ট না হয়ে পারি, আমি কোনো কাজের হুকুম করি, অথচ তা মান্য করা হবে না? [২৯৮২]

তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، أبو إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 484)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، سماع أبي بكر بن عياش من أبي إسحاق -وهو عمرو بن عبد الله السبيعي- ليس بذاك القوي فيما ذكره ابن أبي حاتم عن أبيه في "العلل" ١/ ٣٥، ثم إن أبا إسحاق لم يصرح بسماعه من البراء. وأخرجه النسائي (٩٩٤٦) من طريق أبي بكر بن عياش، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥٢٣)









সুনান ইবনু মাজাহ (2983)


حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ أَبُو بِشْرٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، أَنْبَأَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي مَنْصُورُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أُمِّهِ، صَفِيَّةَ عَنْ أَسْمَاءَ بِنْتِ أَبِي بَكْرٍ، قَالَتْ خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ مُحْرِمِينَ فَقَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ مَنْ كَانَ مَعَهُ هَدْىٌ فَلْيُقِمْ عَلَى إِحْرَامِهِ وَمَنْ لَمْ يَكُنْ مَعَهُ هَدْىٌ فَلْيَحْلِلْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ وَلَمْ يَكُنْ مَعِي هَدْىٌ فَأَحْلَلْتُ وَكَانَ مَعَ الزُّبَيْرِ هَدْىٌ فَلَمْ يَحِلَّ فَلَبِسْتُ ثِيَابِي وَجِئْتُ إِلَى الزُّبَيْرِ فَقَالَ قُومِي عَنِّي ‏.‏ فَقُلْتُ أَتَخْشَى أَنْ أَثِبَ عَلَيْكَ ‏.‏




আসমা বিনতু আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা ইহরাম অবস্থায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে রওনা হলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যাদের সাথে কোরবানির পশু আছে তারা যেন ইহরাম অবস্থায় থাকে। আর যাদের সাথে কোরবানির পশু নেই তারা যেন ইহরাম ভঙ্গ করে। রাবী বলেন, আমার সাথে কোরবানির পশু না থাকায় আমিও ইহরাম ভঙ্গ করলাম, কিন্তু (আমার স্বামী) যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -র সাথে কোরবানির পশু থাকায় তিনি ইহরাম ভঙ্গ করতে পারেননি। আমি আমার পরিধেয় বস্ত্র পরে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -র নিকট আসলে তিনি বলেন, তুমি আমার নিকট থেকে উঠে যাও। আমি বললাম, আপনি কি আশঙ্কা করছেন যে, আমি আপনার উপর ঝাঁপিয়ে পড়বো? [২৯৮৩]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (١٢٣٦)، والنسائي ٥/ ٢٤٦ من طريق مئصور بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٩٦٥)









সুনান ইবনু মাজাহ (2984)


حَدَّثَنَا أَبُو مُصْعَبٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُحَمَّدٍ الدَّرَاوَرْدِيُّ، عَنْ رَبِيعَةَ بْنِ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنِ الْحَارِثِ بْنِ بِلاَلِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَرَأَيْتَ فَسْخَ الْحَجِّ فِي الْعُمْرَةِ لَنَا خَاصَّةً أَمْ لِلنَّاسِ عَامَّةً فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ بَلْ لَنَا خَاصَّةً ‏"‏ ‏.‏




বিলাল ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ ! হজ্জের ইহরাম ভঙ্গ করে উমরা করার সুযোগ কি কেবল আমাদের পর্যন্তই সীমিত, না সাধারণভাবে সব লোকের জন্য উন্মুক্ত? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ বরং আমাদের জন্যই সীমিত। [২৯৮৪]

তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * منكر، وهذا إسناد ضعيف، الحارث بن بلال مجهول الحال، فقد انفرد ربيعة بن أبي عبد الرحمن بالرواية عنه، وقال الإمام أحمد: ليس إسناده بالمعروف، ولا أقول به. قلنا: ثم هذا أمر مما تعم به البلوى، ولا يمكن خفاؤه على الصحابة الذين حجوا مع النبي ﷺ لا سيما وقد ذكر أهل العلم أن الذين حجوا معه ﷺ كان يزيد عددهم على مئة ألف. والصواب في ذلك أن هذا مما فهمه بعض الصحابة، وليس من قول النبي يكون كما في حديث أبي ذر التالي لهذا الحديث. قال ابن القيم في "زاد المعاد" ٢/ ١٩٢: ومما يدل على صحة قول الإمام أحمد" وأن هذا الحديث لا يصح أن النبي ﷺ أخبر عن تلك المتعة التي أمرهم أن يفسخوا حجهم إليها أنها لأبد الأبد، فكيف يثبت عنه بعد هذا أنها لهم خاصة؟ هذا من أمحل المحال، وكيف يأمرهم بالفسخ، ويقول: دخلت العمرة في الحج إلى يوم القيامة، ثم ثبت أن ذلك مختص بالصحابة دون من بعدهم. وأخرجه أبو داود (١٨٠٨)، والنسائي ٥/ ١٧٩ من طريق عبد العزيز الدراوردي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٥٨٥٣). وانظر ما سلف برقم (٢٩٨٠)









সুনান ইবনু মাজাহ (2985)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ، قَالَ كَانَتِ الْمُتْعَةُ فِي الْحَجِّ لأَصْحَابِ مُحَمَّدٍ ـ صلى الله عليه وسلم ـ خَاصَّةً ‏.‏




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, হজ্জের ইহরাম ভঙ্গ করার সুযোগ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবীগণের মধ্যে সীমিত ছিল। [২৯৮৫]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو إبراهيم التيمي: اسمه يزيد بن شريك بن طارق. وأخرجه مسلم (١٢٢٤)، والنسائي ٥/ ١٧٩ - ١٨٥ من طريق إبراهيم التيمي، بهذا الإسناد









সুনান ইবনু মাজাহ (2986)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، قَالَ أَخْبَرَنِي أَبِي قَالَ، قُلْتُ لِعَائِشَةَ مَا أَرَى عَلَىَّ جُنَاحًا أَنْ لاَ أَطَّوَّفَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ ‏.‏ قَالَتْ إِنَّ اللَّهَ يَقُولُ ‏{إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلاَ جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا}‏ وَلَوْ كَانَ كَمَا تَقُولُ لَكَانَ فَلاَ جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ لاَ يَطَّوَّفَ بِهِمَا ‏.‏ إِنَّمَا أُنْزِلَ هَذَا فِي نَاسٍ مِنَ الأَنْصَارِ كَانُوا إِذَا أَهَلُّوا أَهَلُّوا لِمَنَاةَ فَلاَ يَحِلُّ لَهُمْ أَنْ يَطَّوَّفُوا بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ فَلَمَّا قَدِمُوا مَعَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي الْحَجِّ ذَكَرُوا ذَلِكَ لَهُ فَأَنْزَلَهَا اللَّهُ فَلَعَمْرِي مَا أَتَمَّ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ حَجَّ مَنْ لَمْ يَطُفْ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ ‏.‏




হিশাম বিন উরওয়াহ হতে বর্ণিত, আমার পিতা আমাকে অবহিত করে বলেছেন, আমি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) – কে বললাম, আমি যদি সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ না করি তবে তা আমার জন্য দূষণীয় মনে করি না। তিনি বলেন, নিশ্চয় আল্লাহ বলেছেনঃ “সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে কেউ কাবা ঘরের হজ্জ অথবা উমরাহ সম্পন্ন করে, এই দু’টির মাঝে সাঈ করলে তার কোনো পাপ নেই” (সূরা বাকারাঃ ১৫৮)। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তুমি যেরূপ বুঝেছ যদি তাই হত তবে এভাবে বলা হতঃ “তবে এ দু’টির মাঝে সাঈ না করলে তার কোনো গুনাহ নেই”। উপরোক্ত আয়াত আনসার সম্প্রদায়ের কতক লোকের সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। তারা যখন ইহরাম বাঁধতো (জাহিলী যুগে) মানাত দেবতার উদ্দেশ্যে বাঁধতো। তাই সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করা (তাদের বিশ্বাস অনুযায়ী) তাদের জন্য হালাল ছিলো না। তারা (ইসলামোত্তর যুগে) মহানবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে হজ্জ করতে এসে বিষয়টি তাঁর সামনে উত্থাপন করলে তখন আল্লাহ তাআলা উপরোক্ত আয়াত নাযিল করেন। (আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার জীবনের শপথ! যে ব্যক্তি হজ্জ করতে এসে সাফা-মারওয়ার মাঝে সাঈ করবে না মহান আল্লাহ তার হজ্জ পূর্ণ করবেন না। [২৯৮৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٧٩٠)، ومسلم (١٢٧٧) (٢٥٩) و (٢٦٠)، وأبو داود (١٩٠١)، والنسائي في "الكبرى" (١٠٩٤٢) من طريق هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١٦٤٣)، ومسلم (١٢٧٧) (٢٦١) - (٢٦٣)، والترمذي (٣٢٠٣)، والنسائي في "المجتبى" ٥/ ٢٣٧ - ٢٣٨ و ٢٣٨ من طريق الزهري، عن عر وة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٥١١٢)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٣٩) و (٣٨٤٠). قال العلماء: ويستفاد من قول عائشة: فلعمري ما أتم الله ﷿ حج من لم يطف بين الصفا والمروة، وجوب السعي بين الصفا والمروة، وقال الحافظ: والعمدة في الوجوب قوله: "خذوا عني مناسككم" وقد اختلف أهل العلم في هذا، فقال أحمد في رواية: إنه ركن لا يتم الحج إلا به، وهو قول عائشة وعروة ومالك والشافعي. وروي عن أحمد: أنه سنة لا يجب بتركه دم، روي ذلك عن ابن عباس وأنس وابن الزبير وابن سيرين. وقال القاضي من الحنابلة: هو واجب، وليس بركن، إذا تركه وجب عليه دم، وهو مذهب الحسن وأبي حنيفة والثوري، ورجحه ابن قدامة المقدسي في "المغني" ٥/ ٢٣٩









সুনান ইবনু মাজাহ (2987)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ الدَّسْتَوَائِيُّ، عَنْ بُدَيْلِ بْنِ مَيْسَرَةَ، عَنْ صَفِيَّةَ بِنْتِ شَيْبَةَ، عَنْ أُمِّ وَلَدِ، شَيْبَةَ قَالَتْ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَسْعَى بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ وَهُوَ يَقُولُ ‏ "‏ لاَ يُقْطَعُ الأَبْطَحُ إِلاَّ شَدًّا ‏"‏ ‏.‏




শায়বার উম্মু ওয়ালাদ হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাফা-মারওয়ার মাঝে সাঈ করতে দেখেছি এবং তিনি তখন বলছিলেনঃ আল-আবতাহ্ উপত্যকা অতিক্রম করতে হবে। [২৯৮৭]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن، وقد تكلمنا على إسناده في "مسند أحمد" (٢٧٢٨٠). أم ولد شيبة" قال الحافظ في "التهذيب" اسم هذه الصحابية: حبيبة بنت أبي تَجراة، وقيل: تَملِك. وأخرجه النسائي ٥/ ٢٤٢ عن قتيبة بن سعيد، عن حماد بن سلمة، عن بديل ابن ميسرة، عن المغيرة بن حكيم، عن صفية بنت شيبة، عن امرأة، قالت: رأيت رسول الله ﷺ .. إلخ. زاد في الإسناد بين بديل وصفية: المغيرة بن حكيم. قوله: "شدًا" أي: عَدْوًا









সুনান ইবনু মাজাহ (2988)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَمْرُو بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ عَطَاءِ بْنِ السَّائِبِ، عَنْ كَثِيرِ بْنِ جُمْهَانَ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ إِنْ أَسْعَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ فَقَدْ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَسْعَى وَإِنْ أَمْشِ فَقَدْ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَمْشِي وَأَنَا شَيْخٌ كَبِيرٌ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি যদি সাফা-মারওয়ার মাঝে সাঈ করে দৌড়াই তবে তা এজন্য যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে সাঈ করতে দেখেছি। আমি যদি তা হেঁটে অতিক্রম করি তবে তা এজন্য যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে তা হেঁটে অতিক্রম করতে দেখেছি। আমি তো একজন অতি বৃদ্ধ। [২৯৮৮]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف، أبو وكيع واسمه: الجراح بن مليح الرؤاسي ضعيف، وعطاء بن السائب كان قد اختلط، وكثير بن جمهان يعتبر به، لكن قد صح الحديث من طريق آخر كما سيأتي. وأخرجه أبو داود (١٩٠٤)، والترمذي (٨٨٠)، والنسائي ٥/ ٢٤١ - ٢٤٢ من طريق عطاء بن السائب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٥١٤٣). وأخرجه النسائي ٥/ ٢٤٢ من طريق سعيد بن جبير، عن ابن عمر-وتحرف في المطبوع إلى: ابن عمرو- وسنده صحيح، وهو في "المسند" (٦٣٩٣). وأخرج أحمد (٤٩٩٣) من طريق عبد الله بن المقدام قال: رأيت ابن عمر يمشي بين الصفا والمروة، فقلت له: أبا عبد الرحمن مالك لا ترمل؟ فقال: رَمَلَ رسولُ الله ﷺ وترك









সুনান ইবনু মাজাহ (2989)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ يَحْيَى الْخُشَنِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ قَيْسٍ، أَخْبَرَنِي طَلْحَةُ بْنُ يَحْيَى، عَنْ عَمِّهِ، إِسْحَاقَ بْنِ طَلْحَةَ عَنْ طَلْحَةَ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ ‏ "‏ الْحَجُّ جِهَادٌ وَالْعُمْرَةُ تَطَوُّعٌ ‏"‏ ‏.‏




তালহাহ বিন উবায়দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেনঃ হাজ্জ হলো জিহাদ এবং উমরা হলো নফল। [২৯৮৯]

তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف جدًا، عمر بن قیس سندل: متروک (تقریب: 4959) والراوي عنہ الحسن، بن یحیی الخشني: ضعیف ، والسند ضعفہ البوصیري من أجلھما، (انوار الصحیفہ ص 484، 485)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، الحسن بن يحيى الخشني ضعيف، وشيخه عمر بن قيس -وهو المكي المعروف بسندل- متروك. وسئل أبو حاتم كما في "العلل" ١/ ٢٨٦ عن هذا الحديث فقال: حديث باطل. وقال الشافعي: ليس في العمرة شيء ثابت بأنها تطوع، نقله عنه الترمذي في "سننه". وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (٦٧١٩) من طريق هشام بن عمار، بهذا الإسناد. ووقع في إسناده خطأ، يصحح من هنا. وأخرج ابن أبي شيبة في "المصنف" ص ٢٢٣ (نشرة العمروي) عن جرير عن معاوية بن إسحاق، عن أبي صالح ماهان رفعه "الحج جهاد والعمرة تطوع" وهو مرسل. وأخرجه ابن قانع كما في "نصب الراية" ٣/ ١٥٠ فوصله بذكر أبي هريرة فوهم. وانظر ما سلف برقم (٢٩٠٢)









সুনান ইবনু মাজাহ (2990)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا يَعْلَى، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ أَبِي أَوْفَى، يَقُولُ كُنَّا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ حِينَ اعْتَمَرَ فَطَافَ وَطُفْنَا مَعَهُ وَصَلَّى وَصَلَّيْنَا مَعَهُ وَكُنَّا نَسْتُرُهُ مِنْ أَهْلِ مَكَّةَ لاَ يُصِيبُهُ أَحَدٌ بِشَىْءٍ ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন আবূ আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)- এর সাথে ছিলাম। তিনি উমরা করা কালে (বাইতুল্লাহ) তাওয়াফ করেন, আমরাও তাঁর সাথে তাওয়াফ করি, তিনি সলাত আদায় করেন এবং আমরাও তাঁর সাথে সলাত আদায় করি। আমরা তাঁকে মক্কাবাসীদের থেকে আড়াল করে রাখতাম যাতে কেউ তাঁর কোনরূপ ক্ষতি করার সুযোগ না পায়। [২৯৯০]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يعلى: هو ابن أبي عبيد الطنافسي، وإسماعيل: هو ابن أبي خالد. وأخرجه البخاري (٤١٨٨)، وأبو داود (١٩٠٢) و (١٩٠٣)، والنسائي في "الكبرى" (٤٢٠٦) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن ابن أبي أوفى. وهو في "مسند أحمد" (١٩١٢٩)، و"صحيح ابن حبان" (٢٨٤٣). وقوله: لا يصيبه أحد بشئ، أي: لئلا يصيبه، قال الحافظ: وهذا كان في عمرة القضاء وعبد الله بن أبي أوفى كان ممن بايع تحت الشجرة وهو في عُمرة الحديبية، وكُل من شهد الحديبية، وعاش إلى السنة المقبلة خرج مع النبي ﷺ معتمرًا في عمرة القضاء









সুনান ইবনু মাজাহ (2991)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ بَيَانٍ، وَجَابِرٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ وَهْبِ بْنِ خَنْبَشٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ عُمْرَةٌ فِي رَمَضَانَ تَعْدِلُ حِجَّةً ‏"‏ ‏.‏




ওয়াহব বিন খানবাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ রামাদান মাসের উমরা (সওয়াবের ক্ষেত্রে ) হাজ্জের সমতূল্য। [২৯৯১]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وبيان: هو ابن بشر الأحمسي، وجابر: هو ابن يزيد الجعفي، والشعبي: هو عامر بن شراحيل. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٢١١) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٦٠١)









সুনান ইবনু মাজাহ (2992)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، ح وَحَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَمْرُو بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، جَمِيعًا عَنْ دَاوُدَ بْنِ يَزِيدَ الزَّعَافِرِيِّ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ هَرِمِ بْنِ خَنْبَشٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ عُمْرَةٌ فِي رَمَضَانَ تَعْدِلُ حِجَّةً ‏"‏ ‏.‏




হারিম বিন খানবাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ রামাদান মাসের উমরা হাজ্জের সমতূল্য। [২৯৯২]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح على وهم وقع لداود بن يزيد الأودي الزعافري -وهو ضعيف- في تسمية صحابية، والصواب في اسمه: وهب بن خنبش كما سماه أصحاب الشعبي، وهم: بيان وجابر في الرواية السالفة، وفراس بن يحيى عند الطبراني. قال الحافظ ابن حجر: وهو المحفوظ، ونقل عن ابن الصلاح أن داود الأودي أخطأ فيه. وأخرجه الحمدي (٩٣٢) عن سفيان بن عبينة، وأحمد (١٧٥٩٩) عن وكيع، كلاهما عن داود بن يزيد، بهذا الإسناد، وقالا فيه: ابن خنبش لم يذكرا اسمه









সুনান ইবনু মাজাহ (2993)


حَدَّثَنَا جُبَارَةُ بْنُ الْمُغَلِّسِ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ عُثْمَانَ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الأَسْوَدِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ أَبِي مَعْقِلٍ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ عُمْرَةٌ فِي رَمَضَانَ تَعْدِلُ حِجَّةً ‏"‏ ‏.‏




আবূ মা‘কিল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ রামাদান মাসের একটি উমরা একটি হাজ্জের সমতূল্য। [২৯৯৩]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف بمرة، جبارة بن المغلس ضعيف، وإبراهيم بن عثمان متروك، وقد اختلف في إسناد هذا الحديث كثيرًا كما بسطنا القولَ فيه في "مسند أحمد" عند الحديث (٢٧١٠٦). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٢١٤) من طريق عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أبي معقل. ويغني عنه ما قبله، وما بعده









সুনান ইবনু মাজাহ (2994)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنْ حَجَّاجٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ عُمْرَةٌ فِي رَمَضَانَ تَعْدِلُ حِجَّةً ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ রমদানের একটি উমরা একটি হাজের সমতুল্য। [২৯৯৪]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وحجاج -وهو ابن أرطاة، وإن كان مدلسًا، وقد عنعن- قد توبع. عطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه البخاري (١٧٨٢)، ومسلم (١٢٥٦)، (٢٢١)، والنسائي ٤/ ١٣٠ - ١٣١ من طريق ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس. وأخرجه البخاري (١٨٦٣)، ومسلم (١٢٥٦) (٢٢٢) من طريق حبيب المعلم، عن عطاء به، وسمى حبيب المرأة أم سنان الأنصارية. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٢٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٧٥٠). وأخرجه أبو داود (١٩٩٠) من طريق بكر بن عبد الله، عن ابن عباس









সুনান ইবনু মাজাহ (2995)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ وَاقِدٍ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرٍو، عَنْ عَبْدِ الْكَرِيمِ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ عُمْرَةٌ فِي رَمَضَانَ تَعْدِلُ حِجَّةً ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ রমদান মাসের উমরা হাজ্জের সমতূল্য। [২৯৯৫]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عبد الكريم: هو ابن مالك الجزري، وعطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه أحمد (١٤٧٩٥) و (١٤٨٨٢) و (١٥٢٧٠) من طريق عبد الكلريم الجزري، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله









সুনান ইবনু মাজাহ (2996)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ زَكَرِيَّا بْنِ أَبِي زَائِدَةَ، عَنِ ابْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنْ عَطَاءٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لَمْ يَعْتَمِرْ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ إِلاَّ فِي ذِي الْقَعْدَةِ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল যিলকাদ মাসেই উমরা করেছেন। [২৯৯৬]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، ابن أبو ليلى -واسمه: محمَّد بن عبد الرحمن- سيئ الحفظ. لكن قد صح الحديث من حديث عائشة في الذي يليه. وأخرجه أبو يعلى (٢٣٤٠) عن عثمان بن أبي شيبة" بهذا الإسناد. وانظر ما بعده









সুনান ইবনু মাজাহ (2997)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ لَمْ يَعْتَمِرْ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ عُمْرَةً إِلاَّ فِي ذِي الْقَعْدَةِ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিলকাদ মাস ছাড়া অন্য কোন মাসে উমরা করেননি। [২৯৯৭]

তাহকীক আলবানী: সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ص ١٣٠ (نشرة العمروي). وأخرجه أحمد (٢٥٩١٠) من طريق ابن إسحاق، عن يحيى بن عباد، عن أبيه عباد بن عبد الله، عن عائشة قالت: ما اعتمر رسول الله ﷺ إلا في ذي القعدة، ولقد اعتمر ثلاث عُمرَ. وأخرج أبو داود (١٩٩١) من طريق داود بن عبد الرحمن عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: أن رسول الله ﷺ اعتمر عمرتين: عمرة في ذي القعدة، وعمرة في شوال. وأخرج ابن سعد في "الطبقات" ٢/ ١٧٢ من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، والبيهقي ٤/ ٣٤٦ من طريق عبد العزيز الدراوردي، كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: أن النبي ﷺ اعتمر ثلاث عمر: عمرة في شوال، وعمرتين في ذي القعدة. قال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٦٠٠: ويجمع بينهما بأن يكون ذلك وقع في آخر شوال وأول ذي القعدة. قلنا: ويؤيد هذا الجمع ما رواه ابن سعد ٢/ ١٧١ عن محمَّد بن سابق، عن إبراهيم بن طهمان، عن أبي الزبير، عن عتبة مولى ابن عباس قال: لما قدم رسول الله ﷺ من الطائف نزل الجعرانة فقسم بها الغنائم ثم اعتمر منها وذلك لليلتين بقيا من شوال. وفي الباب عن أنس عند البخاري (١٧٧٨) و (١٧٧٩) و (١٧٨٠)، ومسلم (١٢٥٣) ولفظه عند البخاري في الرواية الأخيرة: اعتمر أربع عمر في ذي القعدة -إلا التي اعتمر مع حجته-: عمرته من الحديبية، ومن العام المقبل، ومن الجعرانة حيث قسم غنائم حنين، وعمرة مع حجته. فجعل الثلاثة في ذي القعدة، وهو الذي عليه أهل السير أيضًا، انظر ابن سعد ٢/ ١٧٠ - ١٧٢، و "التمهيد" ٢٢/ ٢٨٩ - ٢٩١، و"مجمع الزوائد" ٢/ ٢٧٩، و"تفسير ابن كثير" ١/ ٢٣١









সুনান ইবনু মাজাহ (2998)


حَدَّثَنَا أَبُو كُرَيْبٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ عَيَّاشٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ حَبِيبٍ، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي ثَابِتٍ - عَنْ عُرْوَةَ، قَالَ سُئِلَ ابْنُ عُمَرَ فِي أَىِّ شَهْرٍ اعْتَمَرَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ فِي رَجَبٍ ‏.‏ فَقَالَتْ عَائِشَةُ مَا اعْتَمَرَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي رَجَبٍ قَطُّ وَمَا اعْتَمَرَ إِلاَّ وَهُوَ مَعَهُ - تَعْنِي ابْنَ عُمَرَ ‏.‏




উরওয়াহ হতে বর্ণিত, ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট জিজ্ঞাসা করা হলো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন মাসে উমরা করেছেন? তিনি বলেন, রজব মাসে। তখন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও রজব মাসে উমরা করেননি। আর তিনি যখনই উমরা করেছেন, বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথে ছিলেন (কিন্তু তিনি ভুলবশত রজব মাসে বলেছেন)। [২৯৯৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، حبيب بن أبي ثابت قد توبع. وأخرجه الترمذي (٩٥٤) عن أبي كريب، بهذا الإسناد. وقال: حديث غريب، سمعت محمدًا (يعني البخاري) يقول: حبيب بن أبي ثابت لم يسمع من عروة بن الزبير! قلنا: وفي قول البخاري هذا نظر بسطناه في التعليق على حديث عائشة من المسند (٢٥٧٦٦) فارجع إليه لزامًا. وأخرجه مسلم (١٢٥٥) (٢١٩)، والنسائي في "الكبرى" (٤٢٠٨) من طريق ابن جريج عن عطاء، به. وهو في البخاري (١٧٧٧) من هذا الطريق مختصر بقصة نفي عائشة في رجب. وأخرجه البخاري (١٧٧٥) و (١٧٧٦)، ومسلم (١٢٥٥) (٢٢٠)، وأبو داود (١٩٩٢)، والترمذي (٩٥٥)، والنسائي (٤٢٠٣) و (٤٢٥٤) و (٤٢٠٧) من طريق مجاهد، عن ابن عمر. وهو عند بعضهم مختصر. وهو في "مسند أحمد" (٥٤١٦)، و"صحيح ابن حبان" (٣٩٤٥)









সুনান ইবনু মাজাহ (2999)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَأَبُو إِسْحَاقَ الشَّافِعِيُّ إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ الْعَبَّاسِ بْنِ عُثْمَانَ بْنِ شَافِعٍ قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ أَوْسٍ، حَدَّثَنِي عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ أَبِي بَكْرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَمَرَهُ أَنْ يُرْدِفَ عَائِشَةَ فَيُعْمِرَهَا مِنَ التَّنْعِيمِ ‏.‏




আবদুর রহমান বিন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নির্দেশ দেন যে, তিনি যেন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -কে নিজের জন্তুযানে করে নিয়ে যান এবং তানঈম নামক স্থান থেকে তার উমরা করার ব্যবস্থা করেন। [২৯৯৯]

তাহকীক আলবানী: সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٧٨٤)، ومسلم (١٢١٢)، والترمذي (٩٥٢)، والنسائي في "الكبرى" (٤٢١٦) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٠٥). وأخرجه بنحوه أبو داود (١٩٩٥) من طريق حفصة بنت عيد الرحمن، عن أيها عبد الرحمن. وانظر ما بعده









সুনান ইবনু মাজাহ (3000)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي حِجَّةِ الْوَدَاعِ نُوَافِي هِلاَلَ ذِي الْحِجَّةِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏"‏ مَنْ أَرَادَ مِنْكُمْ أَنْ يُهِلَّ بِعُمْرَةٍ فَلْيُهْلِلْ فَلَوْلاَ أَنِّي أَهْدَيْتُ لأَهْلَلْتُ بِعُمْرَةٍ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ فَكَانَ مِنَ الْقَوْمِ مَنْ أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ وَمِنْهُمْ مَنْ أَهَلَّ بِحَجٍّ فَكُنْتُ أَنَا مِمَّنْ أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ ‏.‏ قَالَتْ فَخَرَجْنَا حَتَّى قَدِمْنَا مَكَّةَ فَأَدْرَكَنِي يَوْمُ عَرَفَةَ وَأَنَا حَائِضٌ لَمْ أَحِلَّ مِنْ عُمْرَتِي فَشَكَوْتُ ذَلِكَ إِلَى النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَالَ ‏"‏ دَعِي عُمْرَتَكِ وَانْقُضِي رَأْسَكِ وَامْتَشِطِي وَأَهِلِّي بِالْحَجِّ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ فَفَعَلْتُ فَلَمَّا كَانَتْ لَيْلَةُ الْحَصْبَةِ وَقَدْ قَضَى اللَّهُ حَجَّنَا أَرْسَلَ مَعِي عَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ أَبِي بَكْرٍ فَأَرْدَفَنِي وَخَرَجَ إِلَى التَّنْعِيمِ فَأَهْلَلْتُ بِعُمْرَةٍ فَقَضَى اللَّهُ حَجَّنَا وَعُمْرَتَنَا وَلَمْ يَكُنْ فِي ذَلِكَ هَدْىٌ وَلاَ صَدَقَةٌ وَلاَ صَوْمٌ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জিলহজ্জ মাসের চাঁদ উদিত হওয়ার কাছাকাছি সময়ে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে বিদায় হজ্জে রওয়ানা হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি উমরার উদ্দেশ্যে ইহরাম বাঁধতে চায় সে তা করতে পারে। আমি যদি সাথে কোরবানির পশু না আনতাম তবে অবশ্যই উমরার ইহরাম বাঁধতাম। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, কাফেলার কতক উমরার উদ্দেশ্যে এবং কতক হজ্জের উদ্দেশ্যে ইহরাম বাঁধলো। যারা উমরার নিয়াতে ইহরাম বাঁধে আমি তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম। তিনি আরো বলেন, আমরা রওয়ানা হয়ে মক্কায় পৌছলাম। আরাফাত দিবস নিকটবর্তী হলে আমি হায়েজগ্রস্থ হলাম এবং তখনও উমরার ইহরাম খুলিনি। এ ব্যাপারে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট অভিযোগ করলে তিনি বলেন: তুমি উমরা ত্যাগ করো, মাথার চুলের বাঁধন খুলে ফেলো, তাতে চিরুনী করো এবং হজ্জের ইহরাম বাঁধো। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাই করলাম। যখন হাসবার রাত (যিলহজ্জ মাসের ১২ তম রাত) এলো এবং আল্লাহ তায়ালা আমাদের হজ্জ পূর্ণ করলেন তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে (আমার ভাই) আবদুর রহমান বিন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে পাঠালেন। তিনি আমাকে তাঁর উটের পিঠে পেছন দিকে তুলে নিয়ে তানঈম রওনা হলেন। সেখানে আমি উমরার উদ্দেশ্যে ইহরাম বাঁধলাম। এভাবে আল্লাহ তায়ালা আমাদের হজ্জ ও উমরা পূর্ণ করে দিলেন এবং এজন্য আমাদের উপর না কোরবানী, না সদাকা, আর না রোযা বাধ্যতামূলক হয়েছিল। [৩০০০]

তাহকীক আলবানী: সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٣١٧) و (١٧٨٣)، ومسلم (١٢١١) (١١٥) - (١١٧)، وأبو داود (١٧٧٨)، والنسائي ١/ ١٣٢ و٥/ ١٤٥ - ١٤٦ من طريق هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وبعضهم يختصره. وأخرجه بنحوه البخاري (٣١٦)، ومسلم (١٢١١) (١١١) - (١١٤)، وأبو داود (١٧٨١)، والنسائي ١/ ١٣٢ و٥/ ١٦٥ - ١٦٧ و ٢٤٦ من طريق الزهري، عن عروة، به. ويزيد بعضهم فيه على بعض. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٥٨٧)، و "صحيح ابن حبان" (٣٧٩٢) و (٣٩٤٢)









সুনান ইবনু মাজাহ (3001)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الأَعْلَى بْنُ عَبْدِ الأَعْلَى، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، حَدَّثَنِي سُلَيْمَانُ بْنُ سُحَيْمٍ، عَنْ أُمِّ حَكِيمٍ بِنْتِ أُمَيَّةَ، عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ مَنْ أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ مِنْ بَيْتِ الْمَقْدِسِ غُفِرَ لَهُ ‏"‏ ‏.‏




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি বায়তুল মাকদিস থেকে উমরার উদ্দেশ্যে ইহরাম বাঁধে, তাকে ক্ষমা করা হয়। [৩০০১]

তাহকীক আলবানী: দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (1741)، (انوار الصحیفہ ص 485)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لجهالة حال أم حكيم -واسمها حُكيمة- بنت أمية بن الأخنس، ثم إنه قد اضطرب في إسناده ومتنه اضطرابًا شديدًا فصلناه في "مسند أحمد" عند الحديث (٢٦٥٥٨). وأخرجه أبو داود (١٧٤١) من طريق يحيى بن أبي سفيان الأخنسي، عن جدته حكيمة، عن أم سلمة. وانظر ما بعده