সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُصَفَّى، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " لاَ أُحَرِّمُ " . يَعْنِي الضَّبَّ .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, আমি দব্ব/সান্ডা হারাম বলি না। [৩২৪২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن كسابقه. وأخرجه البخاري (٥٥٣٦)، ومسلم (١٩٤٣)، والترمذي (١٨٩٣)، والنسائي ٧/ ١٩٧ من طرق عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر قال: قال النبي ﷺ: "الضب لستُ آكله ولا أحرمه" لفظ البخاري. وأخرجه مسلم (١٩٤٣)، والنسائي ٧/ ١٩٧ من طريق نافع، ومسلم (١٩٤٣) من طريق الشعبي، كلاهما عن ابن عمر. لفظ نافع بنحو اللفظ السابق، أما الشعبي فقال في روايته: فقال رسول الله ﷺ: "كلوا، فإنه حلال، ولكنه ليس طعامي". "وهو" في "مسند أحمد" (٤٤٩٧) و (٤٥٦٢)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٦٤) (٥٢٦٥)
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، وَعَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ هِشَامِ بْنِ زَيْدٍ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ مَرَرْنَا بِمَرِّ الظَّهْرَانِ فَأَنْفَجْنَا أَرْنَبًا فَسَعَوْا عَلَيْهَا فَلَغَبُوا فَسَعَيْتُ حَتَّى أَدْرَكْتُهَا فَأَتَيْتُ بِهَا أَبَا طَلْحَةَ فَذَبَحَهَا فَبَعَثَ بِعَجُزِهَا وَوَرِكِهَا إِلَى النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَبِلَهَا .
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা “মারজা-জাহরান (ওয়াদী ফাতিমাহ)” এলাকা অতিক্রমকালে একটি খরগোশকে উত্তেজিত করে বের করলাম। লোকেরা তার পিছু ধাওয়া করে ক্লান্ত হয়ে পড়লো। অতঃপর আমি তার পিছু ধাওয়া করে তা ধরে ফেললাম এবং তা নিয়ে আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-র নিকট আসলাম। তিনি তা যবেহ করলেন। অতঃপর তার নিতম্ব ও উরুর গোশত নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট পাঠালেন। তিনি তা গ্রহণ করলেন। [৩২৪৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. هشام بن زيد: هو ابن أنس بن مالك. وأخرجه البخاري (٢٥٧٢)، ومسلم (١٩٥٣)، وأبو داود (٣٧٩١)، والترمذي (١٨٩٢)، والنسائي ٧/ ١٩٧ من طريق هشام بن زيد، به. وهو في "مسند أحمد" (١٢١٨٢). وقوله: "استنفجنا" أي: استثَزنا أرنبًا، يقال: نَفَجَ الأرنبُ: إذا ثار، وأنفَجَها الصائد، إذا أثارها من مَجْثَمِها. قاله في "اللسان". ولَغَبوا، أي: تعِبوا، قال تعالى: ﴿وَلَقَدْ خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ وَمَا مَسَّنَا مِنْ لُغُوبٍ﴾ [ق: ٣٨]، أي: مِن تَعَب
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَنْبَأَنَا دَاوُدُ بْنُ أَبِي هِنْدٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ صَفْوَانَ، أَنَّهُ مَرَّ عَلَى النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِأَرْنَبَيْنِ مُعَلِّقَهُمَا فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي أَصَبْتُ هَذَيْنِ الأَرْنَبَيْنِ فَلَمْ أَجِدْ حَدِيدَةً أُذَكِّيهِمَا بِهَا فَذَكَّيْتُهُمَا بِمَرْوَةٍ أَفَآكُلُ قَالَ " كُلْ " .
মুহাম্মদ বিন সফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি দু’টি খরগোশ কাঁধে ঝুলিয়ে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি এই খরগোশ দু’টি ধরেছি কিন্তু এমন কোন লৌহাস্ত্র পেলাম না, যা দিয়ে তা যবেহ করতে পারতাম। তাই আমি একটি ধারালো সাদা পাথর দিয়ে তা যবেহ করেছি। আমি কি তা আহার করতে পারি? তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আহার করো। [৩২৪৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح، وقد سلف برقم (٣١٧٥)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ وَاضِحٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَبْدِ الْكَرِيمِ بْنِ أَبِي الْمُخَارِقِ، عَنْ حِبَّانَ بْنِ جَزْءٍ، عَنْ أَخِيهِ، خُزَيْمَةَ بْنِ جَزْءٍ قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ جِئْتُكَ لأَسْأَلَكَ عَنْ أَحْنَاشِ الأَرْضِ مَا تَقُولُ فِي الضَّبِّ قَالَ " لاَ آكُلُهُ وَلاَ أُحَرِّمُهُ " . قَالَ قُلْتُ فَإِنِّي آكُلُ مِمَّا لَمْ تُحَرِّمْ وَلِمَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ " فُقِدَتْ أُمَّةٌ مِنَ الأُمَمِ وَرَأَيْتُ خَلْقًا رَابَنِي " . قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا تَقُولُ فِي الأَرْنَبِ قَالَ لاَ آكُلُهُ وَلاَ أُحَرِّمُهُ " . قُلْتُ فَإِنِّي آكُلُ مِمَّا لَمْ تُحَرِّمْ وَلِمَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ " نُبِّئْتُ أَنَّهَا تَدْمَى " .
খুযায়মাহ বিন জাযই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি মাটির গর্ভে বসবাসকারী প্রানী সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করার জন্য আপনার নিকট এসেছি। দব্ব/সান্ডা সম্পর্কে আপনি কী বলেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমি নিজে খাই না এবং হারামও করি না। রাবী বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যে জিনিস আপনি হারাম করবেন না তা কি আমি আহার করতে পারি, আর আপনিই বা কেন তা আহার করেন না? তিনি বলেন, কোন এক সম্প্রদায় বিলুপ্ত হয়ে গিয়েছিল এবং তাদের গঠন এরুপ দেখেছি বলে আমার সন্দেহ হচ্ছে। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! খরগোশ সম্পর্কে আপনি কী বলেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমি তা খাইও না এবং হারামও করি না। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যে জিনিস আপনি হারাম করেন না, তা কি আমি আহার করতে পারি, আর আপনি তা কেন খান না? তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমাকে অবহিত করা হয়েছে যে, তা ঋতুবতী হয়। [৩২৪৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (3235)، (انوار الصحیفہ ص 493)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف كالإسناد السالف برقم (٣٢٣٥). وأخرجه ابن أبي شيبة ٨/ ٢٤٩ - ٢٥٠، والبخاري تعليقًا في "التاريخ الكبير" ٣/ ٢٠٦، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (١٤١١)، والطبراني في "المعجم الكبير" (٣٧٩٥) و (٣٧٩٦) و (٣٧٩٧)، والمزي في ترجمة حبان بن جَزء من طريق عبد الكريم بن أبي المخارق، به
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ، حَدَّثَنِي صَفْوَانُ بْنُ سُلَيْمٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ سَلَمَةَ، مِنْ آلِ ابْنِ الأَزْرَقِ أَنَّ الْمُغِيرَةَ بْنَ أَبِي بُرْدَةَ، - وَهُوَ مِنْ بَنِي عَبْدِ الدَّارِ - حَدَّثَهُ أَنَّهُ، سَمِعَ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " الْبَحْرُ الطَّهُورُ مَاؤُهُ الْحِلُّ مَيْتَتُهُ " . قَالَ أَبُو عَبْدِ اللَّهِ بَلَغَنِي عَنْ أَبِي عُبَيْدَةَ الْجَوَادِ أَنَّهُ قَالَ هَذَا نِصْفُ الْعِلْمِ لأَنَّ الدُّنْيَا بَرٌّ وَبَحْرٌ فَقَدْ أَفْتَاكَ فِي الْبَحْرِ وَبَقِيَ الْبَرُّ .
আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ “সমুদ্রের পানি পাক এবং তার মৃতজীব হালাল”। আবূ আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি আবূ উবায়দা আল-জাওয়াদের সূত্রে জানতে পেরেছি যে, তিনি বলেন, এটা জ্ঞানের অর্ধেক। কারণ দুনিয়াটা (দু‘ভাগে বিভক্ত): স্থলভাগ ও জলভাগ। অতএব তোমাকে জলভাগ সম্পর্কে ফতোয়া দেয়া হয়েছে। আর অবশিষ্ট থাকলো স্থলভাগ। [৩২৪৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهو مكرر الحديث السالف برقم (٣٨٦). ننبيه: في المطبوع بعد هذا الحديث زيادة: قال أبو عبد الله: بلغني عن أبي عُبيدة الجواد أنه قال: هذا نصف العلم، لأن الدنيا بَرٌّ وبحرٌ، فقد أفتاك في البحر، وبقي البر. اهـ، قلنا: وليس هذا في شيء من أصولنا، والجواد محرَّف -فيما يغلب على ظننا- عن الحداد، وهو عبد الواحد بن واصل، والله تعالى أعلم
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سُلَيْمٍ الطَّائِفِيُّ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ أُمَيَّةَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَا أَلْقَى الْبَحْرُ أَوْ جَزَرَ عَنْهُ فَكُلُوهُ وَمَا مَاتَ فِيهِ فَطَفَا فَلاَ تَأْكُلُوهُ " .
জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ সমুদ্র যা উদগীরণ করে অথবা তা থেকে যা নিক্ষিপ্ত হয় তা তোমরা আহার করো। আর যা সমুদ্রে মারা যায়, অতঃপর পানির উপর ভেসে উঠে তা আহার করো না। [৩২৪৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (3815)، (انوار الصحیفہ ص 493)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف. أبو الزبير -وهو محمَّد بن مسلم بن تَدرُس المكي- مدلس وقد عنعن، ثم إن يحيى بنَ سُليم -وهو الطائفي- في حفظه شيء، وقد خالفَه الثقات فرووه عن أبي الزبير عن جابر موقوفًا، وهو الصحيح، نص عليه أبو داود والدارقطني وغيرهما. وأخرجه أبو داود (٣٨١٥)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٠٢٨)، والطبراني في "الأوسط" (٢٨٥٩)، والدارقطني (٤٧١٥)، والبيهقي ٩/ ٢٥٥ - ٢٥٦، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٦/ ٢٢٥، وابن الجوزي في "التحقيق" (١٩٤٥) من طريق يحيى بن سُليم الطائفي، بهذا الإسناد. قال أبو داود: روى هذا الحديث سفيان الثوري، وأيوب وحماد عن أبي الزبير، أوقفوه على جابر. وقد أُسند هذا الحديث أيضًا من وجه ضعيف عن ابن أبي ذئب، عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي ﷺ. وأخرجه الدارقطني (٤٧١٦) من طريق إسماعيل بن عياش، عن إسماعيل بن أمية، عن أبي الزبير، عن جابر موقوفًا من قوله. وقال الدارقطني: وهو الصحيح. وأخرجه الترمذي في "العلل الكبير" ٢/ ٦٣٦، والطبراني في "الأوسط" (٥٦٥٦)، والخطيب في "تاريخ بغداد" ١٠/ ١٤٨ من طريق حسين بن يزيد الطحان، عن حفص بن غياث، عن ابن أبي ذئب، عن أبي الزبير، عن جابر مرفوعًا، قال البخاري فيما نقله عنه الترمذي: ليس هذا بمحفوظ، ويروى عن جابر خلاف هذا، ولا أعرف لابن أبي ذئب عن أبي الزبير شيئًا. قلنا: وقد ضعفه أبو داود كما سلف. وأخرجه الدارقطني (٤٧١٤)، والبيهقي ٩/ ٢٥٥ من طريق أبي أحمد الزُّبيري، عن سفيان الثوري، عن أبي الزبير، عن جابر مرفوعًا كذلك. قال الدارقطني: لم يُسنده عن الثوري غير أبي أحمد، وخالفه وكيع والعدنيان، وعبد الرزاق ومؤمل وأبو عاصم وغيرهم، رووه عن الثوري موقوفًا، وهو الصواب، وكذلك رواه أيوب السختياني وعُبيد الله بن عمر وابن جريج وزهير وحماد بن سلمة وغيرهم عن أبي الزبير موقوفًا. قلنا: ووهمَ أبا أحمد كذلك الطبراني والبيهقيُّ. وأخرجه موقوفًا ابنُ أبي شيبة ٥/ ٣٧٩ من طريق أيوب السختياني، والدارقطني (٤٧١٧) و (٤٧١٨)، والبيهقي ٩/ ٢٥٥ من طريق عُبيد الله بن عمر، كلاهما عن أبي الزبير، عن جابر. وأخرجه مرفوعًا الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٠٢٦) و (٤٠٢٧)، والدارقطني (٤٧١٣) من طريق عبد العزيز بن عُبيد الله، عن وهب بن كيسان -زاد الطحاوي: ونُعيم بن عبد الله- عن جابر. قال الدارقطني: تفرد به عبد العزيز عن وهب، وعبد العزيز ضعيف لا يُحتج به
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ الأَزْهَرِ النَّيْسَابُورِيُّ، حَدَّثَنَا الْهَيْثَمُ بْنُ جَمِيلٍ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ مَنْ يَأْكُلُ الْغُرَابَ وَقَدْ سَمَّاهُ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " فَاسِقًا " . وَاللَّهِ مَا هُوَ مِنَ الطَّيِّبَاتِ .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কোন্ লোক কাক খায়? অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নাম রেখেছেন, “ফাসিক” (নিকৃষ্ট প্রাণী)। আল্লাহর শপথ! তা পবিত্র প্রাণীর অন্তর্ভূক্ত নয়। [৩২৪৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف. شريك -وهو ابن عبد الله النخعي القاضي- سيئ الحفظ، وقد اختُلف في إسناد هذا الحديث عن هشام بن عروة، فرواه شريك كذلك، ورواه مرة أخرى عن هشام، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير، وخالفه يحيى بن سعيد فرواه عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، ورواه أبو معاوية محمَّد بن خازم وأنس بن عياض وجعفر بن عون عن هشام بن عروة، عن أبيه مرسلًا قال الدارقطني في "العلل" ٤/ ٢٤٢: والصحيح: هشام، عن أبيه مرسل. وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات"، ومن طريقه أخرجه الببهقي ٩/ ٣١٧، والذهبي في "تذكرة الحفاظ" ١/ ٣٦٣ من طريق الهيثم بن جميل، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٢٥٩ - قطعة من الجزء١٣)، والضياء المقدسي في "المختارة" ٩/ (٢٩٥) و (٢٩٦) من طريق حنيفة بن مرزوق، عن شريك، عن هشام، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير. وأخرجه البيهقي ٩/ ٣١٧ من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن يحيى بن سعيد عن عمرة بنت عبد الرحمن وعن هشام، عن أبيه، عن عائشة. وأبو أويس -وهو عبد الله بن عبد الله الأصبحي- ضعيف. وأخرجه ابن أبي شيبة ٥/ ٤٠٠ عن أبي معاوية، والبيهقي ٩/ ٣١٧ من طريق جعفر بن عون، وابن عبد البر في "التمهيد" ١٥/ ١٨٥ من طريق أنس بن عياض، ثلاثتهم عن هشام، عن أبيه مرسلًا
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا الأَنْصَارِيُّ، حَدَّثَنَا الْمَسْعُودِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " الْحَيَّةُ فَاسِقَةٌ وَالْعَقْرَبُ فَاسِقَةٌ وَالْفَأْرَةُ فَاسِقَةٌ وَالْغُرَابُ فَاسِقٌ " . فَقِيلَ لِلْقَاسِمِ أَيُؤْكَلُ الْغُرَابُ قَالَ مَنْ يَأْكُلُهُ بَعْدَ قَوْلِ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " فَاسِقٌ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ বলেনঃ সাপ ক্ষতিকর প্রাণী, বিছা ক্ষতিকর প্রানী, ইঁদুর ক্ষতিকর প্রানী এবং কাক ক্ষতিকর প্রাণী। কাসিমের নিকট জিজ্ঞাসা করা হলো, কাক আহার করা যায় কি? তিনি পাল্টা প্রশ্ন করেন, কোন্ লোক কাক আহার করে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কথার পর যে, ‘তা ফাসিক’? [৩২৪৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. الأنصاري -وهو محمَّد بن عبد الله بن المثنى- وإن كان لا يُعلَم سمع من المسعودي -وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة- قبل أو بعد اختلاطه، تابعه وكيع وأبو نعيم، وهما ممن سمع من المسعودي قبل اختلاطه. وأخرجه ابن المبارك في "مسنده" (٢٠٤)، وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (٩٥٥) قِسم مسند عائشة- عن أبي نعيم الفضل بن دكين، والبيهقي ٩/ ٣١٦ من طريق أبي النضر هاشم بن القاسم، ثلاثتهم (ابن المبارك وأبو نعيم وأبو النضر) عن المسعودي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٧٥٣) عن وكيع، عن المسعودي
حَدَّثَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ مَهْدِيٍّ، أَنْبَأَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَنْبَأَنَا عُمَرُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ عَنْ أَكْلِ الْهِرَّةِ وَثَمَنِهَا.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিড়াল ও তার ক্রয়মূল্য ভোগ করতে নিষেধ করেছেন। [৩২৫০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عمر بن زيد -وهو الصنعاني - لكن تابعه معقل بن عُبيد الله، وحماد بن سلمة عن أبي الزبير عن جابر، وأبو سفيان طلحة بن نافع عن جابر كذلك كلما سلف عند المصنف برقم (٢١٦١). وأخرجه أبو داود (٣٤٨٠) و (٣٨٠٧)، والترمذي (١٣٢٦) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث غريب. وانظر الكلام على فقه الحديث فيما سلف برقم (٢١٦١)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ عَوْفٍ، عَنْ زُرَارَةَ بْنِ أَوْفَى، حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَلاَمٍ، قَالَ لَمَّا قَدِمَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ الْمَدِينَةَ انْجَفَلَ النَّاسُ قِبَلَهُ وَقِيلَ قَدْ قَدِمَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَدْ قَدِمَ رَسُولُ اللَّهِ قَدْ قَدِمَ رَسُولُ اللَّهِ . ثَلاَثًا فَجِئْتُ فِي النَّاسِ لأَنْظُرَ فَلَمَّا تَبَيَّنْتُ وَجْهَهُ عَرَفْتُ أَنَّ وَجْهَهُ لَيْسَ بِوَجْهِ كَذَّابٍ فَكَانَ أَوَّلَ شَىْءٍ سَمِعْتُهُ تَكَلَّمَ بِهِ أَنْ قَالَ " يَا أَيُّهَا النَّاسُ أَفْشُوا السَّلاَمَ وَأَطْعِمُوا الطَّعَامَ وَصِلُوا الأَرْحَامَ وَصَلُّوا بِاللَّيْلِ وَالنَّاسُ نِيَامٌ تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ بِسَلاَمٍ " .
আবদুল্লাহ বিন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (হিজরত করে মক্কা থেকে) মদীনায় এলেন তখন লোকেরা তাঁর নিকট যেতে লাগলো এবং বলাবলি হতে লাগলোঃ আল্লাহর রাসূল এসেছেন, আল্লাহর রাসূল এসেছেন, আল্লাহর রাসূল এসেছেন (তিনবার)। আমিও লোকজনের সাথে (তাঁকে) দেখতে গেলাম। আমি তাঁর মুখমন্ডল উত্তমরূপে দেখার পর বুঝতে পারলাম যে, এই চেহারা মিথ্যাবাদীর নয়। সর্বপ্রথম তাঁর মুখে আমার শোনা কথা এই যে, তিনি বললেনঃ হে লোকসকল! তোমরা সালামের ব্যাপক প্রচলন করো, আহার করাও, আত্নীয়তার সম্পর্ক বহাল রাখো এবং লোকজন যখন ঘুমিয়ে থাকে, তখন রাতের বেলা নামায পড়ো। শান্তিতে জান্নাতে প্রবেশ করো। [৩২৫১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. حماد: هو ابن أسامة الكوفي، وعوف، هو ابن أبي جميلة الأعرابي. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ٨/ ٥٣٦ و ٦٢٤ و ١٤/ ٩٥. وسلف برقم (١٣٣٤)
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى الأَزْدِيُّ، حَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ مُحَمَّدٍ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، قَالَ سُلَيْمَانُ بْنُ مُوسَى حُدِّثْنَا عَنْ نَافِعٍ، أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ، كَانَ يَقُولُ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " أَفْشُوا السَّلاَمَ وَأَطْعِمُوا الطَّعَامَ وَكُونُوا إِخْوَانًا كَمَا أَمَرَكُمُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ " .
আবদুল্লাহ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা সালামের ব্যাপক প্রসার করো, খাদ্য দান করো এবং ভাই ভাই হয়ে সদ্ভাবে থাকো, যেমন মহামহিম আল্লাহ তোমাদের আদেশ করেছেন। [৩২৫২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز المكي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٩٢٩) من طريق حجاج بن محمَّد الأعور، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٤٥٠)
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ أَبِي الْخَيْرِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، . أَنَّ رَجُلاً، سَأَلَ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَىُّ الإِسْلاَمِ خَيْرٌ قَالَ " تُطْعِمُ الطَّعَامَ وَتَقْرَأُ السَّلاَمَ عَلَى مَنْ عَرَفْتَ وَمَنْ لَمْ تَعْرِفْ " .
আবদুল্লাহ বিন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেনঃ এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট জিজ্ঞাস করলো, হে আল্লাহর রাসূল! কোন্ ইসলাম উত্তম? তিনি বলেনঃ দরিদ্রদেরকে তোমার খাদ্যদান এবং তোমার পরিচিত ও অপরিচিত সকলকে সালাম দেয়া। [৩২৫৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو الخير: هو مرثد بن عبد الله اليزني. وأخرجه البخاري (١٢) و (٢٨) و (٦٢٣٦)، ومسلم (٣٩)، وأبو داود (٥١٩٤)، والنسائي ٨/ ١٠٧ من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٥٨١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٥)
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ الرَّقِّيُّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ زِيَادٍ الأَسَدِيُّ، أَنْبَأَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، أَنْبَأَنَا أَبُو الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " طَعَامُ الْوَاحِدِ يَكْفِي الاِثْنَيْنِ وَطَعَامُ الاِثْنَيْنِ يَكْفِي الأَرْبَعَةَ وَطَعَامُ الأَرْبَعَةِ يَكْفِي الثَّمَانِيَةَ " .
জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ একজনের খাবার দু’জনের জন্য যথেষ্ট, দু’জনের খাবার চারজনের জন্য যথেষ্ট এবং চারজনের খাবার আটজনের জন্য যথেষ্ট হতে পারে। [৩২৫৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز بن جريج، وأبو الزبير: هو محمَّد بن مسلم بن تَدرُس المكي. وأخرجه مسلم (٢٠٥٩) (١٧٩) من طريق روح بن عبادة، عن ابن جريج، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٢٠٥٩) (١٧٩)، والنسائي في "الكبرى" (٦٧٤٣) من طريق سفيان الثوري، عن أبي الزبير، به. وأخرجه مسلم (٢٠٥٩) (١٨٠) و (١٨١)، والترمذي (١٩٢٤) من طريق أبي سفيان طلحة بن نافع، عن جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٢٢)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٣٧). وفي الحديث حثُّ على المواساة في الطعام، فإنه وإن كان قليلًا حصلت منه الكفاية المقصودة، ووقعت فيه بركة تعم الحاضرين. وتفسير هذا ما قال عمر ؓ في عام الرمادة: لقد هممتُ أن أُنزِلَ على أهلِ كُل بيت مثلَ عددهم، فإنَ الرجلَ لا يهلِكُ على نِصف بطنه
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ الْخَلاَّلُ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ زَيْدٍ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ، قَهْرَمَانُ آلِ الزُّبَيْرِ قَالَ سَمِعْتُ سَالِمَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّ طَعَامَ الْوَاحِدِ يَكْفِي الاِثْنَيْنِ وَإِنَّ طَعَامَ الاِثْنَيْنِ يَكْفِي الثَّلاَثَةَ وَالأَرْبَعَةَ وَإِنَّ طَعَامَ الأَرْبَعَةِ يَكْفِي الْخَمْسَةَ وَالسِّتَّةَ " .
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ একজনের খাদ্য দু’জনের জন্য যথেষ্ট হতে পারে, দু’জনের খাবার তিন বা চারজনের জন্য যথেষ্ট হতে পারে এবং চারজনের খাবার পাঁচ অথবা ছ’জনের জন্য যথেষ্ট হতে পারে। [৩২৫৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف جدا
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، عمرو بن دینار قھرمان آل الزبیر ضعیف ، و الحدیث السابق (الأصل: 3255) یغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 493)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عمرو بن دينار قهرمان آل الزبير. وهذا الحديث انفرد به ابن ماجه مِن هذا الوجه. ويشهد له حديثُ جابر الذي قبله. وحديث عبد الرحمن بن أبي بكر في قصة أضياف أبي بكر عند البخاري (٦٠٢) و (٣٥٨١)، ومسلم (٢٠٥٧): أن النبي ﷺ قال: "من كان عنده طعام اثنين، فليذهب بثالث، ومن كان عنده طعام أربعة فليذهب بخامس أو سادس". وثالث من حديث أبي هريرة عند البخاري (٥٣٩٢)، ومسلم (٢٠٥٨): أن رسول الله ﷺ -قال: "طعام الاثنين كافي الثلاثة، وطعام الثلاثة كافي الأربعة". والجامع بين هذه الأحاديث -كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" ٩/ ٥٣٥ - أن مطلقَ طعامِ القليل يكفي الكثيرَ، لكن أقصاه الضعف، وكونه يكفي مثلَه لا يفي أن يكفي دونَه، نعم كونُ طعامِ الواحد يكفي الاثنين يُؤخذ منه أن طعامَ الاثنين يكفي الثلاثةَ بطريقِ الأولى بخلاف عكسه
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَفَّانُ، ح وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " الْمُؤْمِنُ يَأْكُلُ فِي مِعًى وَاحِدٍ وَالْكَافِرُ يَأْكُلُ فِي سَبْعَةِ أَمْعَاءٍ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মুমিন ব্যক্তি এক উদরে খায় এবং কাফের ব্যক্তি সাত উদরে খায়। [৩২৫৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٥٣٩٧)، والنسائي في "الكبرى" (٦٧٤١) من طريق شعبة، بهذا الأسناد. وأخرجه البخاري (٥٣٩٦) من طريق الأعرج، ومسلم (٢٠٦٣) من طريق أبي صالح، كلاهما عن أبي هريرة. وعند مسلم: "يشرب" بدل: يأكل. وهو في "مسند أحمد" (٧٤٩٧) و (٩٣٧٤)، وابن حبان (١٦١). قوله: "ياكلُ في معي واحدِ"، قال السندي: مِن شأن المؤمن التقليلُ من الأطعمة وغيرها من حظوظ الدنيا، وإرسالُ النفسِ فيها من شأن الكافرين الذين نظرهم مقصورٌ على هذه الدار، وأما من يرى هذه الدار فناءَ ويعتقد أن هناك دارًا أخرى هي دارُ بقاءِ، فمِنْ شأنه الزهدُ في هذه، والاستعدادُ لتلك، والله أعلم
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " الْكَافِرُ يَأْكُلُ فِي سَبْعَةِ أَمْعَاءٍ وَالْمُؤْمِنُ يَأْكُلُ فِي مِعًى وَاحِدٍ " .
ইবনু উমার (রাদিয়ালাহু তা’আলা আনহু) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, কাফের ব্যক্তি সাতটি পাকস্থলী পূর্তি করে খায় এবং মুমিন ব্যক্তি এক পাকস্থলী পূর্তি করে খায়। [৩২৫৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. علي بن محمَّد: هو الطنافسي، وعبيد الله: هو ابن عمر ابن حفص العمري. وأخرجه البخاري (٥٣٩٤)، ومسلم (٢٠٦٠) (١٨٢)، والترمذي (١٩٢١)، والنسائي في "الكبرى" (٦٧٤٠) من طريق عبيد الله بن عمر، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٥٣٩٣)، ومسلم (٢٠٦٠) (١٨٣) من طريق واقد بن محمَّد، ومسلم (٢٠٦٠) (١٨٢) من طريق أيوب، كلاهما عن نافع، به. وأخرجه البخاري (٥٣٩٥) من طريق عمرو بن دينار، ومسلم (٢٠٦١) من طريق أبي الزبير، كلاهما عن ابن عمر. وقرن أبو الزبير بابن عمر جابرًا. وهو في "مسند أحمد" (٤٧١٨)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٣٨)
حَدَّثَنَا أَبُو كُرَيْبٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ بُرَيْدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ جَدِّهِ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِي مُوسَى، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " الْمُؤْمِنُ يَأْكُلُ فِي مِعًى وَاحِدٍ وَالْكَافِرُ يَأْكُلُ فِي سَبْعَةِ أَمْعَاءٍ " .
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মুমিন ব্যক্তি এক পাকস্থলীতে খায় এবং কাফের ব্যক্তি সাত পাকস্থলীতে খায়। [৩২৫৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو كريب: هو محمَّد بن العلاء، أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه مسلم (٢٠٦٢) عن أبي كريب، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٥٢٣٤)
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ مَا عَابَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ طَعَامًا قَطُّ إِنْ رَضِيَهُ أَكَلَهُ وَإِلاَّ تَرَكَهُ .
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي يَحْيَى، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ مِثْلَهُ . قَالَ أَبُو بَكْرٍ نُخَالِفُ فِيهِ يَقُولُونَ عَنْ أَبِي حَازِمٍ .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও খাদ্যসামগ্রীর ত্রুটি ধরতেন না। পছন্দ হলে তিনি আহার করতেন, অন্যথায় রেখে দিতেন।
[উপরোক্ত হাদীসে মোট ২টি সানাদের ১টি বর্ণিত হয়েছে, অপর সানাদটি হলোঃ]
২/৩২৫৯ (১). আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে উপরোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে। [৩২৫৯]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عبد الرحمن: هو ابن مهدي، وسفيان: هو الثوري، والأعمش: هو سليمان بن مِهران، وأبو حازم: هو سَلمان الأشجعي. وأخرجه البخاري (٥٤٠٩)، ومسلم (٢٠٦٤) (١٨٧)، وأبو داود (٣٧٦٣)، والترمذي (٢١٥٠) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٣٥٦٣)، ومسلم (٢٠٦٤) من طرق عن الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (١٠١٤١)، و"صحيح ابن حبان" (٦٤٣٧). * إسناده حسن من أجل أبي يحيى: وهو مولى بني جَعدة بن هبيرة. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير. وأخرجه مسلم (٢٠٦٤) (١٨٨) من طريق أبي معاوية، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٩٥٠٧)
حَدَّثَنَا جُبَارَةُ بْنُ الْمُغَلِّسِ، حَدَّثَنَا كَثِيرُ بْنُ سُلَيْمٍ، سَمِعْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنْ أَحَبَّ أَنْ يُكْثِرَ اللَّهُ خَيْرَ بَيْتِهِ فَلْيَتَوَضَّأْ إِذَا حَضَرَ غَدَاؤُهُ وَإِذَا رُفِعَ " .
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি চায় যে, তার ঘরে বরকত আসুক, সে যেন সকালের আহার গ্রহণের সময় উযু করে এবং আহার শেষেও উযু করে। [৩২৬০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، کثیر بن سلیم: ضعیف ، والسند ضعفہ البوصیري، (انوار الصحیفہ ص 493)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، لضعف كثير بن سُليم، وجبارة بن المغلس وان كان ضعيفًا قد توبع فأخرجه أبو الشيخ في "أخلاق النبي" ﷺ ص ٢١٧ بن طريق إسماعيل بن أبان الأزدي والبيهقي في "شعب الإيمان" (٥٨٠٧) من طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث، كلاهما عن كثير بن سليم، به. وقال البيهقي في كثير: يأتي بما لا يُتابع عليه. وأخرج أبو داود (٣٧٦١)، وأحمد (٢٣٧٣٢)، والترمذي (١٩٥٢) من طرق عن قيس بن الربيع، عن أبي هاشم الرماني الواسطي، عن زاذان، عن سلمان الفارسي، قال: قرأتُ في التوراة "بركة الطعام الوضوء بعده" قال: فذكرت ذلك لرسول الله ﷺ، وأخبرته بما قرأت في التوراة، فقال: "بركة الطعام الوضوءُ قبله والوضوءُ بعده" وقيس بن الربيع مختلف فيه وثقه شعبة والثوري وأبو الوليد الطيالسي، وسفيان بن عيينة، وضعفه أحمد ووكيع ويحيى القطان وابن معين، وباقي رجاله ثقات، وقد مال المنذري في "الترغيب" ٣/ ١٥٠ - ١٥١ إلى تحسينه. والمراد بالوضوء هنا تنظيف اليدين بغسلهما، قال الطيبي: معنى بركته قبله نموه وزيادة نفعه، وبعده دفع ضرر الغمر الذي علق بيده وعيافته
حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ، حَدَّثَنَا صَاعِدُ بْنُ عُبَيْدٍ الْجَزَرِيُّ، حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ مُعَاوِيَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جُحَادَةَ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ الْمَكِّيُّ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَنَّهُ خَرَجَ مِنَ الْغَائِطِ فَأُتِيَ بِطَعَامٍ فَقَالَ رَجُلٌ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَلاَ آتِيكَ بِوَضُوءٍ قَالَ " أُرِيدُ الصَّلاَةَ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট থেকে বর্ণিত। তিনি পায়খানা থেকে বেরিয়ে আসলে তাঁর জন্য খাবার পেশ করা হলো। এক ব্যক্তি বললো, হে আল্লাহ্র রাসূল! আমি কি আপনার জন্য উযুর পানি নিয়ে আসব না? তিনি বলেনঃ আমি কি নামায পড়তে চাচ্ছি? [৩২৬১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد فيه مقال، صاعد بن عبيد مجهول الحال. وأخرجه ابن عدي في ترجمة زياد بن عبد الله البكائي من "الكامل" ٣/ ١٠٤٩ من طريقه عن محمَّد بن جُحادة، بهذا الإسناد. قال ابن عدي: هكذا حدَّث به زياد عن ابن جحادة عن عمرو عن عطاء عن أبي هريرة، وتابعه على ذلك زهير بن معاوية، وعندي أنهما أخطآ على ابن جحادة، أو الخطأ من ابن جحادة عن عمرو بن دينار، فإن الحديث لا يرويه عن ابن جحادة غِيرُهما، وقد روى هذا الحديث أصحاب عمرو بن دينار الأثبات مثل حماد بن زيد وابن عيينة وغيرهما عن عمرو بن دينار عن سعيد بن الحويرث عن ابن عباس، وهو الصواب. قلنا: وحديث عمرو عن سعيد بن الحويرث عن ابن عباس أخرجه مسلم في "صحيحه" (٣٧٤)، وهو في "مسند أحمد" (١٩٣٢)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٠٨)