সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَمْرٍو، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " رَأَيْتُ فِي يَدِي سِوَارَيْنِ مِنْ ذَهَبٍ فَنَفَخْتُهُمَا . فَأَوَّلْتُهُمَا هَذَيْنِ الْكَذَّابَيْنِ مُسَيْلِمَةَ وَالْعَنْسِيَّ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি স্বপ্নে আমার হাতে দুটি সোনার চুড়ি দেখতে পেলাম। আমি ফুঁ দিতেই তা উড়ে চলে গেলো। আমি এই চুড়িদ্বয়ের এ ব্যাখ্যা করেছি যে, নবুয়াতের দু’ মিথ্যা দাবিদারের আবির্ভাব হবে। তারা হলোঃ মুসায়লামা ও আনসী। [৩২৫৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمَّد بن عمرو -وهو ابن علقمة الليثي -وهو متابع. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وهو في "صحيح ابن حبان" (٦٦٥٣). وأخرجه البخاري (٤٣٧٥) و (٧٠٣٧)، ومسلم (٢٢٧٤) من طريق همام بن منبه، والبخاري (٣٦٢١) و (٤٣٧٤)، ومسلم (٢٢٧٤)، والترمذي (٢٤٤٥)، والنسائي في "الكبرى" (٧٦٠٢) من طريق عبد الله بن عباس، كلاهما عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٨٢٤٩)، و"صحيح ابن حبان" (٦٦٥٤). وأخرجه البخاري (٤٣٧٩) و (٧٠٣٣) و (٧٠٣٤)، والنسائي (٧٦٥١) من طريق عُبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس قال: ذُكِر لي أن رسول الله ﷺ قال: "بينا أنا نائم … " الحديث. وقد تبين من خلال الروايات السابقة أن الذي أخبره بذلك أبو هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٧٣). ومسيلمة: هو مسيلمة بن ثمامة بن كبير بن حبيب من بني حنيفة ولد ونشأ باليمامة، ادعى النبوة وأكثر من وضع أسجاع تضحك الثكلى، وفي خلافة أبي بكر أرسل إليه جيشًا قويًا بقيادة خالد بن الوليد، هاجم ديار بني حنيفة، وانتهت المعركة بظفر المسلمين بقيادة خالد بن الوليد وقتل مسيلمة سنة ١٢ هـ. وأما الأسود العنسي فهو عبهلة بن كعب بن عوف العنسي متنبئ مشعوذ من أهل اليمن، أسلم لما أسلمت اليمن، وارتد في أيام النبي ﷺ،وادعى النبوة، وقد استفحل أمره، فتولى قتله فيروز الديلمي، وقيل بن مكشوح فارس مَذحِجِ، وداذويه بمعونة آزاد امرأة الأسود، وذلك في سنة ١١هـ.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ، حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ هِشَامٍ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ صَالِحٍ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ قَابُوسَ، قَالَ قَالَتْ أُمُّ الْفَضْلِ يَا رَسُولَ اللَّهِ رَأَيْتُ كَأَنَّ فِي بَيْتِي عُضْوًا مِنْ أَعْضَائِكَ قَالَ " خَيْرًا رَأَيْتِ تَلِدُ فَاطِمَةُ غُلاَمًا فَتُرْضِعِيهِ " . فَوَلَدَتْ حُسَيْنًا أَوْ حَسَنًا فَأَرْضَعَتْهُ بِلَبَنِ قُثَمَ قَالَتْ فَجِئْتُ بِهِ إِلَى النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَوَضَعْتُهُ فِي حَجْرِهِ فَبَالَ فَضَرَبْتُ كَتِفَهُ فَقَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " أَوْجَعْتِ ابْنِي رَحِمَكِ اللَّهُ " .
উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি স্বপ্নে আপনার দেহের কোন একটি অঙ্গ আমার ঘরে দেখতে পেলাম। তিনি বলেনঃ তুমি ভালোই দেখেছো। ফাতিমাহ একটি সন্তান প্রসব করবে এবং তুমি তাকে দুধ পান করাবে। অতএব ফাতিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হুসাইন অথবা হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে প্রসব করেন এবং তিনি তাকে কুসাম এর ভাগের দুধ পান করান। তিনি বলেন, আমি তাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট গেলাম এবং তাকে তাঁর কোলে রাখলাম। সে পেশাব করে দিলে আমি তার কাঁধে আঘাত করলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি আমার সন্তানকে কষ্ট দিলে, আল্লাহ তোমার প্রতি রহম করুন। [৩২৫৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد اختلف فيه على سماك بن حرب كما أوضحناه في "مسند أحمد" (٢٦٨٧٥). وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٥/ (٣٩) من طريق علي بن صالح، وابن سعد في "الطبقات" ٨/ ٢٧٩ عن عُبيد الله بن موسى، عن إسرائيل بن يونس بن أبي إسحاق السبيعي، كلاهما عن سماك، به. وأخرجه أحمد (٢٦٨٧٥)، وأبو يعلى (٧٠٧٤) من طريق يحيى بن أبي بكير، عن إسرائيل، والطبراني (٢٥٤١) من طريق شريك النخعي كلاهما عن سماك، عن قابوس، عن أم الفضل. وأخرجه الطبراني (٢٥٢٦) و٢٥/ (٣٨) من طريق عثمان بن سعيد المري، عن علي بن صالح، عن سماك، عن قابوس، عن أبيه قال: جاءت أم الفضل … الحديث. هكذا مرسلًا. وأخرجه أيضًا ٢٥/ (٤١) من طريق عبد الملك بن الحسين، عن سماك، عن قابوس، عن أبيه، عن أم الفضل. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ٨/ ٢٧٨ - ٢٧٩ من طريق حاتم بن أبي صغيرة، عن سماك: أن أم الفضل فأرسله. وأخرجه أحمد (٢٦٨٧٨) من طريق عبد الله بن الحارث، والطبراني ٢٥/ (٤٢)، والحاكم ٣/ ١٧٦ - ١٧٧، والبيهقي في "الدلائل" ٦/ ٤٦٩ من طريق أبي عمار شداد بن عبد الله، كلاهما عن أم الفضل. وإسناد عبد الله بن الحارث صحيح، وأما إسناد أبي عمار فمنقطع لأنه لم يُدرك أم الفضل. وأم الفضل: اسمها لبابة بنت الحارث الهلالية، وهي زوجة العباس عم النبي ﷺ، وأخت زوجته ميمونة أم المؤمنين وخالة خالد بن الوليد وأخت أسماء بنت عميس لأمها.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ، أَخْبَرَنِي ابْنُ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي مُوسَى بْنُ عُقْبَةَ، أَخْبَرَنِي سَالِمُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ رُؤْيَا النَّبِيِّ، ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " رَأَيْتُ امْرَأَةً سَوْدَاءَ ثَائِرَةَ الرَّأْسِ خَرَجَتْ مِنَ الْمَدِينَةِ حَتَّى قَامَتْ بِالْمَهْيَعَةِ وَهِيَ الْجُحْفَةُ . فَأَوَّلْتُهَا وَبَاءً بِالْمَدِينَةِ فَنُقِلَ إِلَى الْجُحْفَةِ " .
আবদুল্লাহ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেনঃ আমি স্বপ্নে দেখলাম যে, এলোমেলো চুলবিশিষ্ট এক কৃষ্ণকায় নারী নির্গত হয়ে মাহইয়াআ অর্থাৎ জুহফায় পৌছে যাত্রাবিরতি করলো। আমি স্বপ্নের এই ব্যাখ্যা করলাম যে, মদীনার মহামারী জুহফায় স্থানান্তরিত হয়েছে। [৩২৫৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ولا يضر الخطأ في تسمية شيخ محمَّد بن بشار هنا بأبي عامرِ، لأن كلًا من أبي عامر العقدي وأبي عاصم النبيل ثقة. وأخرجه البخاري (٧٠٣٨)، والترمذي (٢٤٤٣)، والنسائي في "الكبرى" (٧٦٠٤) من طريق موسى بن عقبة، به. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب. وهو في "مسند أحمد" (٥٨٤٩). قوله: وهي الجُحفة، قال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٤٢٥ - ٤٢٦: أظنه مدرجًا من قول موسى بن عقبة، فإن أكثر الروايات خلا عن هذه الزيادة، وثبتت في رواية سليمان بن بلال وابن جريج.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنِ ابْنِ الْهَادِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ طَلْحَةَ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، أَنَّ رَجُلَيْنِ، مِنْ بَلِيٍّ قَدِمَا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَكَانَ إِسْلاَمُهُمَا جَمِيعًا فَكَانَ أَحَدُهُمَا أَشَدَّ اجْتِهَادًا مِنَ الآخَرِ فَغَزَا الْمُجْتَهِدُ مِنْهُمَا فَاسْتُشْهِدَ ثُمَّ مَكَثَ الآخَرُ بَعْدَهُ سَنَةً ثُمَّ تُوُفِّيَ . قَالَ طَلْحَةُ فَرَأَيْتُ فِي الْمَنَامِ بَيْنَا أَنَا عِنْدَ بَابِ الْجَنَّةِ إِذَا أَنَا بِهِمَا فَخَرَجَ خَارِجٌ مِنَ الْجَنَّةِ فَأَذِنَ لِلَّذِي تُوُفِّيَ الآخِرَ مِنْهُمَا ثُمَّ خَرَجَ فَأَذِنَ لِلَّذِي اسْتُشْهِدَ ثُمَّ رَجَعَ إِلَىَّ فَقَالَ ارْجِعْ فَإِنَّكَ لَمْ يَأْنِ لَكَ بَعْدُ . فَأَصْبَحَ طَلْحَةُ يُحَدِّثُ بِهِ النَّاسَ فَعَجِبُوا لِذَلِكَ فَبَلَغَ ذَلِكَ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ . وَحَدَّثُوهُ الْحَدِيثَ فَقَالَ " مِنْ أَىِّ ذَلِكَ تَعْجَبُونَ " فَقَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ هَذَا كَانَ أَشَدَّ الرَّجُلَيْنِ اجْتِهَادًا ثُمَّ اسْتُشْهِدَ وَدَخَلَ هَذَا الآخِرُ الْجَنَّةَ قَبْلَهُ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " أَلَيْسَ قَدْ مَكَثَ هَذَا بَعْدَهُ سَنَةً " . قَالُوا بَلَى . قَالَ " وَأَدْرَكَ رَمَضَانَ فَصَامَهُ وَصَلَّى كَذَا وَكَذَا مِنْ سَجْدَةٍ فِي السَّنَةِ " . قَالُوا بَلَى قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " فَمَا بَيْنَهُمَا أَبْعَدُ مِمَّا بَيْنَ السَّمَاءِ وَالأَرْضِ " .
তালহাহ বিন উবায়দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, দু’ব্যক্তি দূর-দূরান্ত থেকে রাসূল্লুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে উপস্থিত হলো। তারা ছিলো খাঁটি মুসলমান। তাদের একজন ছিলো অপরজন অপেক্ষা শক্তিধর মুজাহিদ। তাদের মধ্যকার মুজাহিদ ব্যক্তি যুদ্ধ করে শহীদ হলো এবং অপরজন এক বছর পর মারা গেলো। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি একদা স্বপ্নে দেখলাম যে, আমি জান্নাতের দরজায় উপস্থিত এবং আমি তাদের সাথে আছি। জান্নাত থেকে এক ব্যক্তি বের হয়ে এলো এবং তাদের মধ্যে যে ব্যক্তি পরে মারা গিয়েছিল তাকে জান্নাতে প্রবেশের অনুমতি দিলো। সে পুনরায় বের হয়ে এসে শহীদ ব্যক্তিকে জান্নাতে প্রবেশের অনুমতি দিলো। পরে সে আমার নিকট ফিরে এসে বললো, তুমি চলে যাও। কেননা তোমার (জান্নাতে প্রবেশের) সময় এখনও হয়নি, তোমার পালা পরে। সকাল বেলা তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উক্ত ঘটনা লোকদের নিকট বর্ণনা করলেন। তারা এতে বিস্ময়াভিভূত হলো। বিষয়টি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)এর কানে গেলো এবং তারাও তাঁর কাছে ঘটনা বর্ণনা করলো। তিনি বলেনঃ কী কারণে তোমরা বিস্মিত হলে? তারা বললো, ইয়া রাসুলাল্লাহ! এই ব্যক্তি তাদের দু’জনের মধ্যে অধিক শক্তিধর মুজাহিদ। তাকে শহীদ করা হয়েছে। অথচ অপর লোকটি তার আগেই জান্নাতে প্রবেশ করলো। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ অপর লোকটি কি তার পরে এক বছর জীবিত থাকেনি? তারা বললো, হাঁ। তিনি বলেনঃ সে একটি রমাদান মাস পেয়েছে, রোযা রেখেছে এবং এক বছর যাবত এই এই নামায কি পড়েনি? তারা বললো, হাঁ। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আসমান-জমীনের মধ্যে যে ব্যবধান রয়েছে, তাদের দু’জনের মধ্যে রয়েছে তার চেয়ে অধিক ব্যবধান। [৩২৫৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، أبو سلمۃ بن عبد الرحمٰن بن عوف لم یسمع من أبیہ و لا من طلحۃ، بن عبید اللّٰہ،قالہ الإمام یحیی بن معین (تاریخ ابن معین،روایۃ الدوري: 1103) و، حدیث أحمد (2/ 333 ح 8399 و سندہ حسن) یغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 516)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإن أبا سلمة بن عبد الرحمن لم يسمع من طلحة بن عُبيد الله. وأخرجه إسحاق بن راهويه وأحمد بن منيع في "مسنديهما" كما في "المختارة" للضياء ٣/ ٢٩، وأبو يعلى (٦٤٨)، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (٢٧)، والبيهقي ٣/ ٣٧١ - ٣٧٢، والضياء في "المختارة" (٨٢٦) و (٨٢٨) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، به. وهو في "مسند أحمد" (١٣٨٩)، و"صحيح ابن حبان" (٢٩٨٢). وأخرجه بنحوه عبد بن حميد (١٠٤)، والبزار (٩٥٤)، وأبو يعلى (٦٣٤) من طريق عبد الله بن شداد، عن طلحة بن عُبيد الله وفي إسناده طلحة بن يحيى بن طلحة ابن عبيد الله صدوق يخطئ وقد اضطرب في إسناده كما بيناه في "المسند" (١٤٠١). وهو في "المسند" (١٤٠١) عن عبد الله بن شداد مرسلًا. وأخرجه مختصرًا النسائي في "الكبرى" (١٠٦٠٦) من طريق عبد الله بن شداد، قال طلحة بن عبيد الله، قال رسول الله ﷺ: "ليس أحدٌ أفضل عند الله من مؤمن يُعمر في الإسلام، يكثِرُ تكبيرَهُ وتسبيحَه وتهليلَه وتحميده". وفي الباب عن سعد بن أبي وقاص عند أحمد (١٥٣٤)، وابن خزيمة (٣١٠)، والحاكم ١/ ٢٠٠، وابن عبد البر في "المهيد" ٢٤/ ٢٢١. وإسناده قوي. وعن عبد الله بن بسر عند أحمد (١٧٦٨٠)، والترمذي (٢٤٨٢)، وإسناده صحيح. وقال الترمذي: حسن غريب، ولفظه عند الترمذي: أن أعرابيًا قال: يا رسول الله، من خير الناس؟ قال: "من طال عمره وحَسُن عمله".
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ الْهُذَلِيُّ، عَنِ ابْنِ سِيرِينَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " أَكْرَهُ الْغُلَّ وَأُحِبُّ الْقَيْدَ الْقَيْدُ ثَبَاتٌ فِي الدِّينِ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আমি স্বপ্নে গলায় চাকতি দেখা অপছন্দ করি, কিন্তু আংটা পছন্দ করি। কারণ আংটা অর্থ দ্বীনের উপর অবিচল থাকা। [৩২৫৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف مرفوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: ضعیف، أبو بکر الہذلي: متروک الحدیث ، وتابعہ قتادۃ مع عنعنتہ ، و لکن السند إلیہ ضعیف والصواب أنہ من قول أبي ہریرۃ رضي، اللّٰہ عنہ، انظر صحیح البخاري (7017) ومسلم (2263) وغیرھما والمدرج إلی، المدرج للسیوطي (ص 36 ح 40) ، (انوار الصحیفہ ص 516)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا. أبو بكر الهذلي متروك الحديث، وقد رواه غيره عن محمَّد بن سيرين ضمن حديث أبي هريرة في رؤيا المؤمن، ولا يصح رفعُه، والصحيح أنه موقوف أدرج في الخبر، لكن اختُلف هل هو موقوف على أبي هريرة أو على محمَّد بن سيرين كما سيأتي. وقد نص على كونه مُدرجا البخاريُّ (٧٠١٧)، ومسلمٌ (٢٢٦٣)، والخطيبُ في "الفصل للوصل" ١/ ١٧٠، وأبو عوانة، وأبو العباس القرطبي في "المفهم" كما نقله الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٤٠٧. وأخرجه مسلم (٢٢٦٣)، وأبو داود (٥٠١٩)، والترمذي (٢٤٢٣) من طريق عبد الوهَّاب بن عبد المجيد الثقفي، عن أيوب السختياني، والدارمي (٢١٦٠)، ومسلم (٢٢٦٣)، والترمذي (٢٤٣٣)، والطبراني في "الأوسط" (٣٩٣) من طريق قتادة بن دعامة السدوسي، وقرن به الطبراني أيوب السختياني، والبزار في "مسنده" كما في "فتح الباري" ١٢/ ٤٠٩ من طريق يونس بن عُبيد، ثلاثتهم عن محمَّد بن سيرين، عن أبي هريرة، وأدرجوه ضمن حديث أبي هريرة في رؤيا المؤمن. لكنه وقع عند مسلم بعد رواية الثقفي: لا أدري هو في الحديث أم قاله ابن سيرين. وأخرجه عبد الرزاق (٢٠٣٥٢)، ومن طريقه أحمد (٧٦٤٢)، ومسلم (٢٢٦٣)، والترمذي (٢٤٤٤)، والحاكم ٤/ ٣٩٠ عن معمر بن راشد، وابن حبان (٦٠٤٠) من طريق سفيان بن عيينة، كلاهما عن أيوب السختياني، ومسلم (٢٢٦٣) من طريق حماد بن زيد والبغوي في "شرح السنة" (٣٢٧٨) من طريق جرير بن حازم، كلاهما عن أيوب وهشام بن حسان، وابن أبي شيبة ١١/ ٧٧ عن أبي أسامة حماد بن أسامة وأحمد (١٠٥٩٠) عن يزيد بن هارون، كلاهما عن هشام بن حسان، كلاهما (أيوب وهشام) عن محمَّد بن سيرين، به. وجعلوه من قول أبي هريرة موقوفًا عليه. وأخرجه البخاري (٧٠١٧) من طريق عوف بن أبي جميلة الأعرابي، عن محمَّد ابن سيرين، عن أبي هريرة. وجعله من قول محمَّد بن سيرين حيث قال: وكان يكرَه الغُل في النوم، وكان يُعجِبُهم القيدُ، ويقال: القيد ثبات في الدين.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، وَحَفْصُ بْنُ غِيَاثٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " أُمِرْتُ أَنْ أُقَاتِلَ النَّاسَ حَتَّى يَقُولُوا لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ فَإِذَا قَالُوهَا عَصَمُوا مِنِّي دِمَاءَهُمْ وَأَمْوَالَهُمْ إِلاَّ بِحَقِّهَا وَحِسَابُهُمْ عَلَى اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, আমি লোকেদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে আদিষ্ট হয়েছি যাবত না তারা বলে, “লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ” (আল্লাহ ব্যতীত কোন ইলাহ নাই)। তারা এটা বললে আমার থেকে তাদের জানমালের নিরাপত্তা লাভ করলো। কিন্তু দ্বীন ইসলামের অধিকারের বিষয়টি স্বতন্ত্র। তাদের চূড়ান্ত হিসাব গ্রহণের ভার আল্লাহর উপর ন্যস্ত। [৩২৫৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير، وأبو صالح: هو ذكوان السمان. وأخرجه مسلم (٢١) (٣٥)، وأبو داود (٢٦٤٠)، والترمذي (٢٧٨٩)، والنسائي ٧/ ٧٩ من طريق الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٨٩٠٤). وانظر تتمة تخريجه عند الحديث السالف برقم (٧١). والمراد بقوله: "أمرت أن أقاتل الناس" مشركو العرب وأهل الأوثان دون أهل الكتاب. قال ابن قدامة في "المغني" ١٣/ ٣١: ولا تقبل الجزية من عبدة الأوثان ومَن عَبَدَ ما استحسن، ولا يقبل منهم سوى الإسلام، هذا ظاهر المذهب، وهو مذهب الشافعي، وروي عن أحمد: أن الجزية تقبل من جميع الكفار إلا عبدة الأوثان من العرب، وهو مذهب أبي خيفة، لأنهم يقرون على دينهم بالاسترقاق، فيقرون ببذل الجزية كالمجوس، وحكي عن مالك: أنها تقبل من جميع الكفار إلا كفار قريش لحديث بريدة عند مسلم (١٧٣١) وفيه "إذا لقيت عدوك من المشركين فادعهم إلى ثلاث خصال … " وهو عام.
حَدَّثَنَا سُوَيْدُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي سُفْيَانَ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " أُمِرْتُ أَنْ أُقَاتِلَ النَّاسَ حَتَّى يَقُولُوا لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ فَإِذَا قَالُوا لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ عَصَمُوا مِنِّي دِمَاءَهُمْ وَأَمْوَالَهُمْ إِلاَّ بِحَقِّهَا وَحِسَابُهُمْ عَلَى اللَّهِ " .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মানুষ “লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ” না বলা পর্যন্ত আমি তার বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে আদিষ্ট হয়েছি। তারা “লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ” বললে আমার থেকে তাদের জান-মালের নিরাপত্তা লাভ করলো। কিন্তু দ্বীন ইসলামের অধিকারের বিষয়টি স্বতন্ত্র। তাদের চূড়ান্ত হিসাব গ্রহণের বিষয়টি আল্লাহর উপর ন্যস্ত। [৩২৬০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، سويد بن سعيد -وإن كان فيه ضعفٌ- قد توبع، ومن فوقه ثقات. الأعمش: اسمه سليمان بن مِهران، وأبو سفيان: اسمه طلحة بن نافع. وأخرجه مسلم (٢١) (٣٥) عن أبي بكر بن أبي شيبة عن حفص بن غياث، والنسائي ٧/ ٧٩ عن إسحاق بن إبراهيم عن يعلى بن عبيد، كلاهما عن الأعمش، به. وأخرجه مسلم (٢١) (٣٥)، والترمذي (٣٦٣٥) من طريق سفيان الثوري، عن أبي الزبير، عن جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٠٩).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ بَكْرٍ السَّهْمِيُّ، حَدَّثَنَا حَاتِمُ بْنُ أَبِي صَغِيرَةَ، عَنِ النُّعْمَانِ بْنِ سَالِمٍ، أَنَّ عَمْرَو بْنَ أَوْسٍ، أَخْبَرَهُ أَنَّ أَبَاهُ أَوْسًا أَخْبَرَهُ قَالَ إِنَّا لَقُعُودٌ عِنْدَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَهُوَ يَقُصُّ عَلَيْنَا وَيُذَكِّرُنَا إِذْ أَتَاهُ رَجُلٌ فَسَارَّهُ فَقَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " اذْهَبُوا بِهِ فَاقْتُلُوهُ " . فَلَمَّا وَلَّى الرَّجُلُ دَعَاهُ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَالَ " هَلْ تَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ " . قَالَ نَعَمْ قَالَ " اذْهَبُوا فَخَلُّوا سَبِيلَهُ فَإِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أُقَاتِلَ النَّاسَ حَتَّى يَقُولُوا لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ فَإِذَا فَعَلُوا ذَلِكَ حَرُمَ عَلَىَّ دِمَاؤُهُمْ وَأَمْوَالُهُمْ " .
আওস বিন হুযায়ফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। তিনি আমাদেরকে (অতীতের) ঘটনাবলী উল্লেখপূর্বক উপদেশ দিচ্ছিলেন। ইত্যবসরে এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে তাঁর সাথে একান্তে কিছু বললো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা তাকে নিয়ে গিয়ে হত্যা করো। লোকটি ফিরে গেলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডেকে জিজ্ঞেস করলেনঃ তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, "আল্লাহ ব্যতীত কোন ইলাহ নাই”? সে বললো, হাঁ। তিনি বলেনঃ যাও, তোমরা তাকে তার পথে ছেড়ে দাও। কারণ লোকেরা "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ” না বলা পর্যন্ত আমাকে তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করার নির্দেশ দেয়া হয়েছে। তারা তাই করলে তাদের জান-মালে হস্তক্ষেপ আমার জন্য হারাম হয়ে গেলো। [৩২৬১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: *إسناده صحيح. وأخرجه النسائي ٧/ ٨١ عن هارون بن عبد الله، عن عبد الله بن بكر، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦١٦٣).
حَدَّثَنَا سُوَيْدُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنِ السُّمَيْطِ بْنِ السُّمَيْرِ، عَنْ عِمْرَانَ بْنِ الْحُصَيْنِ، قَالَ أَتَى نَافِعُ بْنُ الأَزْرَقِ وَأَصْحَابُهُ فَقَالُوا هَلَكْتَ يَا عِمْرَانُ . قَالَ مَا هَلَكْتُ . قَالُوا بَلَى . قَالَ مَا الَّذِي أَهْلَكَنِي قَالُوا قَالَ اللَّهُ {وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّى لاَ تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ كُلُّهُ لِلَّهِ} . قَالَ قَدْ قَاتَلْنَاهُمْ حَتَّى نَفَيْنَاهُمْ فَكَانَ الدِّينُ كُلُّهُ لِلَّهِ إِنْ شِئْتُمْ حَدَّثْتُكُمْ حَدِيثًا سَمِعْتُهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ . قَالُوا وَأَنْتَ سَمِعْتَهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ . قَالَ نَعَمْ شَهِدْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَقَدْ بَعَثَ جَيْشًا مِنَ الْمُسْلِمِينَ إِلَى الْمُشْرِكِينَ فَلَمَّا لَقُوهُمْ قَاتَلُوهُمْ قِتَالاً شَدِيدًا فَمَنَحُوهُمْ أَكْتَافَهُمْ فَحَمَلَ رَجُلٌ مِنْ لُحْمَتِي عَلَى رَجُلٍ مِنَ الْمُشْرِكِينَ بِالرُّمْحِ فَلَمَّا غَشِيَهُ قَالَ أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ إِنِّي مُسْلِمٌ فَطَعَنَهُ فَقَتَلَهُ فَأَتَى رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَلَكْتُ قَالَ " وَمَا الَّذِي صَنَعْتَ " . مَرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ فَأَخْبَرَهُ بِالَّذِي صَنَعَ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " فَهَلاَّ شَقَقْتَ عَنْ بَطْنِهِ فَعَلِمْتَ مَا فِي قَلْبِهِ " . قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ لَوْ شَقَقْتُ بَطْنَهُ أَكُنْتُ أَعْلَمُ مَا فِي قَلْبِهِ قَالَ " فَلاَ أَنْتَ قَبِلْتَ مَا تَكَلَّمَ بِهِ وَلاَ أَنْتَ تَعْلَمُ مَا فِي قَلْبِهِ " . قَالَ فَسَكَتَ عَنْهُ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَلَمْ يَلْبَثْ إِلاَّ يَسِيرًا حَتَّى مَاتَ فَدَفَنَّاهُ فَأَصْبَحَ عَلَى ظَهْرِ الأَرْضِ فَقَالُوا لَعَلَّ عَدُوًّا نَبَشَهُ فَدَفَنَّاهُ ثُمَّ أَمَرْنَا غِلْمَانَنَا يَحْرُسُونَهُ فَأَصْبَحَ عَلَى ظَهْرِ الأَرْضِ فَقُلْنَا لَعَلَّ الْغِلْمَانَ نَعَسُوا فَدَفَنَّاهُ ثُمَّ حَرَسْنَاهُ بِأَنْفُسِنَا فَأَصْبَحَ عَلَى ظَهْرِ الأَرْضِ فَأَلْقَيْنَاهُ فِي بَعْضِ تِلْكَ الشِّعَابِ .
ইমরান বিন হুসায়ন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাফে ইবনুল আযরাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তার সাথীরা (আমার নিকট) এসে বললো, হে ইমরান! তুমি ধ্বংস হয়ে গেছো। তিনি বলেন, আমি ধ্বংস হইনি। তারা বলেন, আল্লাহ বলেছেনঃ “তোমরা তাদের বিরুদ্ধে সংগ্রাম করতে থাকো যতক্ষণ না ফেতনা দূরীভূত হয় এবং আল্লাহর দ্বীন সামগ্রিকভাবে প্রতিষ্ঠিত হয়” (৮:৩৯)। তিনি বলেন, আমরা তাদের বিরুদ্ধে এতটা যুদ্ধ করেছি যে, তাদেরকে নির্বাসিত করেছি। ফলে আল্লাহর দ্বীন সামগ্রিকভাবে প্রতিষ্ঠিত হয়েছে। তোমরা চাইলে আমি তোমাদের নিকট একটি হাদীস বর্ণনা করতে পারি, যা আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট শুনেছি। তারা বলেন, আপনি কি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তা শুনেছেন? তিনি বলেন, হা, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তিনি একটি সামরিক বাহিনী মুশরিকদের বিরুদ্ধে পাঠালেন। মুসলমানরা তাদের মোকাবিলায় অবতীর্ণ হয়ে ঘোরতর যুদ্ধে লিপ্ত হলো। মুশরিকরা পরাজিত হয়ে আত্মসমর্পণ করলো। আমার এক বন্ধু যুদ্ধে লিপ্ত হলো। মুশরিকের উপর বর্শা দ্বারা হামলা করলো, তিনি তাকে পাকড়াও করলে সে বলতে লাগলো, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ব্যতীত কোন ইলাহ। নিশ্চয় আমি একজন মুসলিম। তিনি তাকে ভৎসনা করলেন এবং তাকে হত্যা করলেন। অতঃপর তিনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে একবার বা দু’বার বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি ধ্বংস হয়ে গেছি। অতঃপর তিনি যা করেছেন তা তার নিকট বর্ণনা করলে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলেনঃ তুমি তার পেট চিরে দেখলে না কেন? তাহলে তো তুমি তার অন্তরের খবর জানতে পারতে তিনি বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তার পেট চিরে ফেললেও তার অন্তরের খবর জানতে পারতাম না। তিনি বলেনঃ তাহলে তুমি তার উচ্চারিত স্বীকারোক্তি কেন কবুল করলে না, অথচ তুমি তার অন্তরের খবর জানতে না? ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন। অবশেষে লোকটি মারা গেলে আমরা তাকে দাফন করলাম। ভোরে উঠে আমরা দেখলাম যে, তার লাশ কবরের বাইরে যমীনের উপরে পড়ে আছে। তারা বললেন, হয়ত কোন শক্র কবর খুঁড়ে একে বের করে তুলে রেখেছে। অতঃপর আমরা তাকে আবার দাফন করলাম এবং আমাদের যুবকদের তার কবর পাহারা দিতে নির্দেশ দিলাম। আমরা পরদিন ভোরবেলা দেখতে পেলাম যে, তার লাশ কবরের বাইরে যমীনের উপর পড়ে আছে। আমরা বললাম, হয়ত প্রহরীরা তন্দ্রাগ্রস্ত হয়ে পড়েছিল। আমরা পুনরায় তাকে দাফন করলাম এবং নিজেরাই প্রহরায় রত হলাম। প্রত্যুষে আমরা দেখলাম, সে কবরের বাইরে যমীনের উপর পড়ে আছে। অবশেষে আমরা তাকে এক গিরিসংকটে নিক্ষেপ করলাম।
উপরোক্ত হাদীসে মোট ২টি সানাদের ১টি বর্ণিত হয়েছে, অপর সানাদটি হলোঃ
৫/৩৯৩০(১) ইমরান বিন হুসায়ন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এক ক্ষুদ্র সামরিক অভিযানে পাঠান, তাতে এক মুসলমান এক মুশরিকের উপর চড়াও হলো। অতঃপর তিনি পূর্ণ হাদীস বর্ণনা করেন ..। এ বর্ণনায় আরো আছেঃ যমীন তাকে উৎক্ষিপ্ত করলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে খবর দেয়া হলো। তিনি বলেনঃ যমীন তো অবশ্যি তার চেয়ে নিকৃষ্ট ব্যক্তিকেও গ্রহণ করে। কিন্তু আল্লাহ তাআলা তোমাদের দেখাতে চান যে, "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ-এর মর্যাদা ও মাহাত্ন্য কত বেশী।[৩২৬২]
তাহকীক আলবানীঃ ইমরান এর [আরবী] কথাটি হাসান; যা পরবর্তী হাদীস ৩৯৩১ নং এর মাঝে আসবে। এবং ইমরান এর [আরবী] এ কথাটি ও হাসান যা পূর্ববর্তী হাদীস ৩৯২৯ নং হাদীসে অতিবাহিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، وانظر مسند الإمام أحمد (4/ 438) والسند معلول بعلۃ قادحۃ: فیہ، رجل من الحي وھو مجہول،رواہ السمیط بن السمیر عن أبی العلاء عن رجل من، الحي أن عمران بن حصین حدثہ بہ إلخ، (انوار الصحیفہ ص 517)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لإعضاله، فإن بين السُيمط وعمران اثنين -كما سيأتي في التخريج- أحدهما رجل مبهم. عاصم: هو ابن سليمان الأحول. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٣٢٣٤) و (٣٢٣٥)، والطبراني في "الكبير" ١٨/ (٥٦٢) من طريق عاصم الأحول، به. وأخرجه أحمد في "المسند" (١٩٩٣٧)، والطبراني ١٨/ (٦٠٩) من طريق معتمر ابن سليمان التيمي، عن أبيه، عن السميط، عن أبي العلاء بن الشخير قال: حدثني رجل من الحي، عن عمران بن الحصين. وهذا إسناد ضعيف لإبهام الراوي عن عمران. * إسناده ضعيف كسابقه
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي حِجَّةِ الْوَدَاعِ " أَلاَ إِنَّ أَحْرَمَ الأَيَّامِ يَوْمُكُمْ هَذَا أَلاَ وَإِنَّ أَحْرَمَ الشُّهُورِ شَهْرُكُمْ هَذَا أَلاَ وَإِنَّ أَحْرَمَ الْبَلَدِ بَلَدُكُمْ هَذَا أَلاَ وَإِنَّ دِمَاءَكُمْ وَأَمْوَالَكُمْ عَلَيْكُمْ حَرَامٌ كَحُرْمَةِ يَوْمِكُمْ هَذَا فِي شَهْرِكُمْ هَذَا فِي بَلَدِكُمْ هَذَا أَلاَ هَلْ بَلَّغْتُ " . قَالُوا نَعَمْ . قَالَ " اللَّهُمَّ اشْهَدْ " .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হাজে বলেছেনঃ সাবধান! তোমাদের এই দিন সর্বাপেক্ষা সম্মানিত দিন। সাবধান! তোমাদের এই মাস সর্বাপেক্ষা সম্মানিত মাস। সাবধান! তোমাদের এই শহর সর্বাপেক্ষা সম্মানিত শহর। সাবধান তোমাদের জীবন, তোমাদের ধনসম্পদ ও তোমাদের উজ্জত-আবরু তোমাদের পরস্পরের জন্য পবিত্র, যেমন এই দিন, এই মাস ও এই শহর। শোন! আমি কি (আল্লাহর পয়গাম) পৌছে দিয়েছি? সমবেত জনমণ্ডলী বলেন, হাঁ। তিনি বলেনঃ হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো। [৩২৬৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل هشام بن عمار، وقد توبع، ومن فوقه ثقات. أبو صالح: هو ذكوان السمان. وأخرجه أحمد في "المسند" (١١٧٦٢) عن علي بن بحر، عن عيسى بن يونس، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا أَبُو الْقَاسِمِ بْنُ أَبِي ضَمْرَةَ، نَصْرُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ سُلَيْمَانَ الْحِمْصِيُّ حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي قَيْسٍ النَّصْرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ، قَالَ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَطُوفُ بِالْكَعْبَةِ وَيَقُولُ " مَا أَطْيَبَكِ وَأَطْيَبَ رِيحَكِ مَا أَعْظَمَكِ وَأَعْظَمَ حُرْمَتَكِ وَالَّذِي نَفْسُ مُحَمَّدٍ بِيَدِهِ لَحُرْمَةُ الْمُؤْمِنِ أَعْظَمُ عِنْدَ اللَّهِ حُرْمَةً مِنْكِ مَالِهِ وَدَمِهِ وَأَنْ نَظُنَّ بِهِ إِلاَّ خَيْرًا " .
আবদুল্লাহ বিন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে কাবা ঘর তাওয়াফ করতে দেখলাম এবং তিনি বলছিলেনঃ কত উত্তম তুমি হে কাবা! আকর্ষণীয় তোমার খোশবু, কত উচ্চ মর্যাদা তোমার (হে কাবা)! কত মহান সম্মান তোমার। সেই সত্তার শপথ, যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ! আল্লাহর নিকট মুমিন ব্যক্তির জান-মাল ও ইজ্জতের মর্যাদা তোমার চেয়ে অনেক বেশী। আমরা মুমিন ব্যক্তি সম্পর্কে সুধারণাই পোষণ করি। [৩২৬৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، نصر بن محمد: ضعیف ، و للحدیث شواھد ضعیفۃ،و روی الترمذي (2032) عن نافع، و ذکر الحدیث و فیہ: ’’ قال: و نظر ابن عمر یومًا إلی البیت أو الکعبۃ فقال: ما، أعظمک و أعظم حرمتک و المؤمن أعظم حرمۃ عند اللّٰہ منک۔‘‘ و قال الترمذي: ’’ ھذا، حدیث حسن غریب ‘‘ إلخ وسندہ حسن وھو یغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 517)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: *إسناده ضعيف لضعف نصر بن محمَّد شيخ المصنف. وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (١٥٦٨) عن خطاب بن سعد الدمشقي، عن نصر بن محمَّد، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ عَبْدِ الْوَهَّابِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نَافِعٍ، وَيُونُسُ بْنُ يَحْيَى، جَمِيعًا عَنْ دَاوُدَ بْنِ قَيْسٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ، مَوْلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَامِرِ بْنِ كُرَيْزٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " كُلُّ الْمُسْلِمِ عَلَى الْمُسْلِمِ حَرَامٌ دَمُهُ وَمَالُهُ وَعِرْضُهُ "
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-বলেনঃ প্রত্যেক মুসলামনের জান-মাল ও মান-সম্মানে হস্তক্ষেপ করা অপর মুসলামনের জন্য হারাম। [৩২৬৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد جيد، أبو سعيد مولى عبد الله بن عامر روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات". وأخرجه مسلم (٢٥٦٤) من طريق داود بن قيس وأسامة بن زيد الليثي، كلاهما عن أبي سعيد مولى ابن كريز، به. وليس لأبي سعيد هذا في "صحيح مسلم" سوى هذا الحديث الواحد. وهو في "مسند أحمد" (٧٧٢٧). وأخرجه أبو داود (٤٨٨٢)، والترمذي (٢٠٤٠) من طريق هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة. وهذا سند حسن في المتابعات والشواهد من أجل هشام بن سعد. وحسَّنه الترمذي.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ الْمِصْرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، عَنْ أَبِي هَانِئٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مَالِكٍ الْجَنْبِيِّ، أَنَّ فَضَالَةَ بْنَ عُبَيْدٍ، حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " الْمُؤْمِنُ مَنْ أَمِنَهُ النَّاسُ عَلَى أَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ وَالْمُهَاجِرُ مَنْ هَجَرَ الْخَطَايَا وَالذُّنُوبَ " .
ফাদালাহ বিন উবায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ মুমিন সেই ব্যক্তি যার হস্তক্ষেপ থেকে মানুষের জান-মাল নিরাপদ থাকে এবং মুহাজির সেই ব্যক্তি, যে মন্দ কাজ ও গুনাহ ত্যাগ করেছে। [৩২৬৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: *إسناده صحيح. أبو هانئ: هو حميد بن هانئ الخَولاني. وأخرجه ابن المبارك في "الزهد" (٨٢٦)، وأحمد في "المسند" (٢٣٩٥٨)، وابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص ٢٧٧، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" ١/ ٣٤١ - ٣٤٢، والبزار في "مسنده" (٣٧٥٢)، والمروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (٦٤٠)، وابن حبان في "صحيحه" (٤٨٦٢)، والطبراني في "الكبير" ١٨/ (٧٩٦)، وابن منده في "الإيمان" (٣١٥)، والحاكم في "المستدرك" ١/ ١٠ - ١١، والبيهقي في "شعب الإيمان" (١١١٢٣)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (١٣١) من طريق أبي هانئ الخولاني، به - وبعضهم يزيد فيه على بعض.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو عَاصِمٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنِ انْتَهَبَ نُهْبَةً مَشْهُورَةً فَلَيْسَ مِنَّا " .
জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি প্রকাশ্যে লুটতরাজ ও ছিনতাই করলো সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়। [৩২৬৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وابن جريج قد صرَّح بالسماع عند غير واحد ممن خرجه ثم هو متابع، وانظر تفصيل القول في هذا الحديث في "مسند أحمد" (١٥٠٧٠). أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وابن جريج: اسمه عبد الملك بن عبد العزيز بن جريج، وأبو الزبير: هو محمَّد بن مسلم بن تَدرُس. وأخرجه أبو داود (٤٣٩١) من طريق محمَّد بن بكر، عن ابن جريج، به. وهو في "صحيح ابن حبان" (٤٤٥٦). ويشهد له حديث أنس بن مالك عند الترمذي (١٦٩٣)، وسنده صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٣٠٣٢). وحديث عمران بن الحصين الآتي عند المصنف برقم (٣٩٣٧). وحديث عبد الرحمن بن سَمُرة عند أحمد (٢٠٦١٩) وغيره، وسنده حسن. "مشهورة" أي: ظاهرة غير مخفية. وقال السندي في حاشيته على "مسند أحمد": النُّهبة، بضم فسكون: المال المنهوب، وبالفتح: مصدرٌ، قيل: هذا النهي في أخذ مال المسلم قهرًا، وأخذ الأموال المشترَكة.
حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ حَمَّادٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ عُقَيْلٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْحَارِثِ بْنِ هِشَامٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " لاَ يَزْنِي الزَّانِي حِينَ يَزْنِي وَهُوَ مُؤْمِنٌ وَلاَ يَشْرَبُ الْخَمْرَ حِينَ يَشْرَبُهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ وَلاَ يَسْرِقُ السَّارِقُ حِينَ يَسْرِقُ وَهُوَ مُؤْمِنٌ وَلاَ يَنْتَهِبُ نُهْبَةً يَرْفَعُ النَّاسُ إِلَيْهِ أَبْصَارَهُمْ حِينَ يَنْتَهِبُهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যেনাকারী যখন যেনায় লিপ্ত হয় তখন সে মুমিন থাকে না। মদ্যপ যখন মদ পানে লিপ্ত হয় তখন সে মুমিন থাকে না। চোর যখন চৌর্যবৃত্তিতে লিপ্ত হয় তখন সে মুমিন থাকে না। আর লুটতরাজ ও ছিনতাইকারী যখন লুটতরাজ ও ছিনতাই করে এবং লোকজন তার দিকে চোখ তুলে তাকায়, তখন সে মুমিন থাকে না। [৩২৬৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عقيل: هو ابن خالد. وأخرجه البخاري (٢٤٧٥)، ومسلم (٥٧) (١٠٠ - ١٠١)، والنسائي في "المجتبى" ٨/ ٣١٣ وفي "الكبرى" (٥١٤٩) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه مسلم (٥٧) (١٠٢ - ١٠٣)، والنسائي في "الكبرى" (٥١٥٠) و (٧٣١٤) و (٧٠٨٨ - ٧٠٩٢) من طرق عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٨٢٠٢)، و"صحيح ابن حبان" (١٨٦) و (٥١٧٣) و (٥٩٧٩). وروي عن أبي هريرة دون ذِكر النهبة فيه، انظر "مسند أحمد" (٨٨٩٥). قوله: "يرفع الناس إليه أبصارهم"، وفي بعض الروايات: "ذات شرف" أي: ذات قدر حيث يشرف الناس لها ناظرين إليها.
حَدَّثَنَا حُمَيْدُ بْنُ مَسْعَدَةَ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ، عَنْ عِمْرَانَ بْنِ الْحُصَيْنِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَنِ انْتَهَبَ نُهْبَةً فَلَيْسَ مِنَّا " .
ইমরান ইবনুল হুসায়ন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি ছিনতাই ও লুটতরাজ করে, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়। [৩২৬৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: *صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أن الحسن -وهو البصري- لم يسمع من عمران بن الحمين. حميد: هو ابن أبي حميد الطويل. وأخرجه الترمذي (١١٥١)، والنسائي ٦/ ١١١ و ٢٢٧ - ٢٢٨ من طريق حميد، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٩٢٩)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٦٧) و (٥١٧٠).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ ثَعْلَبَةَ بْنِ الْحَكَمِ، قَالَ أَصَبْنَا غَنَمًا لِلْعَدُوِّ فَانْتَهَبْنَاهَا فَنَصَبْنَا قُدُورَنَا فَمَرَّ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِالْقُدُورِ فَأَمَرَ بِهَا فَأُكْفِئَتْ ثُمَّ قَالَ " إِنَّ النُّهْبَةَ لاَ تَحِلُّ " .
সা‘লাবাহ ইবনুল হাকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা শক্রপক্ষের মেষপালের নাগাল পেয়ে তা লুট করলাম। অতঃপর আমরা সেগুলোর গোশত পাতিলে করে রান্না করছিলাম। এমতাবস্থায় নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাতিলগুলো অতিক্রমকালে (সেগুলো উল্টে) ফেলে দেয়ার নির্দেশ দিলে তা উল্টে ফেলে দেয়া হলো। অতঃপর তিনি বলেনঃ লুটতরাজ করা হালাল নয়। [৩২৭০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن من أجل سماك بن حرب. أبو الأحوص: سلام بن سُلَيم. وأخرجه الطيالسي (١١٩٥)، وعبد الرزاق (١٨٨٤١)، وأحمد في "المسند" (٢٣١١٦)، والبخاري في "التاريخ الكبير" ٢/ ١٧٣، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٩٣٥)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ٤٩، وفي "شرح مشكل الآثار" (١٣١٨)، وابن قانع في "معجم الصحابة" ١/ ١٢٠ و١٢١، وابن حبان (٥١٦٩)، والطبراني في "الكبير" (١٣٧١ - ١٣٧٩)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (١٣٥٤ - ١٣٥٦)، والحاكم ٢/ ١٣٤ من طريق سماك بن حرب، به. قال الإمام البغوي في "شرح السنة" ٨/ ٢٢٨: وتتأول النهبة في الحديث على الجماعة ينتهبون الغنيمة، فلا يُدخلون في القسم، والقوم يقدم إليهم الطعام فينتهبونه، فكل يأخذ بقدر قوته ونحو ذلك، وإلا فنهب أموال المسلمين محرم لا يُشكل على أحد، ومن فعله يستحق العقوبة والزجر.
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ شَقِيقٍ، عَنِ ابْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " سِبَابُ الْمُسْلِمِ فُسُوقٌ وَقِتَالُهُ كُفْرٌ " .
আবদুল্লাহ বিন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মুসলমানকে গালি দেয়া ফাসেকী এবং তাকে হত্যা করা কুফরী। [৩২৭১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: *إسناده صحيح. وقد سلف برقم (٦٩). وقوله: "سباب المسلم فسوق" السباب: الشتم الوجيع، وأن يقول الرجل ما فيه وما ليس فيه يريد بذلك عيبه، والفسوق في اللغة: الخروج، وفي الشرع: الخروج عن طاعة الله ورسوله، وهو في عرف الشرع أشد من العصيان، قال الله تعالى: ﴿وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ﴾ [الحجرات: ٧] ففي هذا الحديث تعظيم حق المسلم، والحكم على من سبه بغير حق بالفسق. وقوله: "وقتاله كفر" أي: مقاتلته كفر، قال الحافظ في "الفتح" ١/ ١١٢: ولم يرد حقيقة الكفر التي هي خروج عن الملة، بل أطلق عليه الكفر مبالغة في التحذير من ذلك، لينزجر السامع عن الإقدام عليه، معتمدًا على ما تقرر من القواعد أن مثل ذلك لا يخرج عن الملة، مثل حديث الشفاعة، ومثل قوله تعالى: ﴿إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ﴾ [النساء: ٤٨] أو أطلق عليه الكفر لشبهه به، لأن قتال المؤمن من شأن الكافر. وجاء في ترجمة الإمام أبي الحسن الأشعري من "سير أعلام النبلاء" ١٥/ ٨٨ للإمام الذهبي ما نصه: رأيت للأشعري كلمة أعجبتني وهي ثابتة رواها البيهقي: سمعت أبا حازم العبدَوي، سمعت زاهر بن أحمد السرخسي يقول: لما قَرُبَ حضور أجل أبي الحسن الأشعري في داري ببغداد، دعاني فأتيته، فقال: اشهدْ عليَّ أني لا أكفر أحدًا من أهل القبلة، لأن الكل يشيرون إلى معبود واحد، وإنما هذا كله اختلاف العبارات. قال الذهبي: وبنحو هذا أدينُ، وكذا كان شيخنا ابن تيمية في أواخر أيامه يقول: أنا لا أكفر أحدًا من الأمة، ويقول: قال النبي ﷺ:"لا يحافظ على الوضوء إلا مؤمن" فمن لازم الصلوات بوضوء، فهو مسلم.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْحَسَنِ الأَسَدِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو هِلاَلٍ، عَنِ ابْنِ سِيرِينَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " سِبَابُ الْمُسْلِمِ فُسُوقٌ وَقِتَالُهُ كُفْرٌ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ মুসলমানকে গালি দেয়া ফাসেকী এবং তাকে হত্যা করা কুফরী। [৩২৭২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح بما قبله، وهذا إسناد ضعيف، محمَّد بن الحسن وأبو هلال -وهو محمَّد بن سليم الراسبي- فيهما لِينٌ. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ص ١٥٩ (القسم الذي نشره العمروي). وأخرجه أبو يعلى (٦٠٥٢)، والعقيلي في "الضعفاء" ٤/ ٥٠، والطبراني في "الأوسط" (٥٧٢٣) من طريق محمَّد بن الحسن الأسدي، به. وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" ٨/ ٣٥٩، والخطيب في "تاريخ بغداد" ٣/ ٣٩٧ من طريق منخل بن حكيم، عن ابن عون، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة. وهذا سند ضعيف.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ شَرِيكٍ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ سَعْدٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " سِبَابُ الْمُسْلِمِ فُسُوقٌ وَقِتَالُهُ كُفْرٌ " .
সা’দ (বিন আবূ ওয়াক্কাস) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মুসলমানকে গালি দেয়া ফাসেকী এবং তাকে হত্যা করা কুফরী। [৩২৭৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، شريك: هو ابن عبد الله النخعي، وهو وإن كان سيئ الحفظ متابع، وباقي رجاله ثقات. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله بن عبيد السبيعي، وسعد: هو الصحابي الجليل سعد بن أبي وقاص. وأخرجه أحمد في "المسند" (١٥٣٧)، والبخاري في "الأدب المفرد" (٤٢٩) من طريق زكريا بن أبي زائدة، والطبراني في "الكبير" (٣٢٥) من طريق روح بن مسافر، كلاهما عن أبي إسحاق، به. وأخرجه النسائي ٧/ ١٢١ من طريق معمر، عن أبي إسحاق، عن عمر بن سعد، عن أببه سعد.