সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا مَجْزَأَةُ بْنُ سُفْيَانَ بْنِ أَسِيدٍ، مَوْلَى ثَابِتٍ الْبُنَانِيِّ حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الصَّائِغُ، عَنْ ثَابِتٍ الْبُنَانِيِّ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " بَشِّرِ الْمَشَّائِينَ فِي الظُّلَمِ إِلَى الْمَسَاجِدِ بِالنُّورِ التَّامِّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ " .
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, রাতের অন্ধকারে মসজিদসমুহে যাতায়াতকারীদেরকে কিয়ামাতের দিনের পরিপূর্ণ নূরের সুসংবাদ দাও। [৭৭৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف سلمان بن داود، فقد قال عنه العقيلي ٢/ ١٤٠: لا يتابع على حديثه، ولا يُعرف إلا به. وسماه سليمان بن مسلم، وقال البوصيري في "مصباح الزجاجة" ورقة ٥٣: روى عن ثابت، وقيل: عن أبيه عن ثابت، وليس له عند ابن ماجه سوى هذا الحديث، ولم يكن له شيء في بقية الكتب، ومجزأة لم أرَ لأحد فيه كلامًا. رواه الحاكم في "المستدرك" عن أبي بكر بن إسحاق الفقيه، عن محمَّد بن أيوب، عن سليمان بن مسلم، عن أبيه، عن ثابت، به، فاضطرب إسناده. وأخرجه ابن الجوزي في "العلل المتناهية" (٦٨٥) من طريق ابن ماجه، بهذا الإسناد. وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" ٢/ ١٤٠، والقضاعي في "مسند الشهاب" (٧٥١)، والحاكم ٢/ ٢١١، والبيهقي ٣/ ٦٣ من طرق عن داود بن سليمان بن مسلم، عن أبيه، عن ثابت البناني، عن أنس. وأخرجه الطبراني في "المعجم الأوسط" (٥٩٥٣) عن محمَّد بن محمَّد التمار، عن سليمان بن داود بن سليمان مؤذن مسجد ثابت البناني، قال: حدثني أبي، عن ثابت، عن أنس. وأخرجه القُضاعي (٧٥٣) من طريق أبي هاشم كثير بن سُليم الأبلِّي، عن أنس ابن مالك. وأبو هاشم هذا قال عنه الذهبي في "المقتنَى": واهٍ.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنِ ابْنِ أَبِي ذِئْبٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ مِهْرَانَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " الأَبْعَدُ فَالأَبْعَدُ مِنَ الْمَسْجِدِ أَعْظَمُ أَجْرًا " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, মসজিদ থেকে দূরে আরও দূরে বসবাসকারীর জন্য রয়েছে মহা পুরস্কার। [৭৮০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في الشواهد، عبد الرحمن بن مهران لم يرو عنه غير ابن أبي ذئب -واسمه محمَّد بن عبد الرحمن بن المغيرة بن الحارث-، ولم يوثقه غير ابن حبان، فهو في عداد المجهولين، وقال الدارقطني: يعتبر به. وأخرجه أبو داود (٥٥٦) من طريق يحيى بن سعيد، عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٨٦١٨). وفي باب فضل كثرة الخطأ إلى المساجد لبعد المنزل انظر حديث أنس عند البخاري (٦٥٥) و (٦٥٦)، وهو في "المسند" (١٢٠٣٣). وسيأتي (٧٨٤). وحديث جابر عند مسلم (٦٦٤) و (٦٦٥)، وهو في "المسند" (١٤٥٦٦). وحديث أبي بن كعب عند مسلم (٦٦٣)، وهو في "المسند" (٢١٢١٢). وسيأتي بعده. وحديث أبي سعيد الخدري عند الترمذي (٣٢٢٦).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ، حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ عَبَّادٍ الْمُهَلَّبِيُّ، حَدَّثَنَا عَاصِمٌ الأَحْوَلُ، عَنْ أَبِي عُثْمَانَ النَّهْدِيِّ، عَنْ أُبَىِّ بْنِ كَعْبٍ، قَالَ كَانَ رَجُلٌ مِنَ الأَنْصَارِ بَيْتُهُ أَقْصَى بَيْتٍ بِالْمَدِينَةِ وَكَانَ لاَ تُخْطِئُهُ الصَّلاَةُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ . قَالَ فَتَوَجَّعْتُ لَهُ فَقُلْتُ يَا فُلاَنُ لَوْ أَنَّكَ اشْتَرَيْتَ حِمَارًا يَقِيكَ الرَّمَضَ وَيَرْفَعُكَ مِنَ الْوَقَعِ وَيَقِيكَ هَوَامَّ الأَرْضِ . فَقَالَ وَاللَّهِ مَا أُحِبُّ أَنَّ بَيْتِي بِطُنُبِ بَيْتِ مُحَمَّدٍ ـ صلى الله عليه وسلم ـ . قَالَ فَحَمَلْتُ بِهِ حِمْلاً حَتَّى أَتَيْتُ بَيْتَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَذَكَرْتُ ذَلِكَ لَهُ فَدَعَاهُ فَسَأَلَهُ فَذَكَرَ لَهُ مِثْلَ ذَلِكَ وَذَكَرَ أَنَّهُ يَرْجُو فِي أَثَرِهِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّ لَكَ مَا احْتَسَبْتَ " .
উবাই বিন কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক আনসারী ব্যক্তির বাড়ি ছিল মাদীনাহর শেষ প্রান্তে। সে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাতে উপস্থিত হতে কখনো ভুল করতো না। রাবী বলেন, তার জন্য আমার মনে কষ্ট অনুভব করলাম। তাই আমি বললাম, হে অমুক! একটি গাধা কিনে নিলে তা তোমাকে গরম থেকে, পথের কষ্ট–কাঠিন্য থেকে এবং মাটির কীট-পতঙ্গ থেকে রেহাই দিত। লোকটি বলল, আল্লাহ্র শপথ! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরের লাগোয়া আমার ঘর হোক, এটাও আমার পছন্দনীয় নয়। রাবী বলেন, আমি তার কষ্টে ব্যথিত হলাম, অবশেষে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাড়িতে উপস্থিত হয়ে তাঁর নিকট বিষয়টি উপস্থাপন করলাম। তিনি তাকে ডেকে জিজ্ঞেস করলে সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একই কথা ব্যক্ত করে। সে আরো উল্লেখ করে যে, সে তার পদক্ষেপসমূহের নেকী আশা করে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, তুমি যেরূপ আশা করছো তদ্রূপই পাবে। [৭৮১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (٦٦٣) من طريق عاصم الأحول، ومسلم (٦٦٣)، وأبو داود (٥٥٧) من طريق سليمان التيمي، كلاهما عن أبي عثمان النهدي، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٢١٢)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٤٥). وقوله: "الرَّمَض": بفتحتين، شدةُ وقْع الشمس على الرمْل وغيره. و"الوَقَعُ"، بفتحتين، أي: الحجارة المحدَّدة. وقوله: "بطُنُب" بضمتين، أو سكون الثاني: الحبل الذي تُشَدُّ به الخيمة ونحوها، والجمع أطناب. والمعنى: ما أحب أن يكون بيتي إلى جانب بيته ﷺ، لأني أحتسب عند الله كثرة خطاي من بيتي إلى المسجد.
حَدَّثَنَا أَبُو مُوسَى، مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ الْحَارِثِ، حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ أَرَادَتْ بَنُو سَلِمَةَ أَنْ يَتَحَوَّلُوا، مِنْ دِيَارِهِمْ إِلَى قُرْبِ الْمَسْجِدِ فَكَرِهَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَنْ يُعْرُوا الْمَدِينَةَ فَقَالَ " يَا بَنِي سَلِمَةَ أَلاَ تَحْتَسِبُونَ آثَارَكُمْ " . فَأَقَامُوا .
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, বনূ সালিমার লোকেরা তাদের বাড়িঘর মসজিদে নববীর নিকটে স্থানান্তরিত করার ইচ্ছা করলো। কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনাহর প্রান্ত এলাকা জনশূন্য হওয়া অপছন্দ করলেন। তাই তিনি বলেন, হে বনূ সালিমা! তোমরা কি তোমাদের পদক্ষেপের নেকী আশা করো না? অতএব তারা স্বস্থানেই থেকে গেল। [৭৮২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٥٥) و (٦٥٦) و (١٨٨٧) من طرق عن حميد الطويل، به. وهو في "المسند" (١٢٠٣٣). قوله: "أن يُعروا المدينة" أي: أن يُخلوها، من العراء وهو الخلاء.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كَانَتِ الأَنْصَارُ بَعِيدَةً مَنَازِلُهُمْ مِنَ الْمَسْجِدِ فَأَرَادُوا أَنْ يَقْتَرِبُوا فَنَزَلَتْ {وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا وَآثَارَهُمْ} قَالَ فَثَبَتُوا .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসারদের বসতি মসজিদে নববী থেকে দূরে ছিল। তারা মসজিদের কাছাকাছি স্থানান্তরিত করতে চাইলে এ আয়াত নাযিল হয় (অনুবাদ) : “আমি লিখে রাখি যা তারা অগ্রে পাঠায় এবং যা তারা পিছনে রেখে যায়” (সূরাহ ইয়াসীনঃ ১২)। রাবী বলেন, তখন তারা তাদের অবস্থানে বহাল থাকেন। [৭৮৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سماک عن عکرمۃ: ضعیف ، و للحدیث شاھد ضعیف عند الترمذي (3226) والحدیث السابق، (الأصل: 784) یغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 407)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، سماك -وهو ابن حرب- مضطرب في روايته عن عكرمة. وكيع: هو ابن الجراح، وإسرائيل: هو ابن يونس السبيعي. وأخرجه الطبري في "تفسيره" ٢٢/ ١٥٤ من طريقين عن إسرائيل، بهذا الإسناد. ويشهد له ما قبله، وما سلف برقم (٧٨٣). وله شاهد آخر من حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (٦٦٤) و (٦٦٥). وآخر من حديث أبي سعيد الخدري عند الترمذي (٣٥٠٦)، وقال: حديث حسن غريب.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " صَلاَةُ الرَّجُلِ فِي جَمَاعَةٍ تَزِيدُ عَلَى صَلاَتِهِ فِي بَيْتِهِ وَصَلاَتِهِ فِي سُوقِهِ بِضْعًا وَعِشْرِينَ دَرَجَةً " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম), বলেছেন, কোন ব্যক্তির জামাআতে সালাত তার ঘরে বা বাজারে পড়া সালাত অপেক্ষা বিশ গুণের অধিক মর্যাদাপূর্ণ। [৭৮৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير. وأخرجه ضمن حديث مطول البخاري (٤٧٧)، ومسلم بإثر الحديث (٦٦١)، وأبو داود (٥٥٩) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. وهو في "المسند" (٧٤٣٠)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٤٣). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا أَبُو مَرْوَانَ، مُحَمَّدُ بْنُ عُثْمَانَ الْعُثْمَانِيُّ حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ سَعْدٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " فَضْلُ الْجَمَاعَةِ عَلَى صَلاَةِ أَحَدِكُمْ وَحْدَهُ خَمْسٌ وَعِشْرُونَ جُزْءًا " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ জামাআতের ফাদীলাত তোমাদের কারো একাকী সালাত পড়ার তুলনায় পঁচিশ গুণ বেশি। [৭৮৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٤٨)، ومسلم (٦٤٩)، والترمذي (٢١٤)، والنسائي ١/ ٢٤١ و ٢/ ١٠٣ من طريق الزهري، به. وقرن البخاري بسعيد بن المسيب أبا سلمة بن عبد الرحمن بن عوف وكذا مسلم في إحدى روايات الحديث عنده. وهو في "المسند" (٧١٨٥). وانظر الحديث السالف.
حَدَّثَنَا أَبُو كُرَيْبٍ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنْ هِلاَلِ بْنِ مَيْمُونٍ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " صَلاَةُ الرَّجُلِ فِي جَمَاعَةٍ تَزِيدُ عَلَى صَلاَتِهِ فِي بَيْتِهِ خَمْسًا وَعِشْرِينَ دَرَجَةً " .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, কোন ব্যক্তির জামাআতের সালাত তার বাড়িতে পরা সালাত অপেক্ষা পঁচিশ গুণ বেশি মর্যাদাপূর্ণ। [৭৮৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد جيد من أجل هلال بن ميمون، وقد توبع. وأخرجه أبو داود (٥٦٠) من طريق أبي معاوية، بهذا الإسناد، وزاد في روايته: "فإذا صلاها في فلاة، فأتم ركوعها وسجودها بلغت خمسين صلاة". وهو في "صحيح ابن حبان" (١٧٤٩). وأخرجه البخاري (٦٤٦) من طريق عبد الله بن خباب، عن أبي سعيد الخدري. وهو في "مسند أحمد" (١١٥٢١).
حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عُمَرَ، رُسْتَهْ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " صَلاَةُ الرَّجُلِ فِي جَمَاعَةٍ تَفْضُلُ عَلَى صَلاَةِ الرَّجُلِ وَحْدَهُ بِسَبْعٍ وَعِشْرِينَ دَرَجَةً " .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, কোন ব্যক্তির জামাআতের সালাত তার একাকী পড়া সালাত অপেক্ষা সাতাশ গুণ বেশি মর্যাদাপূর্ণ। [৭৮৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٤٥)، ومسلم (٦٥٠)، والترمذي (٢١٥)، والنسائي ٢/ ١٠٣ من طريقين عن نافع مولى ابن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٧٠) و (٥٣٣٢)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٥٢).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مَعْمَرٍ، حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ الْحَنَفِيُّ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَصِيرٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أُبَىِّ بْنِ كَعْبٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " صَلاَةُ الرَّجُلِ فِي جَمَاعَةٍ تَزِيدُ عَلَى صَلاَةِ الرَّجُلِ وَحْدَهُ أَرْبَعًا وَعِشْرِينَ أَوْ خَمْسًا وَعِشْرِينَ دَرَجَةً " .
উবাই বিন কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, কোন ব্যক্তির জামাআতে সালাত তার একাকী পড়া সালাত অপেক্ষা চব্বিশ কিংবা পঁচিশ গুণ বেশি মর্যাদাপূর্ণ। [৭৮৮]
তাহকীক আলবানীঃ (আরবি) কথাটি ছাড়া সহীহ। সহীহ আবূ দাঊদ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح دون قوله أربعا وعشرين
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن أبي بصير، قال الحافظ في "الفتح" ٢/ ١٣٢ بعد أن نسب الحديث لجمع من الصحابة: واتفق الجميع على "خمس وعشرين" سوى رواية أُبي، فقال: أربع أو خمس على الشك، ولا أثر للشك. وأخرجه ضمن حديث مطول الضياء في "المختارة" (١١٩٦) من طريق محمَّد ابن معمر، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " لَقَدْ هَمَمْتُ أَنْ آمُرَ بِالصَّلاَةِ فَتُقَامَ ثُمَّ آمُرَ رَجُلاً فَيُصَلِّيَ بِالنَّاسِ ثُمَّ أَنْطَلِقَ بِرِجَالٍ مَعَهُمْ حُزَمٌ مِنْ حَطَبٍ إِلَى قَوْمٍ لاَ يَشْهَدُونَ الصَّلاَةَ فَأُحَرِّقَ عَلَيْهِمْ بُيُوتَهُمْ بِالنَّارِ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, আমার ইচ্ছা হয় যে, আমি সালাত কায়েমের নির্দেশ দেই এবং এক ব্যক্তিকে লোকেদের নিয়ে সালাত আদায় করতে আদেশ করি। অতঃপর আমি লাকড়িসহ একদল লোককে নিয়ে বেরিয়ে যাই সেইসব লোকের নিকট যারা জাআমাতে উপস্থিত হয়নি, অতঃপর তাদেরসহ তাদের বসতি আগুন দিয়ে ভস্মীভূত করে দেই। [৭৮৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٥٧)، ومسلم (٦٥١)، وأبو داود (٥٤٨) من طريق سليمان بن مهران الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٩٤٨٦)، و"صحيح ابن حبان" (٢٥٩٧). وأخرجه البخاري (٦٤٤) و (٢٤٢٠)، ومسلم (٦٥١)، وأبو داود (٥٤٩)، والترمذي (٢١٧)، والنسائي ٢/ ١٠٧ من طرق عن أبي هريرة. وهو في "المسند" (٧٣٢٨)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٩٦).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ زَائِدَةَ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنْ أَبِي رَزِينٍ، عَنِ ابْنِ أُمِّ مَكْتُومٍ، قَالَ قُلْتُ لِلنَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ إِنِّي كَبِيرٌ ضَرِيرٌ شَاسِعُ الدَّارِ وَلَيْسَ لِي قَائِدٌ يُلاَوِمُنِي فَهَلْ تَجِدُ لِي مِنْ رُخْصَةٍ قَالَ " هَلْ تَسْمَعُ النِّدَاءَ " . قُلْتُ نَعَمْ . قَالَ " مَا أَجِدُ لَكَ رُخْصَةً " .
আবদুল্লাহ বিন উম্মু মাকতূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম), কে বললাম, আমি বৃদ্ধ ও অন্ধ, আমার বসতিও দূরে এবং আমার সাহায্যকারী কোন পরিচালকও নেই। সুতরাং আপনি কি (আমাকে জামাআতে হাযির না হওয়ার ব্যাপারে) অবকাশ (অনুমতি) দিবেন? তিনি বলেন, তুমি কি আযান শুনতে পাও? আমি বললাম, হাঁ। তিনি বলেন, আমি তোমার জন্য অবকাশ পাচ্ছি না। [৭৯০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (552)، (انوار الصحیفہ ص 407)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، أبو رزين -وهو مسعود بن مالك الأسدي- لم يسمع من ابن أم مكتوم، فيما نص عليه ابن معين وابن القطان لكنه قد توبع. عاصم: هو ابن بهدلة، وهو ابن أبي النجود أيضًا. وأخرجه أحمد (١٥٤٩٠)، وأبو داود (٥٥٢) من طريق عاصم بن بهدلة، به. وأخرجه بنحوه أبو داود (٥٥٣)، والنسائي ٢/ ١٠٩ - ١١٠ من طريق عبد الرحمن ابن أبي ليلى، وأحمد (١٥٤٩١)، وابن خزيمة (١٤٧٩)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٥٠٨٧)، والدارقطني (١٤٣٥)، والحاكم ١/ ٢٤٧ من طريق عبد الله بن شداد بن الهاد، والطحاوي (٥٠٨٦)، والحاكم ٣/ ٦٣٥ من طريق زر بن حبيش، ثلاثتهم عن ابن أم مكتوم. قال الطحاوي بإثر حديث زر بن حبيش: هذا الحديث أحسن ما وجدنا في هذا الباب، وصحح سماع عبد الله بن شداد وزر بن حبيش من ابن أم مكتوم، وجود الحافظ المنذري في "الترغيب والترهيب" ١/ ٢٧٤ إسناد رواية ابن شداد. وأخرج ابن أبي شيبة ١/ ٣٤٦، والطحاوي في "شرح المشكل" (٥٠٨٩) من طريق عمرو بن مرة، عن أبي رزين، عن أبي هريرة، قال: جاء ابن أم مكتوم … الحديث. وسنده صحيح، وهذا يؤيد أن أبا رزين لم يسمعه من ابن أم مكتوم مباشرة. وفي الباب عند أبي هريرة عند مسلم (٦٥٣).
حَدَّثَنَا عَبْدُ الْحَمِيدِ بْنُ بَيَانٍ الْوَاسِطِيُّ، أَنْبَأَنَا هُشَيْمٌ، عَنْ شُعْبَةَ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَنْ سَمِعَ النِّدَاءَ فَلَمْ يَأْتِهِ فَلاَ صَلاَةَ لَهُ إِلاَّ مِنْ عُذْرٍ " .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি আযান শুনল এবং তার কোন ওযর না থাকা সত্ত্বেও জামাআতে উপস্থিত হলো না, তার সালাত নাই। [৭৯১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * رجاله ثقات، إلا أن هشيمًا لم يصرح بالسماع هنا ولا عند ابن حبان، ورواه الحاكم ١/ ٢٤٥ من طريق هشيم قال: حدثنا شعبة. وقد رواه غير واحد من الثقات من أصحاب شعبة فاوقفوه على ابن عباس، منهم وهب بن جرير، وحفص ابن عمر الحوضي، وسليمان بن حرب، ووكيع بن الجراح، وعلي بن الجعد. انظر "مصنف ابن أبي شيبة" ١/ ٣٤٥، و"مسند ابن الجعد" (٤٩٦)، و"سنن البيهقي" ٣/ ١٧٤. وصحح وقفه عبد الحق الإشبيلي في "الأحكام الوسطى" ١/ ٢٧٤، وأقره ابن القطان في "الوهم والإيهام" ٣/ ٩٦. وأخرجه أبو داود (٥٥١) من طريق أبي جناب يحيى بن أبي حية الكلبي، عن مغراء العبدي، عن عدي بن ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس رفعه: "من سمع المنادي فلم يمنعه من اتباعه عُذرٌ- قالوا: وما العذر؟ قال: خوف أو مرض- لم تُقبل منه الصلاة التي صلى"، وهذا سند ضعيف لضعف أبي جناب الكلبي. وهو عند ابن حبان في "صحيحه" (٢٠٦٤) من طريق هُشيبم بن بشير. وقال بإثره: في هذا الخبر دليل أن أمر النبي ﷺ بإتيان الجماعات أمرُ حَتم لا ندب، إذ لو كان القصد في قوله: "فلا صلاة له إلا من عذرِ" يُريد به في الفضل، لكان المعذور إذا صلى وحده، كان له فضل الجماعة، فلما استحال هذا وبطل، ثبت أن الأمر بإتيان الجماعة أمر إيجاب لا ندبِ.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ هِشَامٍ الدَّسْتَوَائِيِّ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، عَنِ الْحَكَمِ بْنِ مِينَاءَ، أَخْبَرَنِي ابْنُ عَبَّاسٍ، وَابْنُ، عُمَرَ أَنَّهُمَا سَمِعَا النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ عَلَى أَعْوَادِهِ " لَيَنْتَهِيَنَّ أَقْوَامٌ عَنْ وَدْعِهِمُ الْجَمَاعَاتِ أَوْ لَيَخْتِمَنَّ اللَّهُ عَلَى قُلُوبِهِمْ ثُمَّ لَيَكُونُنَّ مِنَ الْغَافِلِينَ " .
ইবনু আব্বাস ও ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তারা উভয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে তাঁর কাঠের মিম্বারের উপর থেকে বলতে শুনেছেনঃ লোকেরা অবশ্যই যেন জামাআত ত্যাগ করা থেকে বিরত থাকে। অন্যথায় আল্লাহ অবশ্যই তাদের অন্তরে সীলমোহর মেরে দিবেন, অতঃপর তারা বিস্মৃতদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে পড়বে। [৭৯২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح بلفظ: "الجُمُعات" لا "الجماعات"، وإن بوب له ابن ماجه بالتغليظ في التخلف عن الجماعة، ذلك أن مخرجي الحديث قد رووه بلفظ: "الجُمُعات"، والحديث هنا قد دلسه يحيى بن أبي كثير، إذ بينه وبين الحكم بن ميناء رجل أو رجلان أو أكثر كما سيأتي. فقد أخرجه أحمد (٣٠٩٩)، وابن حبان (٢٧٨٥) من طريقين عن هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلام، عن الحكم بن ميناء، عن ابن عمر وابن عباس. وأخرجه أحمد (٢٢٩٠) من طريق أبان العطار، والنسائي في "الكبرى" (١٦٧١) من طريق علي بن المبارك، كلاهما عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلام، عن أبي سلام، عن الحكم بن ميناء، عن ابن عمر وابن عباس. وأخرجه النسائي ٣/ ٨٨ - ٨٩ من طريق أبان العطار، عن يحيى بن أبي كثير، عن الحضرمي بن لاحق، عن زيد بن سلام، عن أبي سلام، عن الحكم بن ميناء، عن ابن عباس وابن عمر. قلنا: لعل هذه الرواية هي أصح الروايات عن يحيى بن أبي كثير، والله تعالى أعلم. وأخرجه مسلم (٨٦٥) من طريق معاوية بن سلام، عن زيد بن سلام، عن أبي سلام، عن الحكم بن ميناء، عن ابن عمر وأبي هريرة.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ الْهُذَلِيُّ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، عَنِ ابْنِ أَبِي ذِئْبٍ، عَنِ الزِّبْرِقَانِ بْنِ عَمْرٍو الضَّمْرِيِّ، عَنْ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " لَيَنْتَهِيَنَّ رِجَالٌ عَنْ تَرْكِ الْجَمَاعَةِ أَوْ لأُحَرِّقَنَّ بُيُوتَهُمْ " .
উসামাহ বিন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, লোকজনকে অবশ্যই জামাআত ত্যাগ করা থেকে বিরত থাকতে হবে, অন্যথায় আমি তাদের ঘরবাড়ি ভস্মীভূত করে দিবো। [৭৯৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لانقطاعه، فإن الزِّبرقان بن عمرو لم يسمع من أسامة بن زيد فيما ذكره المزي في "التهذيب". قلنا: بينهما فيه رجل يقال له: زُهرة، وهو مجهول، ثم إن الوليد بن مسلم مدلس، وقد عنعن. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٤) من طريق يحيى القطان، عن ابن أبي ذئب، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٧٩٢)، وصححه الضياء في "مختارته" (١٣١٠)! وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٩) من طريق أبي داود الطيالسي، عن ابن أبي ذئب، عن الزبرقان، عن زهرة، عن أسامة وزيد بن ثابت. وأخرجه كذلك (٣٦٠) من طريق عثمان بن عثمان الغطفاني، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن زيد بن ثابت، وقال النسائي بإثره: هذا خطأ، والصواب: ابن أبي ذئب، عن الزبرقان بن عمرو بن أمية، عن زيد بن ثابت وأسامة بن زيد. ويشهد له حديث أبي هريرة السالف برقم (٧٩١).
حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ إِبْرَاهِيمَ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، حَدَّثَنَا الأَوْزَاعِيُّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ أَبِي كَثِيرٍ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيُّ، حَدَّثَنِي عِيسَى بْنُ طَلْحَةَ، حَدَّثَتْنِي عَائِشَةُ، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " لَوْ يَعْلَمُ النَّاسُ مَا فِي صَلاَةِ الْعِشَاءِ وَصَلاَةِ الْفَجْرِ لأَتَوْهُمَا وَلَوْ حَبْوًا " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, যদি লোকেরা ইশা ও ফজরের সালাতের যে কত ফাদীলাত তা জানতো, তাহলে অবশ্যই তারা এই দু’সালাতে হামাগুড়ি দিয়ে হলেও উপস্থিত হত। [৭৯৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٨٦) من طريق أبان بن يزيد العطار، عن يحيى بن أبي كثير، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٣٨٥) من طريق شيبان بن عبد الرحمن النحوي، عن يحيى ابن أبي كثير، عن محمَّد بن إبراهيم، عن يُحنَّس بن أبي موسى، عن عائشة. فذكر يحنَّس، بدل: عيسى. وكلاهما ثقة، فلا يضر ذلك بصحة إسناد الحديث. وهو في "المسند" (٢٤٥٠٦) من طريق شيان.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، أَنْبَأَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّ أَثْقَلَ الصَّلاَةِ عَلَى الْمُنَافِقِينَ صَلاَةُ الْعِشَاءِ وَصَلاَةُ الْفَجْرِ وَلَوْ يَعْلَمُونَ مَا فِيهِمَا لأَتَوْهُمَا وَلَوْ حَبْوًا " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন রসূলুল্লাহ (সাল্ললাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, মুনাফিকদের সবচেয়ে ভারবহ (কষ্টকর) হচ্ছে ইশা এবং ফজরের সালাত। তারা যদি এই দু’সালাতের ফাদীলাত সম্পর্কে অবহিত থাকতো, তাহলে অবশ্যই তারা হামাগুড়ি দিয়ে হলেও তাতে হাযির হতো। [৭৯৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٥٧)، ومسلم (٦٥١) من طريق الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٩٤٨٦)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٩٨). وأخرجه البخاري (٦١٥)، ومسلم (٤٣٧)، والنسائي ١/ ٢٦٩ و ٢/ ٢٣ من طريق مالك بن أنس، عن سمّي مولى أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أبي صالح، به. وهو في "المسند" (٧٢٢٦)، و"صحيح ابن حبان" (١٦٥٩).
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ عَيَّاشٍ، عَنْ عُمَارَةَ بْنِ غَزِيَّةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَنَّهُ كَانَ يَقُولُ " مَنْ صَلَّى فِي مَسْجِدٍ جَمَاعَةً أَرْبَعِينَ لَيْلَةً لاَ تَفُوتُهُ الرَّكْعَةُ الأُولَى مِنْ صَلاَةِ الْعِشَاءِ كَتَبَ اللَّهُ لَهُ بِهَا عِتْقًا مِنَ النَّارِ " .
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেনঃ যে ব্যাক্তি মসজিদে এসে জামাআতের সাথে চল্লিশ রাত তাকবীরে ঊলাসহ ইশার সালাত পড়বে, তার বিনিময়ে আল্লাহ জাহান্নাম থেকে তার মুক্তির সনদ লিখে দেন। [৭৯৬]
তাহকীক আলবানীঃ ইশার প্রথম তাকবীর ছুটবে না-একথা ছাড়া হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن دون قوله لا تفوته الركعة الأولى من صلاة العشاء
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، قال البوصیري: ’’ عمارۃ لم یدرک أنسًا ولم یلقہ‘‘ فالسند، منقطع ، (انوار الصحیفہ ص 407)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، إسماعيل بن عياش ضعيف في روايته عن غير أهل بلده، وهذا منها، ثم إن عمارة بن غزية لم يسمع من أنس فيما قاله الترمذي والدارقطني. وقد رجح الترمذي الموقوف عند الحديث رقم (٢٣٨). وأخرجه أبو يعلى في "المسند الكبير" كما في "مسند الفاروق" لابن كثير ١/ ١٩٧، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٢٨٧٦)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" ١٢/ ورقة ٤٧٥ من طريق إسماعيل بن عياش، بهذا الإسناد. وذكر الدارقطني في "العلل" ٢/ ١١٨ أن محمَّد بن إسحاق قد رواه كإسماعيل ابن عياش، يعني أنه تابعه. ورواه يحيى بن أيوب، عن عمارة بن غزية، عن رجل، عن أنس، عن عمر فيما قاله الدارقطني في "العلل" ٢/ ١١٨. وقد روي من أوجه أخرى لا يصح منها شيء، وقد بسطنا القول في عللها وتخريجها في "جامع الترمذي" عند الحديث رقم (٢٣٨).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّ أَحَدَكُمْ إِذَا دَخَلَ الْمَسْجِدَ كَانَ فِي صَلاَةٍ مَا كَانَتِ الصَّلاَةُ تَحْبِسُهُ وَالْمَلاَئِكَةُ يُصَلُّونَ عَلَى أَحَدِكُمْ مَادَامَ فِي مَجْلِسِهِ الَّذِي صَلَّى فِيهِ يَقُولُونَ اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ اللَّهُمَّ ارْحَمْهُ اللَّهُمَّ تُبْ عَلَيْهِ مَا لَمْ يُحْدِثْ فِيهِ مَا لَمْ يُؤْذِ فِيهِ " .
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কেউ যখন মসজিদে প্রবেশ করে এবং যতক্ষণ সালাত তাকে আটক রাখে, ততক্ষণ সে সালাতের মধ্যে থাকে। তোমাদের কেউ যে মজলিসে সালাত পড়েছে তাতে যতক্ষণ সে অবস্থান করে ততক্ষণ ফেরেশতারা তার জন্য দুআ করতে থাকেন। তারা বলেন, “হে আল্লাহ্! তাকে ক্ষমা করুন। হে আল্লাহ্! তাকে অনুগ্রহ করুন। হে আল্লাহ্! তার তওবা কবূল করুন।” যতক্ষণ না তার উদূ ছুটে যায়, যতক্ষণ না সে কাউকে কষ্ট দেয় (ততক্ষণ এ দুআ চলতে থাকে)। [৭৯৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمَّد بن خازم الضرير. وأخرجه البخاري (٤٧٧) و (٦٤٧) و (٢١١٩)، ومسلم بإثر (٦٦١) / (٢٧٢)، وأبو داود (٥٥٩)، والنسائي في الملائكة من "الكبرى" كما في "تحفة الأشراف" ٩/ ٣٥٣ من طريق سليمان بن مهران الأعمش، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٤٤٥) و (٦٥٩)، ومسلم بإثر (٦٦١)، وأبو داود (٤٦٩) و (٤٧٠)، والنسائي ٢/ ٥٥ من طريق عبد الرحمن الأعرج، والبخاري (١٧٦) من طريق سعيد المقبري، ومسلم بإثر (٦٦١)، وأبو داود (٤٧١) من طريق أبي رافع نفيع الصائغ، ومسلم بإثر (٦٦١)، والنسائي في الملائكة من "الكبرى" كما في "تحفة الأشراف" ١٠/ ٣٣٠ و ٣٤٣ و ٣٥٦ من طريق محمَّد بن سيرين، ومسلم بإثر (٦٦١) من طريق همام بن منبه، خمستهم عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٤٣٠)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٤٣). وانظر ما سلف برقم (٧٧٤).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا شَبَابَةُ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي ذِئْبٍ، عَنِ الْمَقْبُرِيِّ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَا تَوَطَّنَ رَجُلٌ مُسْلِمٌ الْمَسَاجِدَ لِلصَّلاَةِ وَالذِّكْرِ إِلاَّ تَبَشْبَشَ اللَّهُ لَهُ كَمَا يَتَبَشْبَشُ أَهْلُ الْغَائِبِ بِغَائِبِهِمْ إِذَا قَدِمَ عَلَيْهِمْ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নাবী (সাল্ললাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, কোন মুসলিম ব্যক্তি যতক্ষণ মসজিদে সালাত ও যিকিরে রত থাকে ততক্ষণ আল্লাহ তাঁর প্রতি এতটা আনন্দিত হন, প্রবাসী ব্যক্তি তাঁর পরিবারে ফিরে এলে তারা তাকে পেয়ে যেরূপ আনন্দিত হয়। [৭৯৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * رجاله ثقات رجال الشيخين، وقد اختلف في إسناده كما سيأتي بيانه، ومع ذلك فقد صحيح إسناده البوصيري في "مصباح الزجاجة" ورقة ٥٤، وسكت عنه عبد الحق الإشبيلي. وأخرجه الطيالسي (٢٣٣٤)، وابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" بإثر (١٤٧٨)، وأحمد بن حنبل (٨٣٥٠) و (٩٨٤١)، وابن خزيمة (١٥٠٣)، وابن حبان (١٦٠٧) و (٢٢٧٨)، والحاكم في "المستدرك" ١/ ٢١٣، وأبو سعد السمعاني في "أدب الإملاء" ص ٤٣ من طرق عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. وصححه الحاكم ووافقه الذهبي. وأخرجه أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (١٤٧٧)، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (٢٩٣٩) من طريقين عن ابن أبي ذئب، عن المقبري، عن أبي هريرة. فأسقط من إسناده سعيد بن يسار! وأخرجه أحمد (٨٠٦٥) عن هاشم بن القاسم، وابن خزيمة (١٤٩١) من طريق شعيب بن الليث بن سعد، كلاهما عن الليث بن سعد، عن سعيد المقبري، عن أبي عبيدة، عن سعيد بن يسار، عن أبي هريرة. فزاد في إسناده أبا عبيدة، وهو مجهول كما قال الدارقطني في "العلل" ٣/ ورقة ١٩٦. وأخرجه الحارث بن محمَّد بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (١٤٧٨) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، عن الليث، عن المقبري، عن سعيد بن يسار، عن أبي هريرة. فأسقط من إسناده أبا عبيدة. وذكر الدارقطني في "العلل " ٣/ ورقة ١٩٦ أن قتيبة بن سعيد قد رواه عن الليث كذلك. وأخرجه ابن خزيمة (٣٥٩) عن محمَّد بن بشار بندار، عن يحيى القطان، عن ابن عجلان، عن سعيد المقبري، عن سعيد بن يسار، عن أبي هريرة. وأخرجه مسدد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (١٤٧٦) عن يحيى القطان، به، لكنه وقفه على أبي هريرة. والبَشُّ: قال ابن الأثير: فرح الصديق بالصديق، واللطف في المسألة والإقبال عليه، وقد بَشِشْت به أبَش، وهذا مثل ضربه لتلقيه إياه ببره وتقريبه وإكرامه.