الحديث


الجامع الكامل
Al-Jami Al-Kamil
আল-জামি` আল-কামিল





الجامع الكامل (3391)


3391 - عن أبي هريرة قال:"إذا خرجتْ روح المؤمن تلقاه ملكان يُصْعِدانها".

قال حماد: فذكر من طيب ريحها، وذكر المسك وقال:"ويقول أهل السماء: روح طيبة جاءت من قبل الأرض، صلى الله عليك وعلى جسد كنتِ تعمرنيه، فينطلق به إلى ربه عز وجل. ثم يقول: انطلقوا به إلى آخر الأجل".

قال:"وإن الكافر إذا خرجتْ روحُه -قال حماد: وذكر من نَتْنِها وذكر لعنًا- ويقول أهل السماء: روح خبيثة جاءت من قبل الأرض قال: فيقال: انطلقوا إلى آخر الأجل". قال أبو هريرة: فرد رسول الله صلى الله عليه وسلم رَيْطَةً كانت عليه على أنفه هكذا.

وفي رواية عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المَيِّتُ تحضُرُه الملائكة، فإذا كان الرجل صالحًا، قالوا: اخرجي أيتها النفس الطيبة! كانت في الجسد الطيب اخرجي حميدة، وأبشري بروحٍ وريحان وربٍّ غير غضبان، فلا يزال يقال لها ذلك، حتى تخرج، ثم يعرجُ بها إلى السماء، فيفتح لها، فيقال: مَنْ هذا؟ فيقولون: فلان، فيقال: مرحبًا بالنفس الطيبة، كانت في الجسد الطيب، ادْخُلي حميدةً، وأبشري بروح وريحان ورب غير غضبان، فلا يزال يقال لها ذلك حتى يُنْتَهى بها إلى السماء التي فيها الله عز وجل، وإذا كان الرجل السوء قال: اخرجي أيتها النفس
الخبيثة! كانت في الجسد الخبيث، اخرجي ذميمة، وأبشري بحميم وغسّاق، وآخر من شكله أزواج، فلا يزال يقال لها ذلك حتى تخرج، ثم يعرجُ بها إلى السماء، فلا يفتح لها، فيقال: مَنْ هذا؟ فيقال: فلان، فيقال: لا مرحبا بالنفس الخبيثة، كانت في الجسد الخبيث، ارجعي ذميمة، فإنها لا تُفتح لك أبواب السماء، فَيُرْسَلُ بها من السماء، ثم تَصِيرُ إلى القبر".

صحيح: الرواية الأولى أخرجها مسلم في الجنة (2872) عن عبيد الله بن عمر القواريري، حدثنا حماد بن زيد، حدثنا بُديل، عن عبد الله بن شقيق، عن أبي هريرة موقوفًا عليه.

وحكمه المرفوع لأنه مثله لا يقال بالرأي، ولذا أخرجه مسلم في صحيحه، وهو الذي جاء في الرواية الثانية مرفوعًا، رواها ابن ماجه (4262) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا شبابة، عن ابن أبي ذئب، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن سعيد بن يسار، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه الإمام أحمد (8769) من وجه آخر عن ابن أبي ذئب به مثله.

ورواه النسائي (1833) من حديث معاذ بن هشام، قال: حدثني أبي، عن قتادة، عن قُسامة بن زهير، عن أبي هريرة مرفوعًا ولفظه:

قال: إذا حُضِر المؤمن أتتْه ملائكة الرحمة بحريرة بيضاء فيقولون: اخرجي راضية مرضيًا عنك إلى روح الله وريحان ورَب غير غضبان فتخرج كأطيب ريح المسك حتى أنه ليُناوِلُهُ بعضُهم بعضًا حتى يأتون به بابَ السماء فيقولون: ما أطيب هذه الريح التي جاءتْكم من الأرض فيأتون به أرواح المؤمنين فلهم أشدُّ فرحًا به من أحدكم بغائبه يقدم عليه فيسألونه ماذا فعل فلانٌ؟ ماذا فعل فلان؟ فيقولون: دعوهُ فإنه كان في غم الدنيا، فإذا قال: أما أتاكم قالوا: ذُهِبَ به إلى أمِّه الهاوية، وإن الكافر إذا احتُضِر أتَتْه ملائكة العذاب بمسح فيقولون: اخْرُجي ساخطةً مسخوطًا عليك إلى عذاب الله عز وجل، فتخرج كأَنتن ريح جيفَة حتى يأتون به باب الأرض فيقولون: ما أنتن هذه الريح حتَّى يأتونَ به أرواحَ الكُفَّار.

وصحَّحه ابن حبان (3014)، والحاكم (1/ 352 - 353) كلاهما من طريق معاذ بن هشام به مثله، وللحاكم أسانيد أخرى وقال في آخرها:"هذه الأسانيد كلها صحيحة" وقال الذهبي:"والكل صحيح".

قوله في حديث مسلم:"انطلقوا به إلى آخر الأجل" أي إلى سدرة المنتهى وذلك بالنسبة لأرواح المؤمنين.

وقوله مرة ثانية:"انطلقوا به إلى آخر الأجل" أي إلى السجين بالنسبة لأرواح الكفار.

وقوله:"رَيْطَة" الريط ثوب رقيق. وكان سبب ردها على الأنف ما ذكر من نتن ريح روح الكافر.




অনুবাদঃ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মুমিন ব্যক্তির রূহ বের হয়, তখন দুজন ফেরেশতা তাকে গ্রহণ করে এবং তারা সেটাকে উপরে আরোহণ করায়। হাম্মাদ (রাহ.) বলেন: তিনি এর সুগন্ধি উল্লেখ করেন এবং কস্তুরীর কথা উল্লেখ করে বলেন: আসমানবাসীগণ বলে, পবিত্র রূহ! যা জমিন থেকে এসেছে। তোমার উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক এবং তুমি যে দেহের মধ্যে বসবাস করতে তার উপরও (আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক)। অতঃপর সেটাকে নিয়ে তার রবের কাছে যাওয়া হয়। এরপর আল্লাহ বলেন: একে শেষ সময় পর্যন্ত নিয়ে যাও। তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন: আর যখন কাফিরের রূহ বের হয়— হাম্মাদ (রাহ.) বলেন: তিনি এর দুর্গন্ধ উল্লেখ করেন এবং অভিশাপের কথা উল্লেখ করেন— তখন আসমানবাসীগণ বলে: এ অপবিত্র রূহ! যা জমিন থেকে এসেছে। তখন বলা হয়: একে শেষ সময় পর্যন্ত নিয়ে যাও। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এ সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিহিত চাদরটি এভাবে তাঁর নাকের ওপর চেপে ধরেন (অর্থাৎ অপবিত্র রূহের দুর্গন্ধের কারণে)।

অপর এক বর্ণনায় আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: যখন মৃত ব্যক্তির কাছে ফেরেশতাগণ উপস্থিত হন, আর যদি লোকটি নেককার হয়, তখন তারা বলেন: হে পবিত্র নফস (আত্মা)! যা পবিত্র দেহের মধ্যে ছিল, বেরিয়ে এসো প্রশংসিত হয়ে, আর সুসংবাদ গ্রহণ করো আল্লাহর আরামদায়ক পরিবেশ, উত্তম প্রতিদান ও অসন্তুষ্ট নন এমন রবের পক্ষ থেকে। তার রূহ বেরিয়ে না আসা পর্যন্ত তাকে এভাবে বলা হতে থাকে। এরপর সেটাকে নিয়ে আসমানের দিকে আরোহণ করা হয়। সেটার জন্য আসমানের দরজা খোলা হয় এবং বলা হয়: এ কে? তারা বলেন: অমুক। তখন বলা হয়: এই পবিত্র আত্মাকে স্বাগতম! যা পবিত্র দেহের মধ্যে ছিল। প্রশংসিত হয়ে প্রবেশ করো এবং সুসংবাদ গ্রহণ করো আল্লাহর আরামদায়ক পরিবেশ, উত্তম প্রতিদান ও অসন্তুষ্ট নন এমন রবের পক্ষ থেকে। সে আসমান পর্যন্ত না পৌঁছা পর্যন্ত তাকে এভাবেই বলা হতে থাকে, যে আসমানে আল্লাহ্ তা‘আলা অবস্থান করেন। আর যদি লোকটি অসৎ হয়, তখন তারা বলেন: হে অপবিত্র নফস! যা অপবিত্র দেহের মধ্যে ছিল, বেরিয়ে এসো নিন্দিত অবস্থায়, আর সুসংবাদ গ্রহণ করো উত্তপ্ত পানি, পূঁজ ও রক্ত এবং অনুরূপ ধরনের অন্যান্য শাস্তির। তার রূহ বের না হওয়া পর্যন্ত তাকে এভাবে বলা হতে থাকে। এরপর সেটাকে নিয়ে আসমানের দিকে আরোহণ করা হয়, কিন্তু তার জন্য আসমানের দরজা খোলা হয় না। তখন জিজ্ঞেস করা হয়: এ কে? তারা বলেন: অমুক। তখন বলা হয়: এই অপবিত্র আত্মাকে স্বাগতম নয়! যা অপবিত্র দেহের মধ্যে ছিল। নিন্দিত অবস্থায় ফিরে যাও, কেননা তোমার জন্য আসমানের দরজা খোলা হবে না। তখন সেটাকে আসমান থেকে নিক্ষেপ করা হয়, অতঃপর সেটা কবরে ফিরে যায়।