সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا صَدَقَةُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي الْعَاتِكَةِ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ يَزِيدَ، عَنِ الْقَاسِمِ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ، أَنَّ رَجُلاً، قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا حَقُّ الْوَالِدَيْنِ عَلَى وَلَدِهِمَا قَالَ " هُمَا جَنَّتُكَ وَنَارُكَ " .
আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললো, হে আল্লাহর রাসূল! সন্তানের উপর মাতা-পিতার কী অধিকার আছে? তিনি বলেনঃ তারা তোমার জান্নাত এবং তোমার জাহান্নাম। [২৯৯৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، قال البوصیري: ’’ ھذا إسناد ضعیف،وقال الساجي: اتفق أھل، النقل علی ضعف علي بن یزید ‘‘ ، (انوار الصحیفہ ص 508)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، علي بن يزيد -وهو الألهاني- متفق على ضعفه
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِي الدَّرْدَاءِ، سَمِعَ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ " الْوَالِدُ أَوْسَطُ أَبْوَابِ الْجَنَّةِ فَأَضِعْ ذَلِكَ الْبَابَ أَوِ احْفَظْهُ " .
আবূ দারদা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছেন : পিতা হলো জান্নাতের দরজাসমূহের মধ্যবর্তী দরজা। অতএব তুমি ঐ দরজা নষ্টও করতে পারো অথবা তার হেফাজতও করতে পারো। [২৯৯৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وقد سلف برقم (٢٠٨٩) ٠ أبو عبد الرحمن: هو عبد الله ابن حبيب السُلمي
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ إِدْرِيسَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَسِيدِ بْنِ عَلِيِّ بْنِ عُبَيْدٍ، مَوْلَى بَنِي سَاعِدَةَ عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي أُسَيْدٍ، مَالِكِ بْنِ رَبِيعَةَ قَالَ بَيْنَمَا نَحْنُ عِنْدَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ إِذْ جَاءَهُ رَجُلٌ مِنْ بَنِي سُلَيْمٍ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَبَقِيَ مِنْ بِرِّ أَبَوَىَّ شَىْءٌ أَبَرُّهُمَا بِهِ مِنْ بَعْدِ مَوْتِهِمَا قَالَ " نَعَمْ الصَّلاَةُ عَلَيْهِمَا وَالاِسْتِغْفَارُ لَهُمَا وَإِيفَاءٌ بِعُهُودِهِمَا مِنْ بَعْدِ مَوْتِهِمَا وَإِكْرَامُ صَدِيقِهِمَا وَصِلَةُ الرَّحِمِ الَّتِي لاَ تُوصَلُ إِلاَّ بِهِمَا " .
আবূ উসায়দ মালিক বিন রাবীআহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলিইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তখন সালামা গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমার পিতা-মাতার মৃত্যুর পর তাদের সাথে সদাচারের কিছু অবশিষ্ট আছে কি, যা আমি তাদের সাথে করতে পারি? তিনি বলেনঃ হাঁ, তাদের জন্য দুআ’ করা, ক্ষমা প্রার্থনা করা, তাদের মৃত্যুর পর তাদের প্রদত্ত প্রতিশ্রুতি পালন করা, তাদের বন্ধুদের সম্মান করা এবং (অপরের সাথে) তাদের গড়ে তোলা সম্পর্ক উজ্জীবিত রাখা। [২৯৯৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لجهالة علي بن عُبيد. وأخرجه أبو داود (٥١٤٢) من طريق عبد الله بن إدريس، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٠٥٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤١٨). وفي الباب عن ابن عمر عند مسلم (٢٥٥٢) مرفوعًا: "إن من أبَر البر صلةَ الرجلِ أهلَ وُدِّ أبيه، بعد أن يولِّيَ". قال السندي: "الصلاة عليهما" أي: الدعاء لهما بالرحمة. وقوله: "لا تُوصل إلا بهما" أي: بسببهما
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قَدِمَ نَاسٌ مِنَ الأَعْرَابِ عَلَى النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَالُوا أَتُقَبِّلُونَ صِبْيَانَكُمْ قَالُوا نَعَمْ . فَقَالُوا لَكِنَّا وَاللَّهِ مَا نُقَبِّلُ . فَقَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " وَأَمْلِكُ أَنْ كَانَ اللَّهُ قَدْ نَزَعَ مِنْكُمُ الرَّحْمَةَ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কতক বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললো, আপনারা কি আপনাদের শিশুদের চুমু দেন? সাহাবীগণ বলেন, হাঁ। তারা বললো, কিন্তু আল্লাহর শপথ! আমরা চুমু দেই না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আল্লাহ যদি তোমাদের অন্তর থেকে দয়ামায়া তুলে নিয়ে থাকেন তাহলে আমি আর কী করতে পারি। [২৯৯৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه البخاري (٥٩٩٨)، ومسلم (٢٣١٧) من طريق هشام بن عروة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٩١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٩٥)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَفَّانُ، حَدَّثَنَا وُهَيْبٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُثْمَانَ بْنِ خُثَيْمٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي رَاشِدٍ، عَنْ يَعْلَى الْعَامِرِيِّ، أَنَّهُ قَالَ جَاءَ الْحَسَنُ وَالْحُسَيْنُ يَسْعَيَانِ إِلَى النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَضَمَّهُمَا إِلَيْهِ وَقَالَ " إِنَّ الْوَلَدَ مَبْخَلَةٌ مَجْبَنَةٌ " .
ইয়া‘লা আল-আমিরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, হাসান ও হোসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দৌড়াতে দৌড়াতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তিনি তাদের কে বুকে জড়িয়ে ধরলেন এবং বললেনঃ সন্তান মানুষকে কাপুরুষ ও দুর্বল বানিয়ে দেয়। [২৯৯৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة سعيد بن أبي راشد، فقد انفرد بالرواية عنه ابن خثيم ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان. وهيب: هو ابن خالد بن عجلان، ويعلى العامري: هو يعلى بن مرة بن وهب، من الصحابة. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ١٢/ ٩٧. وأخرجه أحمد (١٧٥٦٢)، والطبراني في "الكبير" (٢٥٨٧) و ٢٢/ (٧٠٣) و (٧٠٤)، والرامهرمزي في "الأمثال" (١٤٠)، والحاكم ٣/ ١٦٤، والقضاعي في "مسند الشهاب" (٢٥)، والبيهقي في "السُّنن" ١٠/ ٢٠٢ من طريق عبد الله بن عثمان بن خثيم، به. وفي الباب عن الأسود بن خلف الجمحى عند البزار (١٨٩١ - كشف الأستار)، وسنده محتمل للتحسين. ويشهد لقوله: "الولد مبخلة مجبنة" دون قصة الحسن والحسين: حديث الأشعث بن قيس عند الحاكم ٤/ ٢٣٩، ورجاله رجال الصحيح. وله إسناد آخر ضعيف عند أحمد في "المسند" (٢١٨٤٠). وحديثُ أبي سعيد الخدري عند البزار (١٨٩٢)، وسنده ضعيف. قوله: "مَبخلة مَجْبنة" هو بفتح الميم وسكون الباء، أي: سبب ومحصل للبخل، ففي "النهاية": المبخلة مفعلة من البخل ومَظِنَّة له، أي: أنه يحمل أبويه على البخل ويدعوهما إليه، فيبخلان بالمال لأجله، ومجبنة، بفتح الميم وسكون الجيم، أي: باعث على الجبن، وهذا يدل على كمال محبتهم وغاية مودتهم حتى يختار أكثر الناس حبهم على محامد المحاسن الرضية والأمور المأمور بها في الشريعة الحنيفية النافعة لهم في القضايا الدينية والدنيوية. قاله القاري في "شرح المشكاة" ٤/ ٥٨٠
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ الْحُبَابِ، عَنْ مُوسَى بْنِ عُلَىٍّ، سَمِعْتُ أَبِي يَذْكُرُ، عَنْ سُرَاقَةَ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " أَلاَ أَدُلُّكُمْ عَلَى أَفْضَلِ الصَّدَقَةِ ابْنَتُكَ مَرْدُودَةً إِلَيْكَ لَيْسَ لَهَا كَاسِبٌ غَيْرُكَ " .
সুরাকাহ বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমি কি তোমাদেরকে সর্বোত্তম দান-খয়রাতের পথ নির্দেশ করবো না? তোমার যে কন্যা তোমার নিকট ফিরে এসেছে এবং তুমি ছাড়া তার আর কোন উপার্জনকারী নেই, তার জন্য কৃত দান-খয়রাত সর্বোত্তম। [২৯৯৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، علتہ الإنقطاع بین سراقۃ وعُلَيّ کما صرح بہ البوصیري، وغیرہ ، فالسند منقطع، (انوار الصحیفہ ص 508، 509)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لانقطاعه بين علي بن رباح وبين سراقة بن مالك. وأخرجه أحمد (١٧٥٨٦)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٨٠) و (٨١)، والطبراني في "الكبير" (٦٥٩١) و (٦٥٩٢)، والحاكم ٤/ ١٧٦ من طريق موسى بن عُلي، به. ورواية البخاري في الموضع الأول: موسى بن علي عن أبيه: أن النبي ﷺ قال لسراقة .. مرسلًا
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ، عَنْ مِسْعَرٍ، أَخْبَرَنِي سَعْدُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ صَعْصَعَةَ، عَمِّ الأَحْنَفِ قَالَ دَخَلَتْ عَلَى عَائِشَةَ امْرَأَةٌ مَعَهَا ابْنَتَانِ لَهَا فَأَعْطَتْهَا ثَلاَثَ تَمَرَاتٍ فَأَعْطَتْ كُلَّ وَاحِدَةٍ مِنْهُمَا تَمْرَةً ثُمَّ صَدَعَتِ الْبَاقِيَةَ بَيْنَهُمَا . قَالَتْ فَأَتَى النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَحَدَّثْتُهُ فَقَالَ " مَا عَجَبُكِ لَقَدْ دَخَلَتْ بِهِ الْجَنَّةَ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, (সা’সাআহ) বলেন, এক মহিলা তার দু’ কন্যা সন্তানসহ আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এলো। তিনি তাকে তিনটি খেজুর দিলেন। সে তাদের প্রত্যেককে একটি করে খেজুর দিলো এবং অবশিষ্ট খেজুরটিও দু’ টুকরা করে তাদের মাঝে বণ্টন করলো। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলে আমি তাঁর নিকট ঘটনা বর্ণনা করলাম। তিনি বলেনঃ তুমি তো অবাক হচ্ছো, এর ফলে সে অবশ্যি জান্নাতে প্রবেশ করেছে। [৩০০০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا الإسناد صحيح لولا عنعنة الحسن -وهو البصري- فإنه كان مدلسًا ولم يصرِّح فيه بالسَّماع. وأخرجه مسلم (٢٦٣٠) من طريق زياد بن أبي زياد مولى ابن عياش، عن عراك بن مالك، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٦١١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٨). وأخرجه بنحوه البخاري (١٤١٨) و (٥٩٩٥)، ومسلم (٢٦٢٩)، والترمذي (٢٠٢٧) من طريق عبد الله بن أبي بكر بن حَزْم، عن عروة، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٥٧٢)، و"صحيح ابن حبان" (٢٩٣٩). صَدَعَت: شقَّت
حَدَّثَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ الْحَسَنِ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ حَرْمَلَةَ بْنِ عِمْرَانَ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا عُشَّانَةَ الْمَعَافِرِيَّ، قَالَ سَمِعْتُ عُقْبَةَ بْنَ عَامِرٍ، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ " مَنْ كَانَ لَهُ ثَلاَثُ بَنَاتٍ فَصَبَرَ عَلَيْهِنَّ وَأَطْعَمَهُنَّ وَسَقَاهُنَّ وَكَسَاهُنَّ مِنْ جِدَتِهِ - كُنَّ لَهُ حِجَابًا مِنَ النَّارِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ " .
উকবাহ বিন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছি : কারো তিনটি কন্যা সন্তান থাকলে এবং সে তাদের ব্যাপারে ধৈর্য ধারণ করলে, যথাসাধ্য তাদের পানাহার করালে ও পোশাক-আশাক দিলে, তারা কিয়ামতের দিন তার জন্য জাহান্নাম থেকে অন্তরায় হবে। [৩০০১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو عشانة المَعَافري: اسمه حيُّ بن يُومِن. وهو في "البر والصلة" لابن المبارك (١٥٣). وأخرجه أحمد (١٧٤٠٣)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٧٦)، وابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص ٢٨٩، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" ٢/ ٥٠٠، وأبو يعلى (١٧٦٤)، والطبراني في "الكبير" ١٧/ (٨٢٦)، والبيهقي في "الشعب" (٨٦٨٨)، وفي "الآداب" (٢٥) من طريق حرملة بن عمران، به. قوله: "من جِدَته" أي: من غِناه
حَدَّثَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ الْحَسَنِ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ فِطْرٍ، عَنْ أَبِي سَعْدٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَا مِنْ رَجُلٍ تُدْرِكُ لَهُ ابْنَتَانِ فَيُحْسِنُ إِلَيْهِمَا مَا صَحِبَتَاهُ أَوْ صَحِبَهُمَا إِلاَّ أَدْخَلَتَاهُ الْجَنَّةَ " .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তির দু’টি কন্যা সন্তান থাকলে এবং সে তাদের সাথে উত্তম ব্যবহার করলে যত দিন তারা একত্রে বসবাস করবে, তারা তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে। [৩০০২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي سعد: واسمه شرحبيل بن سعد الخطمي. وأخرجه ابن أبي شيبة ٨/ ٥٥١، وأحمد (٢١٠٤)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٧٧)، وأبو يعلى (٢٥٧١)، وابن حبان (٢٩٤٥)، والطبراني في "الكبير" (١٠٨٣٦)، والحاكم ٤/ ١٧٨، والبيهقي في "شعب الأيمان" (٨٦٨٣) من طريق فطر بن خليفة، به. وأخرجه أحمد (٣٤٢٤) من طريق عكرمة، عن أبي سعد، به. وفي الباب عن غير واحد من الصحابة، انظر حديث أبي سعيد الخدري في "مسند أحمد" برقم (١١٣٨٤). قوله: "تُدرِك" من الإدراك، وهو البلوغ
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ الْوَلِيدِ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ عَيَّاشٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ عُمَارَةَ، أَخْبَرَنِي الْحَارِثُ بْنُ النُّعْمَانِ، سَمِعْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ، يُحَدِّثُ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَنَّهُ قَالَ " أَكْرِمُوا أَوْلاَدَكُمْ وَأَحْسِنُوا أَدَبَهُمْ " .
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা তোমাদের সন্তানদের সাথে উত্তম আচরন করো এবং তাদেরকে উত্তমরূপে সদাচার শিক্ষা দাও। [৩০০৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سعید بن عمارۃ و الحارث بن النعمان:ضعیفان (تقریب: 2367،ضعیف، سنن الترمذي: 2352) ، (انوار الصحیفہ ص 509)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف سعيد بن عمارة وشيخه الحارث. وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" ١/ ٢١٤، والخطيب في "تاريخ بغداد" ٨/ ٢٨٨، والمزي في ترجمة سعيد بن عمارة من "تهذيب الكمال" ١١/ ١٥ من طريق سعيد بن عمارة به
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، سَمِعَ نَافِعَ بْنَ جُبَيْرٍ، يُخْبِرُ عَنْ أَبِي شُرَيْحٍ الْخُزَاعِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيُحْسِنْ إِلَى جَارِهِ وَمَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيُكْرِمْ ضَيْفَهُ وَمَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيَقُلْ خَيْرًا أَوْ لِيَسْكُتْ " .
আবূ শুরায়হ আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন তার প্রতিবেশীর সাথে সদাচরন করে। যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে সে যেন তার মেহমানকে সমাদর করে। যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন উত্তম কথা বলে, অন্যথায় নীরব থাকে। [৩০০৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (٤٨) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٣٧٠). وانظر ما سيأتي برقم (٣٦٧٥). قال السندي: قوله: "فليحسن إلى جاره" أي: بما أمكن، وليتحمَّل ما يصدر عنه، ويكفُّ الأذى عنه. "فليكرم ضيفه" بما ينبغي الإكرام
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، وَعَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ، ح وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، جَمِيعًا عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرِو بْنِ حَزْمٍ، عَنْ عَمْرَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَا زَالَ جِبْرِيلُ يُوصِينِي بِالْجَارِ حَتَّى ظَنَنْتُ أَنَّهُ سَيُوَرِّثُهُ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ জিবরাঈল (আঃ) আমাকে প্রতিবেশীর ব্যাপারে অবিরত উপদেশ দিচ্ছিলেন, এমনকি আমার ধারনা হলো যে, অচিরেই তিনি তাকে হয়তো ওয়ারিস বানাবেন। [৩০০৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو ابن قيس الأنصاري، وعمرة: هي بنت عبد الرحمن الأنصارية. وأخرجه البخاري (٦٠١٤)، ومسلم (٢٦٢٤)، وأبو داود (٥١٥١)، والترمذي (٢٠٥٧) من طريق يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (٢٦٢٤) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٦٠)، و"صحيح ابن حبان" (٥١١)
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَا زَالَ جِبْرَائِيلُ يُوصِينِي بِالْجَارِ حَتَّى ظَنَنْتُ أَنَّهُ سَيُوَرِّثُهُ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ জিবরাঈল (আঃ) আমাকে প্রতিবেশীর ব্যাপারে অবিরত উপদেশ দিচ্ছিলেন, এমনকি আমার মনে হলো যে, অচিরেই তিনি হয়ত তাকে ওয়ারিস বানাবেন। [৩০০৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق. وأخرجه أحمد في "المسند" (٨٠٤٦) و (٩٧٤٦)، وأبو عوانة في البر والصلة من "مسنده" كما في "إتحاف المهرة" ٥/ ورقة ٢٤٠، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" ص ٣٧، وأبو نعيم في "الحلية" ٣/ ٣٠٦ من طريق يونس بن أبي إسحاق، به. وأخرجه أحمد (٧٥٢٢) و (٩٩١٠) و (١٠٦٧٥)، وابن أبي شيبة ٨/ ٥٤٦ - ٥٤٧، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" (١٤١)، والبزار (١٨٩٨ - كشف الأستار)، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (١٦٤٦)، وابن حبان (٥١٢)، والخرائطي ص ٣٧، وابن عدي في "الكامل" ٣/ ٩٤٩، وأبو محمَّد البغوي في "شرح السنة" (٣٤٨٨) من طريق داود بن فراهيج، عن أبي هريرة
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ ابْنِ عَجْلاَنَ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي شُرَيْحٍ الْخُزَاعِيِّ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيُكْرِمْ ضَيْفَهُ وَجَائِزَتُهُ يَوْمٌ وَلَيْلَةٌ وَلاَ يَحِلُّ لَهُ أَنْ يَثْوِيَ عِنْدَ صَاحِبِهِ حَتَّى يُحْرِجَهُ الضِّيَافَةُ ثَلاَثَةُ أَيَّامٍ وَمَا أَنْفَقَ عَلَيْهِ بَعْدَ ثَلاَثَةِ أَيَّامٍ فَهُوَ صَدَقَةٌ " .
আবূ শুরায়হ আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন তার মেহমানকে সম্মান করে। আর মেহমানের অধিকার হলো এক দিন ও এক রাত। আপ্যায়নকারীর কষ্ট হতে পারে এরূপ দীর্ঘ সময় তার নিকট মেহমানের অবস্থান বৈধ নয়। আপ্যায়ন তিন দিন। তিন দিনের অতিরিক্ত সময়ের জন্য যা সে ব্যয় করবে তা তার জন্য দান হিসেবে গণ্য হবে। [৩০০৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد قوي، ابن عجلان -واسمه محمَّد- صدوق لا بأس به، وهو متابع. وأخرجه البخاري (٦٠١٩) و (٦١٣٥)، ومسلم بإثر (١٧٢٦) / (١٤ - ١٦)، وأبو داود (٣٧٤٨)، والترمذي (٢٠٨٢) و (٢٠٨٣) من طرق عن سعيد بن أبي سعيد المقبُري، به. وهو في "مسند أحمد" (١٦٣٧٤)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٨٧). وانظر ما سلف برقم (٣٦٧٢). قوله: "وجائزته يوم وليلة"، قال النووي في "شرح مسلم": قال العلماء: معناه الاهتمام به في اليوم والليلة واتحافه بما يمكن من بِرٍّ وإلطاف، وأما في اليوم الثاني والثالث فيطعمه ما تيَسر ولا يزيد على عادته، وأما ما كان بعد الثلاثة فهو صدقة ومعروف، إن شاء فعل وإن شاء ترك. اهـ. وقو له: "أن يثوي" أي: يُقِيم. وقوله: "حتى يُحرِجه" أي: يضيِّق عليه. وفي رواية: "حتى يُؤْثمه"، قال النووي: أي: حتى يوقعه في الإثم لأنه قد يغتابه لطول مُقامه، أو يَعرِض له بما يؤذيه، أو يظن به ما لا يجوز، وقد قال الله تعالى: ﴿اجْتَنِبُوا كَثِيرًا مِنَ الظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ إِثْمٌ﴾ [الحجرات: ١٢]، وهذا كله محمول على ما إذا أقام بعد الثلاث من غير استدعاء من المضيف، أما إذا استدعاه وطلَب زيادة إقامته، أو علم أو ظن أنه لا يكره إقامته، فلا بأس بالزيادة، لأن النهي إنما كان لكونه يُؤْثمه، وقد زال هذا المعنى
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ أَبِي الْخَيْرِ، عَنْ عُقْبَةَ بْنِ عَامِرٍ، أَنَّهُ قَالَ قُلْنَا لِرَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ إِنَّكَ تَبْعَثُنَا فَنَنْزِلُ بِقَوْمٍ فَلاَ يَقْرُونَا فَمَا تَرَى فِي ذَلِكَ . قَالَ لَنَا رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنْ نَزَلْتُمْ بِقَوْمٍ فَأَمَرُوا لَكُمْ بِمَا يَنْبَغِي لِلضَّيْفِ فَاقْبَلُوا وَإِنْ لَمْ يَفْعَلُوا فَخُذُوا مِنْهُمْ حَقَّ الضَّيْفِ الَّذِي يَنْبَغِي لَهُمْ " .
উকবাহ বিন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বললাম, আপনি আমাদেরকে বিভিন্ন স্থানে পাঠিয়ে থাকেন। আমরা এমন সব জনপদে যাত্রাবিরতি করি যারা আমাদের আপ্যায়ন করে না। এ ব্যাপারে আপনার কি অভিমত? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে বলেনঃ যদি তোমরা কোন বসতি এলাকায় যাত্রাবিরতি করো এবং তারা মেহমানের আপ্যায়নযোগ্য ব্যবস্থা করলে তা তোমরা গ্রহণ করো। আর যদি তারা তা না করে, তবে তাদের থেকে তাদের সামর্থ্য অনুসারে মেহমানদারির ন্যায্য দাবি আদায় করো। [৩০০৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو الخير: هو مَرثَد بن عبد الله اليَزَني. وأخرجه البخاري (٢٤٦١) و (٦١٣٧)، ومسلم (١٧٢٧)، وأبو داود (٣٧٥٢) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه الترمذي (١٦٧٩) من طريق ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧٣٤٥)، و "صحيح ابن حبان" (٥٢٨٨). قال صاحب "الفتح" ٥/ ١٠٨: ظاهر هذا الحديث أن قِرَى الضيف واجب، وأن المنزول عليه لو امتنع من الضيافة أخذت منه قهرًا، وقال به الليث مطلقًا، وخصه الإمام أحمد بأهل البوادي دون القرى، وقال الجمهور: الضيافة سنة مؤكدة، وأجابوا عن هذا الحديث بحمله على المضطرين، وأشار الترمذي إلى أنه محمول على من طلب الشراء محتاجًا فامتنع صاحب الطعام، فله أن يأخذها منه كرهًا
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنِ الْمِقْدَامِ أَبِي كَرِيمَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " لَيْلَةُ الضَّيْفِ وَاجِبَةٌ فَإِنْ أَصْبَحَ بِفِنَائِهِ فَهُوَ دَيْنٌ عَلَيْهِ فَإِنْ شَاءَ اقْتَضَى وَإِنْ شَاءَ تَرَكَ " .
মিকদাম আবূ কারীমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, রাতে আগত মেহমানকে আপ্যায়ন করা বাধ্যতামূলক। কারো বাড়ির আঙ্গিনায় মেহমান (অভুক্ত) রাত কাটালে সেটা (বাড়ির মালিকের জন্য) ঋণস্বরূপ। মেহমান ইচ্ছা করলে এ ঋণ উসুল করতেও পারে, অথবা ত্যাগও করতে পারে। [৩০০৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المعتمر، والشعبي: هو عامر بن شَرَاحيل. وأخرجه أبو داود (٣٧٥٠) من طريق أبي عوانة، عن منصور، به. وهو في "مسند أحمد" (١٧١٧٢). قوله: "ليلة الضيف واجبة" أي: إطعام ليلة الضيف والقيام بأمره فيها. "فإن أصبح" أي: الضيف. "بفنائه" أي: بفناء أحد. "فهو" أي: حقُّ الضيف
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ، عَنِ ابْنِ عَجْلاَنَ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " اللَّهُمَّ إِنِّي أُحَرِّجُ حَقَّ الضَّعِيفَيْنِ الْيَتِيمِ وَالْمَرْأَةِ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ হে আল্লাহ! আমি দু’ দুর্বলের অর্থাৎ ইয়াতীম ও নারীর অধিকার (নস্যাৎ করা) নিষিদ্ধ করেছি। [৩০১০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده قوي. ابن عجلان: اسمه محمَّد، وسعيد بن أبي سعيد: هو المقبري. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٩١٠٤) عن إسحاق بن منصور، عن يحيى القطان، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٩٦٦٦)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٦٥). قال السندي: قوله: "إني أُحرِّج" من التحريج أو الإحراج، أي: أضيِّق على الناس في تضييع حقِّهما وأُشدِّد عليهم في ذلك، والمقصودُ إشهادُه تعالى في تبليغ ذلك الحكم إليهم
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي أَيُّوبَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي سُلَيْمَانَ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَبِي عَتَّابٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " خَيْرُ بَيْتٍ فِي الْمُسْلِمِينَ بَيْتٌ فِيهِ يَتِيمٌ يُحْسَنُ إِلَيْهِ وَشَرُّ بَيْتٍ فِي الْمُسْلِمِينَ بَيْتٌ فِيهِ يَتِيمٌ يُسَاءُ إِلَيْهِ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, মুসলমানদের ঘরসমূহের মধ্যে যে ঘরে ইয়াতীম থাকে এবং তার সাথে সদয় ব্যবহার করা হয়, সেই ঘরই সর্বোত্তম। পক্ষান্তরে মুসলমানদের ঘরসমূহের মধ্যে যে ঘরে ইয়াতীম থাকে এবং তার সাথে নির্দয় ব্যবহার করা হয়, সেই ঘরই সর্বাধিক নিকৃষ্ট। [৩০১১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، یحیی بن أبي سلیمان:ضعیف (د 893) والسند ضعفہ البوصیري، (انوار الصحیفہ ص 509)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف يحيى بن أبي سليمان. وهو في "الزهد" لابن المبارك (٦٥٤)، ومن طريقه أخرجه عبد بن حميد (١٤٦٧)، والبخاري في "الأدب المفرد" (١٣٧)، والطبراني في "الأوسط" (٤٧٨٥)، وابن عدي في "الكامل" ٧/ ٢٦٨٦
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْكَلْبِيُّ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ الأَنْصَارِيُّ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ أَبِي رَبَاحٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنْ عَالَ ثَلاَثَةً مِنَ الأَيْتَامِ كَانَ كَمَنْ قَامَ لَيْلَهُ وَصَامَ نَهَارَهُ وَغَدَا وَرَاحَ شَاهِرًا سَيْفَهُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَكُنْتُ أَنَا وَهُوَ فِي الْجَنَّةِ أَخَوَيْنِ كَهَاتَيْنِ أُخْتَانِ " . وَأَلْصَقَ إِصْبَعَيْهِ السَّبَّابَةَ وَالْوُسْطَى .
আবদুল্লাহ বিন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি তিনজন ইয়াতীমের ভরণপোষণ করে, সে ঐ ব্যক্তি সমতূল্য যে রাতভর ইবাদতরত থাকে, দিনভর রোযা রাখে এবং সকাল-সন্ধ্যা আল্লাহর রাস্তায় সশস্ত্র জিহাদ করে। জান্নাতে আমি ও সেই ব্যক্তি এই দু’ বোনের মত দু’ ভাইরূপে বসবাস করবো, (এই বলে) তিনি তর্জনি ও মধ্যমা আঙ্গুল একত্র করে দেখান। [৩০১২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، قال البوصیري: ’’ إسماعیل بن إبراہیم:مجہول والراوي عنہ ضعیف، ‘‘ حماد بن عبد الرحمٰن: ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 509)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، إسماعيل بن إبراهيم مجهول، والراوي عنه ضعيف. وبهما ضعّفه البوصيري في "مصباح الزجاجة". وفي الباب عن سهل بن سعد عند البخاري (٥٣٠٤) و (٦٠٠٥): أن النبي ﷺ قال:" أنا وكافل اليتيم في الجنة هكذا وأشار بالسبَّابة والوسطى
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ أَبَانَ بْنِ صَمْعَةَ، عَنْ أَبِي الْوَازِعِ الرَّاسِبِيِّ، عَنْ أَبِي بَرْزَةَ الأَسْلَمِيِّ، قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ دُلَّنِي عَلَى عَمَلٍ أَنْتَفِعُ بِهِ . قَالَ " اعْزِلِ الأَذَى عَنْ طَرِيقِ الْمُسْلِمِينَ " .
আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে এমন একটি কাজের পথনির্দেশ দিন যার দ্বারা আমি উপকৃত হতে পারি। তিনি বলেনঃ মুসলমানদের যাতায়াতের পথ থেকে কষ্টদায়ক বস্তু সরিয়ে ফেলো। [৩০১৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن من أجل أبي الوازع الراسبي: واسمه جابر بن عمرو. وأخرجه مسلم (٢٦١٨) من طريقين عن أبي الوازع الراسبي، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٧٦٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥٤١)