হাদীস বিএন


সুনান ইবনু মাজাহ





সুনান ইবনু মাজাহ (3102)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَمَانٍ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ اشْتَرَى هَدْيَهُ مِنْ قُدَيْدٍ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুদায়দ নামক স্থান থেকে তাঁর কোরবানী পশু ক্রয় করেন। [৩১০২]

তাহকীক আলবানীঃ সানাদটি দুর্বল, হাদীসটি ইবনু উমার থেকে মাওকুফ সুত্রে বর্ণিত হয়েছে, [সহীহ হলোঃ নবী বড় হজ্জের সময় তার হাদীসকে (কুরবানীর পশুকে) যুল হুলায়ফাহ থেকে তাড়িয়ে নিতেন]।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف الإسناد موقوف على ابن عمر والصحيح أن النبي صلى الله عليه وسلم ساق هديه من ذي الحليفة الحج الكبير




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، ترمذي (907)، (انوار الصحیفہ ص 487)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف يحيى بن اليمان، وقد خولف في رفعه فرواه الثقات من فعل ابن عمر، وهو الصحيح. سفيان: هو الثوري، وعبيد الله: هو ابن عمر العمري. وأخرجه مرفوعًا الترمذي (٩٢٣) من طريق يحيى بن اليمان، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث الثوري إلا من حديث يحيى بن اليمان. وروي عن نافع: أن ابن عمر اشترى هديه من قُديد. وهذا أصح. وأخرجه موقوفًا على ابن عمر البخاري (١٦٩٣)، ومسلم (١٢٣٠) (١٨١)، والنسائي ٥/ ٢٢٦ من طرق عن نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٥٩٥) و (٥١٦٥). قوله: "قُديد" قال السندي: موضع بين الحرمين داخل الميقات









সুনান ইবনু মাজাহ (3103)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ سُفْيَانَ الثَّوْرِيِّ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، ‏.‏ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَأَى رَجُلاً يَسُوقُ بَدَنَةً فَقَالَ ‏"‏ ارْكَبْهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ إِنَّهَا بَدَنَةٌ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ ارْكَبْهَا وَيْحَكَ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে তার কোরবানীর পশু হাঁকিয়ে নিয়ে যেতে দেখে বলেনঃ এর পিঠে চড়ে যাও। সে বললো, এটা কোরবানীর পশু। তিনি বলেনঃ তুমি তার পিঠে চড়ে যাও। তোমার জন্য আফসোস। [৩১০৩]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وكيع: هو ابن الجراح، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هرمز. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ١٤/ ٢٢٨ - ٢٢٩. وأخرجه البخاري (١٦٨٩)، ومسلم (١٣٢٢) (٣٧١)، وأبو داود (١٧٦٠)، والنسائي ٥/ ١٧٦ من طريقين عن أبي الزناد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١٧٠٦) من طريق عكرمة، ومسلم (١٣٢٢) (٣٧٢) من طريق همام، كلاهما عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٥٠) و (١٠٢٣٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٠١٤)









সুনান ইবনু মাজাহ (3104)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ هِشَامٍ، - صَاحِبِ الدَّسْتَوَائِيِّ - عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ مُرَّ عَلَيْهِ بِبَدَنَةٍ فَقَالَ ‏"‏ ارْكَبْهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ إِنَّهَا بَدَنَةٌ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ ارْكَبْهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَرَأَيْتُهُ رَاكِبَهَا مَعَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي عُنُقِهَا نَعْلٌ ‏.‏




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে দিয়ে একটি উট নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল। তখন তিনি বলেনঃ এর পিঠে চড়ে যাও। লোকটি বললো, এটা কোরবানীর উট। তিনি বলেনঃ তুমি এর পিঠে চড়ো। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাকে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে উটের পিঠে চড়ে যেতে দেখেছি। এর গলায় একটি জুতা বাঁধা ছিল। [৩১০৪]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. هشام صاحب الدستوائي: هو هشام بن أبي عبد الله الدستوائي، ويقال له: صاحب الدستوائي أيضًا، وقتادة: هو ابن دعامة السدوسي. وأخرجه البخاري (١٦٩٠) و (٢٧٥٤) و (٦١٥٩)، والترمذي (٩٢٧)، والنسائي ٥/ ١٧٦ من طرق عن قتادة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٣٢٣) (٣٧٣)، والنسائي ٥/ ١٧٦ من طريق ثابت البناني، ومسلم (١٣٢٣) (٣٧٤) من طريق بكير بن الأخنس، كلاهما عن أنس. وهو في "مسند أحمد" (١٣٤١٥)









সুনান ইবনু মাজাহ (3105)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ الْعَبْدِيُّ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ أَبِي عَرُوبَةَ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ سِنَانِ بْنِ سَلَمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ ذُؤَيْبًا الْخُزَاعِيَّ، حَدَّثَ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ يَبْعَثُ مَعَهُ بِالْبُدْنِ ثُمَّ يَقُولُ ‏ "‏ إِذَا عَطِبَ مِنْهَا شَىْءٌ فَخَشِيتَ عَلَيْهِ مَوْتًا فَانْحَرْهَا ثُمَّ اغْمِسْ نَعْلَهَا فِي دَمِهَا ثُمَّ اضْرِبْ صَفْحَتَهَا وَلاَ تَطْعَمْ مِنْهَا أَنْتَ وَلاَ أَحَدٌ مِنْ أَهْلِ رُفْقَتِكَ ‏"‏ ‏.‏




যুআইব আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কোরবানীর পশু নিয়ে (মক্কায়) পাঠাতেন, অতঃপর বলতেন : এগুলোর মধ্যে কোন পশু অচল হয়ে পড়লে এবং তুমি তার মৃত্যুর আশঙ্কা করলে সেটি যবেহ করবে, অতঃপর তার রক্তের মধ্যে তার গলায় জুতা ফেলে রাখবে, অতঃপর তার পাছার উপর ক্ষতচিহ্ন করবে। তবে তার গোশত তুমিও খাবে না এবং তোমার সঙ্গীদের মধ্যেও কেউ খাবে না। [৩১০৫]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، قتادة -وهو ابن دعامة السدوسي- لم يسمع من سنان بن سلمة شيئًا فيما قال يحيى بن سعيد ويحيى بن معين كما في "سؤالات ابن الجنيد" ص ٣٤٠، وللحديث طريق أخرى صحيحة. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ٤/ ٣٣ - ٣٤. وأخرجه مسلم (١٣٢٦) في الشواهد من طريق سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٩٧٤). وأخرجه مسلم (١٣٢٥)، وأبو داود (١٧٦٣)، والنسائي في "الكبرى" (٤١٢٢) من طريق أبي التياح يزيد بن حميد، عن موسى بن سلمة، عن ابن عباس: أن رسول الله ﷺ بعث بست عشرة بدنة مع رجل، وأمره فيها، قال: فمضى ثم رجع فقال: يا رسول الله، كيف أصنع بما أُبدِعَ عليَّ منها؟ قال: "انحرها، ثم اصبغ نعليها في دمها، ثم اجعله على صفحتها، ولا تأكل أنت ولا أحد من أهل رفقتك". وهو في "مسند أحمد" (١٨٦٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٠٢٥)









সুনান ইবনু মাজাহ (3106)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَمْرُو بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالُوا حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ نَاجِيَةَ الْخُزَاعِيِّ، - قَالَ عَمْرٌو فِي حَدِيثِهِ وَكَانَ صَاحِبَ بُدْنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ - قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَيْفَ أَصْنَعُ بِمَا عَطِبَ مِنَ الْبُدْنِ قَالَ ‏ "‏ انْحَرْهُ وَاغْمِسْ نَعْلَهُ فِي دَمِهِ ثُمَّ اضْرِبْ صَفْحَتَهُ وَخَلِّ بَيْنَهُ وَبَيْنَ النَّاسِ فَلْيَأْكُلُوهُ ‏"‏ ‏.‏




নাজিয়াহ আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরের বর্ণনামতে তিনি ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কোরবানীর উটের রক্ষনাবেক্ষনকারী) তিনি বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! কোনো উট অচচল হয়ে পড়লে আমি কী করবো? তিনি বলেনঃ সেটি যবেহ করবে এবং তার গলায় জুতা তার রক্তের মধ্যে ফেলে দিবে, অতঃপর তার পাছার উপর ক্ষতচিহ্ন করবে এবং লোকেদের জন্য তা ফেলে রাখবে, তারা তা আহার করবে। [৩১০৬]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وكيع: هو ابن الجراح. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ٤/ ٣٣ و ١٤/ ٢٣٠. وأخرجه أبو داود (١٧٦٢)، والترمذي (٩٢٦)، والنسائي في "الكبرى" (٤١٢٣) من طريقين عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٨٩٤٣)، و "صحيح ابن حبان" (٤٠٢٣)









সুনান ইবনু মাজাহ (3107)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، عَنْ عُمَرَ بْنِ سَعِيدِ بْنِ أَبِي حُسَيْنٍ، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي سُلَيْمَانَ، عَنْ عَلْقَمَةَ بْنِ نَضْلَةَ، قَالَ تُوُفِّيَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَأَبُو بَكْرٍ وَعُمَرُ وَمَا تُدْعَى رِبَاعُ مَكَّةَ إِلاَّ السَّوَائِبَ مَنِ احْتَاجَ سَكَنَ وَمَنِ اسْتَغْنَى أَسْكَنَ ‏.‏




আলকামা বিন নাদলাহ (মাকবূল) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) , আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করেন এবং ঐ সময় পর্যন্ত মক্কার বাড়িঘর ‘আস-সাওয়াইব’ নামে পরিচিত ছিল। কোন ব্যক্তির প্রয়োজন হলে সে তাতে (তিন ঘরে) বসবাস করতো এবং কারো (নিজের জন্য) প্রয়োজন না হলে সে তা অন্যকে বসবাসের জন্য খালি করে দিতো। [৩১০৭]

তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، صححہ البوصیري علی شرط مسلم (!) وضعفہ الدمیري وقال: ’’، علقمۃ بن نضلۃ لا یصح لہ صحبۃ ‘‘ وقولہ ھو الصواب،وقال ابن حجر: ’’ تابعي، صغیر،أخطأ من عدہ فی الصحابۃ ‘‘ (تقریب:4683) ، (انوار الصحیفہ ص 487)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لجهالة حال علقمة بن نضلة، وهو تابعي لا تصح صحبته، فالحديث مرسل. وهو في "مصنف ابن أبي شبة" الجزء الذي نشره العمروي ص ٣٧٢، وتحرف فيه عمر بن سعيد إلى عمرو، ومن طريقه أخرجه الطبراني ١٨/ (٧)، والدارقطني (٣٠١٩). وأخرجه ابن أبي حاتم في "العلل" ١/ ٢٩٢، وابن قانع في "معجم الصحابة" ٢/ ٢٨٧، والطبراني ١٨/ (٧) من طريق مسدد بن مسرهد، عن عيسى بن يونس، بهذا الإسناد. وجاء في رواية ابن أبي حاتم: عثمان بن سليمان، قال أبو حاتم: كذا قال مسدد، وإنما هو عثمان بن أبي سليمان. قلنا: وقد جاءت روايته على الصواب عند الطبراني وابن قانع. وأخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" ٢/ ١٦٢ - ١٦٣، والفاكهي في "أخبار مكة" (٢٠٤٧)، والطحاوي ٤/ ٤٨ و ٤٩، وابن عدي في ترجمة يحيى بن نصر من "الكامل" ٧/ ٢٧٠١، والدارقطني (٣٠٢٠) من طرق عن عمر بن سعيد، به. وأخرجه البيهقي ٦/ ٣٥ من طريق أبي الجواب الأحوص بن جواب، عن سفيان الثوري، عن عمر بن سعيد، به. وتابع أبا جواب عليه محمَّد بن يوسف الفريابي عن ابن منده، وأبو حذيفة موسى بن مسعود النهدي عند الطبراني، فيما ذكر الحافظ في "الإصابة" ٤/ ٢٥٠، إلا أن الفريابي سمى علقمة: عبدَ الله بن نضلة. وخالفهم معاوية بن هشام عند الدارقطني (٣٠٢٠)، فرواه عن سفيان، عن عمر بن سعيد، عن عثمان بن أبي سليمان، عن نافع بن جبير بن مطعم، عن علقمة ابن نضلة. فزاد نافعًا، ونافع ثقة، وكان البيهقي وابن حجر في "الفتح" ٣/ ٤٥٠ حكمًا بانقطاع الإسناد الأول لهذه الزيادة، لكن قد إنفرد بذكره في هذا الإسناد معاوية بن هشام، وهو صدوق له أوهام، وخالفه الرواة عن سفيان، والرواة عن عمر ابن سعيد، ثم قد صرح عثمان بن أبي سليمان بسماعه من علقمة عند الدارقطني (٣٠٢٠)، وابن منده كما في "الإصابة" ٤/ ٢٥٠، وهو ثقة على كل حال، فتبقى علةُ الحديث الإرسال، وأن مُرسِلَه مجهول الحال. والله أعلم. وانظر في مسألة تأجير بيوت مكة "شرح معاني الآثار" ٤/ ٤٨ - ٥١، و "فتح الباري" ٣/ ٤٥٠









সুনান ইবনু মাজাহ (3108)


حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ حَمَّادٍ الْمِصْرِيُّ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، أَخْبَرَنِي عُقَيْلٌ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ مُسْلِمٍ، أَنَّهُ قَالَ إِنَّ أَبَا سَلَمَةَ بْنَ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَوْفٍ أَخْبَرَهُ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَدِيِّ بْنِ الْحَمْرَاءِ قَالَ لَهُ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَهُوَ عَلَى رَاحِلَتِهِ وَاقِفٌ بِالْحَزْوَرَةِ يَقُولُ ‏ "‏ وَاللَّهِ إِنَّكِ لَخَيْرُ أَرْضِ اللَّهِ وَأَحَبُّ أَرْضِ اللَّهِ إِلَيَّ وَاللَّهِ لَوْلاَ أَنِّي أُخْرِجْتُ مِنْكِ مَا خَرَجْتُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ সালামাহ বিন আবদুর রহমান বিন আওফ হতে বর্ণিত, আবদুল্লাহ বিন আদী ইবনুল হামরা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বলেন, আমি দেখেছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উষ্ট্রীর পিঠে আরোহিত অবস্থায় আল-জাযওয়ারা নামক স্থানে বলেনঃ আল্লাহর শপথ! তুমি (মক্কা) আল্লাহর গোটা যমীনের মধ্যে সর্বশ্রেষ্ঠ এবং দুনিয়ার সমস্ত যমীনের মধ্যে তুমি আমার নিকট সর্বাধিক প্রিয়। আল্লাহর শপথ! তোমার থেকে আমাকে উচ্ছেদ না করা হলে আমি (তোমায় ত্যাগ করে) চলে যেতাম না। [৩১০৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عقيل: هو ابن خالد الأيلي، ومحمد بن مسلم: هو الزهري. وأخرجه الترمذي (٤٢٦٧)، والنسائي في "الكبرى" (٤٢٣٨) و (٤٢٣٩) من طريق الزهري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٨٧١٥) و (١٨٧١٦)، و "صحيح ابن حبان" (٣٧٠٨). وأخرجه النسائي (٤٢٤٠) من طريق معمر، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. وهو وهم من معمر كما هو مبين في "المسند" (١٨٧١٨)









সুনান ইবনু মাজাহ (3109)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ بُكَيْرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، حَدَّثَنَا أَبَانُ بْنُ صَالِحٍ، عَنِ الْحَسَنِ بْنِ مُسْلِمِ بْنِ يَنَّاقٍ، عَنْ صَفِيَّةَ بِنْتِ شَيْبَةَ، قَالَتْ سَمِعْتُ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَخْطُبُ عَامَ الْفَتْحِ فَقَالَ ‏"‏ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّ اللَّهَ حَرَّمَ مَكَّةَ يَوْمَ خَلَقَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ فَهِيَ حَرَامٌ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ لاَ يُعْضَدُ شَجَرُهَا وَلاَ يُنَفَّرُ صَيْدُهَا وَلاَ يَأْخُذُ لُقَطَتَهَا إِلاَّ مُنْشِدٌ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ الْعَبَّاسُ إِلاَّ الإِذْخِرَ فَإِنَّهُ لِلْبُيُوتِ وَالْقُبُورِ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏"‏ إِلاَّ الإِذْخِرَ ‏"




সাফিয়্যা বিনতু শায়বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি মক্বা বিজয়ের বছর মহানবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে তাঁর ভাষণে বলতে শুনেছিঃ হে জনগণ! আল্লাহ তাআলা আসমান ও যমীন সৃষ্টির দিন থেকে মক্কাকে হারাম (সম্মানিত) করেছেন। অতএব তা কিয়ামত পর্যন্ত হারাম থাকবে। তার বৃক্ষরাজি কাটা যাবে না, এখানকার শিকারের পিছু ধাওয়া করা যাবে না, এখানে পড়ে থাকা কোন জিনিস তুলে নেয়া যাবে না, কেবল সেই ব্যক্তি তা তুলতে পারবে যে তার ঘোষণা দিবে। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, কিন্তু ইযখির ঘাস (বৈধ করা হোক)। কারণ তা ঘরবাড়ি তৈরিী ও কবরে রাখার জন্য (প্রয়োজন হয়)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ ইযখির ঘাস ব্যতীত। [৩১০৯]

তাহকীক আলবানীঃ হাসান।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمَّد بن إسحاق، وباقي رجاله ثقات. وعلقه البخاري في "صحيحه" بإثر الحديث (١٣٤٩) بصيغة الجزم عن أبان بن صالح. وقد جزم النسائي والدارقطني والبرقاني بأن حديث صفية بنت شيبة عن النبي- ﷺ مرسل، وكذا جزم ابن سعد وابن حبان بأن صفية بنت شيبة تابعية. وقال المزي في "تحفة الأشراف" (١٥٩٠٨): لو صح هذا الحديث، لكان صريحًا في سماعها من النبي ﷺ، لكن في إسناده أبان بن صالح وهو ضعيف. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" ٩/ ٢٣٩ معقبًا عليه: كذا أطلق هنا، ولم ينقل في ترجمة أبان بن صالح في "التهذيب" تضعيفه عن أحد، بل نقل توثيقه عن يحيى بن معين وأبي زرعة وغيرهم، وقال الذهبي في "مختصر التهذيب": ما رأيت أحدًا ضعف أبان بن صالح، وكأنه لم يقف على قول ابن عبد البر في "التمهيد" (١/ ٣١٢) لما ذكر حديث جابر في استقبال قاضي الحاجة القبلة من رواية أبان بن صالح المذكور: هذا ليس صحيحًا، لأن أبان بن صالح ضعيف. كذا قال، وكأنه التبس عليه بأبان بن أبي عياش البصري صاحب أنس فإنه ضعيف باتفاق، وهو أشهر وأكثر حديثًا ورواة من أبان بن صالح، ولهذا لما ذكر ابن حزم الحديث المذكور عن جابر قال: أبان بن صالح ليس بالمشهور (انظر "المحلى" ١/ ١٩٨)، قلت (القائل ابن حجر): ولكن يكفي توثيق ابن معين ومن ذكر له، وقد روى عنه أيضًا ابن جريج وأسامة بن زيد الليثي وغيرهما، وأشهر من روى عنه محمَّد بن إسحاق. وقد ذكر المزي أيضًا حديث صفية بنت شيبة قالت: طاف النبي ﷺ على بعير يستلم الحجر بمحجن وأنا انظر إليه. أخرجه أبو داود (١٨٧٨)، وابن ماجه (٢٩٤٧)، قال المزي: هذا يضعف قول من أنكر أن يكون لها رؤية، فإن إسناده حسن. قلت (القائل ابن حجر): وإذا ثبتت رؤيتها له ﷺ وضبطت ذلك، فما المانع أن تسمع خطبته ولو كانت صغيرة. انتهى كلام الحافظ. وله شاهد من حديث ابن عباس عند البخاري (١٣٤٩)، ومسلم (١٣٥٣)









সুনান ইবনু মাজাহ (3110)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، وَابْنُ الْفُضَيْلِ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، أَنْبَأَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ سَابِطٍ، عَنْ عَيَّاشِ بْنِ أَبِي رَبِيعَةَ الْمَخْزُومِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ لاَ تَزَالُ هَذِهِ الأُمَّةُ بِخَيْرٍ مَا عَظَّمُوا هَذِهِ الْحُرْمَةَ حَقَّ تَعْظِيمِهَا فَإِذَا ضَيَّعُوا ذَلِكَ هَلَكُوا ‏"‏ ‏.‏




আয়্যাশ বিন আবূ রবীআহ আল-মাখযূমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ এই উম্মাত যত দিন এই হারাম শরীফের যথাযোগ্য সম্মান প্রদর্শন করবে, ততো দিন তারা কল্যাণের মধ্যে থাকবে। কিন্তু যখন তারা তা বিনষ্ট করবে, তখন ধ্বংস হবে। [৩১১০]

তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، یزید بن أبي زیاد: ضعیف مشہور ، (انوار الصحیفہ ص 487)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف يزيد بن أبي زياد، وهو الكوفي، وعبد الرحمن بن سابط لم يدرك عياش بن أبي ربيعة. ابن الفضيل: هو محمَّد. وأخرجه أحمد (١٩٠٤٩)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٦٨٩)، وابن قانع في "معجم الصحابة" ٢/ ٣٠٧، والسهمي في "تاريخ جرجان" (٤٨٤)، والمزي في ترجمة عياش من "تهذيب الكمال" ٢٢/ ٥٥٥ من طرق عن يزيد بن أبي زياد، بهذا الإسناد. وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (١٤٥٨)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٦٩٠) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الرحمن بن سابط، عن رجل، عن عياش. وأخرجه البيهقي في "الشعب" (١١٠٠٩) من طريق إسحاق بن راهويه، عن جرير بن عبد الحميد، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الرحمن بن سابط، عن عياش. بإسقاط الرجل، فهو منقطع. قال السندي: قوله: "هذه الحُرمة" أي: حُرمة شعائر الله









সুনান ইবনু মাজাহ (3111)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، وَأَبُو أُسَامَةَ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ خُبَيْبِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ حَفْصِ بْنِ عَاصِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ إِنَّ الإِيمَانَ لَيَأْرِزُ إِلَى الْمَدِينَةِ كَمَا تَأْرِزُ الْحَيَّةُ إِلَى جُحْرِهَا ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ঈমান মাদীনার দিকে গুটিয়ে আসবে, যেমন সাপ তার গর্তের দিকে গুটিয়ে আসে। [৩১১১]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ١٢/ ١٨١، وعنه أخرجه مسلم (١٤٧). وأخرجه البخاري (١٨٧٦)، ومسلم (١٤٧) من طريقين عن عبيد الله بن عمر، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٠٤٤٠)، و"صحيح ابن حبان" (٣٧٢٨) و (٣٧٢٩). قوله: "يأرِز" أي: ينضم ويجتمع بعضُه إلى بعض، ومعنى: يأرز الإيمان" أي: أهل الإيمان. قاله ابن حبان في "صحيحه" ٩/ ٤٧









সুনান ইবনু মাজাহ (3112)


حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ، حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ هِشَامٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ مَنِ اسْتَطَاعَ مِنْكُمْ أَنْ يَمُوتَ بِالْمَدِينَةِ فَلْيَفْعَلْ فَإِنِّي أَشْهَدُ لِمَنْ مَاتَ بِهَا ‏"‏ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের মধ্যে কেউ যদি মদীনায় মৃত্যুবরণ করতে পারে, সে যেন তাই করে। কারণ যে ব্যক্তি এখানে মারা যাবে, আমি তার পক্ষে সাক্ষী হবো। [৩১১২]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. هشام: هو ابن أبي عبد الله الدستوائي، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني. وأخرجه الترمذي (٤٢٥٩) من طريق معاذ بن هشام، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٥٤٣٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٧٤١). وفي هذه المصادر: "أشفع" بدل "أشهد"









সুনান ইবনু মাজাহ (3113)


حَدَّثَنَا أَبُو مَرْوَانَ، مُحَمَّدُ بْنُ عُثْمَانَ الْعُثْمَانِيُّ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ أَبِي حَازِمٍ، عَنِ الْعَلاَءِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ اللَّهُمَّ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلُكَ وَنَبِيُّكَ وَإِنَّكَ حَرَّمْتَ مَكَّةَ عَلَى لِسَانِ إِبْرَاهِيمَ اللَّهُمَّ وَأَنَا عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ وَإِنِّي أُحَرِّمُ مَا بَيْنَ لاَبَتَيْهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو مَرْوَانَ لاَبَتَيْهَا حَرَّتَىِ الْمَدِينَةِ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ হে আল্লাহ! ইবরাহীম (আ.) তোমার বন্ধু ও নবী। তুমি মক্কাকে ইবরাহীম (আ.)-এর যবানীতে হারাম (সম্মানিত) ঘোষণা করেছো। হে আল্লাহ! আমিও তোমার বান্দা ও নবী। অতএব আমি মদীনাকে, তার দু প্রস্তরময় জমীনের মধ্যস্থল হারাম ঘোষণা করছি। আবূ মারওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, ‘লাবাতাইহা’ শব্দের অর্থ মদীনার দু’প্রান্তের প্রস্তরময় ভূমি। [৩১১৩]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٨٧٣)، ومسلم (١٣٧٢) (٤٧١)، والترمذي (٤٢٦٣)، والنسائي (٤٢٧٢) من طريق الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة مرفوعًا: "ما بين لابتيها حرام". وهو في "مسند أحمد" (٧٢١٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٧٥١). وأخرجه مسلم (١٣٧٢) (٤٧٢) من طريق الزهري، به. بلفظ: حَرَّم رسول الله ﷺ به ما بين لابتي المدينة. وأخرجه البخاري (١٨٦٩) من طريق سعيد المقبري، عن أبي هريرة أن النبي ﷺ قال: "حُرم ما بين لابتي المدينة على لساني". وأخرج مسلم (١٣٧١) من طريق أبي صالح، عن أبي هريرة مرفوعًا: "المدينة حَرَمٌ". وللفظ المصنف شاهد من حديث عبد الله بن زيد بن عاصم عند البخاري (٢١٢٩)، ومسلم (١٣٦٠). وآخر من حديث رافع بن خديج عند مسلم (١٣٦١). وثالث من حديث أنس بن مالك عند مسلم (١٣٦٥) (٤٦٢)









সুনান ইবনু মাজাহ (3114)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ مَنْ أَرَادَ أَهْلَ الْمَدِينَةِ بِسُوءٍ أَذَابَهُ اللَّهُ كَمَا يَذُوبُ الْمِلْحُ فِي الْمَاءِ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, , রাসূলু্ল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি মদীনার অধিবাসীদের ক্ষতিসাধনের ইচ্ছা করবে, তাকে আল্লাহ তাআলা এমনভাবে গলিয়ে দিবে, যেভাব লবণ পানিতে গলে যায়। [৩১১৪]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمَّد بن عمرو، وهو الليثي، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه أبو يعلى (٥٩٩١) من طريق عبدة بن سليمان، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٣٨٦) من طريق أبي عبد الله القرَّاظ، عن أبي هريرة. وأخرجه (١٣٨٧) (٤٩٥) من طريق القراظ أيضًا، عن أبي هريرة وسعد بن أبي وقاص. وأخرجه أيضًا (١٣٨٧) (٤٩٤) من طريق القراظ، عن سعد وحده. وحديث سعد أخرجه البخاري (١٨٧٧) من طريق عائشة بنت سعد، عن أبيها









সুনান ইবনু মাজাহ (3115)


حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، حَدَّثَنَا عَبْدَةُ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مِكْنَفٍ، قَالَ سَمِعْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ، يَقُولُ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ إِنَّ أُحُدًا جَبَلٌ يُحِبُّنَا وَنُحِبُّهُ وَهُوَ عَلَى تُرْعَةٍ مِنْ تُرَعِ الْجَنَّةِ وَعَيْرٌ عَلَى تُرْعَةٍ مِنْ تُرَعِ النَّارِ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন মিকনাফ (মাজহুল বা অপরিচিত) হতে বর্ণিত, আমি আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ উহুদ একটি পাহাড়, সে আমাদের ভালোবাসে এবং আমরাও তাকে ভালোবাসি। তা জান্নাতের টিলাসমূহের একটির উপর অবস্থিত। আর আইর পাহাড় দোযখের টিলাসমূহের একটির উপর অবস্থিত। [৩১১৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف جدا




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، وشیخہ عبد اللّٰہ بن مکنف:مجہول (تقریب: 3639) وضعفہ، البخاري وغیرہ وشطر الحدیث ((إن أحدًا جبل یحبنا ونحبہ)) صحیح متفق علیہ، (البخاري 4083،مسلم 1393/504) ، (انوار الصحیفہ ص 487، 488)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * القطعة الأولى منه صحيحة من طريق آخر، وهذا إسناد ضعيف، محمَّد بن إسحاق مدلس، وقد رواه بالعنعنة، وعبد الله بن مكنف روى عنه اثنان، أحدهما مدلس، والثاني صدوق حسن الحديث في أكثر أحواله، وقال البخاري: فيه نظر، وذكره العقيلي في "الضعفاء"، وقال ابن حبان في "المجروحين": روى عنه محمَّد ابن إسحاق، ولا أعلم له سماعًا من أنس، ولا لمحمد بن إسحاق عنه، وهذا منفطع من جهتين، لا يجوز الاحتجاج به. قلنا: وقد صرح بسماعه من أنس هنا، وجزم بسماعه منه البخاري في "التاريخ" ٥/ ١٩٣، وهو ضعيف فيه جهالة على كل حال، ولم يخرج له من الستة غير ابن ماجه، وليس له في ابن ماجه سوى هذا الحديث. وأخرجه يحيى بن معين في "التاريخ" ٤/ ٥٣ رواية الدوري، وأخرجه البخاري في "التاريخ" ٥/ ١٩٣ من طريق يوسف بن بهلول، وابن عدي في ترجمة ابن مكنف من "الكامل" ٤/ ١٥٣٩ من طريق هناد بن السري، ثلاثتهم (ابن معين ويوسف وهناد) عن عبدة بن سليمان، بهذا الإسناد. وليس في رواية ابن معين وهناد عن عبدة تصريح ابن مكنف بالسماع من أنس. والله أعلم. وأخرج قوله: "إن أحدًا جبل يحبنا ونحبه" البخاري (٢٨٨٩)، ومسلم (١٣٩٣)، والترمذي (٤٢٦٤) من طريقين عن أنس









সুনান ইবনু মাজাহ (3116)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا الْمُحَارِبِيُّ، عَنِ الشَّيْبَانِيِّ، عَنْ وَاصِلٍ الأَحْدَبِ، عَنْ شَقِيقٍ، قَالَ بَعَثَ رَجُلٌ مَعِيَ بِدَرَاهِمَ هَدِيَّةً إِلَى الْبَيْتِ ‏.‏ قَالَ فَدَخَلْتُ الْبَيْتَ وَشَيْبَةُ جَالِسٌ عَلَى كُرْسِيٍّ فَنَاوَلْتُهُ إِيَّاهَا ‏.‏ فَقَالَ أَلَكَ هَذِهِ قُلْتُ لاَ وَلَوْ كَانَتْ لِي لَمْ آتِكَ بِهَا ‏.‏ قَالَ أَمَا لَئِنْ قُلْتَ ذَلِكَ لَقَدْ جَلَسَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ مَجْلِسَكَ الَّذِي جَلَسْتَ فِيهِ فَقَالَ لاَ أَخْرُجُ حَتَّى أَقْسِمَ مَالَ الْكَعْبَةِ بَيْنَ فُقَرَاءِ الْمُسْلِمِينَ ‏.‏ قُلْتُ مَا أَنْتَ بِفَاعِلٍ ‏.‏ قَالَ لأَفْعَلَنَّ ‏.‏ قَالَ وَلِمَ ذَاكَ قُلْتُ لأَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَدْ رَأَى مَكَانَهُ ‏.‏ وَأَبُو بَكْرٍ وَهُمَا أَحْوَجُ مِنْكَ إِلَى الْمَالِ فَلَمْ يُحَرِّكَاهُ ‏.‏ فَقَامَ كَمَا هُوَ فَخَرَجَ ‏.‏




শায়বাহ বিন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আমার মাধ্যমে বাইতুল্লাহয় হাদিয়াস্বরূপ কতকগুলি দিরহাম পাঠায়। আমি বাইতুল্লাহর অভ্যন্তরে প্রবেশ করে শাইবাকে একটি কুরসীর উপর উপবিষ্ট দেখতে পেলম। আমি দিরহামগুলো তাকে দিলাম। সে তাকে জিজ্ঞেসা করলো, এগুলো কি তোমার দিরহাম? আমি বললাম, না। এগুলো আমার হলে তা নিয়ে তোমার নিকট আসতাম না। সে বলরো, যদি তুমি এ কথা বলো তবে শোনো, তুমি যে স্থানে বসে আছো, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এখানে বসেছেন, অতঃপর বলেছেন, আমি কাবার সম্পদ দরিদ্র মুসলমানদের মধ্যে বণ্টন না করা পর্যন্ত বের হবো না। আমি বললাম, আপনি তা করবে না। তিনি বললেন, আমি অবশ্যই তা করবো। তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলৈন, তুমি একথা কেন বললে? আমি বললাম, কারণ রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ সম্পদের স্থান দেখেছেন এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও। তাঁদের উভয়ের আপনার চেয়ে মালের অধিক প্রয়োজন ছিল। কিন্তু তাঁরা এ সম্পদ স্থানচ্যুত করেননি। একথা শুনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ান এবং বের হয়ে চলে যান। [৩১১৬]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (2031)، المحاربي عنعن ، وحدیث البخاري (1594،7275) یغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 488)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. المحاربي: هو عبد الرحمن بن محمَّد، والشيباني: هو أبو إسحاق سليمان بن أبي سليمان، وواصل الأحدب: هو ابن حيان، وشقيق: هو ابن سلمة أبو وائل. وأخرجه أبو داود (٢٠٣١) من طريق عبد الرحمن المحاربي، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه البخاري (١٥٩٤) من طريق سفيان، عن واصل الأحدب، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٣٨٢). قوله: "مال الكعبة": في رواية البخاري: "صفراء ولا بيضاء" قال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٤٥٦: أي: ذهبًا وفضة، قال القرطبي: غلط من ظن أن المراد بذلك حلية الكعبة، وإنما أراد الكنز الذي بها، وهو ما كان يُهدى إليها، فيدَّخر ما يزيد عن الحاجة. قال ابن بطال: أراد عمر لكثرته إنفاقه في منافع المسلمين، ثم لما ذكر بأن النبي ﷺ لم يتعرض له أمسك، وإنما تركا ذلك -والله أعلم- لأن ما جعل في الكعبة وسُبِّل لها يجري مجرى الأوقاف، فلا يجوز تغييره عن وجهه، وفي ذلك تعظيم الإسلام وترهيب العدو. قلت (القائل ابن حجر): أما التعليل الأول فليس بظاهر من الحديث، بل يحتمل أن يكون تركه ﷺ لذلك رعاية لقلوب قريش، كما ترك بناءَ الكعبة على قواعد إبراهيم، ويؤيده ما وقع عند مسلم (١٣٣٣) (٤٠٠) في بعض طرق حديث عائشة في بناء الكعبة: "لأنفقت كنز الكعبة"، ولفظه: "لولا أن قومك حديثو عهد بكفر لأنفقت كنز الكعبة في سبيل الله، ولجعلت بابها بالأرض" الحديث، فهذا التعليل هو المعتمد، وعلى هذا فإنفاقه جائز، كما جاز لابن الزبير بناؤها على قواعد إبراهيم، لزوال سبب الامتناع









সুনান ইবনু মাজাহ (3117)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي عُمَرَ الْعَدَنِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحِيمِ بْنُ زَيْدٍ الْعَمِّيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ مَنْ أَدْرَكَ رَمَضَانَ بِمَكَّةَ فَصَامَ وَقَامَ مِنْهُ مَا تَيَسَّرَ لَهُ كَتَبَ اللَّهُ لَهُ مِائَةَ أَلْفِ شَهْرِ رَمَضَانَ فِيمَا سِوَاهَا ‏.‏ وَكَتَبَ اللَّهُ لَهُ بِكُلِّ يَوْمٍ عِتْقَ رَقَبَةٍ وَكُلِّ لَيْلَةٍ عِتْقَ رَقَبَةٍ وَكُلِّ يَوْمٍ حُمْلاَنَ فَرَسٍ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَفِي كُلِّ يَوْمٍ حَسَنَةً وَفِي كُلِّ لَيْلَةٍ حَسَنَةً ‏"‏ ‏.‏




সাঈদ বিন জুবায়র হতে বর্ণিত, ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি মক্কায় রমাদান মাস পেলো, রোযা রাখলো এবং যথাসাধ্য (রাতে) ইবাদত করলো, আল্লাহ তাআলা তাকে অন্য স্থানের তুলনায় এক লক্ষ রমাদান মাসের সওয়াব দান করবেন এবং প্রতিটি দিনের পরিবর্তে একটি গোলাম এবং প্রতিটি রাতের পরিবর্তে একটি গোলাম আযাদ করার সওয়াব (তার আমলনামায়) লিখে দিবেন, প্রতিটি দিনের পরিবর্তে আল্লাহর রাস্তায় যুদ্ধের জন্য একটি ঘোড়া দানের সমপরিমাণ সওয়াব, প্রতি দিনের জন্য একটি নেকী (পূণ্য) এবং প্রতিটি রাতের জন্য একটি পূণ্য দান করবেন। [৩১১৭]

তাহকীক আলবানীঃ বানোয়াট।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * موضوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف جدًا، عبدالرحیم بن زید العمي وأبوہ مجروحان ، (انوار الصحیفہ ص 488)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، عبد الرحيم بن زيد العمي متروك، وأبوه زيد بن الحواري ضعيف. قال أبو حاتم في "علل الحديث" ١/ ٢٥٠: حديث منكر، وعبد الرحيم ابن زيد متروك. وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (١٥٧٤)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٣٧٢٩) و (٤١٤٩) من طريق عبد الرحيم بن زيد العمي، بهذا الإسناد. وقال البيهقي: عبد الرحيم بن زيد العمي ضعيف يأتي بما لا يتابعه الثقات عليه









সুনান ইবনু মাজাহ (3118)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي عُمَرَ الْعَدَنِيُّ، حَدَّثَنَا دَاوُدُ بْنُ عَجْلاَنَ، قَالَ طُفْنَا مَعَ أَبِي عِقَالٍ فِي مَطَرٍ فَلَمَّا قَضَيْنَا طَوَافَنَا أَتَيْنَا خَلْفَ الْمَقَامِ فَقَالَ طُفْتُ مَعَ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ فِي مَطَرٍ فَلَمَّا قَضَيْنَا الطَّوَافَ أَتَيْنَا الْمَقَامَ فَصَلَّيْنَا رَكْعَتَيْنِ فَقَالَ لَنَا أَنَسٌ ‏ "‏ ائْتَنِفُوا الْعَمَلَ فَقَدْ غُفِرَ لَكُمْ ‏"‏ ‏.‏ هَكَذَا قَالَ لَنَا رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَطُفْنَا مَعَهُ فِي مَطَرٍ




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা আবূ ইকালের সাথে বৃষ্টির মধ্যে (বাইতুল্লাহ) তাওয়াফ করলাম এবং তাওয়াফ শেষে মাকামে ইবরাহীমের পেছনে এলাম। তখন আবূ ইকাল বলেন, আম আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-র সাথে বৃষ্টির মধ্যে বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করেছি। আমরা তাওয়াফ শেষে মাকামে (ইবরাহীম) এসে দু’ রাক’আত নামায পড়েছি। অতঃপর আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের বলেন, এখন নতুনভাবে নিজেদের আমলের হিসাব রাখো। তোমাদের পূর্বের গুনাহ মাফ করে দেয়া হয়েছে। রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এরূপই বলেছেন এবং আমরা তাঁর সাথে বৃষ্টির মধ্যে তাওয়াফ করেছি। [৩১১৮]

তাহকীক আলবানীঃ সানাদটি খুবই দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف الإسناد جدا




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف جدًا، داود بن عجلان: ضعیف و أبو عقال ہلال بن زید:متروک، (تقریب: 1800،7336)، وقال الھیثمي في ھلال بن زید: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد، 61/10) ، والسند ضعفہ البوصیري، (انوار الصحیفہ ص 488)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، داود بن عجلان ضعيف، وأبو عقال- واسمه هلال ابن زيد بن يسار- متروك، اتهم برواية الموضوعات عن أنس. وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (٤٧٧) و (٤٧٨)، والعقيلي في ترجمة داود ابن عجلان من "الضعفاء" ٢/ ٣٨، وابن عدي في ترجمة داود من "الكامل" ٣/ ٩٦٥، والبيهقي في "الشعب" (٤٠٤٣)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" ٢/ ٤٤٨ من طريق داود بن عجلان، بهذا الإسناد









সুনান ইবনু মাজাহ (3119)


حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ حَفْصٍ الأُبُلِّيُّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَمَانٍ، عَنْ حَمْزَةَ بْنِ حَبِيبٍ الزَّيَّاتِ، عَنْ حُمْرَانَ بْنِ أَعْيَنَ، عَنْ أَبِي الطُّفَيْلِ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ، قَالَ حَجَّ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَأَصْحَابُهُ مُشَاةً مِنَ الْمَدِينَةِ إِلَى مَكَّةَ وَقَالَ ‏ "‏ ارْبُطُوا أَوْسَاطَكُمْ بِأُزُرِكُمْ ‏"‏ ‏.‏ وَمَشَى خِلْطَ الْهَرْوَلَةِ ‏.‏




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ মদীনা থেকে মক্কায় পদব্রজে গিয়ে হাজ্জ করেন এবং তিনি বলেনঃ নিজেদের কোমরে পরিধেয় বস্ত্র বেঁধে নাও”। তিনি কিছুটা দ্রুত গতিতে পথ অতিক্রম করেন। [৩১১৯]

তাহকীক আলবানীঃ দূর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، حمران بن أعین: ضعیف رمي بالرفض (تقریب: 1514) ، ومن أجلہ ضعفہ البوصیري والصواب معہ دون الحاکم والذہبي، (442/1) ، (انوار الصحیفہ ص 488)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، يحيى بن يمان وحمران بن أعين ضعيفان، أبو الطفيل: هو عامر بن واثلة. وأخرجه ابن خزيمة (٢٥٣٥)، والفاكهي في "أخبار مكة" (٨٣٤)، وابن عدي في ترجمة حمران بن أعين من "الكامل" ٢/ ٨٤٢، والحاكم ١/ ٤٤٢، وتمام في "فوائده" (٦٠١) و (٦٠٢)، وأبو نعيم في "أخبار أصبهان" ١/ ٣٣٨ و ٢/ ٢٩١، والمزي في ترجمة حمران من "تهذيب الكمال" ٧/ ٣٠٨ - ٣٠٩ من طريق يحيى بن اليمان، بهذا الإسناد. وقوله: خِلطَ الهرولة. قال السندي: أي: مشيًا مخلوطًا بالهرولة: بأن يمشي حينًا ويهرول حينًا أو معتدلًا. ويُعارضه الأحاديث الصحيحة في وصف حج النبي ﷺ، وأنه كان راكبًا، وأن أصحابه كانوا بين راكب وماش، كحديث جابر الطويل السالف برقم (٣٠٧٤)، وهو في "صحيح مسلم" (١٢١٨)









সুনান ইবনু মাজাহ (3120)


حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْجَهْضَمِيُّ، حَدَّثَنِي أَبِي ح، وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، سَمِعْتُ قَتَادَةَ، يُحَدِّثُ عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ يُضَحِّي بِكَبْشَيْنِ أَمْلَحَيْنِ أَقْرَنَيْنِ وَيُسَمِّي وَيُكَبِّرُ وَلَقَدْ رَأَيْتُهُ يَذْبَحُ بِيَدِهِ وَاضِعًا قَدَمَهُ عَلَى صِفَاحِهِمَا ‏.‏




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’ শিংবিশিষ্ট দু’টি ধুসর বর্ণের মেষ কোরবানী করেছিলেন। তিনি (যবেহ করার সময়) বিসমিল্লাহ ও তাকবীর কলেছিলেন। আমি তাঁকে নিজের পা সেটির পাঁজরের উপর রেখে ছেপে ধরে স্বহস্তে তা কোরবানী করতে দেখেছি। [৩১২০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٥٥٥٨) و (٥٥٦٤) و (٥٥٦٥) و (٧٣٩٩)، ومسلم (١٩٦٦)، وأبو داود (٢٧٩٤)، والترمذي (١٥٦٨)، والنسائي ٧/ ٢٢٠ و ٢٣٠ و ٢٣٠ - ٢٣١ و٢٣١ من طريق قتادة، به. وأخرجه البخاري (١٥٥١) و (١٧١٢) و (١٧١٤) و (٥٥٤٩) و (٥٥٥٣) و (٥٥٥٤) و (٥٥٦١)، ومسلم (١٩٦٢)، وأبو داود (٢٧٩٣)، والنسائي ٣/ ١٩٣ و ٧/ ٢١٩ و ٢١٩ - ٢٢٠ و ٢٢٣ - ٢٢٤ من طرق عن أنس. وهو في "مسند أحمد" (١١٩٦٠)، و"صحيح ابن حبان" (٥٩٠٠). وسيأتي مختصرًا بذكر طريقة الذبح برقم (٣١٥٥). قوله: "أملحَين": قال السندي: قال العراقي: في الأملح خمسة أقوال أصحها أنه الذي فيه بياض وسواد، وبياضه أكثر. و "أقرنين": هو الذي له قرنان معتدلان، و"صفاحهما" أي: على صفحة العنق منها وهي جانبه









সুনান ইবনু মাজাহ (3121)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ عَيَّاشٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ أَبِي عَيَّاشٍ الزُّرَقِيِّ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ ضَحَّى رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَوْمَ عِيدٍ بِكَبْشَيْنِ فَقَالَ حِينَ وَجَّهَهُمَا ‏ "‏ إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ حَنِيفًا وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ إِنَّ صَلاَتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَاىَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ لاَ شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ اللَّهُمَّ مِنْكَ وَلَكَ عَنْ مُحَمَّدٍ وَأُمَّتِهِ ‏"‏ ‏.‏




জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন দু’টি মেষ যবেহ করেন। তিনি পশু দু’টিকে কিব্লামুখী করে বলেনঃ “ইন্নী ওয়াজ্জাহতু ওয়াজহিয়া লিল্লাযী ফাতারাস সামাওয়াতি ওয়াল-আরদা হানীফাঁও ওয়ামা আনা মিনাল মুশরিকীন। ইন্না সালাতী ওয়া নুসুকী ওয়া মাহইয়াকা ও মামাতী লিল্লাহি রব্বিল আলামীন। লা শারীকা লাহু ওয়া বিযালিকা উমিরতু ওয়া আনা আওওয়ালুল মুসলিমীন। আল্লাহুম্মা মিনকা ওয়া লাকা আন মুহাম্মাদিন ওয়া উম্মাতিহি।”

“আমি একনিষ্ঠভাবে তাঁর দিকে মুখ ফিরাচ্ছি যিনি আকাশমণ্ডলী ও পৃথিবী সৃষ্টি করেছেন এবং আমি মুশরিকদের অন্তর্ভুক্ত নই” (সূরা আনআমঃ ৭৯)। “বলো, আমার নামায, আমার ইবাদত (কুরবানী), আমার জীবন, আমার মৃত্যু বিশ্বজাহানের প্রতিপালক আল্লাহর জন্য। তাঁর কোন শরীক নাই এবং আমি তাই আদিষ্ট হয়েছি এবং আত্মসমর্পণকারীদের মধ্যে আমিই প্রথম” (সূরা আনআমঃ ১৬২-৩)। হে আল্লাহ! তোমার নিকট থেকেই প্রাপ্ত এবং তোমার জন্যই উৎসর্গিত। অতএব তা মুহাম্মাদ ও তাঁর উম্মাতের পক্ষ থেকে কবুল করো”। [৩১২১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن، أبو عياش -وهو ابن النعمان المَعَافري المصري- روى عنه ثلاثة، وقال الذهبي: شيخ، وصحح حديثه ابن خزيمة والحاكم ووافقه الذهبي، وإسماعيل بن عياش متابع. وقد زاد إبراهيم بن سعد الزهري ويونس بن بُكير عن محمَّد بن إسحاق: خالد بن أبي عمران التُجيبي، بين يزيد وأبي عياش، وخالد ثقة، وقد صرح ابن إسحاق بالسماع في رواية إبراهيم بن سعد فانتفت شبهة تدليسه. وأخرجه أبو داود (٢٧٩٥)، والبيهقي ٩/ ٢٨٧ من طريق عيسى بن يونس، والدارمي (١٩٤٦)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ١٧٧، والبيهقي ٩/ ٢٨٧ من طريق أحمد بن خالد الوهبي، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٧٣٢٤) من طريق يزيد بن زُريع، ثلاثتهم عن محمَّد بن إسحاق، به. وأخرجه ابن خزيمة (٢٨٩٩)، والحاكم ١/ ٤٦٧ من طريق إبراهيم بن سعد، والحاكم ١/ ٤٦٧ من طريق يونس بن بكير، كلاهما عن محمَّد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن خالد بن أبي عمران، عن أبي عياش، عن جابر بن عبد الله. وهو في "مسند أحمد" (١٥٠٢٢) من طريق إبراهيم بن سعد. وأخرج أحمد (١٤٨٣٧)، وأبو داود (٢٨١٠)، والترمذي (١٥٩٩) من طريق المطلب بن عبد الله بن حنطب، عن جابر بن عبد الله قال: صليتُ مع رسول الله ﷺ عيد الأضحى، فلما انصرف أُتِي بكبش، فذبحه، فقال: "باسم الله، والله أكبر، اللهم إن هذا عني وعمن لم يضح من أمتي" وهو صحيح لغيره. وقوله: "وأنا أول المسلمين" قال الطيبي: هذا لفظ التنزيل حكاية عن قول إبراهيم ﵇، وإنما قال: أول المسلمين، لأن إسلام كل نبي مقدم على إسلام أمته. وقال القاري: والظاهر من القرآن أن نبينا ﵊ مأمور بهذا القول، فإنه تعالى قال له: ﴿قُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي﴾ [الأنعام: ١٦٢]. لكن كان يقول هذا تارة، و"أنا من المسلمين" أخرى كما تقدم تواضعًا حيث عدّ نفسه واحدًا منهم كما قال: "واحشرني في زمرة المساكين"، وفي "الأزهار" قوله: "وأنا أول المسلمين" مخصوص بالنبي ﷺ وأما غيره فلا يقرأ كذلك، بل يقول: وأنا من المسلمين ذكره الأبهري. قال القاري: قلت: وإلا كان كاذبًا ما لم يُرِد لفظ الآية، يعني لا يكون مُخبرًا عن نفسه بل تاليًا للقرآن. انظر "شرح المشكاة" ١/ ٥٢١٨